RTI मलतब सूचना का अधिकार के अंतर्गत आरटीआई कैसे लिखे



सूचना का अधिकार अधिनियम (अधिनियम सं. 22/2005)
  1. अधिनियम का परिचय - संसद ने सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया है, जिसे 15 जून, 2005 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली और 21 जून 2005 को सरकारी गजट में अधिसूचित किया गया। अधिनियम के अनुसार, यह, जम्मू व कश्मीर राज्य को छोड़कर, संपूर्ण भारत पर लागू है।
  2. सार्वजनिक प्राधिकारी- "सार्वजनिक प्राधिकारी" से आशय है (क) संविधान द्वारा अथवा उसके अंतर्गत (ख) संसद द्वारा निर्मित किसी अन्य कानून के द्वारा (ग) राज्य विधायिका द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून के द्वारा (घ) समुचित सरकार आदि द्वारा जारी अथवा दिए गए किसी आदेश के द्वारा स्थापित कोई प्राधिकरण अथवा निकाय अथवा स्व-शासी संस्था।
  3. सूचना का अधिकार - सूचना का अधिकार में ऐसी सूचना तक पहुँच का होना समाहित है, जो किसी सार्वजनिक प्राधिकारी द्वारा धारित अथवा उसके नियंत्रण में है। इसमें कार्य, दस्तावेज, अभिलेखों को देखने, दस्तावेजों/ अभिलेखों से टीप, उद्धरण लेने और सामग्री के प्रमाणित नमूने तथा इलेक्ट्रॉनिक रूप में संग्रहीत सूचना प्राप्त करने का अधिकार शामिल है।
  4. प्रकटन से छूट-प्राप्त सूचना - अधिनियम की धारा 8 व 9 में कतिपय श्रेणियों की सूचनाओं को नागरिकों पर प्रकट करने से छूट का प्रावधान है। सूचना पाने के इच्छुक व्यक्तियों को सलाह दी जाती है कि वे सूचना हेतु अनुरोध प्रस्तुत करने के पहले अधिनियम की तत्संबंधी धाराओं को देख लें।
  5. सूचना के लिए कौन अनुरोध कर सकता है - कोई भी नागरिक निर्धारित शुल्क देकर अंग्रेजी/हिन्दी/जहाँ आवेदन किया जा रहा हो वहाँ की राजभाषा भाषा में लिखित में अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना के लिए आवेदन कर सकता है। आवेदन लखनऊ स्थित केन्द्रीय जन सूचना अधिकारी को सीधे अथवा केन्द्रीय सहायक जन सूचना अधिकारी के माध्यम से भेजा जाना चाहिए।
RTI मलतब सूचना का अधिकार - ये कानून हमारे देश मे 2005 मे लागू हुआ। जिस का उपयोग कर के आप सरकार और किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है आम तौर पर लोगो को इतना ही पता होता है, परंतु इस सम्‍बन्‍ध में रोचक जानकारी निम्न हूँ -
  • आरटीआई से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछ कर सूचना ले सकते है
  • आरटीआई से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है
  • आरटीआई से आप दस्तावेज़ या Document की प्रमाणित Copy ले सकते है
  • आरटीआई से आप सरकारी काम काज मे इस्तमल सामग्री का नमूना ले सकते है
  • आरटीआई से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते है
आरटीआई कि निम्‍न धाराऐं महत्‍वपूर्ण है इन्‍हे स्‍मरण में रखना चाहिये -
  • धारा 6 (1) - आरटीआई का application लिखने का धारा है
  • धारा 6 (3) - अगर आप की application गलत विभाग मे चली गयी है तो गलत विभाग इस को 6 (3)
  • धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा
  • धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता
  • धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन मे नही आता है तो सूचना फ्री मे दी जाएगी
  • धारा 18 - अगर कोई अधिकारी जवाब नही देता तो उस की शिकायत सूचना अधिकारी को दी जाए
  • धारा 19 (1) - अगर आप की आरटीआई का जवाब 30 दिन मे नही आता है तो इस धारा के अनुसार आप प्रथम अपील अधिकारी को प्रथम अपील कर सकते हो
  • धारा 19 (3) - अगर आप की प्रथम अपील का भी जवाब नही आता है तो आप इस धारा की मदद से 90 दिन के अंदर 2nd अपील अधिकारी को अपील कर सकते हो
आरटीआई कैसे लिखे -
 
इस के लिए आप एक साधा पेपर ले और उस मे 1 इंच की कोने से जगह छोड़े और नीचे दिए गए प्रारूप मे अपने आरटीआई लिख ले

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सूचना का अधिकार 2005 की धारा 6(1) और 6(3) के अंतर्गत आवेदन


सेवा मे
(अधिकारी का पद)/ जन सूचना अधिकारी
विभाग का नाम

विषय - आरटीआई act 2005 के अंतर्गत .................. से संबधित सूचनाए

1- अपने सवाल यहाँ लिखे
2-
3
4

मैं आवेदन फीस के रूप में 10रू का पोस्टल ऑर्डर ........ संख्या अलग से जमा कर रहा /रही हूं।

या
मैं बी.पी.एल. कार्ड धारी हूं इसलिए सभी देय शुल्कों से मुक्त हूं। मेरा बी.पी.एल. कार्ड नं..............है।

यदि मांगी गई सूचना आपके विभाग/कार्यालय से सम्बंधित नहीं हो तो सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6 (3) का संज्ञान लेते हुए मेरा आवेदन सम्बंधित लोक सूचना अधिकारी को पांच दिनों के समयाविध् के अन्तर्गत हस्तान्तरित करें। साथ ही अधिनियम के प्रावधानों के तहत सूचना उपलब्ध् कराते समय प्रथम अपील अधिकारी का नाम व पता अवश्य बतायें।


भवदीय
नाम:
पता:
फोन नं:


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वीर सम्राट सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य



वीर सम्राट सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य
हेम चन्द्र सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य दिल्ली के सिंहासन पर बैठे अंतिम हिन्दू सम्राट थे। उन्होंने भारत को एक शक्तिशाली हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए अत्यंत साहसी तथा पराक्रमपूर्ण विजय प्राप्त की थीं। हेमचन्द्र अलवर क्षेत्र में राजगढ़ के निकट माछेरी ग्राम में 1501 ईं. में जन्मे धार्मिक संत पूरणदास के पुत्र थे। बाद में उनका परिवार सुन्दर भविष्य की कामना से रिवाड़ी आ गया था तथा वहीं हेमचन्द्र ने शिक्षा प्राप्त की थी।
उन दिनों ईरान-इराक से दिल्ली के मार्ग पर रिवाड़ी महत्वपूर्ण नगर था। उन्होंने शेरशाह सूरी की सेना को रसद तथा अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचानी शुरू कर दी थी तथा बाद में युद्ध में काम आने वाले शोरा भी बेचने लगे थे। शेरशाह सूरी की मृत्यु 22 मई, 1545 ईं. को हुई थी। यह कहा जाता है कि शेरशाह के उत्तराधिकारी इस्लामशाह की नजर रिवाड़ी में हाथी की सवारी करते हुए, युवा, बलिष्ठ हेमचंद्र पर पड़ी तथा वे उसे अपने साथ ले गए, उनकी प्रतिभा को देखकर इस्लामशाह ने उन्हें शानाये मण्डी, दरोगा ए डाक चौकी तथा प्रमुख सेनापति ही नहीं, बल्कि अपना निकटतम सलाहाकार बना दिया। साथ में 1552 ई. में इस्लामशाह की मत्यु पर उसके 12 वर्षीय पुत्र फिरोज खां को शासक बनाया गया, परन्तु तीन दिन के बाद आदित्यशाह सूरी ने उसकी हत्या कर दी। नए शासक का मूलत: नाम मुवरेज खां या मुबारक शाह था, जिसने 'आदित्यशाह' की उपाधि धारण की थी। आदित्यशाह एक विलासी शराबी तथा निर्बल शासक था। उसके काल में चारों ओर भयंकर विद्रोह हुए। आदित्यशाह ने व्यावहारिक रूप से हेेमचन्द्र को शासन की समस्त जिम्मेदारी सौंपकर, प्रधानमंत्री तथा अफगान सेना का मुख्य सेनापति बना दिया। अधिकतर अफगान शिविरों ने भी आदित्यशाह के खिलाफ विद्रोह कर दिए थे। हेमचन्द्र ने अद्भुत शौर्य तथा वीरता का परिचय देते हुए एक-एक करके उनके विरुद्ध 22 युद्ध लड़े तथा सभी में महान सफलताएं प्राप्त की थीं। उसने एक-एक करके आदित्यशाह के सभी शत्रुओं को पराजित कर दिया।
1556 ईं. में जब बाबर का ज्येष्ठ पुत्र हुमायुं पुन: भारत लौटा तथा उसने खोये साम्राज्य पर अधिकार करना चाहा। आदित्यशाह स्वयं तो चुनार भाग गया, और हेमचन्द्र को हुमायूं से लड़ने के लिए भेज दिया। इसी बीच 26 जनवरी, 1556 ई. को अफीमची हुमायूं की, जो जीवन भर इधर-उधर भटकता तथा लुढ़कता रहा, सीढियों से लुढ़क कर मौत हो गई। हेमचन्द्र ने इस स्वर्णिम अवसर को न जाने दिया। उन्होंने भारत में स्वदेशी राज्य की स्थापना के लिए अकबर की सेनाओं को आस-पास के क्षेत्रों से भगा दिया। हेमचन्द्र ने सेना को संगठित कर, ग्वालियर से आगरा की ओर प्रस्थान किये। उनकी विजयी सेनाओं ने आगरा के मुगल गवर्नर सिकन्दर खां बेगम को पराजित किया। हेमचन्द्र ने अपार धनराशि के साथ आगरा पर कब्जा किया। और वे विशाल सेना के साथ अब दिल्ली की ओर बढे। दिल्ली का मुगल गवर्नर तारीफ बेग खां अत्यधिक घबरा गया तथा भावी सम्राट अकबर तथा बैरमखां से एक विशाल सेना तुरन्त भेजने का आग्रह किया। बैरमखां की सेना जो पंजाब के गुरुदासपुर के निकट कलानौर में डेरा डाले पड़ी थी, बैरमखां ने तुरन्त अपने योग्यतम सेनापति पीर मोहम्मद शेरवानी के नेतृत्व में एक विशाल सेना देकर भेजा। भारतीय इतिहास का एक महान निर्णायक युद्ध 6 अक्तूबर, 1556 ई. तुगलकाबाद में हुआ जिसमें लगभग 3000 मुगल सैनिक मारे गए। आखिर 7 अक्तूबर, 1556 को भारतीय इतिहास का वह विजय दिवस आया जब दिल्ली के सिंहासन पर सैकड़ों वर्षों की गुलामी तथा अधीनता के बाद हिन्दू साम्राज्य की स्थापना हुई। यह किसी भी भारतीय के लिए, जो भारतभूमि को पुण्यभूमि मातृभूमि मानता हो, अत्यंत गौरव का दिवस था।
हेमचन्द्र का राज्याभिषेक भी भारतीय इतिहास की अद्वितीय घटना थी। भारत के प्राचीन गौरवमय इतिहास से परिपूर्ण पुराने किले (पांडवों के किले) में हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार राज्याभिषेक था। अफगान तथा राजपूत सेना को सुसज्जित किया गया। सिंहासन पर एक सुन्दर छतरी लगाई गई। हेमचन्द्र ने भारत के शत्रुओं पर विजय के रूप में 'शकारि' विजेता की भांति ' विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की। नए सिक्के गढ़े गए। राज्याभिषेक की सर्वोच्च विशेषता सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य की घोषणाएं थीं जो आज भी किसी भी प्रबुद्ध शासक के लिए मार्गदर्शक हो सकती हैं।
सम्राट ने पहली घोषणा की, कि भविष्य में गोहत्या पर प्रतिबंध होगा तथा आज्ञा न मानने वाले का सिर काट लिया जाएगा। सम्भवत: यह समूचे पठानों, मुगलों, अंग्रेजो तथा भारत की स्वतंत्रता के बाद तक की दृष्टि से पहली घोषणा थी। ( देश की स्वतंत्रता के पश्चात डा. राजेन्द्र प्रसाद ने ऐसे 3000 पत्रों व तारों को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को भेजते हुए आग्रह किया था कि भारत का पहला कानून 15 अगस्त, 1947 को गोहत्या बन्द के बारे में होना चाहिए। तत्कालीन प्रकाशित पत्र-व्यवहार से ज्ञात होता है कि मिश्रित संस्कृति का ढोंग पीटते हुए पं. नेहरू ने इसे अस्वीकार कर दिया था ) ।
जहां दिल्ली में यह विजय दिवस था, वहां बैरमखां के खेमे में यह शोक दिवस था। आगरा, दिल्ली सम्भलपुर तथा अन्य स्थानों के भगोड़े मुगल गवर्नर अपनी पराजित सेनाओं के साथ मुंह लटकाए खड़े थे। अनेक सेनानायकों ने हेमचन्द्र के विरुद्ध लड़ने से मना कर दिया था, वे बार-बार काबुल लौटने की बात कर रहे थे। परन्तु बैरमखां इस घोर पराजय के लिए तैयार न था। आखिर 5 नवम्बर, 1556 ई. को पानीपत में पुन: हेमचन्द्र व मुगलों की सेनाओं में टकराव हुआ।
प्रत्यक्ष द्रष्टाओं का कथन है कि हेमचन्द्र के दाईं और बाईं ओर की सेनाएं विजय के साथ आगे बढ़ रही थीं। केन्द्र में स्वयं सम्राट सेना का संचालन कर रहे थे। परन्तु अचानक आंख में एक तीर लग जाने से वे बेहोश हो गए। देश का भाग्य पुन: बदल गया। हेमचन्द्र को बेहोश हालत में ही सिर काट कर मार दिया गया। उनका मुख काबुल भेजा गया तथा शेष धड़ दिल्ली के एक दरवाजे पर लटका दिया गया। उससे भी उनकी जब तसल्ली न हुई उनके पुराने घर मछेरी पर आक्रमण किया गया। लूटमार की गई, उनके 80 वर्षीय पिता पूरनदास को धर्म परिवर्तन के लिए कहा गया, न मानने पर उनका भी कत्ल कर दिया गया।


