बिनु हनुमाना न पूर्ण होई राम काजा



अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्‍य मंदिर जल्द बने इस हेतु सम्‍पूर्ण भारत वर्ष में हनुमत शक्ति जागरण अभियान का आयोजन हो रहा है। इस आयोजन मे 16 अगस्‍त से 19 नवम्‍बर के मध्‍य सम्‍पूर्ण भारत मे हनुमंत जागरण पाठ किया जाएगा और हर हिन्‍दुस्‍थानी के घर पर हनुमान चालीसा का वितरण भी किया जायेगा। निश्चित रूप से इस अभियान से एक आंदोलन तो होगा ही साथ ही साथ भक्ति आंदोलन का भी आगाज़ होगा। यह भक्ति आंदोलन 19 नवम्बर तक चलेगा। इसके तहत देश के करीब तीन लाख गांवों के मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ किया जाएगा। इस कार्यक्रम में करीब 8 करोड़ लोग शामिल होंगे।

आप भी इस अभियान से जुड़े और इस कार्यक्रम को सफल बनाये


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विभूति नारायण की कहानी पत्रकारिता के चौपट पत्रकारों की जुबानी



कितना अच्‍छा लगता है न जब नारी को छिनार बनाने वाले लोग ही किसी विशेष परिस्थिति मे नारी को छिनार कहे जाने पर विरोध करें, ऐसे ही कुछ मीडिया के महानुभाव लोग "छिनार मुक्ति मोर्चा" का गठन किये हुये है। जब तक स्‍वयं छिनार बनाओ आंदोलन छेड़ा हुआ था तब तक तो ठीक था किन्तु जब किसी ने वर्तमान परिदृश्य को छूने की कोशिश की तो यह बुरा लगने वाला प्रतीत हो रहा है।
आज की जो परिस्थित है वह बहुत ही निन्‍दनीय और सोचनीय है, आज मोहल्‍ला ब्‍लाग समूह बड़ी तेजी से विभूति नारायण को कुलपति पद से हटवाने के पीछे पड़ा हुआ है। यह वही मोहल्‍ला है जिसने पूर्व के वर्षो मे अपनी गंदगी से काफी समय पूर्व तक बदबू फैला हुये था, ऐसा है मोहल्‍ला जहाँ कि सडंध से लोग दूर भागते फिरा करते है।
बात यहाँ विभूति की नही है बल्कि बात यहाँ उनके कुलपति के पद की है, अगर वि‍‍भूति नारायण कुलपति न होते तो शायद ही इतना बड़ा मुहीम उनके खिलाफ चलाया गया होता। व्‍यक्ति की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता भी कुछ होती है और उस व्‍यक्ति ने पिछले कुछ समय से कुछ ऐसी महिलाओ को कहा जो अनर्गल लेखन का सहारा ले रही है। यदि इस देश मे फिदा हुसैन जैसे लोगो को अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार है कि हिन्‍दुओ के आराध्‍यों के नग्न चित्र बनाया जा सकता है किन्‍तु अन्‍य व्यक्ति मर्मस्‍पर्सी भावनाओ को अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता नही कहा जा सकता है। अब कुछ ऐसे महानुभाव लोग यह कहते है कि अब अगर मकबूल फिदा हुसैन हिंदू को पेंटिंग में नहीं, इंटरव्‍यू में गाली देते तो उनका भी शर्तिया विरोध होता इसी प्रकार के विचित्र प्राणी भी इसी धरा पर विराजते है यह आज पता चला, कि दोहरे मापदंड ऐसे निकाले जाते है।
यह किसी को इसलिये पेंट मे दर्द नही हो रहा कि पिछले कुछ वर्षो की कुछ लेखिकाएँ छिनार हो गई अपितु पेंट के दर्द का असली कारण यह कि है कोई संवैध‍ानिक दायित्‍व(कुलपति) पर बैठा व्‍यक्ति कैसे यह कह सकता है, इसका सारा अधिकार तो मोहल्‍ला के पत्रकारो का ही कि वो किसे छिनार बोलवाये और किसे नही, क्‍योकि पत्रकार बन्‍धु लोग तो पत्रकारिता की छात्राओं के साथ छेड़खानी करते है तो किसी नार‍ी के दामन दंगा न ही होता अपुति उस समय पत्रकार उसी शोभा मे चार चांद लगाने का प्रयास कर रहा होता है।
बात यहाँ विभूति नारायण की नही है बात यहाँ मह‍ात्‍मागांधी विश्वविद्यलाय में अपनी दाल गलाने की, पूर्व में कभी दाल नही गली रही होगी तो आज कलम के सिपाहीगण, कमल की धार के बल पर विभूति नारायण सामाजिक बलात्‍कार करने मे जुट गये, समकालीन मे कुछ पत्रकारों को तरह तरह के बलात्कार करने प्रचलन ही चल गया है, कभी कोई स्त्री का करता है तो कभी नाजायज़ स्‍त्री विमर्श का विरोध करने वाले है इसी प्रकार लगातार कुछ लोगो के कारण झूठे का बोल-बाला और सच्‍चे का मुँह काला किया जा रहा है। क्‍योकि आज पत्रकारिता की कलम कुछ ऐसे ही अधेर नगरी के चौपट राजाओ के हाथ लग गई है।


