सद्दाम का अन्‍त



आज क्रिकेट खेल की तुरन्‍त ही कम्‍पयुटर पर दस्‍तक दी। मन मे खुशी थी। पर अम्‍मा जी ने खबर दी सद्दाम को फॉंसी को दे दिया गया। मन मे अफशोस था। अमेरिकी दबाव मे जो कुकर्म किया गया वह गलत एवं एक जरफा था। मै इस न्‍याय नही कहूँगा यह अन्‍याय को दबाने के लिये अन्‍याय का प्रयोग किया गया। अमेरिकी नीतियॉं कभी विश्‍व मे हित मे नही रही है। अगर अमेरिकी नापक ईरादो को न रोका गया तो वह दिन दूर नही जब विश्‍व का कोई देश उसके नापाक इरादों से बच पाये।
सद्दाम दोषी था उसे फासी दिया जाना सही था किन्‍तु जिस प्रकार य‍ह किया गया क्‍या वह सही था?


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महाशक्ति अधिवक्‍ता-मुंशी क्रिकेट प्रतियोगिता



प्रत्‍येक वर्ष की भातिं इस वर्ष भी महाशक्ति अधिवक्‍ता-मुंशी क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। तथा खिलाडियों की कमी को पूरा करने के लिये उनके परिवारिक सदस्‍यों ने भी विभिन्‍न टीमो मे सदस्‍य को रूप मे भाग लिया। यह मैच प्रथम बार दिसम्‍बर 2004 मे माननीय उच्‍च न्‍यायालय के शीतकालीन अ‍वकाश मे खेला जाता है। यह मैच आपने आप मे अनोखा होता है जिसमे अधिवक्‍ता और मुंन्‍शी आपस मे खेलते है। पूरे साल अधिवक्‍ता और उनके कर्मचारी किसी व्‍यक्ति के साथ न्‍याय (कुछ लोग अन्‍याय ) का पक्ष रखने के लिये प्रत्‍यन्‍न शील रहते है। आपस मे प्रेम भाव मे प्रर्दशन को व्‍यक्‍त करता है।
आज लूकरगंज मैदान मे दो मैच हुऐ जिसमे जिसमे पहले मैच मे अधिवक्‍ताओं की टीम ने संर्घष करते हुये जीत दर्ज की। तथा दूसरे मैच मैच मे जोर दार प्रर्दशन करते मुशियों की टीम ने अधिवक्‍तो के हराया। और महाशक्ति अधिवक्‍ता-मुंशी क्रिकेट प्रतियोगिता 1-1 से बराबर रही। तथा दोनो टीमो को सयुक्‍त विजेता घोषित किया गया। मैच के मुख्‍य अथिति भारत सरकार के पूर्व वरिष्‍ठ स्‍थाई अधिवक्‍ता श्री भूपेन्‍द्र नाथ सिंह थे। तथा अन्‍य गण मान्‍य अतिथियो मे भारत सरकार के अपर स्‍थाई अधिवक्‍ता श्री हरिश्‍चन्‍द्र दूबे, अपर स्‍थाई अधिवक्‍ता श्री नरेन्‍द्र प्रसाद शुक्‍ला, श्री चन्‍द्र भान सिंह अधिवक्‍ता उच्‍च न्‍यायालय, अनिल पांडेय अधिवक्‍ता उच्‍च न्‍यायालय, लाल मणि सिंह अधिवक्‍तास व कोषाध्‍यक्ष कैट वार एसोसिएसन, नन्‍द लाल मौर्या अधिवक्‍ता, जी पी सिंह अधिवक्‍ता, आदि अधिवक्‍ता गण मौजूद थे।
कार्यक्रम के अन्‍त मे बाटी-चोखा का कार्यक्रम रखा गया जिसके निर्माण मे मुंशी श्री अमर बहादुर सिंह ने किया। करीब 70 व्‍यक्तियों ने इस कार्यक्रम मे भाग लिया अन्‍त मे दो सन्‍त भी इस कार्यक्रम मे आ गये और इन्‍हे भी शामिल किया गया।
खिलाडी के रूप मे भाग लेने बालो मे- श्री देवेन्‍द्र प्रताप सिंह, अभषिक श्रीवास्‍तव, शाशि कान्‍त पाण्‍डेय, अरविन्‍द गोस्‍वामी, लाल मणि सिंह विशाल जी, रामदास, पंकज, राधेश्‍याम यादव सभी अधिवकता, रामधन, समरथ, पंकज, भाष्‍कर, गुलाब धर्मराज अनिल सभी मुन्‍शी, अन्‍य अमन्त्रित प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह, विनीत सिंह, राजकुमार, सागर, हिमांशु आदि शामिल थे।
मैच का सक्षिंप्‍त स्‍कोर निमन है-

प्रथम मैच पहली पारी
बल्‍लेबाजी- मुंशी (केवल शीर्ष 5 बल्‍लेबाज)
विनीत 7 रन
भाष्‍कर 5 रन
सुरेश 4 रन
राजकुमार 3 रन
अनि‍ल 3 रन
कुल रन 31 रन आल आउट 12.3 ओवर

गेदबाजी
हिमाशु 4 ओवर 9 रन 3 विकेट
अरविन्‍द 3 ओवर 7 रन 2 विकेट
पाठक 3 ओवर 10 रन 1 विकेट (केवल सफलता प्राप्‍त गेदबाज)

दूसरी पारी
बल्‍लेबाजी ---- अधिवक्‍ता

देवेन्‍द्र ---- 6 रन
अरविन्‍द ---6 रन
शशिकान्‍त 5 रन
रिंकू ------ 4 रन
मनोज ---- 3 रन(केवल शीर्ष 5 बल्‍लेबाज)

कुल रन ***** 32 रन 9 विकेट के नुकसान पर 14.5 ओवर
गेदबाजी
विनीत सिंह 4 ओवर 8 रन 4 विकेट
प्रशान्‍त 3 ओवर 9 रन 2 विकेट
प्रमेन्‍द्र 1 ओवर 1 रन 1 विकेट (केवल सफलता प्राप्‍त गेदबाज)

परिणाम विजयी अधिवक्‍ता 1 विकेट से



दूसरा मैच पहली पारी
बल्‍ले बाजी ------ अधिवक्‍ता (केवल शीर्ष 5 बल्‍लेबाज)
शशिकान्‍त 6 रन
देवेन्‍द्र 5 रन
अरविन्‍द 5 रन
रिकू 7 रन
मनोज 6 रन
12.4 ओवर मे 34 रन आल आउट

गेदबाजी
प्रमेन्‍द्र 3 ओवर 8 रन 4 विकेट
विनीत 3 ओवर 9 रन 1 विकेट
सुरेश 2 ओवर 6 रन 1 विकेट (केवल सफलता प्राप्‍त गेदबाज)

बल्‍लेबाजी दूसरी पारी मुन्‍शी (केवल शीर्ष 5 बल्‍लेबाज)प्रमेन्‍द्र 12 रन
सुरेश 6 रन
धर्मराज 5 रन
प्रशान्‍त 5 रन
अनिल 3 रन
गेदबाजी (केवल सफलता प्राप्‍त गेदबाज)
मनोज 4 ओवर 11 रन 3 विकेट
अरविनद 3 ओवर 15 रन 2 विकेट
हिमान्‍शु 2 ओवर 6 रन 1 विकेट

विजयी मुंशी दल 4 विकेट से विजयी

सीरीज एक-एक से ड्रॉ

मैच तथा कार्यक्रम के चित्र देखने के लिये कि ईनाम मे क्‍या था


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इन घरेलू टिप्स में छिपे हैं चेहरे के दाग-धब्बे को हटाने के नुस्खे



  • चेहरे के काले दागों को मिटाने के लिए टमाटर के रस में रुई भिगोकर दागो पर मलें। काले धब्बे साफ हो जाएंगे।
  • रोजाना सुबह एक गिलास टमाटर के रस में नमक, जीरा, काली मिर्च मिलाकर पीएं। चेहरे पर नारियल पानी लगाएं।
  • आलू उबाल कर छिलके छील लें और इसके छिलकों को चेहरे पर रगड़ें, मुहासे ठीक हो जाएंगे।
  • जायफल को घिसकर दस पिसी काली मिर्च व थोड़े कच्चे दूध में मिलाकर पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाएं। दो घंटे बाद चेहरा धो लें।
  • त्वचा पर जहां कभी चकते हो उन पर नींबू का टुकड़ा रगड़े। नींबू में फिटकरी भरकर रगड़े। इससे चकते हल्के पड़ जाएंगे और त्वचा में निखार आएगा।
  • नींबू के छिलके गर्दन पर रगडऩे से गर्दन का कालापन दूर होता है।
  • संतरे के छिलकों को सुखाकर पीस लें। इसमें नारियल का तेल व थोड़ा सा गुलाब जल मिलाकर चेहरे पर लगाने से त्वचा कोमल बन जाती है।
  • संतरे के छिलके व नींबू छिलके को बारीक पीसकर दूध में मिलाकर चेहरे पर लगाने से निखार आ जाता है।
  • मसूर की दाल और बरगद के पेड़ की नर्म पत्तियां पीसकर लेप करें अथवा दालचीनी पीसकर दूध की मलाई के साथ लगाएं।
  • मुहांसों के दाग-धब्बे चेहरे पर ज्यादा हो तो दही को उबटन की तरह इस्तेमाल करें।


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ब्यूटी बाथ के लिए टिप्स - Beauty Bath Tips



 

  •  सोडा बाथ :- लगातार धूप में रहने से त्वचा झुलस जाती है, ऐसे में सोडा बाथ आपकी त्वचा में ठंडक पहुंचाएगा और धूप से जली त्वचा के लिए सोडा बाय-कार्बोनेट से स्नान करें ।
  • हर्ब बाथ :- गेंदे की पत्तियां, संतरे या निम्बू के छिलके या तुलसी जो भी मिले उसे पानी में डाल कर नहायें।
  • प्रोटीन बाथ:- नहाने के पानी में दूध मिला कर नहायें।
  • लेमन बाथ :-नींबू के रस की कुछ बूंदे पानी में डालकर नहायें।
  • विंटर बाथ :- सरसों पीस कर उबटन बना कर नहाने से पहले शरीर की मसाज करें और फिर नहायें।
  • क्लीजिंग बाथ :- नहाने के पानी में ढेर सारा नमक मिला कर नहायें।
  • रिलैक्सिंग बाथ :- विनेगर (सिरका) को पानी में मिला कर नहायें।


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“अब मैं नही”



जब से मैने ये सब कब सुधरेगें मे प्रतीक जी की टिप्‍पणी पढ़ी है तब से यह लेख पूरा करने का मन बनाया था किन्‍तु आज मन मे कुछ ऐसा भाव विचार आया कि लगा कि आज यह लेख पूरा होना चाहिये, और मैं इसी प्रयास से यह लिखने की कोशिस कर रहा हूँ।
मेरे पिछले लेख मे प्रतीक जी ने राधा के सम्‍बन्‍ध कुछ कहा था, मैने अपने पक्ष रखने के लिये समय मॉंगा था आज मै अपनी बात कह रहा हूँ। प्रतीक जी आप विद्यापति की बात कर रहे है वे वैसे ही श्रृगांरिक कवि है, उनकी भक्ति रचानओं को भी काफी विद्वानों ने भक्ति काव्‍य मानने से इनकार किया है। द्वापर मे न तो मै था न आप थे न विद्यापति। जैसा कि विद्यापति राजाश्रित कवि थे, और जैसा वर्णन उन्‍होने राजाओं के सम्‍बन्‍ध मे किया था, वही वर्णन उनका राधा और कृष्‍ण के लिये भी किया गया। अगर विद्यापति जी की कही बात को आप मानते है तो मै सूरदास से सहमत हूँ। सूर के अनुसार राधा के श्री कृष्‍ण के घूमने फिरने के लिये राधा के माता-पिता की स्‍वीकृति थी इसी स्‍वीकृति के सम्‍बन्‍ध मे सूर दास जी कह रहे है-
मिटि गई अंतरबाधाखेलौ जाइ स्याम संग राधा।यह सुनि कुंवरि हरष मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा॥जननी निरखि चकित रहि ठाढ़ी दंपति रूप अगाधा॥देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा॥संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढ़ी अगाधा॥मनहुं तडि़त घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा॥निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा॥सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा॥
अर्थ ..... रास रासेश्वरी राधा और रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण एक ही अंश से अवतरित हुये थे। अपनी रास लीलाओं से ब्रज की भूमि को उन्होंने गौरवान्वित किया। वृषभानु व कीर्ति (राधा के माँ-बाप) ने यह निश्चय किया कि राधा श्याम के संग खेलने जा सकती है। इस बात का राधा को पता लगा तब वह अति प्रसन्न हुई और उसके मन में जो बाधा थी वह समाप्त हो गई। (माता-पिता की स्वीकृति मिलने पर अब कोई रोक-टोक रही ही नहीं, इसी का लाभ उठाते हुए राधा श्यामसुंदर के संग खेलने लगी।) जब राधा-कृष्ण खेल रहे थे तब राधा की माता दूर खड़ी उन दोनों की जोड़ी को, जो अति सुंदर थी, देख रही थीं। दोनों की चेष्टाओं को देखकर कीर्तिदेवी मन ही मन प्रसन्न हो रही थीं। तभी राधा और कृष्ण खेलते-खेलते झगड़ पड़े। उनका झगड़ना भी सौंदर्य की पराकाष्ठा ही थी। ऐसा लगता था मानो दामिनी व मेघ और चंद्र व सूर्य बालरूप में आनंद रस की अभिवृद्धि कर रहे हों। यह देखकर ब्रह्म भी भ्रमित हो गए और मन ही मन विचार करने लगे। सूरदास कहते हैं कि ब्रह्म को यह भ्रम हो गया कि कहीं जगत्पति ने अन्य सृष्टि तो नहीं रच डाली। ऐसा सोचकर उनमें ईर्ष्‍या भाव उत्पन्न हो गया।

श्रीकृष्‍ण और राधा रानी का प्रेम की व्‍याख्‍या तो साक्षात् ब्रम्‍हा भी नही कर सकते थे अगर उन्‍हे राधा को श्रीकृष्‍ण की प्रेमिका बनया तो पत्‍नी भी बना सकते थे। वास्‍तव मे राधा और कृष्‍ण का प्रेम भक्‍त और भगवान का प्रेम था। राधा के प्रेम के भक्ति के सम्‍बन्‍ध मे एक कथा है ........
देवऋषि नारद खीज से गये थे कि, तीनों लोकों में राधा की स्तुति जो हो रही थी। वे स्वयं भी तो कृष्ण जी से कितना प्रेम करते थे। इसी मानसिक संताप को छिपाये हुये वे कृष्ण के पास जा पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कृष्ण अयंकर सरदर्द से कराह रहे हैं। देवऋषि के हृदय में टिस उठी। पूंछा, "भगवन क्या इस वेदना का कोई उपचार नहीं है। क्या मेरे हृदय के रक्त से यह शान्त नहीं हो सकती।
कृष्ण ने उत्तर दिया, "मुझे रक्त की आवश्यकता नहीं है। यदि मेरा कोई भक्त अपना चरणोदक पिला दे तो यह वेदना शान्त हो सकती है। यदि रुक्मिणी अपना चरणोदक पिला दे तो शायद लाभ हो सकता है।"
नारद ने मन में सोंचा , 'भक्त का चरणॊदक भगवन के श्रीमुख में' आखिर रुक्मिणी के पास जाकर उन्हे सारा हाल कह सुनाया। रुक्मिणी भी बोलीं , "नहीं-नहीं देवऋषि, मैं यह पाप नहीं कर सकती।" नारद ने लौटकर रुक्मिणी की असहमति कृष्ण के सामने व्यक्त कर दी। तब कॄष्ण ने उन्हें राधा के पास भेज दिया। राधा ने जो यह सुना तो तत्क्षण एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने पैर डुबा दिये और नारद से बोलीं, "देवऋषि इसे तत्काल कृष्ण के पास ले जाईये। मैं जानती हूं इससे मुझे रौरव नर्क मिलेगा, किन्तु अपने प्रियतम के सुख के लिये मैं अनन्त युगों तक यातना भोगने को प्रस्तुत हूं।" और देवऋषि नारद समझ गये कि तीनों लोकों में राधा के प्रेम की स्तुति क्यों हो रही है।
प्रस्‍तुत प्रंसग मे राधा ने आपने प्रेम का परिचय दिया है प्रेमी(ईष्‍ट) का इच्‍छा की पूर्ति के लिये नर्क नर्क मे ही क्‍यों न जाना पड़े राधा(भक्‍त) को मंजूर था, और रूकमनी (लक्ष्‍मी) को नही है। यही है सच्‍चे प्रेम की पराकाष्‍टा जो लाभ हानि की गणना नही करता है। राधा का प्रेम शारीरिक भोग की ललसा नही रखता था जैसा कि विद्यापति के दोहो के माध्‍यम मे आप कहना चाह रहे थे, प्रेम आत्‍मा से परमात्‍मा(आत्‍मा) के मिलन की लालसा रखता है। राधा ने कृष्‍ण के प्रेमी रूप की भक्ति की तो श्रीकृष्‍ण ने प्रेम रूपी भक्ति को प्रदान किया और कंश न आने नाश के रूप मे आराधना कि तो उसका नाश किया। प्रेम के लिये शादी अथवा किसी प्रकार का प्रर्दशन प्रमाण नही होता है जो आज के जामाने मे समझा जा रहा है।
एक तरफ सूर राधा के श्रीकृष्‍ण वियोग के बारे मे मारी मारी फिर रही है तो दूसरी ओर आयोध्‍यासिंह उपाघ्‍याय के प्रिय प्रवास मे लोकहित में सतत संलग् श्री कृष्ण की भांति राधा को भी परोपकार, लोकसेवा, विश्व प्रेम आदि से परिपूर्ण चित्रित किया है। यहां राधा सूर की राधा की तरह कृष्ण के विरह में मारी-मारी नहीं फिरती, अपितु वह दीन-हीन एवं रोगी जनों की सेवा-सुश्रूषा में ही अपना जीवन व्यतीत करती हैं। प्रत्‍येक कबि का अपना अपना मत है किसी के कहने पर यह राधा के दो:दो पति थे तो य‍ह गलत होगा। एक जगह पर यह कहा गया है कि ‘उनका कहना था कि 'कृष्ण और राधा के विवाहेतर सम्बन्ध इस स्थिति के द्योतक थे कि हिन्दू धर्म अपनी स्त्रिायों को कितनी गिरी दशा में रखता था।` उन्होंने यह भी लिखा कि, 'कृष्ण, दूसरे आदमी की पत्नी राधा के साथ पति पत्नी के रूप में रहते हैं। कृष्ण को इसके लिए कोई अनुताप का पश्चाताप नहीं होता।’ लिखने को बहुत कुछ लिखा गया है,। वास्‍तव मे राधा आदर्श प्रेम की मूर्ति थी आज भी उनका प्रेम अमर है और उस पवित्र प्रेम की आड़ मे उन्‍हे ही बदनाम किया जा रहा है।

