आतंक की राह पर इस्‍लाम और कुरान



आतंक की राह पर इस्‍लाम और कुरान

फिर जब हराम के महीने बीत जाएं, तो 'मुश्रिकों'* को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो, और उन्हें घेरो, और घात की जगह उनकी ताक में बैठो । फिर यदि वे ' तौबा ' कर लें नमाज कायम करें, और जकात दें, तो उनका मार्ग छोड़ दो । नि: सन्देह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है । 
*मूर्तिपूजको (कुरान - '10 पार: 9 शूर: 5 वीं आयत) 
 
यह बाते स्‍पष्‍ट रूप से कुरान में लिखी हुई, क्‍या किसी धार्मिक पुस्‍तक में इस तरह मार-काट का उल्‍लेख होना चाहिये ? क्‍या ऐसी पुस्‍तकों को धर्म ग्रथ का दर्जा दिया जाना चाहिये ? यह बहुत बड़ा प्रश्‍न है किन्‍तु उठना वाजिब है। इस पुस्‍तक का उपरोक्‍त भाग पढ़कर यही लग रहा है कि इसमें धर्म की बात न होकर अंतकवादी हमले का प्रशिक्षण दिया जा रहा हो। जहाँ मूर्तिपूजक मिले उनका कत्‍ल कर दो, घात लगा कर बैठो, यदि तौबा कर छोड़ दो। अल्‍लाह अपने भक्‍तो को आतंकवादी प्रशिक्षण दे रहा है, दूसरी ओर भक्तो के आंतक से जो लोग इस्‍लाम कुबूल कर ले तो अल्‍लाह क्षमाशील हो जाता है, दयावान हो जाता है। क्‍या इस तरह भटकाओ का रास्‍ता बताना ही धर्म का मार्ग है ? 
 
धर्म की सही व्‍याख्‍या करते हुये ईशोपनिषत् मे लिखा गया है- 
ॐ ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । 
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥
 
अर्थात- अखिल विश्‍व मे जो कुछ भी गतिशील अर्थात चर अचर पदार्थ है, उन सब मे ईश्‍वर अपनी गतिशीलता के साथ व्‍याप्‍त है उस ईश्‍वर से सम्‍पन्‍न होते हुये से तुम त्‍याग भावना पूर्वक भोग करो। आसक्‍त मत हो कि धन अथवा भोग्‍य पदार्थ किसके है अथार्थ किसी के भी नही है ? अत: किसी अन्‍य के धन का लोभ मत करो क्‍योकि सभी वस्‍तुऐ ईश्‍वर की है। तुम्‍हारा क्‍या है क्‍या लाये थे और क्‍या ले जाओगे।
 
हिन्‍दु धर्म कभी किसी से नही कहता कि भगवान को न मानने वाले के साथ मार-काट करो हमारे भगवान तो-
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥
- की भावना में ही खुश रहता है। लाख कोई इस्‍लाम की पैरवी कर ले किन्‍तु जब तक भाव में आतंक का पर्याय समाप्‍त नही होगा, हिन्‍दु व अन्‍य धर्मो को गाली देने से अल्‍लाह तो खुश होगा किन्‍तु जनमानस नही खुश होगा। जैसा कि कुछ नुमाईदें कर रहे है। इस्‍लाम में अपनी कुछ अच्‍छाईयाँ है उसे हिन्‍दू समाज कभी अपनाने/मानने से पीछे नही हटा किन्‍तु दुनिया भी की दकियानूसी सोच को पाले रहने से इस्‍लाम का भला कर सकते हो तो करो किन्‍तु किसी अन्‍य धर्म को गलत शिद्ध करना ठीक नही।


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43 comments:

Anonymous said...

आपकी बातें सत्य है बंधू ....

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...
This comment has been removed by the author.
Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

सलीम खान को बहुत समझाया की भाई आप हन्दू धर्म ग्रंथों का अपमान बंद करो ... वो सुनते ही नहीं .... शायद आपका तरिका ही सही है की उनके कुरान से ही आयत निकाल कर सलीम खान और उमर को बताया जाए की देखो कुरान मैं क्या लिखा है ....

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

कूली फिल्म के शक्तिकपूर, पोस्ट किया तो कब किया जिसका जवाब मैंने महीनों पहले ही लिख दिया है. पढ़ लेना नीचे लिखा है. तुम और तुम जैसे और लोग जिनमें अरुण शौरी भी शामिल है. कुर-आन की जिस आयत का जिक्र करते हो उससे पहले या आड़ की आयत में तुम जैसों की बीमारी का हल है ज़रा गौर से पढो. यह आयत सुरह तौबा की है जिसमें (जब मक्का के लोगों ने हज़रत मुहम्मद सल्ल० से की गयी संधि को एक तरफा विच्छेद कर दिया था, तो) अल्लाह सुबहान व तआला फरमाता है.

सुरह-तौबा की आयत संख्या पांच (5) से पहले की कुछ आयतों में शांति और समाधान की चर्चा है और शांति संधि का पालन न करने पर अल्लाह ने बहुदेववादियों को चार महीने की चेतावनी देता है और फिर उसके बाद का यह आदेश उस युद्धरत सेना के लिए है कि उन्हें अर्थात मक्का के मुश्रिकीन को क़त्ल करो उन्हें मारो. कुर'आन की इस आयत का आगाज़ इसलिए हुआ क्यूंकि युद्ध में मुस्लिम अपने दुश्मन को जहाँ पाए वहां मारे और यह स्वाभाविक ही है कि कोई भी आर्मी जनरल अपनी सेना का हौसला बढ़ाता है और कहता है कि "डरना नहीं, बिलकुल भी, और अपने दुश्मन के छक्के छुड़ा दो. उन्हें युद्ध में जहाँ पाओ मरो और उसका वध कर दो.