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तुम्‍हारी पालिटिक्‍स क्‍या है पार्टनर !



अभी तक तस्‍लीमा नसरीन और मकबूल फिदा हुसैन की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर जो जार-जार आंसू बहा रहे थे, सत्‍ता के दमन को जी-भर कोस रहे थे, छिनाल प्रकरण के बाद वह खुद बेपर्दा हो गये। विभूति राय ने जो कहा वह तो अलग विमर्श की मांग करता है लेकिन जिस तरह सजा का एलान करते हुये स्‍वनाम धन्‍य लोग विभूति के पीछे लग लिये उसने कई सारे सवाल पैदा कर दिये।
विभूति राय की टिप्‍पड़ी के बाद विरोध का पूरा का पूरा माहौल ही दरबारीनुमा हो गया। ज्‍यादातर, एक सुर मेरा भी मिलो लो की तर्ज पर विभूति की लानत मनालत में जुटे हैं। हमारे कई साथी तो इस वजह से भी इस मुहिम का हिस्‍सा बन लिये की शायद इसी बहाने उन्‍हें स्त्रियों के पक्षधर के तौर पर गिना जाने लगे। लेकिन एक सवाल हिन्‍दी समाज से गायब रहा कि- विभूति की‍ टिप्‍प़डी़ के सर्न्‍दभ क्‍या हैं। इस तरह एक अहम सवाल जो खड़ा हो सकता था, वह सामने आया ही नहीं।
जबकि विभूति ने साक्षात्‍कार में यह अहम सवाल उठाया कि महिला लेखिकाओं की जो आत्‍मकथाएं स्त्रियों के रोजाना के मोर्चा पर जूझने, उनके संघर्ष और जिजाविषा के हलाफनामे बन सकते थे आखिर वह केलि प्रसंगों में उलझाकर रसीले रोमैण्टिक डायरी की निजी तफसीलों तक क्‍यूं समिति कर दिये गये। इस पर कुछ का यह तर्क अपनी जगह बिल्‍कुल जायज हो सकता है कि आत्‍मकथाएं एजेण्‍डाबद्व ले‍खन का नतीजा नहीं होंती लेकिन अगर सदियों से वंचित स्‍त्रियों का प्रतिनिधित्‍व करने वाली लेखिकाएं सिर्फ केलि प्रसंग के इर्द-गिर्द अपनी प्रांसगिकता तलाशने लगे तो ऐसे में आगे कहने को कुछ शेष नहीं बचता। हम पाठकों के लिए स्‍त्री विर्मश देह से आगे औरतों की जिन्‍दगी के दूसरे सवालों की ओर भी जाता हैं। हमें यह लगता है कि धर्म, समाज और पितसत्‍तामक जैसी जंजीरों से जकड़ी स्‍त्री अपने गरिमापूर्ण जीवन के लिए कैसे संघर्ष पर विवश है उसकी तफलीसें भी बयां होनी चाहिये। मन्‍नू भण्‍डारी, सुधा अरोडा, प्रभा खेतान जैसी तमाम स्‍त्री रचानाकारों ने हिन्‍दी जगत के सामने इन आयमों को रखा है।अन्‍या से अनन्‍या तो अभी हाल की रचना है जिसमें प्रभा खेतान के कन्‍फेस भी हैं लेकिन बिना केलि-प्रंसगों के ही यह रचना स्‍त्री अस्तित्‍व के संघर्ष को और अधिक मर्मिम बनाती है।