रमाकान्त रथ कृत 'श्री राधा' के बारे मे डॉ. मधुकर पाडवी व्‍याखा कर रहे है---- 
विद्यापति हिन्दी साहित्य के आदिकाल के महत्वपूर्ण कवि हैं जिनकी अनेकविध कलात्मक रचनाएं आविष्कार के लिए विवश हैं। विद्यापति की महत्वपूर्ण रचनाओं में मैथिली में लिखी हुई पदावली, अवहट्ठ में लिखे गये दो ग्रंथ कीर्तिलता और कीर्तिपताका, संस्कृत में लिखे गये ग्रंथो में शैव सर्वस्वसार, भूपरिक्रमा, पुरूष परीक्षा लिखनावली, गंगा वाक्यावली, दान वाक्यावली, विभागसार, वर्ण कृत्य आदि हैं। विद्यापति आदिकाल के कवि है। समय विभाजन के जरिए देखा जाए तो यह समय 10वीं से 16वीं सदी तक का माना गया है। इस समय दरम्यान अनेक महत्वपूर्ण कवियों ने अपनी रचनाएं की हैं जिनमें जैन अपभ्रंश साहित्य, बौद्ध एवं नाथ साहित्य, डिंगल और पिंगल भाषा के ग्रंथ, चारण साहित्य तथा रासो काव्य का प्राधान्य रहा है। इस युग में हेमचन्द्र का सिद्धहेम शब्दानुशासन, अब्दुल रहमान का संदेश रासक, चन्द बरदाई का पृथ्वीराज रासो आदि महत्वपूर्ण रचनायें हैं। पृथ्वीराज रासो हिन्दी का प्रथम महाकाव्य है। आदिकाल में भाषा का वैविध्य रहा है तो काव्य विषयों में भी वैविध्य दिखाई देता है। जिसमें चरित्र काव्य, सिद्ध और नाथों का काव्य, भाट और चारणों के युद्ध से सबंधित वीर काव्य, रासो काव्य, भक्ति काव्य तथा श्राृंगारिक काव्य की परंपरा रही है। इन सब कवियों में एक महत्वपूर्ण नाम विद्यापति का है जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से तत्कालीन समय में अपनी खुद की एक अलग पहचान बनाई।वैसे तो आदिकाल में प्रभु भक्ति ही केन्द्र में रही है। प्रेम की महत्तम बातें प्रभु और धर्म से जुडी हुई मिलती हैं। मानुषी प्रेम की अभिव्यक्ति होती नहीं थी। प्रेम की बात होती तो वह राधा और कृष्ण के आसपास जाकर सिमट जाती। आदिकाल में प्रभु भक्ति के साथ जो और एक बात देखने को मिलती है वह है राजाओं की एैयाशी, उनकी दरबारी नजाकत और हार और जीत के बीच झूलती हुई लडाईयां।आदिकाल का यह संदर्भ इसलिए जरूरी है क्योंकि विद्यापति की लेखनी इस माहौल में विकसित हुई है। विद्यापति नि:शंक एक कवि थे मगर उनको राजा र्तिसिंह, शिवसिंह से राज्याश्रय मिला था। इसलिए वे राजा के आश्रित कवि यानि दरबारी कवि गिन जाते थे।आदिकालीन कवियों में विद्यापति का व्यक्तित्व सबसे निराला था। उनके बारे में कहा जाता है कि वे बाल्यकाल से ही बड़े मेधावी थे। वे संस्कृत के प्रकांड पंडित थे क्योंकि उनके पिता संस्कृत के प्रतिष्ठित पंडित थे। उन्होंने संस्कृत ग्रंथों की भी रचना की है जिसमें से कई रचनाएं तो आज भी अप्रकाशित हैं।
विद्यापति के जीवन काल को देखा जाए तो उन्होंने एक ही वंश के चार राज दरबारों को देखा था। इन सब में राजा शिवसिंह से उन्हें अधिक सन्मान मिला था। राजा शिवसिंह विद्यापति के आश्रयदाता के अतिरिक्त घनिष्ठ मित्र भी थे। वैसे तो उस समय में आश्रित कवियों का काम आश्रयदाता राजाओं की रुचि के अनुसार रचनाओं का निर्माण करना था। कभी राजाओं की कीर्ति का यशोगान करना तो कभी दरबारी माहौल को रोमांचित करने के लिए श्राृंगारिक काव्यों का निर्माण करना। इस तरह देखा जाए तो उस समय के कवियों की रचनाएं राजा की रस रुचि और मांग पर निर्भर रहती थीं। कभी राजा और राज दरबार की वाह-वाह की सुनवाई के लिए कवि अपनी कृतियों में छिछोरापन भी शामिल करते थे। मगर विद्यापति इन सबसे अलग थे। उनकी रचनाओं में निरूपित अद्भूत कल्पनाएं तथा असाधारण कवित्व से वे सबको सम्मोहित कर देते थे। विद्यापति असामान्य प्रतिभा के धनी थे। उनका कवित्व अपने विद्वान पूर्वजों की संस्कारिकता की देन था और इसके लिए उन्हें जीवन पर्यंत मान सन्मान मिलता रहा। कवियों के लिए कहा जाता है कि वे परंपराओं में रहकर भी अपनी निजी प्रतिभाओं को निखारते हैं। विद्यापति ने भागवत की माधुर्य भावना की परंपरा जयदेव के गीत गोविन्द से ग्रहण की थी। इसी कारण विद्यापति की पदावली में राधा-कृष्ण की प्रेम लीला का श्राृंगारिक वर्णन हुआ है। जयदेव के प्रभाव से विद्यापति की पदावली में प्रेम की उदात्तता, भव्यता और भक्ति का समन्वय दिखाई देता है। संस्कृत साहित्य में महाकवि कालिदास को प्रेम और श्रृंगार का कवि माना जाता है। विद्यापति के सामने कालिदास के प्रेम से सभर अनेक ग्रंन्थ थे जिसमें विरह की उत्कटता और प्रेम की चरम सीमा का निरूपण हुआ है।
विद्यापति की पदावली में प्रेम और विरह की उत्कटता का जो वर्णन मिलता है उस पर नि:शंक कालिदास का प्रभाव देखा जाता है। जयदेव और कालिदास से प्रभावित विद्यापति ने अपनी पदावली में प्रेम और विरह की उत्कटता को अपनी निजी शैली में निरूपित किया ।
गाथा सप्तशती और आर्यासप्तशती द्वारा श्रृंगार की जो परंपरा चली थी उसी परंपरा से भावित विद्यापति ने भी मुक्तक काव्य शैली में राधा-कृष्ण की प्रेम लीला को माध्यम बनाकर श्राृंगारिक भावनाओं को अभिव्यक्त किया है। विद्यापति का समग्र जीवन राज दरबार में ही बीता था। राजा शिवसिंह परम मित्र होने के कारण राजा के अन्त:पुर तक जाने का अवसर उन्हें बार-बार मिलता था जिसके कारण रानियों, राजकुमारियों, नर्तकियों, दासियों और गांव की नारियों के संपर्क में वे आये।
विद्यापति ने राज दरबार के भीतर छिपी आंतरिकता को - कामुकता को देखा और उनका अपनी रचनाओं में खुल कर निरूपण किया। जहां तक राज दरबार का सवाल था वहां बाह्य रूप सौंदर्य को ही प्राधान्य मिलता था। आंतरिक सौंदर्य का कोई निजी स्थान न था। बाह्य सौंदर्य की तुलना में आंतरिक सौंदर्य हमेशा उपेक्षित रहता था। विद्यापति ने उस छिपे हुए सौंदर्य को खोलकर रख दिया। राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम को अत्यंत सहज और मानुषी
बना दिया। इस संदर्भ में सही अर्थ में देखा जाए तो विद्यापति दरबारी कवि होते हुए भी एक आम जनता के कवि यानि जन मानस के कवि बने हैं। राज दरबार में छिपे हुए सौंदर्य को आम जनता तक ले जाने का श्रेय विद्यापति को मिलता है। मानो सही अर्थो में वे लोक कवि थे।
विद्यापति की ख्याति का मूलाधार उनकी पदावली है। उनकी रस रचना को देखते हुए यह स्पष्ट होता है किवे सौंदर्योपासक कवि थे क्योंकि उन्होंने सौंदर्य के सभी रूपों को विभिन्न दशाओं में निरूपित किया है। विद्यापति चिर नूतन यौवन के उपासक थे। पदावली का एक-एक पद मर्मस्पर्शी है और हमारे समक्ष सौंदर्य तथा प्रेम क्रीडा की सुंदरता को प्रस्तुत करता है। उनके रूप वर्णन, वय: सन्धि के चित्रण तथा मादक युवावस्था की मुधर झलकें मन को मुग्ध कर लेती हैं। ये चित्रण काल्पनिक न होकर जीवन के यथार्थ रूप हैं। वे अपने भावों और विचारों को यथार्थ रूप में कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। श्रृंगार रस सबंधी कोई ऐसी बात नहीं है जिसका वर्णन इनकी पदावली में मिलता न हो। लौकिक जीवन के एक बड़े पक्ष सौंदर्य, क्रीडा और आनन्द का जैसा सजीव वर्णन विद्यापति में पाया जाता है वैसा अन्य किसी कवि के काव्य में नहीं मिलता।
विद्यापति निश्चित रूप से नागरिक जीवन और नागरिक रूचि के पक्ष में थे।जब-जब विद्यापति की'पदावली की बात निकलती है तब-तब निश्चित रूप से यह सवाल उठता है कि विद्यापति श्रृंगार कवि है या भक्त कवि! वैसे तो विद्यापति श्रृंगार, प्रेम, रूप, वन और सौंदर्य रससिद्ध पारखी कवि माने जाते हैं। वे मानवीय एवं मानवेत्तर श्रृंगार के यथार्थ प्रेमी कवि है। वैसे भी दरबारी राज्याश्रित कवि नीरस हो ही नहीं सकता। अपने आश्रयदाता राजा शिवसिंह और रानी लखिमादेवी को प्रसन्न करने के लिए विद्यापति ने अतिविलक्षण एवं मनोरम काव्य का सर्जन किया है। उन्होंने यौवनावस्था के सभी प्रेमानुभावों को जनभाषा में उतारकर संगीत की चासनी में डुबाया है। विद्यापति ने अपने पदों में राजा-रानी के स्थान पर राधा-कृष्ण शब्द का प्रयोग किया। परिणामत: विद्यापति की पदावली राजा-रानी की प्रणय-क्रीडा तक सीमित न रहकर जन समाज के साधारण व्यक्ति के प्रेम के आविर्भाव की द्योतक बनी। लोकभाषा में लिखे गये इन पदों में राधा-कृष्ण की श्रृांगारिकता को विद्वानों ने प्रभु-भक्ति के साथ जोड़ दिया और उसे भजनों में स्थान दे दिया। विद्यापति ने अपने पदों में राधा-कृष्ण का जो चित्र निर्मित किया है उसमें वासना का रंग प्रखर रूप से दिखाई देता है। आराध्य देव के प्रति भक्ति का जो पवित्र विचार होना चाहिए वह लेशमात्र भी नहीं था। विद्यापति की राधा का प्रेम भौतिक एवं वासनामय प्रेम है। आनंद ही उनका उद्देश्य है और सौंदर्य ही उनकी काव्योपासना थी। इसलिए विद्यापति को भक्त कवि कहना ठीक नहीं होगा।

भक्त अपने इष्टदेव की लीलाओं के गान को अपना परम कर्तव्य समझता है। विद्यापति ने श्राृंगारिक वर्णन को भक्ति की अभिव्यक्ति का साधन माना। अत: विद्यापति को रसिक भक्त कवि कहा गया किन्तु भक्त का हृदय उन्हें प्राप्त न था। भक्तों के हृदय की सी पावनता, आर्द्रता, कोमलता, कातरता, दीनता और भावमग्ता का उनमें सामान्यत: अभाव था। विद्यापति पूर्ण रूप से श्रृंगारी कवि थे और उनका काव्य संसार श्रृंगार ही था। यौवन और सौंदर्य विद्यापति के पदों की अनूठी पहचान रही है। जिस तरह कवि बायरन ने यौवन के दिनों को दी डो ऑफ यूथ आर दी डो ऑफ ग्लोरी कहा है उसी तरह विद्यापति ने यौवन के दिनों के लिये कहा है -
जनम अवधि नहि तुअ पद सेवल जुबती रति रंग मेलि अमिअ तेजि हालाएल पीउल सम्पद आपदहि मेलि।
महाकवि विद्यापति संस्कृत, अपभ्रंश और मैथिली भाषा के प्रकांड पंडित थे। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के पूर्ववती ग्रन्थों का उन्होंने गहन अध्ययन किया था। उनकी पदावली में भक्ति और श्रृंगार का जो मिश्रण मिलता है उसका मूल इन्हीं ग्रन्थों में ढूंढा जा सकता है।
पदावली में निरूपित भक्ति श्रृंगार भावना के मिश्रण से या कुछ पद भक्ति के होने मात्र से न तो पदावली के पद भक्ति के पद साबित हो सकते हैं और न ही विद्यापति भक्त कवि। विद्यापति रसिक भक्त कवि थे। इसलिए उनकी पदावली में कभी भक्ति भावना प्रबल हो जाती थी और कभी रसिकता। विद्यापति की इस विशेषता के कारण ही चैतन्य महाप्रभु उनके पदों को सुनकर आनन्द विभोर हो जाते थे।
राधा-कृष्ण के नाम मात्र से यह समझना अनुचित होगा कि कवि केवल भक्ति रस की चरम सीमा या पराकाष्टा पर पहुंचकर जीव ब्रह्म के ऐक्य ही को श्राृंगारिक शब्दों में कह रहा है। वस्तुत: विद्यापति श्रृंगार की उस अखंड परंपरा के कवि थे जिसमें आगे चल कर बिहारीलाल, पद्माकर जैसे श्रृंगारी कवि दिखाई देते हैं। कहा जा सकता है कि विद्यापति की पदावली में राधा-कृष्ण का वही स्थान हैं जो बिहारी सतसई में राधा-कृष्ण का है।

