ताजमहल नही तेजोमहालय: शिव मंदिर होने का मिला साक्ष्य



ताजमहल या तेजोमहालय इसकी गुत्थी सुलझने में तो न जाने कितना वक्त लगे। हां, इतिहास कुछ तथ्यों की धुंधली ही सही पर तस्वीर पेश कर रहा है। वर्ष 1888 में मिले एक शिलालेख में ताज को राजा परमार्दिदेव का शिव मंदिर बताया गया है।
ताजमहल नही तेजोमहालय: शिव मंदिर होने का मिला साक्ष्य

इतिहास की बेशकीमती जानकारी देने वाला शिलालेख बटेश्वर में कराए गए उत्खनन में मिला था। दुनिया के सातवें अजूबे ताजमहल को लेकर सिविल अदालत में लखनऊ के हरीशंकर जैन और अन्य द्वारा अग्रेश्वर नाथ महादेव का मंदिर बताते हुए वाद दायर किया गया। इसमें तर्क दिया गया कि मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा परमार्दिदेव द्वारा कराया गया। जागरण की छानबीन में सामने आया है कि बटेश्वर में हुए उत्खनन में मिले राजा परमार्दिदेव से जुड़ा एक शिलालेख भी यही कहता है। यह शिलालेख बटेश्वर में एक टीले पर वर्ष 1888 में कराए गए उत्खनन में मिला था।

ताजमहल नही तेजोमहालय: शिव मंदिर होने का मिला साक्ष्य

यह राजा परमार्दिदेव के शासन विक्रमी संवत् 1252 (1195 ईस्वी) से जुड़ा है। शिलालेख पर दो फुट चौड़ाई और करीब एक फुट आठ इंच ऊंचाई में नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में 24 श्लोक उत्कीर्ण हैं। इनमें राजा परमार्दिदेव के मंत्री सलक्षणा द्वारा दो भव्य मंदिर बनवाने का उल्लेख है, जिनमें एक वैष्णव और दूसरा शैव मंदिर था। इनमें से शैव मंदिर के निर्माण का काम सलक्षणा के पुत्र पुरुषोत्तमा द्वारा पूर्ण कराया गया था। शिलालेख में यह स्पष्ट नहीं होता कि परमार्दिदेव ने मंदिरों का निर्माण कहां कराया? मगर यह स्पष्ट है कि विष्णु भगवान का एक मंदिर बनवाया और उसमें प्रतिमा स्थापित की, जिसकी ऊंचाई आकाश को चूमती थी। वहीं भगवान शिव का चंद्रमा की तरह चमकने वाला बर्फ की तरह चमकने वाला मंदिर बनवाया, जिससे कि आराध्य देव अपने निवास स्थान कैलास पर जाने के बारे में न सोचें। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की एपिग्राफिका इंडिका वोल्यूम-फस्र्ट और कार्पस इंस्क्रिप्शंस इंडीकेरम वोल्यूम सात-भाग 3 में शिलालेख के उत्खनन और उस पर उत्कीर्ण लेख के साथ उसका अनुवाद भी दिया गया है। उत्खनन में मिला शिलालेख इस समय लखनऊ के संग्रहालय में रखा हुआ है। ताज भी चंद्रमा के समान ही चमकता है, इसी के चलते सिविल अदालत में दायर वाद में उसे राजा परमार्दिदेव द्वारा बनवाया गया शिव मंदिर बताया गया है। इस मामले में छह मई को गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और एएसआइ को जवाब दाखिल करना है। 13 मई को वाद बिंदु तय किए जाएंगे।
ताजमहल नही तेजोमहालय: शिव मंदिर होने का मिला साक्ष्य