अरुण शौरी अपनी किताब "The World of Fatwas" में जब कुर'आन की सुरह तौबा के पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का ज़िक्र करता है तो वह तुंरत ही पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) से सातवीं आयत (श्लोक संख्या 7) में कूद कर जाता है. कोई भी तार्किक व्यक्ति जब कुर'आन को पढेगा तो उसे पता चल जायेगा कि पांचवी आयत (श्लोक संख्या 5) का जवाब छठी आयत (श्लोक संख्या 6) में है.

अगर आप कुर'आन में पढेंगे तो आपको यह श्लोक मिलेगा मगर वे लोग (अरुण शौरी जैसे लोग) श्लोक को 'आउट ऑफ़ कांटेक्स्ट' करके व्याख्यांवित करते हैं मगर आप फ़ौरन ही इस आयत के बाद पढेंगे तो मिलेगा कि “If any amongst the Mushriks (i.e. the enemies)ask thee for asylum, grant it to him so that he may hear the word of Allah and then escort him to where he can be secure”. (Al Qur’an 9:6)

अर्थात "और यदि मुश्रीकों में से कोई तुमसे शरण मांगे तो तुम उसे शरण दे दो. यहाँ तक कि वे अल्लाह की वाणी सुन लें. फिर उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो क्यूंकि वे ऐसे लोग लोग है जिन्हें ज्ञान नहीं."

आज दुनियाँ का कौन सा आर्मी जनरल होगा जो अपने सैनिकों से कहेगा कि अपने दुश्मन को जाने दो. लेकिन अल्लाह सुबहान व त-आला अपनी किताब अल-कुर'आन में फरमाता है कि अगर तुम्हारा दुश्मन शान्ति चाहता है तो न सिर्फ शान्ति करो बल्कि उन्हें उनके सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दो. आज और इतहास का कौन सा ऐसा आर्मी जनरल होगा जिसने इस तरह का दयालुता से परिपूर्ण आदेश दिया होगा. अब अरुण शौरी से कोई ये पूछेगा कि उन्होंने अपनी किताब में जानबूझ कर आयत संख्या 6 का ज़िक्र क्यूँ नहीं किया?

जिहाद (अर्थात संघर्ष) का ज़िक्र भगवत गीता में
सभी मुख्य धर्म ने अपने यह आदेश दिया है कि अच्छे कार्य के लिए संघर्ष करो. यह भगवत गीता में भी लिखा है. “Therefore strive for Yoga, O Arjuna, which is the art of all work.” (Bhagavad Gita 2:50) लड़ाई-मारपीट (युद्ध) का ज़िक्र भगवत गीता में भी लिखा है:

महाभारत एक महाकाव्य है और हिन्दू धर्म में सबसे ज़्यादा पवित्र और मान्य है, जिसमें वर्णन है मुख्यतः दो रिश्तेदारों (cousins) के आपस में हुई लड़ाई का, वे रिश्तेदार थे कौरव और पांडव. भगवत गीता, महाभारत के अध्याय 25 से अध्याय 42 तक के 18 अध्याय को ही कहते हैं. इसमें 700 श्लोक हैं. जब अर्जुन युद्ध के मैदान में लड़ने से मना करते हैं और अपने ही रिश्तेदारों को युद्घ क्षेत्र में देखते है तो उनकी अंतरात्मा बोझिल हो जाती है और वे रिश्तेदारों की हत्या के विचार से विरक्त हो जाते हैं. और अपना हथियार ज़मीन पर रख देते हैं. उस क्षण में श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध के मैदान में ही सलाह देते हैं. वही पूरी की पूरी सलाह का रूप है 'भगवत गीता'. भगवत गीता की कई आयतों में श्री कृष्ण, अर्जुन को अपने दुश्मन से लड़ने और उन्हें मारने के लिए आदेश और सलाह देतें हैं, चाहे दुश्मन उनके रिश्तेदार ही क्यूँ न हो?

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

To know about this subject please read my article below

http://swachchhsandesh.blogspot.com/2009/08/jihad-in-bhagwat-geeta_18.html

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

दो बातें तुम और सारे ब्लोगर समझ लें यह कुरान नहीं है कुरआन है और यह मुस्लिम धर्म नहीं हैं, इस्लाम धर्म है.

Alok Nandan said...