नरेन्द्र गुप्त ने विद्यापति के 936 पदों का विद्यापति ठाकुर
की पदावली नामक पुस्तक में संग्रह किया है जिसमें राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, गंगा और
परकीया पर आधारित पद मिलते हैं। इनमें सबसे अधिक 849 पद राधा-कृष्ण के सबंध में
मिलते हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि विद्यापति की पदावली के अधिकांश पद प्रेम और
श्राृंगारिकता को केन्द्र में रखकर लिखे गये हैं। राधा-कृष्ण की अतृप्त वासानाजनीत
क्रियाओं का अनेक पदों में वर्णन किया है। पदावली के कृष्ण दुष्टों का दलन करने
वाले न होकर या पूतना वध - कंस वध करने वाले न बन कर अपनी प्रेमिका राधा से मिलने
के लिए अनेक उपाय खोजने वाले घोर विलासी तथा कामुक मनुष्य को भी लाित करने वाले
हैं। क्या र्कोई भक्त अपने आराध्य देवी-देवता के प्रति इस प्रकार का घृणित वर्णन कर
सकता है!
मेरा यह निश्चित रूप से मानना है कि विद्यापति स्पष्ट रूप में
श्रृंगारी कवि हैं। उन्होंने अपने पदों की रचना न भक्ति कीर्तनों के लिए की थी और न
स्वयं वे भक्त थे। 'विद्यापति ने अपनी पदावली में अपने आश्रयदाता राजा-रानी को
श्रृंगाार रस के प्याले पिला-पिला कर मदहोश एवं प्रसन्न करने के लिए श्रृंगार रस से
सने (भरे)अनेक पद रचे हैं।'
प्रेम विद्यापति की पदावली का महत्वपूर्ण अंश है।
उन्होंने विवाह पूर्व प्रेम, वैवाहिक प्रेम और परकीया प्रेम का वर्णन किया है।
प्रेम की प्रत्येक अनुभूति को रागात्मक शैली में अभिव्यक्त किया है। कवि ने नारी
सौंदर्य का वर्णन काम प्रेरक किया है। विद्यापति के श्रृंगार के आलम्बन राधा और
कृष्ण हैं किन्तु कवि की दृष्टि कृष्ण से अधिक राधा पर रही है। इसलिए राधा के रूप,
आकर्षण, अभिसार और मिलन का वर्णन पूरी सह्रदयता से उन्होंने किया है। कवि ने राधा
के अंगों का नख शिख तक वर्णन किया है। नख शिख वर्णन का प्रारंभ शायद विद्यापति से
हुआ हो ऐसा माना जाता है। कवि के शब्दों में राधा का रूप सौंदर्य यहां दर्शनीय है
-
णचांद सार लए मुख घटना करु
लोचन चकित चकोर।
अमिय धोए आचुरे धनि
पौछल
वह दशि मेल उजोरे।
कवि ने दर्शाया है कि नायिका का मुख चंद्र का सार
लेकर गढा गया है। उसके लोचनों को देखकर चकोर भी चकित रह गये हैं। जब उसने अपने मुख
को अमृत से धोकर आंचल से पोंछा तब दसों दिशाओं में प्रकाश हो गया।
कहीं कहीं
मिलन के प्रसंग में उन्होंने कुछ ऐसी सस्ती बातों का उल्लेख किया है जो समाज को
शायद रुचिकर न प्रतीत हों। कृष्ण-लीला के नाम पर कवि विद्यापति ने दरबारी विलासिता
का उन्मुक्त चित्रण किया है - राधा नायिका अब काम कला में प्रवीण बन गयी है। वह
कहती है -
पसुक संग हुन जनम गमाओल
से कि बुझथि रतिरंग
मधु जामिनि मोर आज
विफल गेलि
गोप गमारक संग।
राधा की प्यास कृष्ण बुझा नहीं सके। क्रोधवश वह
अपनी सखियों से कहने लगी - वह गंवार गोप पशु के साथ जिसने अपना जन्म गंवाया वह
रतिजन्य आनंद को क्या जाने। हे सखी! आज की मेरी वसन्त की रात अथवा प्रथम मिलन की
रात यों ही चली गयी। निर्लाता से प्रथम रात्रि का अपना अनुभव सब के बीच कहने वाली
राधा न होकर निश्चित रूप से दरबार की कोई रानी ही होगी।
यदि प्रेम का पात्र
लौकिक पुरुष होता है तो लौकिक प्रेम श्रृंगार की अभिव्यक्ति होती है किन्तु जब
प्रेमी पात्र दिव्य पुरुष हो तो पारलौकिक प्रेम से भक्ति रस की अभिव्यक्ति होती है।
विद्यापति के कृष्ण और राधा लौकिक पात्रों की तरह हावभावों एवं विशिष्ट मुद्राओं का
अंकन, कामुकता और विलासिता आदि प्रकट करते हैं। अत: विद्यापति के राधा और कृष्ण
अलौकिक होते हुए भी पदावली में अलौकिक न रह कर पूर्ण लौकिक बन गये
हैं।
विद्यापति संयोग श्रृंगार में जहां अत्यंत उत्कृष्ट कवि के रूप में सफल हुए
है वहां वियोग श्रृंगार में उससे भी अधिक सफल रहे हैं। पदावली में वियोग श्रृंगार
के पद संयोग की तुलना में अधिक नहीं है फिर भी जितने भी हैं वे सब मौलिक
हैं।
कृष्ण के विदेश जाने की खबर सुन कर राधा चिंतित और व्याकुल हो जाती है। वह
स्वयं कृष्ण को रुक जाने के लिए कुछ कह नहीं सकती। अत: सखी से कहती है -
सखि हे
बालुम जितब बिदेस
हम कुल कामिनी कहइत अनुचित
तोहहुं दे दुति उपदेस।'
कवि
राधा की मनोदशा का सुंदर चित्रण करते हुए कहते हैं कि - राधा को थोडा आनन्द मिलता
अगर सपने में भी वह अपने प्रिय को देख लेती। बेचारी की नींद भी विरह दु:ख में नष्ट
हो गई है कि उसे सपना कैसे आयगा! प्रिय की प्रतीक्षा में अवधि के दिन लिखते-लिखते
राधा के नाखून घिस गये, रास्ते को देखते आंखों की ज्योति मंद पड ग़ई। राधा कहती है
-
सखि हे हमर दुखक नहिं ओर
ई भर बादर माह मादर
सून मंदिर मोर।
भावों
में कितनी व्याकुलता दिखाई देती है। अनुभूति की ऐसी सहज अभिव्यक्ति विद्यापति जैसे
सिद्धहस्त कवि ही कर सकते हैं।
विरह वर्णन में विद्यापति ने राधा की अनेक
मनोदशाओं के साथ-साथ कृष्ण की वियोगावस्था का भी वर्णन किया है। भाषा की सरलता,
भावुकता, तन्मयता के कारण विद्यापति के विरह के गीत हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि
बन गए हैं। विरह की ऐसी कोई दशा नहीं जिसका वर्णन विद्यापति ने न किया हो।
इस
प्रकार विद्यापति ने अपनी सामयिक परिस्थितियों के अनुसार संयोग श्रृंगार के तथा
वियोग श्रृंगार के पदों की रचना की। श्रृंगार रस मन की सर्वाधिक वृत्तियों को अपने
में समाविष्ट कर लेता है। इसलिए दरबारी कवि श्रृंगार रस में ही काव्य सर्जन करते
थे। श्रृंगार रस की निष्पत्ति के लिए आवश्यक सभी बातें विद्यापति की पदावली में
विपुल मात्रा में है। विषयवस्तु, विषय प्रतिपादन एवं रचना-शैली तीनाें दृष्टियों से
विद्यापति की पदावली सफल हुई है।







प्रिय प्रवास में राधा की विरह-व्यथा के बारे मे डॉ. देवायत एम. सोलंकी कह रहे है ---


श्री रामाकान्त रथ उडिसा के वरिष्ठतम आई.ए.एस.
अधिकारी होने के साथ-साथ उडिया के एक शीर्षस्थ कवि भी है। उनके अब तक आठ कविता
संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनका काव्य संग्रह सप्तम ऋतु 1978 के साहित्य अकादमी
पुरस्कार से सम्मानित हुआ है। उसके बाद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित खंडकाव्य
'श्री राधा' उनकी बहुचर्चित कृति है। प्रस्तुत कृति परिपक्व संवेदनशीलता, प्रगाढ
मानवीय चेतना, प्रतीकात्मक भाषा-लालित्य और काव्य-शिल्प के कारण न केवल उडिया
की बल्कि भारतीय भाषा की भी एक अमूल्य कृति है।
प्रस्तुत काव्य का शीर्षक 'श्री
राधा' है और राधा का नाम आते ही अनायास ही हमारे सामने राधा-कृष्ण का अलौकिक स्वरूप
आ जाता है। निस्संदेह प्रस्तुत काव्य में वही श्री राधा है, परंतु कवि ने उसके
चरित्र को यहां जिस तरह से प्रस्तुत किया है वही हमारे लिए वैचारिक संकट का कारण
बना है। डॉ. अर्जुन शतपति के शब्दों में कहें तो - 'ओडिया कवि श्री रमाकान्त रथ की
काव्य अंर्तयात्रा की महान उपलब्धि उनकी श्री राधा काव्य-कृति है। काव्य का शीर्षक
इसलिए सार्थक लगता है कि इसमें श्री राधा ही है। यह शब्द ही हमारे वैचारिक संकट का
कारण बन जाता है क्योंकि यह वह राधा है, जो हमारी जनचेतना में रची-बसी राधा से
भिन्न होते हुए भी अभिन्न है। इसमें दो मत नहीं है कि भारतीय सांस्कृतिक, धार्मिक,
नैतिक और सामाजिक चेतना में राधा एक उदात्त कृति है जिसके साथ नारी के औदार्य,
सौंदर्य, सुख, हर्षोल्लास आदि जुड़े हैं। इसलिए तात्त्वि अवबोधन हेतु स्वयं कवि ने
काव्य के पृष्ठबंध में लम्बी बहस छेड़ी है जिसमें उनके द्वारा सृजित राधा के स्वरूप
पर आलोकपात किया है।'1
श्री राधा काव्य का केन्द्रीय चरित्र राधा है, परन्तु
यहां जिस राधा का कवि ने उल्लेख किया है उसका चरित्र परम्परागत राधा के चरित्र से
भिन्न है और कवि ने स्वयं उस पर सवाल उठाये हैं। कवि ने काव्य के पृष्ठबंध में इसको
लेकर लम्बी बहस छेड़ी है। उनका पहला सवाल राधा के स्वरूप को लेकर है और इसको स्पष्ट
करते हुए वे कहते हैं कि 'मैं ऐसी चिड़चिड़ी राधा की कल्पना नहीं कर सकता जो कृष्ण को
वृंदावन छोड़ने के लिए, उस पर निष्ठा न रखने के लिए तथा उसके प्रति उदासीन रहने के
लिए उससे कहती हो, ऐसा कोई भी आचरण उसके लिए अप्रासंगिक है। प्रारंभ से ही वह ऐसी
आशा नहीं पाले रखती। कुंठित होकर निराश होने की भी उसके लिए कोई संभवना नहीं है।
अगर वह निराश हो सकती है तो केवल इसलिए कि कृष्ण को जिस सहानुभूति की आवश्यकता थी,
वह उसे न दे सकी। न दे पाने की पीड़ा कुछ लोगों के लिए न ले पाने की पीड़ा से बड़ी
होती है।'2 राधा को प्रेम की इस उदात्त स्थिति को प्राप्त करने से पहले जिन-जिन
स्थितियों से गुजरना पडा होगा तथा उसकी क्या मन: स्थिति रही होगी उसका कवि ने बहुत
गहराई से विवेचन किया है। साधारणतया संसार के प्रेमीजनों का लक्ष्य मिलन होता है
किन्तु यहां पर राधा कृष्ण के मिलन की ऐसी कोई संभावना ही नहीं हैं। कवि ने
पूर्वबंध में इसका उल्लेख करते हुए लिखा है - 'राधा-कृष्ण की प्रेमकथा विश्व की
किसी भी प्रेमकथा से भिन्न है, अन्य कथाओं में यदि परिस्थितियां कुछ भिन्न होती और
दूसरे लोग उनके प्रेम को समझने का प्रयास करते या कम से कम उनके रास्ते में बााधाएं
पैदा न करते तो प्रेमी प्रेमिका का मिलन संभव था। पर राधा और कृष्ण के संबंधों में
ऐसी कोई संभवना कभी रही ही नहीं। जब वे एक दूसरे से मिले, राधा का विवाह हो चुका
था। कृष्ण के साथ उसका संबंध ऐसा था कि उसके साथ रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती
थी। यदि उन्हें लोगों का सहयोग मिलता, तब भी उनका विवाह नहीं हो सकता था। राधा
निश्चित रूप से यह बात जानती होगी, तब भी अगर वह अपने जीवन की अंतिम सांस तक कृष्ण
को चाहती रही तो स्पष्ट है कि यह सब वह बिना किसी भ्रम के करती रही। कृष्ण के साथ
अपने संबंधों का आधार उसने सांसारिक रूप से एक-दसरे के साथ रहने की बजाए कुछ और
बनाया जो इससे कहीं श्रेष्ठ था। सफलता निम् श्रेणी के मनस छोटी-छोटी तुष्टियों की
प्राप्ति से बाधित नहीं होते, वे इन्हें केवल छोटे-छोटे परिणाम मानकर एक ओर कर देते
हैं। वे जानते हैं कि ये तुष्टियां मिलने के साथ समाप्त भी हो जायेगी और उस कामना
के मार्ग से भटकायेंगी और उससे दूर करेंगी। जब कि शुद्ध कामना ऐसी अविच्छिन्न
यात्रा है जिसमें यदि इसके कभी न समाप्त होने की निराशा है तो साथ ही इस गौरव का
बोध भी है कि इस यात्रा में उसने छोटे-छोटे विकल्पों को स्वीकार नहीं किया।'3 और
राधा के द्वारा इस स्थिति का स्वीकार करने से पूर्व उसे जो तपस्या करनी पडी होगी
उसका अनुभव राधा के अलावा कौन कर सकता है! कवि के शब्दों में- 'पहले तो कभी
छाती
आज की तरह धुक्धुक् नहीं करती थी, भला
मैं क्या जानूं, मेरे जीवन
काल
अथवा यमुना जाने की राह की मोड़ पर होगा
कैसा अपदस्थ होने का योग, अथवा
अन्य सभी
संबंधों को उजाड ड़ालने वाले संबंध
मेरी जरा, मृत्यु, व्याधि आदि
की
राह हॅसते हुए रोक लेंगे।'4
पर राधा का यह स्वरूप उसके पौराणिक रूप से मेल
नहीं खाता है। कवि ने राधा का एक नया ही रूप यहां प्रस्तुत किया है। राधा
सांसारिकता के तमाम सुख-दुखों से ऊपर उठ चुकी है और यह स्थिति एकदम उसके जीवन में आ
गई हो ऐसा नहीं हैं। कवि ने पूर्वबंध में इसकी चर्चा करते हुए लिखा है - 'एक ऐसा
क्षण अवश्य आया होगा जब राधा सांसारिकता से ऊपर उठ गयी होगी और अपनी कामनाओं तथा
उनके फलीभूत न हो पाने के विश्वास से उत्पन्न पीडा के अनुभव से उसने स्वयं को परे
कर लिया होगा। इसके बाद वह क्षण आया होगा, जब पहली बार उसके लिए कामना तथा उसका
फलीभूत होना युगपत क्रियाएं बन गयी होंगी और वही क्षण उसके लिए अखंड आनंद का क्षण
बन गया होगा।'5 इस प्रकार प्रस्तुत काव्य में राधा-कृष्ण के शाश्वत प्रेम का रहस्य
कवि ने उद्धाटित किया है। अर्जुन शतपति के शब्दों में 'कवि ने पहला सवाल उठाया है
राधा के स्वरूप को लेकर। उनका दावा है कि उनके काव्य का उपजीव्य राधा तो है, पर
राधा की समग्रता नहीं है। राधा एक अवस्था है जिसकी प्रसिद्धि पुराणों और
किंवदन्तियों में नहीं है। 'जिस समय राधा ने असामान्य बनना शुरु किया, खूब सूरत
बनने लगी एवं अनन्य बनकर अपने को अर्थपूर्ण करने लगी। ठीक उसी वक्त और ठौर मेरी
संवेदना वापस आ गई।' भारतीय वाङ्मय आज तक जिस राधा को समेटता अया है, कवि का उससे
कोई लेना-देना नहीं हैं।'5
जहां तक श्री राधा काव्य के स्वरूप का प्रश् है - कुछ
विद्वान इसे खंड काव्य मानते हैं तो कुछ विद्वान मुक्तक प्रबंध अथवा प्रबंध मुक्तक।
प्रस्तुत काव्य स्वरूप को लेकर डॉ. अर्जुन शतपति का विचार अधिक समीचीन लगता है -
प्रस्तुत काव्य में प्रबंध-मुक्तक या मुक्तक-प्रबंध की विशेषताएं प्राप्त होती है।
आधुनिक भारतीय काव्य दृष्टि से प्राचीन स्वरूप ओझल हो चुका है। न तो सांप्रतिक
काव्य में सर्ग विन्यास है और न अध्यायीकरण। 'श्री राधा' आधुनिक काव्य है और इसमें
समय-समय पर लिखी गई इकसठ कविताएं संकलित हैं। ये कविताएं दोनों प्रबंधात्मकता और
मुक्तक कविता का अहसास दिलाती हैं। फिर भी प्रबंधात्मकता की शैली छायी रहती है। यह
एक नायिका प्रधान काव्य है। राधा की मानसिकता का वर्णन शुरू से अंत तक मिलता है। वह
असामान्य प्रेयसी प्रत्येक छंद में वर्तमान हैं। नायिका अपने मुंह से अपनी दशा का
वर्णन करती है और अपने को असामान्य स्थिति में पहुंचा देती हैं। अत: इसे स्वगतोक्ति
प्रधान काव्य कहा जाय तो शायद ही अत्युक्ति होगी।'6
'श्री राधा' काव्य 61
कविताआें का संकलन है, पर इसे कोई मुक्तक प्रबंध कहना चाहे तो कह सकता है। और इस
आधुनिक काव्य के लिए प्राचीन काव्य परिपाटी के कुछ सिद्धांताें के साथ थोड़ा समझौता
करते हैं तो इसे खंड काव्य की कोटि में रखा जा सकता है। कथानक की दृष्टि से देखें
तो कवि ने राधा-कृष्ण के शाश्वत प्रेम को अपने काव्य का उपजीव्य बनाया है। कृष्ण के
जीवन में राधा का स्थान और राधा के जीवन में कृष्ण का स्थान अनन्य है। कृष्ण राधा
के बिना अधूरे हैं, चूंकि राधा ही कृष्ण की शक्ति व प्रकृति भी है। अत: वह कृष्ण से
भिन्न कैसे हो सकती है। पर इस वैष्णवी भावना को स्वीकार कर लेते हैं तो राधा की उस
चाहत का क्या होगा? प्रेम में यही चाहत मिलन के आनंद का कारण बनती है और मिलन के
बाद विरह का अवसर भी आ सकता है, उसका क्या करें! और जिस प्रेम में मिलन के बाद विरह
निश्चित है तो इस तरह के मिलन को क्या करें? यहां राधा की इस भाव भूमि को समझ लेना
उचित होगा। राधा कृष्ण के जीवन में आयी उससे पहले उसका विवाह हो हो गया था पर कृष्ण
के इस तरह उसके जीवन में आने के कारण उसके जीवन का अंधकार मिट गया और जैसे एक नयी
सुबह का आगमन हुआ। पर एक विवाहिता इस तरह किसी पराए पुरुष के लिए तड़पती-छटपटाती
रहे, इसमें औचित्य कितना? और संभवत: कवि ने इसी कारण दैहिक मिलन के बजाय मनोमिलन का
औचित्य देखा! तभी तो राधा कृष्ण को मन ही मन चाहती है, कृष्ण के साथ उसका मिलन शरीर
नहीं, बल्कि स्मृतिजन्य मिलन है, इसकी बराबर अनुभूति की जा सकती है जैसे निगुण
संतों के यहां होता है।
काव्य की शुरूआत सुबह के साथ हुई है। राधा के जीवन में
अब तक जैसे अंधेरा था, पर उसके जीवन में कृष्ण के आगमन से नया सवेरा हुआ है। राधा
के लिए यह सवेरा अलग तरह का है। कवि के शब्दों में -
'अन्य सभी सुबहों से आज की
सुबह
न जाने लगती है क्यों अलग-अलग।
धूप में यह कैसा दुस्साहस! आज हवा
में
अन्यमनस्कता जो नहीं है पहले-सी।
मानो लौटा हो प्रवासी प्रेमी, रह रहा
हो
आसपास कहीं छदम वेश लिए।
कितनी बारिश, कितनी भयंकर बिजलियों की कौंध थी
कल
रात भर! कैसे पर्वताकार थे बादल
फूल-पत्ते झड ग़ए, मैंने स्वयं को स्वयं
ही
जी-जान से दुबका लिया, कहीं बिजलियों की
झिलमिलाती पुकार न बज उठे मेरे
कानों में!
अपने नि:शब्द अथवा अर्थहीन शब्दों के
साम्राज्य की अंतिम घडी
में
कल का अंधेरा यदि रक्त से सना जूझ रहा होगा,
उसकीजो नाम मात्र स्मृति है
वह
कब तक रहेगी बिन बुझे?' 7
यहां जैसे राधा का अतीत और वर्तमान एक
साथ साकार हो उठा है। कृष्ण के आगमन से पहले का जीवन और बाद का जीवन कल की रात और
आज की सुबह में देखा जा सकता है। राधा का जीवन कल तक कृष्ण के बिना निस्सार था, पर
अब 'मानो लौटा हो प्रवासी प्रेमी, रह रहा हो आसपास कहीं छदम वेश लिए।' आज की सुबह
ने राधा की जीवन दृष्टि ही बदल डाली। 'अब दिखने लगी है अलग-अलग-सी नदी, नदी के उस
पार के वन, कब तक भला न बदलता मेरा पांडुर गगन-पवन?' काव्य में कृष्ण चिंतन का लंबा
सिलसिला चलता है। कृष्ण का चिंतन करते हुए राधा को लगता है कि 'ये पैर तो
मेरे नहीं, मेरी सारी आशा हताशा का इतिहास मेरा नहीं, पति, घरबार गोष्ठ भर गाय
गोरू, कुछ भी नहीं है मेरे यह जीना नहीं हैं मेरा, जो मृत्यु एक दिन अवश्य आएगी, वह
भी नहीं है मेरी।' 'यह है राधा का कृष्ण प्रेम। ऐसा भाग्य किसी-किसी का ही होता है
जहां अपने प्रियतम के लिए जीवन के साथ मृत्यु तक समर्पित किया जाता है! और अपने लिए
सिर्फ रीतापन रह जाता है, बावजूद इसके जीवन का वह शाश्वत आनंद बना रहता है! यानि
पीडा में भी आनंद। और यही अद्भूत स्थिति राधा की है। तभी तो वह एक जगह पर कहती है -
तुम्हें समर्पित कर दी मैंने शरीर की कठिनता, भार-भार पुरानी आदत, भय भ्राति,
सुख-दुख, जरा और मृत्यु, उसके पश्चात्, पिघलकर ब्रह्माण्ड पर बह गयी मानो मैं हूं
पर्वत के भीतर तुरंत-मुक्त चंद्र की किरण।' इस स्थिति को कवि ने अन्यत्र
व्यक्त करते हुए कहा है - 'तुम यदि वायदा करके न आते किसी रात, मैं यदि रह जाती
अपना वैधव्य विलापती रो रहे क्षणों के बीच, वे सब निश्चिह्न हो गए होते लंबी सांसो
में, भोर के उजाले में तब भी मैं अगले दिन न खीजती न रूठती अपने ललाट, वक्षस्थल
यौवन की दिशा-दिशान्तरों के सजा देती समूचे सृष्टि के फूलों पर, मन को समझाती कि
तुम जिस वक्त तुम नहीं होते तब होते खूब निकट हो, इसलिए क्या फर्क पडता है केवल एक
रात्रि की लक्ष्यभ्रष्टता में?'
राधा के कृष्ण वर्ण प्रियतम धीरे-धीरे निराकार
हो जायेंगे, भले ही उन्हें पा नहीं सकेगी, पर तब भी वह उन्हें भूल नहीं पायेगी-
'तुम्हें न भूल सकूंगी न ही पा सकूंगी और आंखों से आंसू सूख गया होगा तुम्हारे और
मेरे एक साथ रहने के दिन न होंगे तुम्हारे और मेरे अलग-अलग रहने के दिन ही तो होंगे
चंद्र, तारा, वृक्ष, लता, नदी पहले की भांति जड़ बने होंगे, अगर अचानक उष्मा आये कभी
भी खून में अपने आप शीतल होगी तरल राख बन बहती जाएगी नस-नस में मेरी।' राधा अपने इस
सांवरे प्रियतम के लिए अपने पति व समाज समेत सबकी ओर से दिये जाने वाले हर दुख को
झेलती है। क्योंकि कृष्ण उसकी नस-नस में समा गये हैं। ठीक उसी तरह जैसे सूर के यहां
'तिरसे व्है के अडै है।' यहां तक कि अंत में एक दिन उसके पास कृष्ण के अवसान के
समाचार आते हैं तब भी उस सांवरे की शाश्वतता में विश्वास व्यक्त करते हुए वह कहती
है - 'अब नहीं हो तुम किसी के पिता पुत्र स्वामी हमारे विदा के दिन की पूर्व
रात्रि-सा आज तुम पूर्ण चंचल हो, ध्वनि-सा छेड देते हो, छू देते हो मेरी कुवांरी
निर्जनता, मेरे रो पडने पर, गुदगुदी करते हो निस्पंद मेरे देखते रहने पर।' 'राधा ने
अपने प्रियतम को पीडा में पाया है। दुनिया की नंजर में भले ही कृष्ण का अवसान हआ हो
पर राधा का कृष्ण कभी मर ही नहीं सकता और तभी तो वह अंत में कहती है - कोई नहीं
जानता तुम जीवित हो, इसलिए मेरी नदी आने की राह में पीछे-पीछे र्कोई नहीं आयेगा, वे
सभी मुझे भूल जाएंगे या सोये रहेंगे गहरी नींद जब तुम्हें भींचकर पकडी होऊंगी अपनी
छाती में, जब मेरे सर्वांग पर तुम्हारा हाथ फिर रहा होगा, जब बाधा देने या कुछ कहने
की मुझ में सामर्थ्य नहीं होगी, जब मर नहीं पा रही होऊंगी और जीना भी होगा पूर्ण
असंभव।' राधा-कृष्ण का इस तरह का मिलन जैसे जीवन और मृत्यु का अद्भूत संगम है। यही
तो है काव्य की कथा।
श्री राधा काव्य में रहस्यानुभूति का आभास मिलता है।
रहस्यभाव के साथ स्वप्, जिज्ञासा, प्रतीक्षा व रति इत्यादि भाव देखने को मिलते हैं।
कहते हैं, प्रत्येक जैविक सत्ता में काम की प्रवृति होती हैं। अत: राधा में भी इस
तरह की प्रवृति होना नैसर्गिक बात हो सकती है, परंतु प्रस्तुत काव्य में कहीं भी
राधा की कामुकता, कामुक उत्सुकता एवं उन्मत्तता नहीं हैं। डॉ. अर्जुन शतपति इसकी
स्पष्टता करते हुए कहते हैं - 'कामना और कामुकता के बीच फासला इतना छोटा है कि महज
कामना में कामुकता की भ्रांति पैदा हो सकती है। विरह की कुछ दशाएं राधा में भी देखी
जाती है, परंतु प्राचीन और मध्यकालीन शास्त्रीयता का आरोप करना उचित नहीं लगता। यह
नि:सन्देह कहा जा सकता है कि राधा मध्यकालीन नायिका नहीं है। राधा कृष्ण आलंबन
विभाव है। यमुना का किनारा और चांदनी रात उद्दीपन विभाव हैं। समूचे काव्य में
अनेकों बार नदी और रात का वर्णन हुआ है।'
'श्री राधा' काव्य में प्रकृति का
अद्भूत चित्रण किया गया है। जैसे राधा-कृष्ण स्वरूप अभिन्न है वैसे ही यहां प्रकृति
को इस काव्य से अलग नहीं किया जा सकता। आकाश, बादल, बिजली, नदी, वृक्ष, रात, सुबह,
शाम, अंधकार, बारिश आदि का अत्यंत प्रभावशाली ढंग से कवि ने वर्णन किया है।
भाषा
शिल्प की दृष्टि से भी 'श्री राधा' काव्य उत्तम कोटि का काव्य ठहरता है। डॉ. अर्जुन
शतपति के शब्दों में कहें तो 'कवि रमाकान्त रथ की भाषा में सम्मोहन है; लालित्य है,
छन्दहीन छन्द पाठक को आगे बढ़ने के लिए विवश करते हैं। भाषा ऊपर से दुर्बोध-सी लगती है, पर उसकी परतें अपने आप खुलती जाती हैं। कवि ने उडिया भाषा में शब्दिक अभिव्यंजना का नया प्रयोग किया है। ठेठ उडिया शब्दों को जनजीवन से बटोकर उनमें सहज अर्थवत्ता भर देने में कवि की सफलता निर्विवाद है। श्री राधा की भाषा विशिष्ट है।
लंबे अरसे तक कवि सच्चिदानंद राउत राय की भाषा-शैली का अनुसरण किया गया था। किन्तु आज श्री राधा की अभिव्यक्ति कला का अनुसरण करने वाला हर गली में मिल जाएगा। काव्य के बिंब और प्रतीक एकदम से नए प्रतीक नहीं होते। परिचित बिंबों में नवीन भाव व्यंजना इसकी खूबी है। काव्य-शिल्प बेजोड़ है।'8
निष्काम प्रेम की अवतरणा प्रस्तुत काव्य का महान उद्देश्य है। कृष्ण राधा के इष्ट हैं, तो राधा भी कृष्ण की आराध्य देवी है। राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं। कवि ने संभवत: राधा के दैवी रूप का अस्वीकार करते हुए उसके मानवीय रूप को अधिक ग्रहणीय समझकर मानवीय और दैवी गुणाें का संगम उसमें दिखाया है। संक्षेप में कहें तो कवि रमाकान्त रथ ने 'श्री राधा' काव्य की राधा में मानवीय अतृप्ति और दैवी संपन्नता को एक साथ अवतरित किया है। 
प्रस्‍तुत लेखों मे लेखको न अपना मत प्रस्‍तुत किया है मै जो इनके सम्‍मुख नगण्‍य हूँ और मै क्‍या सकता हँ। आशा है कि मै बात रख सका हूँ। हाँ एक बात कहना चाहूँगा पर इस मुद्दे से हट कर, आज का शीर्षक ‘अब मैं नही’ कहीं भी विषय से सम्‍बन्धित नही था। पर शीर्षक इन अन्तिम पक्तिंयों के लिये ही है, आज बैठे-2 कुछ ऐसा महसूस हुआ कि अब मै नही। आशा है कि प्रतीक जी राधा के सम्‍बन्‍ध आपकी की जिज्ञासा समाप्‍त हो गई है, अगर नही हुई है तो आपको चिठ्ठा मंच काफी बन्‍धु मिलेगे जो इस पर आपकी तृष्‍णा को मिटाने का प्रयास करेगे,वैसे यह शोध का विषय हो सकता है। एक प्रश्न सागर भाई ने एक बार पूछा था कि अदिति कौन है तो भाई जी अदिति मेरे भतीजी है। अब मै यहाँ न लिख सकूँगा, ऐसा पूर्व की भातिं को ऐसा बहाना या कारण भी नही है कि मै बता सकूँ आप सभी से प्‍यार स्‍नेह मिल इसके लिये धन्‍यवाद। नव वर्ष से पूर्व बिछाड़ने पर दुख तो हो रहा है किन्‍तु आप सभी सदा मेरे हृदय मे रहेगें। आप सभी को नव वर्ष मंगलमय हो।


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ये सब कब सुधरेगें ?



आज बहुत दिनों के बाद ऑन लाइन होने और लिखने का अवसर प्राप्‍त हुआ, इन दिनों लिखने का अवसर नही मिल रहा है और शायद जल्‍दी लिख भी न पाऊ। किन्‍तु पंकज जी के मंतव्‍य को और अफलातून जी के समाजवादी जनपरिषद- उत्तर प्रदेश के विचारो को पढ़ा, चर्चा गम्‍भीर और मजेदार थी और मै आपने आपको को लिखने से रोक न सका, एक तरफ कम्‍पुटर पर एरियनस बैन्‍ड का गाना बज रहा था ‘’देखा है तेरी ऑंखो को, चाहा है तेरी अदाओं को, इसमे मेरा कूसूर क्‍या है सनम’ ’लग रहा था कि लिखते समय मेरे मुँह पर तमाचा मार रहा था या मै इस गीत के मुँह पर।
वैसे मेरा तरकश और मंतव्‍य और तरकश पर जाना कम ही होता था एक बार पंकज जी ने कहा कि आप तरकश पर नही जाते है क्‍या? तो मेरा कहना था कि शायद हां वो भी जोगलिखी पर, क्‍योकि मेरा उनके चिठ्ठे पर ज्‍यादा जाना होता है जो मेरे चिठ्ठे पर आते है, और उनके पर भी जाना होता है तो उनके चिठ्ठे पर आते है (उनके कमेण्‍ट के लिंक के द्वारा)। कौन नही जानता है कि सर्वाधिक कमेन्‍ट कौन करता है, इस लिये तरकश पर जाना तो होता तो है, सर्वाधिक जोगलिखी पर, अब तो मंतव्‍य पर भी होने लगा है। शायद मेरी यह बात कई बन्‍धुओं को खराब भी लगे।
अब मेन मुद्दे पर आना चाहिये, पंकज जी का प्रश्‍न था कि क्या श्री कृष्ण मवाली थे? मुझे कोई शक नही है नही है कि वे मवाली नही थे, श्रीकृष्‍ण बनना तो कितना आसान है पर नही भूलना चाहिये कि वे कभी राम भी थे, अगर को आज के दौर मे कोई श्रीकृष्‍ण बनना चाहता है तो उसे राम के आचरण को भी नही भूलना चाहिये, एक तरफ श्री कृष्‍ण श्री की 16 हजार रानियॉं थी, तो राम एक पत्‍नीव्रता थे। श्री कृष्‍ण से बड़ा मवाली इस दुनियाँ कोई नही मिलेगा, ऐसा कौन राजा होगा जो अपने से गरीब सथियों के साथ खेलता, कौन ऐसा मित्र होगा जो अपने दीन मित्र के पावों को धोया होगा और बिन मागे चार चावल के दानों के बदले राज पाठ दे देगा। कौन ऐसा पति होगा 16 हजार रानियों को एक साथ प्रेम दे सकता होगा जहाँ आज के जामने मे जिससे प्रेम विवाह होता है उसी से विवाह विच्‍छेदन होते देर नही लगती है। श्री कृष्‍ण रासलीला करते थे, तो एक मर्यादित ढंग से राधा से उन्‍होने प्रेम किया पर, पर राधा पवित्र रही और विवाह किसी और से हुआ, आज के जमाने में सारे कर्म हो जाते है, शादी बाद मे होती है और परिणाम पहले आ जाता है। शादी न होने पर नैनी के नये यमुना का नये पुल पर चले जाते है, आत्‍महत्‍या करने के लिये, ये कहना न कहना कि उस जामने मे यमुना पुल न था न तो राधा भी कूदने के लिये चली जाती। प्रेम एक हद तक ठीक है पर प्रेम का प्रर्दशन कहाँ तक उचित है। वो भी श्री कृष्‍ण का नाम लेकर की वे भी प्रेम करते थे। श्रीकृष्‍ण का प्रेम सच्‍चे प्रेम का प्रतीक था न कि भोग का, अगर कोई श्रीकृष्‍ण को मवाली कहता है, तो मै भी सुर मे सुर मिला के कहूँगा कि कृष्‍ण मवाली थे, और मुझे अफसोस होगा कि हमारे देश मे ऐसे और मवाली क्‍यों पैदा हुऐ।
देश को क्‍या हो गया है? अपना दोष दूसरे को गले मढता है। आज से ठीक एक साल पहले जब मेरठ मे पुलिस वालों ने जम कर लैला-मजनूँ की पिटाई की गई थी तब कोई समाजवादी और अन्‍यों ने विरोध किया जबकि जिसका नाम लेकर आज हल्‍ला मचाया जा रहा है उसी ने पुलिस की कार्यवाही का सर्मथन किया था, जबकि उत्‍तर प्रदेश मे समाजवादी सरकार थी और वही बृज प्रदेश है जहाँ श्री कृष्‍ण रहते थे। क्‍यों भूलते है कि मोदी से पहले इतिहास बनाने वाले मुलायम है। ये दोहरे माप दण्‍ड कब तक चलते रहेगे?
मोदी के दुश्‍मनो भाईयों की कमी उनके घर मे ही कम नही है, क्‍योकि जब तक मोदी है तब तक किसी भी भाई के मुख्‍यमंत्री की सम्‍भावना नही है, अगर बाहर हल्‍ला होती है तो यहाँ मोदी के सुशासन के कारण है क्‍योकि जो विकास मोदी ने 5 साल मे गुजरात मे किया है वह आज तक किसी प्रदेश की सरकार और यहाँ तक कोई केन्‍द्रीय सरकारों ने नही किया है। आज की सरकारें तो विकास के नाम पर कहीं कन्‍या पिद्याधन बॉंट रही है तो कही बेरोजगारी भत्‍ता तो कहीं विशेष वर्ग को आरक्षण देकर वोट की राजनीति खेलती है। पर मोदी के शासन मे यह नही सुनाई दिया। अगर अगला प्रधानमंत्री अगर मोदी न हो तो मोदी जैसा जरूर हो।
एक बात सोचने पर दिमाग को खटकती है कि गांधी-गुजरात और मोदी इन्‍ही तीनो पर कीचड़ ज्‍यादा क्‍या उछाला जाता है? क्‍योकि गुजरात मे कीचडों की कमी नही है, 1/5 भाग गुजराज मे कीचड़ ही भरा हुआ है, कारण है ‘’कच्‍छ की रण’’ कीचड़ मय है। इस कारण तीनों पर ही ज्‍यादा कीचड़ ऊछाला जाता है, और इनके पीछे और साथ चलने वाले भी कीचड़ खाते है। कुछ लोगों की आदत ही होती है कीचड़ ऊछालने कि क्‍यो वे भूल जाते है कि सबसे पहले कीचड़ उनके ही हाथ मे लगता है जो कीचड़ उछालते है। मोदी को जितना लोकप्रियता विरोधियों से मिली उतना उनके सर्मथकों(पार्टी) से नही मिली है। पहले आज से 5 साल पहले जब मै हाई स्‍कूल का छात्र था और नरेन्‍द्र मोदी भाजपा के महासचिव हुआ करते थे तो मुझे यहीं मोदी मुझे फुटी आँख नही सुहाते थे क्‍योकि मोदी की आवाज मे पता नही क्‍या लगता था कि उसे बायन करने के लिये मरे पास शब्‍द नही है। गोधरा के बाद जिस प्रकार के दृश्‍य हमारे सामने रखे गये और और जिस प्रकार मोदी ने सबका समना करते हुये, सरकार का त्‍याग पत्र देकर पुन: जनता का विश्‍वास प्राप्‍त किया। जनता के द्वारा दिये गये विश्‍वास मत को विपक्षियों से ठोग कहा ¾ के बहुमत से निर्वाचित सरकार को बरखस्‍त करने की मॉंग की गई। क्‍या यह जनता के साथ विस्‍वास घात न होता। जब महत 14.5 प्रतशित मुस्लिमों के बल पर पूरे देश मे कही भी सरकार बनाने का दावा किया जाता है तो क्‍या 84 प्रतशित हिन्‍दू के बल अगर कोई सरकार बनती है तो केवल उसका विरोध क्‍यों? जब उत्‍तर प्रदेश मे MY समीकरण चल सकता तो H समीकरण से परहेज क्‍यों? ये तो वही बात हुई गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज, क्‍योकि यह उनके हित मे नही है इस लिये यह ठीक नही है।
अक्‍सर लोग कहते मिल जाते है कि आज समाज कितना असुरक्षित हो गया है। अखिर यही कहने वालों ने ही समाज को असुरक्षित कर दिया है। कपड़ो के नाम पर छात्राओं 8-9 गज की साडी के नाम पर आज मात्र 2 गज का कपडा की बचा है। भगवान को भी इनकी इज्‍जत बचाने के लिये सोचना पढता है कि जाये तो कैसे जाये? अखिर कब तक अधुनिकता के नाम पर हम अपने आप को नंगा करते रहेगें? सीमाओं का अतिक्रमण कभी भी ठीक नही होता है, औ प्रकृति इसे अपने अनुरूप बानाने के लिये अपना रास्‍ता स्‍वयं खोज लेती है। कुछ लोगों का कहना है कि युगलों कर साथ-साथ धूमना खराब नही है और आकडे कहते है कि मित्र तथा नजदीकी सम्‍बन्‍धी इन हादसों के लिये ज्‍यादा जिम्‍मेदार होते है। जब आप किसी पर छींटा कसी करते हो तो क्‍यों भूल जाते हो जिस चौराहे पर आप खडे हो कर जो कुकृत्‍य कर रहे है, उसी सड़क के दूसरे चौराहे पर कोई आपकी बहन के साथ आपकी हरकत की पुर्नावृत्ति कर रहा होगा? जो कुछ आप करे वह सही है और कोई वही काम आपके साथ किया जाये तो आपको गलत क्‍या लगता है। दोहरे माप दण्‍ड मिटाने होगे, गलत- तो गलत है चाहे आप हो या कोई, समाज को बदलने से अपने आप को बदलो जिस दिन आप बदलोगे समाज अपने आप बदल जायेगा।
आज कल का छात्र जीवन को छात्र जीवन को छात्र जीवन कहने मे भी संकोच होता है, लगता है कि हम अपने आप को ही गाली दे रहे है, विश्‍वविद्यालय शिक्षा केन्‍द्र न होकर प्रेमस्‍थान और नेतागीरी का सयुक्‍त रणक्षेत्र बनता जा रहा है। मेरे 3 साल के विश्‍वविद्यालय काल मे विश्‍वविद्यालय परिसर तथा उसके परिधि के 2 किमी क्षेत्र मे छात्रो के बीच नेता गीरी और प्रेमप्रंसग के सम्‍बन्‍ध मे आधा दर्जन हत्‍या सहित सैकडो झडप देखने को मिली है। एक दो बार तो गोली बारी और बमबाजी परिसर मे मेरे आखों के समने हुई है। छात्र नेता के नाम एसे छात्र आज भी केन्‍द्रीय इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय मे आज भी है जिन्‍हो ने मेरे जन्‍म के 2 साल पहले यानि 1984 मे स्‍नातक किया था, आज ये छात्र नेता इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय मे छात्र संद्य अध्‍यक्ष पद के लिये रिट दखिल किया है।
गलत काम का प्रतिकार जरूरी है, चाहे कोई करे। मुझे नही लगता कि मेरठ और अहमदाबाद मे जो हुआ गलत हुआ, तब मेरठ पुलिस को सर्मथन था तो आज दुर्गावहिनी को है। कम से कम समाज का एक वर्ग तो इस नगे नाच के प्रतिकार के लिये उठा। आगे उम्मिद है कि एसे लोग सामने आयेगे। जिस दिन से महिलाओं और पुरूषों दोनों के लिये समान ‘वस्‍त्र नियम’ लागू हो जायेगा, तब भारत मे हर तरफ महिलाओं के प्रति आपराधिक प्र‍वृत्तियों मे कमी आयेगी। यह समय गम्‍भीर चिन्‍तन का है कि क्‍या हमारी पीढ़ी सही रास्‍ते पर जा रही है। आज के युवा वर्ग अधुनिकता के दौर में अपने अस्तित्‍व को खतरे मे डाल रहा है। आज उसकी चाहत उसी की जान की दुश्‍मन बनी हुई है। इस आत्‍मघाती प्रवृत्ति से हम सब को बचना होगा। शायद मै इस समय इस हिन्‍दी चिठ्ठा जगत का उम्र, योग्‍यता तथा अन्‍य सभी क्षेत्रो मे सबसे छोटा सदस्‍य हूँ, यह लेख लिखते समय काफी असहज महसूस कर रहा था, क्‍योकि मैने एसे विषय पर पहले कभी नही लिखा था। मेरी कही गई किसी बात को आप अन्‍यथा न लेगे चाहे वह श्रीकृष्‍ण के प्रति हो या अन्‍य के प्रति, मेरी कमियो तथा गल्‍तियों को नजरांदाज करेगें।