कौन थे राजा परमार्दिदेव- राजा परमार्दिदेव कालिंजर व महोबा के शासक थे। 1165 ईस्वी में सिंहासन पर बैठे। उन्हें चंदेल वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक माना जाता है। चंदेलों का साम्राज्य यमुना-नर्मदा नदी के बीच फैला था, जिसमें वर्तमान बुंदेलखंड और दक्षिणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा हिस्सा आता था। परमार्दिदेव के सेनापति आल्हा और ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान से टक्कर ली। वह कन्नौज के राजा जयचंद्र के मित्र थे, इसलिए अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान उनके प्रतिद्वंद्वी थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1202 ईस्वी में कालिंजर पर आक्रमण किया। कुछ दिन तक लडऩे के बाद परमार्दिदेव ने हार मान ली। जिसके कुछ दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। (दैनिक जागरण की रपट)

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प्रेरणा स्त्रोत छत्रपति शिवाजी



दृणनिश्चयी, महान देशभक्त, धर्मात्मा, राष्ट्र निर्माता तथा कुशल प्रशासक शिवाजी का व्यक्तित्व बहुमुखी था। माँ जीजाबाई के प्रति उनकी श्रद्धा ओर आज्ञाकारिता उन्हे एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है। शिवाजी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था। साहस, शौर्य तथा तीव्र बुद्धी के धनि शिवाजी का जन्म 19 फरवरी, 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। शिवाजी की जन्मतीथि के विषय में सभी विद्वान एक मत नही हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार 20 अप्रैल 1627 है।
 छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश
शिवाजी की शिक्षा-दिक्षा माता जीजाबाई के संरक्षण में हुई थी। माता जीजाबाई धार्मिक प्रवृत्ती की महिला थीं, उनकी इस प्रवृत्ति का गहरा प्रभाव शिवाजी पर भी था। शिवाजी की प्रतिभा को निखारने में दादाजी कोंणदेव का भी विषेश योगदान था। उन्होने शिवाजी को सैनिक एवं प्रशासकीय दोनो प्रकार की शिक्षा दी थी। शिवाजी में उच्चकोटी की हिन्दुत्व की भावना उत्पन्न करने का श्रेय माता जीजाबाई को एवं दादा कोंणदेव को जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल पूना में हुआ था। में हुआ था ।
हिंदु साम्राज्य संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज

शिवाजी की बुद्धी बङी ही व्यवहारिक थी, वे तात्कालिक सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों के प्रति बहुत सजग थे। हिन्दु धर्म, गौ एवं ब्राह्मणों की रक्षा करना उनका उद्देश्य था। शिवाजी हिन्दु धर्म के रक्षक के रूप में मैदान में उतरे और मुग़ल शाशकों के विरुद्ध उन्होने युद्ध की घोषणां कर दी। वे मुग़ल शासकों के अत्याचारों से भली-भाँति परचित थे इसलिए उनके अधीन नही रहना चाहते थे। उन्होने मावल प्रदेश के युवकों में देशप्रेम की भावना का संचार कर कुशल तथा वीर सैनिकों का एक दल बनाया। शिवाजी अपने वीर तथा देशभक्त सैनिकों के सहयोग से जावली, रोहिङा, जुन्नार, कोंकण, कल्याणीं आदि उनेक प्रदेशों पर अधिकार स्थापित करने में कामयाब रहे। प्रतापगढ तथा रायगढ दुर्ग जीतने के बाद उन्होने रायगढ को मराठा राज्य की राजधानी बनाया था।

शिवाजी पर महाराष्ट्र के लोकप्रिय संत रामदास एवं तुकाराम का भी प्रभाव था। संत रामदास शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु थे, उन्होने ही शिवाजी को देश-प्रेम और देशोध्दार के लिये प्रेरित किया था।

