हिस्टीरिया (Hysteria) : कारण और निवारण



यह रोग कोमल स्वभाव वाली स्त्रियों में अधिकतर देखा जाता है। पुरुष स्वभाव से ही थोड़े कठिन होते हैं किन्तु कोमल स्वभाव के भी कुछ पुरुष देखे जाते हैं। उनमें भी यह रोग का होना पाया जाता है। यह रोग मुख्यता उन नवयुवतियों को होता है जिनमें अपने प्रति असुरक्षा की भावना होती है एवं अत्यधिक मानसिक अवसाद में जीती हैं। जिन जवान स्त्रियों की समभोग इच्छा तृप्त नहीं होती उनको ही यह रोग अत्यधिक देखा जाता है। मानसिक अवसाद, भय, चिन्ता, शोक, पारिवारिक कष्ट, अचानक मानसिक आघात, मासिक रोग की गड़बड़ी, मंदाग्नी एवं अजीर्ण, घरेलू कलेश इत्यादि रोगों से भी यह रोग बनता है। इस बीमारी का सबसे घनिष्ठ सम्बन्ध दीमाग से है। दीमागी परेशानी अधिक बढ़ने पर रोग का रूप बढ़ता है। कम परेशानी होने पर रूप कम दिखाई देता है। एक रोगी में जो लक्षण होते हैं दूसरे में भिन्न प्रकार से लक्षण होते हैं। सबमें लक्षण का एक रूप नहीं होता इस रोग की चिकित्सा उसी कुशल वैद्य या डाक्टर करानी चाहिए जो मनुष्यों की मानसिक संवेदना एवं स्थिति को भलीभांति समझता हो। दीमागी गड़बड़ी के कारण ही ज्ञानेन्द्रियों में गड़बड़ी पैदा होती है। इस कारण हिस्टीरिया रोग में देखने, सुनने, बोलने, सूंघने या छूने में विकार पैदा होता है। इस प्रकार के रोगी में या तो सामने की दृष्टि में या बगल की दृष्टि में दोष आ जाता है। कोई ऊंचा सुनने लगता है, कोई कम सुनने लगता है या बिल्कुल नहीं सुनता। इसी प्रकार बोलने में भी फर्क आ जाता है और किसी-किसी की बोली बंद हो जाती है। किसी की छूने की शक्ति मारे जाने के कारण कांटा चुबना या चिंटी-मकोड़े के काटने का कुछ भी मालूम नहीं होता। संवेदन शक्ति भी इस प्रकार के रोगी की लोप हो जाती है। स्नायु मण्डल के विकार के कारण लकवा के लक्षण भी पैदा हो जाते हैं। हिस्टीरिया का प्रधान लक्षण मूर्छा या बेहोशी है। किसी-किसी को यह 1-2 दिन तक निरन्तर होता देखा गया है एवं बहुत से रोगियों में बार-बार और जल्दी-जल्दी दौरा होता है। ऐसी अवस्था में होश आते ही कुछ समय पश्चात् रोगी को फिर मूर्छा आती है। बेहोशी की अवस्था में रोगी के दांत भीच जाते हैं एवं शरीर अकड़ जाता है। किसी-किसी रोगी को मृगी की तरह मुंह से झाग भी आने लगती है। हिस्टीरिया रोग में मृगी रोग की तरह शरीर का नीलापन या आंखों की पुतली नहीं फिरती एवं दौरे की स्थिति तक बन जाती है।

कारणः-
  • तनावः- हिस्टीरिया रोग का खतरा रोगी के चेतन व अचेतन मन में चल रहे तनाव के कारण ही होता है। ये लक्षण रोगी द्वारा बनावटी तौर पर जानबूझ कर तैयार नहीं किए जाते। तनाव से अधिक ग्रस्त हो जाने के बाद बहुत कोशिशों के बाद भी जब व्यक्ति इससे बाहर नहीं आ पाता, तो रोगी को हिस्टीरिया के दौरे पड़ने लगते हैं। यह रोग उन महिलाओं को अपनी गिरफ्त में लेता है, जिन्हें तनाव से बाहर निकलने में पारिवारिक व सामाजिक कहीं से भी कोई जरिया नहीं मिलता। 10 में से 9 बार महिलाओं को यह रोग होता है।