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इलाहाबाद हाईकोर्ट बार की सफलता की दिशाहीनता



उच्च न्यायालय की बेंच को लेकर कुछ अधिवक्ता समूहों द्वारा जिस तरह से भाजपा और प्रधानमंत्री को टारगेट कर पुतले फूखे जा रहे है यह ठीक नहीं है. इलाहबाद हाईकोर्ट बार अधिवाक्ताओं की बार है किसी पार्टी विशेष नहीं और किसी पार्टी विशेष को हाईकोर्ट बार के मंच से राजनितिक रोटियां नहीं सेकनी देनी चाहिए.
हमारा एक ही उद्देश्य होना चाहिए उच्च न्यायालय की अखंडता का, वह किसी हमें किसी एक दल के विरोध करके और किसी एक दल के सहयोग नहीं मिलने वाला है.
हमें देखना होगा कि क्या राजनाथ या लक्ष्मी बाजपेई ने मीडिया के सामने बेच की बात स्वीकार है? या मेरठ बेंच के अधिवक्ताओं के इनका घेराव करके वार्ता कि और खुद ही ऐसे बयानों की प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी.
जब भाजपा के सांसद श्री Keshav Prasad Maurya व श्री Shyamacharan Gupta ने पहले ही कह दिया कि वो उच्च न्यायालय को नहीं बटने देगे तो बार के मंच से भाजपा विरोधी बयान क्यों देने दिए जा रहे है ?
जिस प्रकार सलाहकार समिति में कांग्रेसी विधायक अनुग्राह नारायण सिंह को सलाहकार सामिति में रखा गया वो भी ठीक नही है क्योकि वह बार के सदस्य भी नही है, अगर जन्प्रातिनिधि के तौर पर अनुग्रह को रखा गया तो केशव मौर्य और श्यामाचरण गुप्त को भी रखा जाना चाहिए था. ये सरकार से बात करने में ज्यादा सक्षम थे और भी अधिवक्ता जो बेंच की लड़ाई में ज्यादा प्रखर हो सकते है उनको साथ लेने और आगे करने की जरूरत है न कि बेंच की लड़ाई में बार के मैदान में राजनैतिक खेल खेलने की.
भाजपा के लोग भी बार की लड़ाई में साथ है और साथ भी दे और गाली खाए, एक साथ दोनों काम संभव नही हो सकता है. सर्वप्रथम बार का कांग्रेसीकरण और सपाईकारण बंद होना चाहिए.


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इलाहाबाद उच्च न्यायालय का इतिहास



