ईश्‍वर के अस्तित्‍व पर प्रश्‍न चिन्‍ह



एक जगह है चर्चा चल रही थी कि क्या आप ईश्वर को मानते हैं? ,वह चर्चा चर्चा न हो गई हो गई संसद हो गई। कह रहे थे कि ईश्‍वर का अस्तित्‍व नही है। क्‍या वे कहगे कि मै गंजा हूं? तो क्‍या मै मान लूगां और का ये कह देगे तो हम (सब) मान लेगे की ईश्‍वर का अस्तित्‍व नही है, जैसे संसद समझ कर कोई कानून बना दिया है कि ईश्‍वर नही है। ईश्‍वर का अस्तित्‍व न होता तो करोडो लोग धर्म के नाम पर फकीरीगीरी न कर रहे होते। कुछ का कहना है कि ईश्‍वर को कभी देखा नही इस लिये ईश्‍वर नही है, क्‍या किसी और के बताने से पहले आपको अपने अस्तित्‍वि पता था कि ‘मै कौन हूं मेरे माता-पिता कौन है’ नही न, किसी ने आपको बताया था कि आप कौन है। ऐसा नही था जन्‍म लेते ही मम्‍मी-पापा कहना चालू कर दिया था। ईश्‍वर का महत्‍व तथा अर्थ तो वह जानता है जो ईश्‍वर जानता हो, कभी क,ख,ग पढा नही चल दिये बिहारी के पद की व्‍याखा करने।
जितने लोग ईश्‍वर को न मानने का ढोग करते है, इनमे से एक भी बन्‍दा ऐसा नही होगा, जिसने कि कभी ईश्‍वर के सम्‍मुख सिर न झुकाया हो, कोई कितना भी नास्तिक हो वह कभी न कभी ईश्‍वर को जरूर मानता है। हाईटेक जमाना है जहां हंसो के बीच बहुला पहुच कर बांग मारता है तो हंसो को भी लगता है कि हम कही नये दौर मे पिछड न जाये ऐसे मे कुछ हंस भी है जो बकुला की तरह बाग मारते है कि ईश्‍वर नही है, यह तो वही कहावत हो गई कि ‘कौआ कान ले गया’ अपने कान को न देख कर कौवे के पीछे दौड जाना, ऐसे ही कुछ अनुयायी है जो केवल हां मे हां मिलाना उचित समझते है। क्‍या चार लोग मिल कर पंचरा कर ले की ईश्‍वर नही है तो क्‍या वास्‍तव मे ईश्‍वर का अस्तित्‍व नही है।
इस विषय पर मतदान भी हुआ, बात आती है कि कभी-2 वालो के मत को किसमे लिया जाये, क्‍या आप कभी-2 ईश्‍वर को मानने वाले को आप यह थोडे ही कह सकते है वह ईश्‍वर को नही मानता है वह जरुरत पडने पर ईश्‍वर को मानता है। एक दिन मे सौ बार जरूरत पडेगी सौ बार मानेगा तथा नही पडेगी तो नही मानेगा। अर्थात बह ईश्‍वर को अवश्‍य (जरूरत पर ही सही) मानेगा। चार को तो 50-50 कर लिये पाचवां होता तो क्‍या हलाल करके उसका वोट लेते। ये चारो झारखण्‍ड के विधायक थोडे है कि खरीद कर नास्तिक घोषित करवा कर अपनी सरकार बना लोगे लोकतंत्र नही भक्‍ततंत्र है। ये वो भक्‍त है जो सशर्त सर्मथन तो देते है किन्‍तु भगवान की सत्‍ता को मानने से इन्‍कार नही करते है। क्‍योकि भगवान जी से इन भक्‍तो की मांग काफी होती है किन्‍तु देने न देने की इच्‍छा भगवान पर होती है भगवान दे या न दे पर ये भगवान का साथ नही छोडते है क्‍योकि कल सर्मथन न देगे तो कल किस मुह से मागेगें।
भगवान का होना या न होना किसी मतदान से नही तय किया जा सकता है वहां तो कद्दापि नही जहां विचार रखने वालो कर संख्‍या सीमित हो, यह तो ऐसा होगा 50 किलो के पतीले ढाई चाउर (चावल) की खीर पकाना और फिर पूछना कि कितने खा लेगें। यह कहावत तो सही है कि यह चावल के 4 दानों को देख कर पकने का पता चल जाता है किन्‍तु विषय बहुत बडा है यह 6 अरब लोगों के बीच की बात है मात्र दो दर्जन के विचारो को हम 6 अरब व्‍यक्तियो के विचार नही मान सकते है। यहां पतीली भी काफी बडी है ऊपर के जिन चावलो को टो रहे है वे आंच न लगने के कारण पके नही है वे नास्तिक है और वे ईश्‍वर को नही मानते है, और जो टोने के लिये नीचे पहुच के बाहर थे वे जल गये वे ईश्‍वर के ज्ञान को प्राप्‍त कर लिया, अर्थात ईश्‍वर को देख लिया। वैसे ईश्‍वर को मानने न मानने का जो पूर्वानुमान जो निकाला जा रहा है वह चुनाव की एक्जिट पोल की तरह फ्लाप जायेगा। हर वर्ष प्रयाग मे करोडो श्रद्धालु माघ मेले मे आते है, अयोध्‍या आते है, काशी आते है पता नही कौन-2 से मतावलम्‍बी विश्‍व के कोने कोने मे जाते है। वे सब मूरख है और ये चर्चालु बुद्धिमान। 
ईश्‍वर को यह बताने की आवश्‍यता नही है मै हूं वो भी हम जैसे तुच्‍छ प्राणियो के लिये, जो हर क्षण जिन्‍दगी और मौत से जूझता रहता है। इस विशाल ब्रम्‍हाड मे उपलब्‍ध भगवान की का सृष्टि का अध्‍ययन लाखो करोडो वैज्ञानिक सैकडो वर्षो से करते चले आये है और करते रहेगें। जब ये करोडो विद्वान इस परमात्‍मा की इस रचना का आर छोर नही पा सके तो तो चार लोग क्‍या ईश्‍वर को मिटा सकेगें।


