वीर सावरकर से अन्याय!



वीर सावरकर से अन्याय!वीर सावरकर से अन्याय!

महात्मा गाँधी का कहना था-शांति- शांति-शांति
जबकि वीर सावरकर का नारा था -क्रांति-करांति-क्रांति।
लेकिन अफ़सोस आज हम उस मुकाम पर खड़े है जहाँ से इतिहास हमें चुनोती दे रहा है। आज कि पीढी वीर सावरकर के बारे मैं कुछ ज्यादा नहीं जानती है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता का रोना रोने वालो ने देश मैं क्रांति का उदघोष करने वालो से अन्याय किया, उनका पूरा इतिहास सामने ही नहीं आने दिया। लाल रंग मैं रंगे बिके हुए इतिहासकारों ने क्रांतिकारिओं के इतिहास को विकृत किया । पाठ्य पुस्तकों से उनके जीवन सम्बन्धी लेख हटाये गए।
वीर सावरकर एक महान राष्ट्रवादी थे। भारतीय स्वंत्रता संग्राम मैं उनकी भूमिका अतुलनीय है। वीर सावरकर भारत के पहले क्रन्तिकारी थे जिन्होंने विदेशी धरती से भारत कि स्वाधीनता के लिए शंखनाद किया। वो पहले स्वाधीनता सेनानी थे जिन्होंने भारत कि पूर्ण स्वतंत्रता कि मांग की। वो पहले भारतीय थे जिनकी पुस्तके प्रकाशित होने से पहले ही जब्त कर ली गई और वो पहले छात्र थे जिनकी डिग्री ब्रिटिश सरकार ने वापिस ले ली थी। वस्तुत: वह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी, क्रांतिकारिओं के प्रेरणास्त्रोत, अद्वितीय लेखक, राष्ट्रवाद के प्रवर्तक थे, जिन्होंने अखंड हिंदुस्तान के निर्माण का संकल्प लिया।
उनका सारा जीवन हिंदुत्व को समर्पित था। उन्होंने अपनी पुस्तक 'हिंदुत्व' मैं हिन्दू कोण है की परिभाषा मैं यह श्लोक लिखा--
"आसिंधू सिन्धुपर्यन्तास्य भारतभूमिका ।
पितृभू: पुन्याभूश्चैवा स वै हिन्दूरीति स्मृत:।। "
जिसका अर्थ है कि भारत भूमि के तीनो ओर के सिन्धुओं से लेकर हिमालय के शिखर से जहाँ से सिन्धु नदी निकलती है, वहां तक कि भूमि हिंदुस्तान है एवं जिनके पूर्वज इसी भूमि पर पैदा हुए है ओर जिनकी पुण्य भूमि यही है वोही हिन्दू है। " सावरकर का हिन्दू धर्मं से नहीं एक व्यवस्था, आस्था, निष्ठा, त्याग का परिचायक है, जो सामाजिक समरसता को बढ़ने मैं अग्रसर हो।
वह तो फिरंगियों की चल से उद्वेलित थे जो जो की हिंदुस्तान मैं अपनी सत्ता को कायम रखने की लिए साम्प्रदायिकता को बढावा दे रहे थे। अंग्रेजो द्वारा देश के किसानों मजदूरों पर जुल्म ढहाने वाले उनके कतई बर्दाश्त नहीं थे। उन्होंने हिंदुत्व के नाम पर देश को संगठित करने का प्रयत्न किया। वीर सावरकर के क्रन्तिकारी विचारो और राष्ट्रवादी चिंतन से अंग्रेजो की नींद हरम हो गई थी और भयभीत अंग्रेजी सत्ता ने उन्हें कालापानी की सजा दी ताकि भारतीय जनता इनसे प्रभावित होकर अंग्रेजी सत्ता को न उखाड़ फैंके। वीर सावरकर ने अपनी निष्ठां और आत्मसम्मान पर कभी भी आंच नहीं आने दी। मदन लाल ढींगरा ने १ जुलाई ,१९०९ को कर्जन वायले की हत्या कर दी तब इंडिया हॉउस मैं इस हत्या की निंदा करने के लिए एक सभा हुई जिसमें सर आगा खान ने कहा की यह सभा सर्वसम्मति से इस हत्या की निंदा करती है। इतने मैं वीर सावरकर ने निर्भय होकर कहा "केवल मुझे छोड़कर"।
