इस्‍लाम का संदेश आतंक मचाओ हूर मिलेगी



इस्लाम का इतिहास है कि इस्लाम के जन्म का उदृदेश्य आतंक और सेक्स है यह मेरा कहना नही है किन्‍तु जब इस्‍लाम से सम्‍बन्धित ग्रंथो का आध्‍ययन किया जाये तो प्रत्‍यक्ष रूप ये यह बात सामने आ ही जाती है। कि घूम फिर कर अल्‍लाह को खुश करने के लिये जगह पर आंतक फैलाने और उनके अनुयायियों खुश करने के लिये सेक्‍स की बात खुल कर कही जाती है।
इस्लाम के पवित्र योद्धाओ (आतंकियो) को यौन-सुखों और भोगविलास के असामान्य विशेषाधिकार दिए गए हैं। यदि वे लड़ाई के मैदान में जीवित रह जाते हैं तो उनके लिए गैर-मुसलमानों की स्त्रियाँ रखैलों के रूप में सुनिश्चित हो जाती हैं। लेकिन यदि वे युद्ध के मैदान में मारे जाते हैं तो वे हूरियों से भरे 'जन्नत' के अत्यन्त विलासिता पूर्ण वातावरण में निश्चित रूप से प्रवेश के अधिकारी हो जाते हैं। अल्‍लाह को खुश करने के लिये कई जगह मुर्तिपूजको तथा गैर-मुसलमानों की संहार योजना में भाग लेने के बदले में यौन-सुखों के प्रलोभनों का वायदा किया जाता है जैसे कि -
  1. यदि वह (आतंक फैलाने वाला ) युद्ध भूमि की कठिन परिस्थितियों मारा गया तो उसे 'जन्नत' में उसकी प्रतीक्षा कर रहीं अनेक हूरों के साथ असीमित भोगविलासों एवं यौन-सुखों का आनंद मिलेगा, और यदि वह जीवित बचा रहा तो उसको 'गैर-ईमान वालों' के लूट के माल, जिसमें कि उनकी स्त्रियाँ भी शामिल होंगी, में हिस्सा मिलेगा।
  2. इन आतंकियो को कितनी अच्‍छी तरह से हूरो का लालच दे कर बरगलाया जा रहा है हदीस तिरमिज़ी खंड-2 पृ.(35-40) में दिए गए हूरों के सौंदर्य के वर्णन इस प्रकार है।
  3. हूर एक अत्यधिक सुंदर युवा स्त्री होती है जिसका शरीर पारदर्शी होता है। उसकी हड्डियों में बहने वाला द्रव्य इसी प्रकार दिखाई देता है जैसे रूबी और मोतियों के अंदर की रेखाएँ दिखती हैं। वह एक पारदर्शी सफेद गिलास में लाल शराब की भाँति दिखाई देता है।
  4. उसका रंग सफेद है, और साधारण स्त्रियों की तरह शारीरिक कमियों जैसे मासिक धर्म, रजोनिवृत्ति, मल व मूत्रा विसर्जन, गर्भधारण इत्यादि संबंधित विकारों से मुक्त होती है।
  5. प्रत्येक हूर किशोर वय की कन्या होती है। उसके उरोज उन्नत, गोल और बडे होते हैं जो झुके हुए नहीं हैं। हूरें भव्य परिसरों वाले महलों में रहतीं हैं।
  6. हूर यदि 'जन्नत' में अपने आवास से पृथ्वी की ओर देखे तो सारा मार्ग सुगंधित और प्रकाशित हो जाता है।
  7. हूर का मुख दर्पण से भी अधिाक चमकदार होता है, तथा उसके गाल में कोई भी अपना प्रतिबिंब देख सकता है। उसकी हड्डियों का द्रव्य ऑंखों से दिखाई देता है। प्रत्येक व्यक्ति जो 'जन्नत' में जाता है, उसको 72 हूरें दी जाएँगी। जब वह 'जन्नत' में प्रवेश करता है, मरते समय उसकी उम्र कुछ भी हो, वहाँ तीस वर्ष का युवक हो जाएगा और उसकी आयु आगे नहीं बढ़ेगी।
इस्‍लाम का संदेश आतंक मचाओ हूर मिलेगी

अब भई अब जब हूर इतनी खूब होगीं तो कोई क्‍यो न अल्‍लाह के लिये मरने को तैयार होगा, इन आतंकियो का यही मकसद होता है कि घरती पर उनके विलास के लिये अल्‍लाह द्वारा दिया गया मसौदा तो तैयार ही है और जन्‍नत में भी हूरे उनका इन्‍जार कर रही है। सोने पर सुहागा हदीस तिरमिज़ी खंड-2 (पृ.138) करती है कि ''जन्नत में एक पुरुष को एक सौ पुरुषों के बराबर कामशक्ति दी जाएगी'' :) जैसे जन्‍नत में थोक के भाव वियाग्रा की फैक्‍ट्री लगी है। क्या इसके बाद भी यौन-सुखों के लिए आकर्षित करने वाले प्रलोभनों और प्रमाणों को देने की आवश्यकता रह जाती है जो कि इस्लाम अपने जिहादी योद्धाओ को प्रेरित करने के लिए प्रस्तुत करता है?

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65 comments:

Anonymous said...

यह तो कोक शास्त्र की तरह लग रहा है , भई वाह यह सीरीज जारी रखी जाये :)

Anonymous said...

दूसरों के उकसाने पर आपका यह लिखना मुझे तो अच्छा नहीं लग रहा है. इस तरह एक दूसरे के बारे में लिखने का अन्त क्या होगा? कोई एक धर्म के बारे में गलीज़ बाते लिखे तो यह जरूरी नहीं को दूसरे धर्म वाला व्यक्ति पहले वाले व्यक्ति के धर्म के बारे में ग़लीज बातें लिखने लग जाये... हम इस तरह एक दूसरे की नाक काटने का खेल करने लगेंगे तो सब के सब नकटे ही हो जायेंगे.

प्रेमेन्द्र, क्या हमारे संस्कार यह सब करने की आज्ञा देते हैं?

hindugang said...

भई वाह यह सीरीज जारी रखी जाये

mahashakti said...

