एक पत्र मित्रो को



ब्लॉगिंग की दुनिया को अलविदा कहे काफ़ी दिन गुजर चुके है, तब एक जूनून सा था लगता था हमारे हाथ मे कुछ तो है जहाँ से हम दुनिया बदले ना बदले पर हमने बदलने की कोशिश तो कर ही सकते थे। अपनी बात किसी ऐसे से कह सकते है जो पढकर अपनी राय भी रखता है, ऐसे मे जुडाव हो ही जाता है कुछ पसंद करते है कुछ नापसंद, यही जीवन है आप हर किसी को खुश नही रख सकते ।
अति हर एक की बुरी होती है हमने भी की, कुछ नुकसान भी उठाये पर यहाँ होने के फ़ायदे भी मिलें। बडे भ्राता जैसे मैथिली जी , समीर भाई ,ज्ञान जी अफ़लातून जी मिले छोटो में सिरिल, प्रमेंद्र, पी डी नीरज और कितने नाम गिनाऊ बहुत लंबी लिस्ट बन जायेगी सम कक्षो मे मसिजिवी जी, सुरेश जी, शिव जी, अविनाश जी, अजीत जी, संजय बेंगाणी, कृतीश भट्ट जी ( माफ़ी चाहूंगा आपका साथ बीच मे छॊडकर भाग आया) नीरज जी व डाक्टर साहब ढेरो लोगो से मित्रता हुई, जो अभी तक जारी है।
बहुत मुश्किल वक्त था वो ब्लोगवाणी को ना देखने का निर्णय, चैट पर अपने आप को अदश्य रखने का, अखबार ना पढने का और टीवी पर खबरो को गंभीरता से ना लेने के लिये, पर अब आदत वापस आ गई है। अब कोई फ़रक नही पडता मुझे चाहे सौ सैनिक मारे जाये और सरकार शाम को पार्टी मे चियर्स करने मे जुटी रहे, गृहमंत्री को अब अचानक माओवादी समस्या सिर्फ़ छतीसगढ की सरकार की जिम्मेदारी है दिखने लगता है
क्योकी वहा अल्पसख्यक वोट नही मर रहे है. वहा देश के लिये मरे सैनिको से किसी अल्पसंख्यक की भावना को ठेस नही लगती तब तक कोई समस्या नही. देश का क्या है जितनी देश मे ताकत कम होगी जितना बटवारा होगा जितनी आग लगी होगी राज करना उतना आसान होगा. तब भ्रष्टाचार महगाई का सवाल कही बहुत पीछे होगा. आतंकवाद के लिये हम पाक को दोषी ठहराते रहे है और रहेगे भी ,पर काग्रेस के समर्थन कारो के द्वारा माओवाद को पालकर उसकी इन आतंकवादी गति विधियो को सरकार की अनदेखी को क्या कहेगे ? क्या काग्रेस फ़िर से भिडारवाला की तरह माओवादियो को पराश्रय नही दे रही है ?

सिर्फ़ दुनिया को दिखाने के लिये कि हम कितने सेकुलर है सरकार ने कासिब के दो लोकल साथियो की पैरवी मे ढील देकर उन्हे बाईज्जत बरी करवाया , चार साल लगा दिये अजमेर बम ब्लास्ट मे मालेगाव की तर्ज पर जबरन हिंदू आतंकवाद का ढिढोरा बजाने के लिये ?

