351 पोस्‍टो में यादो के झरोखे से झाकती 25 पोस्‍टे



1 जुलाई 2006 से आज तक हमने करीब 351 लेख महाशक्ति ब्‍लाग पर लिखे, और इन पोस्‍टो में 25 पोस्‍टे ऐसी रही जो कमेन्‍ट से महरूम रही। 14 मई 2008 के बाद ऐसी कोई पोस्‍ट नही नही जो टिप्‍पणी न प्राप्‍त कर सकी। कल अनायास ही ब्‍लाग हिस्‍ट्री देखने बैठा था लगा कि क्‍यो न इस पोस्‍टो को भी याद कर लिया जाये।
किसी पोस्‍ट का सर्वश्रेष्‍ठ कहा जाये या नही ब्‍लाग लेखको में इसको लेकर मतभेद होगा किन्‍तु जहाँ तक मै मानता हूँ कि इन 25 पोस्‍टो में सबसे अच्‍छी पोस्‍ट भी है, उस समय मुझे बहुत दुख हुआ था कि वह टिप्‍पणी प्राप्‍त नही कर सकी थी।
वह दौर ऐसा था जिसमे टिप्‍पणी की अपेक्षा करना बहुत कठिन था, नारद जो आज इतिहास बन गया है, सभी पोस्‍टो की जानकारी के लिये उस पर निर्भर करते थे, आप परिदृश्‍य बिल्‍कुल बदल गया है, पोस्‍टो को पठने के नये नये तरीके सामने आ गये है। उस समय तो हमे पोस्टिंग करनी भी नही आती थी कई पोस्‍ट तो हमने बिना शीर्षक के किये थे।
जन्‍मदिन 24 नम्वम्‍बर को बीत गया, महाशक्ति समूह, जबलपुर परिवार, ब्‍लाग परिवार की सनेह बधाईयाँ और शुभकामनाऍं मिली, आर्कुट, फेसबुक और फोन आदि पर भी मित्रो ने अपार प्रेम दिया। वाकई बहुत अच्‍छा लगा। सभी को हृदय से धन्‍यवाद देता हूँ।
ये 25 पोस्‍टे निम्‍न है, जो टिप्‍पणी प्राप्‍त न कर सकी और इन 25 में क्रमांक 6, 9, 10,11,21 और 22 नम्‍बर की पोस्‍टे मैने बहुत ही मन से लिखी थी। तब टिप्‍पणी न मिलने पर हमने पोस्‍ट में लिखा था कि जब टिप्‍पणी न मिले तो समझना चाहिये कि पोस्‍ट इतनी अच्‍छी थी कि उसमें टिप्‍पणी करने लायक ही कुछ नही था।


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ऊपर वाला “खुदा” है तो देर से अंधेर भली



एक बात से तो कोई इन्‍कार नही कर सकता है कि भारत मे सुनामी और भूकंप आने पर इतना हल्‍ला नही मचता है जितना कि फतवा जारी होने पर, जैसे फतवा न हो गया अल्‍लाह की जुलाब की घुट्टी हो गई पीते ही दस्‍त शुरू।
 
आज के समय में यही देखने पर लग रहा है कि यह कैसा दकियानूसी समुदाय है, जो फतवों पर जीता है। फतवा अरबी का लफ्ज़ है। इसका मायने होता है- किसी मामले में आलिम ए दीन की शरीअत के मुताबिक दी गयी राय होती है जिसे स्‍वीकार करना या न करना राय मागने वाले पर ही निर्भर करता है पर भारत में इसे अल्‍लाह की वाणी जैसा महत्‍व दिया जा रहा है। फतवा कोई मांगता है तो दिया जाता है, फतवा जारी नहीं होता है। हर उलेमा जो भी कहता है, वह भी फतवा नहीं हो सकता है। फतवे के साथ एक और बात ध्‍यान देने वाली है कि हिन्‍दुस्‍तान में फतवा मानने की कोई बाध्‍यता नहीं है। फतवा महज़ एक राय है। मानना न मानना, मांगने वाले की नीयत पर निर्भर करता है। लेकीन हिन्दुस्तान मे फतवा मुस्लमाने के लिये हिन्दुस्तान का संविधान से भी ज्यादा महत्वपुर्ण है
21शताब्‍दी मे कुछ जारी फतवो और इस्‍लामिक न्‍यायिक निर्णयो पर गौर करेगे तो पायेगे कि इस्‍लाम में अल्‍लाह, मुहम्‍मद साहब, फतवा और पुरूषों के अलावा कोई भी चीज पाक नही है। गुनाह अगर पुरूष करता है तो स्त्री पर थोप दिया जाता है कि अमुख स्‍त्री के आकर्षण के कारण पुरूष की नीयत खराब हो गई तो इसमें पुरूष की क्‍या दोष है ? इसे कहते है खुदा का न्‍याय।
 
