इस्‍लाम का संदेश आतंक मचाओ हूर मिलेगी



इस्लाम का इतिहास है कि इस्लाम के जन्म का उदृदेश्य आतंक और सेक्स है यह मेरा कहना नही है किन्‍तु जब इस्‍लाम से सम्‍बन्धित ग्रंथो का आध्‍ययन किया जाये तो प्रत्‍यक्ष रूप ये यह बात सामने आ ही जाती है। कि घूम फिर कर अल्‍लाह को खुश करने के लिये जगह पर आंतक फैलाने और उनके अनुयायियों खुश करने के लिये सेक्‍स की बात खुल कर कही जाती है।
इस्लाम के पवित्र योद्धाओ (आतंकियो) को यौन-सुखों और भोगविलास के असामान्य विशेषाधिकार दिए गए हैं। यदि वे लड़ाई के मैदान में जीवित रह जाते हैं तो उनके लिए गैर-मुसलमानों की स्त्रियाँ रखैलों के रूप में सुनिश्चित हो जाती हैं। लेकिन यदि वे युद्ध के मैदान में मारे जाते हैं तो वे हूरियों से भरे 'जन्नत' के अत्यन्त विलासिता पूर्ण वातावरण में निश्चित रूप से प्रवेश के अधिकारी हो जाते हैं। अल्‍लाह को खुश करने के लिये कई जगह मुर्तिपूजको तथा गैर-मुसलमानों की संहार योजना में भाग लेने के बदले में यौन-सुखों के प्रलोभनों का वायदा किया जाता है जैसे कि -
  1. यदि वह (आतंक फैलाने वाला ) युद्ध भूमि की कठिन परिस्थितियों मारा गया तो उसे 'जन्नत' में उसकी प्रतीक्षा कर रहीं अनेक हूरों के साथ असीमित भोगविलासों एवं यौन-सुखों का आनंद मिलेगा, और यदि वह जीवित बचा रहा तो उसको 'गैर-ईमान वालों' के लूट के माल, जिसमें कि उनकी स्त्रियाँ भी शामिल होंगी, में हिस्सा मिलेगा।
  2. इन आतंकियो को कितनी अच्‍छी तरह से हूरो का लालच दे कर बरगलाया जा रहा है हदीस तिरमिज़ी खंड-2 पृ.(35-40) में दिए गए हूरों के सौंदर्य के वर्णन इस प्रकार है।
  3. हूर एक अत्यधिक सुंदर युवा स्त्री होती है जिसका शरीर पारदर्शी होता है। उसकी हड्डियों में बहने वाला द्रव्य इसी प्रकार दिखाई देता है जैसे रूबी और मोतियों के अंदर की रेखाएँ दिखती हैं। वह एक पारदर्शी सफेद गिलास में लाल शराब की भाँति दिखाई देता है।
  4. उसका रंग सफेद है, और साधारण स्त्रियों की तरह शारीरिक कमियों जैसे मासिक धर्म, रजोनिवृत्ति, मल व मूत्रा विसर्जन, गर्भधारण इत्यादि संबंधित विकारों से मुक्त होती है।
  5. प्रत्येक हूर किशोर वय की कन्या होती है। उसके उरोज उन्नत, गोल और बडे होते हैं जो झुके हुए नहीं हैं। हूरें भव्य परिसरों वाले महलों में रहतीं हैं।
  6. हूर यदि 'जन्नत' में अपने आवास से पृथ्वी की ओर देखे तो सारा मार्ग सुगंधित और प्रकाशित हो जाता है।
  7. हूर का मुख दर्पण से भी अधिाक चमकदार होता है, तथा उसके गाल में कोई भी अपना प्रतिबिंब देख सकता है। उसकी हड्डियों का द्रव्य ऑंखों से दिखाई देता है। प्रत्येक व्यक्ति जो 'जन्नत' में जाता है, उसको 72 हूरें दी जाएँगी। जब वह 'जन्नत' में प्रवेश करता है, मरते समय उसकी उम्र कुछ भी हो, वहाँ तीस वर्ष का युवक हो जाएगा और उसकी आयु आगे नहीं बढ़ेगी।
इस्‍लाम का संदेश आतंक मचाओ हूर मिलेगी

