कविता- एक आनोखा टेनिस का मैच



देखा एक शाम टीवी खेल , चल रहा था ,
टेनिस का एक मैच बेगाना।
रिमोट बटन की बढ़ती गति को कुछ नया देख,
मैने इस न्‍यारें खेल को रोकने समझना चाहा।
थोड़ी देर बाद पता चला कि यह तो बिबंडन का फाइनल है।
जहॉं फेडरर मुकाबला स्‍पेन के नाडल से होने वाला है।
क्रिकेट वर्ड कप से हार कर मेरा मन भी गया था क्रिकेट से ऊब,
अन्‍तत: मुझे भी इस खेल में लगी रोचकता खूब।
कुछ ही देर में इस खेल ने पकड़ लिया।
फिर मैने भी उसको अपनी बाहों में जकड़ लिया।
फेडरर के एक एक फोरहैन्‍ड शॉट का नही था कोई जवाब,
पर शायद दूसरे सेट के बाद चढ़ना था अभी नडाल का शबाब।
मै भी कभी नाडाल तो कभी फेडरर की तरफ से आवाज लगाने लगा,
इसी बीच हॉक आई ने भी की नाडाल की वकालत,
पर तभी फेडरर ने खुद की गलतियों से खिलाफत,
मै में अब सर्विस फाल्‍ट की गललियों का नाडाल का था कारोबार
जिसके कारन विबलंडल की ट्राफी से हुआ फेडरर का साक्षात्‍कार
पर क्ले कोर्ट के बादशाह ने ग्रास कोर्ट पर भी जीता सबका दिल,
और मुझे क्रिकेट का विकल्‍प गया था मिला।
कवि - विवेक कुमार मिश्र, इलाहाबाद विवि के स्‍नातक छात्र है।




















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2 comments:

mamta said...

कविता अच्छी है। लिखते रहे।

Anonymous said...

"थोड़ी देर बाद पता चला कि यह तो बिबंडन का फाइनल है।"

बिबंडन का फाईनल ?...विडम्बना का फाईनल है...

"कुछ ही देर में इस खेल ने पकड़ लिया।
फिर मैने भी उसको अपनी बाहों में जकड़ लिया।"

पकड़ने-जकड़ने का खेल है ये टेनिस...

"क्रिकेट वर्ड कप से हार कर मेरा मन भी गया था क्रिकेट से ऊब,"

क्रिकेट से ऊब! बहुत ख़ूब...आप भारतीय टीम में थे!...और आप वर्ड कप से हार गए?...अरे हारना था तो किसी टीम से हारते...