महामृत्युंजय मंत्र -- मृत्युंजय महादेव त्राहिमाम शरणागतम् .Maha Mrityunjaya Mantra



महामृत्युंजय (महादेव मंत्र ) का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। 
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥

इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ' लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे 'त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है। मंत्र विचार : इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।
शब्द बोधक शब्द बोधक 'त्र' ध्रुव वसु 'यम' अध्वर वसु 'ब' सोम वसु 'कम्‌' वरुण 'य' वायु 'ज' अग्नि 'म' शक्ति 'हे' प्रभास 'सु' वीरभद्र 'ग' शम्भु 'न्धिम' गिरीश 'पु' अजैक 'ष्टि' अहिर्बुध्न्य 'व' पिनाक 'र्ध' भवानी पति 'नम्‌' कापाली 'उ' दिकपति 'र्वा' स्थाणु 'रु' भर्ग 'क' धाता 'मि' अर्यमा 'व' मित्रादित्य 'ब' वरुणादित्य 'न्ध' अंशु 'नात' भगादित्य 'मृ' विवस्वान 'त्यो' इंद्रादित्य 'मु' पूषादिव्य 'क्षी' पर्जन्यादिव्य 'य' त्वष्टा 'मा' विष्णु 'ऽ' दिव्य 'मृ' प्रजापति 'तात' वषट

इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।
शब्द की शक्ति- शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-
शब्द शक्ति शब्द शक्ति 'त्र' त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र 'य' यम तथा यज्ञ 'म' मंगल 'ब' बालार्क तेज 'कं' काली का कल्याणकारी बीज 'य' यम तथा यज्ञ 'जा' जालंधरेश 'म' महाशक्ति 'हे' हाकिनो 'सु' सुगन्धि तथा सुर 'गं' गणपति का बीज 'ध' धूमावती का बीज 'म' महेश 'पु' पुण्डरीकाक्ष 'ष्टि' देह में स्थित षटकोण 'व' वाकिनी 'र्ध' धर्म 'नं' नंदी 'उ' उमा 'र्वा' शिव की बाईं शक्ति 'रु' रूप तथा आँसू 'क' कल्याणी 'व' वरुण 'बं' बंदी देवी 'ध' धंदा देवी 'मृ' मृत्युंजय 'त्यो' नित्येश 'क्षी' क्षेमंकरी 'य' यम तथा यज्ञ 'मा' माँग तथा मन्त्रेश 'मृ' मृत्युंजय 'तात' चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण 'देवो भूत्वा देवं यजेत' के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।
महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चुन लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ। मंत्र निम्नलिखित हैं-
तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥
संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।
महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

शिव को अति प्रसन्न करने वाला मंत्र है महामृत्युंजय मंत्र। जन साधारण की धारणा है कि इसके जाप से व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती परंतु यह पूरी तरह सही अर्थ नहीं है। महामृत्युंजय का अर्थ है महामृत्यु पर विजय अर्थात् व्यक्ति की बार-बार मृत्यु ना हो। वह मोक्ष को प्राप्त हो जाए। उसका शरीर स्वस्थ हो, धन एवं मान की वृद्धि तथा वह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाए। शिवपुराण में भी महामृत्युंजय मंत्र की महिमा के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसी मंत्र के लगातार जाप से कई असाध्य रोगों से भी लाभ पहुंचता है। महामृत्युंजय मेंत्र के पहले तथा बाद उसके बीज मंत्र ú हौं जूँ स: का उच्चारण आवश्यक माना गया है। जिस तरह बिना बीज के जीवन उत्पन्न नहीं होता है उसी तरह बिना बीज मंत्र के महामृत्युंजय मंत्र फलित नहीं होता है। जो पूरे मंत्र का जाप नहीं सकते वे केवल बीज मंत्र के सतत जाप से सभी अभिष्ट फल प्राप्त कर सकते हैं।महामृत्युंजय मंत्र का एक लाख जाप करने पर शरीर की शुद्धि होती है। दो लाख जाप करने पर पूर्वजन्म का स्मरण होता है। तीन लाख जाप करने पर इच्छित वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। चार लाख जाप करने पर स्वप्न में भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। पांच लाख जाप करने पर भगवान शिव प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। दस लाख जाप करने पर संपूर्ण फल की सिद्धि होती है।मंत्र जाप आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से पूर्ण पवित्र होकर करें। जो असहाय बीमार हो वह कैसी भी अवस्था में लेटे-बैठे, बगैर स्नान किए, किसी भी समय, किसी भी उम्र में बीज मंत्रों का जाप कर सकते हैं। उन्हें शिव की कृपा से निरोगता प्राप्त होगी।

महादेव मंत्र


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सद्विचार दर्शन



  • संसार में इससे बढ़कर हंसी की दूसरी बात नहीं हो सकती कि जो दुर्जन हैं, वे स्वयं ही सज्जन पुरुषों को "दुर्जन" कहते हैं। - वेदव्यास (महाभारत, आदिपर्व, 74/95)
  • यदि जगत् में कोई पाप है, तो वह है दुर्बलता। दुर्बलता ही मृत्यु है, दुर्बलता ही पाप है, इसलिए सब प्रकार से दुर्बलता का त्याग कीजिए। - स्वामी विवेकानन्द (युवकों के प्रति, पृष्ठ 27)
  • संसार का एक भी आदमी जब तक भूखा है, जानो कि संसार का प्रत्येक मनुष्य तब तक अपराधी है। - विमल मित्र (साहब बीबी गुलाम, पृष्ठ 101)
  • उत्साह-शून्य, दु:खी, कमजोर और शत्रुओं को आनंदित करने वाले पुत्र को कोई भी जननी जन्म न दे। - नारायण पंडित (हितोपदेश, पृष्ठ 2/7)
  • सफलता का एक ही मंत्र - जितना मिले, उससे ज्यादा लौटाओ - शिव खेड़ा


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आदित्यहृदय स्तोत्रम् (आदित्यहृदयम्) - Aditya Hrudayam (ādityahṛdayam) - Hindi and Sanskrit



Surya ( सूर्य Sūrya, "the Supreme Light"), also known as Aditya, Bhanu or Ravi Vivasvana in Sanskrit, and in Avestan Vivanhant. Aditya is the chief solar deity in Hinduism and generally refers to the Sun.
Ādityahṛdayam (आदित्यहृदयम्, ), is a devotional hymn associated with Aditya or Surya and was recited by the sage Agastya to Rāma on the battlefield before fighting the demon king Rāvana. This historic hymn starts at the beginning of the duel between Rāma and Rāvana. rishi Agastya teaches Rām, who is fatigued after the long battle with various warriors of Lanka, the procedure of worshiping the Sun God for strength to defeat the enemy. These verses belong to Yuddha Kānda (Book 6) Canto 107, in the Rāmāyana as composed by Agastya and compiled by Vālmīki


॥ आदित्यहृदयम्॥  .. ādityahṛdayam .. आदित्यहृदय स्तोत्रम्

जब भगवान् राम रावण के साथ युद्ध करते-करते क्लान्त हो गए, तब ऋषि अगस्त्य ने आकर भगवान् राम से कहा कि ‘३ बार जल का आचमन कर, इस ‘आदित्य-हृदय’ का तीन बार पाठ कर रावण का वध करो ।’ भगवान श्री राम ने इसी प्रकार किया, जिससे उनकी क्लान्ति मिट गई और नए उत्साह का सञ्चार हुआ । भीषण युद्ध में रावण मारा गया ।

सूर्य देव आराधना

भगवान भाष्कर की आराधना आरोग्य मात्र ही नहीं प्रदान करती। यह व्यक्ति की विजय भी सुनिश्चित करती है। सूर्यपूजा यश कीर्ति प्रदायी है। विजय की प्राप्ति और शत्रुनाश के लिए भगवान सूर्य को समर्पित आदित्यहृदय स्तोत्रम् एक अचूक अस्त्र है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लड प्रैशर मानसिक रोगों में सुधार होने लगता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है।


पूजन विधि

आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता के सामने पूर्व की ओर खड़े होकर एक ताम्बे के कलश में जल भरकर उसमे लाल कुमकुम,अक्षत, लाल पुष्प एवं मोली डालकर निम्न मंत्र का जप करते हुये अर्ग्य देना चाहिए एवं तत्पश्चात पूजा क्क्ष में सूर्य यन्त्र के सामने बैठकर आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। बीज मंत्र निम्न प्रकार है :-
" ॐ घ्रणी सूर्याय नम: "



ध्यानम्
नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे, जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे
nmah svitre jagtaik chakchhushe,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे, विरिंचि नारायण शंकरात्मने


ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
tato yuddhapariśrāntaṃ samare chintayā sthitam
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ १॥
rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam .. 1 ..