एक कहावत है कि ऊपर वाले के यहाँ देर है अंधेर नही, यदि ऊपर खुदा ही बैठा है तो देर से अंधेर ही भली जो स्त्रियों को दोयम दर्जे पर स्‍थापित करता है और कही बलात्कार की शिकार लड़की को 200 कोड़े तो कहीं पैंट पहनने पर मारे गए 40 कोड़े और तो और मस्जिद में नमाज अदा करने पर महिलाओं को फतवा जारी कर दिया जाता है। आपको हाल की कुछ खबरों की ओर ले जाता हूँ -
 
बलात्कार की शिकार लड़की को 200 कोड़े मारने की सजा जेद्दाह : जेद्दाह में एक सऊदी अदालत ने पिछले साल सामूहिक बलात्कार की शिकार लड़की को 90 कोड़े मारने की सजा दी थी। उसके वकील ने इस सजा के खिलाफ अपील की तो अदालत ने सजा बढ़ा दी और हुक्म दिया: '200 कोड़े मारे जाएं।' लड़की को 6 महीने कैद की सजा भी सुना दी। अदालत का कहना है कि उसने अपनी बात मीडिया तक पहुंचाकर न्याय की प्रक्रिया पर असर डालने की कोशिश की। कोर्ट ने अभियुक्तों की सजा भी दुगनी कर दी।
इस फैसले से वकील भी हैरान हैं। बहस छिड़ गई है कि 21वीं सदी में सऊदी अरब में औरतों का दर्जा क्या है? उस पर जुल्म तो करता है मर्द, लेकिन सबसे ज्यादा सजा भी औरत को ही दी जाती है।


महिलाओं को पैंट पहनने पर मारे गए 40 कोड़े!खार्तूम। सूडान में कुछ महिलाओं को पैंट पहनना काफी महंगा पड़ गया। दरअसल कुछ सूडानी महिलाएं पैंट पहनकर रेस्टोरेंट में खाना खाने गई थीं। तभी वहां पर करीब 30 की संख्या में पुलिसकर्मी पहुंचे और इन्हें गिरफ्तार कर लिया। इन महिलाओं को 40-40 कोड़े लगाने का आदेश दिया गया।
वेबसाइट ‘डेलीमेल डॉट को डॉट यूके’ के मुताबिक ये महिलाएं देश की राजधानी खार्तूम के एक रेस्टोरेंट में बैठी थीं तभी अचानक पुलिस वहां पहुंची और 13 महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया। कुछ महिलाओं ने तो गलती मानते हुए माफी मांग ली तो उन्हें 10 कोड़े लगाकर छोड़ दिया गया लेकिन कुछ ऐसी थी जिन्होंने अपनी गलती स्वीकार नहीं की तो उन्हें 40 कोड़ों की सजा दी गई।
मालूम हो कि गिरफ्तार की गई महिलाओं में से एक लुबना अहमद एल-हुसैन नाम की एक पत्रकार भी थी। उसने बताया कि कैसे पुलिस ने बिना सूचना के बिल्डिंग पर धावा बोल पैंट पहने महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया। उस पत्रकार महिला ने बताया कि मैंने पैंट पहनी थी और मेरी तरह 10 महिलाओं ने भी पैंट पहनी थी।  लुबना अहमद एल-हुसैन काफी जानीमानी रिपोर्टर हैं और सूडानी अखबार में कॉलम भी लिखती हैं। ये देश दो भागों में बंटा है। खार्तूम में मुसलमान हैं और दक्षिण में ईसाई हैं। जिन महिलाओं को दोषी पाया गया वो ज्यादातर दक्षिण से थीं। वहां पर गैर मुसलमान भी शरिया कानून का विरोध नहीं कर सकते।
 