इलाहाबाद उच्च न्यायालय का इतिहास
सन् 1834 से 1861 के बीच की अवधि में अर्थात भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम के लागू होने से पहले भारत में दो प्रकार के न्यायालय कार्यरत थे। यह थे सम्राट के न्यायालय और कंपनी के न्यायालय, जिनके अधिकार क्षेत्र भिन्न थे और जिन्होंने दोहरी न्याय प्रणाली को जन्म दिया था। इन दो प्रकार के न्यायालयों को एकीकृत करने के प्रयास सन् 1861 के बहुत पहले ही प्रारंभ हो गये थे। सन् 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी को भंग कर दिया गया और ब्रिटिश सम्राज्ञी द्वारा भारत के शासन को प्रत्यक्ष रूप से संभालने की नीति ने दो प्रकार के न्यायालयों के एकीकरण की समस्या का निराकरण बहुत आसान कर दिया। सभी लोगों पर लागू होने वाली भारतीय दंड संहिता तथा दीवानी और आपराधिक प्रक्रिया संहिताऍं पारित की गई तथा तत्कालीन उच्चतम न्यायालयों और सदर अदालतों का समामेलन न्यायिक प्रशासन में एकरूपता लागू करने का अगला कदम था। इस लक्ष्य की प्राप्ति ब्रिटिश संसद द्वारा सन् 1861 में पारित भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम (24 और 25 विक्टो0 C 104) द्वारा हुई, जिससे ब्रिटेन की महारानी को उच्चतम न्यायालयों तथा सदर अदालतों को समाप्त करने और उनकी जगह बम्बई,कलकत्ता एवं मद्रास की तीनों प्रेसीडेंसियों में एक-एक उच्च न्यायालय जिसे प्रेसीडेंसी नगरों तथा मोफस्सिल के भी सभी न्यायालयों में सर्वोच्च होना था, के गठन का अधिकार दिया गया । उक्त विधेयक पेश करने के समय सर चार्ल्स वुड ने ब्रिटिश संसद में कहा था कि संपूर्ण देश में केवल एक सर्वोच्च न्यायालय होगा तथा दो के बजाय केवल एक अपील न्यायालय होगा और चूंकि कनिष्ठ न्यायालयों में न्यायिक प्रशासन उन निर्देशों पर आधारित होता है जो उनके द्वारा ऊपर की अदालतों में भेजी गई अपीलों का निस्ताररण करते समय जारी किये जाते है, अत: मुझे आशा है कि इस प्रकार गठित उच्चतर न्यायालय सामान्य रूप से पूरे भारत में न्यायिक प्रशासन में सुधार लाऍंगे।
इसी अधिनियम की धारा 16 के द्वारा क्राउन को ब्रिटिश भारत में किसी अन्य उच्च न्यायालय का गठन करने का अधिकार भी दिया गया था। उक्त धारा के द्वारा प्रदत्त शक्तियों के आधार पर क्राउन ने लेटर्स पेटेंट के द्वारा फोर्ट विलियम की प्रेसीडेंसी के उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों के लिये एक उच्च न्यायालय का गठन सन् 1966 में आगरा में किया। इसे उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों के लिए उच्च न्यायालय की संज्ञा दी गयी जिसके मुख्य न्यायाधीश सर वाल्टर मोर्गन तथा अन्य पांच न्यायाधीशों के नामों का उल्लेख स्वयं चार्टर में था। उच्च न्यायालय का गठन अभिलेख न्यायालय के रूप में किया गया था (खंड-1) । इसकी स्थापना के साथ ही आगरा प्रदेश में पिछले 35 वर्षो से कार्य कर रही सदर दीवानी अदालत और सदर निजाम अदालत को समाप्त कर दिया गया और उच्च न्यायालय अपने लेटर्स पेटेंट और उक्त अधिनियम की धारा 16 और 9 के आधार पर सभी अपीलीय और प्रशासनिक शक्तियों से सम्पन्न हो गया तथा अन्य न्यायालयों के प्राधिकार और अधिकारिताऍं समाप्त हो गयीं। अपने लेटर्स पेटेंट द्वारा उच्च न्यायालय कुछ विशेष मामलों में उन शक्तियों और प्राधिकारों से भी सम्पन्न किया गया जो कलकत्ता उच्च न्यायालय के पास थीं। इन विशेष मामलों में शामिल थे वकीलों के विरूद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाहियॉं (खंड-18), अवयस्कों एवं भ्रान्तचित्त व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण (खंड-12), वसीयतयुक्त और वसीयत विहीन मामलों में उत्तराधिकार (खंड-25) तथा वैवाहिक मामले (खंड-26)। हालांकि विवाह विषयक अधिकारिता का प्रयोग इस उच्च न्यायालय द्वारा ब्रिटिश महारानी की ईसाई प्रजा के लिए ही किया जा सकता था।
इस उच्च न्यायालय को दीवानी मामलों में मौलिक क्षेत्राधिकार नहीं दिया गया था तथा लेटर्स पेटेंट खंड 15 के द्वारा इसे प्रदत्त सामान्य आरंभिक आपराधिक अधिकारिता भी उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों के निवासी यूरोपीय ब्रिटिश प्रजाजन तक ही सीमित थी जो इस उच्च न्यायालय की स्थापना के पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय की सामान्य आरंभिक आपराधिक अधिकारिता के अधीन रहे थे। अपनी सामान्य आरंभिक आपराधिक अधिकारिता का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायालय विधि के सम्यक अनुक्रम में अपने समक्ष लाए गए उपर्युक्त किसी भी व्यक्ति के संबंध में परीक्षण कर सकता था (खंड-16) और इस शक्ति के अंतर्गत उच्च न्यायालय उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों से बाहर के निवासी यूरोपीय-ब्रिटिश प्रजाजन के विषय में भी विचारण कर सकता था किन्तु उच्च न्यायालय को दीवालिया प्रकृति के वादों तथा नौसेना विधि से संबंधित वादों के श्रवण का अधिकार नहीं था।
अपनी असाधारण आरंभिक सिविल अधिकारिता (खंड-9) के रूप में उच्च न्यायालय को यह अधिकार दिया गया था कि वह किसी भी दीवानी मामले को अपने किसी अधीनस्थ न्यायालय से हटाकर उस पर स्वयं विचारण करके निर्णीत कर सकता था। उसे अपनी अपीलीय अधिकारिता के प्रयोग के अंतर्गत सदर अदालतों की तरह अपने अपीली अधिकारिता क्षेत्र में आने वाले न्यायालयों के निर्णयों के विरूद्ध अपीलें सुनने के लिए प्राधिकृत किया गया था। (खण्ड 11 एवं 50) इसके दो न्यायाधीशों की खंडपीठ के सम्मुख अपने ही न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा निर्णीत सिविल मामलों की अपीलों पर सुनवाई हो सकती थी (खंड-10)। उच्च न्यायालय को अपने अधीनस्थ आपराधिक न्यायालयों के निर्णयों के संबंध में निर्देश न्यायालय तथा पुनरीक्षण न्यायालय भी बनाया गया (खंड-21)। इसे किसी भी आपराधिक मामले या अपील को एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में स्थानान्तरित करने की शक्ति भी दी गई (खंड-21)। किन्तु सन् 1950 तक इस उच्च न्यायालय के पास रिट याचिका जारी करने की शक्ति नहीं थी क्योंकि न तो यह सर्वोच्च न्यायालय का उत्तराधिकारी था और न ही यह शक्ति इसे लेटर्स पेटेंट या सन् 1877 के अधिनियम विनिर्दिष्ट अनुतोष की धारा 45 द्वारा प्रदान की गई थी।
इस न्यायालय द्वारा असाधारण आरंभिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में लागू की जाने वाली साम्या विधि (equity) वही थी जो इसके अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा लागू की जाती थी (खंड-13) और इसकी सिविल अपीलीय अधिकारिता के प्रयोग में लागू की जाने वाली साम्याविधि और शुद्ध अंत:करण (good conscience) की विधि को ठीक वैसा ही होना था जैसी कि वह अधीनस्थ न्यायालयों के कार्य में प्रयुक्त होती थी (खंड-14)। अंग्रेजी विधि भारत में स्वयमेव लागू नहीं होती थी। अपितु वह यहां साम्या और शुद्ध अंत:करण के नियमों को उपलब्ध कराकर प्रयुक्त होती थी और वह भी तब जब भारतीय समाज और परिस्थितियों के संदर्भ में उसे उपयोगी पाया जाता था।
उच्च न्यायालय को आरंभिक फौजदारी न्यायालय एवं अपीलीय पुनरीक्षण तथा निर्देश न्यायालय के रूप में अपनी अधिकारिता के प्रयोग क्रम में किसी अपराध के लिए व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के अंतर्गत दंडित करने के लिए आदेशित किया गया था (खंड-23) इसके अतिरिक्त यह भी आदेशित किया गया था कि अपनी असाधारण आरंभिक फौजदारी अधिकारिता (खंड-15) के प्रयोग क्रम में उच्च न्यायालय द्वारा विचारित सभी फौजदारी मामलों में कार्यवाहियों का नियमन लेटर्स पेटेंट वर्ष 1866 के प्रकाशन के ठीक पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय में उपयोग की जाने वाली ‘आपराधिक प्रक्रिया और प्रचलन’ के अनुसार किया जाएगा और अन्य सभी आपराधिक मामलों में कार्यवाहियों का नियमन दंड प्रक्रिया संहिता 1861 या ऐसी अन्य विधियों द्वारा होगा जो सपरिषद गवर्नर जनरल द्वारा इस उद~देश्य से निर्मित की गई हैं अथवा भविष्य में निर्मित होंगी (खंड-29)।
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 की धारा 15 द्वारा (24 और 25 विक्टो0C 104) और भारत शासन अधिनियम 1915 के द्वारा उच्च न्यायालयों को अपनी अपीलीय अधिकारिता से संबंधित सभी न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति से सम्पन्न बनाया गया और उस सीमा तक विवरिणियां मँगाने, किसी वाद या अपील को एक अधीनस्थ न्यायालय से दूसरे में स्थानान्तरित करने तथा ऐसे न्यायालयों की कार्यवाहियों और परिपाटी को नियमित करने के लिए सामान्य नियम बनाने और जारी करने तथा प्रारूप विहित करने की शक्ति उन्हें दी गई। दीवानी मामलों के स्थानान्तरण की उस शक्ति को छोड़कर, जो सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 24 में समाविष्ट हैं, उच्च न्यायालयों की यह शक्तियॉं भारत शासन अधिनियम 1935 (धारा 224) तथा भारत के संविधान (अनुच्छेद 227) द्वारा आगे भी जारी रहीं।
उत्तरी-पश्चिमी प्रदेशों के लिए उच्च न्यायालय का स्थान सन् 1869 में आगरा से इलाहाबाद स्थानान्तरित कर दिया गया और सन् 1919 में 11 मार्च को जारी एक पूरक लेटर्स पेटेंट द्वारा इसका पदनाम बदलकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय (द हाईकोर्ट आफ जूडीकेचर ऐट इलाहाबाद) कर दिया गया। यही पदनाम आज तक प्रयुक्त हो रहा है।
अवध में सन् 1856 में एक न्यायिक आयुक्त और एक वित्तीय आयुक्त की नियुक्ति की गई थी। सन् 1856 से 1863 की अवधि में सर्व श्री ओमानी, कैम्पबेल और कूपर ने क्रमश: न्यायिक आयुक्त के रूप में कार्य किया। न्यायिक आयुक्त का न्यायालय सन् 1865 के सी.पी. कोर्ट~स ऐक्ट द्वारा पुनर्गठित किया गया और इसकी धारा 25 के द्वारा इसे अवध तक विस्तृत किया गया। तत्पश्चात यह पुन: सन् 1871 के अधिनियम सं0 XXXII द्वारा गठित किया गया। इस अधिनियम की धारा 23 और 24 के अनुसार किसी अपील पर निर्णय करते समय संशय की स्थिति उत्पन्न होने पर अवध के न्यायिक आयुक्त को ऐसे मामलों का विचारण हेतु इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्देशित करना पड़ता था तथा मामले के अभिलेख तथा उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों का व्यौरा भी उच्च न्यायालय को प्रेषित करना पड़ता था।तब उच्च न्यायालय इस पर इस प्रकार सुनवाई करके, मानो यह वहीं प्रस्तुत किया गया हो, अपने निर्णय की एक प्रति अवध के न्यायिक आयुक्त को भेजता था जो इसके बाद मामले का निबटारा उसी निर्णय के अनुरूप कर देता था। सन् 1885 के अधिनियम सं0 IV, सन् 1891 के अधिनियम सं0 XIV तथा सन् 1897 के अधिनियम XVI के प्रावधानों के अनुसार अपर न्यायिक आयुक्तों की नियुक्तियां भी की गई।
अवध में न्यायिक आयुक्त का न्यायालय लगभग 70 वर्षो तक सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय के रूप में कार्यरत रहा। हालॉंकि इस प्रांत में भू-राजस्व निर्धारण के मामलों में सन् 1865 के अवध राजस्व न्यायालय अधिनियम की धारा 2-3 के आधीन वित्तीय आयुक्त ने सर्वोच्च न्यायालय के रूप में कार्य किया तथा ऐसे मामलों में उस समय न्यायिक आयुक्त की कोई अधिकारिता नहीं थी, किन्तु सन् 1871 के अधिनियम सं0 XXXII की धारा 84 के वित्तीय आयुक्त का पद समाप्त कर दिया गया तथा ऐसे सारे मामले फिर से न्यायिक आयुक्त को सौंप दिये गए।
 
