आदित्यहृदय स्तोत्रम् (आदित्यहृदयम्) - Aditya Hrudayam (ādityahṛdayam) - Hindi and Sanskrit



 
Surya ( सूर्य Sūrya, "the Supreme Light"), also known as Aditya, Bhanu or Ravi Vivasvana in Sanskrit, and in Avestan Vivanhant. Aditya is the chief solar deity in Hinduism and generally refers to the Sun.
Ādityahṛdayam (आदित्यहृदयम्, ), is a devotional hymn associated with Aditya or Surya and was recited by the sage Agastya to Rāma on the battlefield before fighting the demon king Rāvana. This historic hymn starts at the beginning of the duel between Rāma and Rāvana. rishi Agastya teaches Rām, who is fatigued after the long battle with various warriors of Lanka, the procedure of worshiping the Sun God for strength to defeat the enemy. These verses belong to Yuddha Kānda (Book 6) Canto 107, in the Rāmāyana as composed by Agastya and compiled by Vālmīki


॥ आदित्यहृदयम्॥  .. ādityahṛdayam .. आदित्यहृदय स्तोत्रम्
जब भगवान् राम रावण के साथ युद्ध करते-करते क्लान्त हो गए, तब ऋषि अगस्त्य ने आकर भगवान् राम से कहा कि ‘३ बार जल का आचमन कर, इस ‘आदित्य-हृदय’ का तीन बार पाठ कर रावण का वध करो ।’ भगवान श्री राम ने इसी प्रकार किया, जिससे उनकी क्लान्ति मिट गई और नए उत्साह का सञ्चार हुआ । भीषण युद्ध में रावण मारा गया ।

सूर्य देव आराधना
भगवान भाष्कर की आराधना आरोग्य मात्र ही नहीं प्रदान करती। यह व्यक्ति की विजय भी सुनिश्चित करती है। सूर्य पूजा यश कीर्ति प्रदायी है। विजय की प्राप्ति और शत्रु नाश के लिए भगवान सूर्य को समर्पित आदित्यहृदय स्तोत्रम् एक अचूक अस्त्र है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से मिर्गी, ब्लड प्रैशर मानसिक रोगों में सुधार होने लगता है। आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ से नौकरी में पदोन्नति, धन प्राप्ति, प्रसन्नता, आत्मविश्वास में वृद्धि होने के साथ-साथ समस्त कार्यों में सफलता व सिद्धि मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

पूजन विधि
आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ आरम्भ करने के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार का दिन शुभ माना गया है। इस दिन प्रातः काल जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर सूर्योदय के समय सूर्य देवता के सामने पूर्व की ओर खड़े होकर एक तांबे के कलश में जल भरकर उसमें लाल कुमकुम,अक्षत, लाल पुष्प एवं मोली डालकर निम्न मंत्र का जप करते हुये अर्घ्य देना चाहिए एवं तत्पश्चात पूजा कक्ष में सूर्य यंत्र के सामने बैठकर आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। इसके बाद आने वाले प्रत्येक रविवार को यह पाठ करते रहना चाहिए। बीज मंत्र निम्न प्रकार है :-
" ॐ घ्रणी सूर्याय नम: "


ध्यानम्
नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे, जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे
nmah svitre jagtaik chakchhushe,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे, विरिंचि नारायण शंकरात्मने


ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
tato yuddhapariśrāntaṃ samare chintayā sthitam
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥ १॥
rāvaṇaṃ cāgrato dṛṣṭvā yuddhāya samupasthitam .. 1 ..

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
daivataiśca samāgamya draṣṭumabhyāgato raṇam
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवान् ऋषिः॥ २॥
upāgamyābravīdrāmamagastyo bhagavān ṛṣiḥ .. 2 ..

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
rāma rāma mahābāho śṛṇu guhyaṃ sanātanam
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥ ३॥
yena sarvānarīn vatsa samare vijayiṣyasi .. 3 ..

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
ādityahṛdayaṃ puṇyaṃ sarvaśatruvināśanam
जयावहं जपेन्नित्यम् अक्षय्यं परमं शिवम्॥ ४॥
jayāvahaṃ japennityam akṣayyaṃ paramaṃ śivam .. 4 ..

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
sarvamaṅgalamāṅgalyaṃ sarvapāpapraṇāśanam
चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥ ५॥
cintāśokapraśamanam āyurvardhanamuttamam .. 5 ..

रश्मिमंतं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
raśmimaṃtaṃ samudyantaṃ devāsuranamaskṛtam
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥ ६॥
pūjayasva vivasvantaṃ bhāskaraṃ bhuvaneśvaram .. 6 ..

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
sarvadevātmako hyeṣa tejasvī raśmibhāvanaḥ
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥ ७॥
eṣa devāsuragaṇām̐llokān pāti gabhastibhiḥ .. 7 ..