अब भई अब जब हूर इतनी खूब होगीं तो कोई क्‍यो न अल्‍लाह के लिये मरने को तैयार होगा, इन आतंकियो का यही मकसद होता है कि घरती पर उनके विलास के लिये अल्‍लाह द्वारा दिया गया मसौदा तो तैयार ही है और जन्‍नत में भी हूरे उनका इन्‍जार कर रही है। सोने पर सुहागा हदीस तिरमिज़ी खंड-2 (पृ.138) करती है कि ''जन्नत में एक पुरुष को एक सौ पुरुषों के बराबर कामशक्ति दी जाएगी'' :) जैसे जन्‍नत में थोक के भाव वियाग्रा की फैक्‍ट्री लगी है। क्या इसके बाद भी यौन-सुखों के लिए आकर्षित करने वाले प्रलोभनों और प्रमाणों को देने की आवश्यकता रह जाती है जो कि इस्लाम अपने जिहादी योद्धाओ को प्रेरित करने के लिए प्रस्तुत करता है?

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इलाहाबादी चिक्-चिक् का मतलब !



पिछले कई दिनो से जारी इलाहाबादी चिक-चिक बंद होने का नाम नही ले रही है। इलाहाबाद में सम्पन्‍न हुई ब्‍लागर मीट के बाद से शामिल होने वाले भी और न शामिल होने वाले लिखने पढने में कोई कसर नही छोड़ रहे है। कहने वाले कुछ भी कहे किन्‍तु यर्थात से मुँह नही मोड़ा जा सकता है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि या अध्‍यक्ष कौन थे यह ब्‍लागरों के मध्‍य चर्चा का विषय हो सकता है और हुआ भी है, किन्‍तु इन सब के बीच कुछ सबसे महत्वपूर्ण बात हम सब भूल रहे है, मै उसे याद दिलाना चाहूँगा।

पहली की सिद्वार्थ जी की पुस्तक सत्‍यार्थ मित्र का प्रकाशन, किसी ब्‍लागर ने उन्‍हे इनके इस साहसिक काम से लिये बधाई देना भी उचित नही समझा, सर्वप्रथम मै आपनी इस पोस्‍ट के माध्‍यम से बधाई देता हूँ। यह किताब इसलिये भी महत्‍वपूर्ण है, अभी तक ब्‍लाग पोस्‍ट पर आधारित यह पहली किताब है। यह एक जज्‍़बा है कि कोई भी ब्‍लागर इस मुकाम को हासिल करने का प्रयास करेगा।