अवध मुख्य न्यायालय (चीफ कोर्ट)
अवध न्यायिक आयुक्त के न्यायालय के स्थान पर लखनऊ में अवध मुख्य न्यायालय (चीफ कोर्ट) की स्थापना 2 नवम्बर सन् 1929 को की गई। इस बार ऐसा लेटर्स पेटेंट द्वारा नहीं बल्कि भारत शासन अधिनियम 1919 की धारा 80-ए (3) के अनुसार गवर्नर जनरल की पूर्व अनुमति से उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा अधिनियमित अवध दीवानी न्यायालय अधिनियम सं0 IV, सन् 1925 के द्वारा किया गया। इस न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और चार अवर न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान था। सन् 1945 में अवर न्यायाधीशों की संख्या पांच कर दी गयी। वर्ष 1929 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्रीमान न्यायमूर्ति स्टुअर्ट को अवध मुख्य न्यायालय का पहला मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। इस न्यायालय को पांच लाख रूपया एवं उससे अधिक राशि के वादों की सुनवाई करने के लिए साधारण आरंभिक अधिकारिता से सम्पन्न किया गया था और इसे अवध में उद~भूत होने वाले दीवानी और फौजदारी मामलों के लिए उच्चतम अपीलीय और पुनरीक्षण न्यायालय घोषित किया गया था। इसकी साधारण आरंभिक दीवानी अधिकारिता को सन् 1939 के उ0प्र0 अधिनियम सं0 IX द्वारा समाप्त कर दिया गया तथा यहॉं विचाराधीन आरंभिक वाद और तत्सम्बन्धी कार्यवाहियों को संबंधित जिला न्यायाधीश को स्थानान्तरित कर दिया गया।
सन् 1911 के उच्च न्यायालय अधिनियम के अंतर्गतप्रत्येक उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या को 16 से बढ़ाकर 20 कर दिया गया जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल था तथा न्यायाधीशों को भारत के राजस्व से वेतन देने का प्रावधान किया गया।
वर्ष 1915 में भारत शासन अधिनियम को ब्रिटिश संसद द्वारा भारत के शासन और उच्च न्यायालयों संबंधी तत्कालीन संविधियों को पुन: अधिनियमित एवं समेकित करने के लिए पारित किया गया। सन् 1861 तथा सन् 1911 के उच्च न्यायालय अधिनियमों के प्रावधानों को इसमें पुन: अधिनियमित किया गया।जिसके अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा सम्राट द्वारा निर्धारित संख्या में नियुक्त अन्य न्यायाधीश होते थे। उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए योग्यताऍं भी निर्धारित की गईं। उच्च न्यायालयों को आरंभिक और अपीलीय अधिकारिता दी गई जिसमें खुले समुद्र में किये गये अपराधों से संबंधित अधिकारिता भी शामिल थी। उन्हें अभिलेख न्यायालय घोषित किया गया तथा न्यायालय के कार्यो को नियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति भी दी गई। किन्तु राजस्व मामलों में किसी आरंभिक अधिकारिता का प्रयोग करने या स्थानीय प्रचलन और परंपरा के अनुसार राजस्व एकत्र करने के लिए की गई किसी कार्यवाही को अमान्य करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं दिया गया। उसके पास सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर पर्यवेक्षण की निहित शक्तियां थीं।
ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम 1935 को अधिनियमित करते हुए भारत की विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यकलाप को नियमित करने के लिए एक नया विधान दिया। अधिनियम में उच्च न्यायालयों की स्थापना, अधिकारिता और शक्तियों को नियमित करने वाले कई प्रावधान थे। इस अधिनियम के उच्च न्यायालयों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान संक्षेप में इस प्रकार बताए जा सकते हैं--
  1. सन् 1935 के अधिनियम में प्रावधान किया गया कि प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीश होंगे जिनकी नियुक्ति समय-समय पर सम्राट द्वारा की जाएगी। सन् 1911 के अधिनियम के उस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया जिसमें न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या 20 निश्चित की गई थी तथा सन् 1935 के अधिनियम ने सपरिषद सम्राट को समय-समय पर प्रत्येक उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निश्चित करने की शक्ति प्रदान की।
  2. तत्कालीन उच्च न्यायालयों की अधिकारिता, इनमें विधिक प्रशासन तथा न्यायाधीशों की शक्तियां सन् 1935 के अधिनियम में भी वैसी ही बनी रहीं जैसी वे इसके पहले थीं। सन् 1915 में किसी राजस्व संबंधी मामले को संज्ञान में लेने की तीन प्रेसिडेंसी उच्च न्यायालयों की आरंभिक अधिकारिता पर जो प्रतिषेध आरोपित किया गया था, उसे जारी रखा गया।
  3. सन् 1935 के अधिनियम में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन, भत्तों तथा पेंशन के संबंध में यह प्रावधान किया गया कि इन्हें न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय सम्राट द्वारा निश्चित किया जाएगा। यह भी प्रावधान किया गया कि न्यायाधीश की नियुक्ति के बाद इनमें से किसी में भी उसके लिए हानिकर परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इस महत्वपूर्ण प्रावधान ने कार्यपालिका के किसी हस्तक्षेप की संभावना से न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्च्ति की।
  4. उच्च न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री अथवा अंतिम आदेश के विरूद्ध संघीय न्यायालय में अपील का प्रावधान भी किया गया।
  5. उच्च न्यायालय के लेटर्स पेंटेंट में एक प्रावधान यह था कि न्यायाधीशों में मतभेद होने की स्थिति में, जबकि किसी मत के पक्ष में बहुमत न हो, वरिष्ठ न्यायाधीश के दृष्टिकोण को मान्य होना था, जबकि दूसरी ओर सिविल प्रक्रिया संहिता के धारा 98 में एक प्रावधान यह था कि जब किसी अपील पर सुनवाई करते हुए दो न्यायाधीशों की खंडपीठ में किसी विधिक बिंदु पर मतभेद पैदा होगा तो उन्हें उस बिंदु का उल्लेख करते हुए उस मामले और अपील को निर्दिष्ट करना होगा तथा तब अपील पर केवल उसी बिंदु के संदर्भ में एक या अधिक न्यायाधीश सुनवाई करेंगे और उनकी राय के अनुसार उस अपील का निबटारा होगा।
अवध मुख्य न्यायालय का उच्च न्यायालय इलाहाबाद में समामेलन
भारत द्वारा स्वतंत्रता- प्राप्ति के पश्चात, एक स्थानीय शासन के अंतर्गत आ चुके आगरा और अवध क्षेत्रों के एक ही प्रदेश (यूनाइटेड प्राविन्स) में दो उच्च अपीलीय न्यायालयों के सन् 1902 से ही विद्यमान होने की ऐतिहासिक विसंगति को बड़ी गंभीरता से महसूस किया गया। उ0प्र0 उच्च न्यायालय समामेलन आदेश, 1948 के द्वारा अवध के मुख्य न्यायालय का इलाहाबाद उच्च न्यायालय से समामेलन कर दिया गया तथा नये उच्च न्यायालय को दोनों समामेलित न्यायालयों की अधिकारिता प्रदान की गयी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सर बी0 मलिक को नये उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया तथा अवध मुख्य न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों को नये न्यायालय में अवर न्यायाधीश नियुक्त किया गया। समामेलन आदेश के द्वारा लेटर्स पेटेंट में वर्णित उच्च न्यायालय इलाहाबाद की अधिकारिता तथा अवध न्यायालय अधिनियम में वर्णित मुख्य न्यायालय लखनऊ की अधिकारिता को संरक्षित रखा गया। नये न्यायालय की मुहर को मुख्य न्यायाधीश द्वारा उपलब्ध कराया जाना था तथा इस समामेलन के ठीक पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समादेशों और तत्सम्बन्धी अन्य प्रक्रियाओं के सम्बन्ध में जो विधियां प्रभावी थीं, उन्हें आवश्यक परिवर्तनों के साथ नये न्यायालय द्वारा अपना लिया गया। न्यायाधीशों को इलाहाबाद में या राज्यपाल की सहमति से मुख्य न्यायाधीश द्वारा निदेशित किन्हीं अन्य स्थलों पर कार्य करना था जबकि कम से कम दो न्यायाधीशों को लखनऊ में बैठना था और ऐसा तब तक रहना था जब तक राज्यपाल मुख्य न्यायाधीश की सहमति से अन्यथा निर्देशित न करें। अवध क्षेत्र में उद~भूत होने वाले किसी मामले या किसी वर्ग के मामलों को इलाहाबाद में सुनवाई हेतु निदेशित करने की शक्ति मुख्य न्यायाधीश को प्रदान की गयी थी। जबकि इलाहाबाद क्षेत्र के मामलों को लखनऊ पीठ को स्थानांतरित करने के लिए कोई तत्संवादी उपबंध समामेलन आदेश में नहीं था।
जुलाई 1949 में ”राज्य- विलयन (गवर्नर के प्रांत) आदेश” पारित किया गया जिसे नवंबर में “राज्य विलयन (संयुक्त प्रांत) आदेश 1949” द्वारा संशोधित किया गया। इसके द्वारा अनुसूची में विनिर्दिष्ट कुछ भारतीय राज्यों की शक्तियों को जो डोमिनियन सरकार में निहित थीं, उनके पार्श्व में स्थित गवर्नर शासित प्रांतों को स्थानान्तरित कर दिया गया। अनुसूची VII में विनिर्दिष्ट यह राज्य रामपुर, बनारस और टिहरी गढ़वाल थे और धारा 3 के अनुसार उक्त राज्यों को इस प्रकार से प्रशासित होना था मानो वे विलयनकारी प्रांत के ही भाग थे। उक्त राज्यों में कानूनों को लागू करने के संबंध में सपरिषद गवर्नर जनरल के द्वारा “विलीन राज्य विधियाँ अधिनियम” पारित किया गया। इस अधिनियम के द्वारा इसकी अनुसूची में वर्णित अनेक अधिनियमों को विलीन राज्यों में लागू करने का प्रावधान किया गया।
स्थानीय विधियों के विषय में “उ0प्र0 विलीन राज्य (विधियों का उपयोजन) अधिनियम 1950”, 16 मार्च 1950को पारित किया गया । इस अधिनियम ने “उ0प्र0 विलीन राज्य (विधियों का उपयोजन) अध्यादेश” का स्थान लिया जिसके द्वारा उत्तर प्रदेश के भाग के रूप में प्रशासित होने वाले विलीन राज्यों बनारस, रामपुर और टिहरी गढ़वाल में इसकी अनुसूची में वर्णित विधियों का विस्तारण किया गया था। राज्य विलयन आदेश की धारा 12 के द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकारिता को रामपुर के विलीन राज्य तक विस्तृत किया गया। नवाब की अध्यक्षता वाली प्रिवी काउंसिल ‘इजलास-ए-हुमायूँ’,रामपुर के उच्च न्यायालय तथा दीवानी न्यायालय समाप्त कर दिये गये तथा इजलास-ए-हुमायूँ एवं उच्च न्यायालय रामपुर में विचाराधीन सभी कार्यवाहियां उच्च न्यायालय इलाहाबाद में तथा दीवानी न्यायालयों में लंबित सभी मामले जिला न्यायाधीश रामपुर को स्थानान्तरित हो गयीं।
बनारस के मामले में गवर्नर ने केन्द्र सरकार द्वारा उन्हें प्रत्यायोजित प्राधिकार का प्रयोग करते हुए 30 नवंबर 1949 को “बनारस राज्य (प्रिवी काउंसिल और मुख्य न्यायालय की समाप्ति) आदेश, 1949” जारी किया जिसके द्वारा ये न्यायालय समाप्त कर दिये गये तथा इनके समक्ष विचाराधीन सभी अपीलें और अन्य कार्यवाहियां इलाहाबाद उच्च न्यायालय को स्थानान्तरित हो गयीं। अन्य अधीनस्थ न्यायालयों के स्थान पर एक अलग आदेश के माध्यम से जिला न्यायालयों को प्रतिस्थापित किया गया।
इसी प्रकार “टिहरी गढ़वाल (हुजूर के न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की समाप्ति) आदेश, 1949” द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकारिता टिहरी गढ़वाल के लिए विस्तृत की गयी तथा विचाराधीन अपीलों को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित कर दिया गया।
भारत के संविधान के लागू होने की तिथि 26 जनवरी 1950 अर्थात~ प्रथम गणतंत्र दिवस समारोह की पूर्वसंध्या को वर्तमान इलाहाबाद उच्च न्यायालय को उत्तर प्रदेश के संपूर्ण क्षेत्र में अधिकारिता प्राप्त हो गयी।
“उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000” के द्वारा उत्तरांचल राज्य तथा उत्तरांचल उच्च न्यायालय 8 और 9 नवंबर 2000 के बीच की मध्यरात्रि से अस्तित्व में आये तथा इस अधिनियम की धारा 35 के अनुसार उत्तरांचल राज्य के क्षेत्र में आने वाले 13 जिलों में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की अधिकारिता समाप्त हो गयी।