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56 comments:

मनुज said...

प्रमेन्द्र जी,
लीजीये कमेन्ट कर दिया, आपका खाता खोल दिया.
मैं नास्तिक हु, और मैं इसे साबित कर सकता हू की ईश्वर नहीं है. आप साबित कर दिजीये कि इश्वर है ??

Mishra, RC: रा च मिश्र said...

जो भी है, चलो आप लोग साबित करो हम फिर आते हैं देखने, किसने क्या साबित किया।

Mithilesh dubey said...

सही कहा भाई आपने कि ईश्वर को यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि वह है या नहीं ।

Suman said...

मनुज ji nay shahi likha hai.nice

PD said...

दोस्त मेरा तो कहना है कि अगर भगवान है तो वही एक ऐसा पात्र होगा जिससे मुझे सबसे अधिक नफरत होगी.. तो मुझे मेरे भगवान के बिना ही जीने दो यारों.. किसी से नफरत करने से तो अच्छा है कि उसके अस्तित्व को ही नकार दो..

मैं गर किसी को ये नहीं कहता कि भगवान को ना मानो तो लोग अक्सर मुझे क्यों कहते हैं कि भगवान को मानो(यह बात मैं आपको नहीं, अपने आस-पास के लोगों पर कह रहा हूँ, आपका क्या है आपने तो बस एक पोस्ट ही लिखी है :))? रही बात भगवान के सामने सर झुकाने कि तो जब से होश संभाला है तब से मैंने नहीं झुकाया है कभी.. माँ-पापा के कहने पर कभी भी सर झुकाया या हाथ जोड़े तो उसे मैं माँ-पापा के ही हिस्से में देता हूँ, क्योंकि यह उनके ही सम्मान में किया गया कर्म था..

प्रकाश गोविन्द said...

ईश्वर यानी
बकलोल की झोली
गरीब की बोली
जाहिल का अस्त्र
ढोगियों का वस्त्र

प्रकाश गोविन्द said...

महाशक्ति जी
एक ठो अहमक हम भी हैं
प्लीज नाम दर्ज किया जाए
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बस एक ठो सवाल उठता है अज्ञानी मन में
आपको किसने बताया कि ईश्वर है ?
माँ-बाप ने ही न ?
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उनको किसने बताया
उनको उनके भी माँ-बाप ने
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उनके माँ-बाप को किसने बताया
उनके भी माँ-बाप ने
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पीढियां दर पीढियां
बस बोझ लादे घूम रहे हैं
बगैर देखे कि पीठ पे आखिर है क्या
बस यही हवाला देते हुए कि
हमारे बुजुर्ग क्या बेवकूफ थे
देखने से डर भी लगता है कि
कहीं सच में न साबित हो जाए को हमारे बुजुर्ग नादान थे
और आज तक हम भगवान् के नाम पर कितनी-कितनी बेवकूफाना हरकत करते आये हैं

महफूज़ अली said...

सही कहा भाई आपने कि ईश्वर को यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि वह है या नहीं ।

परमजीत बाली said...

बहुत बढ़िया पोस्ट लिखी है।बधाई स्वीकारें।

दिगम्बर नासवा said...

अंत में ईश्वर ये एहसास करवा देगा की मैं हूँ या नही .... आप सब देखते रहिए ....

प्रकाश गोविन्द said...

दिगम्बर नासवा जी ईश्वर जब एहसास करवाएगा तब की तब देखी जायेगी ! अभी तो उसके एजेंट ही सारी मुसीबत और चिंता का सबब बने हुए हैं ! कोई एजेंट ए के-47 लिए ईश्वर के बताये रास्ते पे निकल पड़ा है .... कोई रात-रात भर माईक पर चौपाईयां गाकर पूरा मोहल्ला शुद्ध कर रहा है .... कोई ईश्वर के नाम पर जुलूस लेकर पूरी सड़क घेरे हुए हुए है .... सारे कुकर्म ईश्वर के नाम पे ही देखते आया हूँ ! जिन जगहों पर जाकर बुरी तरह दम घुटता है वहां आप जैसे लोग कैसे नतमस्तक हो जाते हो ..... हमारे लिए तो यही हैरानी की बात है !

सवाल एक यह भी है कि ईश्वर के बिना हम क्यूँ नहीं रह सकते ! बस आप कल्पना कीजिये कि लोग ईश्वर को नहीं मानते ! क्या फर्क पड़ेगा जीवन चर्या पर ? क्या-क्या परिवर्तन आयेंगे ?