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ २॥
upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavān ṛṣiḥ .. 2 ..

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ ३॥
yena sarvānarīn vatsa samare vijayiṣyasi .. 3 ..

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ ४॥
jayāvahaṃ japennityam akṣayyaṃ paramaṃ śivam .. 4 ..

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ ५॥
cintāśokapraśamanam āyurvardhanamuttamam .. 5 ..

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
raśmimaṃtaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ ६॥
pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram .. 6 ..

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ ७॥
eṣa devāsuragaṇām̐llokān pāti gabhastibhiḥ .. 7 ..

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ ८॥
mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ .. 8 ..

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ ९॥
vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ .. 9 ..

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ १०॥
suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ .. 10 ..

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥ ११॥
timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtāṇḍa aṃśumān .. 11 ..

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥ १२॥
agnigarbho'diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ .. 12 ..

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥ १३॥
ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthīplavaṅgamaḥ .. 13 ..

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥ १४॥
kavirviśvo mahātejāḥ raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ .. 14 ..

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥ १५॥
tejasāmapi tejasvī dvādaśātman namo'stu te .. 15 ..

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ १६॥
jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ .. 16 ..

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ १७॥
namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ .. 17 ..

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥ १८॥
namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ .. 18 ..

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarcase
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ १९॥
bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ .. 19 ..

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ २०॥
kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ .. 20 ..

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥
namastamo'bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe .. 21 ..

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ २२॥
pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ .. 22 ..

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥ २३॥
eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām .. 23 ..

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ २४॥
yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ .. 24 ..

॥ फलश्रुतिः॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥ २५॥
kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava .. 25 ..

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ २६॥
etat triguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi .. 26 ..

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ २७॥
evamuktvā tadāgastyo jagāma ca yathāgatam .. 27 ..

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा।
etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko'bhavattadā
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥ २८॥
dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān .. 28 ..

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥ २९॥
trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān .. 29 ..

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥ ३०॥
sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto'bhavat .. 30 ..

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
niśicarapatisaṃkṣayaṃ viditvā
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥ ३१॥
suragaṇamadhyagato vacastvareti .. 31 ..

॥ इति आदित्यहृदयम् मन्त्रस्य॥  ..
iti ādityahṛdayam mantrasya ..


इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकीये आदिकाव्ये युद्दकांडे पंचाधिक शततम सर्गः ॥

 आदित्य हृदय स्त्रोतम

इस स्तोत्र का संबंध राम-रावण युद्ध से है। इस स्त्रोत का उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण के लंका कांड में हुआ है। राम-रावण युद्ध के अंतिम चरण में भीषण युद्ध होने के बावजूद रावण की पराजय के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। वह मायावी शक्तियों का प्रयोग कर भगवान राम की सेना को भयभीत कर रहा था। राम उसकी हर शक्ति को निष्प्रभावी कर रहे थे,लेकिन रावण को नुकसान नहीं पहुंचा पा रहे थे। इस स्थिति में राम-रावण युद्ध का कोई अंत होता नहीं दिख रहा था। यहीं से आदित्यहृदय स्तोत्रम् की पूर्वपीठिका प्रारंभ होती है। श्रीरामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख अगस्त्य मुनि, जो युद्ध देखने के लिये देवताओं के साथ आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले कि हे राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा सकोगे। यह गोपनीय स्तोत्र आदित्यहृदयं परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय प्राप्त होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है। "भगवन सूर्य अपनी अनंत किरणों से शुशोभित है। ये नित्य उदय होने वाले देवताओ और असुरो से नमस्कृत , विवस्वान नाम से प्रसिद्द , प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी है। तुम इनका पूजन करो। सम्पूर्ण देवता इन्ही के स्वरूप है। ये तेज की र्राशी तथा किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले है। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरो सहित सम्पूर्ण लोको का पालन करते है। ये ही ब्रम्हा , विष्णु , शिव , स्कन्द , प्रजापति , इंद्रा , कुबेर , काल , यम , चन्द्रमा , वरुण , पितर , वसु , साध्य , अश्विनी कुमार , मरुद्रण , मनु वायु , अग्नि , प्रजा , प्राण , ऋतुओ को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज है। इन्ही के नाम आदित्य , सविता , सूर्य , खग , पुषा , गभास्तिमान , सुवर्ण सदृश , भानु , हिरण्यरेता , दिवाकर , हरिदश्व , सहस्त्रार्ची , सप्तसप्ति , मरीचिमान , तिमिरोन्मथन , शम्भू , त्वष्टा , मार्तन्डक, अंशुमान , हिरण्यगर्भ , शिशिर , तपन , अहस्कर रवि , अग्निगर्भ , अदितिपुत्र , शंख , शिशिरनाशन , व्योमनाथ , तमोभेदी , ऋग , यजु और सामवेद के पारगामी , घनवृष्टि , अपामित्र , विन्ध्यावी पल्लवगम , आतापी , मंडली , मृत्यु , पिगल , सर्वतापन , कवि , विश्व , महातेजस्वी , रक्त , सर्वभावोद्द्व , नक्षत्र , गृह और तारो के स्वामी , विश्वभावन , तेजस्वियो में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा है। आपको नमस्कार है। 'पुर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्यतिर्गाणो के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है। आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्त्रो किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारम्बार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्द है। आपको नमस्कार है। उग्र , वीर और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलो को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तंड को प्रणाम है। आप ब्रम्हा , विष्णु , शिव के भी स्वामी है। सूर आपकी संज्ञा है , यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है , आप प्रकाश से परिपूर्ण है , सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है , आप रोद्र रूप धारण करने वाले है , आपको नमस्कार है। आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले है , सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप है , आपको नमस्कार है। आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के सामान है , आप हरि और विश्वकर्मा है , तम के नाशक , प्रकाश स्वरूप और जगत के साक्षी है , आपको नमस्कार है। रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतो का संहार , सृष्टि और पालन करते है। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुचते है और वर्षा करते है। ये सब भूतो में अंतर्यामी रूप से स्थित हॉकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्र पुरुषो को मिलाने वाले फल है। देवता , यज्ञ और यज्ञो के फल भी ये ही है। सम्पूर्ण लोको में जितनी क्रियाये होती है , उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ है। राघव ! विपत्ति में , कष्ट में , दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन करता है , उसे दुःख नहीं भोगना पडता। इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य ह्र्दय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है। महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावन का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्यजी जैसे आये थे , उसी प्रकार चले गये। अगत्स्य का उपदेश सुनकर सुनकर श्रीरामचंद्र का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके भगवान् सूर्य को देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उनमें उत्साह का नवसंचार हुआ। इसके पश्चात भगवान राम ने पूर्ण उत्साह के साथ रावण पर आक्रमण कर उसका वध कर दिया। आदित्यहृदय एक ऐसा स्तोत्र है जिसका अवलंबन विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने स्वयं किया। इसलिए ,इस स्तोत्र का प्रभाव असंदिग्ध है।


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सुर्य वंदना व सुर्यनमस्कार



सुर्य वंदना:
आदिदेव। नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर। नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तुsते॥

सुर्यनमस्कार
ॐ मित्राय नमः।
ॐ रवये नमः।
ॐ सूर्याय नमः।
ॐ भानवे नमः।
ॐ खगय नमः।
ॐ पुष्णे नमः।
ॐ हिरण्यगर्भाय नमः।
ॐ मारिचाये नमः।
ॐ आदित्याय नमः।
ॐ सावित्रे नमः।
ॐ अर्काय नमः।
ॐ भास्कराय नमः।

सुर्यनमस्कार  फलश्रुती
आदितस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
जन्मजन्मान्तरसहस्त्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते॥

ब्रह्मतत्व प्रार्थना
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

दीर्घायुष्यासाठीची प्रार्थना
ॐ भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवा:।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा:॥
स्थिरैरग्ङैस्तुष्टुवांसस्तनुभि:।
व्यशेम देवहितं यदायु:॥

कल्याण होण्यासाठीची प्रार्थना
स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवा:।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदा:॥
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि:।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

सरस्वतीची प्रार्थना
प्रणोदेवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती।
धीनामवित्र्यवतु॥१॥
चोदयित्रि सूनृतानां चेतंती सुमतीनाम्।
यज्ञं दधे सरस्वती॥२॥
महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना।
धियो विश्वा विराजती॥३॥

