चिट्ठाकारी में महाशक्ति के एक साल



 
समीर लाल जी के निर्देशानुसार केक तो नही मिठाई लगा दी गई है
आज (30 जून) मुझे ब्‍लागिंग की दुनियाँ में आये एक साल हो रहे है। आज के ही दिन मैने कई पोस्‍ट एक साथ पब्‍लिस की थी। जिसमें से आज केवल दो का ही अस्तित्‍व है। कुछ पोस्‍ट विकीपीडिया से काँपी करके किया था, कुछ आपत्तियों के बाद मैने उसे हटा दिया था, पर खेद की उसके साथ मेरी कई अनमोल टिप्‍पणी का अस्तित्‍व समाप्‍त हो गया। अर्थात न पहली पोस्‍ट रही और न ही पहली टिप्‍प्‍णी। 
मै बलगिंग की दुनियॉं मे कैसे आया मुझे नही पता, और जब मैने ब्‍लागिंग शुरू की तो मुझे पता भी नही था जो मै कर रहा हूँ उसे ब्‍लागिंग के नाम से परिभाषित किया जाता है। शायद मै पहला शक्‍स रहा हूँगा कि जो बिना किसी उद्देश्‍य के इस क्षेत्र में आया था। मुझे कम्‍प्‍युटर पर हिन्‍दी पढ़ना काफी अच्छा लगता था। और मै विकी से कोई एक यूनीकोड शब्‍द काँपी करके उसे गूगल सर्च के खोजता था, और इस तरह मुझे काफी माल मसाला पढ़ने को मिल जाता था। चूकिं हिन्‍दी ब्‍लाग में ही सर्वाधिक यूनिकोड का प्रयोग होता था। और सबसे अधिक पढ़ने को मिलता था ब्‍लाग। फिर अचानक एक दिन अचानक ब्‍लाग के ऊपर Create Blog और | Sign In शब्‍द मिला और मैने रजिस्‍टर करके विकी से कुछ लेख डाल दिया। फिर अचानक एक दिन भूचाल आ गया और मेरे पास कई वरिष्‍ठों की ईमेल आई, जो काफी धमकी भरी थी। फिर देखा तो लेखों पर टिप्‍पणी भी आई थी। तब मुझे पता चला कि लेखों को पढ़ने के बाद यह औपचारिका भी निभानी होती है। खैर यह विवाद मेरे लिये काफी अच्‍छा और मनभावन था जिसे मैने पूर्ण रूप से इनज्‍वाय किया। मुझे इस विवाद का कई शोक नही है शायद यह विवाद न होता तो मै भी न होता। इसलिये जो होता है अच्‍छा ही होता है। मेरे ख्‍याल से प्रमेन्‍द्र जीतू विवाद मेरे बचकाने पन से ज्‍यादा कुछ नही था। 
फिर अचानक एक दिन जन-गण-मन को लेकर अमित जी से काफी लम्‍बी चर्चा हुई। और परिचर्चा पर मुझे बुलाया। और परिचर्चा तो मेरे लिये एक प्रकार से संजीवनी थी एक अच्‍छा मंच था। यह दूसरी बात है कि व्‍यकितगत व्‍यवहारों के कारण काफी दिनों तक सक्रिय न रह सका और वहॉं का महौल मेरे कारण खराब न हो इस लिये लगा कि पलायन की सर्वश्रेष्‍ठ विकल्‍प है। अखिर एक दिन विवादों के कारण अनूप जी से सम्‍पर्क हुआ और उन्‍होने मुझसे मेरा फोन नम्‍बर मॉंग कहा कि मै तुमसे बात करना चाहता हूँ। फिर मैने गूगल के जरिये खोजा कि अखिर ये महाशय कौन है? पता चला कि हिन्‍दनी पर लिखते है। काफी लम्‍बी और विस्‍तृत बात हुई।
फिर धीरे धीरे समीर लाल जी, सागर भाई, प्रतीक जी, संजय और पंकज भाई, शैलेश जी, गिरिराज जी डा0 प्रभात जी और कई बन्‍धुओं से सम्‍पर्क हुआ। नाम की लिस्‍ट बहुत बड़ी है लिखते लिखते कई पेज भर सकते है। मुझे विवाद कभी प्रिय नही रहा किन्‍तु मुझे लगा कि कई बार मुझे खुद ही विवादों के लिये उकसाया भी गया, मैने भी सहर्ष स्वीकार किया। क्‍योकि विवादों मे सच्‍चाई थी और सच्चाई के लिये मेरा सर्वत्र न्‍योछावर है। शायद ही कोई ऐसा बन्‍धु बचा हो कि जिससे मेरा विवाद न हुआ हो। मुझे लगता था कि मेरी प्रकृति ही लडाकू टाईप की होती जा रही है। फिर विचार किया कि दुनिया को बदलना कठिन है, अपने आप को बदलना काफी सरल है और मैने खुद ही आपने आप को विवादों से दूर किया। काफी दिनों तक कौन क्‍या कर है मैने सरोकार रखना छोड़ दिया। फिर अचानक एक दिन एक भ्रष्‍ट ब्‍लाग का प्रवेश हुआ जिसका उद्देश्‍य केवल गन्‍दगी फैलना था उसे भी लेकर मैने दूरी बनाये रखी। किन्‍तु एक दिन अरूण भाई की पाती और ईमेल मिला और उन्‍होने मुझे पंगेबाज पर लिखने के लिये आमंत्रित किया। और यह मेरे लिये सौभाग्‍य था कि मै किसी अन्‍य के ब्‍लाग पर एडमाइन के हैसियत से था। मैने उनके ब्‍लाग पर आये दिन नित प्रयोग करता था और वे कुछ न कहते थे मेरे हर काम पर प्रसन्‍न रहते थे।
कुछ व्‍यकित ऐसे है जिनसे मेरा ज्‍यादा सम्‍पर्क नही हुआ जिसका मुझे काफी दुख भी है, ईस्‍वामी जी, रतलामी जी, आशीष श्रीवास्‍तव, अनुराग मिश्र, जगदीश भाटिया, नीरज दीवान, उन्‍मुक्‍त और अनुनाद जी (और भी कई नाम है) से दूरी मुझे जरूर खलती है। कारण चाहे जो भी हो पर जरूर मेरी ही कुछ कमी है। जिसका मुझे मलाल है।
मेरे ब्‍लागिंग के एक साल कैसे बीते मुझे नही पता, मैने बहुत कुछ पाया है ता बहुत कुछ खोया भी है। मै खोने की चर्चा नही करूँगा। मैने इन 365 दिनों में काफी कुछ सीखा, जो आपके समक्ष के रखा भी। कुछ ने पंसद भी किया और कुछ ने गालियॉं भी दी। अभद्रता मुझे कतई पंसद नही है इस लिये मैने गाली वाली टिप्‍पणी को मिटाने में कतई संकोच नही किया। 
इन 365 दिनों मे मैने कई ब्‍लागों पर लिखा, महाशक्ति, अदिति, कविता संग्रह, हिन्‍द युग्‍म, टाईम लास, भारत जागरण, पंगेबाज सहित कई अन्‍य जगहों पर लिखना हुआ और लिख रहा हूँ। 
मैने अब तक महाशक्ति पर 99 लेख लिखें और कुल 451 टिप्‍पणी प्राप्‍त की, अदिति पर 32 पोस्‍ट और 111 टिप्‍पणी प्राप्त हुई, Timeloss : समय नष्‍ट करने का एक भ्रष्‍‍ट पर 23 पोस्‍ट और 75 टिप्‍पणी, सहित अन्‍य ब्‍लागों पर कई लेख सहित काफी मात्रा पर टिप्‍प्‍णी मिली है।
मेरे ब्‍लागर के एकाउँट की प्रोफाइल अब तक लगभग 1832 लोगों ने देखा जो अब तक किसी का भी एक साल में सर्वाधिक होगा। 
मै यह लेख एक दिन पहले पोस्‍ट कर रहा हूँ क्‍योकि 30 जून की सुबह 5 बजे ही मै अपने गॉंव प्रतापगढ़ चला जाऊँगा। सोचा था कि अपने एक साल का पूरा लेखा-जोखा लिखूँगा किन्‍तु समय साथ नही दे रहा है। गॉंव से लौट कर जरूर लिखूँगा।


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मुस्लिम भाई मै आप से अभिभूत हूँ



एक मुस्लिम भाई मेरी कल की पोस्‍ट संघ की प्रार्थना का अर्थ जानने के उत्‍सुक थे। मै संघ की प्रार्थना का अर्थ नीचे उद्धत कर रहा हूँ।
नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
हे वत्‍सल मातृभूमि! मैं तुझे निरन्‍तर प्रमाण करता हूँ। हे हिन्‍दुभूमि! तूने ही मुझे सुख में बढ़ाया है। हे महामंगलमयी पुण्‍यभूमि! तेरे लिये ही मेरी यह काया अर्पित हो। मै तुझे बार बार प्रणाम करता हूँ।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।
हे सर्वशक्तिमान् परमेश्‍वर! ये हम हिन्‍दू राष्‍ट्र के अंगभू‍त घटक, तुझे आरदपूर्वक प्रणाम करते है। तेरे ही कार्यके लिये हमने कमर कसी हैउसकी पूर्ति के लिये हमें शुभ आशीर्वाद दें। विश्‍व के लिये ऐसी अजेय ऐसी शक्ति, सारा जगत् विनम्र हो ऐसा विशुद्धशील तथा बुद्धिपूर्वक स्‍वीकृत हमारे कण्‍टकमय मार्ग को सुगम करें, ऐसा ज्ञान भी हमें दें।
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
ऐहिक तथा पारलौकिक कल्‍याण तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिये वीरव्रत नामक जो एकमेव उग्र साधन हे उसका हम लोगों के अन्‍त:करण में स्‍फुरण हो। हमारे हृदय में अक्षय तथा तीव्र ध्‍येयनिष्‍ठा सदैव जागृत रहे। तेरे आशीर्वाद से हमारी विजयशालिनी संगठित कार्यशक्ति स्‍वधर्म का रक्षण कर अपने इस राष्‍ट्र को परम वैभव की स्थिति पर ले जाने में अतीव समर्थ हो।
।। भारत माता की जय ।।
।। भारत माता की जय ।।


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।। संघ प्रार्थना ।।



 Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) Bhagwa Dwaj

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।

समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।

।। भारत माता की जय ।।


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नारद जी - आप बधाई के पात्र है



सहीं कहूँ तों मुझे आपसे साहसिक निर्णय की उम्‍मीद नही थी, किन्‍तु पता था कि नारद की उक्‍त कार्यवाही कई लोगों को नागवार गुजरेगी, और उन्‍हे सबसे ज्‍यादा जिन्‍होने नारद की उदारता को अपनी ताकत समझ रखा था। मुझे भी चिठ्ठाकारिता में आये एक साल होने को है किन्‍तु मैने कभी भी किसी को अहात नही किया। किन्‍तु जिस प्रकार कुछ लोगों ने लाम बंद होकर अकारण ही अपने हिन्‍दू विरोधी रवैया अपना कर, शान्‍त जल में पत्‍थर मानने का काम किया है। शान्‍त जल मे पत्‍थन मारने से पानी ही नही उसमे रहने वाले जीव भी विचलित हो जाते है। हम तो जीवों की सबसे ऊँची योनी मे जन्‍म लिये मनुष्‍य है। इन लोगों के हिन्‍दू‍ विरोधी तालीबानी लेखों ने न केवल लोगों को आहत किया वरन एक विरोधी आवाज को उकसाया कि एक अलग आवाज ने जन्‍म लिया। जिस प्रकार एक एक करके इन्‍होने गुजरात, मोदी, को लेकर हिन्‍दी चिठ्ठाकारों के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी किया था वह बर्दाश्‍त के बाहर थी।
चूकिं हिन्‍दी चिठ्ठाकरिता का समय ज्‍यादा बड़ा नही है और मुझे भी इस माह एक साल हो जायेगा इस कारण किन्‍तु कुछ बन्‍धु मुझे भी काफी पुराना और अपने से वरिष्‍ठ मानते है पर मै नही कभी आपने से नये साथियों को अपने से नया या अपने को वरिष्‍ठ नही माना किन्‍तु पिछले साल से आज की तुलना मे मेरे अन्‍दर एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है। भले ही मेरी आदत विवादों को तूल देने अथवा बिवाद करने वालों से लोहा लेने वाली रही हो किन्तु मैने कभी किसी के दुखती रग को नही झेड़ा जिससे कि कोई आहत हुआ हो। किन्‍तु कुछ लोग ऐसे है जो लोग नाम को प्रसिद्ध करने के लिये काफी नीचे के स्‍तर तक गिर सकते है यह मैने पिछले कुछ माह देखा है, कि किस प्रकार अपनी गन्‍दी लेखनी से हिनदू धर्म के देवी देवताओं से लेकर संजय भाई, पंकज भाई और सागर भाई को भी नही छोड़ा, हद तो तब हुई मक्‍कार पत्रकारों ने पत्रकारिता के मापदण्‍ड को धता देते हुऐ एक माननीय न्‍यायधीश तक को नही बक्सा, जिसे भारत के लोकतंत्र के भगवान की संज्ञा दी गई है। 
मै नारद के द्वारा बाजार को नारद पर प्रतिबन्धित करने की कार्यवाही का पूर्ण रूप से सर्मथन करता हूँ, और पूरी नारद टीम मुझे इस फैसले मे आपने साथ समझे। नारद का यह फैसला समाज में द्वेष फैलाने वालों के मुँह पर तामाचा है। जहॉ तक बाजार को स्‍पष्टिकरण देने के लिये समय नही दिया गया तो मै इस बात से इत्‍फाक नही रखता हूँ, क्‍योकि क्‍या बाजार ने एक बार भी सोचा कि उनकी लेखनी से समाने वाले पर क्‍या बीतती है। बाजार ने जो किया था भूत मे, वह उनके लिये चेतावनी थी। मै सदैव व्‍यक्तिगत अक्षेपों के खिलाफ रहा हूँ। मै इतने दिनों से हूँ कई से मेरे सम्‍बन्‍ध अच्‍छे नही है किन्‍तु कभी कोई कह दे कि महाशक्ति या प्रमेन्‍द्र न मुझे भला बुरा कहा हो।
जिन बेगानी बन्‍धुओं को लेकर यह मामला गर्म हुआ मै भी नही जानता था कि वे भाई है। इन दोनो से भी मेरा विवाद हुआ किन्‍तु पंकज भाई भी मेरे ब्‍लाग पर आते है और कहते है कि और गर्व से कहते है कि पहली बार टिप्‍पणी कर रहा हूँ कि मै आपसे सहमत हूँ। जीतू भाई और मेरे बीच विवाद सर्वविवादित था पर मैने कभी भी उनको कभी गलत नही कहा। मेरे ओर जीतू भाई के बीच लगातर 6 माह तक किसी प्रकार का मेल व सम्पर्क बन्‍द था, और मैने ही पहल करके नव वर्ष पर उसे पाटने की कोशिस की। अफलातून जी और मेरे बीच विचारों की भिन्‍नता सर्वविदित है किन्‍तु हमने कभी गाली गलौज नही किया। विचारों कि भिन्‍नता के बाद भी हम एक दूसरे को अपने से वरिष्‍ठ मानते है।
हिन्‍दी चिठ्ठा‍क‍ारी आपने आप में सहयोग की भावना से कार्य करती थी किन्‍तु इन लोगों ने प्रेम से संचालित परिवार में दीमक बन कर उपज गये है। और इन दीमको को समय पर ही मार डालना था। किन्‍तु आपसी विरोधाभासों के कारण यह सम्‍भव नही हो सका, पर आज सही समय पर सही फैसला लिया गया। बाजार को प्रतिबन्धित करके न सिर्फ अन्‍य विषराजों के फनों को कुचला गया और इसके साथ ही साथ यह चेतावनी भी दी गई कि अब इनकी अराजकता बर्दाश्‍त नही की जायेगी। मै तो माँग करता हूँ कि पुरा लेखों के आधार पर मुहल्‍ले को भी सर्वाजनिक रूप से निष्‍क‍ासित एवं बहिष्‍कृत किया जाये।
आज बाजार प्रकरण पर कई बन्‍धु नारद के फैसले को सही नही मान रहे ? उनका कहना है कि नारद की कार्यवाही अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर प्रहार है। अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता अगर गाली देना या किसी की भावनाओं को चोट पहुँचना है तो मै पुरजोर इसका विरोध करता हूँ। अभी व्‍यक्ति के स्‍वतंत्रता के कई माध्‍यम है मैने पहले भी चुनौती दे चुका हुँ कि आप ये पत्रकार आपने माध्‍यम के द्वारा अपनी अभिव्‍यक्ति को उठाये, पर नही लगता कि इन्‍हे मेरी चुनौती स्‍वीकार है। यह तो वही कहावत चरित्रर्थ करते है कि थोथा चना बाजे धना :) । अपने कई ऐसे वरिष्‍ठ लोग भी इनके साथ है और कहते है कि ये ठीक कर रहे है जिन्‍हे मै काफी अच्‍छी तरह से जानता हूँ, और इनकी बाते पढ़ कर काफी हतप्रभ भी हूँ। ऐसे चिठ्ठो को संगरक्षण देना सॉंप को दूध पिलाने जैसा है। जो कभी भी अपने लाभ के लिये संगरक्षण देने वाले को भी डसने में संकोच नही करेगा। आज समय आ गया है कि इन सॉंपों की पूरी नस्‍ल को कुचल दिया जाना चाहिये।
अन्‍त मे मै स्‍पष्‍ट कर देना चाहता हूँ कि हम हवाओं को इतना कमजोर न समझों कि हवाऐं केवल शीतलता ही प्रदान करनी है, अगर ये हवाऐ अपने पर उतर आये तो तूफान का रूप ले सकती है जो पृथ्‍वी के एक बड़े भूभाग को तहस- नसह करने में कोई कसर नही छोड़ती है। तूफान आपने समाने आये आये लोगों में यह अन्‍तर नही करता कि कौन दोषी है या कौन निर्दोष, वह सम्‍पूर्ण जगत को अपने मे लपेट लेती है। इसलिये इनके बेतुकी गालियों का सर्मथन करने वालों को सावधान रहना चाहिये कि वे भी तूफान के लपेटे में न आये, और यदि आयेगें तो फिर हमें दोष न देंना। ऐसा नही है कि इन विषपुरूषों की कारस्‍तानियों हमारी नजर में नही है हम उसे अपने बैकं के बचतखाते में जमा कर रहे हे और समय आने पर उन्‍हे ब्‍याज सहित लौटा भी दिया जायेगा।


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एक पुराना विज्ञापन



दुकानदार - ओहो दीपिका जी आईये आईये, कौन सा साबुन लेना पंसद करेगी( जैसे दीपिका जी उनको बता कर आई थी कि साबुन की खरीदनें आई है :-) ) ये देखिऐ ये (अन्‍य साबुन को दिखाते हुऐ)
दीपिका जी- नही नही, ये नही वो (निरमा को दिखाते हुऐ)
दुकानदार - पर आप तो हमेशा पुराना बाला साबुन लेती थी । (हकलाते हुऐ)
दीपिका जी - लेती थी पर, पर वही सफेदी जब मुझे कम दाम में मिले तो कोई वों क्‍यों ले ये न लें ( निरमा की ओर दिखाते हुऐ)
दुकानदार - मान गये
दीपिका जी - किसें ?
दुकानदार - आपकी पारखी नजर और निरमा सुपर दोनों को :)
 
फिर गाना शुरू होता है 

वाशिंग पावडर निरमा,
वाशिंग पावडर निरमा,
दूध सी सफेदी निरमा से आई
रंगीन कपड़ा भी खिल खिल जाये
सबकी पंसद निरमा
वाशिंग पावडर निरमा
निरमा .... निरमा ..... निरमा
 
अरे कुछ भी लिख दों, आप लोग पढ़ने के लिये चले आते है, यही तो है आपका प्‍यार :)
अरे कहॉं चल दिये टिप्‍पणी करना किसके लिये छोड़ जा रहे है :)


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भैया दूज की कहानी Bhai Duj ki Kahani



एक बुढ़िया थी। उसके सात बेटे और एक बेटी थी। बेटी की शादी हो चुकी थी। जब भी उसके बेटे की शादी होती, फेरो के समय एक नाग आता और उसके बेटे को डस लेता था। बेटा वही ख़तम हो जाता और बहू विधवा। इस तरह उसके छह बेटे मर गये। सातवें की शादी होनी बाकी थी। इस तरह अपने बेटों के मर जाने के दुख से बुढ़िया रो-रो के अंधी हो गयी थी। भाई दूज आने को हुई तो भाई ने कहा की मैं बहिन से तिलक कराने जाऊँगा। माँ ने कहा ठीक है। उधर जब बहिन को पता चला की उसका भाई आ रहा है तो वह खुशी से पागल होकर पड़ोसन के गयी और पूछने लगी की जब बहुत प्यारा भाई घर आए तो क्या बनाना चलिए? पड़ोसन उसकी खुशी को देख कर जल भुन गयी और कह दिया कि," दूध से रसोई लेप, घी में चावल पका। " बहिन ने ऐसा ही किया। उधर भाई जब बहिन के घर जा रहा था तो उसे रास्ते में साँप मिला। साँप उसे डसने को हुआ।

भाई बोला- तुम मुझे क्यू डस रहे हो?
साँप बोला- मैं तुम्हारा काल हूँ। और मुझे तुमको डसना है।

भाई बोला- मेरी बहिन मेरा इंतजार कर रही है। मैं जब तिलक करा के वापस लौटूँगा, तब तुम मुझे डस लेना।

साँप ने कहा- भला आज तक कोई अपनी मौत के लिए लौट के आया है, जो तुम आओगे।

भाई ने कहा- अगर तुझे यकीन नही है तो तू मेरे झोले में बैठ जा। जब मैं अपनी बहिन के तिलक कर लूँ तब तू मुझे डस लेना। साँप ने ऐसा ही किया।

भाई बहिन के घर पहुँच गया। दोनों बड़े खुश हुए।

भाई बोला- बहिन, जल्दी से खाना दे, बड़ी भूख लगी है।

बहिन क्या करें, न तो दूध की रसोई सूखे, न ही घी में चावल पके।

भाई ने पूछा- बहिन इतनी देर क्यूँ लग रही है? तू क्या पका रही है?

तब बहिन ने बताया कि ऐसे-ऐसे किया है।

भाई बोला- पगली! कहीं घी में भी चावल पके हैं , या दूध से कोई रसोई लीपे है। गोबर से रसोई लीप, दूध में चावल पका।

बहिन ने ऐसा ही किया। खाना खा के भाई को बहुत ज़ोर नींद आने लगी। इतने में बहिन के बच्चे आ गये। बोले-मामा मामा हमारे लिए क्या लाए हो?