मस्जिद में नमाज अदा करने पर महिलाओं को मिला फतवा गुवाहाटी (टीएनएन) 
असम के हाउली टाउन में कुछ महिलाओं के खिलाफ फतवा जारी किया गया क्योंकि उन्होंने एक मस्जिद के भीतर जाकर नमाज अदा की थी। असम के इस मुस्लिम बाहुल्य इलाके की शांति उस समय भंग हो गई , जब 29 जून शुक्रवार को यहां की एक मस्जिद में औरतों के एक समूह ने अलग से बनी एक जगह पर बैठकर जुमे की नमाज अदा की। राज्य भर से आई इन महिलाओं ने मॉडरेट्स के नेतृत्व में मस्जिद में प्रवेश किया। इस मामले में जमाते इस्लामी ने कहा कि कुरान में महिलाओं के मस्जिद में नमाज पढ़ने की मनाही नहीं है। जिले के दीनी तालीम बोर्ड ऑफ द कम्युनिटी ने इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि इस तरीके की हरकत गैरइस्लामी है। बोर्ड ने मस्जिद में महिलाओं द्वारा नमाज करने को रोकने के लिए फतवा भी जारी किया।
 
कम कपड़े वाली महिलाएं लावारिस गोश्त की तरह
मौलवी मेलबर्न (एएनआई) : एक मौलवी के महिलाओं के लिबास पर दिए गए बयान से ऑस्ट्रेलिया में अच्छा खासा विवाद उठ खड़ा हुआ है। मौलवी ने कहा है कि कम कपड़े पहनने वाली महिलाएं लावारिस गोश्त की तरह होती हैं , जो ' भूखे जानवरों ' को अपनी ओर खींचता है।
रमजान के महीने में सिडनी के शेख ताजदीन अल-हिलाली की तकरीर ने ऑस्ट्रेलिया में महिला लीडर्स का पारा चढ़ा दिया। शेख ने अपनी तकरीर में कहा कि सिडनी में होने वाले गैंग रेप की वारदातों के लिए के लिए पूरी तरह से रेप करने वालों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
500 लोगों की धार्मिक सभा को संबोधित करते हुए शेख हिलाली ने कहा , ' अगर आप खुला हुआ गोश्त गली या पार्क या किसी और खुले हुए स्थान पर रख देते हैं और बिल्लियां आकर उसे खा जाएं तो गलती किसकी है , बिल्लियों की या खुले हुए गोश्त की ?'
 
कामकाजी महिलाएं पुरुषों को दूध पिलाएं : फतवा
काहिरा : मिस्र में पिछले दिनों आए दो अजीबोगरीब फतवों ने अजीब सी स्थिति पैदा कर दी है। ये फतवे किसी ऐरे-गैरे की ओर से नहीं बल्कि देश के टॉप मौलवियों की ओर से जारी किए जा रहे हैं।
देश के बड़े मुफ्तियों में से एक इज्ज़ात आतियाह ने कुछ ही दिन पहले नौकरीपेशा महिलाओं द्वारा अपने कुंआरे पुरुष को-वर्करों को कम से कम 5 बार अपनी छाती का दूध पिलाने का फतवा जारी किया। तर्क यह दिया गया कि इससे उनमें मां-बेटों की रिलेशनशिप बनेगी और अकेलेपन के दौरान वे किसी भी इस्लामिक मान्यता को तोड़ने से बचेंगे।
 
गले लगाना बना फतवे का कारण
इस्लामाबाद (भाषा) : इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के धर्मगुरुओं ने पर्यटन मंत्री नीलोफर बख्तियार के खिलाफ तालिबानी शैली में एक फतवा जारी किया है और उन्हें तुरंत हटाने की मांग की है। बख्तियार पर आरोप है कि उन्होंने फ्रांस में पैराग्लाइडिंग के दौरान अपने इंस्ट्रक्टर को गले लगाया। इसकी वजह से इस्लाम बदनाम हुआ है।
 