आत्मउद्धारासाठीची प्रार्थना
असतो मा सत् गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माsमृतं गमय।
ॐ शांति: शांति: शांति:॥


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सनातन धर्म के धर्मग्रंथ



सनातन धर्म के धर्मग्रंथ

।ॐ।। वेद 'विद' शब्द से बना है जिसका अर्थ होता है ज्ञान या जानना, ज्ञाता या जानने वाला; मानना नहीं और न ही मानने वाला। सिर्फ जानने वाला, जानकर जाना-परखा ज्ञान। अनुभूत सत्य। जाँचा-परखा मा...र्ग। इसी में संकलित है 'ब्रह्म वाक्य'।

वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं। वेदों की 28 हजार पांडुलिपियाँ भारत में पुणे के 'भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट' में रखी हुई हैं। इनमें से ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियाँ बहुत ही महत्वपूर्ण हैं जिन्हें यूनेस्को ने विरासत सूची में शामिल किया है। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है।

वेद को 'श्रुति' भी कहा जाता है। 'श्रु' धातु से 'श्रुति' शब्द बना है। 'श्रु' यानी सुनना। कहते हैं कि इसके मन्त्रों को ईश्वर (ब्रह्म) ने प्राचीन तपस्वियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था जब वे गहरी तपस्या में लीन थे। सर्वप्रथम ईश्वर ने चार ऋषियों को इसका ज्ञान दिया:- अग्नि, वायु, अंगिरा और आदित्य।

वेद वैदिककाल की वाचिक परम्परा की अनुपम कृति हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिछले छह-सात हजार ईस्वी पूर्व से चली आ रही है। विद्वानों ने संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद इन चारों के संयोग को समग्र वेद कहा है। ये चार भाग सम्मिलित रूप से श्रुति कहे जाते हैं। बाकी ग्रन्थ स्मृति के अंतर्गत आते हैं।

संहिता : मन्त्र भाग। वेद के मन्त्रों में सुंदरता भरी पड़ी है। वैदिक ऋषि जब स्वर के साथ वेद मंत्रों का पाठ करते हैं, तो चित्त प्रसन्न हो उठता है। जो भी सस्वर वेदपाठ सुनता है, मुग्ध हो उठता है।

ब्राह्मण : ब्राह्मण ग्रंथों में मुख्य रूप से यज्ञों की चर्चा है। वेदों के मंत्रों की व्याख्या है। यज्ञों के विधान और विज्ञान का विस्तार से वर्णन है। मुख्य ब्राह्मण 3 हैं : (1) ऐतरेय, ( 2) तैत्तिरीय और (3) शतपथ।

आरण्यक : वन को संस्कृत में कहते हैं 'अरण्य'। अरण्य में उत्पन्न हुए ग्रंथों का नाम पड़ गया 'आरण्यक'। मुख्य आरण्यक पाँच हैं : (1) ऐतरेय, (2) शांखायन, (3) बृहदारण्यक, (4) तैत्तिरीय और (5) तवलकार।

उपनिषद : उपनिषद को वेद का शीर्ष भाग कहा गया है और यही वेदों का अंतिम सर्वश्रेष्ठ भाग होने के कारण वेदांत कहलाए। इनमें ईश्वर, सृष्टि और आत्मा के संबंध में गहन दार्शनिक और वैज्ञानिक वर्णन मिलता है। उपनिषदों की संख्या 1180 मानी गई है, लेकिन वर्तमान में 108 उपनिषद ही उपलब्ध हैं। मुख्य उपनिषद हैं- ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुंडक, मांडूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वर। असंख्य वेद-शाखाएँ, ब्राह्मण-ग्रन्थ, आरण्यक और उपनिषद विलुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में ऋग्वेद के दस, कृष्ण यजुर्वेद के बत्तीस, सामवेद के सोलह, अथर्ववेद के इकतीस उपनिषद उपलब्ध माने गए हैं।

वैदिक काल :
प्रोफेसर विंटरनिट्ज मानते हैं कि वैदिक साहित्य का रचनाकाल 2000-2500 ईसा पूर्व हुआ था। दरअसल वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है। अर्थात यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: माना यह जाता है कि पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया।

दूसरी ओर कुछ लोगों का यह मानना है कि कृष्ण के समय द्वापरयुग की समाप्ति के बाद महर्षि वेद व्यास ने वेद को चार प्रभागों संपादित करके व्यवस्थित किया। इन चारों प्रभागों की शिक्षा चार शिष्यों पैल, वैशम्पायन, जैमिनी और सुमन्तु को दी। उस क्रम में ऋग्वेद- पैल को, यजुर्वेद- वैशम्पायन को, सामवेद- जैमिनि को तथा अथर्ववेद- सुमन्तु को सौंपा गया। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5112 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूँढ लिए गए हैं।

वेद के विभाग चार हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

ऋग्वेद : ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान। इसमें 10 मंडल हैं और 1,028 ऋचाएँ। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें 5 शाखाएँ हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन।

यजुर्वेद : यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में 1975 मन्त्र और 40 अध्याय हैं। इस वेद में अधिकतर यज्ञ के मन्त्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। यजुर्वेद की दो शाखाएँ हैं कृष्ण और शुक्ल।

सामवेद : साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इसमें 1875 (1824) मन्त्र हैं। ऋग्वेद की ही अधिकतर ऋचाएँ हैं। इस संहिता के सभी मन्त्र संगीतमय हैं, गेय हैं। इसमें मुख्य 3 शाखाएँ हैं, 75 ऋचाएँ हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है।

अथर्ववेद : थर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कम करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। अथर्ववेद में 5987 मन्त्र और 20 कांड हैं। इसमें भी ऋग्वेद की बहुत-सी ऋचाएँ हैं। इसमें रहस्यमय विद्या का वर्णन है।

ND
उक्त सभी में परमात्मा, प्रकृति और आत्मा का विषद वर्णन और स्तुति गान किया गया है। इसके अलावा वेदों में अपने काल के महापुरुषों की महिमा का गुणगान व उक्त काल की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थिति का वर्णन भी मिलता है।

छह वेदांग : (वेदों के छह अंग)- (1) शिक्षा, (2) छन्द, (3) व्याकरण, (4) निरुक्त, (5) ज्योतिष और (6) कल्प।

छह उपांग : (1) प्रतिपदसूत्र, (2) अनुपद, (3) छन्दोभाषा (प्रातिशाख्य), (4) धर्मशास्त्र, (5) न्याय तथा (6) वैशेषिक। ये 6 उपांग ग्रन्थ उपलब्ध हैं। इसे ही षड्दर्शन कहते हैं, जो इस तरह है:- सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत।

वेदों के उपवेद : ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं।

आधुनिक विभाजन : आधुनिक विचारधारा के अनुसार चारों वेदों का विभाजन कुछ इस प्रकार किया गया- (1) याज्ञिक, (2) प्रायोगिक और (3) साहित्यिक।

वेदों का सार है उपनिषदें और उपनिषदों का सार 'गीता' को माना है। इस क्रम से वेद, उपनिषद और गीता ही धर्मग्रंथ हैं, दूसरा अन्य कोई नहीं। स्मृतियों में वेद वाक्यों को विस्तृत समझाया गया है। वाल्मिकी रामायण और महाभारत को इतिहास तथा पुराणों को पुरातन इतिहास का ग्रंथ माना है। विद्वानों ने वेद, उपनिषद और गीता के पाठ को ही उचित बताया है।

ऋषि और मुनियों को दृष्टा कहा गया है और वेदों को ईश्वर वाक्य। वेद ऋषियों के मन या विचार की उपज नहीं है। ऋषियों ने वह लिखा या कहा जैसा कि उन्होंने पूर्णजाग्रत अवस्था में देखा, सुना और परखा।

मनुस्मृति में श्लोक (II.6) के माध्यम से कहा गया है कि वेद ही सर्वोच्च और प्रथम प्राधिकृत है। वेद किसी भी प्रकार के ऊँच-नीच, जात-पात, महिला-पुरुष आदि के भेद को नहीं मानते। ऋग्वेद की ऋचाओं में लगभग 414 ऋषियों के नाम मिलते हैं जिनमें से लगभग 30 नाम महिला ऋषियों के हैं। जन्म के आधार पर जाति का विरोध ऋग्वेद के पुरुष-सुक्त (X.90.12), व श्रीमद्‍भगवत गीता के श्लोक (IV.13), (XVIII.41) में मिलता है।

