भाजपा का दर्द - जिन्‍ना से जसवंत तक



भारतीय जनता पार्टी में आम चुनाव में हार के बाद जिस प्रकार का कलह मजा है, इसके दूरगामी परिणाम दिखाई पड़ते दिख रहे है। 1998 तक देश की सबसे अनुशासित प‍ार्टियों में गिनी जाने वाली भाजपा आज अपने अ‍तीत को भूल कर कांग्रेसी पथ पर चलने को अग्रसर दिखाई पड़ती है। सात साल के केन्‍द्रीय सत्‍ता सुख के काल में भाजपा के नेता कार्यकर्ताओं से विमुख हो चुके थे, उनके दम्‍भ था कि अटल के भरोसे पर कोई भी चुनाव जीता जा सकता है, मगर जो होना था उसका परिणाम हमारे समाने है। अटल के काल मे ही भाजपा सत्‍ता के सिंहासन से घूल चाटती हुई, पराभाव के रसातल में पहुँच गई।

जसवंत सिंह

आडवानी भी जिन्‍ना का गुणगान कर चुके थे और अब जसवंत ने भी किया, दोनो के गुणगान मे बहुत बड़ा अंतर है। आडवानी ने जो किया मै उस पर जाना नही चाहूँगा किन्‍तु जसवंत पर जरूर कहना चाहूँगा। जिस व्‍यक्ति ने भाजपा निर्माण से लेकर आज तक अपना जीवन अपनी पार्टी को दिया आज वही पार्टी उन्‍हे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया, और कारण सरदार पटेल पर टिप्‍पणी को बताया जा रहा है। जसवंत सिंह को पार्टी से निकालना भाजपा की सबसे बड़ी राजनैतिक भूलो में से एक होगी। अपनी लिखी पुस्‍तक सरदार पटेल पर टिप्‍पणी दुर्भाग्‍य पूर्ण है किन्‍तु अनुचित नही है। देश की अखंडता में जिनता योगदान सरदार पटेल का रहा है उसे कोई भी भूला नही सकता किन्‍तु यह भी भूला दिया जाना कि गलत होगा कि सरदार पटेल भी हमेंशा गांधी के हाथ की कठ‍पुतली साबित हुये है। एक बड़ा जनमानस चाहे वह हिन्दू रहा होगा या मुसलमान विभाजन के पक्ष में नही था किन्‍तु नेहरू-गांधी पदलिप्‍सा के आगे पूरा देश लाचार रहा और विभाजन की भीषण विभीषिका से जूझता रहा।
 
मुरझाता कमल

आज यह शोध का विषय होना चाहिये कि क्‍या भारत विभाजन रोका जा सकता था ? मेरी नज़र में इसका उत्‍तर हाँ में आयेगा क्‍योकि आज देश में जितने मुसलमान है उतने आज पाकिस्‍तान में भी नही है। जब आज मुस्लिम स्‍वतंत्रता पूर्वक रह सकते है तो तब भी रह सकते थे किन्‍तु नेहरू के मोह में गांधी जी के आँखो में पट्टी सी बांध दी थी। नेहरू के अतिरक्ति कोई भी ऐसा भारतीय नेता इस हैसियत में नही था कि व गांधी जी के गलत बातों का विरोध कर सकें, यहाँ तक कि सरदार पटेल भी नही। देश के साथ साथ काग्रेस का एक बड़ा जनमानस खुद सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनने की इच्‍छा रखता था किन्‍तु नेहरू और गांधी के प्रभाव में जो वस्‍तु स्थिति हमारे समाने आयी उससे हम भली भाति परिचित है, कि देश कि इच्‍छा के विरूद्ध हमने नेहरू के रूप में देश का पहला प्रधानमंत्री पाया।

जिन्‍ना और गांधी
यह भूलना गुनाह होगा कि गांधी जी ने नेहरू के राजनैतिक कैरियर बनाने के लिये सुभाष चंद्र बोस के साथ क्‍या-क्‍या नही किया ? काग्रेस समिति के पूर्ण बहुतमत के फैसले का विरोध करते है गांधी ने सुभाष बावू को अध्‍यक्ष पद के चुनाव में हराने के लिये क्‍या क्‍या नही किया। गांधी जी उस हद तक गिरे जिस हद तक उन्‍हे ने जाना चाहिये था, पटेल, टंडन सहित अनेको नेताओं को चुप कराने के लिये उन्‍होने नेताजी की जीत को आपनी हार बताने लगे।
 