फतवा: ससुर को पति पति को बेटा
एक फतवा की शिकार मुजफरनगर की ईमराना भी हुई। जो अपने ससुर के हवश का शिकार होने के बाद उसे आपने ससुर को पति ओर पति को बेटा मानने को कहा ओर ऐसा ना करने पे उसे भी फतवा जारी करने की धमकी मिली।
 
मौत का फ़तवा और तस्लीमा नसरीन बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन इस समय दुनिया की सबसे विवादित और चर्चित लेखिका हैं। बांग्लादेश में तो उनकी हत्या का फ़तवा इस्लामी कट्टरपंथियों ने तभी जारी कर दिया था जब उन्होंने ‘लज्जा’ नामक उपन्यास लिखा था। जान बचाने के लिए उन्हें अपना देश छोड़कर नॉर्वे में शरण लेनी पड़ी थी. यह वर्ष 1993 की बात है।
 
देश में इससे ज्‍यादा स्‍तब्‍ध कर देने वाली घटना और क्‍या हो सकती है जब किसी की हत्‍या के लिये फतवा दिया जाता है। ऐसा ही तस्लीमा के विरोध की कमान एक भारतीय इमाम ने किया था। ये कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम हैं और इनका नाम एसएसएनआर बरकती है। बरकती ने तस्लीमा की हत्या का फ़तवा जारी किया था । यह वही है जिन्‍होने तस्लीमा नसरीन का मुँह काला किए जाने और जूतों की माला पहनाए जाने का फ़तवा जारी किया था और इस बार की तरह ही 50 हज़ार रुपयों का इनाम भी घोषित किया था। 
जब तस्‍लीमा का मुँह काला किया गया तो मानवाधिकारी कहाँ थे? भारत की सरकार भी पुरूषार्थ रूप को त्‍याग कर अपनी नई भूमिका में आ जाती है। भारत सरकार भी चीन को धमकी दे सकती है पर मुस्लिम कट्टर पंथ के खिलाफ कार्यवाही नही कर सकती है। भारत सरकार भी जानती है कि कि चीन हमाला करेगा तो सेना देखेगी और मुस्लमान जब हमला करेगा तो देखना तो हमें ही पड़ेगा।
 
जब खुले आज ऐसे फतवे दिये जाते है तो समाज के वे तथाकथित सेक्‍युलर किन्‍नर फौज का भी अता नही चलता है कि वे किस दरबे में घुसी हुई है जो मोदी को गरियाने में आगे रहते है, उनके मुँह से मोदी के लिये ऐसी बद्दुऐं निकलती है जैसा कि किन्‍नरों के सम्‍बन्‍ध में विख्‍यात है। इन सेक्‍यूलर वेश्‍याओ के भली तो रेड लाईट एरिया की वेश्‍या है जो अपना धन्‍धा हिन्‍दू मु‍समान देख कर तो नही करती। उनका का तो सिर्फ धन्‍धा करना होता है।


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अल्‍लाह की शक्ति का अतिक्रमण करता भारतीय संविधान, कठमुल्‍लों फतवा जारी करो



मुस्लिमो द्वारा वन्‍देमातम् को लेकर जो गंदा खेल खेला जा रहा है, उसके पीछे देश के एकीकृत ढाचे को तोड़ने की मंशा दिखाई देती है। वन्‍दे मातरम् कोई गीत मात्र नही है बल्कि देश की आजादी के समय स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानियो में जोश भर देने वाला मंत्र था, जिसे गर्व से हिन्‍दू भी गाता था और मु‍स्‍लमान भी और इसके साथ साथ स्‍वतंत्रता की लडाई लड़ने वाला हर भारतीय ने इसे स्‍वाभिमान के साथ स्‍वीकार किया। वंदेमातरम् बोलते समय भगत‍ सिंह अशफाक उल्‍ला के स्‍वर एक साथ फूटते थे और सीना चौड़ा कर अग्रेजो बत्‍तीसी तोड़ने की माद्दा रखते थे। ये असर थ वन्‍देमातरम् का।