महाशक्ति said...

आप सभी का हार्दिक अभार,ईश्वर की शक्ति हम सभी को क्रिया‍न्‍वित कर रही है, कोई ईश्वर को मूर्त तो कोई अर्मूत रूप मे स्‍वीकार करता है और कोई नही भी किन्‍तु ईश्वर स्‍वयं कहते है कि मनो राम नही तो पत्‍थर।

प्रवीण शाह said...
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प्रकाश गोविन्द said...

महाशक्ति जी आपने कहा - "ईश्वर स्‍वयं कहते है कि मानो राम नही तो पत्‍थर।"
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आपसे स्वयं ईश्वर ने कहा ????
या किसी का पढ़ा या सुना बोल रहे हैं ??
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अगर आप अपने अनुभव से बोल रहे हैं तो मेडिकल टर्म्स में इसे मनोरोगी कहते हैं :)

प्रवीण शाह said...

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जितने लोग ईश्‍वर को न मानने का ढोग करते है, इनमे से एक भी बन्‍दा ऐसा नही होगा, जिसने कि कभी ईश्‍वर के सम्‍मुख सिर न झुकाया हो, कोई कितना भी नास्तिक हो वह कभी न कभी ईश्‍वर को जरूर मानता है। हाईटेक जमाना है जहां हंसो के बीच बहुला पहुच कर बांग मारता है तो हंसो को भी लगता है कि हम कही नये दौर मे पिछड न जाये ऐसे मे कुछ हंस भी है जो बकुला की तरह बाग मारते है कि ईश्‍वर नही है, यह तो वही कहावत हो गई कि ‘कौआ कान ले गया’ अपने कान को न देख कर कौवे के पीछे दौड जाना, ऐसे ही कुछ अनुयायी है जो केवल हां मे हां मिलाना उचित समझते है।

प्रिय प्रमेन्द्र,
यद्मपि आस्था के विषय पर कुछ कहना मैं उचित नहीं समझता परन्तु यह सत्य है कि हम में से बहुत से ईश्वर के सामने सर सिर्फ इसलिये झुका देते हैं क्योंकि अधिकांश लोग ऐसा ही करते नजर आते हैं उन्हें...और भेड़चाल सहज मानव स्वभाव है...ईश्वर जैसी कोई चीज है या नहीं इस पर बहस युगों तक चलती रहे तो भी बेनतीजा रहेगी... क्योंकि आप जैसे लोग जो उसे मानते हैं उसके अस्तित्व को झुठलाते किसी तथ्य या तर्क को समझना तो दूर सुनना तक पसंद नहीं करते...पर इतना निश्चित है कि जैसे जैसे मानव बुद्धि और ज्ञान का विकास होगा...धर्म और ईश्वर की जकड़ भी ढीली होती रहेगी, मानव जाति के ऊपर से...आखिर एक समय वह भी तो था जब मानव हर उस चीज को पूजता था जो उसे समझ नहीं आती थी...

प्रकाश गोविन्द said...

प्रवीण शाह जी बोलते बहुत हैं ........
ये सिर्फ बोलते ही इसलिए हैं कि इनको तो बोलना है ! सर्वज्ञानी का भाव कभी तो छोडिये महाशय ! सौ बात की एक बात - अधार्मिक होना कहीं से भी दुसरे के लिए घातक अथवा परेशानी खड़ा करने वाला नहीं है ! लेकिन धार्मिक होना जरूर दुसरे के लिए अवश्य मुसीबत भरा है ! आप अपने विचारों को दूसरों पर मत लादिये !
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एक बेहद महत्त्वपूर्ण बात
यह तो बहुतेरा हो सकता है कि कोई नास्तिक हो लेकिन आदमी बढ़िया हो !
लेकिन आज तक मैंने नहीं देखा कि आदमी धूर्त, मक्कार, पाखंडी, जालिम हो और आस्तिक न हो !
डाकू भी जब डाका डालने निकलता है तो पूजा करके निकलता है ! जितने नेता हैं सब बहुत धार्मिक होते हैं ! जिनके पास भी हराम की कमाई होती है वो आपको बेहद धार्मिक ही मिलेंगे !

महाशक्ति said...

धर्मिक होना अगल बात है और ढोगी होना अलग, यह हो सकता है कि हर ढोगी धर्मिक हो किन्‍तु यह जरूरी नही है कि हर धार्मिक ढोगी ही हो। ईश्वर की सर्वसत्ता से ही हम क्रियान्वित होते है। अगर आपका कहना है कि बहुत से कुकृत्‍य ईश्वर के नाम पर हो रहे है यह हम सच मान लेते है किन्‍तु आज बहुत से ऐसे कुकृत्य ईश्वर के डर के कारण रूके भी हुये है। आज ईश्वर का डर न होता तो पता नही क्‍या स्थिति होती ?

महाशक्ति said...

अगर आप अपने अनुभव से बोल रहे हैं तो मेडिकल टर्म्स में इसे मनोरोगी कहते हैं :)

प्रकाश भाई, तब तो दुनिया के सबसे बड़े गदहे ऊ डक्टरवा लोग है जौन लोग हास्पिटलवा मे भगवान के मंदिर बनवै राहत है।

प्रकाश गोविन्द said...