@ Anonymous 1 धन्‍यवाद, आपका प्रोत्‍साह काफी है।
@ Anonymous 2 जी, जब भी मुझे कोई प्रमेन्‍द्र को प्रेमेन्‍द्र कहता है तो मुझे बहुत अच्‍छा लगता है। यहाँ मैने किसी को उकसाने के लिये कुछ नही लिखा, मैने पहले ही कहा था कि पहल मेरी तरफ से नही होगी, किन्‍तु जिस प्रकार फिर से पहल की गई वह गलत है, जब आग लगाई है तो धुँवा उठेगा ही और आँख में लगना स्‍वाभाव‍िक है।

@ hindugang जी धन्‍यवाद आपका भी, हम मजबूरी में लिखते है हमारी मंशा किसी का दिल दुखाना नही है।

Anonymous said...

kisi post par ek muhim chaalaye ki jitnae log salim kae blog ko agregator sae hatvana chahtey haen wo sab kamnet mae haami bharey

uskae baad anaam kament band kardae

aur logo ko haa kehnae dae ek baar yae bhi karkae daekhtey haen ki ham hinduo mae taakat haen bhi yaa nahin

aur unkae yahaan nigyog ki jarurat is liyae nahin haen kyuki wo jo kartey haen bazaar mae baeth kar kartey haen

Anonymous said...

hindu gang plz dosto sangthit ho jao................
tumne jo likha wo solah ane such hai bhai,,,,,,,,,
cha gya bos
................ye bechare huro ke liye manav bam ban rhe hai......
............yr tum jo likh rhe ho na mohmmad keranavi hai ek uske blog par kuch asa comment bhejo
.................wo hinduo ko bevkuf banane ki koshish kar rha hai ....................
wo keh rha hai kulki awtar ko allah btata hai
lekin mene comments bheja hai par tum shandar jawab de sakte ho
........................................ek or bat ise jari rahna

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वाह! इस से बढ़िया अनैतिक झाँसा और कहाँ मिलेगा? किसी को मौत के मुहँ में ढकेलने के लिए पर्याप्त है।

Anonymous said...

जन्‍नत में थोक के भाव वियाग्रा की फैक्‍ट्री लगी है

wow!!!
khuda ye kam bhi karta hai?

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

हदीज प्योर फिलासफी नहीं है। इसमे आम आदमी को कंटिया फंसाऊ तरीके से अपने धर्म की ओर मोड़ा जाता है। ऐसे ग्रन्थ सभी धर्मों में हैं।
बाकी, मेरे पीछे लाठी ले मत पड़ जाना - मैं हदीज/कुराअन पर कोई अथॉरिटी नहीं!

Anonymous said...

यार ये धर्म ही लफंगों का है न ही कोई ओर है न ही छोर कब किसकी शादी किससे हो जाये पता ही नही चलता। जितने ग्रंथ उतनी ही विरोध भरी बातें,कोई भी अपने पर कायम नही है।

हैवानो सुधर जाओ अल्‍लाह की वियग्रा पर ज्‍यादा दिन तक भरोसा रखोगे तो न तो तुम लोगो को हूर मिलेगी न ही नूर

अभिषेक ओझा said...

ये 'वाया आगरा' वाली फैक्ट्री में जाने के लिए लोग मरते हैं ! ... वो कहते हैं कि कबूल न करो तो गर्दन काट देंगे करो तो...काट देंगे. उसी तर्ज पे जीयो तो यहाँ मिलेगा मरो तो वाया आगरा फैक्ट्री में जाओगे. वैसे सोचने पर तो कुवां खाई वाली बात है भाई. छोडो भाई लोगों को मेरा जोक बुरा लग गया तो. जोक बनाने के लिए सरदार ही अच्छे हैं.

देवेन्‍द्र प्रताप सिंह said...

एक दिन एक दुकान पर बैठा था, दुकान वाले के पर एक मौलाना समान लेने आये, नमाज़ पढ़ कर आये थे, नमाज की विशेषता बता रहे थे- नमाज़ पढ़ने से जन्‍नत मिलती है, जन्नत में हूरे मिलती है, इनसे सुन्‍दर दुनिया में कुछ नही होता। यह सुन कर दुकान वाले ने सिर खुजलाते हुये पूछा - ''चच्‍चा ई बताओ तुमहू नमाज पढत हौ, चच्‍चीऔ नमाज पढत है, तूमका तो हूर मिलिहै, चच्‍ची का का मिली ?

ये बात सुन कर चच्‍चा लाहौल बिला कुबत कह करते हुये वहाँ से चले गये।

वीरेन्द्र जैन said...

सारे ही धर्म ऐसे ही गलीज़ लालचों से भरे पडे हैं यदि किसी को रुचि है तो हरि मोहन झा की किताब खट्टर काका को पढ ले वह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है और पेपर बैक में भी उपलब्ध है। इसीलिये तो मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है. पर एक धर्म के पापों पर खडे होकर दूसरों की बुराइयों को देखना ही साम्प्रदायिकता है। सारे ही धर्म इसी तरह के पागलपन से भरे हुये हैं

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

परमेन्द्र जी सबसे पहले आपके इस प्रयास को सलाम करता हूँ | आपने बहुत सही ढंग से बात बताई है |

आतंकियों की मुर्खता का क्या क्या कहा जाए, इस धरती के हूर को छोड़ कर जन्नत के हर के पीछे पड़े हैं ...

बहुत बहुत धन्यवाद जारी रखें |

Anonymous said...

premendr ji .........aapne bilkul uchit likha hai.............

carry on............

लाल और बवाल (जुगलबन्दी) said...

हा हा भाई, बहुत ख़ूब।
हमारी तरफ़ से आधा शेर:-
मज़हब ही है सिखाता आपस में बैर रखना।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

हूरों की चाह में लंगूरों जैसी हरकतें :)

राज भाटिय़ा said...

अरे छो्डो यह बाते,अगर एक पागल है तो उस के साथ मत बोलो,लेकिन उस के कारण अपना सुख चेन मत खराब करो , मरने दो उन्हे

AlbelaKhatri.com said...

जन्नत मा बड़ी आग है...............
सोचता हूँ
एक चक्कर लगा ही लूँ वहाँ का
फ़िर सोचता हूँ

ऐसी हूरें किस काम की जिनकी हड्डियों का द्रव और भीतर का अन्य कबाडा बाहर से ही दिखता है

छि :

इस से तो बदनाम बस्ती भली...........

ब्रिगेड said...

ज़नाब ये हालाला क्या है ?

Mohammed Umar Kairanvi said...