कल सुरेश जी का लेख इस्लाम के "सच्चे" फ़ॉलोअर्स से आपका परिचय बहुत जरूरी है को मैने पढ़ा और वकाई इस्‍लाम के बारे में ऐसी बात जानने को मिली जिसकी जिन्दा ही की जानी चाहिये। इस्‍लामकि खलीफाओ की दादागीरि सिर्फ महिलाओ पर ही होती है। 112 का बुड्डा 17 साल की लड़की से शादी कर रहा है। और भी ऐसी बातें आप सुरेश जी के लेख में बेहतर पढ़ सकते है।

आज कुछ तुगलकी मु‍स्‍लमान, ये कह रहे है कि वन्‍देमातरम् गाने से वे नापाक हो जायेगे तो वे कब का नापाक हो चुके है, जितनी बार वन्‍देमातरम् का विरोध करते है उतनी बार ही भारत माता को प्रणाम भी करते है। देश का हर प्रकार के भोजन मे वंदेमातरम् का गान गूँज रहा है और इसे मुस्‍लमान भी खा रहे और और हिन्‍दू भी। आज मु‍स्‍लमान हिन्‍दूओ के साथ रह रहे है, जबकि इस्लाम मे कहा गया है जहाँ भी मूर्तिपूजक मिले उन्‍हे मार डालो, जब तक कि वे अल्‍लाह की पनाह मे न आ जाये। अरे नामकूलो 80 करोड़ हिन्‍दूओ के साथ रह कर अल्‍लाह के नियम को तुम कब का तोड़ चुके हो, तुम अल्‍लाह के गुनाहगार हो गये हो, तुम न तो 80 करोड़ हिन्‍दूओ के मार सके और न ही उन्‍हे अल्‍लाह का गुलाम बना सके। अल्‍लाह के प्रति तुम लोग कितना अनैनिक काम किये जा रहे है, तब पर अल्‍लाह तुम पर रहम किये हुये है, तुम्‍हे हूरो से बद्दुआये नही दिलवा रहा, तुम गर्व से वन्‍देमातनरम् गाओ, इस पर भी अल्‍लाह नाराज नही होगा।

यार तुम्‍हारा अल्‍लाह न हो गये हो गये छुई-मुई जब देखो तब किसी न किसी बात से नाराज हो जाते है कभी महिलाओ द्वारा पुरूष से सेक्‍स से इंकार करने पर भी अल्‍लाह नाराज हो जाता है तो कभी वंदेमातरम् गाने से, अल्‍लाह को सर्वशक्तिमान बने रहने दो छुई-मुई मत बनाओ, अगर तुम लोग अल्‍लाह को छुई-मुई बनाओ के तो जरूर अल्‍लाह नाराज हो जायेगा।

हिन्‍दी चिट्ठकारी मे एक सनकी महाराज है, जब सनक सवार होती है तो एक घटिया पोस्‍ट डाल देते है अब वो कर रहे है कि देशभक्ति जताने के लिए मुसलमान 'वन्दे-मातरम्' के मुहताज नहीं है। अब वो देश भक्ति की बात भी करते है और अल्‍लाह भक्ति की भी जबकि उनके अनुसार इस्‍लाम सिर्फ अल्‍लाह की भक्ति की बात ही करता है। बन्‍देमातरम् गाकर देशभक्ति नही कर सकते तो गोलियो के दम देश से देशभक्ति न करो। वन्‍देमारम् न गाने की बात अब हम पाकिस्‍मानी से सीखेगे वो हमे बतायेगा कि हम बन्‍देमातरम् क्‍यो न गाये। जिस बड़े विद्वान डॉ. जाकिर अब्दुल करीम नाइक की बात हो रही है उसे मुस्‍लमानो ने ही पिछले साल इलाहाबाद और लखुनऊ मे घुसने नही दिया, इसलिये कि खुद मुसलमान इससे नफरत करते है।