मै इसी बात पर मै अपनी चिट्ठकारी के सम्‍बन्‍ध में एक छोटी सी बात बताना चाहूँगा- मैने चिट्ठकारी को एक खेल के रूप शुरूवात किया था, पता नही था कि महाशक्ति इस मुकाम तक पहुँच जायेगी। चिट्ठकारी मे अपने ब्‍लाग के लिये सीढ़ी के स्‍टेप की भातिं अपने लक्ष्य निर्धारित किया। जब मै किसी ब्‍लाग पर ज्‍यादा टिप्‍पणी देखता था तो मन करता था कि ऐसा मेरे ब्‍लाग पर भी हो मैने यह लक्ष्‍य भी पूरा किया। जब किसी ब्लाग पर सभी महत्‍वपूर्ण ब्‍लाग पर यह देखता था कि सभी महत्‍पूर्ण ब्‍लागर(तत्कालीन समय के अनूप जी, जीतू भाई, अरूण जी, रवि रतलामी जी, उन्‍मुक्‍त जी सहित अनेको) के कमेन्‍ट है ऐसा मैने भी लक्ष्‍य बनाया और उसे प्राप्‍त किया। एक लक्ष्‍य मैने यह बनाया कि नारद और ब्‍लागवाणी पर मेरा ब्‍लाग टाप पर रहे तो मैने यह भी लक्ष्‍य पूरा किया। ब्‍लागवाणी पंसदगी में आप सबके सहयोग और स्‍नेह के कारण भी सर्वाधिक पंसद और पठनीयता के एक साल के आकडे में टॉप के 100 ब्‍लागो में अपना नाम बनाने में कामयाब रहा है। अन्‍य ब्‍लागरो को ब्‍लाग से पैसा बनाते देखा तो लक्ष्‍य रखा कि मै भी चिट्ठकारी से पैसा बनाऊँगा और उस लक्ष्‍य की मैने पूर्ति की और गूगल एडसेंस के जरिये पैसा भी बनाया और अपने लिये ई-बाईक भी खरीदी। लोगो को पेपर मे छपता देखा तो मेरे मन भी लालसा थी कि मै भी पेपर मे आऊँ और लक्ष्‍य बनाया और बीते महीने सर्वश्री ज्ञानजी सिद्वार्थ भाई से साथ पेपर में(फोटो के साथ) छपने का भी मौका भी मिला। जब कम्‍यूनिटी ब्‍लाग को देखा तो मेरे मन भी रहा कि मेरा भी एक कम्‍यूनिटी ब्‍लाग हो और मैने उस लक्ष्‍य को भी पूरा किया, महाशक्ति समूह के रूप में मेरे पास भी एक सामूहिक ब्‍लाग है। जब ब्‍लागर मीट होते देखता था तो लक्ष्‍य बनाया कि मै भी ऐसे मीट का हिस्सा बनूँ तो दिल्‍ली, फरीदाबाद, गुड़गॉव, आगरा, कानपुर और जबलपुर जैसे शहरो मे ब्‍लागर मीट भी किया। मै हिन्‍द युग्‍म जैसे महान समुदाय का सदस्‍य हूँ इस पर भी गर्व है। अपनी मजबूरियो के कारण इस महान समूह को समय न ही दे पा रहा हूँ। ऐसे हर लक्ष्‍य को पूरा करने के बाद मै सोचता था कि अब चिट्ठाकारी को आराम से छोड़ सकता हूँ, क्‍योकि जो भी मिलेगा उससे आराम से कहूँगा मैने चिट्ठकारी के हर लक्ष्‍य को पाया जो बड़े ब्‍लागरो ने पाया है। मगर चिट्ठकारी छोडने का मुकाम अभी तक हासिल नही कर पाया हूँ, क्‍योकि हर पल नये नये मुकाम आ जाते है, सिद्धार्थ जी की पुस्‍तक आने के बाद एक लक्ष्‍य यह भी बना सकता हूँ कि अपनी भी एक किताब हो। यानी जब तक किताब नही छपती तब तब को चिट्ठकारी करनी ही पड़ेगी। श्रीश भाई काफी समय का अवकाश ले चुके है और हाल में ही वापसी की है, मेरा भी मन कर रहा है कि कुछ समय का अवकाश ले लिया जाये, जल्‍द ही इसके बारे में सोच रहा हूँ।

आज महाशक्ति के पास अपना डोमेन है, अपने पाठक है, पिछले 30 दिनो में महाशक्ति और महाशक्ति समूह पर कुल 11 लेख प्रकाशित हुये और इन पर करीब 6 हजार पेज लोड हुये प्रति पोस्‍ट के हिसाब से 550 पाठक और 30 दिनो के हिसाब से प्रतिदिन औसत 200 पाठक मिल रहे है, जब कि मै एक एक्टिव ब्‍लागर नही हूँ। मुझे एक ब्‍लागर के रूप में इससे ज्‍यादा और कुछ भी नही चाहिये, और दिनो दिन ज्‍यादा मिल ही रहा है।


पुन: इलाहाबादी ब्‍लागर मीट पर आना चाहूँगा, कार्यक्रम कैसा भी था कार्यक्रम सम्पन्‍न हुआ इसके लिये सिद्धार्थ जी बधाई के पात्र है। निमत्रण पा कर कार्यक्रम में शामिल होने की अपेक्षा हर किसी की होती है, मेरी भी हुई, और होनी भी चा‍हिये। राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नि सती को भी बिन बुलाये का परिणाम झेलना पड़ा था। मेरे घर में गृह निर्माण का काम चल रहा था, और मुझे कार्यक्रम में विषय में बिल्‍कुल भी याद नही था, कार्यकम के सम्‍बन्‍ध में अन्तिम बार करीब 10-15 दिनो पूर्व मोबाईल पर ही बात हुई थी, उसके बाद कोई भी बात नही हुई थी। इन दिनो इंटरनेट पर मेरी सक्रियता नाम मात्र की ही थी, ईमेल देख पाना ही मात्र हो पाता है। मेरा प्रिय आर्कुट भी मेरी उपस्थिति से महरूम है। इस बीच किसी माध्‍यम से मुझे कार्यक्रम की सूचना नही मिल पायी। 23 तारीख की 10.30 बजे के आस पास सुदर्शन ब्‍लाग के श्री मिश्र जी कार्यक्रम के सम्‍बध में फोन आया और मुझे कार्यक्रम की जानकारी मिली और उसके तुरंत बाद इलाहाबाद के पत्रकार ब्‍लागार हिमांशु जी फोन आया दोनो मित्रो को मैने शाम को खाली होने पर कार्यक्रम पर पहुँचने की बात कही, और शाम को समय मिलने के साथ कार्यक्रम मे पहुँचा भी, और इसी प्रकार अगले दिन भी मैने उपस्थिति दर्ज करायी। इसके लिये किसी को दोष देने का कोई मतलब नही है क्‍योकि ऐसे बड़े कार्यक्रम में थोड़ा बहुत ऊँच नीच हो होती है, कम से कम मेरे पहुँचने या न पहुँचने को लेकर इस प्रकार का विवाद नही ही होता चाहिये। सिद्धार्थ जी से मेरे अच्‍छे सम्‍बन्‍ध है हम चिट्ठकारी के सम्‍बन्‍ध में अपनी छोटी बड़ी बाते शेयर करते आये है, साथ चाय भी पिया है और बिस्‍कुट और नमकीन भी खाया है। :) छोटा हूँ तो बड़े भाई से कुछ अपेक्षा करता हूँ तो गलत नही है।