अच्‍छा लिखा, जिस किताब से टीप रहे हो वह भी जानता हूं, इसका जवाब कैसे दिया जायेगा, यह तो मैं ही जानूं, मुझे समझने के किया इतना काफी नहीं है कि ब्लागवाणी हर एक को मेम्‍बरशिप देता है 'कैरानवी' को नहीं, फिर भी 2-3 दिन बाद समय निकाल के तुम्‍हारी घुच्‍ची गीली करूंगा इन्‍शा अल्‍लाह (अगर अल्‍लाह ने चाहा तो)

Vishal Mishra said...

ya Allaha, Kuran Me yahi sab likha hai ? Islam Ka Yahi Matlab hai ?

Anonymous said...

@ Mohammed Umar Kairanvi
दूसरी बात किया तुम में वह शक्ति है जो अलबेला जी में है जाखड जी में है कि उन्‍हें मेरे प्रचारलिंक पर आपत्ति नहीं होती, अगर इसे अबकी बार वायरस समझ के हटा दिया तो मैं इसे सुपर वाइरस के रूप में पेश करने की सोच रहा हूं,

अल्‍लाह के बन्‍दे सावधान अभी तक घूम कर पाद रहे थे सब ने बर्दाश्‍त किया अब हग दोगे कि धमकी दे रहे हो यह बिल्‍कुल भी बर्दाश्‍त नही किया जायेगा।

सौरभ आत्रेय said...

वीरेन्द्र जैन जी ने यहाँ कुछ पॉइंट उठाये हैं क्योंकि उनकी तरह कुछ और भी ऐसा लोग सोचेंगे तो मैंने उनकी बातों का उत्तर दिया है..

१.)सारे ही धर्म ऐसे ही गलीज़ लालचों से भरे पडे हैं

वीरेंदर जैन जी पहले तो मैं ये कहना चाहूँगा की धर्म किसी मजहब, रिलिजन आदि का पर्यावाची शब्द नहीं है, धर्म का अर्थ है कर्तव्य अर्थात मानव का कर्तव्य या मानवता, जबकि मजहब, रिलिजन आदि किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाया गया सम्प्रदाय या पंथ या मत है जो उस व्यक्ति की अपनी महत्वाकांक्षा और स्वार्थ को पूर्ण करता है जोकि उनकी पुस्तकों में प्रत्यक्ष दिखाई देता है उसके लिए और किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है . अब यदि धर्म की बात करें तो वो केवल वैदिक,सनातन या हिन्दू धर्म है जिसकी मान्य पुस्तकों में कोई गाली गलोज नहीं है और ना ही किसी का विरोध है. कालांतर में हिन्दू धर्म में भी विभिन्न सम्प्रदाय खड़े हो गए हैं और उनमें एक दुसरे को नीचा भी दिखाया गया है पर उन सम्प्रदायों की पुस्तकें सनातन या हिन्दू धर्म में प्रमाणिक नहीं है. हिन्दू धर्म की सर्व प्रथम प्रमाणिक पुस्तकें वेद हैं और उसके बाद वेदानुसार स्मृतियाँ, यदि स्मृतियों में कोई विरोध भावः दिखाई भी दे उसका निर्णय "प्रत्यक्ष", "अनुमान" और "शब्द" अर्थात वेद ३ प्रमाणों से होता है. किसी पुस्तक के बारे में बिना पढ़े कोई कैसे आरोप लगा सकता है इसका आप मुझे आप उत्तर दीजिये और यदि आपने हिन्दू धर्म की मान्य पुस्तकों में कहीं गाली-गलोज देखा है तो उसको प्रमाणित कीजिये जिस प्रकार प्रमेन्द्र ने यहाँ हदीस में लिखी बातों को प्रमाणित किया है.

२.)यदि किसी को रुचि है तो हरि मोहन झा की किताब खट्टर काका को पढ ले वह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है और पेपर बैक में भी उपलब्ध है।.

ये खट्टर काका कहाँ के विद्वान् पुरुष हैं हमें भी बताओ जो उनकी बातो का आप इतना विश्वास करते हैं. किसी के लिख देने मात्र से कोई सत्य सिद्ध नहीं होता. यदि ऐसा होता तो ये हदीस और कुरान में लिखी बातें भी सच होती.

३.)इसीलिये तो मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है.

मैंने अभी बताया था की धर्म अर्थात मानव कर्तव्य अर्थात मानवता तो क्या वो अफीम के समान है. ये मार्क्सवादी अपने से बुद्धिमान किसी को नहीं समझते और तर्क किसी बात का कभी ढंग से देते नहीं.

४.)पर एक धर्म के पापों पर खडे होकर दूसरों की बुराइयों को देखना ही साम्प्रदायिकता है। सारे ही धर्म इसी तरह के पागलपन से भरे हुये

धर्म कोई पाप नहीं है अधर्म पाप है और सच को सच कहना साम्प्रदायिकता नहीं है बल्कि लोगो की जागरूकता के लिए अति आवश्यक है.

सौरभ आत्रेय said...

Mohammed Umar Kairanvi said...
अच्‍छा लिखा, जिस किताब से टीप रहे हो वह भी जानता हूं, इसका जवाब कैसे दिया जायेगा, यह तो मैं ही जानूं, मुझे समझने के किया इतना काफी नहीं है कि ब्लागवाणी हर एक को मेम्‍बरशिप देता है 'कैरानवी' को नहीं, फिर भी 2-3 दिन बाद समय निकाल के तुम्‍हारी घुच्‍ची गीली करूंगा इन्‍शा अल्‍लाह (अगर अल्‍लाह ने चाहा तो)

उमर कैरान्वी जी प्रमेन्द्र तो आपके मजहब का प्रचार कर रहा है तो इसमें इतनी आपत्ति क्यों हो रही है हो सकता है हूरो के या लूट की स्त्रियों के लालच में कुछ अपना मत बदल कर आपके मजहब में आ जाएँ.

मैंने कई जगह आपकी उलटी-सीधी टिप्पणियां देखी हैं जो आपकी मानसिक स्तिथि को सही बयां नहीं करती. ऐसा लगता है सत्य आपको बौखला देता है और आप अपना-आपा खो बैठते हैं और पता नहीं क्या-२ बड़-बड़ करते हैं.

ये धमकी से काम नहीं चलता है और न ही तुम्हारी इन धमकियों से कोई डरता है. अपनी बातों को तर्क के साथ रखो ख्वामोंखां अपना समय व्यर्थ की बातों में नष्ट मत करो. यदि तुम बुद्धिमान और चरित्रवान हो तो दूसरो की बातों पर भी ध्यान दोगे और विचार करोगे.

मुहम्मद शाहिद said...

