जीवन परिचय स्वर्गीय ठाकुर गुरुजन सिंह जी



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठतम स्वयंसेवकों में एक स्वयंसेक तथा विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ कार्यकर्ता ठाकुर गुरुजन सिंह जी (20 नवम्बर, 1918 - 28 नवम्बर, 2013) अपनी आयु के 95 वर्ष पूरे करके 28 नवम्बर, 2013 को ब्रह्मलीन हो गये। उनका जन्म 20 नवम्बर, 1918 कोग्राम खुरुहुँजा (बबुरी बाजार, जिला चन्दौली, उत्तर प्रदेश) में हुआथा। उनके पिता का नाम स्व0 शिवमूरत सिंह था। दादा जी का नाम भृगुनाथ सिंह। ठाकुर साहब दो भाई थे। बड़े भाई का नाम डाॅ0 बब्बन सिंह था। कालान्तर में डाॅ0 बब्बन सिंह ने गढ़वा घाट मठ में जाकर सन्यास दीक्षा ले ली और वहीं रहने लगे। डाॅ0 बब्बन सिंह के एक पुत्र था, उनके तीन पुत्र हैं। ठाकुर साहब के पुत्र का नाम नरेन्द्र है, नरेन्द्र का विवाह 1971 में हुआ, उनके भी एक पुत्र और एक पुत्री हैं।
बनारस तथा मीरजापुर जिले में गढ़वा घाट मठ है। हरिद्वार में भी इसकी शाखा है। इस मठ की स्थापना खुरूहुँजा गाँव में जन्मे सन्त स्वामी आत्मविवेकानन्द जी महाराज ने की थी। इसी गढ़वा घाट मठ में ठाकुर साहब के बड़े भाई डाॅ0 बब्बन सिंह सन्यासी बनकर रहने लगे थे। मठ में वे डाॅ0 बाबा के नाम से आज भी जाने जाते थे।

प्रसिद्ध सन्त तेलंग स्वामी के समकालीन भी स्करानन्द जी महाराज बनारस में रहते थे। स्वामी भास्करानन्द जी महाराज के संपर्क में आकर एक गृहस्थ राय साहब रामवरण उपाध्याय जी सन्यासी हो गये थे। सन्यास के बाद उनका नाम सीताराम आश्रम पड़ा। इन्हीं सीताराम आश्रम के शिष्य ठाकुर गुरुजन सिंह जी थे। ठाकुर साहब अपनी पूजा की मेज पर दो चित्र तथा एक प्रति रामचरित मानस रखते थे। एक चित्र अपने गुरु स्वामी सीताराम आश्रम जी महाराज का तथा दूसरा चित्र अपने दादा गुरु दिगम्बरी सन्त स्वामी भास्करानन्द जी महाराज का, रामचरित मानस की प्रति उन्हें अपने गुरु से प्राप्त हुई थी, वहीं प्रति पूजा की मेज पर रहती थी। वे नित्य उसका पारायण करते थे तभी शयन करते थे।

ठाकुर साहब की प्रारम्भिक शिक्षा बनारस के जय नारायण इण्टर काॅलेज में हुई थी। परन्तु उनका मन पढ़ाई में लगता नहीं था। बनारस में उन के परिवारीजनों की ‘‘शीला रंग कम्पनी’’ थी उसी में ठाकुर साहब काम कर ने लगे, बनारस के जिस मोहल्ले में कम्पनी थी उसके पास एक अहाते में संघ शाखा लगती थी। ठाकुर साहब शाखा जाने लगे। सम्भवतः यह काल 1933 से 1935 के बीच का है। स्व0 भाऊराव देवरस से बनारस में ही परिचय हुआ, मित्रता बढ़ने लगी। ठाकुर साहब और भाऊराव बनारस में एक ही साईकिल पर घूमते थे। संघ के कार्य में अधिक समय लगने लगा तो रंग फैक्टरी के प्रमुखों से कहा कि अब मैं कार्य छोड़ना चाहता हूँ क्योंकि मेरा अधिकतम समय संघ के काम में लगता है और फैक्टरी में नहीं आ पाता हूँ। फैक्टरी प्रमुखों ने उत्तर दिया कि आप संघ का काम करिये, फैक्टरी में आपका नाम चलता रहेगा, हम आपको धन देते रहेंगे, अनेक वर्षों तक ऐसा ही चला।