आप स्वयं सोचिये कि आप क्या कह रहे हैं ?
इस हिसाब से तो मुझे लादेन का बाप होना चाहिए !
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जब इंसान के पास गुनाह के बोझ को कम करने का कोई मार्ग नहीं होता तो सिर्फ उसकी अंतरात्मा ही उसके साथ होती है !
आप जैसों के साथ तो दुनिया भर के रास्ते होते हैं ! गंगा में एक डुबकी मारी और सारे पाप धुल गए ! पांच टाईम नमाज पढ़ी और और कोई पाप बोध नहीं ! और अगर खुदा न खास्ता मर भी गए तो खुदा तो ढोलक लेकर स्वागत के लिए खड़ा ही है !
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भाई बहस ख़त्म करो
कभी आईये मिलकर बातें होंगी विस्तार से !
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अभी आपकी प्रतिक्रिया पढ़ी .....
आपने बेहद नादानी वाली बात कही महाशक्ति जी !
डाक्टर होते क्या हैं ?
क्या मंगल गृह से आते हैं या धरती फाड़ के प्रकट होते हैं ?
इसी समाज से आते हैं !
कोई कुछ भी बन जाए ...........संस्कार कहाँ जायेंगे ?
महत्वपूर्ण है स्वयं की तर्क शक्ति
महत्वपूर्ण है कर्म
वो भगवान् भरोसे मरीज को छोड़ नहीं देता
डाक्टर आखिरी दम तक लड़ता है !
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उत्तेजित न होईये
स्वयं को शांत रखिये
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ईश्वर है न मुझे दंड देने के लिए
व्यर्थ ब्लड प्रेशर न बढाईये खुद का :)

प्रवीण शाह said...

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@ आदरणीय प्रकाश गोविन्द जी,
आपने शायद मेरी टिप्पणी पढ़े बिना पूर्वाग्रहित होकर टिपिया दिया है, मेरी टिप्पणी को फिर पढ़ें भाई... मैं तो आपके साथ खड़ा हूँ इस विषय पर ।

Kajal Kumar said...

हे प्रभु अब क्या लिखूं (!) अगर तुमने कहीं इस ब्लाग पर मेरी टिप्पणी पढ़ ली तो (?)...

अल्पना वर्मा said...

रोचक बहस..!
टिप्पणियां पढ़कर लगता है मैं भी नास्तिक हो जाऊँगी जो मैं नहीं होना चाहती.
मेरी आस्था है ,विश्वास है ..उस दैवीय शक्ति में और हमेशा रहेगी.

मनुज said...

@प्रमेन्द्र जी, आप व्यर्थ ही स्वघोषित "थिंक-टेंक" बने जा रहे हैं. अरे भाई कुतर्को के सहारे से कुछ साबित नहीं कर पाएंगे..
चलिए इतने बड़े इश्वर भक्त हैं तो ज़रा अमर शहीद भगत सिंह द्वारा आस्तिको से पूछे गए कुछ प्रश्नों का जवाब दे दीजिये .....
(वे नास्तिक थे)
बस कुछ का ही...
अगर नहीं, तो फिर नास्तिक हो जाईये .....

http://www.boloji.com/spirituality/051.htm

मनुज said...

@अल्पना वर्मा...
वैसे ये बात कि "मेरी आस्था है ,विश्वास है ..उस दैवीय शक्ति में और हमेशा रहेगी" ज़रा ठीक नहीं है. होना ये चाहिए कि अगर आपको विश्वास है कि इश्वर है तो आप के पास समुचित तर्क होने चाहिए...कम से कम प्रमेन्द्र भाई कि तरह कुछ कुतर्क तो होने ही चाहिए....

मनुज said...

All religions, with their gods, demigods, prophets, messiahs and saints, are the product of the fancy and credulity of men who have not yet reached the full development and complete possession of their intellectual powers.

मनुज said...

@प्रमेन्द्र जी,आपके प्रश्नों का सिलसिलेवार ढंग से उत्तर देना चाहूँगा-
१) ईश्‍वर का अस्तित्‍व न होता तो करोडो लोग धर्म के नाम पर फकीरीगीरी न कर रहे होते
महाजीनीयस जी, अगर सिर्फ संख्या ज्यादा हो जाने से किसी बात की सत्यता का पता लग जाता तो मानव ने कोई तरक्की कभी न की होती. दुनिया का हर बड़ा अविष्कार व्यक्तिगत सोच और उसके तार्किक अन्वेषण का नतीजा है. गेलिलीओ ने जब बताया की पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, तो पूरे रोम का ये विचार था की सूर्य धरती की परिक्रमा करता है...लेकिन आज हम सब सच्चाई को जानते भी है और मानते भी हैं...और ऐसा मानते हैं की ये एक "यूनिवर्सल ट्रुथ" माना जाता है.
रही बात फकीरी की तो मुझे नहीं लगता की ये बात किसी से छुपी है की इनमे से ज़्यादातर लोग जीवन के संघर्षो से खुद का दामन छुडाये हुए ढोंगी होते है..अगर ये शुतुरमुर्गी रवैया ही फकीरी है तो लानत है ऐसी फकीरी पे और उनके इश्वर पे....

मनुज said...