अगर यही सवाल विभूति भी खडा करते हैं तो इसका जवाब देने में सन्‍नाटा कैसा। जबकि एक तथाकथित लम्‍पट किस्‍म के उपन्‍यासकार को ऐसी टिप्‍पड़ी पर जवाब देने के लिए कलमवीरों को बताना चाहिये कि- हजूर ! आपने जिन आत्‍मकथात्‍मक उपान्‍यासों का जिक्र किया है उसमें आधी दुनिया के संघर्षो की जिन्‍दादिल तस्‍वीर हैं और यौन कुंठा की वजह से आपको उनके सिर्फ चुनिंदा राति-प्रंसग ही याद रह गये।
मकबूल फिदा हुसैन का समर्थन करके जिस असहमति के तथाकथित स्‍पेस की हम हमेशा से दुहाई सी देते आये इस प्रकरण के बाद इस मोर्चे पर भी हमारी कलई खुल गयी। तमाम बड़े नामों को देखकर यह साफ हो गया कि अभी भी हमारे भीतर असहमति का कोई साहस नहीं है और अतिक्रमण करने वाले के खिलाफ हम खाप पंचायतों की हद तक जा सकते हैं। इन सबके बीच कुछ साथी छिनाल शब्‍द के लोकमान्‍यता में न होने की बात कहते हुये भी कुलपति को हटाने की मांग की लेकिन आज अगर आज लोकमान्‍यता के प्रतिकूल शब्‍द पर कुलपति हटाये जाते हैं तो हुसैन साहब की बनायी तस्‍वीरों को अभिव्‍यक्ति की स्‍वतत्रन्‍ता के नाम पर हम कैसे आगे बचा सकेंगे क्‍यूंकि लोकमान्‍यता के समान्‍य अर्थो में शायद ही कोई हिन्‍दू सीता की नग्‍न तस्‍वीर देखना पंसद करे। और इसी तरह फिर शायद हम तस्‍लीमा के लिए भी सीना नहीं तान सकेंगे क्‍यूंकि शायद ही कोई मुसलमान लोकमान्‍यता के मुताबिक धर्म को लेकर उनके सवालों से इत्‍तेफाक करेगा।
पहले ही कह चुका हूं कि विरोध को लेकर माहौल ऐसा दरबारीनुमा हो गया है कि प्रतिपक्ष में कुछ कहना लांछन लेना है। बात खत्‍म हो इसके पहले डिस्‍कमेलटर की तर्ज पर यह कहना जरूर चाहूंगा कि विभूति नारायण राय से अभी तक मेरी कुछ जमा तीन या चार बार की मुलाकात है, जो एक साक्षात्‍कार के लिए हुयी थी। इसका भी काफी समय हो चुका है और शायद अब विभूति दिमाग पर ज्‍यादा जोर देने के बाद ही मुझे पहचान सकें। तथाकाथित स्‍त्री विमर्श के पक्ष में चल रही आंधी में मेरे यह सब कहना मुझे स्‍त्री विरोधी ठहारा सकता है लेकिन इस जोखिम के साथ यह जानना जरूर चाहूंगा कि आखिर, पार्टनर! तुम्‍हारी पालिटिक्‍स क्‍या है….
हिमांशु पाण्‍डेय, इलाहाबाद में पत्रकार है।


