क्षमामूर्ति संत एकनाथ जी महाराज



भारत की संत परम्परा में एकनाथ जी महाराज का अपना विशेष स्थान है। भक्त श्रेष्ठ भानुप्रताप के पुत्र चक्रपाणि और चक्रपाणि के पुत्र सूर्यनारायण के घर लगभग 1590 संवत् में एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम एकनाथ रखा गया। इनकी माता का नाम रूक्मणि था। बालक के जन्म के समय मूल नक्षत्र था जिसके प्रभाव से बालकपन में ही इनके माता पिता का देहांत हो गया। जब बालक एकनाथ अनाथ हो गया, तब इनका लालन-पालन इनके पितामह ने किया। 12 वर्ष की आयु में बालक एकनाथ के जीवन में घटना घटित होती है जब वे एक शिवालय में कीर्तन कर रहे थे तो रात्रि के अन्तिम पहर में आकाशवाणी होती है, ‘‘जाओ! देवगढ़ में जनार्दन पंत के दर्शन करो।’’ आकाशवाणी को सुनकर एकनाथ जी देवगढ़ की ओर चल पड़े और वहाँ उन्हें संवत् 1602 में जनार्दन पंत के दर्शन हुए। गुरुदेव श्री जनार्दन पंत ने एकनाथ जी को आश्रम की भोजन व्यवस्था का कार्य सौंप दिया। एक दिन एक पाई का हिसाब न मिलने के कारण वे पूरी रात हिसाब मिलाने में लगे रहे और जैसे ही उन्हें अपनी भूल ज्ञात हुई, वे अत्यधिक प्रसन्न होकर गुरुजी के पास आये। गुरुजी बोले, पुत्र! जब तुम एक पाई की भूल ज्ञात होने पर इतने प्रसन्न हो, तो जीवन की भूल जान लेने पर कितने प्रसन्न होगे? कहा जाता है कि गुरुदेव जनार्दन पंत साक्षात् भगवान् दत्तात्रेय थे।
 

एकनाथ जी के जीवन में बहुत से चमत्कार देखने एवम् सुनने को मिलते हैं। कहा जाता है कि कृष्णा एवम् गोदावरी नदियाँ भी मनस्वी रूप धारण कर आपकी कथा सुनने को आती थीं। एकनाथ जी महाराज दृढ़ विश्वास के साथ कथा का वर्णन करते थे। आपके जीवन की एक घटना इस प्रकार है- एक बार वे रामकथा कह रहे थे- प्रसंग था अशोक वाटिका में सीताजी एवम् हनुमान का संभाषण। इसमें एकनाथ जी महाराज बोले कि अशोक वाटिका में सफेद रंग के पुष्प थे, इस पर श्री हनुमान जी ने प्रकट हो कर कहा कि वाटिका के पुष्प लाल रंग के थे। इस पर एकनाथ जी ने कहा, नहीं! पुष्प सफेद रंग के थे। श्री हनुमान जी ने कहा कि आप माँ जानकी जी से पूछ लीजिए। श्री जानकी जी ने कहा कि वत्स हनुमान ठीक कह रहे हैं, वाटिका के पुष्प लाल रंग के ही थे। पुनः एकनाथ जी ने अपने पक्ष पर जोर देकर कहा कि अशोक वाटिका में पुष्प सफेद रंग के ही थे, लाल रंग के नहीं। अब ये तीनों वादी भगवान् श्री रामचन्द्र जी के पास आये और भगवान् के सम्मुख अपना पक्ष रखा। तब भगवान् ने विवाद को निपटाते हुए कहा कि अशोक वाटिका के पुष्प सफेद रंग के थे परन्तु हनुमान जी एवम् जानकी जी को क्रोध के कारण सफेद रंग के पुष्प लाल रंग के दिखाई पड़ रहे थे। यह एकनाथ जी महाराज का दृढ़ विश्वास था। इस संदर्भ में गोस्वामी जी कहते हैं-
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।। मानस उत्तर. दो.-10

दूसरी घटना
एक बार एकनाथ जी महाराज अपनी संत मण्डली के साथ गोमुख से गंगा जल लेकर सेतुबंध रामेश्वरम् की ओर जा रहे थे, रामेश्वरम् के निकट समुद्र्र के रेत में एक गधा प्यास से व्याकुल होकर कातर दृष्टि से देख रहा था। एकनाथ जी ने अपनी काँवर में उपस्थित जल पिलाकर संत मण्डली से कहा कि यदि आप अपनी काँवर का जल भी इस गधे को पिला दें तो इसके प्राण बच सकते हैं। इस पर संत मण्डली ने विरोध तो प्रकट किया परन्तु एकनाथ जी महाराज के निवेदन को टाल न सके जैसे ही गधे ने गंगाजल ग्रहण किया, साक्षात भगवान् गौरी शंकर प्रकट हो गये।