सुरेश जी की एक पोस्‍ट मेरे सम्‍बन्‍ध में आयी थी, उन्‍होने पोस्‍ट में मुझसे क्षमा माँगा था। मै उस दिन को काले अध्याय मानूँगा जब मै अपेक्षा करूँ कि मेरे बड़े भाई चाहे वो सुरेश जी हो या सिद्वार्थ जी जिनसे मै अपेक्षा करूँ कि वे क्षमा मॉगे, अगर मेरी चिट्ठाकारी में वो दिन आता है तो मेरा वह आखिरी दिन होगा।

सुरेश जी की उस पोस्‍ट का मै उतना ही सर्मथन करता हूँ जितना कि सिद्वार्थ भाई का। उन्‍होने जो कुछ भी कहा ब्‍लागरो का एक बड़ा वर्ग उनके सर्मथन में है, नामवर सिंह‍ जी को लेकर जो भी बाते समाने आयी हो। अगर ब्‍लागर समुदाय इसमें अपत्ति दर्ज करता है तो मै भी सभी ब्‍लगारो के साथ हूँ। जो व्‍यक्ति चिट्ठकार और चिट्ठकारी के सम्‍बन्‍ध मे सही राय न रखता हो इसे कैसे स्‍वीकार किया जा सकता है ? श्री सिद्वार्थ भाई के प्रयास से यदि कुछ आर्थिक सहयोग मिल गया और कार्यक्रम सम्‍पनन हुआ तो इसके लिये मै उन्हे धन्‍यवाद देता हूँ।

मुझे नही लगता कि ब्‍लागर इतने कमजोर है कि उन्हे किसी मीट के लिये सरकारी या किसी संस्‍था से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा करे। जो ब्‍लागर एक महीने में 500 से लेकर 3000 रूपये तक का मासिक इंटरनेट कनेक्‍शन ले सकता है साल में एक बार आयोजित होने वाली ब्‍लागर मीट के लिये खर्च वहन नही कर सकता। इलाहाबाद में आयोजित मीट में मेरे हिसाब से करीब 25 पूर्ण रूप से आर्थिक सम्‍पन्‍न ब्‍लागर थे जो सामूहिक रूप से किसी भी प्रकार के कार्यक्रम का आयोजन कर सकते थे , और भविष्‍य में ऐसा प्रयास होना चाहिये। जरूरी यही है कि चिक्-चिक का अंत हो।

आज बहुत लम्‍बी पोस्‍ट हो गई, दिल से लिखी पोस्‍ट है, बुरा लगे तो भी बुरा मत मानियेगा।

नोट- आज से 4 दिनो पूर्व यह पोस्‍ट लिखी थी पिछले 4 दिनो से इंटरनेट कनेक्‍शन पूरे क्षेत्र में खराब था जिससे यह आज पब्लिश कर पर रहा हूँ।


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आतंक की राह पर इस्‍लाम और कुरान