1948 के संघ पर लगे प्रतिबंध के समय ठाकुर साहब को गंगा में स्नान करके वापस आते समय काशी में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वे श्री भाऊराव देवरस, अशोक सिंहल, दत्तराज कालिया आदि के साथ काशी जेल में बंद रहे। 
1955-56 में वे बनारस में नगर कार्यवाह थे। कालान्तर में संघ के प्रचारक हो गये। 1964 में वे बनारस में विभाग प्रचारक का दायित्व संभालते थे। ठाकुर साहब संघ के कार्य में इतने तत्लीन हो गये कि अपने एक मात्र पुत्र नरेन्द्र के विवाह में भी समय पर नहीं पहुँचे। उनके बड़े भाई डाॅ0 बब्बन सिंह एवं उनके एक घनिष्ट सहयोगी सोमनाथ सिंह ने ही नरेन्द्र के विवाह की सब जिम्मेदारी निर्वाह की। घर से बारात जब जाने को तैयार थी तब ठाकुर साहब घर पहुँचे और बोले ‘‘ऐ सोमनाथ तुम्हारे लड़के के ब्याह की तैयारी पूरी हो गई।’’ सोमनाथ सिंह ने उत्तर दिया ‘‘हाँ ठाकुर साहब बारात चलने के लिए तैयार है।’’ वे परिवार के प्रति ऐसे निर्मोही हो चुके थे। ठाकुर साहब अच्छी, बड़ी जमीन वाले किसान थे, परन्तु जीवन में कभी खेती की ओर ध्यान नहीं दिया, किसी से चर्चा नहीं की, वे पूर्ण विरक्त हो चुके थे।

बनारस में ठाकुर गुरुजन सिंह जी का सम्बन्ध क्रान्तिकारी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल से आया। सान्याल जी के बीमारी के समय ठाकुर साहब ने उनकी सेवा की, सान्याल जी के पुत्र ठाकुर साहब की वृद्धावस्था के समय अपने पास से उन्हें कुछ धन भेजा करते थे। स्वयं ठाकुर साहब के शब्दों में- जब सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस से निष्कासित कर दिये गये तब वे बनारस आये थे। बनारस का कोई भी व्यक्ति उन्हें अपने घर ठहराने के लिए तैयार नहीं था। तब ठाकुर साहब ने उनको बनारस में ठहराने की जिम्मेदारी स्वयं स्वीकार कर ली और रामकृष्ण मिशन में व्यवस्था भी कर दी। तभी बनारस से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र ‘‘आज’’ के सम्पादक शिव प्रसाद गुप्ता जी को ये जानकारी मिली। तो उन्होंने ठाकुर साहब से कहाँ कि मैं सुभाष चन्द्र बोस को अपने घर में ठहराऊँगा। चाहें कांग्रेस के लोग मुझे कांग्रेस से निकाल दें। गुप्ता जी उस समय कांग्रेस को धन की व्यवस्था करते थे।

ठाकुर साहब कई संगठनों में रहकर देश की सेवा करते रहे। सन् 1971 से 1978 तक किसानों का संगठन कार्य किया। ‘भारतीय किसान संघ’ के विधिवत गठन से पूर्व ही वे किसानों के बीच काम करने लगे थे। आपातकाल में वे साधु वेश में भूमिगत रहकर काम करते रहे। वर्ष 1979 से विश्व हिन्दू परिषद का दायित्व सम्भाला, जनवरी, 1979 में प्रयागराज में संगम तट पर सम्पन्न हुये द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन की तैयारियों के वे स्तम्भ थे। विश्व हिन्दू परिषद में उनका केन्द्र प्रयागराज हो गया। प्रयागराज के कीटगंज मोहल्ले में विश्व हिन्दू परिषद के पास कार्यालय के रूप में भार्गव जी का एक पुराना भवन था। ठाकुर साहब यहीं रहते थे, वे कीटगंज कार्यालय से नित्य संगम स्नान को जाया करते थे। ठाकुर साहब बड़े गोभक्त थे। पिछले 20 वर्षों से निरन्तर गोशाला चला रहे थे।ठाकुर साहब किसी को अपने पैर नहीं छूने देते थे।

ठाकुर साहब के पास जो भी व्यक्ति आता था (दिन हो या अर्धरात्रि) ठाकुर साहब उसे अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाते थे तभी उसे सोने देते थे। बीमारों की सेवा वे स्वयं सारी-सारी रात जगकर करते थे। अशोक जी के गुरुदेव की सेवा बड़ी तन्मयता से उनकी आयु पर्यन्त की। अनेकों विद्यार्थियों को उन्होंने योग्य शिक्षा की प्रेरणा दी, पढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ निर्माण की। परन्तु जिसकी सेवा की कभी उससे कोई कामना नहीं की। उन्हें आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, जड़ी-बूटियों के रोग निवारक गुणों की जानकरी बहुत थी। ठाकुर साहब सदैव मोटी खादी का तीन चैथाई बाहों का कुर्ता तथा ऊँची बंधी मोटी खादी की धोती पहनते थे। शर्दियों में भी अधिक कपड़े नहीं पहनते थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परमपूजनीय श्री गुरु जी के पास एक कमण्डल रहता था। एक बार उसकी मरम्मत कराने की आवश्यकता थी। बनारस आने पर श्री गुरु जी ने ठाकुर गुरुजन सिंह जी से पूछा ‘‘ठाकुर ये क्या है’’ ? ठाकुर साहब ने उत्तर दिया कि ‘‘है तो यह लौकी की तूम्बड़ी परन्तु महत्व इसका है कि यह किसके हाथ में हैं’’ तब श्री गुरु जी बोले ‘‘अच्छा तो तुम इस कमण्डल की मरम्मत करा दो।’’ श्री गुरु जी ने उनका परिचय कराते समय यह कहा था कि यह ‘‘महात्मा है, महात्मा’’। ठाकुर साहब के जन्म के समय उनका नाम दुर्जन सिंह रखा गया था। श्री गुरु जी ने ही उनका नाम गुरुजन सिंह रखा था। बनारस में गुदौलियाँ चैराहे पर घाटाटे राम मंदिर में संघ कार्यालय प्रारम्भिक दिनों से है। ठाकुर साहब यहीं रहा करते थे। कार्यालय के सामने एक मुसलमान बैठा रहता था। ठाकुर साहब उसको भोजन दिया करते थे।