कुरान में बहुत सारी आयतें है जो आदमी को हिंसा के लिए प्रेरित करती है...इस्लमाम की सबसे बड़ी गड़बड़ी यह है कि इसका ढक्कन पूरी तरह से बंद है...अब रसूल और मोहम्मद के बीच क्या बात हुई वे ही जाने....मोहम्मद अपने एक खास परिस्थिति में लोगों को तमीज सीखा रहे थे, लेकिन उन्होंने सबसे बड़ी गलती यह कर दी खुद को अंतिम पैंगमबर करार दे दिया...और इसके साथ ही इस्लाम का ढक्कन बंद हो गया...इस्लमाम के तहत इन्ट्रोस्पेक्शन की तो पूरी गुंजाईश है लेकिन ईश्वर के खिलाफत जाने की नहीं...ईश्वर के खिलाफ जाने पर लोग पत्थर लेकर दौड़ पड़ते हैं। यदि पकड़ में आ गये तो मार डालेंगे और यदि उनकी पहुंच से दूर है तो फिर ईश निंद करने का फतवा जारी करेंगे...हालांकि इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस्लाम एक व्यापक विजन है और इस विजन को स्थापित करने का मैकेनिज्म क्रूरता की हदो को पार करता है...इस्लमाम मूसा के अज्ञात ईश्वर का ही विस्तार है। मिस्र से जिस आबादी को निकाल कर मूसा ने भटकते हुये उस आबादी को नियंत्रित करने लिए अपने ईश्वर का हवाला देकर जो नियम कानून बनाये थे उसी आगे चलकर मोहम्मद ने अपने तरीके से इस्तेमाल किया। दूसरी सभ्यताओं को डिसट्रक्ट करने का जज्बा प्रारंभिक दौर में इस्लाम के विस्तार का कारण बना। कुछ अच्छे सेना नायकों ने इस्लमाम के नाम पर चारों तरफ गदर मचाया...लूटपाट, कत्लेआम तो किया ही...लेकिन बूतपरस्ती के खिलाफ अभियान को ज्यादा तरजीह दी...अब सभ्यता कई डग भर चुका है...लेकिन इस्लमा की खोपड़ी पर आज भी ढक्कन लगा हुआ है। इस्लाम के अंदर व्यवस्था बनाये रखने के लिये कुछ कानून बेहतरीन है, लेकिन यह भी सच है कि इस्लाम की शुरुआत यकीन से होता है...और यकीन को आप किसी वैज्ञानिक फारमेट पर नहीं कस सकते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वाह!अच्छी बहस है। यदि खिलाड़ी खेल के नियमों का उल्लंघन न करें, फाउल न खेलें (एक दूसरे को और उन के विश्वासों को ठेस न पहुँचाएँ, अपमानित न करें) तो यह वह खेल है जिस में खेल-खेल में इंसान सीखता है।

एक बात और। सही और अच्छी बात तुरंत नहीं मान ली जाती है। उस पर बहुत मनन करना होता है तब इंसान मानने को तैयार होता है। वह भी पहले मन ही मन मानता है। उसे प्रकट करने में बहुत देर लगती है।

Mohammed Umar Kairanvi said...

'वेद द्वेषियों को नष्‍ट कर दो' ऐसा आपके ग्रंथों में मिलता है परन्‍तु हमने कभी नहीं कहा वह इस लिये कि इसके आगे क्‍या है पीछे क्‍या है वह भी हम जानते हैं, अन्‍यथा इसका अर्थ यह लेलो कि हिन्‍दूओं के अलावा सब सरदार,यहूदी,इसाई आदि आदि को नष्‍ट कर दो,
कुरआन की बातों का जवाब अगले कमेटस में

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

आलोक नन्दन जी ने बहुत सटीक लिखा!

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ सलीम साहब आप जवाब दे चुके, यह अगला उससे अगला सवाल उठा लायेंगे क्‍यूं ना इनके मुह पर ऐसे जवाबों की किताब मार दी जाये, किसी सवाल का जवाब ना मिले तो इस किताब को देख लें,

इस पुस्‍तक में ''जिहाद या फसाद'' से संबन्धित सारे सवालों के लाजवाब कर देने वाले उत्‍तर हैं,

यह इस्‍लाम का जवाब है डा. अनूप गौड द्वारा लिखित पुस्‍तक ''क्‍या हिन्‍दुत्‍व का सूर्य डूब जाएगा'' --को, जो जागृति प्रकाशन हरिद्वार, उत्‍तरांचल और ''विश्‍व संवाद केन्‍द्र'' लखनऊ के सहयोग से छपी थी का डा. मुहम्‍मदद असलम कासमी का जवाब है, कासमी साहब मधोक जी को भी जवाब दे चुके, आप दर्जनों पुस्‍तकों के लेखक हैं, मुझे बेहद पसंद आये आपके जवाब, आशा करता हूं यह किताब बहुत पसंद की जायेगी,
डायरेक्‍ट लिंक

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ राकेश सिंह कैरानवी ने कह रखा है यह उसका इस्‍लाम का बचाव है, कभी अटेक किया जैसे तुम कर रहे हो तुम तो विदेश में गोरियों में दिल बहला लोगे इधर के हिन्‍दू भाई दुखी हो जायेंगे, जिन लोगों से सवाल उठाकर ला रहे हो उन तक हमारे जवाब भी पहुचा दो,

scribd.com द्वारा अपनी हाटलिस्‍ट में शुमार कर ली गई कैरानवी की प्रस्‍तुत बुक
"पुस्‍तकः एक पत्र 'बलराज मधोक' के नाम ek-patra-balraj-madhok-ke-nam-hindi-book"
भारतीय हिन्‍दुत्‍ववादी संगठन आर. आर. एस. के भूतपूर्व प्रचारक ''बलराज मधोक' की पुस्‍तक ''विश्‍वव्‍यापी मुस्लिम समस्‍याएं'' का जवाब
डायरेक्‍ट लिंक

लीमस नाख said...

असली दिक्कत यह नहीं है कि क्या लिखा है, दिक्कत यह है कि उसका मतलब क्या निकाला जाता है और मानने वाले क्या मानते हैं. इस तरह की बकवास कई धर्मग्रंथों में मिल जायेगी, आखिर मरने मारने का खेल न हो तो धर्म का प्रसार कैसे हो?

