सद्विचार दर्शन



  • संसार में इससे बढ़कर हंसी की दूसरी बात नहीं हो सकती कि जो दुर्जन हैं, वे स्वयं ही सज्जन पुरुषों को "दुर्जन" कहते हैं। - वेदव्यास (महाभारत, आदिपर्व, 74/95)
  • यदि जगत् में कोई पाप है, तो वह है दुर्बलता। दुर्बलता ही मृत्यु है, दुर्बलता ही पाप है, इसलिए सब प्रकार से दुर्बलता का त्याग कीजिए। - स्वामी विवेकानन्द (युवकों के प्रति, पृष्ठ 27)
  • संसार का एक भी आदमी जब तक भूखा है, जानो कि संसार का प्रत्येक मनुष्य तब तक अपराधी है। - विमल मित्र (साहब बीबी गुलाम, पृष्ठ 101)
  • उत्साह-शून्य, दु:खी, कमजोर और शत्रुओं को आनंदित करने वाले पुत्र को कोई भी जननी जन्म न दे। - नारायण पंडित (हितोपदेश, पृष्ठ 2/7)
  • सफलता का एक ही मंत्र - जितना मिले, उससे ज्यादा लौटाओ - शिव खेड़ा


Share:

अयोध्या मसले की जड़ नेहरु



अयोध्या मसले की जड़ नेहरु
नेहरु की विखंडनकारी महत्वाकांक्षा यही बताती है कि १९४९ में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत रामलला की मूर्ति जन्मभूमि पर रखवाने के पक्ष में थे वही नेहरु उस स्थान से मूर्तियों को हटवाने की बात कह रहे थे। देश के दो दिग्गजों के मध्य दोहरी कश्मकश का परिणाम यह हुआ कि फैज़ाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी के. के. नायर को इस्तीफा देना पड़ा, वास्तव में नेहरु कभी चाहते ही नहीं थे, कि राम जन्मभूमि पर रामलला विराजमान हो। जैसा कि राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल के प्रयास से गुजरात के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार कि तर्ज पर अयोध्या के विवाद को भी समाप्त किया जा सकता था। इतिहास गवाह रहा है कि अयोध्या, कश्मीर, पाकिस्तान और तिब्बत जैसे मुद्दों पर जहां कही भी नेहरु ने अपने दूषित हाथ डाले वे मुद्दे आज भी आज भी एक ज्वलंत समस्याएं बनी हुई है।


Share: