संघकिरण घर घर देने को



संघकिरण घर घर देने को, अगणित नंदा दीप जले,
मौन तपस्वी साधक बनकर, हिमगिरी से चुपचाप गले ॥ध्रु.॥
नई चेतना का स्वर देकर, जन मानस को नया मोड दे
साहस शौर्य ह्रदय में भरकर नई शक्ति का नया छोर दे
संघशक्ति के महाघोष से, असुरों का संसार दले ॥१॥
मौन तपस्वी साधक बनकर....
 
परहित का आदर्श धारकर, पर पीड़ा को ह्रदय हार दे
निश्चल निर्मल मनसे सबको ममता का अक्षय दुलार दे
निशा निराशा के सागर में, बन आशा के कमल खिले ॥२॥
मौन तपस्वी साधक बनकर....

जन-मन-भावुक भाव भक्ती दे, परंपरा का मान यहाँ
भारत माँ के पदकमलों का गाते गौरव गान यहाँ
सबके सुख दुख में समरस हो, संघ मंत्र के भाव पलें ॥३॥
मौन तपस्वी साधक बनकर....


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7 comments:

Anonymous said...

अच्‍छा गीत है

आदिविद्रोही said...
This comment has been removed by a blog administrator.
संजीव कुमार सिन्हा said...

नई चेतना का स्वर देकर, जन मानस को नया मोड दे
साहस शौर्य ह्रदय में भरकर नई शक्ति का नया छोर दे
संघशक्ति के महाघोष से, असुरों का संसार दले

राष्ट्रवाद की प्रखर अभिव्यक्ति है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

mahashakti said...

आदिविद्रोही जी आपकी टिप्‍पणी में अपशब्‍द है इस लिये इसे हटाया जा रहा है।

Tara Chandra Gupta said...

bahut acchi rchna.

Shrish said...

बहुत सुन्दर और ओजस्वी कविता!

दीपक भारतदीप said...

आपका गीत बहुत अच्छा लगा ।
दीपक भारतदीप