२) कुछ का कहना है कि ईश्‍वर को कभी देखा नही इस लिये ईश्‍वर नही है, क्‍या किसी और के बताने से पहले आपको अपने अस्तित्‍वि पता था कि ‘मै कौन हूं मेरे माता-पिता कौन है’ नही न, किसी ने आपको बताया था कि आप कौन है। ऐसा नही था जन्‍म लेते ही मम्‍मी-पापा कहना चालू कर दिया था। ईश्‍वर का महत्‍व तथा अर्थ तो वह जानता है जो ईश्‍वर जानता हो, कभी क,ख,ग पढा नही चल दिये बिहारी के पद की व्‍याखा करने।
चलिए माना महाथिंक टेंक जी, हमने कभी इश्वर का क ख ग नहीं पढ़ा, आपने तो पी एच डी कर ली न ??
क्या आपका इश्वर इतना दुर्बल है कि अपने अस्तित्व का सन्देश दूसरो के द्वारा भिजवाता है कि " मैं हूँ"
अगर वो इतना भी नहीं कर सकता की अपने अस्तित्व का प्रमाण स्वयं दे, तो मित्र ये बात इश्वर की परिभाषा के खिलाफ जाती है , क्यूँ हैं ना?

मनुज said...

३)जितने लोग ईश्‍वर को न मानने का ढोग करते है, इनमे से एक भी बन्‍दा ऐसा नही होगा, जिसने कि कभी ईश्‍वर के सम्‍मुख सिर न झुकाया हो, कोई कितना भी नास्तिक हो वह कभी न कभी ईश्‍वर को जरूर मानता है।
हे परम्शाक्तिवान महोदय, वैसे तो तो ये बात आपने "जनरली" लिखी है पर इसे मैं अपना उदाहरण देकर बताता हूँ . मैं नास्तिक हूँ, पर मैं कलाप्रेमी भी हूँ ;अभी कुछ हफ्ते पहले मैं अपने मित्र के साथ १२ वी शताब्दी के बने हुए शिव मंदिर "जागेश्वर मंदिर समूह" देखने गया..मेरी यात्रा पूर्ण रूप से अधार्मिक थी यानी मैं सिर्फ उन मंदिरों में सुन्दरता और कला देखने गया था...वहां पर कुछ धार्मिक यात्रा पर आये हुए लोग भी थे...कुछ समय बाद वे तीर्थयात्रा पर आये लोग हमें अजीब निगाहों से घूरने लगे क्यूंकि हम उनसब से अलग नज़र आ रहे थे...ऐसे में हमने भी उन्ही कि तरह अपनी मुख-मुद्रा कर ली और ऊपर से धार्मिक दिखने की कोशिश करने लगे...ताकि कोई मुसीबत ना खडी हो..

और रही बात कभी-न-कभी इश्वर को मानना तो ये तो लगभग ऐसी बात हुई कि जैसे किसी मित्र के घर आने पर अपने मुहं से निकलता है कि "आ गए तुम "..जिस प्रकार से ये वाक्य अर्थहीन है और सिर्फ आश्चर्योद्गार को प्रकट करता है उसी प्रकार कभी - कभी इश्वर का नाम निकल जाना उसके विश्वास को प्रकट न करके बल्कि उसके मनौद्गर को प्रकट करता है...

मनुज said...

क्रमश.......

महाशक्ति said...

मित्र मनुज, ईश्‍वर को मानना या न मानना अपने अपने पहलू हो सकते है। शहीद भगत सिंह के अपने विचार और दर्शन हो सकते है, भगत सिंह की स्‍वीकारिता उनके दर्शन से न हो कर उनकी राष्‍ट्रभक्ति और भारत माता के प्रति प्रेम के कारण थी। शहीद भगत सिंह भारत को माता मानते है और उनका जयकार करते है।

इसी प्रकार विवेकानंद मूर्तिपूजा को महत्व नहीं देते थे, ‍लेकिन वे इसका विरोध भी नहीं करते थे। उनके अनुसार 'ईश्वर' निराकर है। ईश्वर सभी तत्वों में निहित एकत्व है। जगत ईश्वर की ही सृष्टि है।

बेचैन आत्मा said...

यह कहना कि ईश्वर नहीं है कहीं न कहीं ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करना है. जरूरी नहीं है कि ढोंगी के साथ ईश्वर को भी न माना जाय. ईश्वर को मैंने देखा है ..रोज देखता हूँ ..मेरे ब्लॉग पर उसका ही चित्र है ...अब आप न मानों तो न मानों, मनवाना मेरी आवश्यश्यकता में नहीं आता.

प्रकाश गोविन्द said...

@ बेचैन आत्मा जी
सारी समस्या ही यही है की आस्तिक अपनी बात मनवाना चाहता है ! नास्तिक कभी नहीं कहता कि मेरी बात मानो ! आप कहीं भी देख लीजिये ..... ब्लॉग जगत ही देख लीजिये .... आस्तिकता के पक्ष में रोज ही आपको तीन-चार पोस्ट मिल जायेंगी ! नास्तिकता के पक्ष में एक भी पोस्ट नहीं मिलेगी !