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
eṣa brahmā ca viṣṇuśca śivaḥ skandaḥ prajāpatiḥ
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥ ८॥
mahendro dhanadaḥ kālo yamaḥ somo hyapāṃ patiḥ .. 8 ..

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
pitaro vasavaḥ sādhyā hyaśvinau maruto manuḥ
वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥ ९॥
vāyurvahniḥ prajāprāṇa ṛtukartā prabhākaraḥ .. 9 ..

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
ādityaḥ savitā sūryaḥ khagaḥ pūṣā gabhastimān
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥ १०॥
suvarṇasadṛśo bhānurhiraṇyaretā divākaraḥ .. 10 ..

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
haridaśvaḥ sahasrārciḥ saptasaptirmarīcimān
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥ ११॥
timironmathanaḥ śambhustvaṣṭā mārtāṇḍa aṃśumān .. 11 ..

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
hiraṇyagarbhaḥ śiśirastapano bhāskaro raviḥ
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥ १२॥
agnigarbho'diteḥ putraḥ śaṅkhaḥ śiśiranāśanaḥ .. 12 ..

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।
vyomanāthastamobhedī ṛgyajuḥsāmapāragaḥ
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥ १३॥
ghanavṛṣṭirapāṃ mitro vindhyavīthīplavaṅgamaḥ .. 13 ..

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।
ātapī maṇḍalī mṛtyuḥ piṅgalaḥ sarvatāpanaḥ
कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥ १४॥
kavirviśvo mahātejāḥ raktaḥ sarvabhavodbhavaḥ .. 14 ..

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
nakṣatragrahatārāṇāmadhipo viśvabhāvanaḥ
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥ १५॥
tejasāmapi tejasvī dvādaśātman namo'stu te .. 15 ..

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
namaḥ pūrvāya giraye paścimāyādraye namaḥ
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥ १६॥
jyotirgaṇānāṃ pataye dinādhipataye namaḥ .. 16 ..

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
jayāya jayabhadrāya haryaśvāya namo namaḥ
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥ १७॥
namo namaḥ sahasrāṃśo ādityāya namo namaḥ .. 17 ..

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।
nama ugrāya vīrāya sāraṅgāya namo namaḥ
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥ १८॥
namaḥ padmaprabodhāya mārtāṇḍāya namo namaḥ .. 18 ..

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
brahmeśānācyuteśāya sūryāyādityavarcase
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥ १९॥
bhāsvate sarvabhakṣāya raudrāya vapuṣe namaḥ .. 19 ..

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
tamoghnāya himaghnāya śatrughnāyāmitātmane
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ २०॥
kṛtaghnaghnāya devāya jyotiṣāṃ pataye namaḥ .. 20 ..

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
taptacāmīkarābhāya vahnaye viśvakarmaṇe
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥ २१॥
namastamo'bhinighnāya rucaye lokasākṣiṇe .. 21 ..

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
nāśayatyeṣa vai bhūtaṃ tadeva sṛjati prabhuḥ
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥ २२॥
pāyatyeṣa tapatyeṣa varṣatyeṣa gabhastibhiḥ .. 22 ..

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
eṣa supteṣu jāgarti bhūteṣu pariniṣṭhitaḥ
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥ २३॥
eṣa evāgnihotraṃ ca phalaṃ caivāgnihotriṇām .. 23 ..

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
vedāśca kratavaścaiva kratūnāṃ phalameva ca
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥ २४॥
yāni kṛtyāni lokeṣu sarva eṣa raviḥ prabhuḥ .. 24 ..

॥ फलश्रुतिः॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
enamāpatsu kṛcchreṣu kāntāreṣu bhayeṣu ca
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥ २५॥
kīrtayan puruṣaḥ kaścinnāvasīdati rāghava .. 25 ..

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
pūjayasvainamekāgro devadevaṃ jagatpatim
एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥ २६॥
etat triguṇitaṃ japtvā yuddheṣu vijayiṣyasi .. 26 ..

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
asmin kṣaṇe mahābāho rāvaṇaṃ tvaṃ vadhiṣyasi
एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥ २७॥
evamuktvā tadāgastyo jagāma ca yathāgatam .. 27 ..

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा।
etacchrutvā mahātejā naṣṭaśoko'bhavattadā
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥ २८॥
dhārayāmāsa suprīto rāghavaḥ prayatātmavān .. 28 ..

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
ādityaṃ prekṣya japtvā tu paraṃ harṣamavāptavān
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥ २९॥
trirācamya śucirbhūtvā dhanurādāya vīryavān .. 29 ..

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
rāvaṇaṃ prekṣya hṛṣṭātmā yuddhāya samupāgamat
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥ ३०॥
sarvayatnena mahatā vadhe tasya dhṛto'bhavat .. 30 ..