वीर सावरकर पर यह भी आरोप भी लगाया गया की उन्होंने मदन लाल ढींगरा को उकसाकर कर्जन वायले की हत्या करवाई है। १३ मार्च १९१० को उन्हें लन्दन के विक्टोरिया स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। उससे पूर्व उनके दोनों भाइयों को भी क्रन्तिकारी गतिविधियों के लिए जेल मैं बंद कर दिया गया था। वीर सावरकर को जब इस बात का पता चला तो वे गर्व के साथ बोले "इससे बड़ी और क्या बात होगी की हम तीनो भाई ही भारत माता की आजादी के लिए तत्पर है।" इतिहास साक्षी है की १ जुलाई १९१० के ब्रिटेन से भारत ले जाने वाले समुद्री जहाज मैं सावरकर को बैठाया गया और वो ८ जुलाई १९१० को "स्वतंत्र भारत की जय" बोल कर समुद्र मैं कूद पड़े। अंग्रेजो ने खूब गोलियां चलाई पर निर्भय सावरकर लगातार कई घंटे तैरकर फ्रांस की सीमा मैं पहुँच गए जहाँ उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग मैं मुकदमा चलाया गया और उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। जज ने जब उनसे कहा की अंग्रेज सरकार आपको ५० साल बाद रिहा कर देगी तो उन्होंने मजाक उड़ते हुए कहा की क्या अंग्रेज ५० वर्षो तक भारत मैं टिके रहेंगे। सजा सुनते ही उन्होंने व्यंग्य किया- चलो इसाई सत्ता ने हिन्दू धर्म के पुनर्जन्म के सिधांत को मन लिया है।
वीर सावरकर को कला पानी की सजा के दोरान भयानक सैल्यूलर जेल मैं रखा गया। उन्हें दूसरी मंजिल की कोठी नंबर २३४ मैं रखा गया और उनके कपड़ो पर भयानक कैदी लिखा गया। कोठरी मैं सोने और खड़े होने पर दीवार छू जाती थी। उन्हें नारियल की रस्सी बनाने और ३० पोंड तेल प्रतिदिन निकलने के लिए बैल की तरह कोल्हू मैं जोता जाता था। इतना कष्ट सहने के बावजूद भी वह रत को दिवार पर कविता लिखते, उसे याद करते और मिटा देते। १३ मार्च १९१० से लेकर १० मई १९३७ तक २७ वर्षो की अमानवीय पीडा भोग कर उच्च मनोबल, ज्ञान और शक्ति साथ वह जेल से बाहर निकले जैसे अँधेरा चीर कर सूर्य निकलता है।
आजादी के बाद भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस ने उनसे न्याय नहीं किया। देश का हिन्दू कहीं उन्हें न अपना नेता मन बैठे इसलिए उन पर महात्मा गाँधी की हत्या का आरोप लगा कर लाल किले मैं बंद कर दिया गया। बाद मैं न्यायालय ने उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया। पूर्वाग्रह से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें इतिहास मैं यथोचित स्थान नहीं दिया। स्वाधीनता संग्राम मैं केवल गाँधी और गांधीवादी नेताओं की भूमिका का बढा-चढ़ाकर उल्लेख किया गया।
वीर सावरकर की मृत्यु के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें नहीं छोडा। सन २००३ मैं वीर सावरकर का चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष मैं लगाने पर कांग्रेस ने विवाद खडा कर दिया था। २००७ मैं कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर ने अंडमान के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर के नाम का शिलालेख हटाकर महात्मा गाँधी के नाम का पत्थर लगा दिया। जिन कांग्रेसी नेताओ ने राष्ट्र को झूठे आश्वासन दिए, देश का विभाजन स्वीकार किया, जिन्होंने शेख से मिलकर कश्मीर का सोदा किया, वो भले ही आज पूजे जाये पर क्या वीर सावरकर को याद रखना इस राष्ट्र का कर्तव्य नहीं है???आजादी केवल गांधीवादियों की देन नहीं है बल्कि भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद,राजगुरु,सुखदेव,नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और वीर सावरकर जैसे कर्न्तिकारियों के बलिदानों के चलते ही मिली है।। राष्ट्र इन सभी के बलिदानों को याद रखे और इन्हें सम्मान दे।