नास्तिकता कोई बडबोलापन नहीं है ......... नास्तिकता द्योतक है सिर्फ तर्क शक्ति का ! जो भी तर्कसांगत विवेचना करेगा वो ईश्वर .... भूत-प्रेत....तंत्र-मंत्र.... ज्योतिष..रत्न - ताबीज ....टैरो कार्ड...फंग-सुई जैसी चीजों को नहीं मानेगा !

आस्था और वास्तविकता दो अलग-अलग चीजें हैं ! ईश्वर का क्या है ? आपको किसी भी चीज में वो दिख सकता है ...गाय-बैल, पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, या कोई स्त्री-पुरुष भी ! जैसा कि आप जानते होंगे - कई जीवित लोगों के भी मंदिर विद्यमान हैं !

महाशक्ति said...

@ बेचैन आत्मा जी, आप बिल्‍कुल सही कह रहे है, ईश्‍वर द्वंद करने की अपेक्षा उसकी शरण मे चले जाना बेहतर होगा।

आज अगर इस संसार मे थोड़ी भी नैतिकता बची है तो सिर्फ आस्तिको के कारण जो पाप और पुण्‍य के चक्‍कर मे पड़े रह कर पाप से बचे हुये है अन्‍यथा नास्तिको ने तो कब का संसार चौपट कर दिया होता। आज सभी लोग कहते है कि पर्यावरण प्रदूषण हो रहा है और रहे पेड़ कटाना ठीक नही, पेड़ मे भी भगवान होते है यही कारण था कि संसार से सामाजस्‍य था और पाप और अनाचार मे कमी थी किन्‍तु न‍ास्तिको के कारण पाप और पुण्‍य समाप्‍त हो गया और जिसका परिणाम हमे दिख ही रहा है।

@ प्रकाश गोविन्द जी, नास्तिको की एक बहुत बुरी आदत है कि जहाँ भगवान की बात होती है वही उनके पेट मे दर्द होने शुरू होने लगता है अगर नास्तिको को लगता है कि ईश्‍वर नही है तो क्‍योकि उसके न होने को साबित करने पर तुले पड़ते है। भगवान है इसलिये पोस्‍टे आती है नास्तिकता नाम की कोई भी चीज नही है इसलिये कोई भी नास्तिकता पर पोस्‍ट नही आती है।

जय हिन्‍द

प्रकाश गोविन्द said...

धार्मिक होने की पहली शर्त है जाहिलाना तर्क !
आपको क्या लगता है सिर्फ आप ही धार्मिक हैं ?

ये जो बेक़सूर लोगों पर गोलियां चलाते हैं ....... कत्लेआम करते हैं वे लोग आपसे भी बड़े धार्मिक हैं ! इनकी सारी हैवानियत ईश्वर के नाम पर ही होती है ! आपने कबूतर की तरह आँखें बंद कर रखी हैं तो कोई क्या करे ? ऐसी बचकानी बात तो आज पहली बार ही सुनी कि पर्यावरण फैलाने के लिए नास्तिक लोग जिम्मेदार हैं ! हंसी आती है आप पर !

नास्तिक लोगों के पेट में दर्द इसलिए होता है क्योंकि आस्तिकों ने आम जीवन में शान्ति से रहना मुश्किल कर रखा है ! नास्तिक किसी के लिए परेशानी का सबब नहीं हैं !

मुझे लगता है आपको अभी काफी पढने की जरूरत है ! आप कहते हैं - "संसार से सामाजस्‍य था और पाप और अनाचार मे कमी थी" ! आप महोदय मुझे बताएँगे कि आप किस युग की बात कर रहे हैं ! किस युग में पाप नहीं था ! कोई भी धार्मिक ग्रन्थ उठा के देखिये हमारे देवता वध करते ही मिलेंगे ! किसका वध करते थे वो ????
एक भी पापी का नाम बता दीजिये जो धार्मिक न रहा हो ! रावण भी बहुत बड़ा धार्मिक ही था !

बेचैन आत्मा said...

मैंने लिखा..
यह कहना कि ईश्वर नहीं है कहीं न कहीं ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करना है.
प्रकाश गोविन्द जी ( गोविन्द भी ईश्वर का नाम है)
आपने लिखा..
ईश्वर का क्या है ? आपको किसी भी चीज में वो दिख सकता है ...गाय-बैल, पेड़-पौधे, नदी-पर्वत, या कोई स्त्री-पुरुष भी !
...फिर विवाद कहाँ शेष रह गया!

महाशक्ति said...

प्रकाश जी का कहना बिल्‍कुल सही है कि हम जाहिल है और जाहिलाना तर्क रख रहे है, ये तो अस्तिको की मजबूरी है कि वे ईश्‍वर और उन सब के सामने ही सिर झुकते जो सम्‍माननीय होते है और नास्तिको को अपने ज्ञान का अभिमान जो हमेशा अपने को ही सर्वोच्‍च शिद्ध करता है।

मै ही सिर्फ धर्मिक नही हूँ ये कहना आपका ही है बल्कि आपकी बातो से लग रहा है कि नास्तिको का सर्वाधिकार सिर्फ आपके पास ही है, मेरे राम तो आपके अंदर भी है ।

प्रकाश गोविन्द said...

भाई आप लोग विषय से भाग रहे हैं ! आप उत्तेजना में यह भी भूल गए कि हम जैसों को भी आपके ईश्वर ने ही बनाया है ! आप ही कहते हैं न कि उनकी मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता ! फिर उसकी मर्जी पे प्रश्न चिन्ह तो आप लगा रहे हैं !