  • कमजोर व्यक्तित्वः- ऐसे स्वभाव वाले रोगी बहुत जिद्दी होते हैं, जब इनके मन के अनुरूप कोई कार्य नहीं होता तो ये बहुत परेशान हो जाते हैं। कभी-कभी अपने मन की बात को पूरा करने के लिए जिद्द करने लगते हैं, जिस कारण चीजें फेंकने लगते हैं और स्वयं को नुकसान पहुंचाते हैं। कभी-कभी रोगी विपरीत परिस्थितियों में बदहवास हो जाते हैं, सांस उखड़ने लगती है और रोगी अचेत हो जाते हैं।
लक्षणः-
  • दौरे पड़नाः- रह-रहकर हाथ-पैरों व शरीर में झटके आना, ऐंठन होना व बेहोश हो जाना।
  • अचानक आवाज निकलना बदं हो जानाः- हिस्टीरिया से ग्रस्त रोगी के गले से आवाज निकलना बंद हो जाता है और रोगी इशारों व फुसफुसा कर बातें करने लगता है। कभी-कभी तो रोगी को दिखाई देना भी बंद हो जाता है। यह लक्षण दौरे के रूप में एक साथ या बदल-बदल कर कुछ मिनटों से लेकर कुछ घण्टों तक रहते हैं, कुछ समय पश्चात् स्वतः ही बंद हो जाते हैं। यदि रोगी को उपचार नहीं मिलता तो 1 दिन में 10 बार दौरे पड़ने लगते हैं तो कभी 2-3 माह में 1-2 बार ही हिस्टीरिया के दौरे पड़ने लगते हैं।
  • उल्टी सांसें चलनाः- रोगी जोर-जोर से गहरी-गहरी सांसें लेता है। रह-रह कर छाती व गला पकड़ता है और ऐसा महसूस होता है जैसा कि रोगी को सांस आ ही नहीं रही हैं और उसका दम घुट रहा है।
  • हाथ-पैर न चलनाः- रोगी की स्थिति गम्भीर होने पर हाथ-पैर फालिज की तरह ढीलें पड़ जाते हैं और कुछ समय तक रोगी चल-फिर भी नहीं पाता।
  • अचेत हो जानाः- रोगी अचानक या धीरे-धीरे अचेत होने लग जाता है। इस दौरान रोगी की सांसें चलती रहती हैं और शरीर बिल्कुल ढीला हो जाता है मगर दांत कसकर भिंच जाते हैं। यह अचेतन अवस्था कुछ मिनटों से लेकर कुछ घण्टों तक बनी रहती है। कुछ समय बाद रोगी खुद ही उठकर बैठ जाता है और उसका व्यवहार ऐसा होता है जैसे उसे कुछ हुआ ही न हो।
सारस्वत घृत
पाढ़ लोध वच सहजना धाय सेंधव आन।
पल पल सब ले लीजिये गौघृत प्रस्थ प्रमान।।
सारस्वत घृत छाग पय डारि सिद्ध कर लेय।
गदगद मिनमिन मूकता रोग नष्ट करि देय।।
तर्क शक्ति मेधा स्मृति बढ़ै मधुर स्वर होय।
कुपित कण्ठ गतवात कफ गदहि नष्ट करि देय।।

चिकित्सा:- जिस कारण से रोग हो उस कारण को ज्ञात कर उसकी चिकित्सा करनी चाहिए।
  1. कामवासना के कारण यदि यह रोग बने तो कामवासना शान्त करने के लिए प्रयास करना चाहिए। शरीर की उत्तेजना शान्त करने के लिए 1 ग्राम कपूर प्रातःकाल जल के साथ सेवन करने से भी उत्तेजना शान्त होती है।
  2. केले के तने का रस आधी कटोरी सेवन करने से भी शरीर की उत्तेजना शान्त होती है।
  3. जटामांसी 10 ग्राम, अश्वगंधा 3 ग्राम, अजवायन 1.5 ग्राम जौकूट कर 100 ग्राम पानी में पकाकर चैथाई भाग रहने पर छानकर सेवन करने से हिस्टीरिया रोग शान्त होता है। इस क्वाथ का नाम मांस्यादि क्वाथ है। इसके सेवन से निद्रा नाश भी होती है।
  4. घी में भूनी हुई हींग 10 ग्राम, कपूर 10 ग्राम, भांग का सत (गांजा) 5 ग्राम, अजवायन 20 ग्राम, तगर 20 ग्राम सबको बारीक कर जटामांसी के क्वाथ के साथ घोटकर 250 मिली ग्राम की गोली बनाकर सूखाकर 2 गोली उपरोक्त मांस्यादि क्वाथ या सारस्वतारिष्ट के साथ 2-3 बार सेवन करने से चमत्कारिक लाभ मिलता है।