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मैथिल कोकिल कवि - विद्यापति



हिन्‍दी साहित्‍य के अभिनव जयदेव के नाम से विद्यापति प्राख्‍यात है। बिहार मे मिथि‍ला क्षेत्र के होने के कारण इनकी भाषा मैथिल थी। इनकी भाषा मैथिल होने के बावजूद़ सर्वाधिक रचनाऐ संस्‍कृत भाषा मे थी, इसके अतिरिक्‍त अवहट्टा भाषा मे रचना करते थे। विद्यापति के जन्‍म के सम्‍बन्‍ध मे विद्वानों मे मतभेद है, कुछ तो इन्‍हे दरभंगा जनपद के विसकी नामक स्‍थान को मानते है। विद्यापति का वंश ब्राह्मण तथा उपाघि ठाकुर थी। विसकी ग्राम को इनके आश्रय दाता राजा शिवसिंह ने इन्‍हे दान मे दिया था। इनका पेरा परिवार पैत्रिक रूप से राज परिवार से सम्‍बद्ध था। इनके पिता गणपति ठाकुर राम गणेश्‍वर के सभासद थे। इनका विवाह चम्‍पा देवी से हुआ था। विद्यापित कि मृत्‍यु सनम 1448 ई0 मे कार्तिक त्रयोदशी को हुई थी।

मैथिल महाकवि विद्यापति का शिव प्रेममैथिल महाकवि विद्यापति का शिव प्रेम

एक किंवदन्ती के अनुसार बालक विद्यापति बचपन से तीव्र और कवि स्वभाव के थे। एक दिन जब ये आठ वर्ष के थे तब अपने पिता गणपति ठाकुर के साथ शिवसेंह के राजदरबार में पहुँचे। राजा शिवसिंह के कहने पर इन्होने निम्नलिखित दे पंक्तियों का निर्माण किया: 
पोखरि रजोखरि अरु सब पोखरा। राजा शिवसिंह अरु सब छोकरा।।
यद्यपि महाकवि की बाल्यावस्था के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। जनश्रुतियों से ऐसा ज्ञात होता है कि महाकवि अपने पिता गणपति ठाकुर के साथ बचपन से ही राजदरबार में जाया करते थे। किन्तु चौदहवीं सदी का शेषार्ध मिथिला के लिए अशान्ति और कलह का काल था। राजा गणेश्वर की हत्या असलान नामक यवन-सरदार ने कर दी थी। कवि के समवयस्क एवं राजा गणेश्वर के पुत्र कीर्तिसिंह अपने खोये राज्य की प्राप्ति तथा पिता की हत्या का बदला लेने के लिए प्रयत्नशील थे। संभवत: इसी समय महाकवि ने नसरतशाह और ग़ियासुद्दीन आश्रमशाह जैसे महपुरुषों के लिए कुछ पदों की रचना की। राजा शिवसिंह विद्यापति के बालसखा और मित्र थे, अत: उनके शासन-काल के लगभग चार वर्ष का काल महाकवि के जीवन का सबसे सुखद समय था। राजा शिवसिंह ने उन्हें यथेष्ठ सम्मान दिया। बिसपी गाँव उन्हें दान में पारितोषिक के रुप में दिया तथा 'अभिनवजयदेव' की उपाधि से नवाजा। कृतज्ञ महाकवि ने भी अपने गीतों द्वारा अपने अभिन्न मित्र एवं आश्रयदाता राजा शिवसिंह एवं उनकी सुल पत्नी रानी लखिमा देवी (ललिमादेई) को अमर कर दिया।

विद्यापति के काव्य में स्वरों की संगीतमयता

विद्यापति ने मैथिल, अवहट्ट, प्राकृत ओर देशी भाषओं मे चरित काव्‍य और गीति पदों की रचना की है। विद्यापति के काव्‍य में वीर, श्रृंगार, भक्ति के साथ-साथ गीति प्रधानता मिलती है। विद्यापति की यही गीतात्‍मकता उन्‍हे अन्‍य कवियों से भिन्‍न करती है। जनश्रुति के अनुसार जब चैतन्‍य महाप्रभू इनके पदों को गाते थे, तो महाप्रभु गाते गाते बेहोश हो जाते थे। भा‍रतीय काव्‍य एवं सांस्‍कृतिक परिवेश मे गीतिकाव्‍य का बड़ा महत्‍व था। विद्यापति की काव्‍यात्‍मक विविधता ही उनकी विशेषता है।

विद्यापति संस्‍कृत वाणी के सम्‍बन्‍ध मे टिप्‍पणी करते हुये कहते है‍ कि संस्‍कृत भाषा प्रबुद्ध जनो की भाषा है तथा इस भाषा से आम जनता से कोई सरोकार नही है प्राकृत भाषा मे वह रस नही है जो आम आदमी के समझ मे आये। इ‍सलिये विद्यापति अपभ्रंश(अवहट्टा) मे रचनाये करते थें। अवहट्ट के प्रमाणिक कीर्ति लता और कीर्ति पताका है। 
विद्यापति भारतीय साहित्यक भक्ति परंपरा क प्रमुख स्तंभ म सँ एकटा आओर मैथिली के सर्वोपरि कवि क रूप म जानल जैत अछि

विद्यापति की तीनो भाषओं की
प्रमुख संग्रह निम्‍नलिखित है-
  • पुरुष परीक्षा / विद्यापति
  • भूपरिक्रमा / विद्यापति
  • कीर्तिलता / विद्यापति
  • कीर्ति पताका / विद्यापति
  • गोरक्ष विजय / विद्यापति
  • मणिमंजरा नाटिका / विद्यापति
  • गंगावाक्यावली / विद्यापति
  • दानवाक्यावली / विद्यापति
  • वर्षकृत्य / विद्यापति
  • दुर्गाभक्तितरंगिणी / विद्यापति
  • शैवसर्वस्वसार / विद्यापति
  • गयापत्तालक / विद्यापति
  • विभागसार / विद्यापति

महेशवाणी आ नचारी

  • एत जप-तप हम की लागि कयलहु / विद्यापति
  • हम नहि आजु रहब अहि आँगन / विद्यापति
  • हिमाचल किछुओ ने केलैन्ह बिचारी / विद्यापति
  • आजु नाथ एक व्रत महा सुख लागल हे / विद्यापति
  • रुसि चलली भवानी तेजि महेस / विद्यापति
  • कखन हरब दुःख मोर हे भोलानाथ / विद्यापति
  • गौरा तोर अंगना / विद्यापति
  • हे हर मन द करहुँ प्रतिपाल / विद्यापति

भजन

  • तीलक लगौने धनुष कान्ह पर टूटा बालक ठाढ़ छै / विद्यापति
  • सबरी के बैर सुदामा के तण्डुल / विद्यापति
  • सीताराम सँ मिलान कोना हैत / विद्यापति
  • सबरी के अंगना में साधु-संत अयलखिन्ह / विद्यापति
  • कोने नगरिया एलइ बरियतिया सुनु मोर साजन हे / विद्यापति

भगबती गीत

  • गे अम्मा बुढ़ी मईया / विद्यापति
  • दया करु एक बेर हे माता / विद्यापति
  • कोने फुल फुलनि माँ के आधी-आधी रतिया / विद्यापति
  • जगदम्ब अहीं अबिलम्ब हमर / विद्यापति
  • भगबती चरनार बन्दिति की महा महिमा निहारु / विद्यापति
  • हे जननी आहाँ जन्म सुफल करु / विद्यापति
  • जयति जय माँ अम्बिके जगदम्बिके जय चण्डिके / विद्यापति
  • भजै छी तारिणी सब दिन कियै छी दृष्टि के झपने / विद्यापति
  • बारह बरष पर काली जेती नैहर / विद्यापति
  • जनम भूमि अछि मिथिला सम्हारु हे माँ / विद्यापति
  • लाले-लाले आहुल के माला बनेलऊँ / विद्यापति
  • क्यों देर करती श्रीभवानी मैं तो बुद्धिक हीन हे माँ / विद्यापति
  • दिय भक्ति के दान जगदम्बे हम जेबै कतइ हे अम्बे / विद्यापति
  • सासु रुसल मैया हम्मर काली एली काली / विद्यापति

भगवती स्तोत्

  • कनक-भूधर-शिखर-बासिनी / विद्यापति

भगबान गीत

  • हरी के मोहनी मुरतीया में मोन लागल हे सखी / विद्यापति
  • भजु राधे कृष्णा गोकुल में अबध-बिहारी / विद्यापति

भगता गीत

  • इनती करै छी हे ब्राह्मण मिनती करै छी / विद्यापति (ब्राह्मण)
  • इनती करै छी भैरवनाथ / विद्यापति (भैरव)

बटगमनी

  • नव जौबन नव नागरि सजनी गे / विद्यापति
  • फरल लवंग दूपत भेल सजनी गे / विद्यापति
  • लट छल खुजल बयस सजनी गे / विद्यापति
  • तरुणि बयस मोही बीतल सजनी गे / विद्यापति
  • ई दिन बड़ दुर्लभ छल सजनी गे / विद्यापति

बारहमासा

  • साओनर साज ने भादवक दही / विद्यापति
  • चानन रगड़ि सुहागिनी हे गेले फूलक हार / विद्यापति
  • चैत मास गृह अयोध्या त्यागल हानि से भीपति परी / विद्यापति
  • अगहन दिन उत्तम सुख-सुन्दर घर-घर सारी / विद्यापति
  • चोआ चानन अंग लगाओल कामीनि कायल किंशगार / विद्यापति
  • प्रीतम हमरो तेजने जाइ छी परदेशिया यौ / विद्यापति

बिरह गीत

  • सखी हम जीबन कोना कटबई / विद्यापति

बिसरही गीत

  • कोन मास नागपञ्चमी भेल / विद्यापति
  • पीयर अंचला बिसहरि के लाम्बी-लाम्बी केस / विद्यापति

भूइयां के गीत

  • कोने लोक आहे भूईयां लकड़ी चुनै छी आहे राम / विद्यापति
  • हई कुसुम बेली चढ़ई ताके मईया गे सुरेसरी / विद्यापति

विबाहक गीत

  • मचिये बैसल तोहें राजा हेमन्त ॠषि / विद्यापति
  • अयलऊँ हे बड़का बाबा / विद्यापति