इस्लाम धर्म और कुरआन में निहित गलत बातों का प्रसार का जिम्मा खुद कुछ जाने-माने मुल्लाओं ने उठाया हुआ है. जब कोई बेवकूफ यह कहता है कि 'हर मुस्लिम को आतंकवादी होना चाहिये' और एक बहुत बड़ी संख्या आ के हांजी-हांजी करते हैं तो धर्मग्रंथ तक जाने कि जहमत ही क्यों उठायें, कट्टरता तो पहले ही जाहिर है.

कम से कम हिन्दू इतना तो मानते हैं कि कोई भी पर्फेक्ट नहीं होता. इसलिये यहां पर भगवान और खुदाई पर भी सवाल उठाने की आजादी है. हिन्दू धर्म में जो कुरीतियां है वो तो दूर होने की राह पर हैं, लेकिन कुछ धर्म के लोग अपने धर्म की दुनिया 1200 साल पहले के विश्व में ही ढूंढ़्ते हैं.

दुनिया चांद पर पहुंच गई है और बुर्के के लिये आंसू बह रहे है. थोड़ा अपने गिरेबान में झांक लिया जाये तो शर्म आयेगी उस पाशविक प्रवृत्ति पर जो बिना बुर्के की औरतों को सस्ता शिकार समझती है.

किसी भी धर्मग्रंथ में लिखी इस तरह की बकवास पर न ही ध्यान दें तो बेहतर है.

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ सलीम साहब मैं आजकल जहां हूं वहां लाइट का कोई भरोसा नहीं, इस लिये आप संभालो यह किताबें हिन्‍दी वालों को क्‍यामत तक मुंह तोड जवाब दे सकेंगी, इन्‍ाके अध्‍ययन की सभी को आवश्‍यकता है, इनको इस लिये कि देख लिया करें कि किसका जवाब हमें नहीं मिला है,आपको इस लिये कि हम नाम के मौलाना हैं असल मौलाना तो नमाज रोजे में लगे हुये हैं हमारे लिये दुआ कर रहे हैं,
और आप इनसे ऐसे सवाल कभी ना करना दिल दुखेगा कि बताओ 'भविष्‍य पुराण' का लेखक कौन है? राकेश सिंह से तो कतई ना करना अन्‍यथा वह इधर आयेगा ही नहीं,

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

अलोक नंदन जी आप अपने ज्ञान में इजाफा कर लें की मुहम्मद (सल्ल०) ही रसूल है और मुहम्मद (सल्ल०) और अल्लाह के बीच जो बातें होती थी वह कई ज़रिये से होती थी. इस पर लिखने लगूंगा तो पोस्ट कम पड़ जायेगी.

और ज्ञानदत्त जी आप भी न बिना, ज्ञान के सहमत सहमत लिख देते हो. अरे अपने ज्ञान का चक्षु खोलिए फिर पढिये और वह भ बिना पूर्वाग्रह के. इस लेख का जवाब मैंने कई महीने पहले अपने ब्लॉग पर दे दिया था यह सवाल नया नहीं है अक्सर नॉन-मुस्लिम त्यः सवाल करते हैं जिसका माकूल जवाब बहुत पहले ही दे हिय गया है.

KMMishra said...

भाई लोगों कीचड़ साफ कर रहे हो कि कीचड़ से होली खेल रहे हो ।

Poorn Shakti said...

Bhai ye nahi manne wale....

.... har shlok apne aap mai poora hota hai....
to paanchven aur saatwein shlokon ka alag alag arth hi to nikla na?
isko 6th wale se jod ke kyun dekh rahe hain....

...aur chalo jod bhi liya to kya uska arth change ho jaiyega..

....Aur jahan tak shrimadbhagvatgita main arjun ko diye gaye updesh ki baat hai to usmein kahin bhi yudh karo ka pratyaksh gyan nahi diya hai...
kewal kaha hai ki apna karm karo///jo ki kshtriya ka yudh karan hai// swach sandesh ji kya aap jaane hai ki aaj bhi log apne jawan baccho ko gita padhen nahi dete kyunki usse yudh to door aur maya moh se bhi vrikti hone lagti hai.
Kya aapne padhi hai?
Padhi hai matlab manan kiya hai uska....

...mujhe ye kehne main katai sankooch nahi hai ki agarmain kisi aur dharm ka anuyayi bhi hota to bhi geeta ko padh ke main hindu dharm grahan kar leta.
Kuch aisi ojaswai hai uski bhasha...
bavzood iske ki main ye nahi jaanta ki shrikrishn wakai exists karte hain ya nahi...
...par us nirakaar ko paane ka raasta (yakeen maniyea) kewal hindu dharmon ke grantho main hi paya hai maine.

Divya Shakti said...

ye dharm hai ki kasai khana, jaha aadmi ko aadmi nahi samjha jata, ye log satyathprakash par ban ki baat karte hai pahle Kuran par bani kyo nahi lagvate?

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

आदरणीय हिन्दू और मुसलमान बंधुओ (अब नाम इस लिए नहीं ले रहा की आप ने अपने आप को यही तक बाँध लिया है )पिछले लगभग एक महीने से मै ब्लॉग पर देख रहा हूँ कभी आप उनकी टांग खीचते है और कभी वो आप की सहारा लेते है धर्म ग्रंथो का (क्यों की अपनी बात जो साबित करनी है और धर्म ग्रंथो से बे सारी चीजे जो उनके फायदे की होती है खीच लाते है उसके आगे क्या है , या उसके पीछे क्या है उसे पढ़ते हुए भी अनजान बनजाते हो आप लोग , अरे भाई यो हिन्दू और मुसलमान नहीं एक आम आदमी की तरह मनुष्य होकर सोचो फिर सब आप का है और आप सब के है
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

Chandan said...

