इलाहाबाद हाईकोर्ट बार की सफलता की दिशाहीनता



उच्च न्यायालय की बेंच को लेकर कुछ अधिवक्ता समूहों द्वारा जिस तरह से भाजपा और प्रधानमंत्री को टारगेट कर पुतले फूखे जा रहे है यह ठीक नहीं है. इलाहबाद हाईकोर्ट बार अधिवाक्ताओं की बार है किसी पार्टी विशेष नहीं और किसी पार्टी विशेष को हाईकोर्ट बार के मंच से राजनितिक रोटियां नहीं सेकनी देनी चाहिए.
हमारा एक ही उद्देश्य होना चाहिए उच्च न्यायालय की अखंडता का, वह किसी हमें किसी एक दल के विरोध करके और किसी एक दल के सहयोग नहीं मिलने वाला है.
हमें देखना होगा कि क्या राजनाथ या लक्ष्मी बाजपेई ने मीडिया के सामने बेच की बात स्वीकार है? या मेरठ बेंच के अधिवक्ताओं के इनका घेराव करके वार्ता कि और खुद ही ऐसे बयानों की प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी.
जब भाजपा के सांसद श्री Keshav Prasad Maurya व श्री Shyamacharan Gupta ने पहले ही कह दिया कि वो उच्च न्यायालय को नहीं बटने देगे तो बार के मंच से भाजपा विरोधी बयान क्यों देने दिए जा रहे है ?
जिस प्रकार सलाहकार समिति में कांग्रेसी विधायक अनुग्राह नारायण सिंह को सलाहकार सामिति में रखा गया वो भी ठीक नही है क्योकि वह बार के सदस्य भी नही है, अगर जन्प्रातिनिधि के तौर पर अनुग्रह को रखा गया तो केशव मौर्य और श्यामाचरण गुप्त को भी रखा जाना चाहिए था. ये सरकार से बात करने में ज्यादा सक्षम थे और भी अधिवक्ता जो बेंच की लड़ाई में ज्यादा प्रखर हो सकते है उनको साथ लेने और आगे करने की जरूरत है न कि बेंच की लड़ाई में बार के मैदान में राजनैतिक खेल खेलने की.
भाजपा के लोग भी बार की लड़ाई में साथ है और साथ भी दे और गाली खाए, एक साथ दोनों काम संभव नही हो सकता है. सर्वप्रथम बार का कांग्रेसीकरण और सपाईकारण बंद होना चाहिए.


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