भाई बोला- में तो कुछ नहीं लाया।

बच्चों ने वह झोला ले लिया जिसमें साँप था। जैसे ही उसे खोला, उसमें से हीरे का हार निकला।

बहिन ने कहा- भैया तूने बताया नहीं की तू मेरे लिए इतना सुंदर हार लाए हो।

भाई बोला- बहना तुझे पसंद है तो तू लेले, मुझे हार का क्या करना।

अगले दिन भाई बोला- अब मुझे जाना है, मेरे लिए खाना रख दे। बहिन ने उसके लिए लड्डू बना के एक डब्बे मे रख के दे दिए।

भाई कुछ दूर जाकर, थक कर एक पेड़ के नीचे सो गया। उधर बहिन के जब बच्चों को जब भूख लगी तो माँ से कहा की खाना दे दो।

माँ ने कहा- खाना अभी बनने में देर है। तो बच्चे बोले कि मामा को जो रखा है वही दे दो। तो वह बोली की लड्डू बनाने के लिए बाजरा पीसा था, वही बचा पड़ा है चक्की में, जाकर खा लो। बच्चों ने देखा कि चक्की में तो साँप की हड्डियाँ पड़ी है।

यही बात माँ को आकर बताई तो वह बावड़ी सी हो कर भाई के पीछे भागी। रास्ते भर लोगों से पूछती की किसी ने मेरा गैल बाटोई देखा, किसी ने मेरा बावड़ा सा भाई देखा। तब एक ने बताया की कोई लेटा तो है पेड़ के नीचे, देख ले वही तो नहीं। भागी भागी पेड़ के नीचे पहुची। अपने भाई को नींद से उठाया। भैया-भैया कहीं तूने मेरे लड्डू तो नही खाए!!

भाई बोला- ये ले तेरे लड्डू, नहीं खाए मैंने। ले दे के लड्डू ही तो दिए थे, उसके भी पीछे पीछे आ गयी।

बहिन बोली- नहीं भाई, तू झूठ बोल रहा है, ज़रूर तूने खाया है। अब तो मैं तेरे साथ चलूंगी।

भाई बोला- तू न मान रही है तो चल फिर।

चलते-चलते बहिन को प्यास लगती है, वह भाई को कहती है की मुझे पानी पीना है।

भाई बोला- अब मैं यहाँ तेरे लिए पानी कहाँ से लाऊँ। देख! दूर कहीं चील उड़ रहीं हैं,चली जा वहाँ शायद तुझे पानी मिल जाए।

तब बहिन वहाँ गयी, और पानी पी कर जब लौट रही थी तो रास्ते में देखती है कि एक जगह ज़मीन में 6 शिलाएँ गढ़ी हैं, और एक बिना गढ़े रखी हुई थी। उसने एक बुढ़िया से पूछा कि ये शिलाएँ कैसी हैं।

उस बुढ़िया ने बताया कि- एक बुढ़िया है। उसके सात बेटे थे। 6 बेटे तो शादी के मंडप में ही मर चुके हैं, तो उनके नाम की ये शिलाएँ ज़मीन में गढ़ी हैं, अभी सातवें की शादी होनी बाकी है। जब उसकी शादी होगी तो वह भी मंडप में ही मर जाएगा, तब यह सातवीं सिला भी ज़मीन में गड़ जाएगी।

यह सुनकर बहिन समझ गयी ये सिलाएँ किसी और की नहीं बल्कि उसके भाइयों के नाम की हैं। उसने उस बुढ़िया से अपने सातवें भाई को बचाने का उपाय पूछा। बुढ़िया ने उसे बतला दिया कि वह अपने सातवें भाई को कैसे बचा सकती है। सब जान कर वह वहाँ से अपने बॉल खुले कर के पागलों की तरह अपने भाई को गालियाँ देती हुई चली।

भाई के पास आकर बोलने लगी- तू तो जलेगा, कुटेगा, मरेगा।

भाई उसके ऐसे व्यवहार को देखकर चौंक गया पर उसे कुछ समझ नहीं आया। इसी तरह दोनों भाई बहिन माँ के घर पहुँच गये। थोड़े समय के बाद भाई के लिए सगाई आने लगी। उसकी शादी तय हो गयी।

जब भाई को सहरा पहनाने लगे तो वह बोली- इसको क्‍यूँ सहरा बँधेगा, सहारा तो मैं पहनूँगी। ये तो जलेगा, मरेगा।

सब लोगों ने परेशान होकर सहरा बहिन को दे दिया। बहिन ने देखा उसमें कलंगी की जगह साँप का बच्चा था। बहिन ने उसे निकाल के फेंक दिया।

अब जब भाई घोड़ी चढ़ने लगा तो बहिन फिर बोली- ये घोड़ी पर क्यू चढ़ेगा, घोड़ी पर तो मैं बैठूँगी, ये तो जलेगा, मरेगा, इसकी लाश को चील कौवे खाएंगे। सब लोग बहुत परेशान । सब ने उसे घोड़ी पर भी चढ़ने दिया।

अब जब बारात चलने को हुई तब बहिन बोली- ये क्यू दरवाजे से निकलेगा, ये तो पीछे के रास्ते से जाएगा, दरवाजे से तो मैं निकलूंगी। जब वह दरवाजे के नीचे से जा रही थी तो दरवाजा अचानक गिरने लगा। बहिन ने एक ईंट उठा कर अपनी चुनरी में रख ली, दरवाजा वही की वही रुक गया। सब लोगों को बड़ा अचंभा हुआ।

रास्ते में एक जगह बारात रुकी तो भाई को पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा कर दिया।

बहिन कहने लगी- ये क्यू छाव में खड़ा होगा, ये तो धूप में खड़ा होगा। छाँव में तो मैं खड़ी होगी।

जैसे ही वह पेड़ के नीचे खड़ी हुई, पेड़ गिरने लगा। बहिन ने एक पत्ता तोड़ कर अपनी चुनरी में रख लिया, पेड़ वही की वही रुक गया। अब तो सबको विश्वास हो गया की ये बावली कोई जादू टोना सिख कर आई है, जो बार बार अपने भाई की रक्षा कर रही है। ऐसे करते-करते फेरों का समय आ गया।

