पूर्णता : पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है। पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है



अथर्ववेद में कहा गया है, ‘पूर्णात्पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते।’
यानी पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है। पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
इस मंत्र का सरल अर्थ है कि वह पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण ही उत्पन्न होता है। और यदि पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लें, तो भी पूर्ण ही शेष बचता है।ब्रह्म की सत्ता अखण्ड है। ब्रह्म ही आनन्द रूप है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव, चित्‌ एक एवं असंग है। वह चलता है, वह नहीं चलता है। वह दूर है, वह समीप है।

अशून्यमिव यच्छून्यं यस्मिंछून्यं जगत्‌ स्थितम्‌।
अर्थात्‌ जो शून्य होते हुए अशून्य के समान है, जिसमें जगत्‌ वर्तमान रहता हुआ भी शून्य है, जो सृष्टिसमूह के होते हुए भी शून्य है, वह परमात्मा का स्वरूप है।

1. ‘मानव की पूर्णता अपनी अपूर्णता से परिचित होना है।’
2.‘यदि यहां और अभी पूर्णता की प्राप्ति असंभव है, तो इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि दूसरे जन्म में हमें पूर्णता मिल ही जाएगी।’
3.‘ब्रह्म निर्वाण दो बातों का समन्वय नहीं है। एक सत्य के लिए उपयोग किए गए दो शब्दों का समवेत प्रयोग है। जो शून्य से चलते हैं, वे निर्वाण कहते हैं, जो पूर्ण से चलते हैं, वे ब्रह्म कहते हैं।’

भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन' कहा जाता है

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'
सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ......

संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें
१ - एको देवः
२ - सर्वर्भूतेषु गूढः
३ - सर्वव्यापी
४ - सर्वभूतान्तरात्मा
५ - कर्माध्यक्षः
६ - सर्व भूताधिवासः
७ - साक्षी
८ - चेता
९ - केवलः
१० - निर्गुणश्च

पूरे मन्त्र को १ से १० की संख्या में विभाजित किया जा सकता है. संख्या का प्रारंभ १ से है और एक अंक की सबसे बड़ी संख्या ९ है और यह संख्या 'केवल' है. दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह शून्य है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले १ पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से १० संख्या स्वतः बन जाती है. इस १० में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता.

'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'

'ब्रह्म' आदि, मध्य और अन्त, सभी काल में पूर्ण है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी, और नहीं भी रहा, वह अनेक '१०' बन गया, जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०'है सृष्टि है, सगुण हैपरन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.


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