कानपुर की दास्‍तान



कानपुर जाना मुझे बहुत अच्‍छा लगता है, हमेशा दिल करता है कि काश कानपुर छूटा होता है! विधि स्‍नातक हो गया हूँ। इस समय विधि‍ लॉ ग्रेजुएट होने के बाद मुझे निरंतर कानपुर के सम्‍पर्क मे रहना पड़ रहा है। ऐसा कोई महीना नही होता है कि मुझे कानपुर न जाना पड़ रहा है और रिजर्ल्‍ट के बाद तो अब कुछ दिनो लगातार आना जाना लगा ही रहेगा। जब भी मै कानपुर गया हूँ चाहे अनूप शुक्‍ल "फुरसतिया"जी से व्‍यक्तिगत मुलाकात हुई हो या न हुई हो मै कानपुर पहुँच कर मोबाइल टॉक जरूर कर लेता हूँ।
कानपुर की दास्‍तान

कल कानपुर अकेले गया था, कल्‍याणपुर में कानपुर विश्वविद्यालय मे अपना काम करवाते हुये मुझे 3 बज गये थे, मेरा मानना है कि परिवार और दोस्‍त किसी भी व्‍यक्ति का अहम हिस्‍सा होते है। ऐसे ही कानपुर के हमारे एक अधिवक्ता मित्र भाई दुर्गेश सिंह लगातार हमारी खैरियत पूछ रहे थे, भोजन किया कि नही, जल्‍दी कर जो, जल्‍दी काम करके घर आ जाओ, इस प्रकार का अपनापन बहुत अच्‍छा लग रहा था। कानपुर विश्वविद्यालय से काम करवाने के बाद मै दुर्गेश जी के पास गया तो वे पहुँचते ही, खाने पानी के बंदोबस्‍त मे लग गये। समय के बाद भूख खत्‍म हो जाती है किन्तु सामने आये खाने का अनादर भी नही करता चाहिये, भोजन हुआ और बहुत सी ढ़ेर सारी बाते तो शाम हो गयी तो नौबस्‍ता का एरिया भी घुमने निकल दिये, टहल कर लौटा तो सीधे बिस्‍तर ही नज़र आया। 
सुबह जल्‍दी उठने की आदत के कारण 5 बजे उठ गया था, और सुबह उठ कर एरिया मे घूम भी लिया था, कल शाम मुझें याद था कि नौबस्‍ता जाते समय बारादेवी (बाराह देवी मंदिर) का मुहल्‍ला पड़ा था, जहाँ मम्‍मी जी के साथ सब्‍जी आदि लेने आते थे। तो सुबह मन कर गया क्‍यो न अपने पुराने घर पर भी हो लिया जाये, जहाँ मैने अपने बचपन के 6-7 साल गुजारें थे। इसी लिये मै मित्र दुर्गेश के घर से भी 6 बजे निकल लिया था ताकि अपने घर की ओर भी जा सकूँ, बारादेवी से ट्रंसपोर्ट नगर पहुँचा वहाँ से अपने घर के मोहल्‍ले ढकना पुरवा भी पूछते पूछते पहुँच गया।
मोहल्‍ला ढकना पुरवा मे इतना बदलाव हो चुका है कि कुछ भी पहिचान पाने की स्थिति मे मै न ही था। एक बुर्जग मिले तो मैने अपने घर के पास के स्थिति भैरव बाबा के पार्क के बारे मे पूछा तो मुझे विपरीत दिशा मे दिखाने लगे जिधर मै आशा करता था कि मेरा घर उधर है। फिर मैने अपने पिताजी का नाम बता कर पूछा कि मुझे उनके घर जाना है तो मुझे क्‍लाइंट जान कर यह बताने लगे कि अब सब इलाहाबाद मे रहते है और वहाँ का रटाराटाया पता देने लगे, फिर मैने जोर देकर कहा कि मै श्री भूपेन्‍द्र नाथ सिंह का लड़का हूँ और मै अपने घर जाना चाहता था। जैसे उनको पता चला कि मै उनका लड़का हूँ वो वह व्‍यक्ति बोला कि बबुआ तुम उनके लड़के हो, जब तुम इयां से गयेन रहेव तो बहुत छोटे छोटे रहेव यह कहने हुये वह व्‍यक्ति अपना काम छोड़कर मुझे घर तक छोड़ने आया। 
जैसे उस व्‍यक्ति ने वहाँ एक दो लोगो को बताया कि देखो भाईजी के लड़के आये है तों आस पास की लोगो की भीड़ ही लग गई। मानो मै कोई लॉटरी का नम्‍बर लेकर बैठा हूँ और सब अपना नम्‍बर देखने को उतावले हो, जब मैने 1993 मे कानपुर छोड़ा था तो लॉटरी का व्‍यवासाय चरम पर होता था और लॉटरी का नम्‍बर देखने को बहुत भीड़ लगती थी। हर मुँह से एक ही बात बेटवा हमका पहिचानेव, सभी चेहरे पर 17 साल बाद की सिकन आ चुकी थी किन्‍तु कोई भी पुराना चेहरा अंजाना नही था। सब को फला की आम्‍मा और फला के पापा कह कर मै पहचान रहा था। क्‍योकि मेरी यादें भी धुधली हो चुकी थी।
मेरे पड़ोस मे एक नाऊन रहती हैनाम तो मै नही जानता हूँ किन्‍तु उन्‍हे बचपर मे मोलमल कहता था, करीब 75 साल की, वह बहुत अच्‍छी महिला है एक हाथ मे फालिस मार गया मै उसकी स्थिति देख कर अपने को अपने का रोक नही पाया और 17 साल पुरानी यादों को लेकर गले लिपट कर रो पड़ा, उनकी एक ही बाद दिल का लग गई कि कहाँ रहेन इतने दिन कर आज दादी के याद आईन है। 17 साल बाद भी वही अपनत्‍व पा कर दिल खुश हो रहा था। उन गलियों मे भी गया जहाँ चोर सिपाही खेला करता था, रेलवे का टुनटुनिया पाटक भी देखने गया तो बंद होने समय टुनटुन की आवाज करता था।
चाय-पानी हुआ, फिर सभी ने खाने पर जोर दिया किन्‍तु भूख न होने के कारण मैने खाने से मना कर दिया। सबने बहुत रोकने की कोशिश की बेटवा आज रात यहीन रूक जाओ मैने यह कह कर कि जल्‍द फिर आऊँगा, तो फिर सब माने, मोहल्‍ले की बुर्जुग महिलाये एक ही बात कह रही थी बेटवा एक बार अम्‍मा (मेरी मम्‍मी) से मिलवाय देव, देखे बहुत दिन होई गये है पता नही कब जिंदगी रहे कि न रहे, वाकई 17 साल बहुत होते है। फिर मोहल्‍ले के एक भइया के मित्र मुझे कानपुर सेट्रल पर छोडने भी आयेए बहुत कुछ बदल गया था किन्‍तु न बदला तो लोगो का प्‍यार और अपनत्‍व।