जब दुल्हन आई तो उसने दुल्हन के कान में कहा- अब तक तो मैंने तेरे पति को बचा लिया, अब तू ही अपने पति को और साथ ही अपने मरे हुए जेठों को बचा सकती है।

फेरों के समय एक नाग आया, वो जैसे ही दूल्हे को डसने को हुआ , दुल्हन ने उसे एक लोटे में भर के उपर से प्लेट से बंद कर दिया। थोड़ी देर बाद नागिन लहर-लहर करती आई।

दुल्हन से बोली- तू मेरा पति छोड़।

दुल्हन बोली- पहले तू मेरा पति छोड़।

नागिन ने कहा- ठीक है मैंने तेरा पति छोड़ा।

दुल्हन- ऐसे नहीं, पहले तीन बार बोल।

नागिन ने 3 बार बोला, फिर बोली की अब मेरे पति को छोड़।

दुल्हन बोली- एक मेरे पति से क्या होगा, हँसने बोलने के लिए जेठ भी तो होना चाहिए, एक जेठ भी छोड़।

नागिन ने जेठ के भी प्राण दे दिए।

फिर दुल्हन ने कहा- एक जेठ से लड़ाई हो गयी तो एक और जेठ छोड़। वो विदेश चला गया तो तीसरा जेठ भी छोड़।

इस तरह एक-एक करके दुल्हन ने अपने 6 जेठ जीवित करा लिए।

उधर रो-रो के बुढ़िया का बुरा हाल था। कि अब तो मेरा सातवाँ बेटा भी बाकी बेटों की तरह मर जाएगा। गाँव वालों ने उसे बताया कि उसके सात बेटा और बहुएँ आ रही है

तो बुढ़िया बोली- अगर यह बात सच हो तो मेरी आँखों की रोशनी वापस आ जाए और मेरे सीने से दूध की धार बहने लगे। ऐसा ही हुआ। अपने सारे बहू बेटों को देख कर वह बहुत खुश हुई,

बोली- यह सब तो मेरी बावली का किया है। कहाँ है मेरी बेटी?

सब बहिन को ढूँढने लगे। देखा तो वह भूसे की कोठरी में सो रही थी। जब उसे पता चला कि उसका भाई सही सलामत है तो वह अपने घर को चली। उसके पीछे-पीछे सारी लक्ष्मी भी जाने लगी।

बुढ़िया ने कहा- बेटी, पीछे मुड़ के देख! तू सारी लक्ष्मी ले जाएगी तो तेरे भाई भाभी क्या खाएंगे।तब बहिन ने पीछे मुड़ के देखा और कहा- जो माँ ने अपने हाथों से दिया वह मेरे साथ चल, बाद बाकी का भाई भाभी के पास रह।

इस तरह एक बहिन ने अपने भाई की रक्षा की।
 
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कामयाबी तुम्हारे कदम चूमे,
खुशियाँ तुम्हारे चारो और हो,
पर भगवान से इतनी प्रार्थना करने के लिए,
तुम मुझे कुछ तोह कमीशन दो...!!!
भाई दूज की आप सब को बधाईयाँ !!

कैसी भी हो एक बहन होनी चाहिये……….
बड़ी हो तो माँ- बाप से बचाने वाली.
छोटी हो तो हमारे पीठ पिछे छुपने वाली……….॥
बड़ी हो तो चुपचाप हमारे पाँकेट मे पैसे रखने वाली,
छोटी हो तो चुपचाप पैसे निकाल लेने वाली………॥
छोटी हो या बड़ी,
छोटी- छोटी बातों पे लड़ने वाली,
एक बहन होनी चाहिये…….॥
बड़ी हो तो, गलती पे हमारे कान खींचने वाली,
छोटी हो तो अपनी गलती पर,
साँरी भईया कहने वाली…
खुद से ज्यादा हमे प्यार करने वाली एक बहन होनी चाहिये…. ….॥
भाईदूज की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

खुशनसीब होती है वो बहन,
जिसके सिर पर भाई का हाथ होता है;
हर परेशानी में उसके साथ होता है,
लड़ना-झगडना फिर प्यार से मनाना,
तभी तो इस रिश्ते में इतना प्यार होता है।
Happy Bhai Dooj 2017 

Bhai Dooj Wishes in HIndi
खामोशियो में एक अदा इतनी प्यारी लगी,
दुनिया में आपकी मोहब्बत सबसे न्यारी लगी,
दुआ करतें हे ये न टूटे ये रिश्ता कभी,
क्योकि इस दुनिया में यही हमको हमारी लगी.
*** Wishes u a very very happy Bhai Dooj ***

भाई दूज का है आया है शुभ त्यौहार,
बहनों की दुआएं भाइयों के लिए हज़ार ,
भाई बहन का यह अनमोल रिश्ता है बहुत अटूट,
बना रहे यह बंधन हमेशा खूब।
भाई दूज की शुभ कामनायें !
Bhai Dooj 2017 Sms in hindi

हे ईश्वर बहुत प्यारा हैं मेरा भाई
मेरी माँ का दुलारा हैं मेरा भाई
न देना उसे कोई कष्ट भगवन
जहाँ भी हो ख़ुशी से बीते उसका जीवन..!!!
Happy भाईदूज to u....
Bhai Dooj Wishes Sms in Hindi 140
I Feel So Blessed And Treasured to Have a Brother Like You In My Life.
You Like An Angel Are Always There When I Need You.
Thanks, Brother And Have a Happy Bhai Dooj .

My Brother is My Best Friend,
You Stand By Me When I Am Alone You Make Feel Happy When I Am Low,
Thanks For Being For Me Always Dear Brother.
Happy Bhai Dooj.