आज सरकार और उनके गृहमंत्री के सामने यह सब हो रहा है और लज्‍जाहीन गृहमंत्री अपने सामने होने की बात से इंकार कर रहे है इससे ज्‍यादा शर्म की बात और क्‍या हो सकती है? काग्रेसी नीति देश तोड़ो राज करो की नी‍ति थी, अखिर काग्रेस पैदाईस तो है अंग्रेजो की ही। गृहमंत्री को बाबरी ढ़ाचा याद आता है गुजरात याद आ जाता है किन्‍तु वो काग्रेंसियो द्वारा सिखों पर हमले को वो भूल जाते है, आखिर क्‍यो ? क्‍योकि खुद के दामन पर दाग आता है। जब तक देश में देश विरोधी शक्तियाँ सत्‍ता मे रहेगी 20 करोड़ मुस्लिम अल्‍पसंख्‍यक रहेगे और 2 करोड़ सिखों के साथ अन्‍याय किया जाता रहेगा।

आज वंदे मातरम गलत है तो कल को भारत के संविधान के खिलाफ फतावा जारी हो सकता है क्‍योकि संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है चाहे वो पुरूष हो या स्‍त्री पर इस्‍लाम की किताबो में लिखा है कि एक पुरूष की बयान दो महिलाओ के बराबर होती है। इस्‍लाम की कुछ ऐसी बाते जिसे संविधान प्रतिरोध करता है-
एक रखैल अपने मालिक की सम्पत्ति है, वह उसको कोड़े मार सकता है और बेच सकता है ।

भारतीय सविधान के अनुसार ऐसा कृत्‍य अपराध होगा।
वह एक बलात पत्नी है और वह अपने मालिक को उसकी इच्छानुसार उसके साथ संभोग करने से इंकार नहीं कर सकती, नही वह वहाँ से भाग सकती थी क्योकि भगोड़े दासों से संबंधित कानून वस्तुत: बहुत कठोर था।

महिला आयोग ही दंडा लेकर पीछे पड़ जायेगी।
यदि कोई स्त्री अपने पति से बुलाए जाने पर शय्या पर न आए तो वह फरिश्तों की बद्दुआओं का निशाना बन जाती है । यदि वह अपने पति की शय्या त्याग कर चली जाती है तो भी ठीक ऐसा ही होगा । ( बोखारी, खण्ड 7 पृष्ठ 93 )

आज के समय में स्त्रियाँ चाहे बद्दुआओं का निशाना बने या न बने, ऐसा कृत्‍य करने वाले इस्‍लामिक पुरूषो को महिला आयोग जरूर बद्दुआओं के शिकार हो जायेगे।
फिर जब हराम के महीने बीत जाएं, तो 'मुश्रिकों'* को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो, और उन्हें घेरो, और घात की जगह उनकी ताक में बैठो । फिर यदि वे ' तौबा ' कर लें नमाज कायम करें, और जकात दें, तो उनका मार्ग छोड़ दो । नि: सन्देह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है । *मूर्तिपूजको (कुरान - '10 पार: 9 शूर: 5 वीं आयत)

ये भारतीय दंड संहिता की धाराओ का उल्‍लंघन करती है।
ये तो कुछ ही बाते है जो भारतीय स‍ंविधान की भावना का अतिक्रमण करने है और भारतीय संविधान इसका अतिक्रमण करता है। इस लहजे से जब वंदेमातरम से अल्‍लाह नाराज हो जाता है तो भारतीय संविधान द्वारा अल्‍लाह के पावर में हस्‍तक्षेप कैसे अल्‍लाह और उनके कठमुल्‍ले कैसे बर्दाश्‍त कर सकते है? फतवा तो संविधान के खिलाफ होना च‍ाहिये। मुस्‍लमानो का संविधान के प्रति फतावा जरूरी भी है, क्योकि देश‍भक्ति जताने के लिये बंदेमातरम) जरूरी नही है उसी प्रकार मुस्लिमो के अनुसार देश में रहने के लिये संविधान भी जरूरी नही है। वैसे भी संविधान गैर इस्‍लामिक हो गया है, और मुस्लिमो के लिये भारत उनका कब रहा ही है जो वो संविधान से बंधे रहे ?
और अ़ंत में आज मुझे अपने हिन्‍दू होने और कहने पर गर्व है कि मै सूर्य, पृथ्वी, जल, वायु या प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष किसी के भी प्रति कृतज्ञता प्रकट कर सकता हूँ, जिससे हमें कुछ मिल रहा है हमारा धर्म हमें यही सिखाता भी है। क्‍योकि हमारा ईश्‍वर छुई-मुई जो नही है, कि छूने से ही मुरझा जाये।