100 % Agree With You and your article and you also forget to add Lots of AYAT which are ordering for Jihad

I am First time come on your Blog and I Like your Blog

Best of Luck For Your New Article

Alok Nandan said...

स्वच्छ हिंदोस्तान---थोड़ी देर के लिए मैं आपके मुताबिक अपने ज्ञान में इजाफा करते हुये यह मान लेता हूं कि मोहम्मद और रसूल एक ही थे..यदि ऐसा है तो यह और भी भरमाने वाली बाते हैं...एक व्यक्ति का मानसिक स्थिति कब क्या होगा कोई नहीं जानता...अकेले में व्यक्ति खुद से बातें करने लगता है...और खुद से लगातार बाते करते करते वह फिर पेड़ पौधों और पत्थरों और परछाइयों तक से बाते करने लगता है...इस मानसिक स्थिति को समझने के लिए आपको मनोविज्ञान का सहारा लेना होगा...अब मोहम्मद साहेब या रसूल (हालांकि अभी भी मेरी जानकारी यही है कि रसूल वह आकृति था जो मोहम्मद को दिखाई दिया था, और पहली बार उसकी उपस्थिति का अहसास करके मोहम्मद डर गये थे, बाद में उनकी पत्नी ने उन्हें समझाया था कि उस आकृति से डरने की जरूरत नहीं है, उसकी बातों को सुनो।) अपने व्यक्तित्व के रिफलेक्शन से विभम्र का शिकार हो गये इसका यह मतलब नहीं है कि पूरी प्रजाति को ही हमेशा के लिए विभम्र की स्थिति में डाल दे। किताबो के सड़े माल को इधर से उधर पटकने से कुछ नहीं होता...असल चीज है अंतरदृष्टि...जरूरी नहीं है कि दुनिया भर की किताबो को आप रट मारे तो आपकी अंतरदृष्टि खुल ही जाये...जो किताब शुरु होने के पहले ही विश्वास और यकीन की बात करता है वह किताब कभी भी मानव के साथ डग नहीं भर सकता है...वैसे तिलस्म और विभम्र की दुनिया में ले जाने के लिए खत्री साहेब की किताब ज्यादा बेहतर है...वैसे वैताल पच्चीसी की कहानियां भी रोचक है...नई दुनिया का तकाजा यह है कि किताबों की बदबू से दिमाग को बचाना...पढ़िये खूब पढ़िये और लोगों को पढ़ने के लिए उकसाइये भी लेकिन पढ़ाई का मतलब यह नहीं है कि ठोक पीट करके दिमाग को किताब के साइज में ला दिया जाये...यदि वाकई में जनमानस के दिमाग में सरसराहट पैदा करना है तो किताबों से इतर कोई नहीं बात कीजिये...किताबों की उल्टी करके संडाध फैलाने से हर जगह लोगों का दम ही घुटेगा...दुनिया का कोई भी किताब अंतिम सच नहीं हो सकता....

SALEEM AKHTER SIDDIQUI said...

yebematlab kee bahas hai. isse bachen.

Arvind Mishra said...

Islam is an archaic religion full of revenge and enmity-it would destroy whole world and also itself if not suitably reformed or banned all over the world without much delay ! Its against humanity !

प्रवीण शाह said...

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@ आलोक नंदन,

"असल चीज है अंतरदृष्टि...जरूरी नहीं है कि दुनिया भर की किताबो को आप रट मारे तो आपकी अंतरदृष्टि खुल ही जाये...जो किताब शुरु होने के पहले ही विश्वास और यकीन की बात करता है वह किताब कभी भी मानव के साथ डग नहीं भर सकता है...पढ़िये खूब पढ़िये और लोगों को पढ़ने के लिए उकसाइये भी लेकिन पढ़ाई का मतलब यह नहीं है कि ठोक पीट करके दिमाग को किताब के साइज में ला दिया जाये...यदि वाकई में जनमानस के दिमाग में सरसराहट पैदा करना है तो किताबों से इतर कोई नयी बात कीजिये...किताबों की उल्टी करके संडाध फैलाने से हर जगह लोगों का दम ही घुटेगा...दुनिया का कोई भी किताब अंतिम सच नहीं हो सकता...."

क्या खूब कहा है मित्र! आपसे असहमत तो हुआ ही नहीं जा सकता...

पर न तो साफसफाई वाले दोस्त इसे समझ पायेंगे और न ही महाशक्तिवान बंधु...लड़ने दीजिये...अच्छा टाईम पास हो जाता है...

मुनीश ( munish ) said...

Debate--USELESS

THIS POST--BIG EYE OPENER

Mithilesh dubey said...

भाई मेरा तो यहीं कहना है कि किसी भी धर्म को लेकर बात करना ही बेकार है। क्यों कि जहाँ तक मुझे लगता है कि ये एक ऐसा मुद्दा है जिसका कोई तूक नहीं है हाँ बहस के मायने से सही है।

जहान said...

mera manna hai ke kisi bhi dharm ke bare mai jab tak theek se puri jankari na ho tab tak us par koi bhi tippani krna sahi nahi hai, hamain koi hak nahi hai ke han kisi ki dharmik bhavnao ko thes pahuchayen main' hindustan ki aawaz" se puri tarah sehmat hun aur logo se guzarish karti bhun ke bina jane kisi bhi mazhar ke bare mai likh kar "arun shori " ki tarah ya "tasleema nasreen" ki tarah adhkachra guan na batain koi bhi mazhab manavta ka dushman nahi hai balki hamain manavta sikhata hai.

shadab said...