प्रतिनिधि रचनाएँ

  • विद्यापति के दोहे / विद्यापति
  • षटपदी / विद्यापति
  • आदरें अधिक काज नहि बंध / विद्यापति
  • सैसव जौवन दुहु मिल गेल / विद्यापति
  • ससन-परस रबसु अस्बर रे देखल धनि देह / विद्यापति
  • जाइत पेखलि नहायलि गोरी / विद्यापति
  • जाइत देखलि पथ नागरि सजनि गे / विद्यापति
  • जखन लेल हरि कंचुअ अचोडि / विद्यापति
  • मानिनि आब उचित नहि मान / विद्यापति
  • पहिल बदरि कुच पुन नवरंग / विद्यापति
  • रति-सुबिसारद तुहु राख मान / विद्यापति
  • दुहुक संजुत चिकुर फूजल / विद्यापति
  • प्रथमहि सुंदरि कुटिल कटाख / विद्यापति
  • कुच-जुग अंकुर उतपत् भेल / विद्यापति
  • कान्ह हेरल छल मन बड़ साध / विद्यापति
  • कंटक माझ कुसुम परगास / विद्यापति
  • कुंज भवन सएँ निकसलि / विद्यापति
  • आहे सधि आहे सखि / विद्यापति
  • सामरि हे झामरि तोर दहे / विद्यापति
  • कि कहब हे सखि रातुक / विद्यापति
  • आजु दोखिअ सखि बड़ / विद्यापति
  • कामिनि करम सनाने / विद्यापति
  • नन्दनक नन्दन कदम्बक / विद्यापति
  • अम्बर बदन झपाबह गोरि / विद्यापति
  • चन्दा जनि उग आजुक / विद्यापति
  • ए धनि माननि करह संजात / विद्यापति
  • माधव ई नहि उचित विचार / विद्यापति
  • सजनी कान्ह कें कहब बुझाइ / विद्यापति
  • अभिनव पल्लव बइसंक देल / विद्यापति
  • अभिनव कोमल सुन्दर पात / विद्यापति
  • सरसिज बिनु सर सर / विद्यापति
  • लोचन धाय फोघायल / विद्यापति
  • आसक लता लगाओल सजनी / विद्यापति
  • जौवन रतन अछल दिन चारि / विद्यापति
  • के पतिआ लय जायत रे / विद्यापति
  • चानन भेल विषम सर रे / विद्यापति
  • भूइयां के गीत / विद्यापति
  • विबाहक गीत / विद्यापति
  • बिरह गीत / विद्यापति
  • बिसरही गीत / विद्यापति
  • भजन / विद्यापति
  • भगता गीत / विद्यापति
  • भगबती गीत / विद्यापति
  • भगबान गीत / विद्यापति
  • बटगमनी / विद्यापति
  • बारहमासा / विद्यापति
  • जनम होअए जनु / विद्यापति
  • गीत / विद्यापति
  • जय- जय भैरवि असुर भयाउनि / विद्यापति
  • गंगा-स्तुति / विद्यापति
  • बसंत-शोभा / विद्यापति
  • सखि,कि पुछसि अनुभव मोय / विद्यापति
  • सखि हे हमर दुखक नहिं ओर / विद्यापति
  • सुनु रसिया अब न बजाऊ / विद्यापति
  • माधव कत तोर / विद्यापति
  • माधव हम परिणाम निराशा / विद्यापति
  • उचित बसए मोर / विद्यापति
  • गौरी के वर देखि बड़ दुःख / विद्यापति
  • जगत विदित बैद्यनाथ / विद्यापति
  • जोगिया मोर जगत सुखदायक / विद्यापति
  • बड़ अजगुत देखल तोर / विद्यापति
  • हम जुवती पति गेलाह / विद्यापति
  • नव यौवन अभिरामा / विद्यापति
  • सासु जरातुरि भेली / विद्यापति
  • आजु नाथ एक व्रत / विद्यापति
  • हम एकसरि, पिअतम नहि गाम / विद्यापति
  • बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि / विद्यापति
  • परतह परदेस, परहिक आस / विद्यापति
  • आदरे अधिक काज नहि बन्ध / विद्यापति
  • वसन्त-चुमाओन / विद्यापति
  • रूप-गौरव / विद्यापति
  • अभिसार / विद्यापति
  • शान्ति पद / विद्यापति
  • बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे / विद्यापति
  • दुल्लहि तोर कतय छथि माय / विद्यापति
  • सैसव जौवन दुहु मिलि गेल / विद्यापति
  • सैसव जौवन दरसन भेल / विद्यापति
  • जय जय भैरवि असुरभयाउनि / विद्यापति
  • उचित बसए मोर मनमथ चोर / विद्यापति
  • जखन लेल हरि कंचुअ अछोडि / विद्यापति
  • कि कहब हे सखि आजुक रंग / विद्यापति
  • सैसव जीवन दुहु सिलि गेल / विद्यापति
  • कुंज भवन सएँ निकसलि रे रोकल गिरिधारी / विद्यापति
  • आहे सधि आहे सखि लय जनि जाह / विद्यापति
  • कि कहब हे सखि रातुक बात / विद्यापति
  • आजु दोखिअ सखि बड़ अनमन सन / विद्यापति
  • नन्दनक नन्दन कदम्बक तरु तर / विद्यापति
  • चन्दा जनि उग आजुक राति / विद्यापति
  • सरसिज बिनु सर सर बिनु सरसिज / विद्यापति
  • लोचन धाय फोघायल हरि नहिं आयल रे / विद्यापति
  • हम जुवती, पति गेलाह बिदेस / विद्यापति
  • कखन हरब दुख मोर / विद्यापति
  • जनम होअए जनु, जआं पुनि होइ / विद्यापति
  • नव बृन्दावन नव नव तरूगन / विद्यापति
  • भल हर भल हरि भल तुअ कला खन / विद्यापति
  • मोरा रे अँगनमा चानन केरि गछिया / विद्यापति
  • सखि हे, कि पुछसि अनुभव मोए / विद्यापति
  • सुनु रसिया / विद्यापति
  • चाँद-सार लए मुख घटना करू / विद्यापति
''देसिल बयना सब जन मिठ्ठा '' उक्‍त पक्तिं के अनुसार वि़द्यापति के अनुसार उन्‍हे अपनी भाषा मे भावो को व्‍यक्‍त्‍ा करना अनिवार्य था, उसकी पूर्ति के उन्‍होने पदावली मे की। पदावली की भाष मैथिल है जिस पर ब्रज का प्रभाव दिखता है। मिथिला कि प्राचीन भाषा ही उसकी 'देसिल बयना' है। विद्यापति ने उसे स्‍वयं भी मैथिल भाषा नही कहा है। विद्यापति की यह पदावली कालान्‍तर मे पूर्वोत्‍तर भारत बंगाल मे प्रचलित हो चुकी थी। विद्यापति का प्रभाव उनके उत्‍तराधिकारी सूर पर भी पडता है।

विद्यापति द्वारा रचित ''राधा-कृष्‍ण'' से सम्‍बन्धित मैथिल भाषा मे निबद्ध पदों का संकलित रूप विद्यापति पदावली के नाम से विख्‍यात है विद्यापति के पदों का संकलन जार्ज गिर्यसन, नरेन्‍द्र नाथ गुप्‍ता, रामवृक्ष बेनी पुरी, शिव नन्‍दन ठाकुर आदि विद्वानों ने किया हैं। विद्यापति के पदों मे कभी तो धोर भक्तिवादिता तो क‍भी घोर श्रृंगारिकता दिखती है, इन्‍ही विभिन्‍नतओं के कारण विद्यापति के विषय मे यह भी विवाद है कि उन्‍हें किा श्रेणीके कवि मे रखा जाये। कुछ कवि तो उन्‍हें भक्त कवि के रूप मे रखनें को तैयार नही थे। विद्यापति द्वारा कृष्‍ण-राधा सम्‍बन्‍धी श्रृंगारी पद उन्‍हे भक्ति श्रेणी में रखने पर विवाद था। विद्वानों का कहना था कि विद्यापति भी रीतिकालीन कवियों की भातिं रा्जाश्रय मे पले बड़े हुये है इसलिये उनकी रचनाओं मे श्रृंगार प्रधान बातें दखिती है। इसलिये इन्‍हे श्रृंगार का कवि कहने पर बल दिया गया है।

विद्यापति के सम्‍बन्‍ध में एक बात प्रमुख है कि उनके पद्यों में राधा को प्रमुख स्‍थान दिया गया है। उसमे भी नख-शिख वर्णन प्रमुख है। विद्यापति के काव्‍य की तुलना सूर के काव्‍य करे तो यह प्रतीत होता है कि सूर ने राधा-कृष्‍ण का वर्णन शैशव काल मे है तो विद्यापति ने श्रीकृष्‍ण एवं राधा के वर्णन तरूणावस्‍था का है जिससे लगता है कि विद्यापति का उद्देश्‍य भक्‍त का न होकर के श्रृंगार का ही हैं।

भक्‍त की दृष्टि से अगर विद्यापति के काव्‍य को देखा जाये तो यह देखने को मिलता था कि तत्कालीन परिवेश एवं परिस्थितियों के कारण उनका भाव श्रृंगारिक हो गया हैं। विद्यापति के पदों को अक्‍सर भजन गीतों के रूप मे गाया जाता रहा है। विद्यापति ने राधा-कृष्‍ण का ही नही शिव, विष्‍णु राम आदि देवताओं को विषय मानकर रचनाऐ की है। विद्यापति द्वारा रचित महेश भक्ति आज भी उड़ीसा के शिव मन्दिरों मे गाई जाती है। दैव प्रचीन ग्रन्‍थवली के अनुसार भक्‍त अपने आराध्‍य को किसी भी रूप मे पूजा कर सकता है, इस आधार पर विद्यापति भक्त कवि भी सिद्ध होते है।

विद्या‍वति के पद्य :--- 

 1
देख-देख राधा रूप अपार,
अपरूष के बिहि आनि मिराओल,
खिति तल लावण्‍य सार,
अगहि अंग अनंग मुरझायत
हेरय पड़य अधीर।

2

भल हरि भल हर भल तुअ कला,
खन पित बासन खनहि बद्यछला।
खन पंचानन खन भुज चारि
खन संकर खन देव मुरारि
खन गोकुल भय चराइअ गाय
खन भिखि मागिये डमरू बजाये।

3
कामिनि करम सनाने
हेरितहि हृदय हनम पंचनाने।
चिकुर गरम जलधारा
मुख ससि डरे जनि रोअम अन्हारा।
कुच-जुग चारु चकेबा
निअ कुल मिलत आनि कोने देवा।
ते संकाएँ भुज-पासे
बांधि धयल उडि जायत अकासे।
तितल वसन तनु लागू
मुनिहुक विद्यापति गाबे
गुनमति धनि पुनमत जन पाबे।

विद्यापति गीत - गौर तोर अंगना - कुंज बिहारी मिश्र
___________________________________________________
01 आजु नाथ एक बरत महासुख - कुंज बिहारी मिश्र
02 हम नहि आजु रहब एही आँगन - कुंज बिहारी मिश्र
03 अब्धि मास छल भादव सजनी गे - कुंज बिहारी मिश्र
04 अरे बाप रे बाप शिव के सगरो - कुंज बिहारी मिश्र
05 चानन भेल बिषम सर रे - कुंज बिहारी मिश्र
06 बड़ अजगुत देखल गौर तोर अंगना - कुंज बिहारी मिश्र
07 सबहक सुधि आहाँ लए छी - कुंज बिहारी मिश्र
08 शंकर गहल चरण हम तोर - कुंज बिहारी मिश्र
09 सुरभि निकुंज बेदी भलि भेली - कुंज बिहारी मिश्र
10 उगना रे मोरा कतए गेल - कुंज बिहारी मिश्र



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हँसना भी जरूरी - भाग एक



राधा मीना से - मिसेज शर्मा है न गधी है गधी घन्‍टे भर से मेरा सिर खा रही थी।
मीना - बेचारी भूखी रही होगी, सिर मे भूसा भरा देख कर रोक न सकी होगी।
------------------------------------------------------
मोनू - मम्‍मी आपने भइया को किस भाव से खरीदा है।
मम्‍मी -बेटे मैने उसे खरीदा नही, जन्‍म दिया है (समझाते हुये)
मोनू - फिर डाक्‍टर साहब ने उसे तौल कर क्‍यों दिया।
------------------------------------------------------
भिखारी - बाबुजी, अन्‍धे सूरदास को एक रूपया देदो।
साहब - सूरदास तो पूरे अन्‍धे थे, तुम्‍हारी एक आँख तो ठीक है।
भिखरी - तो पचास पैसे ही दे दो।
------------------------------------------------------
अध्‍यापक - काल कितने प्रकार के होते है
राजू - काई प्रकार के
अध्‍यापक - (गुस्‍साते हुये) बताओ
राजू - मिस काल, रीसीव काल और डायल काल
------------------------------------------------------
एक आदमी तेजी से बस मे चढ़ा और बोला लगता है सारे के सारे जानवर बस मे भरे है।
दूसरा आदमी बोला बस एक गधे की कमी थी वो भी पूरी हो गई।


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मौसम की जानकारी देता पत्‍थर



कानपुर के एक मन्दिर है जहॉं एक ऐसा पत्थर है जो बिना किसी धोखे के 15 दिन पूर्व ही बारिश की जानकारी दे देता है। उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर के बेहटा बुजुर्ग गांव में एक ऐसा पत्थर है जिससे मानसून आने से 15 दिन पूर्व ही पानी टपकने लगता है। पुरातात्विक विरासत को समेटे इस गांव में विशिष्ट वास्तु शैली में बने जगन्नाथ मंदिर के दो उन्नत शिखर विलक्षणता का आभास करा देते हैं। मुख्यद्वार पर प्राचीन पट है जिससे सूर्य के मुख से जंजीर निकलती दिखाई देती है। जंजीर की आखिरी कड़ी से तीन कडि़यों और फिर उससे नौ कडि़यों का विस्तार होता चला जाता है। मंदिर के गर्भगृह में दिन में भी अंधेरा छाया रहता है और इसी गर्भगृह में ही ऊपर वह पत्थर स्थित है जिसे यहां के लोग मानसून पत्थर कहते हैं। रहस्य को समेटे मानसून पत्थर की सूचना पर आस-पास के लोग खेती के बारे में निर्णय लेते हैं। मंदिर के गर्भगृह के दोनों ओर बनी छोटी छोटी कोठरियों में भगवान विष्णु की प्रतिमा है, इन्हीं में से एक में पुरावशेषों के ढेर हैं। गांव वालों का मत है कि अगर इस मंदिर और आस पास के क्षेत्र में खुदाई की जाए तो पुरातात्विक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण चीजें भी मिल सकती हैं। 
दैनिक जागरण(Danik Jagran) से


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हस्तमैथुन अथवा हैंड प्रैक्टिस की लत छोड़ने के आसान तरीके How to Stop a Masturbation Addiction in Hindi



हस्‍त मैथुन एक स्‍वा‍भाविक और नैसर्गिक क्रिया है, इसे कोई बीमारी कहना एक भ्रांति है। समान्‍य यौन क्रिया की भाति यह भी एक क्रिया है। हमारे पुराणों मे कहा गया कि अति सर्वत्र वर्जयेत, ये एक सत्य है कि किसी भी कार्य की जरूरत से ज्‍यादा करना नुकसान दायक भी है। आप इस लेख मे ऐसे ही हस्‍तमैथुन के लाभ और हानियां के बारे मे पढ़ सकेगे। हस्तमैथुन अथवा हैंड प्रैक्टिस की लत छोड़ने के आसान तरीके जाने, इससे पहले यह जानलेना आवश्यक है कि यह क्या है और कितना हानिकारक है

हस्तमैथुन (मास्टरबेशन) क्या है
सबसे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि हस्तमैथुन एक ऐसी क्रिया है जिसमे व्यक्ति बिना किसी पार्टनर (पुरुष या महिला) के खुद के द्वारा ही अपनी यौन इच्छाओ को संतुष्ट करता है और अपने संवेदनशील अंग के साथ खेलकर वह स्खलन के माध्यम से आत्मसंतुष्टि पाता है। इसे आम भाषा में मुठ मारना, मुठ्ठी मरना भी कहा जाता है। व्यक्ति के द्वारा अपने हाथ से लिंग को तेजी के साथ गति देकर वीर्य को निकाल देना हस्तमैथुन कहलाता है। हस्तमैथुन को दूसरी भाषा में आत्ममैथुन कहते हैं। किशोर अवस्था में अधिकांश युवक हस्तमैथुन की क्रिया को करना शुरू कर देते हैं। कई पुरुष अपने मित्रों को हस्तमैथुन करते देखकर खुद हस्तमैथुन करने लगते हैं। हस्तमैथुन को बढ़ावा देने वाली वह किताबें भी होती है जो सेक्स क्रिया को जगाती है। अक्सर देखा गया है कि हस्तमैथुन करने से मन के अंदर हीन भावना पैदा हो जाती है। इस क्रिया को करने के बाद हस्तमैथुन करने वाला यह सोचता है कि वह इस प्रकार की गलती दोबारा कभी नहीं करेगा परन्तु वह पुरुष अपने मन को काबू न रख पाने की वजह से पुनः हस्तमैथुन की क्रिया करने को मजबूर हो जाता है और इस तरह से हीनभावना के शिंकजे में फंस जाता है। इस रोग को एंजाएटी न्यूरोसिस के नाम से भी जाना जाता है। 
     