भारत के संविधान में उच्च न्यायालय
संविधान के अंतर्गतप्रत्येक राज्य की अपनी न्यायपालिका है जो केन्द्र और राज्य दोनों की विधियों को प्रशासित करती है। इसे सोपानिक संरचना में व्यवस्थित किया गया है। राज्य की न्यायपालिका के शीर्ष पर उच्च न्यायालय है जो राज्य में दीवानी और फौजदारी मामलों के लिए अपील और पुनरीक्षण का सर्वोच्च न्यायालय है। इसे अधीनस्थ न्यायपालिका के ऊपर प्रशासनिक और न्यायिक दोनों ही प्रकार की विस्तृत शक्तियॉं प्राप्त हैं। भारत के वर्तमान संविधान में उच्च न्यायालयों के विषय में बहुत से प्रावधान हैं, उनकी संपूर्ण व्याख्या यहां नहीं की जा रही है क्योंकि यह विषय मुख्य रूप से संवैधानिक विधि के क्षेत्र में आता है। फिर भी उच्च न्यायालय का एक सामान्य परिचय यहॉं दिया जा रहा है।
संविधान ने सभी विद्यमान उच्च न्यायालयों को पुनर्गठित किया। इसने प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय का प्रावधान किया। संसद को दो या अधिक राज्यों अथवा केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक उच्च न्यायालय की स्थापना की शक्ति दी गयी है। उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है तथा यह अपनी अवमानना के लिए दंड दे सकता है। यह किसी भी न्यायालय या प्राधिकरण के प्रशासनिक अधीक्षण में नहीं है, हालांकि इसके निर्णयों की अपीलें उच्चतम न्यायालय में की जा सकती हैं। इसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत संख्या में अन्य न्यायाधीश होते हैं। इस समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 95 है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायालय के प्रशासनिक कार्य का प्रभारी होता है तथा वह अपने साथी न्यायाधीशों में न्यायिक कार्य का वितरण करता है। उसके अपने न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के सम्बन्ध में उसकी सलाह भी ली जाती है। किन्तु न्यायालय में न्यायिक कार्य के सम्पादन में उसका स्तर किसी अन्य न्यायाधीश से ऊँचा नहीं होता है तथा विशेष अपील में किन्हीं अन्य दो न्यायाधीशों द्वारा उसके निर्णय को उलटा जा सकता है। साथ ही यदि वह तीन न्यायाधीशों की न्यायपीठ में विद्यमान हो तो उसके शेष दोनों साथियों द्वारा बहुमत से उसके निर्णय के विरूद्ध व्यवस्था दी जा सकती है। उसका किसी अन्य न्यायाधीश पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं होता है तथा उसकी स्थिति को ‘समानों में प्रथम’ ( Primus inter pares) कहा जा सकता है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति हेतु व्यक्ति को अनिवार्यत: भारत का नागरिक होना चाहिए तथा उसे किसी न्यायिक पद पर कम से कम दस वर्ष का अनुभव होना चाहिए या कम से कम दस वर्ष तक लगातार उच्च न्यायालय में वकालत का अनुभव होना चाहिए। इस प्रावधान की तुलना पूर्व में भारत शासन अधिनियम, 1935 में प्रतिपादित योग्यताओं से करने पर कई परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं। अब एक बैरिस्टर उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए स्वत: अर्ह नहीं है। वह उच्च न्यायालय में तभी नियुक्त हो सकता है जबकि वह कम से कम दस वर्ष से किसी उच्च न्यायालय में वकालत कर रहा हो या कम से कम दस वर्ष किसी न्यायिक पद पर कार्यरत रह चुका हो। न्यायिक सेवा के किसी व्यक्ति के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति की पात्रता के लिए आवश्यक सेवा अवधि पॉंच वर्ष से बढ़ाकर दस वर्ष कर दी गयी है। एक सिविल सेवक अब उच्च न्यायालय में तभी नियुक्त किया जा सकता है जब उसने दस वर्ष तक कोई न्यायिक पद धारण किया हो जबकि इससे पहले तीन वर्ष तक जिला न्यायाधीश के रूप में कार्य करने वाला कोई सिविल सेवक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने का पात्र हो जाता था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल तथा उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से सलाह-मशविरे के बाद की जाती है।
उच्च न्यायालयों की सत्यनिष्ठा को सुरक्षित रखने के लिए तथा उन्हें कार्यपालिका के नियंत्रण से स्वतंत्र रखने के लिए संविधान में बहुत से प्रावधान किये गये हैं ताकि वे अपने न्यायिक कार्यो का संपादन भय और पक्षपात से रहित होकर कर सकें। न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित होता है तथा वे बासठ वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत्त होते हैं। इससे पहले उन्हें केवल उस स्थिति में हटाया जा सकता है जब संसद का प्रत्येक सदन अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत से तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की कुल संख्या के कम से कम दो तिहाई बहुमत से इस आशय का प्रस्ताव उनके साबित कदाचरण या अक्षमता के आधार पर पारित करें। यह प्रावधान उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को कार्यकाल संबंधी वही सुरक्षा देता है जो इंगलैंड के न्यायाधीशों को प्राप्त है । यह मौलिक प्रावधान है क्योंकि 1935 के भारत- शासन अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था। राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद ही किसी न्यायाधीश को एक उच्च न्यायालय से दूसरे में स्थानान्तरित कर सकता है। न्यायाधीशों के वेतन संविधान की दूसरी अनुसूची में वर्णित हैं और इस कारण वश संविधान-संशोधन के बिना नहीं बदले जा सकते हैं। किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के भत्तों, अवकाश तथा पेंशन में उसकी नियुक्ति के बाद उसके लिए अलाभकर कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है। किसी न्यायाधीश को पदच्युत करने के लिए लाए गये पूर्ववर्णित प्रस्ताव की सुनवायी के अलावा और किसी स्थिति में किसी केंद्रीय या राज्य की विधायिका में उसके कार्य निष्पादन संबंधी आचरण के बारे में चर्चा नहीं की जा सकती है। यह प्रतिबंध उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को स्थानीय राजनीतिक दबावों से सुरक्षित करता है।उच्च न्यायालय के व्यय, उस राज्य की समेकित निधि पर भारित होते हैं।
भारत के संविधान द्वारा उच्च न्यायालयों की अधिकारिता, उनमें प्रशासित विधि और न्यायालय के नियम बनाने की उनकी शक्तियों को उसी रूप में जारी रखा गया है जैसी वे संविधान के लागू होने के ठीक पहले थीं। उच्च न्यायालय की यह अधिकारिता और शक्ति भारतीय संविधान के तथा उपयुक्त विधायिका द्वारा निर्मित विधि के प्रावधानों के अधीन है। संविधान के द्वारा ऐतिहासिक सततता को कायम रखने के लिए यह यथास्थिति बनाए रखी गयी है (अनुच्छेद 225) । संविधान के लागू होने के अवसर पर प्रशासित विधि में निर्णयज-विधि भी शामिल है। इसलिए विशेष रूप से यह प्रावधान भी किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों के लिए बाध्यकारी होगी। अत: विधिक स्थिति यह है कि प्रिवी काउंसिल एवं संघीय न्यायालय के निर्णय उच्च न्यायालयों के लिए तब तक बाध्यकारी है जब तक कि उच्चतम न्यायालय उनके विपरीत निर्णय न दे।
भारत शासन अधिनियम 1935 की धारा 226 (1) में राजस्व संबंधी किसी भी मामले में उच्च न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता को वर्जित किया गया था। यह वर्जना मूल संविधान के अनुच्छेद 225 के परंतुक द्वारा समाप्त कर दी गयी थी। संविधान (42वॉं संशोधन) अधिनियम, 1976 के द्वारा उक्त परन्तुक का विलोपन कर दिया गया था परन्तु संविधान (44वॉं) संशोधन अधिनियम 1978 की धारा 29 के जरिये उक्त परन्तुक को पुन: स्थापित कर दिया गया है जो दिनांक 20-6-79 से लागू हो गया है। इस प्रकार अब उच्च न्यायालय को राजस्व संबंधी मामले में भी आरंभिक अधिकारिता प्राप्त है।
संविधान के अति महत्वपूर्ण अनुच्छेद 226 के जरिए उच्च न्यायालयों की अधिकारिता में एक नवीन तत्व का समावेश किया गया जो उच्च न्यायालय के निदेश, आदेश या समादेश - बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण के रूप में हो सकते हैं जिन्हें मूल अधिकारों के प्रवर्तन या किसी अन्य उद~देश्य से जारी किया जाता है। यह उच्च न्यायालय की शक्तियों में उल्लेखनीय वृद्धि है। संविधान-पूर्व युग में समादेश अधिकारिता के संबंध में उच्च न्यायालयों की समान शक्तियॉं नहीं थीं। मुख्यत: ऐतिहासिक कारणों के चलते विभिन्न उच्च न्यायालयों में कृत्रिम और पक्षपातपूर्ण विभेद थे। इस प्रकार नये संविधान की पूर्वसंध्या पर समादेश अधिकारिता के संबंध में उच्च न्यायालयों की स्थितियॉं भिन्न-भिन्न थीं। प्रत्येक उच्च न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 491 के अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण का समादेश जारी कर सकता था जो इसकी अधिकारिता के संपूर्ण क्षेत्र में लागू होता था। कलकत्ता,मद्रास और बंबई के उच्च न्यायालयों में से प्रत्येक के पास उसकी सामान्य आरंभिक सिविल अधिकारिता की सीमाओं के अंतर्गत अन्य समादेश जारी करने का प्राधिकार था लेकिन कोई अन्य उच्च न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण के अलावा कोई और समादेश जारी नहीं कर सकता था। नये संविधान द्वारा सभी उच्च न्यायालयों के साथ समान व्यवहार किया गया तथा अब प्रत्येक उच्च न्यायालय के पास समादेश अधिकारिता है जो उसकी समग्र क्षेत्रीय अधिकारिता के सहवर्ती है।
मूल रूप में अनुच्छेद 226 का शब्द विन्यास काफी विस्तृत था किन्तु संविधान (42वां संशोधन) अधिनियम, 1976 के द्वारा समादेश अधिकारिता के मामले में उच्च न्यायालय की शक्तियों पर शक्तिशाली प्रतिबंध आरोपित कर दिये गये थे। किन्तु उक्त संशोधनों में से अधिकांश को संविधान के 43वें एवं 44वें संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया है। उच्च न्यायालय की एक पक्षीय व्यादेश एवं स्थगनादेश जारी करने की शक्ति में जो कटौती 42वें संशोधन द्वारा की गयी थी उसे भी संविधान के 44वें संशोधन द्वारा इस प्रावधान के साथ निरस्त कर दिया गया है कि एक पक्षीय व्यादेश एवं स्थगनादेश जारी होने की दशा में विपक्षी को न्यायालय में उपस्थित होकर उक्त व्यादेश/स्थगनादेश को अपास्त करने का प्रार्थना पत्र देने का अधिकार होगा तथा ऐसा प्रार्थना पत्र आने पर न्यायालय को उसका निस्तारण 15 दिन में करना होगा वरना स्थगनादेश/व्यादेश स्वत: समाप्त हो जायेगा।
प्रत्येक उच्च न्यायालय को उसकी अपीली अधिकारिता से संबद्ध सभी न्यायालयें के अधीक्षण की शक्ति दी गयी है। (अनुच्छेद 227) । अपनी अधीक्षण शक्ति के अंतर्गत उच्च न्यायालय ऐसे न्यायालयों से विवरणियॉं मंगा सकता है, सामान्य नियम बना कर जारी कर सकता है, ऐसे न्यायालयों के चलन और कार्यवाहियों को नियमित करने की विधाएं निर्धारित कर सकता है तथा ऐसे तरीके निर्धारित कर सकता है जिनसे पुस्तकों प्रविष्टियों और खातों को दुरूस्त रखा जाय। मूल संविधान में अनुच्छेद 227 इस प्रकार निर्मित किया गया था जिससे उच्च न्यायालय अपनी अधीक्षण अधिकारिता का प्रयोग न केवल अपने क्षेत्र में आने वाले अधीनस्थ न्यायालयों पर, बल्कि कानूनी या अर्धन्यायिक अधिकरणों पर करने में समर्थ हो सके जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ये सभी अधीनस्थ संस्थाएं उन्हें प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग ‘अपने प्राधिकार की सीमा के भीतर’ तथा ‘विधिक तरीके से’ करें।
अनुच्छेद 228 उच्च न्यायालय को यह शक्ति देता है कि वह अधीनस्थ न्यायालयों में विचाराधीन किसी मामले को अपने पास मँगा सकता है जब वह संतुष्ट हो जाये कि उक्त मामला संविधान की व्याख्या से संबंधित किसी सारभूत विधिक प्रश्न को समाहित किये हुए है। तत्पश्चात उच्च न्यायालय ऐसे मामले का स्वयं निबटारा कर सकता है या विधिक प्रश्न को निर्णीत करने के उपरांत इसे पुन: पूर्व न्यायालय को लौटा सकता है जिससे वहॉं उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुरूप मामले का निबटारा हो सके।
अनुच्छेद 229 में उच्च न्यायालयों के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति संबंधी प्रावधान है। ऐसी नियुक्तियों के बारे में मुख्य न्यायाधीश को विस्तृत शक्तियां दी गयी हैं। इस अनुच्छेद का उद~देश्य उच्च न्यायालय को अपने कर्मचारी वर्ग पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान करना है जिसका सीमा-निर्धारण केवल स्वयं उक्त अनुच्छेद द्वारा ही किया गया है ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा सरकारी हस्तक्षेप से इसका मुक्त रहना सुनिश्चित हो सके। उक्त अनुच्छेद का परंतुक मुख्य न्यायाधीश की उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति संबंधी शक्ति को सीमित करता है। साधारणत: उसे इन नियुक्तियों के संबंध में लोक सेवा आयोग से परामर्श करने की आवश्यकता नहीं होती है, लेकिन यदि राज्यपाल किन्हीं मामलों को विनिर्दिष्ट करते हुए कोई नियम बना दे तो मुख्य न्यायाधीश को इन विनिर्दिष्ट पदों पर नियुक्तियां करने से पहले लोक सेवा आयोग से परामर्श करना पड़ेगा। तथापि किसी पद विशेष के सृजन के विषय में वित्तीय सहमति देते समय राज्यपाल पदधारकों को चयनित और नियुक्त करने की मुख्य न्यायाधीश की शक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता है।
अनुच्छेद 132 के अनुसार उच्च न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के संबंध में, जो दीवानी, फौजदारी या अन्य कार्यवाहियों से संबंधित हो, अपील उच्चतम न्यायालय में की जाएगी। उच्च न्यायालय यह सत्यापित कर सकता है कि विधादित मामला संविधान की व्याख्या से संबंधित किसी सारभूत विधिक प्रश्न को समाविष्ट करता है। जब कोई उच्च न्यायालय इस आशय का प्रमाण पत्र देने से इंकार कर दे तो उच्चतम न्यायालय अपीलार्थी को अपील की विशेष अनुमति दे सकता है यदि वह संतुष्ट हो जाय कि विचारित मामले में कोई सारभूत विधिक प्रश्न समाविष्ट है। जहां ऐसा प्रमाण पत्र उच्च न्यायालय द्वारा दिया जाता है या उच्चतम न्यायालय अनुमति प्रदान करता है, कोई भी पक्ष उक्त निर्णय के विरोध में उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।
दीवानी मामलों में सुप्रीम कोर्ट में की गयी अपील अनुच्छेद 133 के अंतर्गत होगी जो उच्च न्यायालय के निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के विरूद्ध होगी। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 136 के अंतर्गत विशेष अनुमति से तथा अनुच्छेद 132 के अंतर्गत संवैधानिक आधार पर भी ऐसी अपीलें दायर होंगी। अपील हेतु उच्च न्यायालय को यह प्रमाणित करना होगा कि विचारित मामले में सामान्य महत्व का कोई सारभूत विधिक प्रश्न निहित है तथा उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा होना चाहिए। वादों के मूल्यांकन के आधार पर उच्चतम न्यायालय में अपील के अधिकार को संविधान (30वॉं संशोधन) अधिनियम 1972 द्वारा विलुप्त कर दिया गया है। फौजदारी मामलों में सुप्रीम कोर्ट में तभी अपील हो सकती है जब – (अ) उच्च न्यायालय ने अपील के बाद किसी अभियुक्त की दोष मुक्ति के आदेश को उलट दिया है तथा उसे मृत्यु दंड दे दिया है। (ब) उच्च न्यायालय ने किसी मामले को अधीनस्थ न्यायालय से अपने पास विचारण हेतु मँगा लिया है और अभियुक्त को दोषी पाकर उसे मृत्यु दंड दे दिया है। (स) उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर देता है कि निर्णीत मामला उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए उपयुक्त है।
भारत के संविधान ने उच्च न्यायालयों को न्यायिक प्रशासन, कनिष्ठ न्यायालयों द्वारा न्याय के संवर्द्धन, अन्याय होने की दशा में त्वरित कदम उठाने, लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की सुरक्षा करने तथा यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रशासन विधि की सीमाओं के अंतर्गत ही कार्य करें, महत्वपूर्ण और प्रभावशाली शक्तियां प्रदान की हैं। इस प्रकार आधुनिक न्याय-व्यवस्था में उच्च न्यायालय को सम्मानपूर्ण गरिमामय एवं अधिकारितायुक्त उच्च स्थिति प्राप्त है।