Jab tak sahi baat ka gyaan na ho,sirf dusre ko nicha dikhane ke liye us par tohmat nahi lagani chahiye,aap pehle islam ke baare main study karen,aap ko jawab khud mil jaayega, magar shart hai ki aapki niyat saaf ho...baqi aap khud samajdar hain.....

अभिषेक ओझा said...

अरे यार काहे परेशान हो रहे हो लो फिल्म देखो: http://www.break.com/usercontent/2008/4/Fitna-New-English-Version-485249.html

अनुनाद सिंह said...

मोहम्मद, कुरान एवं आतंकवाद के विषय में वैज्ञानिक एवं तर्कपूर्ण जानकारी के लिये निम्नलिखित साइट पर भरपूर सामग्री दी गयी है-

फेदफ्रीडम_डॉट_आर्ग
http://www.faithfreedom.org/category/articles/islam/

मुनीश ( munish ) said...

@अनुनाद सिंह said..
Thanks Anunad ,it is really a very new kind of site.

अनुनाद सिंह said...

मैं कल 'वैशेषिक दर्शन' पढ़ रहा था। इसका आरम्भ इस प्रकार होता है-

अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः । वैशेषिक-१,१.१ ।
(धर्म की व्याख्या का शुभारम्भ कर रहे हैं)

यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः । वैशेषिक-१,१.२ ।
(जिससे अभ्युदय और मोक्ष की प्राप्ति हो वह धर्म है।)


इसके बाद एक के बाद एक सूत्र आते हैं और लगता है कि कोई रसायन-शास्त्र का आधुनिक काल में वर्णन कर रहा है। द्रव्य क्या है, गुण क्या हैं? कर्म क्या है? रस, गन्ध, स्पर्श आदि की बहुविधि विश्लेषण है। द्रव्य के लक्षण क्या हैं? आदि की विशद चर्चा है। लेकिन आश्चर्य यह है कि पूरी पुस्तक में शायद कहीं भी ईश्वर/भगवान का कहीं उल्लेख नहीं है। 'मजहब' या पन्थ या संकीर्णता का इसमें आगे कहीं अता-पता नहीं है। पूरी पुस्तक में 'धर्म' के नाम पर केवल द्रव्य, अद्रव्य, कर्म, गुण, कार्य आदि का ही वर्णन है। इतना सेक्युलर है यह धर्मशास्त्र। इसी प्रकार न्यायदर्शन और योगदर्शन का भी हाल है।

दूसरी तरफ कुरान है। इसमें हर दूसरे वाक्य में अल्लाह लोगों को डरा-धमका रहा है; ठीक वैसे ही जैसे लोग अपने बच्चों को 'भूत' से डराते हैं। मुहम्मद को अन्तिम रसूल घोषित करके तर्क-वितर्क के दरवाजे बन्द कर दिये हैं। दिमाग को पंगु बनाने का इंजेक्शन दे दिया। बात-बात पर मुहम्मद को न मानने वालों से घृणा करने, कत्ल करने, लूटने, घात लगाकर हमला करने आदि की 'शिक्षा' है।

पूरी पुस्तक में कोई क्रम नहीं है। भाषा-शैली अत्यन्त आदिम प्रकार की है। पूरी पुस्तक में संकीर्ण सोच का बोलबाला है। यह हालत तब है जब यह पुस्तक काफी बाद में लिखी गयी। जबकि सनातन धर्म के ग्रन्थ इतने पुराने तो हैं ही जब मानवता अपना आरम्भिक स्वरूप ग्रहण कर रही थी। कितना भारी अन्तर है।

मैने कैरान्वी को चुनौती दी थी कि कुरान से केवल पाँच सुभाषित बता दो जिनको किसी विद्वानों की मण्डली में सुनाया जा सके और जिसको सुनकर लोगों के दिमाग ताजगी से भर जाय। किन्तु दुख की बात है कि वे आज तक बहाना बनाकर भागे जा रहे हैं।

Mohammed Umar Kairanvi said...

ऐ नाम की महाशक्ति यह आयत एक खास मौके के लिये खास फरमान है, तुम्‍हें जवाब दिये नहीं माने, दूसरी बात मैंने तुम्‍हें कहा था कि तुममें अगर शक्ति है तो मेरा प्रचार लिंक झेल के दिखओ,तुमने हटा के साबित कर दिया कि तुम में शक्ति नहीं है, अगर हटाओगे तो होसकता है यह हो जाये कि बस दिन भर तुम इसे हटाते रहा करो,

signature:
कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि (इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
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6 अल्‍लाह के चैलेंजसहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
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Mohammed Umar Kairanvi said...