श्लोक : श्रुतिस्मृतिपुराणानां विरोधो यत्र दृश्यते।
तत्र श्रौतं प्रमाणन्तु तयोद्वैधे स्मृति‌र्त्वरा॥
भावार्थ : अर्थात जहाँ कहीं भी वेदों और दूसरे ग्रंथों में विरोध दिखता हो, वहाँ वेद की बात की मान्य होगी।-वेद व्यास

प्रकाश से अधिक गतिशील तत्व अभी खोजा नहीं गया है और न ही मन की गति को मापा गया है। ऋषि-मुनियों ने मन से भी अधिक गतिमान किंतु अविचल का साक्षात्कार किया और उसे 'वेद वाक्य' या 'ब्रह्म वाक्य' बना दिया।।। ॐ ।|


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अच्युताष्टकं (Achyutashtakam by Adi Shankara - Sanskrit Stuti)




अच्युतं केशवं राम नारायणं कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥

Achyutham kesavam rama narayanam,
Krishna damodharam vasudevam harim,
Sreedharam madhavam gopika vallabham,
Janaki nayakam ramachandram Bhaje


I sing praise of Ramachandra, Who is known as Achyuta (infallible), Keshav, Raam, Narayan, Krishna, Damodara, Vasudeva, Hari, Shridhara (possessing Lakshmi), Madhava, Gopikavallabha (Dearest of Gopika), and Janakinayaka (Lord of Janaki or Sita).||1||

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरा मन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं संदधे ॥२॥

Achyutham kesavam sathya bhamadhavam,
Madhavam sreedharam radhika aradhitham,
Indira mandiram chethana sundaram,
Devaki nandanam nandhajam sam bhaje

I offer a salute with my hands together to Achyuta, Who is known as Keshav, Who is the consort of Satyabhama (Krishna), Who is known as Madhav and Shridhar, Who is longed-for by Radhika, Who is like a temple of Lakshmi (Indira), Who is beautiful at heart, Who is the son of Devaki, and Who is the Dear-One of all.||2||

विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिनी रागिने जानकी जानये ।
वल्लवी वल्लभायाऽर्चितायात्मने कंस विध्वंसिने वंशिने ते नमः ॥३॥

Vishnava jishnave sankhine chakrine,
Rukhmani ragine janaki janaye,
Vallavi vallabha yarchidha yathmane,
Kamsa vidhvamsine vamsine the nama.

Salutations for Vishnu, Who conquers everyone, Who holds a conch-shell and a discus, Who is the affectionate of Rukmini (Krishna), Who is the consort of only Janaki (Raam), Who is the Dear-One of cowherdesses, Who is offered [in sacrifices], Who is the Atman, Who is the destroyer of Kansa, and Who plays the flute (Krishna).||3||

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रिपते वासुदेवाचित श्रिनिधे ।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारका नायक द्रौपदी रक्षक ॥४॥

Krishna govinda he rama narayana,
Sree pathe vasu deva jitha sree nidhe,
Achyuthanantha he madhava adhokshaja,
Drowpadhi rakshaka , pathu maam sarvadha

O Krishna! O Govinda! O Raam! O Narayan! O Shripati! O Vasudeva, Who attained the Lakshmi! O Achyuta, Who is immeasurable! O Madhav! O Adhokshaja! O Leader of Dvarika! O the protector of Draupadi!¹||4||

राक्षसक्षोभितः सीतयाशोभितो दण्डकारण्य भू पुण्यता कारणः ।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्संपूजितो राघवः पातु माम् ॥५॥

Rakshasa kshobitha seethaya shobitho,
Danda karanya bhoo punyatha karana,
Lakshmanananvitho vanarai ssevitho,
Agasthya sampoojitho raghava pathu maam.

Raghav, Who upsetted the demons, Who adorned Sita, Who is the cause of purification of the forest called Dandaka, Who was accompanied by Lakshman, Who was served by monkeys, and Who was revered by Agastya, save me.||5||

धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद् द्वेषिणां केशिहा कंसहृद् वंशिकावादकः ।
पूतनाकोपकः सूरजा खेलनो बाल गोपालकः पातु माम् सर्वदा ॥६॥

Dheenu karishtako anishta krudwesinaam,
Kesiha kamsa hrud vamsika vaadhana,
Poothana nasana sooraja khelano,
Bala gopalaka pathu maam sarvadha.

Baby Gopal (Krishna), Who destroyed the disguised Dhenuka and Arishtak demons, Who slayed Keshi, Who killed Kansa, Who plays the flute, and Who got angry on Putana², save me always.||6||

विद्युदुद्धयोतवान प्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत् प्रोल्लसद्विग्रहम् ।
वन्यया मालया शोभितोरस्थलं लोहितांघ्रिदूयं वारिजाक्षं भजे ॥७॥

Vidhyu dudhyothavath prasphura dwasasam,
Prouda bodhaval prollasad vigraham,
Vanyaya Malaya shobhi thora sthalam,
Lohinthangri dwayam vareejaksham bhaje.

I sing praise of the Lotus-Eyed Lord, Who is adorned by a shiny lightening like yellow robe, Whose body is resplending like a cloud of the rainy-season, Who is adorned by a forest-garland at His chest, and Who has two feet of copper-red color.||7||

कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजिमानाननं रत्नमौलिं लसत् कुण्डलं गण्डयोः ।
हारकेयूरकं कङ्कण प्रोज्ज्वलं किङ्किणी मञ्जुलं श्यामलं तं भजे ॥८॥

Kanchithai kundalai braja maanananam,
Rathna moulim lasad kundalam gandayo,
Haara keyuragam kankana projwalam,
Kinkini manjula syamalam tham bhaje.

I sing praise of that Shyam, Whose face is adorned by falling locks of curly tresses, Who has jewels are forehead, Who has shiny earrings on the cheeks, Who is adorned with a garland of the Keyur flower, Who has a shiny bracelet, and Who has a melodious anklet.||8||


अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् |
वृत्ततः सुंदरं कर्तृ विश्वंभरं तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ||९||
||इति श्रीशंकराचार्यविरचितमच्युताष्टकं संपूर्णम् ||




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अच्युतं केशवं रामनारायणं  कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ||
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ||१||
अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ||
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं संदधे ||२||
विष्णवे जिष्णवे शङ्खिने चक्रिणे रुक्मिनीरागिणे जानकीजानये ||
वल्लवीवल्लभायाऽर्चितायात्मने कंसविध्वंसिने वंशिने ते नमः ||३||
कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे ||
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ||४||
राक्षसक्षोभितः सीतया शोभितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारणः ||
लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितोऽगस्त्यसंपूजितो राघवः पातु माम् ||५||
धेनुकारिष्टकोऽनिष्टकृद्द्वेषिणां केशिहा कंसहृद्वंशिकावादकः ||
पूतनाकोपकः सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु माम् सर्वदा ||६||
विद्युदुद्धयोतवानप्रस्फुरद्वाससं प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् ||
वन्यया मालया शोभितोरःस्थलं लोहितांघ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे ||७||
कुञ्चितैः कुन्तलैर्भ्राजमानाननं रत्नमौलिं लसत् कुण्डलं गण्डयोः ||
हारकेयूरकं कङ्कणप्रोज्ज्वलं किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं भजे ||८||
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् |
वृत्ततः सुंदरं कर्तृ विश्वंभरं तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ||९||
||इति श्रीशंकराचार्यविरचितमच्युताष्टकं संपूर्णम् ||

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अयोध्या मसले की जड़ नेहरु



अयोध्या मसले की जड़ नेहरु
नेहरु की विखंडनकारी महत्वाकांक्षा यही बताती है कि १९४९ में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत रामलला की मूर्ति जन्मभूमि पर रखवाने के पक्ष में थे वही नेहरु उस स्थान से मूर्तियों को हटवाने की बात कह रहे थे। देश के दो दिग्गजों के मध्य दोहरी कश्मकश का परिणाम यह हुआ कि फैज़ाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के. के. नायर को इस्तीफा देना पड़ा, वास्तव में नेहरु कभी चाहते ही नहीं थे, कि राम जन्मभूमि पर रामलला विराजमान हो। जैसा कि राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल के प्रयास से गुजरात के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार कि तर्ज पर अयोध्या के विवाद को भी समाप्त किया जा सकता था। इतिहास गवाह रहा है कि अयोध्या, कश्मीर, पाकिस्तान और तिब्बत जैसे मुद्दों पर जहां कही भी नेहरु ने अपने दूषित हाथ डाले वे मुद्दे आज भी आज भी एक ज्वलंत समस्याएं बनी हुई है।


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श्री नृसिंहपञ्चामृतस्तोत्रम्



“हिरणा.किसना गोविन्दा प्रहलाद भजे“ के उद्घोष से समूचे वातावतरण को गुजायमान करते हुए आप सब को नरसिंह भगवान् की जयंती की शुभकामनाये ...आज ही के दिन भगवान् से इस सृती पर अवतरित होकर हरी के द्रोही हिरनकश्यप का वध किया था ..