अब नही फ़डफ़डाता मेरी हाथ कूटू बोर्ड पर लिख कर पोस्ट करने के लिये ,चाहे कितनी गन्दी और शर्मनाक कितनी हरकते होती रहे अब मै लिखने के लिये नही मचलता ना ही नीरज को फ़ोन कर सुनाता हूँ कि ये खबर काहे नही दिखाते बिके हुये लोगो ।
लेकिन दिल का क्या करूँ जब देखता हूँ कि समाज के लोग नीचता के तमाम रिकार्ड ध्वस्त करने मे लगे है, अभी तक आक्सी एसीटॊन जानवरो से जबरन दूध निकालने के लिये प्रयोग होता था, जिसके कारण जहरीला दूध बालक पीते थे और उन जानवरो के मरने के बाद खाने वाले गिद्ध दुनिया से अलविदा हो गये। सरकार कहती है इसे बनाना गैर कानूनी है, लोग इसे अब सब्जियो को बडा करने के लिये इसका प्रयोग शुरु किया , और अब राजेस्थान के कई शहरो मे लोग इसे पाच सात साल की लडकियो को देश भर से उठाकर उन्हे आक्सी एसीटोन से डेढ दो साल मे ही जवान कर की सेकस मंडी मे बेचने लगे है दूध तो अब खैर निरमा की सफ़ेदी से ही बन जाता है, और ये सारे गिद्ध खुले घूम रहे है इन्सानो के वेश मे ?
क्या रक्खा है इन्सानियत मे ? कहा बचे है अब इन्सान ? भेड की खाल मे भेडिये चुने है हम ने . देश का चरित्र ही बदल कर रख दिया है इन्होने. साठ साल बहुत होते है किसी देश को बदलने के लिये .जापान को हिरोशिमा नागासाकी के बाद कुछ दशक ही लगे थे। पर हमे सदियाँ नही बदल पाई हम वही है वही थे और वही रहेगे जयचंदो को सम्मान पृथ्वीराज को अपमान यही परंपरा चली आई है।
 
देश के सैनिक देश मे मर रहे है लेकिन मारने वालो से सरकार की सहानुभूति है, छत्ती सगढ मे काग्रेस की सरकार का ना होना ही सबसे बडा कसूर बन गया है छत्तीसगढ का लिहाजा वहा का आतंकवाद काग्रेस समर्थित होने के कारण न्योचित है ,वहा किसी कार्यवाही के बजाय सैनिक मारने पर केन्द्र सरकार अपराधियो से हाथ जोड कर गुजारिश करती दिखती है . सारे देश का हाल कशमीरी पंडितो जैसा दिखता है, न्याय और अन्याय मे वोट बैंक का पलडा अन्याय को न्याय से ज्यादा बडा बना देता है।
देश का करोडो रूपया जा रहा है स्विस बैंको मे निर्बाध रूप से . दिल्ली मे जरुरत ना जरूरत देश का पैसा लग रहा है विकास हो रहा है पर जिस की कीमत पर वो मीलो सडक नाम की पगड्ण्डी पर बिना पैरो मे कुछ पहने भूखा प्यासा दो रोटी के चक्कर मे धक्के खाने मे लगा हुआ है .आखिर पिछले पचास सालो में देश के इन हिस्सों पर १००० करोड़ भी ना खर्च करने वाली सरकार पिछले दो साल में ५००० करोड़ रुपये सुरक्षा बालो पर खर्च कर चुकी है इस असमानता की कीमत तो देश ही चुकाएगा नेता नहीं
मीडिया नाम के इस चौथे खम्बे का हाल तीसरे खंबे से भी ज्यादा गलीच घ्रणित और गिरा हुआ हो गया है। एश ने क्या खाया, हालीवुड के किस हीरो ने किस हिरोईन को किस किया, दिखाने के लिये २४ घंटे पर खबरो के लिये वक्त नही । सोनिया के कमरे मे लाईट चली गई सारा हिंदुस्तान सर पर उठा लेंगे पर जिनके घर के चराग सोनिया के आंखे मूद लेने से हमेशा के लिये बुझ गये उनले किये एक पल नही।
ब्लॉ गजगत की उठापटक से भी मै इतना अनभिज्ञ नहीं हूँ जहाँ कोई किसी के धर्म को नीचा दिखाने में ऊर्जा लगा रहा है तो कोई किसी के कद को छोटा करने में लगा है। लगता ही नहीं की ये इतनी बड़ी बड़ी बाते करने वाले खुद इतने छुद्र दिलो दिमाग के होंगे। पर कभी कभी बहुत अच्छा लगता है की अब मै इनमे से एक नहीं, जहाँ कोई किसी को सम्मन भेजने की धमकी देता हो, जहाँ कोई किसी के घरो के पते छापता फिरता हो, जहाँ कोई गुट बनाकर दूसरो के ऊपर कीचड़ उछलता फिरता हो। नही दोस्त नही अब और नही मै अपने दिल के लिये कॊई बीमारी नही पालना चाहता, मै नही चाहता कि मै सारे जहाँ का दर्द महसूस करने के चक्कर मे खुद के लिये दर्द पाल लूँ। तुम चाहे कुछ भी कहो मै रेगिस्तानी ऊँट की तरह रेत मे सर डाल कर बैठना पसंद करूंगा। अब मै अंधड से टकरा कर आखो मे रेत नही भरना चाहूंगा। भले वो ब्लोगिंग की दुनिया का ही अंधड़ क्यों ना हो।
प्रमेन्द्र तुम्हारी बात अपनी जगह है पर मै कुछ अपने व्यावसायिक हितो तथा पारिवारिक एंव सामाजिक ( मेरे साथ कार्य कर रहे सभी लोगो की भी काफ़ी कुछ जिम्मेदारी मेरी ही बनती है )जिम्मेदारियो के चलते इस से दूर रहने के फ़ैसले कॊ ही सही पाता हू. मै तुम से एंव अपने सभी ब्लोगर मित्रो और शुभ चिंतको को उनके असीम प्यार के लिये कृतज हू और रहूंगा .परंतु मेरी खेद के साथ आप सब से विनम्र कर बद्ध प्रार्थना है कि मै कम से कम अभी पुन: आप सब के साथ ब्लोगिग की दुनिया मे कदम मिला कर नही चल पाउंगा .पुन: आप सभी को इस अकिंचन को इतना प्यार और सम्मान देने के लिये आभार.