@ अनुनाद सिंह जी, मैंने आपको हमेशा जवाब दिया है या यूं कहो कि केवल में चाणक्‍य प्रतिपादित ही जवाब देसका हूं, पहले भी कहा था मनु ही नूह है अगर मैं जवाब नहीं देपाता तब भी नूह अ. तो जीते,

सभी(मुस्‍लिम) यह कहते हैं मनु तो नूह ही हैं उनसे अच्‍छी बात तुम नहीं लासकते, मेरा सोचना था कुरआन तो उनके भी मालिक का है उसमें इससे अच्‍छा होगा, था मुझे मिला एक आयत में ही काम की बात मिल गई लेकिन मैं अपने महान बनने का मौका नहीं छोडना चाहता, इस लिये सर्वधर्म चैलेंज के रूप में रख दो, फिर मैं ही जवाब दूंगा और ज्ञानी मशहूर हो जाउंगा,
आप मनु मनु बहुत करते हो, एक दो दिन मनु अर्थात नूह पर ऐसी पोस्‍ट लेके आ रहा हूं हिन्‍दी जगत दांतों में उंगली दबालेगा,

Kanvashram.....kotdwara said...

हिन्दू धर्म और हिंदुत्व विश्व की प्राचीन ज्ञान और निष्कर्ष आधारित जीवन पद्धति है जिसका मूल आधार सहिष्णुता, एवं जियो और जीने दो सहित अनेक मानवता एवं प्रकृतिवादी शूत्र हैं.
हिंदुत्व को परिभाषित करने, पड़ने, समझने, और समालोचना का अधिकार प्रत्येक को है चाहे वह हिन्दू है या फिर हिंदुत्व को न् मानने वाले किसी संगठन अथवा सम्प्रदाय से जुदा हुआ हो,
लकिन वो हिंदुत्व और हिन्दुओं से जुड़े किसी धार्मिक ग्रन्थ की आलोचना या अपमानजनक टिपण्णी करने से पहले स्वंय की अपनी विचारधारा के सभी पहलुओं और उसके द्वारा समाज पर हो रहे प्रभावों का गहन अध्ययन करे.
आज भारत माता को डायन कहने वाले आजम खान, हिन्दू देवी देवताओं की अश्लील पंटिंग बनाने वाले मानसिक विकृत मकबूल फ़िदा हुसैन, और अब सलीम खान , उमर, जसे दिग्भ्रमित कठमुल्ला
आधुनिक मुस्लिमो के आदर्श होते जा रहे हैं, शायद वो हिन्दुओं की उदार और सहज अहिंसात्मक प्रवृति का लाभ उठा रहे हैं लकिन शायद वो ये भूल रहे हैं हिन्दुओं ने जब जब भी धर्म और राष्ट्ररक्षा के लिए शस्त्र उठाये तब तब उसने सर्वश्रेष्ठ विजय प्राप्त की है. हिन्दुधर्म के प्रति इस प्रकार के दुराग्रापूर्ण विचार एक और महासंघर्ष का संकेत दे रहे हैं जो किसी भी दशा में मानवता के लिए उचित नही है .
अतः इस्लाम को विनाश से बचाने के लिए इन अंधे और रुढिवादी मुस्लिम कठमुल्लाओं को अपने उलेमों से पूछना चाहिए की कुरान में क्यों इनकी माँ, बहनों, को केवल भोगने और बच्चा पैदा करने वाली वस्तु का दर्जा दिया गया है ....?
आधुनिक और मानवतावादी मुस्लिमो को आम सामूहिक जीवन जीते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ कलाम, परम्वेर्र चक्र विजेता वीर अब्दुल प्रेरणा लेते हुए सभी धर्म, सम्प्रदायों का सम्मान करते हुए जीवन जीना चाहिए .....
RAAJ GAURAV NAUTIYAL
9927500123, KOTDWAR, UTTRANCHAL

सौरभ आत्रेय said...

एक कहावत है "प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या". यहाँ पर प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि कुरान का मंतव्य क्या है और भी इसके अलावा अनेको आयतें हैं इस तरह कि पर तुम कितना भी उनको लिखो या स्कैन करके दिखाओ पर ये लोग नहीं मानेंगे. वैसे स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ ने स्वयं मान लिया है कि मोहमद साहब एक आर्मी जनरल कि तरह था जो युद्घ करने और दूसरो को अल्लाह के नाम पर अतार्किक रूप से या बिना मतलब मारने की आज्ञा देता है पर वो उसकी तुलना गीता से करते हैं और उदाहरण देते हैं ."Therefore strive for Yoga, O Arjuna, which is the art of all work" और इस पंक्ति का अर्थ भी मनमाना करते हैं. सर्वप्रथम मैं ये आपको बता दूं गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को अध्यात्म के साथ अन्याय के विरुद्ध लड़ने कि शिक्षा देते हैं चाहे वो आपका रिश्तेदार ही क्यों न हो तो इसमें गलत क्या है जबकि मोहम्मद साहब अपने अनुयायियों को गैर मुस्लिम लोगो को मारने कि शिक्षा देते हैं चाहे वो निर्दोष हों. यदि वो इस्लाम स्वीकार करलें तो उनको क्षमा किया जा सकता है. अब यहाँ दोनों पुस्तकों का उद्देश्य प्रत्यक्ष है फिर भी ये लोग इसको नहीं स्वीकार करेंगे चाहे हम लोग कितने ही तर्क क्यूँ न देलें. किसी बात का सीधा उत्तर इनके पास होता नहीं तो यहाँ-वहां की गाने लगते हैं और अपनी बात मनवाने के लिए असत्य प्रमाण रखते हैं. इनकी वो दशा है कि "बात करो आम की छेड़े कचनार की". योग का अर्थ है ईश्वर से सयोंग या चित्त वृत्तियों का निरोध जिसके लिए मानव को निरंतर अभ्यासरत रहना चाहिए और ये आसान कार्य नहीं है इसके लिए मानव को अपने आप पर नियंत्रण करते हुए वृत्तियों या विभिन्न उठते विचारों को रोक कर अपने आत्म-स्वरुप में अवस्थित होना होता है -"Therefore strive for Yoga" जोकि सभी कार्यों में सर्वश्रेष्ठ कार्य है -"which is the art of all work" वैसे इंग्लिश में व्याखित इस गीता कि उधृत पंक्ति में कुछ गलती है पर फिर भी ये स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ के मंतव्य को सिद्ध करने में असमर्थ है.
मैं यहाँ एक बात और कहना चाहूँगा कोई भी पुराण हिन्दू , वैदिक या सनातन धर्म की प्रमाणिक मान्य पुस्तक नहीं है इसलिए उनमें लिखित बातों को हिन्दू धर्म के विरुद्ध तर्क में तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता, हमारी सबसे प्रमाणिक पुस्तकें वेद हैं और उनके पश्चात् वेदानुसार ग्रन्थ हैं जैसेकी वर्तमान में उपलब्ध अप्रक्षिप्त -सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन, वेदांत दर्शन और मीमांसा दर्शन, उपनिषद, मनु स्मृति आदि हैं मनुस्मृति या अन्य किसी में जो प्रक्षिप्त या मिलावट के श्लोक हैं उनको छोड़ कर. यदि किसी स्मृति और वेद में किसी सूक्त पर मतभेद दिखाई दे तो वेद की बात मान्य होती है. और इन पुस्तकों में लिखी बातों को कोई असिद्ध नहीं कर सकता क्यूंकि प्रत्येक पुस्तक में सभी बातें तर्क-वितर्क के साथ सप्रमाण रखी गयी हैं और न ही कोई बात मानवता के विरुद्ध है. समस्त जगत और मानवता का कल्याण ही इन पुस्तकों का उद्देश्य है न की किसी सम्प्रदाय विशेष का.