स्वातन्त्र्यवीर सावरकर कौन थे ?
१. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्वतन्त्रता के लिए क्रान्तिकारी अभियान चलाने वाले पहले भारतीय थे वीर-विनायक दामोदर सावरकर।
२. मुद्रित और प्रकाशित होने के पूर्व ही दो शासनों ने जिनकी पुस्तकें ज़ब्त घोषित कर दीं, ऐसे पहले लेखक थे स्वातन्त्र्यवीर सावरकर।
३. भारत की स्वतन्त्रता के लिए संघर्षरत रहने के कारण जिन्हें एक भारतीय विश्व-विद्यालय की अपनी उपाधि से वंचित होना पडे़, ऐसे पहले स्नातक थे वीर विनायक सावरकर।
४. दो जन्मों का आजीवन कारा-दंड मिलने पर भी उससे बचने के बाद भी क्रियाशील रहे, विश्व के ऐसे पहले राजवंशी थे तात्या सावरकर।
५. ब्रिटिश न्यायालय के अधिकार को अमान्य करने वाले भारत के पहले विद्रोही नेता थे स्वातन्त्र्य वीर सावरकर।
६. राजनिष्ठा की शपथ लेने से इंकार कर देने के कारण जिन्हें बैरिस्टर की उपाधि प्रदान नहीं की गयी, ऐसे पहले भारतीय छात्र थे वीर सावरकर।
७. भारतीय राष्ट्र जीवन को सभी स्तरों पर पुनर्गठित करने पर जिन्होनें गंभीरता से विचार किया और अपनी रत्नागिरी की स्थानबद्धता के काल-खंड में जिन्होने अस्पृश्यता को मिटाने और जातिमुक्त समाज निर्माण के लिए तीव्र अभियान आरंभ किया, ऐसे पहले क्रान्तिकारी नेता थे स्वातन्त्र्यवीर सावरकर।
८. सार्वजनिक सभा में विदेशी कपडो की होली जलाने का साहस दिखाने वाले पहले राजनीतिक नेता थे राष्ट्र-व्रती सावरकर।
९. "संपूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता" ही भारत का ध्येय है, ऐसी साहस-पूर्ण घोषणा करने वाले पहले युग नायक थे सावरकर।
१०. लेखनी और कागज से वंचित होकर भी जिन्होंने काव्य सृजन किया, कविताओं को अंडमान की कालकोठरी की दीवारों पर कांटों से अंकित किया। उनकी यह सहस्र पंक्तियां वर्षों तक स्मरण रखकर बाद में उन्हें अपने सहबंदियों द्वारा स्वदेश पहुंचाने वाले विश्व के पहले कवि थे विनायक दामोदर।
११. विदेशी भूमि पर जिनका बंदी बनाया जाना देश के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में प्रतिष्ठा का विशय बनकर उभरा, ऐसे पहले राजबंदी थे सावरकर।
१२. योग की सर्वोच्च परंपरा के अनुसार जिन्होंने "आत्मार्पण" द्वारा मृत्यु का स्वेच्छा से आलिंगन किया ऐसे प्रथम और एकमेव क्रान्तिकारी थे संगठक सावरकर।
प्रस्तुति: सावरकर सेना
साभार : शोध-वाहिनी, राष्ट्र-योग शोध मंत्रालय, संक्रान्ति
नेता जी सुभाषचंद्र बोस सम्बंधित आतिरिक्त लेख -


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18 comments:

Satyajeetprakash said...

जब हम खुद ही नहीं पहचान पा रहे हैं तो सावरकर को कैसे पहचानेंगे.

aarya said...

इस महान आत्मा माँ भारती के वीर सपूत को मेरा कोटि कोटि प्रणाम !
आपने काफी जानकारी दी इसके लिए आपको धन्यवाद !
रत्नेश त्रिपाठी

माधव said...

well said

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

गोयबल्स के उत्तराधिकारियों ने वीर सावरकर के साथ अन्याय ही नहीं घोर अन्याय किया... नमन वीर सावरकर को...

राज भाटिय़ा said...

नमन वीर सावरकर को

SANJEEV RANA said...

नमन वीर सावरकर को

ePandit said...