सम्‍‍बन्धित अन्‍य लेख - इस्‍लाम का संदेश आतंक मचाओ हूर मिलेगी, मुस्लिम महिलओं का दर्द, आतंक की राह पर इस्‍लाम और कुरान


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क्‍या भारत में रणजी का सिर्फ मजाक भर ही है ?



मै भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच चल रहे क्रिकेट की बात नही कर रहा हूँ। मै आज बात करने जा रहा हूँ, मुम्‍बई और पंजाब के बीच खेले जा रहे रणजी किक्रेट मैच की। मै रणजी की बात कर रहा हूँ, मुझे मूर्ख ही कहा जायेगा क्‍योकि भारत में रणजी की बात करने वाले को मूर्ख ही कहा जाता है। वो भी तब जबकि भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच वन डे मैच आ रहा हो और भारत के समाने 350 रनो का विशाल लक्ष्‍य हो।
जिसे जो कहना हो कहे पर मै तो बात आज रणजी की ही करूँगा। आज पेपर में कल के मुम्‍बई और पंजाब खेल खत्‍म होने पर खबर थी - पंजाब का पलटवार शीर्षक था पंजाब ने मुम्‍बई के 244 के स्कोर पर सात विकेट ले लिये थे और पंजाब 14 रनो की बढ़त पर था। पर आज के तीसरे दिन जब मुम्‍बई न बैटिंग 244 के स्कोर पर सात पर शुरू की तो 471 के स्‍कोर पर 9 विकेट पर मुम्‍बई को धोषित करनी पड़ी, अर्थात 7 और 8 वें विकेट की साझेदारी में कुल 227 रन बने, वकई है न किक्रेट अनिश्चितता का खेल ? नौवे नम्‍बर पर बैटिंग करने उतरे रमेश पोवर ने शतक लगा कर 125 पर नाबाद रहे।
रणजी के खेल के प्रति न तो बीसीसीआई अपनी रूच‍ि दिखाती है और न ही सरकार, यही कारण है कि रणजी जैसे घरेलू महत्‍पूर्ण मैच के खिलाडियो के प्रदर्शन का नकार दिया जाता है। चेतेश्‍वर पुजारा ने रणजी ट्राफी के नौ मैच में 82.36 की औसत से 906 रन बनाए जिसमें चार शतक शामिल हैं। चोपड़ा ने रणजी और विजय हजारे दोनों में 60 से अधिक औसत से रन बनाए लेकिन यह चयनकर्ताओं का ध्यान खींचने के लिए पर्याप्त नहीं था। गुजरात के पार्थिव पटेल ने तो विकेट के आगे और विकेट के पीछे दोनों भूमिकाओं में प्रभावशाली प्रदर्शन किया है। 
भारत के वर्तमान समय के सबसे ज्‍यादा विकेट लेने वाले गेदबाज अजीत अगरकर को भी लगातार नजर अंदाज किया जा रहा है, जबकि वो अपने 300वे विकेट से मात्र 12 विकेट दूर है, और लगातार रणजी में उम्‍दा प्रदर्शन कर रहे है। गुजरात के स्पिनर मोहनीश परमार [पिछले रणजी सत्र में 42 विकेट], ने अपने प्रदर्शन से कई पूर्व क्रिकेटरों को कायल बनाया लेकिन वह भी बालाजी [36 विकेट] और सिद्धार्थ त्रिवेदी [34 विकेट] की तरह चयनकर्ताओं को प्रभावित नहीं कर पाए। आखिर ये क्रिकेटर लगातार अच्‍छा प्रदर्शन कर रहे है तो भी इन्‍हे राष्‍ट्रीय टीम में जगह क्‍यो नही मिल रही है ?
क्‍या भारत में रणजी का सिर्फ मजाक भर ही है ?
 


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