शायद मुहम्मद कैरानवी और सलीम खान ने इस्लाम को सही तरीके से समझा ही नहीं । खासतौर पर कुरआन का ज्ञान तो उनका शून्य ही नजर आता है। अगर वे कुरआन को समझे होते तो ना तो दूसरे मजहब के बारे में इतनी हल्की पोस्ट लिखते और ना ही इतनी हल्की टिप्पणियां करते। कुरआन में साफ लिखा है-दूसरे धर्म के पूज्यों को तुम गाली ना दो।
ठण्डे दिमाग से सोचो उमर-सलीम क्या इस्लाम की सोने के समान खरी शिक्षाओं को पेश करने के लिए तुम लोगों का यह घटिया तरीका उचित है? तुम लोग साबित क्या करना चाहते हो?
क्या यही कि इस्लाम की तालीम यह जो तुम अपने व्यवहार से पेश कर रहे हो,वह है? क्या तुमने मुहम्मद सल्ल़ की जीवनी को नहीं पढ़ा? अपने पर कचरा डालने वाली औरत का उस वक्त हाल पूछने जाते हैं जिस दिन वह उन पर कचरा नहीं डालती, उनके चाचा की हत्या कर उनका कलेजा चबाने वाली हिंदा को वे माफ कर देते हैं,मक्का विजय पर उन सभी लोगों को आप सल्ल़ माफ कर देते हैं जिन्होंने आप सल्ल को बेहद यातनाएं दी थी। पत्थर फैंके थे। रास्तों में कांटे बिछा देते थे। सिर पर गंदगी डाल देते थे। उनको मारने के लिए षडय़ंत्र रचते थे। लेकिन मुहम्मद सल्ल़ का व्यवहार उनके साथ बेहद शरीफाना था।
लेकिन तुम दोनों का तरीका? तुम खुद अपने दिमाग से सोचो ?
खुद को और अपने ब्लॉग को चमकाने के लिए सलीम-उमर तुम लोग इस्लाम का इस्तेमाल ना करो और ना ही दूसरे मजहब वालों के पूज्यों को गाली दो।
भाई प्रमेन्द्र जी से तो मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि आप ईमानदारी से अपने दिल से पूछें-क्या वास्तव में इस्लाम ऐसा ही है जैसा आप इसको लोगों के सामने पेश कर रहे हैं? सिर्फ अपनी अंर्तात्मा से जाने कि क्या इस्लाम की सच्चाई यही है?

Anonymous said...

बुरा जो देखन मैं चला,बुरा ना मिल्या कोई
जो दिल ढूँढा, आपना मुझ सा बुरा ना कोई.

ढूँढने जाएँ तो हर धर्म में ऐसा कुछ नज़र आएगा जिस से हम सहमत नहीं हो सकते...मैं एक हिन्दू हूँ पर आपके इस पोस्ट से बेहद व्यथित हूँ...एक ही आग्रह है, आप जोश में होश ना खोएं और इस तरह का वैमनस्य फैलाने की कोशिश ना करें.

निशाचर said...

@ तुम्हारा जायज........
भाई हो सकता है कि कैरानवी की बातों से आपको गुस्सा आ गया हो परन्तु एक सार्वजानिक मंच पर गली-गलौच ठीक नहीं. इसमें किसी की माँ-बहनों को घसीटना भी उचित नहीं है क्योंकि इनके कर्मों के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं. फिर सनातन धर्म तो कहता है "यत्र नार्यस्तु पूज्यते , रमन्ते तत्र देवता" (जहाँ नारी पूज्य है, वहां देवताओं का वास होता है). कृपया आवेश को नियंत्रण में रखें और तर्कों द्वारा इन्हें जवाब दें या फिर इनकी मूर्खतापूर्ण बातों की उपेक्षा करें. गन्दगी की ओर देखकर आप अपनी जबान क्यों गन्दी करते हैं.

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

कूली फिल्म के शक्ति कपूर
जो तुम यहाँ लिख रहे हो, उसका जवाब मैंने पहले ही दे दिया है, मैं यहाँ लिंक नहीं दूंगा क्यूंकि मुझे पता है तुम और तुम जैसे अन्य पूर्वाग्रह से ग्रसित ब्लॉगर मेरी टिपण्णी को डिलीट कर देते हैं. इसलिए मैं यहाँ टिपण्णी में ही लिख रहा हूँ...
(शीर्षक है: जिहाद का आदेश भगवत गीता में भी ! Jihad in Bhagwat Geeta !! )

इस्लाम के आलोचक, खास कर हिन्दू आलोचक यह कहते है कि कुर'आन में यह लिखा है कि अगर आप इस तरह की लडाई-झगडा करते हैं,जिहाद में किसी को मारते हैं (सच्चाई के लिए लड़ते हैं) तो आपको जन्नत की प्राप्ति होती है. वे केवल कुर'आन का ही नहीं, सहीह बुखारी की एक हदीस (पर्व 4, बुक ऑफ़ जिहाद, अध्याय संख्या 2 हदीस संख्या 46) का भी हवाला देते हैं:

"अल्लाह सुबहान व-ताला यह कहते हैं कि अगर कोई जिहाद करने वाला लड़ते लड़ते शहीद हो जाता है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा."

भगवत गीता में भी ऐसी ही आयतों का ज़िक्र है कि अगर आप लड़ते लड़ते मर जाते है तो वह स्वर्ग में जायेगा, और वह लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त करके आता है तो उसे धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा. उदाहरणार्थ आप स्वयं देख सकते है, भगवत गीता अध्याय संख्या 2 श्लोक संख्या 37

"हे कुंती-पुत्र, अगर तुम लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और यदि तुम जीत जाते हो तो इस धरती में तुम्हें शासन मिलेगा (अर्थात धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा), इसलिए उठो और लड़ो..."

इसी तरह का आदेश ऋग्वेद में ( पुस्तक संख्या 1 हिम 132 श्लोक 2-6) भी लिखा है.

अगर कोई इस्लाम से सम्बंधित सवाल करता है, आलोचना करता है तो उसकी ग़लतफ़हमियों को दूर करने का सबसे बेहतर यही है कि तो मैं वही सब बातें उन्हीं की धार्मिक पुस्तकों में से हवाले देकर उन्हें समझाने की कोशिश करता हूँ...

आखिर में मैं यही कहना चाहूँगा कि:
"आओ उस बात की तरफ जो हम में और तुम में यकसां (समान) है" (अल-कुर'आन 3:64)

Anonymous said...

