होली की ठिठोली के साथ समीर लाल जी को चिठ्ठा जन्‍म दिन की बधाई



बधाई देने हम भी आ गये,
जन्‍म दिन की मिठाई खाने आ गये,
बासी है मिठाई फफूदी पड़ी है,
खा के मिठाई मुझे उल्‍टी करनी पड़ी है।
 
चिठ्ठा के चककर मे चाय भी न पूछा,
मेरी इस बधाई कविता के कारण
समीर लाल जी ने उड़न तश्‍तरी पर बैठने को न पूछा
उड़न तश्‍तरी पर बैठाने का गम नही,
कीडे पड़ी मिठाई देख कर
बर्थ डे पार्टी मे न बुलाऐ जाने का गम नही।

मिठाई न खाने से हम मस्‍त है,
जिसने भी खाया वह दस्‍त से पस्‍त है।
ब्‍लाग सलाग लिखते नही
क्‍योकि वे पाकिस्‍तान मे ब्‍यस्‍त है।
होली की शुभ कामनाऐ


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2 comments:

Udan Tashtari said...

अब इतनी देर से मिठाई खाने आओगे तो क्या हलवाई की दुकान में आये हो कि हर समय ताजी इमरती उतरती रहे. अरे भई, उसी दिन की रखी है.

खैर, अब तो होली है: बुरा न मानो वाली!!! :)


होली की बहुत शुभकामनायें और मुबारकबाद!!

गिरिराज जोशी "कविराज" said...

:)