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19 दिसम्बर - बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और रौशन सिंह शहीदी दिवस



आज ही के दिन 19 दिसंबर 1927 को काकोरी कांड को अंजाम देने वाले देश के तीन वीर सपूतों को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया था। आज ही के दिन ये दिनों देश की आजादी को समर्पित हो गए थे। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान और ठाकुर रौशन सिंह को लखनऊ के पास काकोरी में ट्रेन लूटने के आरोप में अंग्रजों ने फांसी की सजा दे दी थी।
काकोरी कांड- काकोरी कांड स्वतंत्रता संग्राम की एक स्वर्णिम घटनाओं में से एक है । 9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल सहित करीब 10 क्रान्तिकारियों ने ट्रेन लूटने की योजना बनाई थी। काकोरी रेलवे स्टेशन से जैसे ही ट्रेन थोड़ा आगे बढ़ी, बिस्मिल ने चेन खींच कर ट्रेन रोक दी। इसमें रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, ठाकुर रौशन सिंह और चन्द्र शेखर आजाद भी शामिल थे, जिन्होंने ट्रेन के इंजन और उसके ड्राइवर को कब्जे में कर रखा था। क्रांतिकारियों ने ट्रेन से 8000 रूपए की चोरी की थी। इस घटना के बाद इससे सम्बंधित क्रांतिकारियों को पकडने के लिए अंग्रेजों ने 50 लोगों को गिरफ्तार किया। डेढ़ साल मुकदमा चलने के बाद अशफाक उल्लाह खान, राम प्रसाद बिस्मिल और राजेंद्र नाथ लिहाड़ी को फांसी की सजा दे दी गई।
रामप्रसाद बिस्मिल- राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर में हुआ था। बिस्मिल भारत के महान क्रान्तिकारी, अग्रणी स्वतन्त्रता सेनानी व उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक, बहुभाषाभाषी, इतिहासकार व साहित्यकार थे। उन्होंने हिन्दुस्तान की आजादी के लिये अपने प्राणों की आहुति दे दी। बिस्मिल को काकोरी कांड में अंग्रेजों ने 19 दिसंबर 1927 को फांसी की सजा दे दी।
अशफाक उल्लाह खान- इनका जन्म शाहजहांपुर के एक पठान परिवार में 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था । अशफाक और बिस्मिल दोनों बेहद घनिष्ठ मित्र थे। दोनों ने ही हिन्दी और उर्दू में देस भक्ति का कई कविताएं और शायरी लिखी हैं। इन्होंने बिस्मिल के साथ मिल कर 1925 में काकोरी कांड को अजांम दिया, जिसके चलते इन्हें 19 दिसंबर 1927 को बिस्मिल के साथ फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया ।
रौशन सिंह- ठाकुर रौशन सिंह का जन्म यूपी के शाहजहांपुर में एक ठाकुर परिवार में हुआ था। काकोरी कांड में रौशन सिंह ने बिस्मिल का साथ दिया था । जिसके चलते इनको भी बिस्मिल और अशफाक उल्लाह खान के साथ 19 दिसंबर को फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया गया ।


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दर्द-ए-पेशावर : 32 लोगों की मौत



  • सेक्युलर रुदालियाँ आज हैरान है कि रोये तो किसके लिए ?
  • अभी अभी गगन भेदी आकाश्वानी हुई, आतकवादियो का कोई धर्म नही होता
  • 26/11 और 16/12, तब धरती हमारी थी हथियार तुम्हारे थे, आज धरती भी तुम्हारी है हथियार भी तुम्हारे है, हमे दुख कल भी था आज भी है
  • मैंने मारे खुदा के बन्दे यूँ ही क्योकि खुदा उनको मुस्कराने वजह देता है..
  • ख़ुदा गज़ब तेरे कारनामे कि आज काफ़िर भी मुसलमानों के बच्चो के लिए रो रहे है..
  • मैं बड़ा होकर सभी आंतकवादियों को मार दूंगा। उन्होंने मेरे भाई को मार डाला। मैं उन्हें बख्शूंगा नहीं, एक-एक को मार डालूंगा।
  • मेरे बेटे को नकली बंदूक से भी डर लगता था, असली बंदूक देखकर उस पर क्या गुजरी होगी।
  • मैं बड़ा होकर सभी आंतकवादियों को मार दूंगा। उन्होंने मेरे भाई को मार डाला। मैं उन्हें बख्शूंगा नहीं, एक-एक को मार डालूंगा।
  • एक बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा करने में 20 साल लगते हैं, उन्हें मारने में दो सेकंड्स भी नहीं लगे।


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आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) की धारा 354 में बदलाव




1860 से चले आ रहे कानून भारतीय दंड संहिता अथवा इंडियन पैनल कोड (आईपीसी ) की धारा 354 में स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल प्रयोग करना जैसी वारदातें आती थीं। इसके तहत आरोपी को एक वर्ष के लिए कारावास, जो पांच वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माने की सजा का प्रावधान था. साथ ही यह जमानतीय धारा भी थी। जिसमें आरोपी जमानत पर बाहर आ सकता था। निर्भया केस के बाद सरकार द्वारा बलात्‍कार विरोधी कानून लाया गया  जिसे एंटी रेप लॉ कहा गया और इसके तहत कानून में व्यापक बदलाव किए गए। इस बदलाव के बाद अब 354 के तहत छेड़छाड़ के मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 5 साल कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। साथ ही कम से कम एक साल कैद की सजा का प्रावधान किया गया है और इसे गैर-जमानती अपराध माना गया है।