आतंक की राह पर इस्‍लाम और कुरान

फिर जब हराम के महीने बीत जाएं, तो 'मुश्रिकों'* को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो, और उन्हें घेरो, और घात की जगह उनकी ताक में बैठो । फिर यदि वे ' तौबा ' कर लें नमाज कायम करें, और जकात दें, तो उनका मार्ग छोड़ दो । नि: सन्देह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है । 
*मूर्तिपूजको (कुरान - '10 पार: 9 शूर: 5 वीं आयत) 
 
यह बाते स्‍पष्‍ट रूप से कुरान में लिखी हुई, क्‍या किसी धार्मिक पुस्‍तक में इस तरह मार-काट का उल्‍लेख होना चाहिये ? क्‍या ऐसी पुस्‍तकों को धर्म ग्रथ का दर्जा दिया जाना चाहिये ? यह बहुत बड़ा प्रश्‍न है किन्‍तु उठना वाजिब है। इस पुस्‍तक का उपरोक्‍त भाग पढ़कर यही लग रहा है कि इसमें धर्म की बात न होकर अंतकवादी हमले का प्रशिक्षण दिया जा रहा हो। जहाँ मूर्तिपूजक मिले उनका कत्‍ल कर दो, घात लगा कर बैठो, यदि तौबा कर छोड़ दो। अल्‍लाह अपने भक्‍तो को आतंकवादी प्रशिक्षण दे रहा है, दूसरी ओर भक्तो के आंतक से जो लोग इस्‍लाम कुबूल कर ले तो अल्‍लाह क्षमाशील हो जाता है, दयावान हो जाता है। क्‍या इस तरह भटकाओ का रास्‍ता बताना ही धर्म का मार्ग है ? 
 
धर्म की सही व्‍याख्‍या करते हुये ईशोपनिषत् मे लिखा गया है- 
ॐ ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । 
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥
 
अर्थात- अखिल विश्‍व मे जो कुछ भी गतिशील अर्थात चर अचर पदार्थ है, उन सब मे ईश्‍वर अपनी गतिशीलता के साथ व्‍याप्‍त है उस ईश्‍वर से सम्‍पन्‍न होते हुये से तुम त्‍याग भावना पूर्वक भोग करो। आसक्‍त मत हो कि धन अथवा भोग्‍य पदार्थ किसके है अथार्थ किसी के भी नही है ? अत: किसी अन्‍य के धन का लोभ मत करो क्‍योकि सभी वस्‍तुऐ ईश्‍वर की है। तुम्‍हारा क्‍या है क्‍या लाये थे और क्‍या ले जाओगे।
 
हिन्‍दु धर्म कभी किसी से नही कहता कि भगवान को न मानने वाले के साथ मार-काट करो हमारे भगवान तो-
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥
- की भावना में ही खुश रहता है। लाख कोई इस्‍लाम की पैरवी कर ले किन्‍तु जब तक भाव में आतंक का पर्याय समाप्‍त नही होगा, हिन्‍दु व अन्‍य धर्मो को गाली देने से अल्‍लाह तो खुश होगा किन्‍तु जनमानस नही खुश होगा। जैसा कि कुछ नुमाईदें कर रहे है। इस्‍लाम में अपनी कुछ अच्‍छाईयाँ है उसे हिन्‍दू समाज कभी अपनाने/मानने से पीछे नही हटा किन्‍तु दुनिया भी की दकियानूसी सोच को पाले रहने से इस्‍लाम का भला कर सकते हो तो करो किन्‍तु किसी अन्‍य धर्म को गलत शिद्ध करना ठीक नही।


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बुढे नेहरू का परिणाम विभाजन



‘’मैने कल्‍पना तक नही की थी कि ऐसा होगा मै जीते जी पाकिस्तान देख सकूँगा।‘’ ये शब्‍द पाकिस्‍तान की मॉंग करने वाले जिन्ना के है, यहाँ जिन्ना या मुस्लिम लीक को पाकिस्‍तान का निर्माता कहना बेमानी होगा क्‍योकि पाकिस्‍तान का निर्माता और कोई नही नेहरू और काग्रेस का कमजोर नेतृत्‍व था।
तत्कालीन काग्रेस नेतृत्‍व थक चुका था यह बात नेहरू द्वारा 1960 में लेओनार्ड मोस्ले के साथ बात के दौरान हुई थी। नेहरू कहते है – ‘ सच्‍चाई यह है कि हम थक चुके थे और आयु भी अधिक हो चुकी थी। हम में से कुछ ही लोग फिर कारावास में जानेक बात कर सकते थे और यदि हम अखण्‍ड भारत पर डटे रहते जैसा कि हम चाहते थे तो स्‍पष्ट है कि हमें कारागार जाना ही पड़ता। हमने देखा कि बॅटवारे की आग भड़क रही है और सुना कि प्रतिदिन मार काट हो रही है। बॅटवारे की योजना ने एक मार्ग निकालना जिसे हमने स्वीकार कर लिया।‘ नेहरू के ये वाक्‍य कांग्रेस की कमजोरी तथा उनकी सत्‍ता लोलुपता का बयां कर रहे थे, क्‍योकि काग्रेस चाह‍ती थी किसी प्रकार से स्वतंत्रता लेना चाहती थी चाहे वह विभाजन से ही क्‍यो न हो।
 