नेहरू, गांधी व पटेल
आज जरूरत है कि देश के विभाजन की सही विभिषिका देश के समाने रखी जाये, वही जसवंत सिंह ने रखने का प्रयास किया था। भारत विभाजन के लिये जिन्‍ना से ज्‍यादा दोषी नेहरू, गांधी और कांग्रेस पार्टी है जो जो मुस्लिमो को साथ नही रख सकें, आज यही काग्रेस पार्टी मुस्लिमों को की सबसे बड़ी हितैसी बनी हुई है। गेहू के साथ सदैव घुन पीसा जाता है, नेहरू और गांधी के पापों के छिट्टे पटेल पर पड़ना स्‍वाभाविक ही था।
गांधी और सुभाष

जसवंत सिंह कि किताब पर जो रवैवा भाजपा का है वह र्दुभाग्‍य पूर्ण है, वह एक लेखक की किताब को अपने विचारधारा से तुलना कर रही है और किताब के लेखक के विचारों को अपनी विचारधारा से जोड़ रही है। भाजपा के अंदर की इस कुस्‍ती को असली मजा देश विभाजन की दोषी काग्रेस ले रही है।त्र इन्‍टर नेट के विभिन्‍न सूत्रों से साभार
 


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6 comments:

rohit said...

Premendraji

Aapka blog padha.. Dekh kar khushi hui ki aapke itne unmukt vichaar hai.. parantu aap ki saari bato ko sweekar karna mere liye kathin hai...
Hum aksar puraani baato ko lekar usame paksh vipaksh ki baat karte hai. par vastav me hum us samay ki stithi ko bhool jaate hain jis samay ye nirnay liya gaya tha..
Isame kkoi sandeh nahi hai ki bina Gandhiji ke bharat ki swatantrata ka moortroop hona asambhav tha.. Hinsa se to keval dvesh hi paida hota hai.. Jaha tak Netaji ki baat hai unhone prayas achcha kiya tha par poorna safalta nahi mili...Or jaha tak musalmano ke vibhajan ka sawaal hai to vo keval jinna ki aawaz nahi thi balki bahut se musalmaano ki aawaz nahi thi..Hume ye nahi bhoolna chahiye ki agar koi vyakti itna mashhoor avam prabhutva wala tha to avashtya hi usake vichaaro me wo prabhaav avam baat rahi hogi.. Isliye pahle kya hua, kiski jimmedaari thi isake vishay me charcha karne ko koi fayda nahi hai..

mahashakti said...

धन्‍यवाद रोहित जी,

विचारों की भिन्‍नता हो सकती है, किसी के कोई लिये कुछ महत्‍वपूर्ण हो सकता है तो किसी के लिये कोई बात बेकार की बात, यदि पुरानी बातों में कुछ नही रखा तो हमें इतिहास का पढ़ाई और अध्‍ययन बंद कर देना चाहिये।

शायद इतिहास हम इसीलिये पढ़ते है क्‍योकि हमें भूल स्‍वीकार कर उसे दोहराये नही।

रंजन said...

बहुत सही कहा...

बिल्कुल जल्दबाजी मे लिया गया निर्णय लगता है..

Laxmi N. Gupta said...

सही लिखा है। जसवन्त की पुस्तक पर चर्चा होनी चाहिए। सत्य की शोध होनी चाहिए। जसवन्त को पार्टी से निकालना भा ज पा का बिलकुल ग़लत कदम है। मोदी का पुस्तक पर प्रतिबन्ध लगाना भी सही नहीं है।

रौशन said...

प्रमेन्द्र जी आपकी कुछ मुह बंद करते जाने से भाजपा को कुछ नहीं मिलेगा .
वैसे इतिहास के अध्ययन के बिना इतिहास के बारे में नहीं बोलना चाहिए
गांधी , पटेल और राजेंद्र प्रसाद एक तरह की विचारधारा के थे सुभाष के साथ व्यक्तिगत शत्रुता (vitthal भाई के संपत्ति विवाद के चलते ) सरदार पटेल की थी और पटेल कांग्रेस संगठन में वास्तव में सबसे शक्तिशाली थे पर लोगों में sweekaryataa नेहरु की थी पटेल कभी ज्यादा पोपुलर नहीं रहे थे .
खैर हमें पता है हम वही मानते हैं जो हम मानना चाहते हैं :-)

Suman said...

good