आईपीसी की धारा-354 में कई उप धाराये सेक्शन बनाई गई है। जिसके अंतर्गत महिलाओं के प्रति छेड़छाड़ सम्‍बन्धी अलग-अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा का प्रावधान किया गया है। भादंसं की धारा 354 को धारा-354 ए, 354 बी, 354 सी और 354 डी बनाया गया है तथा धारा 354 एक के चार उपधारा है। अर्थात अगर कोई शख्स किसी महिला के साथ सेक्सुअल प्रकृति शारीरिक टच (छूना) करता है या फिर ऐसा व्‍यवहार दिखाता है जो सेक्सुअल व्‍यवहार का हो तो 354 ए उपधारा 1 लगेगा। वहीं सेक्सुअल डिमांड करने पर उपधारा  2, मर्जी के खिलाफ पोर्न दिखाने पर उपधारा 3 और सेक्सुअल कलर वाले कंमेंट (छींटाकशी) पर उपधारा 4 लगता है। 354 ए के उपधारा 4 में एक साल तक कैद जबकि बाकी तीनों उपधारा में 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है।

नए कानून के तहत अगर कोई शख्स जबरन महिला का कपड़ा उतरवाता है या फिर उकसाता है या फडता है तो धारा-354 बी के तहत केस दर्ज होगा और दोषी को 3 साल से लेकर 7 साल तक कैद की सजा का प्रावधान है और मामला गैर जमानती होगा। महिला के प्राइवेट एक्ट का फोटोग्राफ लेना और बांटने के मामले में आईपीसी की धारा-354 सी लगती है दोषी को एक साल से तीन साल तक कैद का प्रावधान है दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 3 साल से 7 साल तक कैद की सजा हो सकती है और यह गैर जमानती अपराध होगा। वहीं लड़की या महिला का पीछा करना और संम्‍पर्क करने का प्रयास के मामले में आईपीसी की धारा-354 डी के तहत केस दर्ज होगा और दोषी को तीन साल तक कैद हो सकती है।
  • आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) 354(क) अथवा 354A
    इसके तहत अवांछनीय शारीरिक संपर्क और अग्रक्रियाएं या लैंगिक संबंधों की स्वीकृति बनाने की मांग या अनुरोध, अश्लील साहित्य दिखाना जैसी वारदातें आती हैं. वैसे तो यह बेलेबल है लेकिन इसमें कम से कम कारावास तीन वर्ष तक, जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान किया गया। इसी के तहत लैंगिक आभासी टिप्पणियों की प्रकृति का लैंगिक उत्पीडऩ भी जोड़ा गया। जिसमें आरोपी को एक वर्ष तक का कारावास हो सकेगा या जुर्माना या फिर दोनों।
  • आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) 354(ख) अथवा 354B
    इसके तहत किसी महिला को विवस्त्र निवस्‍त्र करने के आशय से स्त्री पर हमला या आपराधिक बल कर प्रयोग किया जाना। जिसमें आरोपी को कम से कम पांच वर्ष का कारावास, किंतु जो दस वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना भी नियत किया गया। साथ ही यह धारा नॉनबेलेबल है।
  • आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) 354(ग) अथवा 354C
    दृश्यरतिकता यानि किसी को घूरकर देखना। इसके तहत अगर किसी लड़की को कोई पंद्रह सेकंड घूरकर देख ले तो उसके खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान है। जिसमें कानून के तहत प्रथम दोष सिद्ध के लिए कम से कम एक वर्ष का कारावास, किन्तु जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना। इसमें जमानत हो सकती ह। अगर यही व्यक्ति दुबारा ऐसी ही घटना के लिए दोषी पाया जाता है तो इसके लिए कम से कम तीन वर्ष का कारावास जो सात वर्ष तक का हो सकेगा और जुर्माना भी। इसमें आरोपी की जमानत भी नहीं हो सकती।
  • आईपीसी (इंडियन पैनल कोड) 354(घ) अथवा 354D
    इसके तहत किसी लड़की या महिला का पीछा करना जैसी वारदातें शामिल हैं। जिसमें पहली बार अगर आरोपी पर दोष सिद्ध होता है तो उसको तीन वर्ष का कारावास और जुर्माना हो सकता है। वहीं अगर यही आरोपी दुबारा ऐसा करता है और उस पर दोष सिद्ध होता है तो इसके लिए पांच वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है और वहीं आरोपी की जमानत भी नहीं हो सकती।


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क्षत्रिय- राजपूत के गोत्र और उनकी वंशावली



राजपूतोँ के वंश
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"दस रवि से दस चन्द्र से बारह ऋषिज प्रमाण, 
चार हुतासन सों भये कुल छत्तिस वंश प्रमाण,
 भौमवंश से धाकरे टांक नाग उनमान, 
चौहानी चौबीस बंटि कुल बासठ वंश प्रमाण."
क्षत्रिय- राजपूत के गोत्र और उनकी वंशावली
अर्थ:-दस सूर्य वंशीय क्षत्रिय दस चन्द्र वंशीय,बारह ऋषि वंशी एवं चार अग्नि वंशीय कुल छत्तिस क्षत्रिय वंशों का प्रमाण है,बाद में भौमवंश नागवंश क्षत्रियों को सामने करने के बाद जब चौहान वंश चौबीस अलग अलग वंशों में जाने लगा तब क्षत्रियों के बासठ अंशों का पमाण मिलता है।



सूर्य वंश की दस शाखायें:-
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१.कछवाह, २.राठौड, ३.बडगूजर, ४.सिकरवार, ५.सिसोदिया, ६.गहलोत, ७.गौर, ८.गहलबार, ९.रेकबार, १०.जुनने, ११.बैस
चन्द्र वंश की दस शाखायें:-
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१.जादौन, २.भाटी, ३.तोमर, ४.चन्देल, ५.छोंकर, ६.होंड, ७.पुण्डीर, ८.कटैरिया, ९.दहिया,


अग्निवंश की चार शाखायें:-
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१.चौहान, २.सोलंकी, ३.परिहार, ४.पमार


ऋषिवंश की बारह शाखायें:-
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१.सेंगर, २.दीक्षित, ३.दायमा, ४.गौतम, ५.अनवार (राजा जनक के वंशज), ६.विसेन, ७.करछुल, ८.हय, ९.अबकू तबकू, १०.कठोक्स, ११.द्लेला १२.बुन्देला