तीसरी घटना
एक बार एकनाथ जी महाराज ने अपने पितरों को श्राद्ध करने के लिए बहुत स्वादिष्ट भोजन बनवाया तथा श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया। ब्राह्मणों के आने से पुर्व ही कुछ महर जाति के लोग वहाँ से गुजर रहे थे, भोजन की सुगंध से प्रभावित होकर उन्होने कहा कि अहा! कितने सुन्दर एवम् स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध आ रही है। एकनाथ जी के इतना सुनने पर आपने महर जाति के लोगों को रोक कर भोजन करवाया। इसके पश्चात् ब्राह्मणों ने जब यह सुना तो वे बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने श्राद्ध ग्रहण करने से इन्कार कर दिया तत्पश्चात् घटना कहती है कि पितरों ने साक्षात प्रकट होकर श्राद्ध ग्रहण किया।
 
चौथी घटना
एक बार कुछ चोरों ने चोरी करने के उद्देश्य से एकनाथ जी के घर में प्रवेश किया, घर का सम्पूर्ण सामान इकट्ठा कर, जब वे चलने लगे तो अंधे हो कर सामान से टकराकर गिरने लगे। इसी समय एकनाथ जी महाराज की समाधि टूटी तो इन्होंने चोरों को दृष्टि देकर सामान भी साथ दे दिया।

पाँचवी घटना
एक बार पैथड़ में एक वेश्या रहती थी। वेश्या के विषय में तो सभी लोग जानते ही हैं। एक दिन वेश्या एकनाथ जी महाराज से मिलने गयी और महाराज श्री से निवेदन भी किया कि आप मेरा स्थन भी पवित्र कीजिए। इस पर एकनाथ जी ने कहा, ‘‘अवश्य। एकनाथ जी महाराज ने समाज की संकीर्ण रूढि़ को तोड़कर वेश्या के घर जाकर, उसे परम पवित्र कर दिया। घटना कहती है कि उसी दिन से वेश्या भगवद्भजन करने लग गयी।

छटी घटना
एक दिन अत्यधिक वर्षा हो रही थी। अर्द्धरात्रि के समय चार ब्राह्मण एकनाथ जी महाराज के घर पहुँचे। कई दिनों से लगातार वर्षा के कारण घर पर सूखे ईंधन का अभाव था। एकनाथ जी को ब्राह्मणों की सेवा के लिए सूखे ईंधन की आवश्यकता थी, तो इन्होंने अपने पलंग को तोड़कर सूखे ईंधन की व्यवस्था करके, ब्राह्मणों की यथा योग्य सेवा की।

सातवीं घटना
एकनाथ जी महाराज का गोदावरी स्नान करने का नित्य का नियम था। एक दिन प्रातः जब महाराज जी गोदावरी स्नान करके लौट रहे थे, तब सराय के पास रहने वाले एक मुसलमान युवक ने उनके ऊपर कुल्ला कर दिया। महाराज श्री पुनः गोदावरी स्नान के लिए चल पड़े, लौटने पर मुसलमान युवक ने पुनः अपनी करतूत दोहरा दी। यह क्रम 108 वार तक चला। 108 वीं बार युवक का हृदय द्रवीभूत हो गया। उसने एकनाथ जी महाराज के चरण पकड़कर क्षमा याचना की। इस पर महाराज जी ने कहा, ‘‘बेटा! तू धन्य है, तेरी कृपा से आज एकादशी के दिन मेरा 108 बार गोदावरी स्नान हो गया। इसी परिपे्रक्ष्य में संत कवि कहते हैं-
जो सहि दुख परछिद्र दुुरावा। बंदनीय जेंहि जग जस पावा।।
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।। मानस बाल. दो. 01-06,07

आठवीं घटना
एक बार कुछ असामाजिक तत्वों ने मिलकर प्रस्ताव बनाया कि एकनाथ जी महाराज को क्रोधित किया जाय। उनमें से एक युवक ने अपने सभी साथियों के समक्ष संकल्प किया कि वह एकनाथ जी को क्रोधित कर सकता है। युवक ने योजनानुसार कार्य करना शुरू किया। वह जूते पहन कर एकनाथ जी महाराज की रसोई में घूमने लगा और घर को दूषित करने का प्रयोजन करने लगा। एकनाथ जी महाराज की धर्मपत्नी घर को बुहार रहीं थीं, तो वह उछलकर उनकी पीठ पर बैठ गया। एकनाथ जी ने उसे ऐसा करते देखकर अपनी पत्नी से कहा, ‘‘बच्चा आपकी पीठ पर बैठा है, उसे चोट नहीं लगनी चाहिए।’’ तब उनकी पत्नी ने कहा, ‘‘यह तो मेरे बच्चे जैसा है। मैं इसे अपने बच्चे की तरह रखूँगी तथा दुलार करूँगीं।’’ इतना सुनते ही युवक की सम्पूर्ण शरारत सिर के बल दौड़ गयी। उसने दोनों से क्षमा माँगी।


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