कुरानावी की दुम देख "हे कुंती-पुत्र, अगर तुम लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हे स्वर्ग में स्थान मिलेगा और यदि तुम जीत जाते हो तो इस धरती में तुम्हें शासन मिलेगा (अर्थात धन-धान्य और ऐश्वर्य मिलेगा), इसलिए उठो और लड़ो.. ये लिखा है गीता मै . लेकिन खुदा तो कहता है की वो जन्नत मै हूरो का चकला चला रहा है ये हिन्दू ग्रंथो मै कही नहीं मिलेगा .समझा क्या ? गन्दगी मै लिपटे सूअर ?

Seedhi Soch said...

एक बार अकबर ने महाभारत के फारसी अनुवाद के लिए आगया पारित की. काम पूर्ण हो जाने पर अकबर ने उससे पूछा कि महाभारत में कौन सी ऐसी बात है जिसे तुमने गौर किया हो? उसने कहा-

"महाभारत में एक भी शख्स ऐसा नहीं हो हलाल पैदा हुआ हो!"

उल्‍टी सोच said...

पहले ये तो बताओ हलाला क्‍या है, महाभारत तो कब का खत्‍म हो गया, जबकि हलालातो हर दिन चल रहा है।

Dipak 'Mashal' said...

Saurabh Aatreya aur Mohammad Shahid bhaiyon se sahmat hhoon, Parmendra tum aur logon ki tarah kachche dimag wale mat bano....
aise kaam karke tum apna blog bhale hi chamka lo lekin tumhari baate maan ke agar dono taraf ke kuchh paglon ne dange bhadka diye to ameeron ka to ya blog likhne walon ka to kuchh nahin hoga, marenge gareeb hindoo aur musalmaan bhai aur unke khoon ke chheente tumhare sar hi aayenge....
isliye yaad rakho ki Bharat vishwa guru tumhari jaisi soch aur baton se nahin bana tha. Saleem ji jara fir se padhna ki Geeta me adharm ke liye kab jihad ka awahan kiya gaya hai apne parmatma ke naam par kab kisko marne ki baat ki gayee hai(main yye nahin kah raha ki ye sab pavitra Quran shareef me likha hai) lekin Geeta me jise tum jihaad kah rahe ho wo aisa kuchh nahin hai jo tum samajh rahe ho, tumhari halat us bachche ki tarah hai jo hindi ya english padhna seekh gaya to use lagta hai ki doosri zamaat me hi MSc ki kitaben samajh sakta hai, beshaq wo MSc ki books padh lega lekin samajh nahin sakta wahi tumhare aur tumhare jaise aur logon ke sath hai jo Quran padh lete hain par samajh nahin pate... jo aise granth samajh lete hain wo itni ochhi baten nahin karte aur na hi logon ko jabardasti apne mazhab ki kahaniyan sunate hain, chahe wah kisi bhi dharm se kyon na hon....
isliye sirf ooparwale ko khud ko samarpit karke uska dhyan lagate rahe aur UP me naye dangon ki zameen mat taiyar karo... main Allah, Ishwar jise bhi maante ho uski taraf se hath jodta hoon aman ke liye shanti ke liye... kyonki tumhaye failaye dangon se bachne ke liye gareebon ke liye koi mahfooz jagah nahin hai...
aur ham majboot kamron me akhbar ya net pe khabren padh ke unka dard nahin samajh sakte..

Jai Hind

PD said...

@ सौरभ आत्रेय - हम ज्यादा कुछ तो नहीं जानते हैं मगर 'खट्टर काका' के बारे में जानकारी है.. उनके उस किताब में उन्होंने कही भी अपनी सोच जाहिर नहीं कि है, बल्कि जगह जगह से उदहारण दे कर अन्धविश्वास के खिलाफ लिखा है.. साथ ही कहीं भी हिन्दू धर्म के प्रति अविश्वास भी नहीं जताया है..

SALEEM AKHTER SIDDIQUI said...

kisi dharm ke baare mein itni gandee baaten likhne walon ye baat samjh lo kee SARITA mein sanatan dharm ke baare mein chpta rahta hai. kya use sach maan loon. dhikkar hai un sab logon par jo aisee wahiyat baaten likhkar samaaj ko todne wali baaten likh rahe hain. BLOGGING KARNE SE ACCHA HAI KEE KAHIN JAAKAR BHADWAGIRI KARO.

Anonymous said...

अक्सर इस्लाम कबूल करने वालों का इतिहास देखें तो वह सब अव्वल दर्जे के अय्याश और हरमखोर रहे । कई -२ औरतॊ के ख्याशि रखने वालॊ के लिये इस्लाम से बढिया रास्ता और कौन सा है । पहले भी ऐसे कई रहे और वर्तमान मे भी है ।

दिवाकर मणि said...

प्रमेन्द्र जी.
बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ. आते ही एक नवीन विषय की जानकारी प्राप्त की. आपके आलेख से पूरी तरह सहमत....

vivek said...

dear pramendra ..if someone is using religion to do such things then ...its gud u posted it and let the world read it .
i learned such things from khuswant singhs recent post in newspapers..

but u should b pity on this n try to use ur wisdom in eradicatin such things...
let ur thoughts change the minds of people for gud.
dont leave us in middle of nowhere..i expect u to rise high n use ur intellect to show the word why india is still the vishwaguru!!! god bless you!

मोहन सिंह said...

आपने काफी मेहनत किया है, इनकी औकात बताने के लिये, बहुत कम लोग है जो सच का सामना कर पाते है, आप खुलकर बोल रहे हो, इसके लिये आपको बधाई।

deepak said...