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
atha raviravadannirīkṣya rāmaṃ
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
muditamanāḥ paramaṃ prahṛṣyamāṇaḥ
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
niśicarapatisaṃkṣayaṃ viditvā
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥ ३१॥
suragaṇamadhyagato vacastvareti .. 31 ..

॥ इति आदित्यहृदयम् मन्त्रस्य॥  ..
iti ādityahṛdayam mantrasya ..


इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकीये आदिकाव्ये युद्दकांडे पंचाधिक शततम सर्गः ॥

 
 आदित्य हृदय स्त्रोतम
इस स्तोत्र का संबंध राम-रावण युद्ध से है। इस स्त्रोत का उल्लेख वाल्मीकि कृत रामायण के लंका कांड में हुआ है। राम-रावण युद्ध के अंतिम चरण में भीषण युद्ध होने के बावजूद रावण की पराजय के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। वह मायावी शक्तियों का प्रयोग कर भगवान राम की सेना को भयभीत कर रहा था। राम उसकी हर शक्ति को निष्प्रभावी कर रहे थे,लेकिन रावण को नुकसान नहीं पहुंच पा रहे थे। इस स्थिति में राम-रावण युद्ध का कोई अंत होता नहीं दिख रहा था। यहीं से आदित्यहृदयस्तोत्रम् की पूर्वपीठिका प्रारंभ होती है। श्रीरामचंद्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख अगस्त्य मुनि, जो युद्ध देखने के लिए देवताओं के साथ आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले कि हे राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा सकोगे। यह गोपनीय स्तोत्र आदित्यहृदयं परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय प्राप्त होती है। यह नित्य अक्षय और परम कल्याणमय स्तोत्र है। इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है। "भगवान सूर्य अपनी अनंत किरणों से सुशोभित है। ये नित्य उदय होने वाले देवताओं और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले और संसार के स्वामी है। तुम इनका पूजन करो। सम्पूर्ण देवता इन्ही के स्वरूप है। ये तेज की राशि तथा किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले है। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित संपूर्ण लोकों का पालन करते है। ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कंध, प्रजापति, इंद्रा, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरुण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनी कुमार, मरुद्रण, मनु वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओ को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज है। इन्ही के नाम आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पुषा, गभास्तिमान, सुवर्ण सदृश, भानु, हिरण्यरेता, दिवाकर, हरिदश्व, सहस्त्रार्ची, सप्तसप्ति, मरीचिमान, तिमिरोन्मथन, शम्भू, त्वष्टा, मार्तन्डक, अंशुमान, हिरण्यगर्भ, शिशिर, तपन, अहस्कर रवि, अग्निगर्भ, अदिति पुत्र, शंख, शिशिरनाशन, व्योमनाथ, तमोभेदी, ऋग, यजु और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि, अपामित्र, विन्ध्यावी पल्लवगम, आतापी, मंडली, मृत्यु, पिगल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभावोद्द्व, नक्षत्र, गृह और तारो के स्वामी, विश्वभावन, तेजस्वियो में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा है। आपको नमस्कार है। 'पुर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्यतिर्गाणो के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है। आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते है। आपको बारम्बार नमस्कार है। सहस्त्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है। आपको नमस्कार है। उग्र, वीर और सारंग सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलो को विकसित करने वाले प्रचंड तेजधारी मार्तंड को प्रणाम है। आप ब्रम्हा, विष्णु, शिव के भी स्वामी है। सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्य मंडल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण है, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रोद्र रूप धारण करने वाले है, आपको नमस्कार है। आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले है, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप है, आपको नमस्कार है। आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के सामान है, आप हरि और विश्वकर्मा है, तम के नाशक, प्रकाश स्वरूप और जगत के साक्षी है, आपको नमस्कार है। रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतो का संहार, सृष्टि और पालन करते है। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुचते है और वर्षा करते है। ये सब भूतो में अंतर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते है। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्र पुरुषों को मिलाने वाले फल है। देवता, यज्ञ और यज्ञो के फल भी ये ही है। सम्पूर्ण लोको में जितनी क्रियाये होती है, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ है। राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्य देव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पडता। इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्त कर सकता है। महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे। यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये। अगस्त्य का उपदेश सुनकर सुनकर श्री रामचंद्र का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्ध चित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके भगवान सूर्य को देखते हुए इसका तीन बार जाप किया। इससे उनमें उत्साह का संचार हुआ। इसके पश्चात भगवान राम ने पूर्ण उत्साह के साथ रावण पर आक्रमण कर उसका वध कर दिया। आदित्य हृदय एक ऐसा स्तोत्र है जिसका अवलंबन विजय प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीराम ने स्वयं किया। इसलिए, इस स्तोत्र का प्रभाव असंदिग्ध है।


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