मंजिले धुमिल हुई है
मिटे राह के नामो निशा
फ़िर से लंगर को उठा
चल पड़ा है कारंवा
अब तो फ़लक पर ही मिलेगे
जब होगा हाथो मे आसमा


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12 comments:

Udan Tashtari said...

जो तुमको उचित लगता हो वो ही फैसला लो. कोई दबाव नहीं, कोई प्रभाव नहीं. संबंध अपनी जगह और लिखना अपनी जगह!!

अनेक शुभकामनाएँ.

महाशक्ति said...

आपको जब यहाँ तक ले आये है तो नियमित तो करवा ही लेगे, मेरा मानना है कि बहुत लिखने की अपेक्षा अच्‍छा लिखना है, बस आपसे उसी अच्‍छे की अपेक्षा है।

SANJEEV RANA said...

भैया जी अपनी मन की भावनाओं को विस्तार दे दो यहाँ
मन में रखोगे तो सिर्फ शोले ही दहकेंगे

kshama said...

मंजिले धुमिल हुई है
मिटे राह के नामो निशा
फ़िर से लंगर को उठा
चल पड़ा है कारंवा
अब तो फ़लक पर ही मिलेगे
जब होगा हाथो मे आसमा

Kya kahen ? Kewal Bharat me nahi,poori duniya me insani zahniyat ek-si hai...

राजीव तनेजा said...

क्या लिखूँ.. कैसे लिखूँ...
लिखना मुझे आता नहीं...

टीवी की झकझक..
रेडियो की बकबक..
मोबाईल में एम.एम.एस..
कुछ मुझे भाता नहीं

भडास दिल की...
कब शब्द बन उबल पडती है
टीस सी दिल में..
कब सुलग पडती है...
कुछ पता नहीं


सोने नहीं देती है ..
दिल के चौखट पे..
ज़मीर की ठक ठक
उथल-पुथल करते..
विचारों के जमघट
जब बेबस हो..तमाशाई हो..
देखता हूँ अन्याय हर कहीं

फेर के सच्चाई से मुँह..
कभी हँस भी लेता हूँ
ज़्यादा हुआ तो..
मूंद के आँखे...
ढाँप के चेहरा...
पलट भाग लेता हूँ कहीं

आफत गले में फँसी
जान पडती है मुझको
कुछ कर न पाने की बेबसी...
जब विवश कर देती मुझको..


असमंजस के ढेर पे बैठा
मैँ'नीरो'बन बाँसुरी बजाऊँ कैसे
क्या करूँ...कैसे करूँ...
कुछ सूझे न सुझाए मुझे...