काग्रेस की कमजोरी के सम्‍बन्‍ध में श्री न.वि. गडगिल कहते है- देश की मुख्य राजनैतिक शक्ति भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस थी, उसके नेता बूढे हो चुके थे, थक चुके थे। वे रस्सी को इतना अधिक नही खीचना चाहते थे कि वह टूट जाये और किये घरे पर पानी फिर जाये। श्री गडगिल का उक्‍त कथन काग्रेस की आजादी की लड़ाई के काले अध्‍याय की ओर हमें ले जाती है। काग्रेस और काग्रेंसी खास कर नेहरू अपनी महत्‍वाकांक्षाओं की नैया पर इतना बोझ लाद चुके थे कि अपनी नैया को बचाने के लिये पाकिस्‍तान की मॉंग स्‍वीकार कर लिया।
नेहरू की महत्वकांक्षाओ के सामने गांधी जी भी टूट चुके थे, मैने कई बार गांधी जी को विभाजन के लिये दोषी ठहराया है और आज भी ठहराता हूँ, गांधी जी भारत विभाजन रोक सकते थे, इसके लिये गांधी जी को अपने जीवन का सबसे बड़ा बलिदान करना पड़ता, हो सकता है कि उनके प्राण चले जाते किन्‍तु गांधी के बल पर भारत टूटने से बच सकता था ये प्राण लेने वाला कोई गोड़से काग्रेसी ही होता। गांधी जी को भारत विभाजन के प्रस्‍ताव पर बहुत दर्द था वे दर्द के साथ कहते है- ‘मै भारत विभाजन का विरोधी हूँ किन्‍तु हमारे नेताओं ने इसे स्‍वीकार कर लिया है, और अब हमें भी इसे स्‍वीकार कर लेना चाहिये। मै इस स्थिति मे नही हूँ कि वर्तमान काग्रेंस के नेतृत्‍व को बदल सकूँ, यदि मेरे पास समय होता तो क्‍या मै इसका विरोध नही करता ? मेरे पास नया नेतृत्‍व देने के लिये विकल्‍प ही नही था कि मै कह सकूँ कि यह लीजिए यह रहा वैकल्पिक नेतृत्‍व। ऐसे विकल्‍प के निर्माण का मेरे पास समय नही हर गया, इसलिये मुझे इस नेतृत्‍व के फैसले को कड़वी औषधि की भाति पीना ही होगा, आज मेरे में ऐसी शक्ति नही, अन्‍यथा मै अकेला ही विद्रोह कर देता।‘ भले गांधी जी उक्‍त बात करते समय नेताजी सुभाष का नाम लिये हो किन्‍तु निश्‍चित रूप से नेहरू के पंगु विकल्‍प के रूप से गांधी जी नेताजी को जरूर याद किये होगे।निश्चित रूप से गांधी जी को अपने नेतृत्‍व चयन पर कष्‍ट हुआ होगा।
 
गांधी जी की नेतृत्‍व चयन की भूल और नेहरू की महत्‍वकांक्षाओं का परिणाम था कि आज विभाजित भारत हम देख रहे है, आज 18 करोड़ मुस्‍लमान मौज के साथ रह रहे है आज से 60 साल पहले 4-5 करोड़ मुसलमान भी रह सकते थे। काग्रेस सत्‍ता भोगी नेतृत्‍व का ही परिणाम हमारे समाने है। तत्कालीन समय में अग्रेजो का भारत छोड़ना अपरिहार्य हो गया था किन्‍तु वास्‍तव में विभाजन अपरिहार्य नही था।


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द्विवेदी जी के कानून के दोहरे मापदण्‍ड