  5. सारस्वत चूर्ण 1 चम्मच 2 बार भोजन बाद अश्वगंधा रिष्ट के साथ सेवन करने से भी हिस्टीरिया एवं मृगी रोग में बहुत लाभ मिलता है।
  6. ब्राह्मी घृत भी इस बीमारी में बहुत लाभ देती है।
  7. ब्राह्मी की ताजी हरी पत्तियां 3 ग्राम (सूखी 1 ग्राम), कालीमिर्च 15 नग मिलाकर, पीसकर जल के साथ सेवन करने से भी इस रोग में शान्ति मिलती है।
  8. बाह्मी स्वरस 10 ग्राम शहद मिलाकर सेवन करने से भी हिस्टीरिया, मृगी एवं पागलपन में लाभ मिलता है व दिमाग दुरुस्त रहता है।
  9. सर्पगंधा चूर्ण 2-3 ग्राम 2 बार जल के साथ सेवन करने से भी लाभ मिलता है।
  10. जटामांसी चूर्ण 2-3 ग्राम 2 बार जल के साथ सेवन करने से भी लाभ मिलता है एवं दीमाग शान्त रहता है।
  11. मकरध्वज, कालीमिर्च एवं शुद्ध मेनसिल समभाग लेकर पान के रस में घोटकर गोला बनाकर सुखाकर धान के अन्दर 15 दिन दबाकर, निकालकर 125 मिली ग्राम शहद के साथ 2 बार सुबह-शाम चाटने से बहुत लाभ मिलता है। यदि कस्तूरी उपलब्ध हो तो इसमें मिलाकर सेवन करने से यह बीमारी नष्ट होती है।
  12. 40 किलो नेत्रबाला, 1 किलो बालछड़ लेकर दोनों की भस्म बनाकर राख को पानी में भिगो कर एवं क्षार विधि से उसका क्षार निकाल लिया। यह क्षार आधा-आधा ग्राम अश्वगंधारिष्ट एवं सारस्वतारिष्ट के साथ सेवन करने से अथवा जल के साथ भी सेवन करने से हिस्टीरिया रोग में बहुत लाभ मिलता है।
  13. ब्राह्मी वटी का सेवन अश्वगंधारिष्ट एवं सारस्वतारिष्ट के साथ सेवन करने से भी बहुत लाभ मिलता है।
  14. वातकुलांतक रस भी इस रोग की प्रधान दवा है।
  15. हींग 20 ग्राम, बच 20 ग्राम, जटामासी, काला नमक, कूठ, बायविडंग 40-40 ग्राम लेकर, कूटकर 1-1 चम्मच दिन में 2-3 बार जल के साथ सेवन करने से हिस्टीरिया रोग में लाभ मिलता है एवं नींद भी आने लगती है।
  16. केसर, जावित्री 4-4 ग्राम, असगन्ध, जायफल, पीपली (गाय के दूध में उबाली हुई) 1-1 ग्राम, अदरख 20 ग्राम, पान 10 नग समस्त औषधियां कूटकर 250 मिली ग्राम की गोली बनाकर 1-1 गोली दिन में 3-4 बार पान के साथ चबाकर खाने से हिस्टीरिया रोग में बहुत लाभ मिलता है। साथ ही साथ मस्तिष्कजन्य विकार भी दूर होते हैं।
  17. पीपल के पिण्ड में जो पतले-पतले तन्तु निकलते हैं उसे दो तोला लेवें व कूट पीसकर उसमें जटामासी एक तोला, जावित्री एक तोला, कस्तूरी एक तोला, माशे का चूर्ण मिलाकर खूब खरल करके एक-एक रत्ती की गोली बना लें। 
  18. हिस्टीरिया रोगी को दो-दो गोली सवेरे, दोपहर, शाम को खिलाने और आधा घण्टे के बाद गुनगुना दूध पिलावें। इस प्रयोग को 29 दिन तक करने से हिस्टीरिया का रोग मिट जाता है। हल्का एवं बलदायक भोजन सेवन करना लाभप्रद है। 
  19. चीनी की जगह शहद का सेवन उत्तम है। दीमागी तनाव दूर रखना चाहिए एवं उत्तेजक खाद्य पदार्थों से परहेज करना चाहिए। लाल मिर्च, खटाई, तले पदार्थ, चाट-पकौड़ी, जंक फूड, बैंगन, गुड़, चाय-काफी, मांस-मदिरा इत्यादि का परहेज हितकारी है। कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे मस्तिष्क में विकार हो। हरी सब्जियां, हरी सब्जियों का सूप, फल एवं फलों का रस बहुत लाभ देता है।
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