You Were Always My Best Friend,
Looking Out For Me, Making Sure
The Path I Traveled On Was Smooth.
Even If I Searched The World Over,
There Cannot Be a Better Sister Than You.
** Happy Bhai Dooj My Sweet Sister **

Brothers r Like Streetlights Along The Road,
They Don’t Make Distance Any Shorter But
They Light Up The Path & Make The Walk Worthwhile.
“Happy Bhai Dooj”

Bhai Dooj Quotes In Hindi

बहन लगाती तिलक, फिर मिठाई है खिलाती;
भाई देता पैसे और बहन है मुस्कुराती;
भाई-बहन का ये रिश्ता न पड़े कभी लूज
मेरे प्यारे भैया मुबारक हो आपको भाई दूज।

थाल सजा कर बैठी हूँ अँगना
तू आजा अब इंतजार नहीं करना
मत डर अब तू इस दुनियाँ से
लड़ने खड़ी हैं तेरी बहन सबसे
Happy Bhai Dooj !!!!!!!
प्रेम और विश्वास के बंधन को मनाओ;
जो दुआ माँगो उसे तुम हमेशा पाओ;
भाई दूज के त्यौहार है, भईया जल्दी आओ;
अपनी प्यारी बहना से आकर तिलक लगवाओ।
भाई दूज की शुभ कामनायें!
Bhai Dooj Whatsapp Sms
भाईदूज के इस पावन अवसर पर आपकी हर मनोकामना पूरी हो,
और वो हर चीज़ आपके पास रहे जो आप के लिए जरूरी हो.....
**** हैप्पी भाईदूज ****

धनतेरस मई आप धनवान हो,
रुप्चौदास मई आप रूपवान हो,
दिवाली मई आपका जीवन जगमग हो,
भाईदूज पर रिश्तो मई मिठास आए.
आपको और आपके पूरे परिवार को भाईदूज की शुभकामनायें

बहन चाहे भाई का प्यार,
नहीं चाहे महंगे उपहार,
रिश्ता अटूट रहे सदियों तक,
मिले मेरे भाई को खुशियाँ अपार.
Happy भाईदूज
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Bhai Dooj Shubh Kamnaye Messages
फूलों का तारों का सबका कहना हैं,
एक हजारों मैं मेरी बहना हैं.
भाईदूज की ख़ूब शुभकामनायें

यह त्योहार है कुछ ख़ास,
बनी रहे हमारे प्यार की यही मिठास.
*** Happy Bhai Dooj ***

Praying For Your Long Life And Good Health
On This Bhai Dooj And Always
Have a Wonderful Bhai Dooj

Bhai Dooj Images Quotes in Hindi
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Bhai dooj Quotes Sms for 2017

Bhai Dooj Festival Hindi Sms

प्रेम और विश्वास के बंधन को मनाओ जो दुआ मांगो,
उससे तुम पाओ भाईदूज का त्यौहार है,
भैया जल्दी आओ अपनी प्यारी बहना से तिलक लगवाऊ.
हैप्पी भाईदूज.

लाल गुलाबी रंग है जाम रहा संसार,
सूरज की किरणें खुशियों की हो बहार,
चाँद की चांदनी अपनों का हो प्यार.
मुबारक हो आपको भाई दूज का त्योहार.

You Ever Say No You Never Say
Thats Impossible And You Never
Say You Can Not.
That’s My Bro a Superman
Who Make Things Possible And
Who Make Paths Smoother.
I Love You Bro.
Happy Bhaiya Dooj...!!!!

Bhai Dooj Greetings in Hindi
Behen Chahe Bhai Ka Pyaar,
Nahi Chahe Mahange Uphar,
Rishta Atoot Rahey Sadiyon Tak,
Mile Mere Bhai Ko Khushiyan Apar.
Happy BHAI DOOJ.....!!!!

प्रेम और विश्वास के बंधन को मनाओ,
जो दुआ मांगो, उससे तुम पाओ,
भाईदूज का त्योहार है, भैयाजी जल्दी आओ,
अपनी प्यारी बहना से तिलक लार्वाओ.
*** हैप्पी भाईदूज ***

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तोड़ दिया सन्‍यास - विषय ग‍म्‍भीर था