यदि हम धर्म और आतंक की बात करे तो दोनों में ही बहुत ही फर्क होता है ये बात तो हम सब ही जानते धर्म हमको राह दिखाता है और आतंक हमको राह से भटकाता है ... पर मेरा यह मानना है जो आदमी आतंक की राह पर चलता है .... चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो उस आतंकी का कोई धर्म नहीं होता है ....रही बात इस्लाम की व्याख्या करे तो कोई धर्म आतंकी का रास्ता नहीं दिखाता है...बल्कि हम उनको समझने की भूल करते है ... हर एक की व्याख्या करने का नजरिया होता है पर सही व्याख्या उसको कहते है जो एक धर्म को दुसरे धर्म से जोरता है रही बात विलासिता की यह धर्म का हिस्सा नहीं है ... धर्म को तो हम लोगो ने ही अलग हिस्सों में बाँट दिया है.... और अगर हम रीतिकाल की बात करे तो ये समय पूर्ण रूप से विलासिता की ही काल था .... एक योधा जब अपनी वीरता कायम करके दिखता है तो उसके बाद वह विलासिता का भोगी बनता है ... ये सब धर्म नहीं काल की वजह से होता है .... यदि हम राधा और कृष्ण की बात करे तो उस समय उनकी सुन्दरता का वर्णन बहुत अश्लील ढंग से किया गया था उस काल के कवी बिहारीलाल ने अपने काव्य में बहुत बार राधा के अन्तरंग क्षणों का बहुत ही अश्लील वर्णन किया है उस समय का काव्य हमको अश्लील नहीं लगता है क्योंकि वह काल ही विलासिता का काल था और इसी काल का धर्मं पर परभाव परता है यह बात हम सब जानते है यही बात इस्लाम के वचनों की है अगर कोई आतंकी धर्म के नाम पर आतंक करता है पहले ये समझना चाहिये की उस आतंकी का कोई धर्म ही नहीं होता है तो फिर इस्लाम पर ये आरोप कैसा ये बात अलग है की ये लोग ज्यादातर इस्लाम धर्म से होते है बल्कि इन लोगो को गलत शिक्षा दी जाती है जिसे वह इस्लाम धर्म का आदेश मान लेते है कोई भी धर्म किसी धर्म को तोरता नहीं है बल्कि जोरता है में किसी भी धर्म की उल्हाना नहीं कर रहा हूँ सिर्फ यही कहना चाहता हूँ की किसी भी आतंकी को चाहे वह किसी भी देश से क्यों न हो उसको कोई भी धर्म से नहीं जोरा जाए क्योंकि जिस आतंकी का कोई धर्म नहीं होता है फिर उसको धर्म से क्यों जोरते है में किसी भी धर्म के बारे में गलत नहीं कहना नहीं चाहता हूँ बल्कि मेरा मानना है की पहले इंसान ही पैदा होता है फिर उसको धर्म का नाम तय होता है लेकिन हम लोग है जो बच्चे के पैदा होते ही उसको धर्म से जोर देते है और दुसरे धर्म से अलग कर देता है और फिर पैदा हो जाता है दुसरे धर्म का विरोध......

आसिफ said...

यहाँ देरी से पहुँच पाया
खैर अब अपनी ओकात भी देख लो---
हे देवी, (उत्तम गुण वाली),हे अवध्य (न मारने योग्य प्रबल वेद वाणी), तू इसी प्रकार ब्रह्मचारियों के हानिकारक,अपराध करने वाले,विद्वानों को सताने वाले,अदानशील पुरुष के,सैंकड़ों जोडऩे वाले,तीक्ष्ण छुरे की सी धारवाले,वज्र से कन्धों और सिर को तोड़ तोड़ दे। उस वेद विरोधी के लोमों को काट डाल,उसकी खाल उतार ले,उसके मांस के टुकड़ों को बोटी-बोटी कर दे,उसकी नसों को ऐंठ दे,उसकी हड्डियां मसल डाल,उसकी मींग निकाल दे,उसके सब अंगों और जोड़ों को ढीला कर दे
(अथर्ववेद१२:५:६५-७१)
हे,घबराए हुए पीड़ा देने वाले शत्रुओं, बिना सिर वाले सिर कटे सांपों के समान चेष्टा करो। प्रतापी वीर राजा आग्रेय शस्त्रों से घबराए हुए,उन तुम सबों में से अच्छे-अच्छों को चुनकर मारें।
(अथर्ववेद-६:६७:२)
इसका भावार्थ बयान करते हुए वेदों के टीकाकार पण्डित क्षेमकरण दास त्रिवेदी जी लिखते हैं-
कुशल सेनापति इस प्रकार व्यूह रचना करे कि शत्रु के सेना दल विध्वंस होकर घबरा जाएं और उनके बड़े-बड़े नायक मारे जाएं।

पियारूणां प्रजां जहि-
हिंसकों की प्रजा को मार (अथर्ववेद-११:२:२१)

अव ब्रह्मद्विषो जहि-
वेद-द्वेषियों को नष्ट कर दे (अथर्ववेद-२०:९३:१)

सर्व परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम
(अथर्ववेद-२०:७४:७)
हे राजन,प्रत्येक निन्दक कष्ट देने वाले को पहुंच और मार डाल

हे अन्जन, आँख के इशारे से हानि करने वाले,दुष्ट हद्य वाले की पसलियों को तोड़
(अथर्ववेद-१९:४५:१)

हे पार्थ अर्जुन, अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युध्द को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। और यदि तूं इस धर्मयुक्त संग्राम को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करेगा और सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और वह अपकीर्ति माननीय पुरुष के लिए मरण से भी अधिक बुरी होती है।
(श्रीमद्भगवद्गीता-२:३२-३४)

उल्‍टी सोच said...

अरे मौलाना! तुम तो संस्‍कृत उवाच कर रहे हो, तुम तो नापाक हो गये।

आधा अधूरा श्लोक लाकर पंडि़त बनने की कोशिश न करो फतवा जारी हो जायेगा।

RK said...

बजाय पोस्ट में लगाए गए इल्ज़ामात का खंडन करने के, यहाँ यह कहा जा रहा है कि तुम्हारा धर्म कौन सा अच्छा है। यह तो गुनाह कबूल करने के बराबर हो गया। यह तो यूँ हुआ कि चोर पुलिस वाले को कह रहा है कि तुम कौन से ईमानदार हो। ठीक है पुलिस वाला भी भले ही बेईमान हो, पर चोर की चोरी तो तब भी गुनाह ही है न। इस्लाम से डरी हुई दुनिया को यह आश्वासन दिलाए जाने की आवश्यकता है कि कुरआन में वह सब चीज़े नहीं लिखीं जिस का उस पर इलज़ाम लगाया जा रहा है -- उदाहरणतः कहीं पर भी काफिर को मारने की बात नहीं कही गई है। हिन्दू धर्म, ईसाई धर्म की पुस्तकों में भी ऐसी बातें लिखी हैं जिन का कोई तर्क नहीं है। सभी धर्मों की पुस्तकों में कई ऐसी बातें लिखी हैं, जो सरासर ग़लत, और मुजरिमाना है। इस का कारण यह है कि सभी धार्मिक पुस्तकें मनुष्य ने ही लिखी हैं, किसी अन्य समय, स्थान और समाज को ध्यान में रखते हुए। जब हम बिना सोचे समझे उन बातों को किसी और समय, स्थान और समाज पर थोपते हैं तो जंगें शुरू हो जाती हैं। क्या कैरानवी साहब या आसिफ साहब दिल पर हाथ रख कर कह सकते हैं कि कुरआन में जो कुछ लिखा है, सही लिखा है, अच्छा लिखा है? मैं एक हिन्दू होते हुए यह कह सकता हूँ कि हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों में बहुत सी बातें बेबुनियाद हैं। और मुझे लगता है अधिकांश हिन्दू इस बात का समर्थन करेंगे। कोई भी यह नहीं कहेगा कि रामायण या महाभारत की नियमावली आजकल लागू की जाए। समस्या यह है कि इस्लाम के अनुयाइयों में कई लोग ऐसे हैं जो शरियत के लिए आज भी मरने मारने को तैयार हो जाते हैं।कुछ लोग जो उनका समर्थन नहीं करते, डर के मारे बोल नहीं पाते।

tarannum said...