यहाँ कोई दौड़ नहीं हो रही है कि हार-जीत तय हो ! मेरे पास कोई सर्वाधिकार नहीं है ! मेरे पास महज जिज्ञाषा और तर्क है ! अगर इन दो चीज का प्रयोग हम नहीं करते तो पढना-लिखना सब व्यर्थ है ! मै किसी दुसरे की खींची लकीर पर आँखें बंद करके नहीं चल सकता !

वाद-विवाद का अर्थ यह नहीं होता कि हम किसी को नीचा दिखाएँ ....और मन-मुटाव की स्थिति कायम हो ! वाद-विवाद का सार्थकता तभी है जब किसी निष्कर्ष तक पहुंचें अथवा कुछ नया मार्ग दर्शन हो ! आस्तिक होने या नास्तिक होने से कोई गोल्ड मेडल नहीं मिल जाता भाई ! जिसको जहाँ संतुष्टि मिले ....वही सही !

होली की शुभ कामनाओं सहित

PD said...

मैं फिर से वही बात दोहराऊंगा जो मैंने अपने पहले कमेंट में लिखा था.. "अगर ईश्वर है तो मेरी नजर में सबसे अधिक घृणा के वह योग्य है.. क्योंकि इस जगत के हर बुरे चीजों का निर्माण में भी उसी का हाथ है.. चोर को भी बनाओ, फिर कोतवाल को भी बनाओ, और फिर लो तमाशा देखो जी भर के.."

मनुज said...

@बेचैन आत्मा @"प्रकाश गोविन्द जी ( गोविन्द भी ईश्वर का नाम है)"
इसमें बेचारे प्रकाश गोविन्द जी का क्या कुसूर है कि उनमे धार्मिक माता-पिता ने उनका ये नाम रखा है ?

मनुज said...

@प्रमेन्द्र भाई, आपने लिखा "मै ही सिर्फ धर्मिक नही हूँ ये कहना आपका ही है बल्कि आपकी बातो से लग रहा है कि नास्तिको का सर्वाधिकार सिर्फ आपके पास ही है, मेरे राम तो आपके अंदर भी है ।"
अगर इतने सात्विक आप होते तो आपको ये लेख नहीं लिखना पड़ता...न ही आप नास्तिको के लिए इनता विष-वमन करते... क्यूंकि अगर इश्वर है तो इश्वर की ज्ञात परिभाषा से इश्वर को बुरा नहीं लगना चाहिए कि कोई मेरी सत्ता को नज़रंदाज़ कर रहा है .....और जब इश्वर को बुरा नहीं लग रहा तो आपके पेट में क्यूँ मरोड़े उठ रही हैं...?

मनुज said...
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मनुज said...

ओशो ने कहा था "It was good of Friedrich Nietzsche to declare God dead – I declare that he has never been born. It is a created fiction, an invention, not a discovery. Do you understand the difference between invention and discovery? A discovery is about truth, an invention is manufactured by you. It is man-manufactured fiction. Certainly it has given consolation, but consolation is not the right thing! Consolation is opium. It keeps you unaware of the reality, and life is flowing past you so quickly – seventy years will be gone soon. Anybody who gives you a belief system is your enemy, because the belief system becomes the barrier for your eyes, you cannot see the truth. The very desire to find the truth disappears. But in the beginning it is bitter if all your belief systems are taken away from you. The fear and anxiety which you have been suppressing for millennia, which is there, very alive, will surface immediately. No God can destroy it, only the search for truth and the experience of truth – not a belief – is capable of healing all your wounds, of making you a whole being. And the whole person is the holy person to me. "

अल्पना वर्मा said...

इतनी लम्बी बहस!
क्यूँ??
मेरे ख्याल से इस बहस से कम से कम २० पोस्ट आराम से बन जायेंगी..या किसी ने अब तक बना भी ली होंगी..
सभी के तर्क वितर्क पढ़ पढ़ कर यकीं नहीं होता कि दोनों पक्ष इतने मज़बूत हैं यहाँ,
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सब से मज़ेदार बात प्रशांत की लगी..उसे पढ़ कर बहुत हंसी आई...मासूम सी बात..
भगवान ने हो दोनों विरोधी पक्ष बना दिए और अब तमाशा देख रहा है!
सच!...करारी सी बात कह कर चल दिए पी डी!
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बेचैन आत्मा said...

मनुज भई,

ओशो मनुष्यों के बनाए भगवान पर, अन्धविश्वास पर, ढोगियों पर कुठाराघात करते थे मगर ऐसा नहीं है कि वे नास्तिक थे. ओशो से बड़ा आस्तिक तो दूसरा देखे नहीं मिलता. उन्हें सत्य का ज्ञान था और वे कहते थे कि प्रकृति ही भगवान है..मैं भी भगवान हूँ ..यदि आप ओशो को मानते हैं तो खुद को नास्तिक कैसे कह सकते हैं? कोई भी ओशो को मानने वाला खुद को नास्तिक नहीं कहता.

मनुज said...