श्री नृसिंहपञ्चामृतस्तोत्रम्
(श्रीरामकृतम्)

अहॊबिलं नारसिंहं गत्वा रामः प्रतापवान् ।
नमस्कृत्वा श्रीनृसिंहं अस्तौषीत् कमलापतिम् ॥ १ ॥

गॊविन्द कॆशव जनार्दन वासुदॆव
विश्वॆश विश्व मधुसूदन विश्वरूप ।
श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम पुष्कराक्ष
नारायणाच्युत नृसिंह नमॊ नमस्तॆ ॥ २ ॥

देवाः समस्ताः खलु यॊगिमुख्याः
गन्धर्व विद्याधर किन्नराश्च ।
यत्पादमूलं सततं नमन्ति
तं नारसिंहं शरणं गतॊऽस्मि ॥ ३ ॥

वॆदान् समस्तान् खलु शास्त्रगर्भान्
विद्याबलॆ कीर्तिमतीं च लक्ष्मीम् ।
यस्य प्रसादात् सततं लभन्तॆ
तं नारसिंहं शरणं गतॊऽस्मि ॥ ४ ॥

ब्रह्मा शिवस्त्वं पुरुषॊत्तमश्च
नारायणॊऽसौ मरुतां पतिश्च ।
चन्द्रार्क वाय्वग्नि मरुद्गणाश्च
त्वमॆव तं त्वां सततं नतॊऽस्मि ॥ ५ ॥

स्वप्नॆऽपि नित्यं जगतां त्रयाणाम्
स्रष्टा च हन्ता विभुरप्रमॆयः ।
त्राता त्वमॆकस्त्रिविधॊ विभिन्नः
तं त्वां नृसिंहं सततं नतॊऽस्मि ॥ ६ ॥

राघवॆणकृतं स्तॊत्रं पञ्चामृतमनुत्तमम् ।
पठन्ति यॆ द्विजवराः तॆषां स्वर्गस्तु शाश्वतः ॥ ७ ॥


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अग्नि सूक्तं.. (Agni Shuktam)



अग्नि सूक्तं... सबसे पहले वेद... ऋग्वेद... की सबसे पहली ऋचा है... यह अग्नि देव को संबोधित करके गयी है | अग्नि देव... जिन्हें ब्रह्माण्ड की शक्ति माना जाता है... यह ऋचा रक्षा करने वाली है और मनुष्यों को पूर्णता की ओर प्रेरित करती है...

[ऋषि - मधुच्छन्दा वैश्वामित्र,  छंद- गायत्री,  देवता- अग्नि... ]

विशेष: - ऋग्वेुदस्यत प्रथमं सूक्तं अग्निदेवस्ये कृते सम्र्पितम् अस्ति , अनेनेव ज्ञायते यत् वैदिक काले एव अग्नि देवस्य महातम्यम ज्ञातम् आसीत् । अग्नि: विश्वगस्य सर्वप्रथम: आविष्का्र: आसीत् । अस्यज प्रथमप्रयोग: भारतदेशे एव अभवत् ।

[ अर्थ : ऋग्वेद का प्रथम सूक्त अग्निदेव को समर्पित है... इससे यह ज्ञात होता है की वैदिक काल में भी अग्निदेव की महिमा ज्ञात थी | अग्नि विश्व का प्रथम आविष्कार थी | इसका प्रथम प्रयोग भारत देश में ही हुआ था...]

ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्न धातमम्।।१।।

हम अग्निदेव की स्तुति करते हैं... जो यज्ञ के पुरोहित, देवता, ऋत्विज ( समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करने वाले), होता (देवों का आवाहन करने वाले) और याजको को रत्नों (यज्ञ के लाभों ) से विभूषित करने वाले हैं |

अग्निः पूर्वेभिर्र्षिभिरीड्यो नूतनैरुत | स देवानेह वक्षति ||२ ||

जो अग्निदेव पूर्वकालीन ऋषिओं द्वारा प्रशंसित है... जो आधुनिक काल में भी ऋषि कल्प वेदज्ञ विद्वानों द्वारा स्तुत्य हैं... वे अग्निदेव इस यज्ञ में देवो का आवाहन करें |

अग्निना रयिमश्नवत पोषमेव दिवे-दिवे | यशसं वीरवत्तमम || ३ ||

ये बढाने वाले अग्निदेव (स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर)... मनुष्यों को (यजमान को) प्रतिदिन विवर्धमान (बढाने वाला) धन, यश, पुत्र -पौत्रादि वीर पुरुष प्रदान करने वाले हैं |

अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि | स इद्देवेषु गछति || ४ ||

हे अग्निदेव ! आप सबका रक्षण करने में समर्थ हैं | आप जिस अध्यर ( हिंसा रहित यज्ञ ) को आवृत किये रहते हैं... वही ( जिसकी आहुति को आप ग्रहण कर रहे हैं ) यज्ञ के देवताओं तक अवश्य पहुँचता है |

अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः | देवो देवेभिरा गमत || ५ ||

हे अग्निदेव ! आप हवि -प्रदाता , ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक , सत्यरूप और विलक्षण रूप युक्त हैं | आप देवो के साथ इस यज्ञ में पधारें |

यदङग दाशुषे तवमग्ने भद्रं करिष्यसि | तवेत तत सत्यमङगिरः || ६ ||

हे अग्निदेव ! आप जो भी कृपा अपने भक्त पर करते हैं... वह अग्निरस... अवश्य ही आपका सार है |

उप तवाग्ने दिवे-दिवे दोषावस्तर्धिया वयम | नमो भरन्त एमसि || ७ ||

हे अग्निदेव ! रात्रि को दूर करने वाले... अपने विचारों और प्रार्थनाओं से , आपकी वंदना करते हुए... हम दिन पर दिन आपके समीप आयें (अर्थात हमें आपका सानिध्य प्राप्त हो) |

राजन्तमध्वराणां गोपां रतस्य दीदिविम | वर्धमानंस्वे दमे || ८ ||

हे अग्निदेव ! यज्ञों के राजा/स्वामी... सनातन सत्य , प्रकाशमयी , अपने तेज में निरंतर वृद्धि को प्राप्त होने वाले , हम आपके समीप आ रहे हैं |

स नः पितेव सूनवे.अग्ने सूपायनो भव | सचस्वा नः सवस्तये || ९ ||

हे अग्निदेव ! कृपया आप हमें उसी प्रकार उपलब्ध होईये , जिस प्रकार
एक पिता अपने पुत्र को होता है | हे अग्निदेव ! आप हमारे भले के लिए हमारे साथ रहिये |

ॐ असतो मा सद्गमय |  तमसो मा ज्योतिर्गमय | मृत्योरमा अमृतं गमय ||
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:


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पूर्णता : पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है। पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है



अथर्ववेद में कहा गया है, ‘पूर्णात्पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते।’
यानी पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है। पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
इस मंत्र का सरल अर्थ है कि वह पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण ही उत्पन्न होता है। और यदि पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लें, तो भी पूर्ण ही शेष बचता है।ब्रह्म की सत्ता अखण्ड है। ब्रह्म ही आनन्द रूप है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव, चित्‌ एक एवं असंग है। वह चलता है, वह नहीं चलता है। वह दूर है, वह समीप है।

अशून्यमिव यच्छून्यं यस्मिंछून्यं जगत्‌ स्थितम्‌।
अर्थात्‌ जो शून्य होते हुए अशून्य के समान है, जिसमें जगत्‌ वर्तमान रहता हुआ भी शून्य है, जो सृष्टिसमूह के होते हुए भी शून्य है, वह परमात्मा का स्वरूप है।

1. ‘मानव की पूर्णता अपनी अपूर्णता से परिचित होना है।’
2.‘यदि यहां और अभी पूर्णता की प्राप्ति असंभव है, तो इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि दूसरे जन्म में हमें पूर्णता मिल ही जाएगी।’
3.‘ब्रह्म निर्वाण दो बातों का समन्वय नहीं है। एक सत्य के लिए उपयोग किए गए दो शब्दों का समवेत प्रयोग है। जो शून्य से चलते हैं, वे निर्वाण कहते हैं, जो पूर्ण से चलते हैं, वे ब्रह्म कहते हैं।’

भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन' कहा जाता है

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'
सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ......

संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें
१ - एको देवः
२ - सर्वर्भूतेषु गूढः
३ - सर्वव्यापी
४ - सर्वभूतान्तरात्मा
५ - कर्माध्यक्षः
६ - सर्व भूताधिवासः
७ - साक्षी
८ - चेता
९ - केवलः
१० - निर्गुणश्च

पूरे मन्त्र को १ से १० की संख्या में विभाजित किया जा सकता है. संख्या का प्रारंभ १ से है और एक अंक की सबसे बड़ी संख्या ९ है और यह संख्या 'केवल' है. दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह शून्य है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले १ पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से १० संख्या स्वतः बन जाती है. इस १० में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता.

'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'

'ब्रह्म' आदि, मध्य और अन्त, सभी काल में पूर्ण है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी, और नहीं भी रहा, वह अनेक '१०' बन गया, जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०'है सृष्टि है, सगुण हैपरन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.


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॥ श्री ललिता सहस्र नाम स्तोत्रम् ॥



 
॥ न्यासः ॥
अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमाला मन्त्रस्य।
वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः।
अनुष्टुप् छन्दः।
श्रीललितापरमेश्वरी देवता।
श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम्।
मध्यकूटेति शक्तिः।
शक्तिकूटेति कीलकम् ।
श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी- प्रसादसिद्धिद्वारा
चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।

      ॥ ध्यानम् ॥
सिन्दूरारुण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलि स्फुरत्
तारा नायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्न घटस्थ रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥

अरुणां करुणा तरङ्गिताक्षीं
धृत पाशाङ्कुश पुष्प बाणचापाम् ।
अणिमादिभि रावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥

ध्यायेत् पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं
हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
सर्वालङ्कार युक्तां सतत मभयदां भक्तनम्रां भवानीं
श्रीविद्यां शान्त मूर्तिं सकल सुरनुतां सर्व सम्पत्प्रदात्रीम् ॥

सकुङ्कुम विलेपनामलिकचुम्बि कस्तूरिकां
समन्द हसितेक्षणां सशर चाप पाशाङ्कुशाम् ।
अशेषजन मोहिनीं अरुण माल्य भूषाम्बरां
जपाकुसुम भासुरां जपविधौ स्मरे दम्बिकाम् ॥