    हस्तमैथुन करने के लाभ अथवा नुकसान : 
    • प्राकृतिक रूप से हस्तमैथुन करना कोई बुरी बात नहीं है। हस्‍तमैथुन के बारे में हमें कई अफवाहें सुनने को मिलती है जिसमे कहा जाता है कि हस्तमैथुन करने से खुशी मिलती है, मजा आता है, अच्‍छी नींद आती है और तनाव कम होता है, पर मुझे यह लगता है कि हस्तमैथुन करने का कुछ भी फायदा नहीं होता है। अगर फायदा होता तो हमें कभी भी हस्तमैथुन करने के बाद खुद पर सबसे ज्यादा ग्लानी नहीं होती और हम खुद से घृणा नही करते। अगर आपको हस्तमैथुन करने के बाद कभी भी ग्लानी महसूस नहीं होती तब आप हस्तमैथुन कर सकते है लेकिन यदि आप ग्लानी महसूस करते है तो मैं आपसे यही कहूँगा कि आप आज से ही हस्तमैथुन को छोड़ दे। आप कुछ देर के मजे के लिए खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर नहीं कर सकते।
    • हस्तमैथुन पर हुए कई सर्वे में यह बात सामने आ चुकी है कि अक्सर किशोरावस्था या युवावस्‍था में हस्तमैथुन के शुरुआत की सबसे ज्‍यादा संभावना होती है और जब व्यक्ति को एक बार हस्तमैथुन कि लत लग जाती है तो वह हस्तमैथुन करने की बार - बार कोशिश करता है। हस्तमैथुन करने के बाद व्यक्ति खुद से घृणा तो करता ही है साथ ही साथ वो और भी कई समस्याओं से घिर जाता है। अगर आपको भी हस्तमैथुन की बहुत ज्यादा लत है तो आपको हस्तमैथुन से होने वाले इन नुकसान को ध्यान से अवश्य पढना चाहिए। ये वह कारण है जिनका सामना हस्तमैथुन करने वालो को अपनी लाइफ में करना पड़ता है और उनका खामियाजा उठाना पड़ता है।
    • कई बार व्यक्ति जल्दीबाजी के चक्कर में बहुत तेजी से हस्तमैथुन करने लगता है। जिस कारण वीर्य से पहले निकलने वाला तरल पानी उसके लिंग की मासपेशियों में चला जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति के लिंग में सूजन आने लगती है और तब तक रहती है जब तक वह वापस खून में न मिल जाये।
    • कई लोग हस्तमैथुन करते समय अपने लिंग को बहुत ही मजबूती से जकड़ लेते है और उसे दबाने या मोड़ने लगते है। ऐसा करने से आपको गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है। ऐसा करने से आपके लिंग की मांसपेशियां टूट सकती हैं और पायरोनी नाम की बीमारी भी हो सकती है। इस बीमारी से व्यक्ति का लिंग टेढ़ा हो जाता है।
    • किसी व्यक्ति द्वारा रोजाना हस्तमैथुन करने से उसके वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम हो जाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है जब व्यक्ति की शादी हो जाती है तब उसके बाद उसके वीर्य में शुक्राणुओं की कमी के कारण वह पिता बनने से भी वंचित रह सकता है।
    • अगर आप हस्तमैथुन करते है तो आपने जरुर यह ध्यान दिया होगा कि हस्तमैथुन के बाद आप बहुत ही बुरा महसूस करते होंगे। हस्तमैथुन आपको काफी मानसिक तनाव दे सकता है। यह तनाव ऐसा होता है जिसमे आप खुद को ही दोषी मानने लगते है। अगर आप तनाव में रहेंगे तो आप अवसाद का शिकार हो सकते है। हस्तमैथुन करने से कई बार घबराहट भी पैदा होती है।
    • व्यक्ति हस्‍तमैथुन करते समय हमेशा ही कल्पनाओ में खोया रहता है। इससे उस व्यक्ति कि सेक्स के प्रति चाह में निरंतर बढ़ोतरी होती रहती है। अपनी सेक्स कीभूख को शांत करने के लिए वह अवैध संपर्कों की ओर चले जाता है। इससे जाने अनजाने वह कई ऐसी भूल कर देता है जो उसे ज़िन्दगी भर पछतावा देते रहता है। कई बार तो व्यक्ति इससे यौन अपराधो में भी शामिल हो जाता है।
    • कई ऐसे लोग भी होते है जिनका अपने पार्टनर के साथ झगड़ा होता रहता है। जिस कारण वे हस्तमैथुन की ओर रूख कर लेते है। लगातार हस्तमैथुन करने से उनको हस्तमैथुन में ही सुख नजर आने लगता है। जब ऐसे लोग संभोग करते है तो उस दौरान उनका स्खलन बहुत ही तेजी से होने लग जाता है। परिणामस्वरूप इससे उनकी पत्नी उनसे नाराज रहने लग जाती है और रिश्ता ख़राब हो जाता है।
    • हस्‍तमैथुन करने से एक बड़ी समस्या यह होती है कि व्यक्ति के चयापचयपर इसका बुरा असर पड़ता है। हस्‍तमैथुन करते वक्त जो पहला गीला द्रव निकलता है उसमे प्रोटीन  होता है। जो सेल संरचनाओं के लिए आवश्यक होता हैं। आप यह जरुर जानते होंगे की प्रोटीन हमारे शरीर के लिए कितना अहम है। इसका लगातार स्खलन आपको दुबला बना देता है।
    • अधिक मात्रा में हस्तमैथुन करने से अक्सर लिंग के ऊतक में चोट पहुंच जाती है और ये ऊतक नष्ट होने लगते है। इससे लिंग में उत्तेजना बंद हो जाती है। कई बार इससे व्यक्ति को उत्तेजना आना हमेशा के लिए बंद हो जाती है।
    • इस रोग के अंदर पढ़ने में मन न लगना, खाने-पीने का मन न करना, कोई भी कार्य करने का दिल न करना तथा सदा ऐसा मन करना कि किसी भी काम को करने पर असफलता ही हाथ लगेगी, इस तरह के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
    IS MASTURBATION GOOD OR BAD

    हस्तमैथुन से संबंधित भ्रम- अक्सर लोगो हस्तमैथुन को लेकर मन में काफ़ी आशंका लेकर बैठे रहते है कि
    • हस्तमैथुन करने से क्या पुरुष संभोग करने के काबिल नहीं रहता है ?
    • अधिक हस्तमैथुन करने से क्या पुरुष का वीर्य ज्यादा पतला हो जाता है ?
    • क्या काफी समय से हस्तमैथुन का आदि पुरुष अपनी स्त्री को आनंद नहीं दे पाता है ?
    • हस्तमैथुन करने से क्या पुरुष मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोरी महसूस करने लगता है ?
    कई मनोचिकित्सकों का मानना है कि अगर ज्यादा समय तक हस्तमैथुन न किया जाए तो वह हानिकारक नहीं होता है। अधिक मात्रा में हस्तमैथुन करने से शरीर के अंदर कई प्रकार के रोग पैदा हो जाते हैं जैसे- चेहरे की चमक समाप्त हो जाना, आंखों के नीचे काले गड्डे पड़ जाना, शरीर के विकास का रुक जाना, कमर के अंदर हमेशा दर्द बने रहना, शरीर की कमजोरी, कुछ भी खाने-पीने का मन न करना तथा किसी भी कार्य को करने में जी न लगना आदि लक्षण महसूस होने लगते हैं। कभी-कभी तो हस्तमैथुन करने के कारण बेचैनी, गुस्सा, मानसिक उत्तेजना तथा मन में हीन भावना बढ़ने लगती है।
    • बेकार का भ्रम - कई लोगों के मन में यह भ्रम पैदा हो जाता है कि अधिक मात्रा में हस्तमैथुन करने से लिंग का आकार टेढा हो जाता है। लेकिन सेक्स के ज्ञाताओं का कहना है कि हस्तमैथुन करने से लिंग के आकार में किसी भी तरह का कोई बदलाव नहीं आता है क्योंकि लिंग ऊतकों से बना हुआ होता है। लिंग के अंदर किसी प्रकार की कोई हड्डी नहीं होती है। इसकी बनावट स्पंज के जैसी ही होती है। इसलिए लिंग सामान्य अवस्था में लटका हुआ तथा मुलायम होता है। लिंग के अंदर जब तनाव पैदा होता है तो वह बहुत अधिक सख्त हो जाता है और इसकी वजह से वह एक तरफ झुक जाता है। लिंग की इस अवस्था को देखकर अधिकतर लोग अपने मन में लिंग के टेढ़ा होने का भ्रम पैदा कर लेते हैं। लिंग के अंदर तनाव पैदा हो जाने के समय में लिंग की नसों में खून भर जाने से लिंग का एक तरफ झुक जाना यह एक आम बात है। तनाव की अवस्था में भी किसी पुरुष का लिंग ठीक स्थिति में खड़ा नहीं हो सकता है।
    • वीर्य को रोकना नामुमकिन - कई पुरुष हस्तमैथुन करते समय अंतिम समय पर पहुचने पर अपने लिंग को हाथ से दबाकर लिंग के आगे के मुख को बंद कर लेते हैं ताकि उनका वीर्य बाहर न निकल पाए। इस तरह से करने से वे लोग ये सोचते हैं कि वे हस्तमैथुन करने से आनंद भी उठा लें और उनके शरीर के अंदर वीर्य भी नष्ट न हो लेकिन इस तरह से करना किसी भी तरह से ठीक नहीं है, क्योंकि इससे शरीर को नुकसान होता है। हस्तमैथुन करने के बाद वीर्य का बाहर निकलना एक स्वाभाविक क्रिया है क्योंकि जब वीर्य अपनी जगह से निकलेगा तो वह पुनः अपनी जगह पर नहीं आएगा। अगर हस्तमैथुन करने के बाद वीर्य को बाहर निकलने से रोका जाए तो वीर्य मूत्र थैली के अंदर चला जाता है और बाद में मूत्र के साथ बाहर निकल जाता है। इसलिए लिंग पर किसी भी तरह का कोई दबाव देकर वीर्य का रोकना सही नहीं है। अधिक दबाव डालने के कारण लिंग को नुकसान पहुंच सकता है और वीर्य के कारण कई बार मूत्र नली भी बंद हो जाती है।
    • गलत तरीकों से बचें - अक्सर पुरुष अधिक उत्तेजना में भर जाने से लिंग को पलंग पर तथा तकिये पर रगड़ने लगते हैं। कई बार तो पुरुष किसी वस्तु को लेकर छेद बना लेते हैं या किसी खाली बोतल के अंदर लिंग को डालकर जोर-जोर से घर्षण करने लगते हैं। कुछ पुरुष तो जमीन के अंदर मिट्टी में गड्डा बनाकर घर्षण करने लगते हैं। इस तरह की क्रिया को कदापि नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से लिंग को हानि हो सकती है। कई बार सख्त चीज की रगड़ लगने से लिंग पर चोट भी लग जाती है या फिर सूजन भी आ जाती है या लिंग के आगे के भाग की त्वचा पीछे की तरफ खिंचकर फट भी सकती है। इसलिए हस्तमैथुन करने के ऐसे गलत तरीकों से बचना चाहिए। हस्तमैथुन करने की आदत अधिकतर कुंवारे युवकों में ही देखी जाती है। उन युवकों को हस्तमैथुन करने की जरुरत नहीं होती है जो शादी हो जाने के बाद अपनी स्त्री के साथ संभोग क्रिया करते हैं। लेकिन कई बार कुछ युवक या पुरुष अपनी पत्नी के मायके चले जाने के बाद अपने आप हस्तमैथुन कर के अपनी कामेच्छा को पूर्ण रूप दे देते हैं। तथा कई बार पुरुष अपनी पत्नी के साथ संभोग करने से पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हो पाते हैं इसलिए वह हस्तमैथुन करके अपने आपको संतुष्ट कर लेते हैं।
    • संगति का असर - किसी भी व्यक्ति पर अच्छी बातों का असर बहुत ही देरी से होता है लेकिन बुरी आदतों का असर शीघ्र ही हो जाता है। किशोरावस्था के अंदर युवक का मन और भावनाएं बहुत ही नाजुक होती है। स्कूल जाते समय तथा सड़को पर चलने-फिरने वाली सुंदर और दिल को भाने वाली लड़कियों को देखकर उनके अंदर सेक्स करने की शक्ति जागने लगती है तथा उनके शरीर के अंदर धीरे-धीरे उत्तेजना आने लगती है। स्कूल-कालेजों के अंदर अपने से ज्यादा अनुभवी युवाओं की संगति में रहकर वह ज्यादा उत्तेजित पुस्तके, सेक्स और उस के बारे में बाते करना लगते हैं। इसके बाद सेक्स से जुड़ी हुई गलत आदतों का शिकार होकर हस्तमैथुन करने लग जाते हैं। बार-बार हस्तमैथुन करने से उसे कुछ देर के लिए आनंद मिल जाता है। हस्तमैथुन करने से एक स्वस्थ पुरुष भी अपने-आपको रोगी महसूस करने लगता है। जो पुरुष बुरे दोस्तों के साथ रहने के कारण हस्तमैथुन के रोगी बन जाते हैं उन्हें उन दोस्तों का साथ खुद ही छोड़ देना चाहिए।
    • पारिवारिक माहौल का असर - अगर घर का माहौल सही होता है तो बच्चे के अंदर भी अच्छी आदतें पैदा होती है। इसके अलावा अगर घर के सदस्य गंदी बातें करेंगे तो बच्चे भी गंदी आदतों का शिकार हो जाएंगे। जब कोई लड़का किशोरवस्था में पहुंचता है तो उस के मन में सेक्स के बारे में जानने की इच्छा जागृत होती है। वह अपने भाई-भाभी के सेक्स करने के तथा मां-बाप के चुम्बन करने पर बहुत ही बारिकी से ध्यान रखता है, अगर घर के लोग एंकात और शर्म के बारे में सोचे तो जवान होते बालक पर इस बात का कोई असर नहीं होता, इस तरह से उसके अंदर सेक्स करने की भावना जागृत नहीं होती। लेकिन घर के अंदर इस तरह के कार्य को करते हुए देखकर उसके मन में इस तरह की इच्छा पैदा हो जाती है और वह इस तनाव से मुक्ति पाने के लिए अपने हाथ को लिंग पर रख देता है। लिंग पर हाथ रखने के बाद उसको सहलाने से उसको बहुत अधिक मजा आने लगता है, जिसके वाद वह वीर्य को बाहर निकाल देता है। घर के अंदर इस तरह के वातावरण से जवान होते लड़कों पर बहुत ही गलत असर पड़ता है। कई बार तो लड़के रात के समय छुप-छुपकर अपने भाई-भाभी तथा मां-बाप को सेक्स क्रिया करते हुए देख लेते हैं। इस तरह से देखने के बाद उन के मन में भी इस तरह के कार्य करने का मन करता है, लेकिन कोई साधन न होने की वजह से वे हस्तमैथुन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस तरह से एक बार आनंद आने के बाद वे बार-बार हस्तमैथुन करके अपने आपको तसल्ली दे देते हैं
    • लिंग की खुजली - लिंग की सफाई न करने की वजह से इसके आगे वाले भाग के नीचे काफी मात्रा में गंदा मैल जमा हो जाता है जिसकी वजह से उस स्थान पर बहुत खुजली होने लगती है। लिंग पर खुजली होने की वजह से लिंग के अंदर तनाव पैदा हो जाता है, जिसके कारण लिंग को सहलाने और खुजलाने की वजह से एक अजीब सा आनंद महसूस होता है। लिंग पर बार-बार हाथ लगने की वजह से लिंग सख्त हो जाता है और इसके अंदर तनाव आ जाता है। तब युवक थोड़े समय के आनंद के लिए अपने वीर्य को हस्तमैथुन करके बाहर निकाल देता है। थोड़े समय के आनंद के लिए वह बार-बार इस क्रिया को करता रहता है। इस तरह से करते रहने से उसकी यह आदत हस्तमैथुन का रूप धारण कर लेती है। इसलिए मां-बाप को बचपन से ही चाहिए कि बच्चे के लिंग के आगे के भाग की त्वचा को अच्छी तरह से खोलकर उसकी सफाई करने की आदत बच्चों में डाल दें। अगर इस तरह का कार्य बचपन से ही मां कर दें तो बच्चे को किसी भी तरह का कोई भी डर नहीं रहता है।
    • किसी अन्य तरह की हलचल होने के कारण - कई बार लिंग में किसी अन्य रोग के हो जाने की वजह से एक हलचल सी होने लगती है, जिसके कारण किशोर अपने लिंग को हाथ के द्वारा रगड़ने लग जाता है। इस तरह की क्रिया करने से लिंग के अंदर सख्तपन और अधिक तनाव आ जाता है। इस प्रकार करते रहने से हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है।
    • गंदी किताबें और फिल्मों के देखने की वजह से - किशोरावस्था के अंदर गंदी किताबों और अश्लील पिक्चरों को देखने से भी युवक को हस्तमैथुन की आदत पड़ जाती है। इस तरह की किताबों और फिल्मों को देखकर जब युवक के शरीर के अंदर सेक्स करने की इच्छा जगने लगती है तो उसे समान रूप से संभोग के द्वारा इसको समाप्त कर देना इतना आसान नहीं होता है। इसके विपरीत शरीर के अंदर तेज होती वासना को समाप्त करने के लिए हस्तमैथुन का सहारा लिया जाता है। इस प्रकार यह कार्य करने से यह एक आदत सी बन जाती है और युवक इस कार्य को बार-बार करने के लिए मजबूर हो जाता है।  
    • मूत्र को रोकने के कारण  - कई बार पुरुष जब मूत्र (पेशाब) को रोकता है तो वह हाथ को दबाकर तेजी से लिंग पर रख देता है, जिसके दबाव देने के कारण शरीर के अंदर एक अजीब सी उत्तेजना पैदा होती है। जिसका सीधा सम्पर्क मस्तिष्क से होता है। कई बार युवक का हाथ अनजाने में ही लिंग पर चला जाता है जिसके उसके अंदर उत्तेजना जागृत हो जाती है, उसे यह बहुत ही अच्छा लगता है। इस तरह से करने के बाद वह अपने लिंग को हाथ में लेकर आराम-आराम से सहलाने लगता है और वीर्य के निकलने तक वह इस क्रिया को करने के लिए अति उत्सुक रहता है।
     हस्तमैथुन की लत छोड़ने के आसान तरीके 
    How to Stop a Masturbation Addiction in Hindi