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8 comments:

kshama said...

फिर मोहल्‍ले के एक भइया के मित्र मुझे कानपुर सेट्रल पर छोडने भी आयेए बहुत कुछ बदल गया था किन्‍तु न बदला तो लोगो का प्‍यार और अपनत्‍व।
Sabse adhik mahatv yahee baat rakhti hai..!

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी आत्मीयता से भरी यात्रा ।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भई आपका कानपुर अपने घर लौटने का वाक़या पढ़ कर अच्छा लगा. सही बात है कि आज भी लोग रिश्तों को वही तरजीह देते हैं.

महेन्द्र मिश्र said...

कानपुर से आपके पुराने रिश्तों के बारे में पढ़कर अच्छा लगा. बढ़िया यात्रा संस्मरण ...

Udan Tashtari said...

यही आत्मियता तो खींचती है बरबस अपनी ओर...कितने अपने हैं वो जो बिछुड़ कर भी नहीं बिछड़ते कभी..


सुन्दर वृतांत.

PD said...

पूरे दिल से लिखा गया है यह पोस्ट.. बहुत सारी यादें आपने बातें हमारे साथ.. अच्छा लगा पढ़ कर.. Thanks Pramendra bhai.

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

बहुत सुन्दर लिखा है भाई.. आपकी यादो और भावो से सजी ये पोस्ट सीधे दिल तक जाती है.. आत्मीयता से भरी हुयी...

दिवाकर मणि said...

भाई, जहां से पुराना नाता रहता है, उसके छूटने के बाद फिर उसे पकड़ने पर आत्मीयता और भी ज्यादा गहरे तक उतर जाती है. अच्छा लगा यह पोस्ट पढ़कर...
ससुराल के रूप में कानपुर से अपना भी रिश्ता एक साल पहले से जुड़ गया है...मैनचेस्टर के रूप में ख्यात कानपुर आज "पत्थरों के पार्क" की राजनीति करने वाले लोगों की उदासीनता के कारण रसातल में जा रहा है....कल तक जो कानपुर एक महानगर हुआ करता था, असंख्य परिवारों का पेट भरने में सक्षम वर्तमानकालीन कानपुर को देखकर मन व्यथित हो जाता है....