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नही जमी - "वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई"



Once Upon A Time In Mumbai के बारे मे जिनता सुना उतना मिला नही। जहाँ तक मै जानता हूँ कि मुम्‍बई के नाम पर फिल्‍म बने तो वह औसत हिट हो ही जायेगी। शुरू से लेकर अंत तक फिल्म के कुछ हिस्‍से छोड़ दिये जाये तो दर्शको को बाधने मे आसफल रही है। पता नही वह कौन सा समय था जब मुम्‍बई काली दुन‍िया के खौफ़ से बेखौफ़ हो कर घुमती थी ?
नही जमी - "वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई"

फिल्‍म शुरूवात होती है, एक एम्‍बेस्‍डर कार के समुद्र के निकलने से, यह कार मुम्‍बई के एएसपी एग्नेल विल्सन की होती है। उनका ही सहकर्मी यह कहता है कि यह आत्‍महत्‍या है न की एग्नेल विल्सन पर कोई हमला, यह विल्सन के सीनियर इस बात को जानना चाहते है कि कारण क्‍या है तो सूत्रधार के रूप मे एग्नेल विल्सन फिल्‍म की कहानी शुरू करते है।
एग्नेल विल्सन के रूप मे अभिनेता रणदीप हुडा का काम मुझे पंसद आया, अभिनेत्री कंगना राणावत भी अपना ग्लैमर छोड़ने मे सफल रही,कंगना जितनी सेक्सी और हसीन दिख सकती थी फिल्म मे उससे भी ज्‍यादा नज़र आयी। फिल्‍म मे कंगना फिल्‍म मे सबसे अधिक सुन्‍दर अजय देवगन के साथ भाषण के समय लगी। प्राची देसाई भी रोल के हिसाब से औसत का किया।
अजय देवगन कीबात ही निराली है, उनके बारे कुछ कह ही नही सकता, अभिनय अच्‍छा रहा। मेरी यह इमरान हशमी की पहली फिल्‍म थी जिसे मैने देखा, उसका काम भी ठीक था। अन्‍तोगत्‍वा फिल्‍म को बहुत उम्दा नही कहा जा सकता है, मेरे नज़र मे पैसा बेकर फिल्‍म थी।छ हटकर - कुछ दिनो से मूड ठीक नही थाऔर मै सो रहा था, कल रात मे दोस्‍त संजू का फोन आया कि कल दोपहर 1.50 की फिल्‍म का टिकट ले ले रहा हूँ। मैने भी नींद मे कहा ले लो और फोन कट गया। आज सुबह 10 बजे फिर फोन आया चल रहे हो न, मैने पूछा कहाँ ? उसने कहा कि भूल गये क्‍या ? :)
आखिर बात खत्‍म हुई और मै 1.45 पर पीवीआर पहुँच गया जहाँ वो इंतजार कर रहा था। अच्‍छा लगा मूड ठीक नही था पर दोस्‍त का साथ हमेशा सब कुछ खराब होने पर भी सब ठीक कर देता है। जब फिल्‍म शुरू हुई तो एक लड़का अपनी गर्ल फ्रेन्‍ड के साथ आया और मसगूल होकर मेरे ऊपर बैठने लगा, मैने कहा भाई साहब देख करके। अच्‍छा हुआ उसकी गर्ल फ्रेन्‍ड ने बैठने की कोशिश नही की। :)
नही जमी - "वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई"
फिल्‍म का ब्रेक मे हम कुछ खाने के लिये चल दिये लौट कर आये तो देखा कि एक नेपाली लड़का हमारी सीट पर बैठा था हमने कहा भाई साहब यहाँ कहाँ ? पला चला कि वो हॉल 2 मे बैठा था और चला आया 3 मे :) खैर फिल्‍म देखा और अब मूड काफी कुछ अच्‍छा लग रहा है यही कारण है कि आज पोस्‍ट भी लिख रहा हूँ।


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छोड़ के दिल्‍ली पहुँचे जम्‍मू से कटरा



एक सुबह दिल्‍ली के नाम करने के बाद दिनॉंक 18 को शाम को ही उत्‍तर सम्‍पर्क क्रान्ति एक्‍सप्रेस से माता बैष्‍णोरानी के चरणो में सीस नवाने जम्‍मू की ओर चल दिये। हमारी ट्रेन विलम्‍ब से करीब 30 मिनट देरी से दिनॉंक 19 को पहुँची, जम्‍मू तवी स्‍टेशन से कटरा जाने के लिये अनेको बसे तैयार थी, उन्‍ही मे से एक बस पर हम भी सवार हो लिये, देखते ही देखते करीब 10 बजे हम कटरा पहुँच गये। वहाँ हमने पहले यात्रा पर्ची बनवायी और फिर महामाई न्‍यास के धर्मशाला मे ठहरने के लिये चल दिये। वहाँ करीब 1 घन्‍टे 30 मिनट आराम, विश्राम, स्‍नान के माता रानी के दर्शन के लिये करीब 11.30 बजे चल दिये।
जम्‍मू का वातावरण बहुत ही खुशनुमा और मनोहारी थी, मन मे बस एक यही ख्‍वाहिस हो रही थी कि पृथ्‍वी के स्‍वर्ग मे अपना भी आशियाना हो किन्‍तु नेहरू के पिचालो को कोसने के अलावा हमारे पास कुछ भी न था। छोटे से कस्‍बे मे बसा कटरा, माता रानी के आशीर्वाद से चहल पहल से रोमांचित कर रहा था। कटरा मे माता के भक्‍तो का तांता मन मे माता के दर्शन को उतावला कर रहा था। मन मे संशय के कारण कि कैमरा ले जा सकते है या नही इसी कारण कैमरा नही ले गये किन्‍तु बाद मे पता चला कि कैमरा ले जा सकते है अपितु वह हैड़ीकैम या विडियो कैम न हो। अब दोपहर के 11.45 हो रहे है, अगली कड़ी मे माता रानी के दर्शन का विस्‍तार दूँगा।
जय माता की


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