mai ab batau hi kya ki mere dharm me mai kya hu? mere sauhar muhe gali dete hai jab mai sex se man karti hu, mujhe kai baar talak de chuke hai par bhi mujhe chhod nahi hai. muhjhe koi in logo se bachao.

Anonymous said...

Good Research.

relevant and true fact behind
Muslim Terrorism.

Akhilesh Singh said...

Nice Post Dear Brother

नितिन said...

संभोग और प्रचंडता के अलावा कुछ नहीं है कुरान में

vijay kumar sharma said...

aapne yhe kha ped liya ki namazi ke aage se sirf ghda kutta oret ke hi guzrne se vighen pedta he, mere bhai nmazi ke aage se to koi bhi nikle to nmaz me to vighen hi pdega,rhi baat islam ki to is dhrem ko ager aap bina kisi porvagrhe se study kro to tum her baat logic ke saath paoge, aapki trhe phle me bhi islam ka alochk tha or isme kmi niklne ke liye iska addhyen krta tha, phir unhe apne vichro se prkhta tha, anet me mujhe iski mhanta ka bodh hua to mene islam swekaar krne ka nirny liya,bhai yhi stye dhrm he,aap iska or adyen kro mera poorn vishvaas he ki ek din aap bhi ek din klma ped lenge.aap sanjay persaad tirpati ji se bhi prerna le skte he, jo ki ahmed pendit ke naam se lokprye he.

अंकुर श्रीवास्‍तव said...

हमारे यहां इन सब बातो के लिये कामसूत्र है पर इनके यहाँ कुरानसूत्र में सब लिखा है।

बहुत अच्छा लिखा है

Anonymous said...

भई वाह यह सीरीज जारी रखी जाये

Anonymous said...

मुसलमानो को खुदाई से ज्यादा मजा चुदाई मे आता है।

Rohit Singh said...

Nice Article Mr. Singh

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

प्रिय भाई महाशक्ति जी, आपकी लेखनी में शक्ति है, लिखने का सामर्थ्य है, सच बात कहने की हिम्मत है। फिर उसे दूसरों की कमियां दिखाने में क्यों नष्ट कर रहे हैं? आप इस उर्जा को सकारात्मक कामों में लगा सकते हैं, भटके हुओं को राह दिखा सकते हैं। यह नफरत का सिलसिला कभी नहीं खत्म होने वाला। आप कुछ लिखोगा, दूसरा कुछ लिखेगा। एक सलीम खान शान्त हुआ है, दूसरा पैदा हो जाएगा।
चूंकि आप हिन्द युग्म जैसी गरिमामय संस्था से जुडे हुए हैं, इसलिए आपसे कह रहा हूँ। प्लीज़, अब यह सिलसिल बंद करो, यकीन जानो तब मैं भी गर्व से कह सकूंगा कि मैं भी उस हिन्द युग्म परिवार का सदस्य हूँ, जिसमें महाशक्ति जी भी हैं।

पद्म सिंह said...

वाह !
बहुत देर से आया इस ब्लॉग पर. इस पर पोस्ट पर किसी की भावनाओं से खिलवाड़ का आरोप न लगे... ये तो एक तथ्य है जिसे "पवित्र कुरआन" से लिया गया है. कुरआन अभी भी गैर मुस्लिमों में ज्यादा पढ़ी नहीं गयी है. दुनिया में बहुत से धर्म हैं, किन्तु अगर हम ध्यान से वास्तविकता देखें तो ऐसा लगता है कि सारे धर्म एक तरफ और इस्लाम एक तरफ. मुसलमान भाई ये कहते नहीं थकते कि इस्लाम भाईचारा और शांति का मजहब है, पर ये शान्ति और भाईचारा कहाँ है, ये नहीं बताता कोई. मदरसों में क्या पढ़ाया जा रहा है, मस्जिदों की तकरीरों से ज़ेहन में क्या भरा जा रहा है इसे कौन नहीं जानता. इस्लाम अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु नहीं है और कहीं न कहीं आत्ममुग्ध है. ऐसा नहीं कि इनकी सोच में परिवर्तन है हो रहा, या मान्यताओं में टूटन नहीं आ रही, परन्तु जो इन बातों को जानता भी है वो बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है. रही हूरों आदि की बात, तो इस्लाम की ये बातें या ये कहें कि किसी भी धर्म की बातें कहीं न कहीं देश काल से प्रभावित होती हैं. इस्लाम के उदय के समय अरब देश की संस्कृति और उस समय की सामजिक मान्यताओं पर गौर करें तो कुरआन की ये बातें अजीब नहीं लगेंगी, ज़रूरत ये है कि किसी धर्म में इतना तो लचीलापन हो कि समय और स्थान की मांग को देखते हुए धनात्मक परिवर्तन ग्राह्य हो. मै एक दो उदाहरण देना चाहता हूँ जो नियम शायद इसी लिए बनाए गए होंगे .- जैसे ऊंची आस्तीन का पाजामा पहनते हैं, सर पर कपड़ा रखते हैं- अरब की रेत से बचने के लिए, टोंटी वाला लोटा इस्तेमाल करते हैं-पानी का अपव्यय रोकने के लिए, नमाज़ से पहले वुजू करते समय हाथ उल्टा धोते हैं इस से भी पानी कम लगता है क्यों कि अरब देशों में पानी बहुमूल्य है, तो बहुत सी ऐसी बातें है जो देश काल से प्रभावित होती हैं. इनका लचीला न होना ही टूटन की तरफ ले जाता है. कुरआन में साफ़ लिखा है कि खुदा तुम्हें उस बाग में दाखिल करेगा जहां मीठे पानी की दरिया बह रही होगी,अब ये भारत जैसे देश में हो सकता है कोई आकर्षण पैदा न करे पर अरब देशों के लिए पानी बहुमूल्य है. इसी तरह हूरों का लालच दिया जाना भी इसी क्रम में एक और प्रयास है. मेरे किसी मित्र ने तो यह भी बताया था कि ज़न्नत में 'गिलमे'(चिकने खूबसूरत लौंडे) भी मिलते हैं यद्यपि इस पर ग्यानी जन और शौकीन लोग ही प्रकाश डाल सकते हैं. तो ये सिर्फ और सिर्फ लोगों को लालच दे कर इस्लाम की तरफ मोड़ने के लिए शिगूफे हैं और कुछ नहीं, समझदार मुसलमान भी इस बात को अंदर ही अंदर स्वीकार करते हैं. पर चंद लोग ऐसे है जो इसे सहारा बना कर आतंक के बल पर अपनी बात सच साबित करने पर तुले हैं. ज़रूरत है एक और फतवे की जो ईमानदारी से समय और दुनिया की भलाई की ज़रूरत के हिसाब जारी किया जाय. दुनिया अब नए युग में प्रवेश कर रही है जहां इन बातों के अब उतने मायने नहीं रह जाते जितने उस काल में रहे होंगे आज हर गली में हूरें घूम रही हैं, मीठा पानी टोंटी खोलते ही हाज़िर है. और मुसलामानों को भी समय के साथ साथ कदम बढ़ा कर दुनिया के साथ आगे आना चाहिए. (यद्यपि आ रहे हैं किन्तु पचास साल पीछे पीछे).
आत्म विश्लेषण का समय है ...
"हमको मालूम है ज़न्नत की हकीकत लेकिन" "दिल के बहलाने को ग़ालिब या ख्याल अच्छा है"