शिवाजी की बढती शक्ती बीजापुर के लिये चिन्ता का विषय थी। आदिलशाह की विधवा बेगम ने अफजल खाँ को शिवाजी के विरुद्ध युद्ध के लिये भेजा था। कुछ परिस्थिती वश दोनो खुल्लम- खुल्ला युद्ध नही कर सकते थे। अतः दोनो पक्षों ने समझौता करना उचित समझा। 10 नवम्बर 1659 को भेंट का दिन तय हुआ। शिवाजी जैसे ही अफजल खाँ के गले मिले, अफजल खाँ ने शिवाजी पर वार कर दिया। शिवाजी को उसकी मंशा पर पहले से ही शक था, वो पूरी तैयारी से गये थे। शिवाजी ने अपना बगनखा अफजल खाँ के पेट में घुसेङ दिया । अफजल खाँ की मृत्यु के पश्चात बीजापुर पर शिवाजी का अधिकार हो गया। इस विजय के उपलक्ष्य में शिवाजी, प्रतापगढ में एक मंदिर का निर्माण करवाया जिसमें माँ भवानी की प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया गया ।
शिवाजी एक कुशल योद्धा थे। उनकी सैन्य प्रतिभा ने औरंगजेब जैसे शक्तिशाली शासक को भी विचलित कर दिया था। शिवाजी की गोरिल्ला रणनीति( छापामार रणनीति) जग प्रसिद्ध है। अफजल खाँ की हत्या, शाइस्ता खाँ पर सफल हमला और औरंगजेब जैसे चीते की मांद से भाग आना, उनकी इसी प्रतिभा और विलक्षण बुद्धी का परिचायक है। शिवाजी एक सफल कूटनीतिज्ञ थे। इसी विषेशता के बल पर वे अपने शत्रुओं को कभी एक होने नही दिये। औरंगजेब से उनकी मुलाकात आगरा में हुई थी जहाँ उन्हे और उनके पुत्र को गिरफ्तार कर लिया गया था। परन्तु शिवाजी अपनी कुशाग्र बुद्धी के बल पर फलों की टोकरियों में छुपकर भाग निकले थे। मुगल-मराठा सम्बन्धों में यह एक प्रभावशाली घटना थी।
छत्रपति शिवाजी के राष्ट्र का ध्वज केशरिया है। इस रंग से संबन्धित एक किस्सा है। एक बार शिवाजी के गुरू, समर्थ गुरू रामदास भिक्षा माँग रहे थे, तभी शिवाजी ने उन्हे देखा उनको बहुत खराब लगा।

शिवाजी, गुरु के चरणों में बैठ कर आग्रह करने लगे कि आप ये समस्त राज्य ले लिजीये एवं भिक्षा न माँगे। शिवाजी की भक्ती देख समर्थ गुरु रामदास अत्यधिक प्रसन्न हुए और शिवाजी को समझाते हुए बोले कि मैं राष्ट्र के बंधन में नही बंध सकता किन्तु तुम्हारे आग्रह को स्वीकार करता हुँ और तुम्हे ये आदेश देता हुँ कि आज से मेरा ये राज्य तुम कुशलता पूर्वक संचालित करो। ऐसा कहते हुए समर्थ गुरु रामदास अपने दुप्पट्टे का एक टुकङा फाङ कर शिवाजी को दिये तथा बोले कि वस्त्र का ये टुकङा सदैव मेरे प्रतीक के रूप में तुम्हारे साथ तुम्हारे राष्ट्र ध्वज के रूप में रहेगा जो तुम्हे मेरे पास होने का बोध कराता रहेगा।
 छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश
कुशल एवं वीर शासक छत्रपति शिवाजी का अंतिम समय बङे कष्ट एवं मानसिक वेदना में व्यतीत हुआ। घरेलू उलझने एवं समस्यायें उनके दुःख का कारण थीं। बङे पुत्र सम्भाजी के व्यवहार से वे अत्यधिक चिन्तित थे। तेज ज्वर के प्रकोप से 3 अप्रैल 1680 को शिवाजी का स्वर्गवास हो गया।
 छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