परीक्षा तक के लिये सन्‍यास लिया था किन्‍तु आज विशेष कारण के कारण इसे तोड़ना पड़ा करू भी क्‍या जरूरी कामों को लिये समय निकालना ही पड़ता है। :) 
आज मेरे लिये बहुत ही शुभ अवसर है कि आज के ही दिन ईश्‍वर मेरे निर्माण के लिये माता-पिता को वैवाहिक बन्‍धन मे बांधा था। प्रत्‍येक व्‍यक्ति निर्माण व्‍यर्थ मे नही हुआ है प्रकृति ने निश्चित रूप से हर व्‍यक्ति-जीव को अपना माध्‍यम बना कर भेजा है। मै आज के दिन अपने माता पिता को कुछ उपहार देना चाहता था पर सोचने को हुआ कि मै उन्‍हे क्‍या दे सकता हूँ ? जो खुद ही अभी उनके ग्रास का में अपने ग्रास को पा रहा हूँ। जो कुछ भी मै क्रय करके देता वह उनके द्वारा दिये माध्‍यम से दिया होता। तो यह कैसा उपहार होता ?
एक पुत्र अपने माता-पिता को क्‍या दे सकता है ? पुत्र अगर दुनिया की सबसे बड़ी खु‍शी भी दे दें तो वह अपने माता-पिता के प्रेम के आगे तुच्‍छ होगा। मै अपने माता -पिता को हर वो चीज देना चाहता हूँ जो वे मुझसे चाहते है। किन्‍तु एक पिता की यही अभिलाषा होती है, उसके पुत्र का नाम उनसे भी उपर जाये तभी पिता को सबसे बड़ी खुशी मिलती है। मै वो खुशी देना चाहता हूँ।
मै अपने माता पिता के सघर्षो को जानता हूँ। मेरे पिता प्रतापगढ़ के छोटे से गाँव बड़ारी मे एक कृषक परिवार मे जन्‍म लिया, फिर अपने कानपुर के गन्‍दे मुहल्‍ले में ढ़कनापुरवा में बीता बचपन, और इसी जगह से अपने नये आयामों को छूते हुऐ अपने पढ़ाई के समय में ही गॉव मे पैसे भेजने की जिम्‍मेदारी के साथ अपने लक्ष्‍यों को प्राप्‍त किया। विभिन्‍न राजनैतिक अन्‍दोलनों मे भाग लेते हुऐ कई बार जेल गये ( मुझे याद है जब 1991-92 मे गिरफ्तारियॉं हो रही थी तब मै 6 वर्ष का रहा हूँगा तब सोचता था कि चोरी आद‍ि करने पर जेल होती थी पर मेरे पापा ने तो ऐसा कुछ नही किया, और व्‍यथित रहता था और सोचता था कि चोरी करते हुऐ पकड़े गये होगें और मुझे कोई बता नही रहा है। पर यह मेरा उस समय का बाल मन की बात थी) और अपने लक्ष्‍यों को नही भूले, और 1988 के आस पास इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय मे वकालत की प्रेक्टिस करने आ गये, उस समय हाथ मे कुछ न था किन्‍तु अपने अथक साहस के बल पर उच्‍च न्‍यायलय में बिना किसी गॉड फादर के 15 वर्षो की वकालत में भारत सरकार के वरिष्‍ठ स्‍थाई अधिवक्‍ता का पद 2003 में प्राप्‍त किया, और आज उच्‍च न्‍यायलय मे सम्‍मानित अधिवक्‍ता है। मेरे पिताजी के शब्‍दकोश में असम्‍भव नाम का कोई शब्‍द नही है और यही उनकी सफलता का राज है। अगर मै उनके चरणों की धूल भी बन सका तो यह मेरी उपलब्‍धी होगी।
 
मेरी माता जी का जन्‍म मुम्‍बई में हुआ था, और उनका भी पैत्रिक निवास प्रतापगढ़ ही था। बचपन और पढ़ाई मुम्‍बई में ही हुई। एक खास बात मेरी माता जी मुम्‍बई नगर पालिका में कई दर्जन स्‍कूल हुआ करते थे। उसमें मेरी माता जी सीनियर वर्ग मे मुम्‍बई चैम्पियन थी। एक गृहणी के रूप में उन्‍होनें अपने अपने सभी द‍ायित्‍वों का पालन किया। पिताजी की अपनी व्‍यस्‍ताते थी पर माता जी ने हमें कभी भी पिताजी की कमी महसूस नही होने दिया। मेरे जन्‍म से पहले और जन्‍म के 5 वर्ष के बाद की मै नही जानता जो जनता हूँ सुनी सुनाई है। किन्‍तु 1990 के बाद की बाते धुधलेपन के साथ याद है। बात 1991-92 के दंगे के समय की है कानपुर वाले जानते है कि कानपुर मे उन दिनों कैसा महोल था, पिताजी को भी रात में गिरफतार कर लिया गया था। अब मेरे घर मे मात्र चार लोग बचे मेरी माता जी, दो बडे भाई (उम्र 13 व 9 वर्ष) और मै उम्र 5 वर्ष पूरे मुहल्‍ले मे दहशत का माहौल था, कि अब हमला हुआ कि तब, मेरी माता जी ने मुझे और मेरे बीच वाले भाई को एक कमरें बन्‍द कर दिया और दरवाजे के बाहर बडे भाई को लेकर एक एक लाठी लेकर बैठ गई। हमारे परिवार को कानपुर से इलाहाबाद पूर्ण रूप से 1994 मे आया और 1988 से 1993 तक मेरी माता जी ने हम दोनो छोटे भाई का अच्‍छी तरह पालन पोषण किया, जो निश्चित रूप से किसी बड़े सघर्ष से कम न था। मेरे पिता जी के 2005 मे हुऐ एक्‍सीडेन्‍ट ( इसके बारे मे फिर कभी लिखूँगा) मे माता जी का धैर्य और साहस गजब का था निश्चित रूप से यह क्षण मेरे परिवार पर अब तक के सबसे भारी थे। मेरे बड़े भइया के कहने पर मेरी माता जी तीन दिनों तक पिताजी को अस्‍पताल मे देखने नही गई, कई महिलाओं ने तो ऐसा भी कहा कि कैसी औरत हो कि तुम्‍हारा पति तीन दिनों से अस्‍पताल मे है और तुम देखने तक नही गई, शायद उनका यही त्‍याग है जो पिताजी को मौत के मुँह से बाहर निकाल लाया। नही तो लोगों का कहना था कि बीएन सिंह अब अपने पैरों पर नहीं चल सकेगें( कुछ का कहना था कि बचेगें ही नही) किन्‍तु आज स्थिति सामने है कि पिताजी प्‍लास्‍टर खुलने के चार म‍हीनें के अन्‍दर ही कोर्ट जाने लगे(चलने लगें) और जो देखता था कि बीएनसिंह जी आप जैसी हिम्‍मत भगवान सभी को दे। इन सब मे पिता जी को योग था ही पर माता जी का अमूल्‍य योगदान था कि गम्‍भीर विषयों पर भी उन्‍होने अपना धैर्य नही खोया और हमारें परिवार की सफलता में हर क्षण एक एक मोती जड़ने का काम करतीं रही।

मै मानता हूँ कि मेरे माता-पिता दुनिया के सबसे अच्‍छे माता-पिता है और मेरे भाई सबसे अच्‍छे भाई, हे ईश्‍वर इस पर कभी किसी की नजर न । ।
मेरी ओर से मेरे माता-पिता और मेरे भाइयों को इस शुभ दिन पर हार्दिक शुभ कामनाऐं।
फिर मिलेगें 24 के बाद :)
सभी पाठकों को धन्‍यवाद


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