Anonymous said...

क्‍या गज़ब लिखा है दोस्‍त

Anonymous said...

allah ke chakle ki photu badi solid lagai hai.

सच का बोलबाला, झूठ का मुँह काला said...

-Islam = Sex+Terrorism

-इस्लाम अय्याशी (चार निकाह, जन्नत में 72 हूरें) और आतंक (जिहाद) का पाठ पढाता है

-ये लोग अपनी बहनो को भी नहीं छोडते, उनसे निकाह करके बिस्तर में ले जाते हैं

-कोई मुसलमान हिन्दू धर्म की प्रशंसा कर दे तो उसे मजहब से निकाल देते हैं

-हिन्दू धर्म ग्रथों को जलाना, मन्दिरों को तोडना, देवी-देवताओं के अश्लील चित्र बनाना, उनके बारे में अपशब्द बोलना इनकी घृणित मानसिकता का प्रमाण है

- हिन्दुओं को मिटाने या मुसलमान बनाने पर इनको जन्नत रूपी अय्याशी का अड्डा मिलता है

-मुसलमान (ना)मर्दों को बुरका बहुत भाता है, क्योंकी बुरके में छिपकर ये "बहुत कुछ" करते हैं

- मुसलमान फर्जी नामों का बुरका पहनकर भौंकते फिरते रहते हैं

-कुल मिलाकर इस्लाम (ना)मर्दों का मजहब है

pandit visnugupta said...

jwala uthi sastragni ki
jhulash uthe sansaar
mahakaal hai kholate
mahasamar ke dwaar

sighra hi ek mahayudhh hoga
jisame sare sampradayo ka vinash ho jaega .......kyoki prikriti ke birudhh uth khade hone walo ka vinash hamesha hi hota hai......

MAZHAR said...

Bahut achcha likha deepak bhai ne inke jaise logo ki wajah se he hindostan sabse behtar hai aur mujhe garv hai ki hum indian hai.
Mahashakti ji Please humare hindostan ko pakistaan mat banao.humare desh me sirf prem ki bhasha boli jati hai. Jai hind jai bharat......

INDIAN said...

ek baat kahna chahunga ki aap maise kuch log to poore poore jaahil hai maine na kuraan padi na bhagwad geeta par phir bhi har dharm ki izzat karna janta hun mujhe sharam aati hai un hindu bhaiyoo pe aur muslim bhaiyoo pe ki wo ek cheez nahi samjh rahe...ki hamara bharat sabse uppar hai..apne dilo mai apne deshprem ki bhawna jagao..jannat apne aap naseeb ho jayegi....

चन्द्र प्रकाश दुबे said...

सबसे बड़े दुःख की बात ये है की इन तमाम बकवास धार्मिक ग्रंथो को झासें में तथाकथित शिक्षित लोग भी आ जाते है, और दूसरे धर्म के लोगों की जान लेने पर उतारू हो जाते हैं. जबकि अंततः इन तमाम धर्म ग्रंथो का जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों से कोई लेना देना नहीं होता.

Anonymous said...

उजाले और चकाचौंध के भीतर ख़ौफ़नाक अँधेरे
नारी जाति की वर्तमान उपलब्धियाँ—शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनीतिक सशक्तीकरण आदिदृयक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय व सराहनीय हैं। लेकिन नारी-जाति के हक़ीक़ी ख़ैरख़ाहों, शुभचिंतकों व उद्धारकों पर लाज़िम है कि वे खुले मन-मस्तिष्क से विचार व आकलन करें कि इन उपलब्धियों की क्या, कैसी और कितनी क़ीमत उन्होंने नारी-जाति से वसूल की है तथा स्वयं नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे, मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी क़ीमत चुकाई है। जो कुछ, जितना कुछ उसने पाया उसके लिए क्या कुछ, कितना कुछ गँवा बैठी। नई तहज़ीब की जिस राह पर वह बड़े जोश व ख़रोश से चल पड़ीद—बल्कि दौड़ पड़ीद—है उस पर कितने काँटे, कितने विषैले व हिंसक जीव-जन्तु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने ख़तरे, कितने लुटेरे, कितने राहज़न, कितने धूर्त मौजूद हैं।

iqlak ansari said...

this is not true.ye logo ko bahkane wali site he adhi adhuri ayat sunakar logo ko bahkane ki koshish ki ja rahi he

Jitendra Panday said...

हर धर्म में कोई न कोई कमी होती है हिंदुत्व में भी है लेकिन हिन्दू उसे स्वीकार करते हैं मुसलमान तो बस काटना और मारना जानते हैं।

Rao Mugdam said...

tum yr 100 200 saal purane muslman ho or vfadari itni dikha the ho