शिवाजी केवल मराठा राष्ट्र के निर्माता ही नही थे, अपितु मध्ययुग के सर्वश्रेष्ठ मौलिक प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ती थे। महाराष्ट्र की विभिन्न जातियों के संर्धष को समाप्त कर उनको एक सूत्र में बाँधने का श्रेय शिवाजी को ही है। इतिहास में शिवाजी का नाम, हिन्दु रक्षक के रूप में सदैव सभी के मानस पटल पर विद्यमान रहेगा। भारतीय इतिहासकारों के शब्दों के साथ कलम को विराम देते हैं।


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उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956



लोक सेवकों से कर्तव्यपरायण, ईमानदार, अनुशासित एवं चरित्रवान होना अपेक्षित है। प्रत्येक सरकारी सेवक के आचरण से शासन की छवि प्रतिबिंबित होती है क्योंकि सरकार एवं कर्मचारी के बीच स्वामी और सेवक का सम्बन्ध होता है। स्वामी द्वारा अपने सेवकों से यह अपेक्षा किया जाना स्वाभाविक है कि सेवक अपने कार्य एवं व्यवहार इस प्रकार व्यवहृत करें कि उससे स्वामी की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। सेवकों का कोई भी दुराकरण सरकार की छवि को धूमिल कर सकता है। 

अत: संविधान के अनुच्छेद 309 के अन्तर्गत प्रदत्त अधिकार का प्रयोग करते हुए श्री राज्यपाल अपने सेवकों को जनता के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन करने में आचरण विनियमन करने के लिये आचरण नियमावली का निर्माण करते हैं।

इस लेख के अध्ययन के उपरान्त राज्य कार्मिकों को आचरण नियमावली के महत्वपूर्ण नियमों की जानकारी तथा इस दिशा में उनके कर्तव्यों के संबंध में जानकारी हो सकेगी। वह अपने अधीनस्थ कार्मिकों को इन नियमों के सम्बन्ध में समुचित जानकारी देकर उनका मार्गदर्शन कर सकेंगे।

प्रस्तुत लेख में उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली के नियमों की जानकारी देने का प्रयास किया गया है।