mehta said...

umar or keranvi islam or kuran ko
geeta jeetna pavitr batane ki koshish me lage hai
lekin inhe ye btao bhagwan shree karishn ne geeta me kisi nirdosh ko yudh ke liye badhya nhi kiya
wo ek dharm yudh tha
dharm ki adhrm par jeet thi
or kuran me saf saf likha hai
murti pujko ko chun chun kar marne ka sandesh deti hai kuran

SHANKAR S V said...

हिंदू यानी तेज;हिंसा नही।भगवतगीता मे निरपेक्षता का संदेश हर पन्ने से झलकता है।
सिर्फ वैदिक धर्म मे हि ईश्वर को "निर्भयता" शब्द का उपयोग किया है।इतिहास गवाह है हिंदूओने कभी अन्याय नही किया न वे पहले कभी किसी पे वार नहि करेंगेँ;वो सिर्फ अन्याय का प्रतिकार करेंगे। फिर भी हिंदु धर्म को लोग बदनाम करते है।
हिँदुस्थान में नहि तो हिँदू धर्म और हिंदूओ का आदर कहाँ होगा।जो वेदों को पुरी तरह नही जानता उसे मेरे धर्म पर इल्जाम लगाने का कोई हक नही।

Mishra said...

aaj ke sandarv me ye saari baato ka koi matlab nahi hona chahey.
kaun se dharm pustak me kya likha tha (Jab likha gaya tha us samay baaten kuch aur raha hoga) ab in baato se kya hoga. Ab naya (new) baate hone chahey jo world me hum ek sath santi se rahen.

Anonymous said...

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Anonymous said...

bahaut khubsurat likha hai or ek dum sach...ek baat kahi gayi ki islam ki apni achhaiya hain.. main ye batana chahunga ki wo bhi uski khud ki nahi hain. pagan tradtion se aaya hai n pagan were the idol worshiper.5 time namaz/5 time wrship vedo main bhi hain.. daan, pyase ko pani pilana har chiz or to or macca main karam kand bhi hindu ritiriwa ke mutaabik h jaise sir mundwana aadi.. islam ne to sirf atank diya, masha ahaar diya.. or osama diya.

Anonymous said...

Me do baat karna chahunga
1). Ye sab debate isliye ho rahi he ki aapme se koi bhi sachchaa itihaas nahi janta. In logo ne pure world ko vednaae di he aur aaj bhi de rahe he unko unka khud ka hi majhab rehne dena he aur kisiko jine ka adhikaar nahi he
2). Mene mere kahi muslim friends se suna he ki tum sab kafir log hamaari mut se peda hue ho kya ye baat sach hai?????
Agar ye baat sach he to, ek taraf aap kahate ho ki tum log meadle east se aaye ho aur pehle se aarya log yani hindu log yaha par bhaarat me the to sach kya he??????

Roy vj said...

Bhaiyo jess level pe as log baat kar rahe hai Mai samjh nahi paa raha Hu,

Per ek baat Maine duniya Mai Dekhi hai sikhi hai her Vo group jahe Vo chiti Ho jahe Vo sher Ho insaan Ho,aapni sanskriti apni sanskar se juda hai or usse maan raha hai sab kahe Ki sher ka dharm hai shikar karna aaab maanlo Vo ye dharm chood de tho maar jaayega,issi tarah her community ke ek alag pahchaan hai alag soch hai, jess community ka jitna dimag hai uthani baat karti hai or vesse he karm karti.
Ha per ye baat hai agar koi aadmi mere gate pe talvaar le khada ho or meri family insecure laage tho Maera
dharm taalvaar uthne ke liya maana nqhi Karta haha tak adharm khatam na ho...