हिन्‍दी चिट्ठाकारी का कोई विशेष पैमाना नही रहा है, हर पैमानेका समय के हिसाब से अपने स्‍वयं के पैमाने तय कर लेता है। श्री दिनेश राय द्विवेदी जी की दो अगल अलग टिप्‍पणी मुझे पढ़ने को मिली थी, दोनो टिप्‍पणी को एक साथ पढ़ने पर आश्‍चर्य होना स्‍वाभविक ही है।मै पहली टिप्‍पणी के रूप में कुछ माह पहले की गई एक टिप्‍पणी का जिक्र करना चाहूँगा, जिस पर श्री द्विवेदी जी ब्‍लागवाणी अरोप लगाते हुये कहते है कि - ब्लागवाणी पक्षपात भी करे तो क्या? निजि है। निश्चित रूप से यह प्रश्‍न वाजिब है क्‍या किसी को पक्षपात करने का पूरा अधिकार है ?

श्री द्विवेदी ब्‍लागवाणी पर पक्षपात का अरोप लगाना समझ से परे है क्‍योकि ब्‍लागवाणी किसके साथ पक्षपात कर रही है ? ब्‍लागवाणी एक ऐसा मंच है जो अपने नीतियो के हिसाब से किसी ब्लाग को अपने एग्रीगेटर पर शामिल करता है, यदि वह किसी को शामिल नही करता है तो उस पर पक्षपात का अरोप लगाना गलत ही है। क्‍योकि ब्‍लावाणी ने स्‍पष्‍ट रूप से कहा है कि हम अपनी मर्जी के मालिक है।

आज श्री द्विवेदी जी यह कहा रहे है किन्‍तु आज से करीब 18-20 महीने पहले श्री द्विवेदी जी की एक टिप्‍पणी मुझे चिट्ठकार के सम्‍बन्‍ध में पढ़ने को मिली थी - देबू भाई के बारे में जानने का अवसर मिला। धन्यवाद्।मैं उन के इस विचार से सहमत हूँ, यह कानून भी यही कहता है कि दूसरे कि संपत्ति पर आप यदि कुछ कर रहे हैं तो उस की सहमति से कर रहे हैं। आप एक लायसेंसी हैं। अब आप वहाँ कोई भी ऐसा काम करते हैं जो संपत्ति के स्वामी द्वारा स्वीकृत नहीं है तो संपत्ति के स्वामी को आप को वहाँ से बेदखल करने का पूरा अधिकार है। आप उसे कोसते रहें तो कोसते रहें। आखिर संपत्ति के स्वामी ने अपने वैध अधिकार का उपयोग किया है कोई बेजा हरकत नहीं की है।

श्री द्विवेदी जी विद्वान अधिवक्‍ता है उनकी बात को कटाना हमारे बस में नही है किन्‍तु उपरोक्‍त उनकी यह दूसरी टिप्‍पणी ब्‍लागवाणी का स्‍वयं सर्मथन कर रही है, वह अपने निर्णय लेने को स्‍वतंत्र है। किन्‍तु यह मै एक बात कहना चाहूँगा कि ब्‍लागवाणी मंच अपनी कोई बात रखने के लिये सदस्‍यता नही देता है, किन्‍तु जिस चिट्ठकार के सम्‍बन्‍ध में उन्‍होने कहा था वह अपनी बात को रखने के लिये सदस्‍यता देता है और किसी सदस्‍य को मंच से हटाये जाने के पर सदस्‍य को पूरा अधिकार है कि वह इस बात की जानकारी प्राप्‍त करे कि उसे किस बात के लिये हटाया गया ? जब मैने उक्‍त बात जाननी चा‍ही थी तो श्री द्विवेदी जी बिना पूरी बात जाने अथवा जानकर भी बड़े ब्‍लागर के महिमा मंडन के मोह से छूट न सके और मुझे कानून की घुट्टी पिला गये।