@बेचैन आत्मा जी
मुझे "ईश्वर", इस शब्द से कोई आपत्ति नहीं है. आप इसे किसी भी कांटेक्स्ट (context) में, किसी भी सात्विक अर्थ में प्रगोग करते हैं तो ऐसी कोई परेशानी किसी नास्तिक को नहीं होगी; न ही ओशो ने "ईश्वर" या "परमात्मा" इन "शब्दों" के प्रति कोई "निगेशन" (negation) या निषेध प्रकट किया है....... या ये कह लीजीये कि मेरी आपत्ति ईश्वर को उस रूप में परिभाषित करने से है, जो व्यक्ति को रूढ़ियों की और ले जाता है, जो इंसान से उसकी मूल प्रवृत्ति से दूर करता है; यानि कि स्व-विवेक प्रयोग करने से रोकता है....जब आप किसी दे प्रेम करते हैं, कोई आपसे प्रेम करता है तो आपको सारी कायनात एक संघर्ष न दिखकर, एक सहयोगात्मक तंत्र दिखाई देती है....तो आपके जेहन में जो अहसास होता है, वह एक दैवीयता से भरा एक परामानुशिक अहसास होता है...और शायद इसी अहसास को आप ईश्वर कहते हैं....

प्रकाश गोविन्द said...

जो मै कहना चाहता था वो मनुज जी ने बहुत ही सुन्दरता से लिख दिया है - "मेरी आपत्ति ईश्वर को उस रूप में परिभाषित करने से है, जो व्यक्ति को रूढ़ियों की और ले जाता है, जो इंसान से उसकी मूल प्रवृत्ति से दूर करता है; यानि कि स्व-विवेक प्रयोग करने से रोकता है"

आशा है आस्तिक लोग ध्यान मुद्रा से बाहर अब चैतन्यवस्था में आयेंगे !

मनुज said...

@प्रकाश गोविन्द जी,
हाँ जी, आशा तो की ही जा सकती है ...

बेचैन आत्मा said...

.जब आप किसी दे प्रेम करते हैं, कोई आपसे प्रेम करता है तो आपको सारी कायनात एक संघर्ष न दिखकर, एक सहयोगात्मक तंत्र दिखाई देती है....तो आपके जेहन में जो अहसास होता है, वह एक दैवीयता से भरा एक परामानुशिक अहसास होता है...और शायद इसी अहसास को आप ईश्वर कहते हैं..
जी हाँ, बिलकुल ठीक कहा आपने और इस एहसास की अनुभूति के लिए आपको आस्तिक होना पड़ेगा जो कि आप हैं.

shivendra sinha said...

बेचैन जी आप अपने खेमे में सबको शामिल करने के लिए इतने उतावले क्यूँ हो रहे हैं ?
दरअसल सारी परेशानी इसी बात की है.
धार्मिक-अधार्मिक, आस्तिक-नास्तिक, पूजा-पाठ, यह सब व्यक्तिगत बातें हैं. दुविधा तब खड़ी होती है जब यह चीजें सार्वजनिक रूप ले लेती हैं !

बेचैन आत्मा said...

शिवेंद्र जी,

आपका हो सकता है लेकिन मेरा कोई खेमा नहीं है मेरी पहली टिप्पणी भी यही है कि

यह कहना कि ईश्वर नहीं है कहीं न कहीं ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करना है. जरूरी नहीं है कि ढोंगी के साथ ईश्वर को भी न माना जाय. ईश्वर को मैंने देखा है ..रोज देखता हूँ ..मेरे ब्लॉग पर उसका ही चित्र है ...अब आप न मानों तो न मानों, मनवाना मेरी आवश्यश्यकता में नहीं आता.

{TRSM} Is New World & New Imagination said...

राम राम भाई जी ...
मेरी ब्लोग्वानी से जुड़ने का कारण आप हो
कुछ दिन में ही आप के लेखो से मैं इतना परभावित हूआ की मुझे आप से वार्तालाब करनी चाहिए क्यों की आप के जो विचार है ऐसे ही कुछ विचार मेरे है तो मुझे लगा की मुझे आप से विचारों का आदान पर्दान करना चाहिए ... मुझे आप के उतर का इंतजार रहेगा...
{TRSM}Is New World & New Imagination

Anonymous said...

Pahali baat to ye ki jab tak hame koi ye nahi batata ki ishwar ka astitva hai ham nastik hi hote hai.fir hota hai hame jhooth ka pahada padhana or ham sirf or sirf dar kar hi ishwar ke astitva sawikaar karte hai.

Waise mai bhi ek kattar nastik hun or mai ishwar ke astitva ko chunoti deta hu aap meri chunoti ko sawikaar kare, mere pass ek nahi kafi reason hai Jo ye sabit karte hai ki koi ishwar nahi hai.

Mere jaisi soch rakhne wale kripya mujhe whatsp kare

999. 11 58 257

dinesh aggarwal said...

ईश्वर संसार सबसे बड़ा झूठ।

dinesh aggarwal said...

ईश्वर का जन्म मनुष्य डर तथा अग्यान के स्वार्थ रूपी अनैतिक संसर्ग से हुआ।

dinesh aggarwal said...

ईश्वर का होने का एक भी प्रमाणित नहीं, जबकि न होने के अनेक।

dinesh aggarwal said...

ईश्वर का होने का एक भी प्रमाणित नहीं, जबकि न होने के अनेक।