जब परमपूजनीय श्री गुरु जी बनारस आये तो कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने शिकायत के लहजे में यह बात श्री गुरु जी को बता दी। श्री गुरु जी ने पूछा ‘‘कहों ठाकुर क्या बात है’’ ? ठाकुर साहब ने उत्तर दिया ‘‘गरीब है, अशक्त है, चल-फिर नहीं सकता,’’ श्री गुरु जी बोले ‘‘ठीक है ! ठीक है !’’ वर्ष 2000 के आस-पास ठाकुर साहब को फेफड़े की बीमारी ने घेर लिया। माननीय अशोक जी उन्हें इलाहाबाद के कीटगंज कार्यालय से अपने पैत्रिक भवन ‘‘महावीर भवन’’ में रहने के लिए ले आये। नैनी निवासी बजरंगदल के युवा कार्यकर्ता मिथिलेश पाण्डेय 1990 से कीटगंज कार्यालय पर आते थे। युवक मिथिलेश का लगाव ठाकुर साहब से बढ़ता गया। मिथिलेश ठाकुर साहब का पूरा ध्यान रखने लगा। इलाहाबाद मेडिकल काॅलेज के प्राचार्य प्रोफेसर डाॅ0 एस0के0 जैन को ठाकुर साहब की चिकित्सा के लिए मिथिलेश अशोक जी के पास ले आया। अशोक जी बोले! डाॅ0 साहब ये हमारे संरक्षक हैं, सन्त हैं, हमारे कार्यकर्ता हैं, इन्हें आप स्वस्थ कर दीजिए। डाॅ0 जैन ठाकुर साहब को अपने हास्पिटल ले गये, 6 महीने रखा, ठाकुर साहब स्वस्थ हो गये और वापस महावीर भवन में ही रहने लगे। डाॅ0 जैन नित्य स्वयं अथवा अपने व्यक्ति को भेजकर ठाकुर साहब की चिन्ता करने लगे। डाॅ0 जैन ने ठाकुर साहब की देखभाल अपने पिता समान की। ठाकुर साहब दिनभर कापी पर राम, राम शब्द लिखते रहते थे। विगत् ढाई वर्षों से उनके पुत्र नरेन्द्र ठाकुर साहब की सेवा में रहते थे। अन्तिम दिनों वे अपने पुत्र नरेन्द्र से मानस सुनने लगे। वे पूर्ण भक्त थे, अनासक्त थे।

ठाकुर साहब ने शायद ही कभी किसी को अपना जन्मदिन बताया हो, शायद उन्हें याद भी नहीं था। 10 अक्टूबर, 2013 को सायं काल के समय इलाहाबाद में ही अनायास पूछने पर उनके पुत्र नरेन्द्र ने कहा कि गाँव के कागजों से मैं पिता जी की जन्मतिथि खोजकर लाया हूँ, 20 नवम्बर 1918 (मार्गशीषर्कृष्ण त्रयोदशी, मृगशिरा नक्षत्र) है। सब चैंक गये। आपस में विचार-विमर्श हुआ कि आगामी 20 नवम्बर, 2013 को ठाकुर साहब की आयु 95 वर्ष पूर्ण हो जायेगी। ठाकुर साहब ने कभी किसी को अपना जन्मदिन नहीं बताया, न ही मनाया, अतः इस बार हम महामृत्युंजय मंत्र जप तथा कुछ होम, नगर और आस-पास के उनके परिचय के व्यक्तियों/कार्यकर्ताओं को बुलाकर सहभोज करेंगे। 20 नवम्बर, 2013 को यह किया गया। 28 नवम्बर को रात्रि 9 बजे के लगभग उन्हाेंने नित्य के समान भोजन किया। रात्रि में उनका रक्तचाप नापने के लिए डाॅ0 एस .के. जैन के चिकित्सालय का व्यक्ति अमित सदैव के समान उनके पास आया। ठाकुर साहब के मुँह से लाॅर गिर रही थी। उसे कपड़े से साफ किया, उन्हें आवाज दी, जब कोई उत्तर नहीं मिला तो हिलाया और अनुभव हुआ कि ठाकुर साहब नहीं रहे। रात्रि के लगभग 9.20 बजे समय था। ठाकुर साहब ने जीवन भर जिनकी उपासना की उसी में वे विलीन हो गये।


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