 श्री ललिता सहस्र नाम स्तोत्रम्


       ॥ अथ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्- सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्नि- कुण्ड- सम्भूता देवकार्य- समुद्यता ॥१॥
उद्यद्भानु- सहस्राभा चतुर्बाहु- समन्विता ।
रागस्वरूप- पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥२॥
मनोरूपेक्षु- कोदण्डा पञ्चतन्मात्र- सायका ।
निजारुण- प्रभापूर- मज्जद्ब्रह्माण्ड- मण्डला ॥३॥
चम्पकाशोक- पुन्नाग- सौगन्धिक- लसत्कचा ।
कुरुविन्दमणि- श्रेणी- कनत्कोटीर- मण्डिता ॥४॥
अष्टमीचन्द्र- विभ्राज- दलिकस्थल- शोभिता ।
मुखचन्द्र- कलङ्काभ- मृगनाभि- विशेषका ॥५॥
वदनस्मर- माङ्गल्य- गृहतोरण- चिल्लिका ।
वक्त्रलक्ष्मी- परीवाह- चलन्मीनाभ- लोचना ॥६॥
नवचम्पक- पुष्पाभ- नासादण्ड- विराजिता ।
ताराकान्ति- तिरस्कारि- नासाभरण- भासुरा ॥७॥
कदम्बमञ्जरी- कॢप्त- कर्णपूर- मनोहरा ।
ताटङ्क- युगली- भूत- तपनोडुप- मण्डला ॥८॥
पद्मराग- शिलादर्श- परिभावि- कपोलभूः ।
नवविद्रुम- बिम्बश्री- न्यक्कारि- रदनच्छदा ॥९॥ orदशनच्छदा
शुद्ध- विद्याङ्कुराकार- द्विजपङ्क्ति- द्वयोज्ज्वला ।
कर्पूर- वीटिकामोद- समाकर्षि- दिगन्तरा ॥१०॥
निज- सल्लाप- माधुर्य- विनिर्भर्त्सित- कच्छपी । orनिज- संलाप
मन्दस्मित- प्रभापूर- मज्जत्कामेश- मानसा ॥११॥
अनाकलित- सादृश्य- चिबुकश्री- विराजिता । orचुबुकश्री
कामेश- बद्ध- माङ्गल्य- सूत्र- शोभित- कन्धरा ॥१२॥
कनकाङ्गद- केयूर- कमनीय- भुजान्विता ।
रत्नग्रैवेय- चिन्ताक- लोल- मुक्ता- फलान्विता ॥१३॥
कामेश्वर- प्रेमरत्न- मणि- प्रतिपण- स्तनी ।
नाभ्यालवाल- रोमालि- लता- फल- कुचद्वयी ॥१४॥
लक्ष्यरोम- लताधारता- समुन्नेय- मध्यमा ।
स्तनभार- दलन्मध्य- पट्टबन्ध- वलित्रया ॥१५॥
अरुणारुण- कौसुम्भ- वस्त्र- भास्वत्- कटीतटी ।
रत्न- किङ्किणिका- रम्य- रशना- दाम- भूषिता ॥१६॥
कामेश- ज्ञात- सौभाग्य- मार्दवोरु- द्वयान्विता ।
माणिक्य- मुकुटाकार- जानुद्वय- विराजिता ॥१७॥
इन्द्रगोप- परिक्षिप्त- स्मरतूणाभ- जङ्घिका ।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ- जयिष्णु- प्रपदान्विता ॥१८॥
नख- दीधिति- संछन्न- नमज्जन- तमोगुणा ।
पदद्वय- प्रभाजाल- पराकृत- सरोरुहा ॥१९॥
सिञ्जान- मणिमञ्जीर- मण्डित- श्री- पदाम्बुजा । orशिञ्जान
मराली- मन्दगमना महालावण्य- शेवधिः ॥२०॥
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण- भूषिता ।
शिव- कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन- वल्लभा ॥२१॥
सुमेरु- मध्य- शृङ्गस्था श्रीमन्नगर- नायिका ।
चिन्तामणि- गृहान्तस्था पञ्च- ब्रह्मासन- स्थिता ॥२२॥
महापद्माटवी- संस्था कदम्बवन- वासिनी ।
सुधासागर- मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥
देवर्षि- गण- संघात- स्तूयमानात्म- वैभवा ।
भण्डासुर- वधोद्युक्त- शक्तिसेना- समन्विता ॥२४॥
सम्पत्करी- समारूढ- सिन्धुर- व्रज- सेविता ।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व- कोटि- कोटिभिरावृता ॥२५॥
चक्रराज- रथारूढ- सर्वायुध- परिष्कृता ।
गेयचक्र- रथारूढ- मन्त्रिणी- परिसेविता ॥२६॥
किरिचक्र- रथारूढ- दण्डनाथा- पुरस्कृता ।
ज्वाला- मालिनिकाक्षिप्त- वह्निप्राकार- मध्यगा ॥२७॥
भण्डसैन्य- वधोद्युक्त- शक्ति- विक्रम- हर्षिता ।
नित्या- पराक्रमाटोप- निरीक्षण- समुत्सुका ॥२८॥
भण्डपुत्र- वधोद्युक्त- बाला- विक्रम- नन्दिता ।
मन्त्रिण्यम्बा- विरचित- विषङ्ग- वध- तोषिता ॥२९॥
विशुक्र- प्राणहरण- वाराही- वीर्य- नन्दिता ।
कामेश्वर- मुखालोक- कल्पित- श्रीगणेश्वरा ॥३०॥
महागणेश- निर्भिन्न- विघ्नयन्त्र- प्रहर्षिता ।
भण्डासुरेन्द्र- निर्मुक्त- शस्त्र- प्रत्यस्त्र- वर्षिणी ॥३१॥
कराङ्गुलि- नखोत्पन्न- नारायण- दशाकृतिः ।
महा- पाशुपतास्त्राग्नि- निर्दग्धासुर- सैनिका ॥३२॥
कामेश्वरास्त्र- निर्दग्ध- सभण्डासुर- शून्यका ।
ब्रह्मोपेन्द्र- महेन्द्रादि- देव- संस्तुत- वैभवा ॥३३॥
हर- नेत्राग्नि- संदग्ध- काम- सञ्जीवनौषधिः ।
श्रीमद्वाग्भव- कूटैक- स्वरूप- मुख- पङ्कजा ॥३४॥
कण्ठाधः- कटि- पर्यन्त- मध्यकूट- स्वरूपिणी ।
शक्ति- कूटैकतापन्न- कट्यधोभाग- धारिणी ॥३५॥
मूल- मन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय- कलेबरा ।
कुलामृतैक- रसिका कुलसंकेत- पालिनी ॥३६॥
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।
अकुला समयान्तस्था समयाचार- तत्परा ॥३७॥
मूलाधारैक- निलया ब्रह्मग्रन्थि- विभेदिनी ।
मणि- पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि- विभेदिनी ॥३८॥
आज्ञा- चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि- विभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधा- साराभिवर्षिणी ॥३९॥
तडिल्लता- समरुचिः षट्चक्रोपरि- संस्थिता ।
महाशक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु- तनीयसी ॥४०॥
भवानी भावनागम्या भवारण्य- कुठारिका ।
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर् भक्त- सौभाग्यदायिनी ॥४१॥
भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥४२॥
शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र- निभानना ।
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥४३॥
निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥४४॥
नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया ।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥४५॥
निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर् निरीश्वरा ।
नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥४६॥
निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥४७॥
निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी ।
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥४८॥ orनिस्संशया
निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥४९॥
निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥५०॥
दुष्टदूरा दुराचार- शमनी दोषवर्जिता ।
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक- वर्जिता ॥५१॥
सर्वशक्तिमयी सर्व- मङ्गला सद्गतिप्रदा ।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र- स्वरूपिणी ॥५२॥
सर्व- यन्त्रात्मिका सर्व- तन्त्ररूपा मनोन्मनी ।
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर् मृडप्रिया ॥५३॥
महारूपा महापूज्या महापातक- नाशिनी ।
महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर् महारतिः ॥५४॥
महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।
महाबुद्धिर् महासिद्धिर् महायोगेश्वरेश्वरी ॥५५॥
महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।
महायाग- क्रमाराध्या महाभैरव- पूजिता ॥५६॥
महेश्वर- महाकल्प- महाताण्डव- साक्षिणी ।
महाकामेश- महिषी महात्रिपुर- सुन्दरी ॥५७॥
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी ।
महाचतुः- षष्टिकोटि- योगिनी- गणसेविता ॥५८॥
मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल- मध्यगा ।
चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र- कलाधरा ॥५९॥
चराचर- जगन्नाथा चक्रराज- निकेतना ।
पार्वती पद्मनयना पद्मराग- समप्रभा ॥६०॥
पञ्च- प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म- स्वरूपिणी ।
चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान- घनरूपिणी ॥६१॥
ध्यान- ध्यातृ- ध्येयरूपा धर्माधर्म- विवर्जिता ।
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥६२॥
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था- विवर्जिता ।
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥६३॥
संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान- करीश्वरी ।
सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य- परायणा ॥६४॥
भानुमण्डल- मध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।
पद्मासना भगवती पद्मनाभ- सहोदरी ॥६५॥
उन्मेष- निमिषोत्पन्न- विपन्न- भुवनावली ।
सहस्र- शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥६६॥
आब्रह्म- कीट- जननी वर्णाश्रम- विधायिनी ।
निजाज्ञारूप- निगमा पुण्यापुण्य- फलप्रदा ॥६७॥
श्रुति- सीमन्त- सिन्दूरी- कृत- पादाब्ज- धूलिका ।
सकलागम- सन्दोह- शुक्ति- सम्पुट- मौक्तिका ॥६८॥
पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।
अम्बिकाऽनादि- निधना हरिब्रह्मेन्द्र- सेविता ॥६९॥
नारायणी नादरूपा नामरूप- विवर्जिता ।
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय- वर्जिता ॥७०॥
राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना ।
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि- मेखला ॥७१॥
रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया ।
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥७२॥
काम्या कामकलारूपा कदम्ब- कुसुम- प्रिया ।
कल्याणी जगतीकन्दा करुणा- रस- सागरा ॥७३॥
कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया ।
वरदा वामनयना वारुणी- मद- विह्वला ॥७४॥
विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल- निवासिनी ।
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥७५॥
क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ- पालिनी ।
क्षयवृद्धि- विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल- समर्चिता ॥७६॥
विजया विमला वन्द्या वन्दारु- जन- वत्सला ।
वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल- वासिनी ॥७७॥
भक्तिमत्- कल्पलतिका पशुपाश- विमोचिनी ।
संहृताशेष- पाषण्डा सदाचार- प्रवर्तिका ॥७८॥ orपाखण्डा
तापत्रयाग्नि- सन्तप्त- समाह्लादन- चन्द्रिका ।
तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥७९॥
चितिस्तत्पद- लक्ष्यार्था चिदेकरस- रूपिणी ।
स्वात्मानन्द- लवीभूत- ब्रह्माद्यानन्द- सन्ततिः ॥८०॥
परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता ।
मध्यमा वैखरीरूपा भक्त- मानस- हंसिका ॥८१॥
कामेश्वर- प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।
शृङ्गार- रस- सम्पूर्णा जया जालन्धर- स्थिता ॥८२॥
ओड्याणपीठ- निलया बिन्दु- मण्डलवासिनी ।
रहोयाग- क्रमाराध्या रहस्तर्पण- तर्पिता ॥८३॥
सद्यःप्रसादिनी विश्व- साक्षिणी साक्षिवर्जिता ।
षडङ्गदेवता- युक्ता षाड्गुण्य- परिपूरिता ॥८४॥
नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण- सुख- दायिनी ।
नित्या- षोडशिका- रूपा श्रीकण्ठार्ध- शरीरिणी ॥८५॥
प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।
मूलप्रकृतिर् अव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त- स्वरूपिणी ॥८६॥
व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या- स्वरूपिणी ।
महाकामेश- नयन- कुमुदाह्लाद- कौमुदी ॥८७॥
भक्त- हार्द- तमोभेद- भानुमद्भानु- सन्ततिः ।
शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥८८॥
शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥८९॥
चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर् जडात्मिका ।
गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजबृन्द- निषेविता ॥९०॥
तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च- कोशान्तर- स्थिता ।
निःसीम- महिमा नित्य- यौवना मदशालिनी ॥९१॥ orनिस्सीम
मदघूर्णित- रक्ताक्षी मदपाटल- गण्डभूः ।
चन्दन- द्रव- दिग्धाङ्गी चाम्पेय- कुसुम- प्रिया ॥९२॥
कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।
कुलकुण्डालया कौल- मार्ग- तत्पर- सेविता ॥९३॥
कुमार- गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर् मतिर् धृतिः ।
शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर् नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥९४॥
तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी- कामरूपिणी ।
मालिनी हंसिनी माता मलयाचल- वासिनी ॥९५॥
सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।
कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥९६॥
वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था- विवर्जिता ।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥९७॥
विशुद्धिचक्र- निलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।
खट्वाङ्गादि- प्रहरणा वदनैक- समन्विता ॥९८॥
पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक- भयङ्करी ।
अमृतादि- महाशक्ति- संवृता डाकिनीश्वरी ॥९९॥
अनाहताब्ज- निलया श्यामाभा वदनद्वया ।
दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष- मालादि- धरा रुधिरसंस्थिता ॥१००॥
कालरात्र्यादि- शक्त्यौघ- वृता स्निग्धौदनप्रिया ।
महावीरेन्द्र- वरदा राकिण्यम्बा- स्वरूपिणी ॥१०१॥
मणिपूराब्ज- निलया वदनत्रय- संयुता ।
वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥१०२॥
रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न- प्रीत- मानसा ।
समस्तभक्त- सुखदा लाकिन्यम्बा- स्वरूपिणी ॥१०३॥
स्वाधिष्ठानाम्बुज- गता चतुर्वक्त्र- मनोहरा ।
शूलाद्यायुध- सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥१०४॥
मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि- समन्विता ।
दध्यन्नासक्त- हृदया काकिनी- रूप- धारिणी ॥१०५॥
मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्च- वक्त्राऽस्थि- संस्थिता ।
अङ्कुशादि- प्रहरणा वरदादि- निषेविता ॥१०६॥
मुद्गौदनासक्त- चित्ता साकिन्यम्बा- स्वरूपिणी ।
आज्ञा- चक्राब्ज- निलया शुक्लवर्णा षडानना ॥१०७॥
मज्जासंस्था हंसवती- मुख्य- शक्ति- समन्विता ।
हरिद्रान्नैक- रसिका हाकिनी- रूप- धारिणी ॥१०८॥
सहस्रदल- पद्मस्था सर्व- वर्णोप- शोभिता ।
सर्वायुधधरा शुक्ल- संस्थिता सर्वतोमुखी ॥१०९॥
सर्वौदन- प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा- स्वरूपिणी ।
स्वाहा स्वधाऽमतिर् मेधा श्रुतिः स्मृतिर् अनुत्तमा ॥११०॥
पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण- कीर्तना ।
पुलोमजार्चिता बन्ध- मोचनी बन्धुरालका ॥१११॥ orमोचनी
बर्बरालका
विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि- जगत्प्रसूः ।
सर्वव्याधि- प्रशमनी सर्वमृत्यु- निवारिणी ॥११२॥
अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष- नाशिनी ।
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष- निषेविता ॥११३॥
ताम्बूल- पूरित- मुखी दाडिमी- कुसुम- प्रभा ।
मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥११४॥
नित्यतृप्ता भक्तनिधिर् नियन्त्री निखिलेश्वरी ।
मैत्र्यादि- वासनालभ्या महाप्रलय- साक्षिणी ॥११५॥
परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघन- रूपिणी ।
माध्वीपानालसा मत्ता मातृका- वर्ण- रूपिणी ॥११६॥
महाकैलास- निलया मृणाल- मृदु- दोर्लता ।
महनीया दयामूर्तिर् महासाम्राज्य- शालिनी ॥११७॥
आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।
श्री- षोडशाक्षरी- विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥११८॥
कटाक्ष- किङ्करी- भूत- कमला- कोटि- सेविता ।
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र- धनुःप्रभा ॥११९॥
हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर- दीपिका ।
दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ- विनाशिनी ॥१२०॥
दरान्दोलित- दीर्घाक्षी दर- हासोज्ज्वलन्- मुखी ।
गुरुमूर्तिर् गुणनिधिर् गोमाता गुहजन्मभूः ॥१२१॥
देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश- रूपिणी ।
प्रतिपन्मुख्य- राकान्त- तिथि- मण्डल- पूजिता ॥१२२॥
कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप- विनोदिनी । orविमोदिनी
सचामर- रमा- वाणी- सव्य- दक्षिण- सेविता ॥१२३॥
आदिशक्तिर् अमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः ।
अनेककोटि- ब्रह्माण्ड- जननी दिव्यविग्रहा ॥१२४॥
क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य- पददायिनी ।
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस् त्रिदशेश्वरी ॥१२५॥
त्र्यक्षरी दिव्य- गन्धाढ्या सिन्दूर- तिलकाञ्चिता ।
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व- सेविता ॥१२६॥
विश्वगर्भा स्वर्णगर्भा वरदा वागधीश्वरी ।
ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥१२७॥
सर्ववेदान्त- संवेद्या सत्यानन्द- स्वरूपिणी ।
लोपामुद्रार्चिता लीला- कॢप्त- ब्रह्माण्ड- मण्डला ॥१२८॥
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता ।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥१२९॥
इच्छाशक्ति- ज्ञानशक्ति- क्रियाशक्ति- स्वरूपिणी ।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप- धारिणी ॥१३०॥
अष्टमूर्तिर् अजाजैत्री लोकयात्रा- विधायिनी । orअजाजेत्री
एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥१३१॥
अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य- स्वरूपिणी ।
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥१३२॥
भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव- विवर्जिता ।
सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥१३३॥
राज- राजेश्वरी राज्य- दायिनी राज्य- वल्लभा ।
राजत्कृपा राजपीठ- निवेशित- निजाश्रिता ॥१३४॥
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग- बलेश्वरी ।
साम्राज्य- दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥१३५॥
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक- वशङ्करी ।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द- रूपिणी ॥१३६॥
देश- कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥१३७॥
सर्वोपाधि- विनिर्मुक्ता सदाशिव- पतिव्रता ।
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल- रूपिणी ॥१३८॥
कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥१३९॥
स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति- रूपिणी ।
सनकादि- समाराध्या शिवज्ञान- प्रदायिनी ॥१४०॥
चित्कलाऽऽनन्द- कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी ।
नामपारायण- प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥१४१॥
मिथ्या- जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥१४२॥
भवदाव- सुधावृष्टिः पापारण्य- दवानला ।
दौर्भाग्य- तूलवातूला जराध्वान्त- रविप्रभा ॥१४३॥
भाग्याब्धि- चन्द्रिका भक्त- चित्तकेकि- घनाघना ।
रोगपर्वत- दम्भोलिर् मृत्युदारु- कुठारिका ॥१४४॥
महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना ।
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर- निषूदिनी ॥१४५॥
क्षराक्षरात्मिका सर्व- लोकेशी विश्वधारिणी ।
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥१४६॥
स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प- निभाकृतिः ।
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥१४७॥
दुराराध्या दुराधर्षा पाटली- कुसुम- प्रिया ।
महती मेरुनिलया मन्दार- कुसुम- प्रिया ॥१४८॥
वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी ।
प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥१४९॥
मार्ताण्ड- भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त- राज्यधूः । orमार्तण्ड
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥१५०॥
सत्य- ज्ञानानन्द- रूपा सामरस्य- परायणा ।
कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ॥१५१॥
कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥१५२॥
परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा ।
पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र- विभेदिनी ॥१५३॥
मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानस- हंसिका ।
सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ॥१५४॥
ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता ।
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥१५५॥
प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ- रूपिणी ।
विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥१५६॥
मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह- रूपिणी ।
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र- प्रवर्तिनी ॥१५७॥
छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।
उदारकीर्तिर् उद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥१५८॥
जन्ममृत्यु- जरातप्त- जनविश्रान्ति- दायिनी ।
सर्वोपनिष- दुद्- घुष्टा शान्त्यतीत- कलात्मिका ॥१५९॥
गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।
कल्पना- रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध- विग्रहा ॥१६०॥
कार्यकारण- निर्मुक्ता कामकेलि- तरङ्गिता ।
कनत्कनकता- टङ्का लीला- विग्रह- धारिणी ॥१६१॥
अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र- प्रसादिनी ।
अन्तर्मुख- समाराध्या बहिर्मुख- सुदुर्लभा ॥१६२॥
त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी ।
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥१६३॥ orसुधास्रुतिः
संसारपङ्क- निर्मग्न- समुद्धरण- पण्डिता ।
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान- स्वरूपिणी ॥१६४॥
धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य- विवर्धिनी ।
विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण- कारिणी ॥१६५॥
विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी ।
अयोनिर् योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥१६६॥
वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी ।
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥१६७॥
तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ- स्वरूपिणी ।
सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव- कुटुम्बिनी ॥१६८॥ orसोम्या
सव्यापसव्य- मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी ।
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥१६९॥
चैतन्यार्घ्य- समाराध्या चैतन्य- कुसुमप्रिया ।
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य- पाटला ॥१७०॥
दक्षिणा- दक्षिणाराध्या दरस्मेर- मुखाम्बुजा ।
कौलिनी- केवलाऽनर्घ्य- कैवल्य- पददायिनी ॥१७१॥
स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति- संस्तुत- वैभवा ।
मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥१७२॥
विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥१७३॥
व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।
पञ्चयज्ञ- प्रिया पञ्च- प्रेत- मञ्चाधिशायिनी ॥१७४॥
पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च- संख्योपचारिणी ।
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥१७५॥
धरा धरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥१७६॥
बन्धूक- कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी ।
सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥१७७॥
सुवासिन्यर्चन- प्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा ।
बिन्दु- तर्पण- सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥१७८॥
दशमुद्रा- समाराध्या त्रिपुराश्री- वशङ्करी ।
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय- स्वरूपिणी ॥१७९॥
योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा ।
अनघाऽद्भुत- चारित्रा वाञ्छितार्थ- प्रदायिनी ॥१८०॥
अभ्यासातिशय- ज्ञाता षडध्वातीत- रूपिणी ।
अव्याज- करुणा- मूर्तिर् अज्ञान- ध्वान्त- दीपिका ॥१८१॥
आबाल- गोप- विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य- शासना ।
श्रीचक्रराज- निलया श्रीमत्- त्रिपुरसुन्दरी ॥१८२॥
श्रीशिवा शिव- शक्त्यैक्य- रूपिणी ललिताम्बिका ।
एवं श्रीललिता देव्या नाम् नां साहस्रकं जगुः ।
॥ इति श्री ब्रह्माण्ड पुराणे उत्तरखण्डे श्री हयग्रीवागस्त्यसंवादे
श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र कथनं सम्पूर्णम् ॥


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