    हस्तमैथुन से पीछा छुड़ाने के लिए कुछ सरल उपचारः- हस्तमैथुन से पीछा छुडा़ने के लिए और इसका इलाज करने के लिए 2 तरीके हैं-
    1. पुरुष के अपने प्रयत्न के द्वारा भी इसका इलाज किया जा सकता है।
    2. इसका इलाज दवाईयों के द्वारा भी किया जा सकता है।
    व्यक्ति के अपने प्रयत्न के द्वारा हस्तमैथुन का इलाज:-
    • व्यक्ति को अपने रोजाना की दिनचर्या इस तरह से बनानी होगी कि उसे किसी भी वक्त खाली बैठे रहने का समय ही न मिले। उसे हमेशा अपने आपको अपने मित्रों के तथा अपने परिवार के साथ हंसते-खेलते हुए और काम-काज में लगाए रखना चाहिए। हमेशा ज्ञान की किताबें तथा धार्मिक ग्रंथों को पढ़ते रहने से मन गंदे विषयों की तरफ नहीं भटकेगा और मन के अंदर भी शांति भी बनी रहेगी।
    • व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर ताजी हवा में घूमना चाहिए। अगर घर के अंदर घास उगा हुआ खुला बाग हो या घर के आस-पास कोई पार्क हो तो वहां पर जाकर सुबह के समय में नंगे पांव ही घूमने की कोशिश करें। इस तरह से करने से आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और मन के अंदर भी शांति बनी रहेगी तथा शरीर में ताकत भी आ जाएगी।
    • व्यक्ति को कभी भी तेज मिर्च-मसालों वाला भोजन नहीं करना चाहिए, नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा तली हुई चीजें कम ही खायें या हो सके तो कम ही कर दें।
    • व्यक्ति को सदा सादा भोजन ग्रहण करना चाहिए, अगर हो सके तो हफ्तें के अंदर एक दिन का भोजन न करें। भोजन करने के साथ-साथ कुछ दिनों के लिए फल का इस्तेमाल करें और हो सके तो फलों के रस का सेवन करें।
    • व्यक्ति को बुरे मित्रों का साथ तुरंत ही छोड़ देना चाहिए। कभी भी अश्लील किताबें न पढ़े और गंदी तथा काम उत्तेजना को बढाना देने वाली फिल्मों को कदापि न देखें। अपने आप को अच्छे कार्य में लगाए रखें। इससे आपका मन नहीं भटकेगा।
    • मल त्याग करने के बाद, शौच आदि से निपटने के बाद अण्डकोष, लिंग तथा हाथ-पांव को अच्छी तरह से ठंडे पानी से धोकर साफ करना चाहिए।
    • पेट के अंदर कभी भी कब्ज न बनने दें, पेट को हमेशा साफ रखें। पेट के साफ न रहने से कई प्रकार की बीमारी हो जाती है। अगर पेट में किसी प्रकार की कोई शिकायत हो तो शीघ्र ही किसी अच्छे डाक्टर से मिलकर इस समस्या का समाधान करें।
    घरेलू औषधियों के द्वारा हस्तमैथुन का इलाजः-
    • 500 ग्राम प्याज के रस को 250 ग्राम शुद्ध शहद में मिला लें। इसके बाद इसे धीमी आग पर गर्म करने के लिए रख दें। इसे तब तक पकाते रहे जब तक प्याज का रस जल जाए और केवल शहद बच जाए। शुद्ध शहद के बच जाने पर इसके अंदर 250 ग्राम मूसली का चूर्ण मिलाकर इसको अच्छी तरह से घोंटकर एक साफ की हुई कांच की शीशी में भर लें। इसके बाद इस चूर्ण को सुबह और शाम के समय में हस्तमैथुन के रोगी को खिलाने से हस्तमैथुन जैसे सभी रोग समाप्त हो जाएगें और उसके अंदर एक नयी प्रकार की स्फूर्ति और शरीर के अंदर सेक्स करने की ताकत में बढोतरी होगी।
    • बेल और पान की जड़ का चूर्ण बनाकर उसमें शहद को मिला लें। फिर इसकी बेर की गुठली के बराबर की गोलियां बनाकर रख लें। इस गोली को 2-2 की मात्रा में गाय के दूध के साथ सुबह और शाम के समय में रोजाना सेवन करने से हस्तमैथुन की वजह से पैदा हुए शीघ्रपतन का रोग समाप्त हो जाता है और संभोग करने की ताकत बहुत अधिक बढ़ जाती है। अगर इस गोली को सेक्स क्रिया शुरू करने से 1 से 2 घंटे पहले दूध के साथ सेवन लिया जाए तो इससे संभोग करने की ताकत दुगनी हो जाती है।
    • कनेर की जड़ का रस 20 ग्राम, गाय का शुद्ध घी 20 ग्राम और शराब 20 ग्राम को एकसाथ मिलाकर एक कांच की साफ शीशी में भरकर रख दें। इस मिश्रण को लिंग के मुंड को बचाकर बाकी के बचे हुए भाग पर लेप कर दें। इसके बाद ऊपर से पान का पत्ता लेकर लिंग पर लपेटने से हस्तमैथुन से होने वाले लिंग की सारी खराबियां दूर हो जाती हैं। इस लेप को करने से लिंग का टेढ़ापन, मोटाई तथा पतलापन, लिंग की नसों के ऊपर उभर आया नीला निशान तथा लिंग से शीघ्र वीर्य का निकल जाना जैसी सभी प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं।
    • 250 ग्राम गाय के ताजे शुद्ध घी के अंदर 18 ग्राम सफेद संखिया को मिलाकर एक हफ्तें तक रोजाना कूट-पीस लें। इसके बाद इस तेल को धूप के अंदर सुखाकर एक साफ कांच की शीशी में भरकर रख दें। रात को सोते समय रोजाना इस तेल की मालिश लिंग के आगे के भाग को छोड़कर करें। इसके बाद बंगला पान को साफ करके लिंग के ऊपर बांध दें। इस तरह से कुछ दिनों तक करने के बाद पुरुष के लिंग के सभी प्रकार के रोग समाप्त हो जाते हैं।
    क्या स्त्रियां भी हस्तमैथुन करती है ?
    • कई पुरुषों का यह सोचना है कि क्या स्त्रियां भी हस्तमैथुन करने में रुचि लेती है, तो इसका जवाब यह है कि आज के युग में स्त्रियां भी हस्तमैथुन करती है। यह बात बिल्कुल ठीक है। जब बालिका की उम्र 12 से 13 साल के आस-पास हो जाती है तो उनके शरीर के अंगों का तेजी से विकास होने लगता है उस समय वह अपनी योनि के अग्र भाग को मसलकर इस तरह के कार्य को करने लग जाती है।
    • स्त्रियों के शरीर के अंदर उनको उत्तेजित करने वाला सबसे नाजुक भाग योनि का ही होता है। जिस तरह से लड़को को हस्तमैथुन करने से सुख की प्राप्ति होती है उसी प्रकार लड़कियों को भी अपनी योनि के अग्र भाग को रगड़ने से सेक्स क्रिया करने का आनंद प्राप्त होता है।
    • अधिकतर वे स्त्रियां जो किसी वजह से पुरुष के साथ सेक्स क्रिया नहीं कर पाती है वे इस तरह का कार्य करके अपनी सेक्स वासना को संतुष्ट कर लेती है। अधिकतर यह देखा गया है कि कभी-कभी लड़किया कोई एकांत सी जगह देखकर मोमबत्ती, खीरा, गाजर व बैंगन जैसी अन्य चीजों को लेकर अपनी कामवासना को मिटा लेती है।
    किन-किन अवस्था में हस्तमैथुन किया जाता हैः-
    • जिन युवकों की शादी उम्र बीत जाने के बाद भी काफी समय के बाद भी नहीं होती है।
    • जिन पुरुषों को बाहर नौकरी करने के लिए एक लम्बे समय तक अपनी पत्नी से दूर रहना पड़ता है।
    • वे पुरुष जिनकी पत्नी मर जाती है और उनकी दूसरी शादी काफी लंबे समय तक नहीं हो पाती है।
    • वे पुरुष जिनकी पत्नियां गर्भवती होती है या उनकी पत्नियां काफी लम्बे समय से बीमारी से ग्रस्त होती है।
    • वृद्धावस्था के अंदर जब प्रोस्टेट ग्रन्थियां बढ़ जाती है तो आप्रेशन आदि के द्वारा भी इसका इलाज न हो पाने की वजह से भी हस्तमैथुन करना पड़ जाता है।

    हस्तमैथुन की लत से होने वाले 10 बड़े नुकसान 10 Large Losses from Masturbation In Hindi
    शरीर का कमजोर हो जाना (Sharir Ka Kamjor Ho Jana
    • इस दुनिया में सभी लोग इसलिए मेहनत करने में लगे हुए है ताकि एक बेहतर जीवन मिल सकेए अच्छा खाना खा सके, अच्छी लाइफ बिता सके किन्‍तु अत्‍यधिक हस्तमैथुन करने से आप खुद की लाइफ को जटिलता की ओर जाते है।
    • हस्तमैथुन (masturbation) करने से कभी भी आपकी सेहत अच्छी नहीं बन सकती। यह शरीर में कमजोरी लाता है। आपने जरुर नोट किया होगा जब आप हस्तमैथुन कर लेते हो उसके बाद आपके अंदर की शक्ति कम हो जाती है। आपको ऐसा लगता होगा जैसे सारी ताकत खत्म हो गई हो और उसे पाने के लिए आप फिर से अपने लिए कुछ खाने के लिए ढूंढने लग जाते हो।
    • एक सीमा तक हस्‍तमैथुन आवाश्‍यक है किन्‍तु इसकी अत्‍यधिक के आप अपना अच्छा स्वास्थ्य भी खो दोगे और आपके अंदर कमजोरी पैदा होने लगेगी। जिसका नुकसान होगा की आपकी सेहत तो जाएगी ही साथ में आपके रिश्तो पर भी असर होगा। 
    खुद के प्रति ग्लानी होना (Khud Ke Prti Glani Hona) 
    • हम जब भी हस्तमैथुन करते है तो हस्तमैथुन (Masturbation) करने के बाद हम खुद से घृणा करने लग जाते है। हमें खुद के प्रति मन में ग्लानी होती है। जो की हस्तमैथुन से होने वाला सबसे बड़ा नुकसान है। हम कोई भी काम इसलिए करते है ताकि हमें उस काम को करने के बाद ख़ुशी मिले।
    • हस्तमैथुन करने के बाद ठीक इसका उल्टा होता है तो फिर हस्तमैथुन करने का फायदा क्या। अगर यह हमें ख़ुशी न दे तो इससे दूर रहना ही सही है। अगर हम अंदर से खुश रहेंगे और हमारे अंदर हमारे लिए अत्‍म सम्‍मान की रक्षा होगी इससे हम कोई भी परेशानी या काम को बहुत ही आसानी से कर सकते है।
    • हमारे अंदर की शक्ति ही हमें मजबूत बनाती है। जिस इंसान के अंदर जितनी अच्छी आदते होंगी वह इन्सान उतना ही मजबूत होगा। जिसके अंदर बुरी आदते होंगी वह उतना ही कमजोर होगा। इसलिए हस्तमैथुन करने से अगर आपको ग्लानी होती है तो इसे छोड़ दे। अगर आप खुद के नजरो में ही गिर जाओगे तो पूरी दुनिया से आप नजर कभी नहीं मिला सकते। 
    लिंग में सूजन का हो जाना (Ling Me Sujan Ka Ho Jana) 
    • कई लोग ऐसे होते है जो जल्दीबाजी के चक्कर में बहुत तेजी से हस्तमैथुन (Masturbation)करने लगते है। जिस कारण उनका वीर्य (viry) से पहले निकलने वाला तरल पानी उनके लिंग (ling) की मासपेशियों में चला जाता है। इसका रिजल्ट यह होता है कि व्यक्ति के लिंग में सूजन आने लगती है और तब तक रहती है जब तक वह वापस खून (blood) में न मिल जाये। ऐसा बार – बार होने पर यह गंभीर बन जाता है और यह सूजन आसानी से जाती नहीं है। इसलिए इससे दूर रहने के लिए हस्तमैथुन की लत से ही दूर रहे। अगर यह लत ही नहीं होगी तो ऐसी कोई भी प्रॉब्लम आपके पास भी नही रहेगी।
    लिंग की मांसपेशियों का टूट जाना (Penis Ki Manspeshiyon Ka Tut Jana)
    • कई लोग हस्तमैथुन (masturbation) करते समय अपने लिंग  को बहुत ही मजबूती से जकड़ लेते है और उसे दबाने या मोड़ने लगते है वे सोचते है की ऐसा करने से वीर्य बाहर नहीं निकलेगा। यह करना सही नहीं है। ऐसा करने से आपको गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
    • ऐसा करने से आपके लिंग की मांसपेशियां टूट सकती हैं जो की बहुत ही नाजुक होती है। कई बार ऐसा करने से पायरोनी नाम की बीमारी भी हो जाती है। इस बीमारी का असर यह होता है की व्यक्ति का लिंग टेढ़ा हो जाता है। एक बार अगर यह बीमारी हो जाये तो समझ सकते है की आपको कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
    मानसिक तनाव का होना (Mansik Tanav Ka Hona)
    • आप मानो या न मानो पर हस्तमैथुन आपके अंदर टेंशन पैदा करता है। अगर आप हस्तमैथुन करते है तो आपने जरुर यह ध्यान दिया होगा कि हस्तमैथुन के बाद आप बहुत ही बुरा महसूस करते होंगे।
    • हस्तमैथुन आपको काफी मानसिक तनाव (mansik tanav) दे सकता है। यह तनाव ऐसा होता है जिसमे आप खुद को ही दोषी मानने लगते है। अपने बारे में आप बुरा सोचते है। लगातार अगर आप तनाव में रहेंगे तो आप अवसाद का शिकार हो सकते है।
    • हस्तमैथुन करने से कई बार घबराहट भी पैदा होती है। अगर आपका माइंड टेंशन में रहेगा तो आप कोई भी काम सही ढंग से नहीं कर पाओगे। इसलिए अगर टेंशन से दूर रहना है तो हस्तमैथुन को अलविदा कहे। 
    अवैध संबंधो का बन जाना (Awaidh Sambandho Ka Ban Jana)
    • हमारे समाज में जिस तरह से यौन अपराध बढ़ रहे है इसमें हस्तमैथुन का बहुत बड़ा रोल है। ऐसे अपराध करने वाले लोग हस्तमैथुन के आदी होते है और यौन इच्छाएं अधिक बढ़ने पर वे अपराध करने लग जाते है। व्यक्ति हस्‍तमैथुन करते समय हमेशा ही कल्पनाओ में खोया रहता है। इससे उस व्यक्ति की सेक्‍स के प्रति चाह में निरंतर बढ़ोतरी होती रहती है।
    • अपनी सेक्स की भूख को शांत करने के लिए वह अवैध संपर्कों की ओर चले जाता है। इससे जाने अनजाने वह कई ऐसी भूल कर देता है जो उसे ज़िन्दगी भर पछतावा देते रहता है। आपकी ज़िन्दगी को हस्तमैथुन की लत बर्बाद कर सकती है। एक बार अगर आपने कोई यौन अपराध कर लिया तो समझ ले आपकी यह ज़िन्दगी तो बर्बाद हो ही गई। इससे बचने का आसान तरीका यही है की जो जड़ है उसे ही हटा दे यानी हस्तमैथुन को अपनी लाइफ से दूर कर दे।
    शुक्राणुओ की संख्‍या में कमी होना (Sperm Ki Sankhya Me Kami Hona)
    • हमारे वीर्य में लाखो की संख्या में शुक्राणु होते है जो हमारे पिता बनने में सहायक होते है। परन्तु जो लोग रोजाना हस्तमैथुन करते है उनके वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम हो जाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है जब व्यक्ति की शादी हो जाती है तब उसके बाद उसके वीर्य में शुक्राणुओं (Sperm) की कमी के कारण वह पिता बनने से भी वंचित रह सकता है। अगर आपके अंदर शुक्राणु कम हो गये तो आप तनाव में आ जायेंगे और यह तनाव आपकी सेहत खराब कर देगा। इसलिए अपने शादी के बाद अच्छे जीवन के लिए अभी से सोचे और इस लत से दूर रहे।
    अपने पार्टनर से झगडा होना (Apne Partner Se Jhagda Ho Jana)
    • छोटी उम्र में बहुत अधिक हस्तमैथुन कर लेने से शादी के बाद इसका असर दिखने लग जाता है। जब ऐसे लोग संभोग करते है तो उस दौरान उनका स्खलन बहुत ही तेजी से होने लग जाता है। परिणामस्वरूप इससे उनकी पत्नी उनसे नाराज रहने लग जाती है और रिश्ता ख़राब हो जाता है।
    • ऐसे भी बहुत लोग है जिनका अपने पार्टनर के साथ झगड़ा होता रहता है। जिस कारण वे हस्तमैथुन की ओर रूख कर लेते है। लगातार हस्तमैथुन करने से उनको हस्तमैथुन में ही सुख नजर आने लगता है। जो की उनके बुरे समय की शुरुआत होती है। शादी  के बाद सिर्फ अपने मेरिड लाइफ पर फोकस करे न की हस्तमैथुन पर। 
    पाचन तंत्र पर बुरा असर होना (Digestive System Par Bura Asar Hona)
    • अच्छी सेहत के लिए हमारे पाचन तंत्र का ठीक होना बहुत जरुरी होता है। पाचन तंत्र हमारे शरीर की वह मशीन होती है जो भोजन में से निचोड़ निकालकर हमारे शरीर को देती है। जिससे हमारा शरीर बलवान और स्वस्थ रहता है। अगर पाचन तंत्र ख़राब हो जाए तो हमारी सेहत कमजोर होने लगती है।
    • हस्‍तमैथुन करने से हमारे चयापचय पर बुरा असर पड़ता है। हस्तमैथुन हमारे पाचन तंत्र को प्रभावित कर देता है। जिस कारण हमारा पाचन तंत्र बहुत ही मंद गति से अपना कार्य करता है और खाना सही ढंग से पचने में काफी समय लगता है।
    • हस्‍तमैथुन करते वक्त जो पहला गीला द्रव निकलता है उसमे प्रोटीन होता है। जो सेल संरचनाओं के लिए आवश्यक होता हैं। आप यह जरुर जानते होंगे की प्रोटीन हमारे शरीर के लिए कितना अहम है। इसका लगातार स्खलन आपको दुबला बना देता है। इसलिए अच्छे पाचन तंत्र बनाये रखने के लिए हस्तमैथुन से दूरी बनाये।
    लिंग में उत्तेजना का बंद हो जाना (Ling Me Uttejana Ka Band Ho Jana) 
    • पुरुष के लिए इससे शर्मसार बात क्या हो सकती है की उसके लिंग में उत्तेजना होना ही बंद हो जाए। यह आपको मेंटली डिप्रेस्ड कर सकती है। अधिक मात्रा में हस्तमैथुन करने से कई बार लिंग के ऊतक में चोट पहुंच जाती है और इससे ये ऊतक नष्ट होने लगते है। जिससे लिंग में उत्तेजना आना बंद हो जाती है। कई बार तो इससे व्यक्ति को उत्तेजना आना हमेशा के लिए बंद हो जाती है।
    • अगर आपकी उत्तेजना खत्म हो गई तो आपकी मैरिड लाइफ बर्बाद हो सकती है क्योंकि अगर आप अपनी पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पाए तो आप दोनों के रिश्ते पर इसका असर पड़ेगा जो आपके रिस्‍क को खत्म कर देगा। इसलिए अब यह आपको तय करना है की आपको कौन सा रास्ता चुनना है।
    सावधानी- इस तरह के कोई रोग हो तो उनको समाप्त करने के लिए सप्ताह के अंदर एक या दो बार सेक्स क्रिया जरुरी होता है। अगर सेक्स क्रिया करने का कोई साधन ना हो तो शरीर तथा मन के अंदर उठी हुई कामवासना को समाप्त करने के लिए सप्ताह में एक या दो बार हस्तमैथुन कर सकते हैं।


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