चौहान वंश की चौबीस शाखायें:-
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१.हाडा, २.खींची, ३.सोनीगारा, ४.पाविया, ५.पुरबिया, ६.संचौरा, ७.मेलवाल, ८.भदौरिया, ९.निर्वाण, १०.मलानी, ११.धुरा, १२.मडरेवा, १३.सनीखेची, १४.वारेछा, १५.पसेरिया, १६.बालेछा, १७.रूसिया, १८.चांदा, १९.निकूम, २०.भावर, २१.छछेरिया, २२.उजवानिया, २३.देवडा, २४.बनकर
यदु वंश
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रघु वंश
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नाग वंश
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राजपूत नाम, गोत्र , वंश, स्थान और जिला की सूची
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क्रमांक नाम गोत्र वंश स्थान और जिला
१. सूर्यवंशी भारद्वाज सूर्य बुलन्दशहर आगरा मेरठ अलीगढ
२. गहलोत बैजवापेण सूर्य मथुरा कानपुर और पूर्वी जिले
३. सिसोदिया बैजवापेड सूर्य महाराणा उदयपुर स्टेट
४. कछवाहा मानव सूर्य महाराजा जयपुर और ग्वालियर राज्य
५. राठोड कश्यप सूर्य जोधपुर बीकानेर और पूर्व और मालवा
६. सोमवंशी अत्रय चन्द प्रतापगढ और जिला हरदोई
७. यदुवंशी अत्रय चन्द राजकरौली राजपूताने में
८. भाटी अत्रय जादौन महारजा जैसलमेर राजपूताना
९. जाडेचा अत्रय यदुवंशी महाराजा कच्छ भुज
१०. जादवा अत्रय जादौन शाखा अवा. कोटला ऊमरगढ आगरा
११. तोमर व्याघ्र चन्द पाटन के राव तंवरघार जिला ग्वालियर
१२. कटियार व्याघ्र तोंवर धरमपुर का राज और हरदोई
१३. पालीवार व्याघ्र तोंवर गोरखपुर
१४. परिहार कौशल्य अग्नि इतिहास में जानना चाहिये
१५. तखी कौशल्य परिहार पंजाब कांगडा जालंधर जम्मू में
१६. पंवार वशिष्ठ अग्नि मालवा मेवाड धौलपुर पूर्व मे बलिया
१७. सोलंकी भारद्वाज अग्नि राजपूताना मालवा सोरों जिला एटा
१८. चौहान वत्स अग्नि राजपूताना पूर्व और सर्वत्र
१९. हाडा वत्स चौहान कोटा बूंदी और हाडौती देश
२०. खींची वत्स चौहान खींचीवाडा मालवा ग्वालियर
२१. भदौरिया वत्स चौहान नौगंवां पारना आगरा इटावा गालियर
२२. देवडा वत्स चौहान राजपूताना सिरोही राज
२३. शम्भरी वत्स चौहान नीमराणा रानी का रायपुर पंजाब
२४. बच्छगोत्री वत्स चौहान प्रतापगढ सुल्तानपुर
२५. राजकुमार वत्स चौहान दियरा कुडवार फ़तेहपुर जिला
२६. पवैया वत्स चौहान ग्वालियर
२७. गौर,गौड भारद्वाज सूर्य शिवगढ रायबरेली कानपुर लखनऊ
२८. बैस भारद्वाज सूर्य उन्नाव रायबरेली मैनपुरी पूर्व में
२९. गेहरवार कश्यप सूर्य माडा हरदोई उन्नाव बांदा पूर्व
३०. सेंगर गौतम ब्रह्मक्षत्रिय जगम्बनपुर भरेह इटावा जालौन
३१. कनपुरिया भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय पूर्व में राजाअवध के जिलों में हैं
३२. बिसैन वत्स ब्रह्मक्षत्रिय गोरखपुर गोंडा प्रतापगढ में हैं
३३. निकुम्भ वशिष्ठ सूर्य गोरखपुर आजमगढ हरदोई जौनपुर
३४. सिरसेत भारद्वाज सूर्य गाजीपुर बस्ती गोरखपुर
३५. कटहरिया वशिष्ठ्याभारद्वाज, सूर्य बरेली बंदायूं मुरादाबाद शहाजहांपुर
३६. वाच्छिल अत्रयवच्छिल चन्द्र मथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर
३७. बढगूजर वशिष्ठ सूर्य अनूपशहर एटा अलीगढ मैनपुरी मुरादाबाद हिसार गुडगांव जयपुर
३८. झाला मरीच कश्यप चन्द्र धागधरा मेवाड झालावाड कोटा
३९. गौतम गौतम ब्रह्मक्षत्रिय राजा अर्गल फ़तेहपुर
४०. रैकवार भारद्वाज सूर्य बहरायच सीतापुर बाराबंकी
४१. करचुल हैहय कृष्णात्रेय चन्द्र बलिया फ़ैजाबाद अवध
४२. चन्देल चान्द्रायन चन्द्रवंशी गिद्धौर कानपुर फ़र्रुखाबाद बुन्देलखंड पंजाब गुजरात
४३. जनवार कौशल्य सोलंकी शाखा बलरामपुर अवध के जिलों में
४४. बहरेलिया भारद्वाज वैस की गोद सिसोदिया रायबरेली बाराबंकी
४५. दीत्तत कश्यप सूर्यवंश की शाखा उन्नाव बस्ती प्रतापगढ जौनपुर रायबरेली बांदा
४६. सिलार शौनिक चन्द्र सूरत राजपूतानी
४७. सिकरवार भारद्वाज बढगूजर ग्वालियर आगरा और उत्तरप्रदेश में
४८. सुरवार गर्ग सूर्य कठियावाड में
४९. सुर्वैया वशिष्ठ यदुवंश काठियावाड
५०. मोरी ब्रह्मगौतम सूर्य मथुरा आगरा धौलपुर
५१. टांक (तत्तक) शौनिक नागवंश मैनपुरी और पंजाब
५२. गुप्त गार्ग्य चन्द्र अब इस वंश का पता नही है
५३. कौशिक कौशिक चन्द्र बलिया आजमगढ गोरखपुर
५४. भृगुवंशी भार्गव चन्द्र वनारस बलिया आजमगढ गोरखपुर
५५. गर्गवंशी गर्ग ब्रह्मक्षत्रिय नृसिंहपुर सुल्तानपुर
५६. पडियारिया, देवल,सांकृतसाम ब्रह्मक्षत्रिय राजपूताना
५७. ननवग कौशल्य चन्द्र जौनपुर जिला
५८. वनाफ़र पाराशर,कश्यप चन्द्र बुन्देलखन्ड बांदा वनारस
५९. जैसवार कश्यप यदुवंशी मिर्जापुर एटा मैनपुरी
६०. चौलवंश भारद्वाज सूर्य दक्षिण मद्रास तमिलनाडु कर्नाटक में
६१. निमवंशी कश्यप सूर्य संयुक्त प्रांत
६२. वैनवंशी वैन्य सोमवंशी मिर्जापुर
६३. दाहिमा गार्गेय ब्रह्मक्षत्रिय काठियावाड राजपूताना
६४. पुण्डीर कपिल ब्रह्मक्षत्रिय पंजाब गुजरात रींवा यू.पी.
६५. तुलवा आत्रेय चन्द्र राजाविजयनगर
६६. कटोच कश्यप भूमिवंश राजानादौन कोटकांगडा
६७. चावडा,पंवार,चोहान,वर्तमान कुमावत वशिष्ठ पंवार की शाखा मलवा रतलाम उज्जैन गुजरात मेवाड
६८. अहवन वशिष्ठ चावडा,कुमावत खेरी हरदोई सीतापुर बारांबंकी
६९. डौडिया वशिष्ठ पंवार शाखा बुलंदशहर मुरादाबाद बांदा मेवाड गल्वा पंजाब
७०. गोहिल बैजबापेण गहलोत शाखा काठियावाड
७१. बुन्देला कश्यप गहरवारशाखा बुन्देलखंड के रजवाडे
७२. काठी कश्यप गहरवारशाखा काठियावाड झांसी बांदा
७३. जोहिया पाराशर चन्द्र पंजाब देश मे
७४. गढावंशी कांवायन चन्द्र गढावाडी के लिंगपट्टम में
७५. मौखरी अत्रय चन्द्र प्राचीन राजवंश था
७६. लिच्छिवी कश्यप सूर्य प्राचीन राजवंश था
७७. बाकाटक विष्णुवर्धन सूर्य अब पता नहीं चलता है
७८. पाल कश्यप सूर्य यह वंश सम्पूर्ण भारत में बिखर गया है
७९. सैन अत्रय ब्रह्मक्षत्रिय यह वंश भी भारत में बिखर गया है
८०. कदम्ब मान्डग्य ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण महाराष्ट्र मे हैं
८१. पोलच भारद्वाज ब्रह्मक्षत्रिय दक्षिण में मराठा के पास में है
८२. बाणवंश कश्यप असुरवंश श्री लंका और दक्षिण भारत में,कैन्या जावा में
८३. काकुतीय भारद्वाज चन्द्र,प्राचीन सूर्य था अब पता नही मिलता है
८४. सुणग वंश भारद्वाज चन्द्र,पाचीन सूर्य था, अब पता नही मिलता है
८५. दहिया कश्यप राठौड शाखा मारवाड में जोधपुर
८६. जेठवा कश्यप हनुमानवंशी राजधूमली काठियावाड
८७. मोहिल वत्स चौहान शाखा महाराष्ट्र मे है
८८. बल्ला भारद्वाज सूर्य काठियावाड मे मिलते हैं
८९. डाबी वशिष्ठ यदुवंश राजस्थान
९०. खरवड वशिष्ठ यदुवंश मेवाड उदयपुर
९१. सुकेत भारद्वाज गौड की शाखा पंजाब में पहाडी राजा
९२. पांड्य अत्रय चन्द अब इस वंश का पता नहीं
९३. पठानिया पाराशर वनाफ़रशाखा पठानकोट राजा पंजाब
९४. बमटेला शांडल्य विसेन शाखा हरदोई फ़र्रुखाबाद
९५. बारहगैया वत्स चौहान गाजीपुर
९६. भैंसोलिया वत्स चौहान भैंसोल गाग सुल्तानपुर
९७. चन्दोसिया भारद्वाज वैस सुल्तानपुर
९८. चौपटखम्ब कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर
९९. धाकरे भारद्वाज(भृगु) ब्रह्मक्षत्रिय आगरा मथुरा मैनपुरी इटावा हरदोई बुलन्दशहर
१००. धन्वस्त यमदाग्नि ब्रह्मक्षत्रिय जौनपुर आजमगढ वनारस
१०१. धेकाहा कश्यप पंवार की शाखा भोजपुर शाहाबाद
१०२. दोबर(दोनवर) वत्स या कश्यप ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर बलिया आजमगढ गोरखपुर
१०३. हरद्वार भार्गव चन्द्र शाखा आजमगढ
१०४. जायस कश्यप राठौड की शाखा रायबरेली मथुरा
१०५. जरोलिया व्याघ्रपद चन्द्र बुलन्दशहर
१०६. जसावत मानव्य कछवाह शाखा मथुरा आगरा
१०७. जोतियाना(भुटियाना) मानव्य कश्यप,कछवाह शाखा मुजफ़्फ़रनगर मेरठ
१०८. घोडेवाहा मानव्य कछवाह शाखा लुधियाना होशियारपुर जालन्धर
१०९. कछनिया शान्डिल्य ब्रह्मक्षत्रिय अवध के जिलों में
११०. काकन भृगु ब्रह्मक्षत्रिय गाजीपुर आजमगढ
१११. कासिब कश्यप कछवाह शाखा शाहजहांपुर
११२. किनवार कश्यप सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार में
११३. बरहिया गौतम सेंगर की शाखा पूर्व बंगाल और बिहार
११४. लौतमिया भारद्वाज बढगूजर शाखा बलिया गाजी पुर शाहाबाद
११५. मौनस मानव्य कछवाह शाखा मिर्जापुर प्रयाग जौनपुर
११६. नगबक मानव्य कछवाह शाखा जौनपुर आजमगढ मिर्जापुर
११७. पलवार व्याघ्र सोमवंशी शाखा आजमगढ फ़ैजाबाद गोरखपुर
११८. रायजादे पाराशर चन्द्र की शाखा पूर्व अवध में
११९. सिंहेल कश्यप सूर्य आजमगढ परगना मोहम्दाबाद
१२०. तरकड कश्यप दीक्षित शाखा आगरा मथुरा
१२१. तिसहिया कौशल्य परिहार इलाहाबाद परगना हंडिया
१२२. तिरोता कश्यप तंवर की शाखा आरा शाहाबाद भोजपुर
१२३. उदमतिया वत्स ब्रह्मक्षत्रिय आजमगढ गोरखपुर
१२४. भाले वशिष्ठ पंवार अलीगढ
१२५. भालेसुल्तान भारद्वाज वैस की शाखा रायबरेली लखनऊ उन्नाव
१२६. जैवार व्याघ्र तंवर की शाखा दतिया झांसी बुन्देलखंड
१२७. सरगैयां व्याघ्र सोमवंश हमीरपुर बुन्देलखण्ड
१२८. किसनातिल अत्रय तोमरशाखा दतिया बुन्देलखंड
१२९. टडैया भारद्वाज सोलंकीशाखा झांसी ललितपुर बुन्देलखंड
१३०. खागर अत्रय यदुवंश शाखा जालौन हमीरपुर झांसी
१३१. पिपरिया भारद्वाज गौडों की शाखा बुन्देलखंड
१३२. सिरसवार अत्रय चन्द्र शाखा बुन्देलखंड
१३३. खींचर वत्स चौहान शाखा फ़तेहपुर में असौंथड राज्य
१३४. खाती कश्यप दीक्षित शाखा बुन्देलखंड,राजस्थान में कम संख्या होने के कारण इन्हे बढई गिना जाने लगा
१३५. आहडिया बैजवापेण गहलोत आजमगढ
१३६. उदावत बैजवापेण गहलोत आजमगढ
१३७. उजैने वशिष्ठ पंवार आरा डुमरिया
१३८. अमेठिया भारद्वाज गौड अमेठी लखनऊ सीतापुर
१३९. दुर्गवंशी कश्यप दीक्षित राजा जौनपुर राजाबाजार
१४०. बिलखरिया कश्यप दीक्षित प्रतापगढ उमरी राजा
१४१. डोमरा कश्यप सूर्य कश्मीर राज्य और बलिया
१४२. निर्वाण वत्स चौहान राजपूताना (राजस्थान)
१४३. जाटू व्याघ्र तोमर राजस्थान,हिसार पंजाब
१४४. नरौनी मानव्य कछवाहा बलिया आरा
१४५. भनवग भारद्वाज कनपुरिया जौनपुर
१४६. गिदवरिया वशिष्ठ पंवार बिहार मुंगेर भागलपुर
१४७. रक्षेल कश्यप सूर्य रीवा राज्य में बघेलखंड
१४८. कटारिया भारद्वाज सोलंकी झांसी मालवा बुन्देलखंड
१४९. रजवार वत्स चौहान पूर्व मे बुन्देलखंड
१५०. द्वार व्याघ्र तोमर जालौन झांसी हमीरपुर
१५१. इन्दौरिया व्याघ्र तोमर आगरा मथुरा बुलन्दशहर
१५२. छोकर अत्रय यदुवंश अलीगढ मथुरा बुलन्दशहर
१५३. जांगडा वत्स चौहान बुलन्दशहर पूर्व में झांसी
१५४. वाच्छिल, अत्रयवच्छिल, चन्द्र, मथुरा बुलन्दशहर शाहजहांपुर  


नोट - 1. क्षत्रियों का इतिहास गौरव शाली है और पूर्व मे और भी विस्‍तृत रहा है। इस लेख का प्राप्‍त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। अगर आपके हिसाब से कोई त्रुटि या सुधार सम्‍भव हो तो कमेन्‍ट के माध्‍यम से जरूर रखे त्रुटि को दूर किया जायेगा।
2. अगर कोई क्षत्रिय-राजपूत शाखा इसमे नही जुडी है तो उसे भी अवगत कराये उसे भी सही श्रेणी मे जोड़ा जायेगा ताकि अपने नये क्षत्रिय भाई अपने इतिहास से अवगत हो सके। 
इस काम मे आपके सहयोग की अपेक्षा है और बिना समूहिक सहयोग के यह सम्‍भव भी नही है। 

धन्‍यवाद सहित

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