दशहरे का मेला और हमारी नींद



रविवार को इलाहाबाद के सिविल लाइन्स में दशहरे के मेले का आयोजन था, मेरी इस मेले में घूमने की कोई इच्छा नही थी, किन्तु मित्रों के आग्रह को मै टाल नही सका, सर्वप्रथम मेले के लिये घर से अनुमति जरूरी थी, जो मुझे मिल गई थी। यह पहली बार मेरा ऐसा मेला था जिममें मैने रात्रि 1 बजे के बाद तक घूमता रहा। सर्वप्रथम मै पहुँचा तो मित्रों का प्रश्न था कि घर से कितने बजे तक समय लेकर आये हो ? मैने 1 बजे तक का समय दे दिया था। रात्रि भर हम घूमते रहे, काफी मजा आया। हम कुछ मित्र करीब 1 महीने बाद मिल रहे थे, विभिन्‍न प्रकार के चर्चाओं में हमने भाग लिया।

रात्रि ढाई बज रहे थे तब मैने कहा कि अब इस कार्यक्रम को समाप्त किया जाना चाहिये,कुछ की नानुकुर के बाद कार्यक्रम की समाप्ति की घोषणा हुई। मुझे घर पहुँचते और सोते सोते 3.30 बज गये थे। करीब 5 बजे थे कि मेरी ऑंख खुल चुकी थी। मेरी आदत है कि मै एक बार 5 बजे जरूर उठ जाता हूँ। वैसा मेरे साथ उस दिन भी हुआ, कुल मिला कर मै दो घन्‍टे भी नही सो पाया था। सुबह पापा जी और दोनो भइया को गॉंव जाना था, किन्‍तु पिछले दिन भइया रायवरेली गये थे तो उन्होने जाने में असर्मथता व्‍यक्त कर दिया। पापा जी ने मुझे कहा मै भी असर्मथ ही था किन्तु जाने के लिये हामी भर दिया। गाड़ी और प्रतापगढ़ में मुझे काफी तेज नींद आ रही थी किन्तु मै सो पाने में सक्षम नही था। गॉंव पहुँचते 4 बज गये, और शाम 6 बजे पापा जी ने कहा कि आज रूका जाये कि चला जाये। मैने इलाहाबाद जाने के पक्ष में राय जाहिर की। क्योकि मै इतना थका हुआ था कि कुछ भी काम करने की स्थिति में नही था। 

हम लोग करीब 6.30 गॉंव से इलाहाबाद की ओर चले और 9 बजे घर पहुँच गये, मेरी थकावट और नींद चरम पर था किन्तु गॉंव से लौटने के बाद 56 प्रकार की चर्चा शुरू हो गई और सोते सोते बज गये 12 और फिर सुबह 5 बजे जग गया। .........


शेष फिर


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6 comments:

Anil Pusadkar said...

जहां चार यार मिल जाये वहीं रात हो गुलज़ार,जहां चार यार। ये फ़िल्मी गीत बताता है कि दोस्तों के मिलने पर समय गुजरने का पता ही नही चलता जैसे आपको नही चला।अक्सर ऐसा ही होता है।

अनूप शुक्ल said...

सही है। घूमघाम लिये।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।

prakharhindutva said...

जानकर हर्ष हुआ कि आप भी इस्लाम और गाँधी के बारे में हमारे जैसे ही विचार रखते हैं। एक आलेख में तथ्यों पर चर्चा की है। कृपया टिप्पणी दें।
आपसे जानना चाहेंगे ब्लॉग को लोकप्रिय बनाने का माध्यम क्या है।

अभिषेक ओझा said...

मेला में पिपिहरी ख़रीदे की नहीं?

योगेन्द्र मौदगिल said...

अभिषेक जी ने जो पूछा है उसका जवाब कब दे रहे हो प्यारे