इस बेहतरीन लेख के लिये आभार।

वीर सावरकर सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी तथा क्राँतिकारी ही नहीं बल्कि एक विचारक और दार्शनिक भी थे। यदि देश उनके विजन पर चल पाता तो आज दुनिया में भारत की तस्वीर ही कुछ और होती।

वीर सावरकर जैसे महापुरुष युगों में जन्म लेते हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह श्री सावरकर को हर जन्म भारतभूमि में ही दे।

ePandit said...

रही बात कॉंग्रेस की तो उसका इतिहास ही रहा है कि गैर गाँधी-नेहरु परिवार के महापुरुषों को खुड्डेलाइन लगाना। जनता कॉंग्रेस द्वारा थोपे गये इस परिवार के कथित महापुरुषों से उब चुकी है। कॉंग्रेस द्वारा इतना उपेक्षित किये जाने के बावजूद भी युवा पीढ़ी अपना आदर्श सुभाष, भगत सिंह और सावरकर जैसे महापुरुषों में देखती है।

प्रवीण पाण्डेय said...

वीरों को यथोचित सम्मान न मिल पाना हमारे देश का दुर्भाग्य है ।

K M Mishra said...

अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले महात्मा गांधी ने भी 1942 में ”करो या मरो“ का नारा दिया था । भारत छोड़ो आंदोलन विशुद्ध रूप से एक हिंसक आंदोलन था । वो तो भला हो विश्वयुद्ध द्वितीय का जो ब्रिटेन संग पूरा यूरोप तबाह हो गया नहीं तो आजादी 1947 के बजाय 1977 या 1987 में हासिल होती । गांधी, नेहरू कब के हेरा गये होते ।

Krishna Kant Pandey said...

bilkul anyay hua hai hamare veer savarkar k sath. kaise nehru parivar k jitne log hain wo hero ban jate hain aur baki k bare me kuchh likha hi nahi jata. jo bhi congress me nahi the unka nam nahi aata hai. congress ki bat hi chhod dijiye jo nehru khandan me the sirf unhi ko promote kiya hai congress ne. aazadi k bad nehru ne communisto se ek samjhauta kiya ki satta mujhe sambhalne do aur shiksha vyavastha tum dekho. books likhne ka kam communisto ko diya gaya jo ki apni marji se tod marodkar likha. unhe savarkar aur hedgevar aur guru ji kyu yad rahe? communist aur congress k log hote hi aise hain jinhe sachchai se matlab hota nahi hai. sirf apne fayde ke liye kam karte hain. pandit nehru ne apne family ko promote karne k alawa desh k liye kiya kya hai? unka goal to indira ko pm banane par jyada aur desh k vikas par kam tha. jo ki unhone kar liya. indira ne bhi wahi kiya. aaj congress chaplusi par chal rahi hai. Rahul k liye pm ka pad chhodne ko raji hain manmohan. kya hai ye? chaplusi hi to hai.

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, सम्पादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक), जयपुर (राजस्थान)/Dr. Purushottam Meena Editor PRESSPALIKA,(Fortnightly) Jaipur, Rajasthan said...

जिन्दा लोगों की तलाश!
मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!


काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=

सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-

(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666

E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

atul said...

mera in kartikari bhaio ko sat sat naman. Aaj bhi desh me har taraf bhastachar falata huwa hai, kashmir, asam, purvotar, atakwad se jal raha hai, naksali adhe hindustan ko dara rahe hai aur hamari nikami sarkar aur neta kuch bhi nahi kar pa rahe . Aaj desho ko in logo ki jarurat pahle se jayada hai

pandit visnugupta said...

or fir bhi is desh ke kayar log aaj bhi un angrejo ki tatti kha kar esa mahsus karate hai ki "he angrejiyat teri tatti kha kar main dhany ho gaya"

dhikkar hai ese kayar hinduo par

jai veer savarkar

vishwajeetsingh said...

माँ भारती के अमर सपूत , लेखक , समाज सुधारक , क्रान्तिकारी और आत्मबलिदानी स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर को कोटि - कोटि नमन । वन्दे मातरम्

राजीव नन्दन द्विवेदी said...

सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते नहीं.

Naval Kishore said...

इस महान आत्मा माँ भारती के वीर सपूत को मेरा कोटि कोटि प्रणाम !जय हिन्द

Naval Kishore said...

इस महान आत्मा माँ भारती के वीर सपूत को मेरा कोटि कोटि प्रणाम !जय हिन्द