श्री द्विवेदी जी के न्‍याय के पैमाने के मै समझ पाने की कोशिश कर रहा हूँ तो पाता हूँ कानून अंधा ही नही बहरा भी होता है। आज ब्‍लागवाणी का पक्षपात उन्‍हे समझ में आ रहा है किन्‍तु तब का पक्षपात उन्‍हे क्‍यो नही दिखा जब मैने उस बात को जानने का प्रयास किया कि मुझे चिट्ठाकार से निकालाने की बात पूछी थी ? तब तो श्री द्विवेदी जी ने किसी कि सम्पत्ति कहते हुये उसे चिट्ठकार के मालिक के अनैतिक कृत्‍य को मनमानी का पूरा मालिकाना अधिकार दे गये थे। न्‍याय का मतालब यही है कि बतालकारी के अरोपी को पता नही है कि आखिर बलात्‍कार हुआ किसका है ? न्‍याय की यह प्रक्रिया सिर्फ चिट्ठकारो की चौपट नगरी में ही सम्‍भव है, जहॉं समय के अनुसार कानून बदल जाता है। ब्‍लागवाणी पर ऊँगली उठाने से पहले यह सोचना चाहिये कि सर्वप्रथम यह कि ब्‍लागवाणी कोई सार्वजनिक चर्चा मंच नही है और न ही वह किसी को सदस्‍यता देता है, उसके सदस्‍यता देना सिर्फ पाठक के लिये है न कि किसी ब्‍लागर के लिये। हो सकता है कि तब और आज के टिप्‍पणी में अंतर इसलिये हो क्‍योकि तब वे चिट्ठाकारी के खेला के नये खिलाड़ी थे और आज वे इस खेला के माहिर खिलाडियो में शामिल हो चुके है और इसलिये नियम, कानून और पक्षपत की परिभाषा बदल चुकी है।

श्री द्विवेदी जी की दोनो टिप्‍पणी प्रस्‍तुत है - चिट्ठकार के सम्‍बन्‍ध में


ब्‍लागवाणी के सम्‍बन्‍ध में

यहाँ ब्‍लागों के लिंक देना उचित नही समझता क्‍योकि इससे अन्‍य सम्‍बन्धित लिंको को भी देना पड़ेगा।

सम्‍बन्धित पोस्‍टें -


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संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो



संगठन गढ़े चलो, सुपंथ पर बढ़े चलो।
भला हो जिसमें देश का, वो काम सब किए चलो॥
युग के साथ मिल के सब, कदम बढ़ाना सीख लो।
एकता के स्वर में गीत, गुनगुनाना सीख लो।
भूलकर भी मुख में, जाति-पंथ की न बात हो।
भाषा, प्रांत के लिए, कभी न रक्तपात हो॥
फूट का भरा घड़ा है, फोड़कर बढ़े चलो ॥१॥
संगठन गढ़े चलो.............॥

आ रही है आज, चारों ओर से यही पुकार
हम करेंगे त्याग, मातृभूमि के लिए अपार॥
कष्ट जो मिलेंग, मुस्कुराकर सब सहेंगे हम।
देश के लिए सदा, जियेंगे और मरेंगे हम।
देश का ही भाग्य, अपना भाग्य है, यह सोच लो॥२॥
संगठन गढ़े चलो.................॥


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दस करोड़ की लाटरी



90 वर्षीय एक सज्जन की दस करोड़ की लाटरी लग गई। इतनी बड़ी खबर सुनकर कहीं दादाजी खुशी से मर न जाएं, यह सोचकर उनके घरवालों ने उन्हें तुरंत जानकारी नहीं दी। सबने तय किया कि पहले एक डॉक्टर को बुलवाया जाए फिर उसकी मौजूदगी में उन्हें यह समाचार दिया जाए ताकि दिल का दौरा पड़ने की हालत में वह स्थिति को संभाल सके।
शहर के जानेमाने दिल के डॉक्टर से संपर्क किया गया । डॉक्टर साहब ने घरवालों को आश्वस्त किया - आप लोग चिंता मत करें । दादाजी को यह समाचार मैं खुद दूंगा । उन्हें कुछ नहीं होगा, मेरी गारंटी है।
डॉक्टर साहब दादाजी के पास गए । कुछ देर इधर - उधर की बातें कीं फिर बोले - दादाजी, मैं आपको एक शुभ समाचार देना चाहता हूं। आपके नाम दस करोड़ की लाटरी निकली हैं।
दादाजी बोले - अच्छा ! लेकिन मैं इस उमर में इतने पैसों का क्या करूंगा । पर अब तूने यह खबर सुनाई है तो जा, आधी रकम मैंने तुझे दी।
डॉक्टर साहब धम् से जमीन पर गिरे और उनके प्राण पखेरू उड़ गए ।
एक मित्र द्वारा भेजा हुआ


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