बोल मैँ सकता नहीं
विरोध कर मैँ सकता नहीं
आज मेरी हर कमी...
बरबस सताए मुझको


उहापोह त्याग...कुछ सोच ..
लौट मैँ फिर
डर से भागते कदम थाम लेता हूँ ...
उठा के कागज़-कलम...
भडास दिल की...
कागज़ पे उतार लेता हूँ

ये सोच..खुश हो
चन्द लम्हे. ..
खुशफहमी के भी कभी
जी लेता हूँ मैँ कि..
होंगे सभी जन आबाद
कोई तो करेगा आगाज़
आएगा इंकलाब यहीं..
हाँ यहीँ...हाँ यहीँ

सच..
लिखना मुझे आता नहीं...
फिर भी कुछ सोच..
भडास दिल की...
कागज़ पे उतार लेता हूँ मैँ"

अरुण जी आपसे निवेदन है कि ..अपने दिल की भड़ास को बाहर निकालने के लिए ब्लॉग पर नियमित हो जाइए

अंशुमाली रस्तोगी said...

आपकी चिंता पर सहमति बनती है मित्र।

राज भाटिय़ा said...

भाई मस्त मोले बनो, ओर इन लोगो की तर्फ़ ध्यान ही मत दो...
कबिरा तेरी झोपडी गल कट्यन के पास,
करेगा सो भरेगा, तु क्यो होत उदास.
आप ने अपने लेख मै सब सच ही लिखा है जिसे यहां सब अच्छी तरह जानते है, ओर इस कीचड से दुर ही रहते है.
धन्यवाद

dr k said...

hataasha aur niraasha se bhare is patr me bhi aap sachchai ko jhutlana nahee bhoole, aakhir ajmer aur malegaon ko yaad kar hi liya, meetha meetha aur aur kadva kadva thoo thoo, sachchai ko swikaarna seekho dost, mamle ka solution mil jayega aur ha'n wo chemical oxy acetone nahee "oxytocin" hai, lekin giddho ke marne ka karan "diclofenac sodium" naam ka dard nashak bataya gaya tha jo ab tak sabit nahee hua. -dr khan udaipur

Sanjeet Tripathi said...

bhai arun sahab, aap laute yahi kafi hai pahle to.

ePandit said...

आपका पुनः स्वागत है मित्र पंगेबाज। "परिचर्चा" के समय से आपके हास्य लेखन को पसन्द करता रहा हूँ। उसके बाद ब्लॉग पर उसका आनन्द उठाया। आपने मुझे हमेशा अपनत्व और सम्मान दिया। दो साल ब्लॉगिंग से दूर रहने के बाद जब मैंने जाना कि आपने ब्लॉगिंग तो छोड़ी ही साथ ही अपनी वो तमाम सुन्दर रचनायें भी मिटा दी तो बहुत अफसोस हुआ। ब्लॉगिंग छोड़ना आपका फैसला था लेकिन उन रचनाओं पर कुछ हक पाठक के नाते हमारा भी बनता था। एक लेखक जब कुछ रचना करता है तो उस रचना पर पाठकों का भी कुछ जुड़ाव होता है।

मैंने हमेशा आपसे कहा कि ये धर्म सम्बंधी नूरा-कुश्ती वाला लेखन छोड़कर अपनी हास्य शैली का लेखन करें। ऐसा क्यों लिखें जिससे किसी को कष्ट हो बल्कि वो लिखें जिससे सबके चेहरे पर मुस्कान आये। आज भी मैं आपसे यही कहता हूँ हमें पंगेबाज की कलम का इंतजार है। हाँ पारिवारिक जिम्मेदारियाँ पहले हैं, उनसे समय मिले तो कभी-कभार लिख लिया करें।

डा० अमर कुमार said...


अब मान भी जाओ, अरूण जी !
आज की पोस्ट में इतना अच्छा ट्रेलर दिखला दिया,
अब पूरी फ़िल्म भी दिखला दो, भाई !

Pratik Pandey said...

आपकी लेखनी एकबार फिर पढ़कर अच्छा लगा। वही संवेदना, वही ऊर्जस्विता और वही क़लम की धार। क्या ज़रूरी है कि दूसरी चीज़ों के लिए इन्हें फीका पड़ने दिया जाए? क्या चीज़ें समानान्तर नहीं चल सकती हैं? आप लिखें या न लिखें, विसंगतियों से उपजी हृदय की वेदना दबाने से भला कहाँ दबती है? आम से दिखने वाले लोगों की अंतर्पीड़ा ही क्रांति की दावानल प्रज्वलित करती है। ज़्यादा क्या कहूँ, यह देखना दिलचस्प रहेगा कि व्यावहारिक मस्तिष्क और संवेदनशील हृदय में अंततः विजय किसकी होती है?