नियम 1 - संक्षिप्त नाम - ये नियम उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली 1956 कहलाएगें।
नियम 2 - परिभाषाएँ - जब तक प्रसंग से कोई अन्य अर्थ अपेक्षित न हो,  इन नियमों में -
  1. सरकार से तात्पर्य उत्तर प्रदेश सरकार से है।
  2. सरकारी सेवक से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, उत्तर प्रदेश राज्य के कार्यों के सम्बद्ध लोक सेवाओं और पदों पर नियुक्त हो।
व्याख्या :-      इस बात को ध्यान में रखना होगा कि ऐसा सरकारी कर्मचारी किसी विशेष समय से किसी कम्पनी, निगम, संगठन, स्थानीय प्राधिकारी, केन्द्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार में प्रति-नियुक्ति पर हो अथवा उसकी सेवा कुछ समय के लिये उस राज्य को अर्पित कर दी गयी हो, उस अवस्था में भी वह उत्तर प्रदेश के सरकारी कर्मचारी की परिभाषा के अन्तर्गत ही आयेगा।
  1. परिवार के सदस्य के अंतर्गत सरकारी सेवक की पत्नी, उसका लड़का, सौतेला लड़का, अविवाहित लड़की या अविवाहित सौतेली लड़की चाहे वह उसके साथ निवास करती हो या नहीं, और महिला सेवक के संबंध में उसके साथ रहने वाला उस पर आश्रित उसका पति।
व्याख्या :-    उपरोक्त में से वही परिवार के सदस्य होंगे जो सरकारी कर्मचारी पर आश्रित हों। यह उल्लेखनीय है कि परिवार का सदस्य होने के लिये आयु महत्वपूर्ण नहीं है। उदाहरण के लिये यदि किसी सरकारी सेवक के पुत्र की आयु 24 वर्ष है तथा वह अभी शिक्षा प्राप्त कर रहा है, वह इसके लिये अपने पिता पर आश्रित है तो वह परिवार का सदस्य है। पर यदि वह कहीं सेवा में है या उसका अपना व्यापार है तथा भरण पोषण के लिये सरकारी सेवक पर आश्रित* नहीं है तो परिवार का सदस्य नहीं माना जायेगा।
*सरकारी सेवक पर आश्रित :-
                ऊपर स्पष्ट किया गया है कि जो भी सदस्य सरकारी सेवक पर आश्रित होगा वही परिवार का सदस्य माना जायेगा। उपरोक्त परिभाषा के सम्बन्ध में यह बताना भी उचित होगा कि ऐसी पत्नी या पति परिवार के सदस्य नहीं माने जायेंगे जो वैध रूप से सरकारी सेवक के परिवार से अलग हो गये हों अथवा ऐसे पुत्र, सौतेले पुत्र,  अविवाहित पुत्री या सौतेली पुत्री भी परिवार के सदस्य नहीं होंगे, जो सरकारी सेवक पर अब किसी भी प्रकार से आश्रित नहीं है या जिनकी अभिरक्षा से विधिक रूप से सरकारी सेवक द्वारा बेदखल कर दिया गया हो।
                इस सन्दर्भ में 'आश्रित' शब्द का अर्थ स्पष्ट करना आवश्यक है। आश्रित का अर्थ किसी ऐसे व्यक्ति से है जो सरकारी सेवक पर भरण पोषण या जीवन यापन के लिये पूर्ण रूप से निर्भर हो। परिवार के सदस्यों के संदर्भ में जिनके आचरण के लिये सरकारी सेवक जिम्मेदार हो, उनका अपने भरण पोषण के लिये सरकारी सेवक पर आश्रित होना आवश्यक है।
नियम 3 में कहा गया है कि
  1. प्रत्येक सरकारी सेवक पूरे समय परम सत्यनिष्ठा तथा कर्तव्य परायणता से कार्य करता रहेगा।
  2. प्रत्येक सरकारी सेवक पूरे समय व्यवहार तथा आचरण विनियमित करने वाले विशिष्ट या अन्तनिर्हित शासकीय आदेशों के अनुसार आचरण करेगा।
                वस्तुत: सरकारी सेवक आचरण नियमावली का नियम-3 सबसे महत्वपूर्ण तथा सारगर्भित है। इस नियम में प्रयुक्त किये गये कुछ बिन्दुओं पर विश्लेषण आवश्यक है।
                पूर्ण सत्यनिष्ठा का अर्थ सच्चाई, ईमानादारी एवं शुद्धता है। यदि किसी सरकारी सेवक से पूर्ण सत्यनिष्ठा बनाये रखने की अपेक्षा की जाय तो यह कहा जायेगा कि वह अपने को उस प्रशासकीय शिष्टता के घेरे में रखे जिसे सभ्य प्रशासन कहा जाता है। घूस लेना या अवैध पारितोषिक की माँग करना, अपनी आय के अनुपात से अधिक की सम्पत्ति क्रय करना या गलत लेखा तैयार करना, दुर्विनियोजन करना, गलत व्यक्ति को प्रोत्साहित करना आदि कुछ ऐसे उदाहरण है, जो सत्यनिष्ठा के विपरीत हैं।
                कर्तव्य परायणता की परिभाषा सेवा के प्रति पूर्ण निष्ठा से सम्बन्धित है। ऐसा सरकारी कार्मिक जो कर्तव्य के प्रति समर्पित नहीं है, दुराचरण का दोषी है। वास्तव में सत्यनिष्ठा व कर्तव्य परायणता एक ही के प्रतिरूप हैं, जिनका एक-दूसरे के बगैर अस्तित्व नहीं है।
विशिष्ट आदेश
                शासन द्वारा समय-समय पर जारी किये गये वैधानिक आदेश हैं। हर सरकारी सेवक चाहे वह अस्थाई हो अथवा स्थाई या अन्य किसी प्रक्रिया द्वारा नियोजित हो, को ऐसे आदेशों का अनुपालन करना आवश्यक है।
अन्तर्निहित शासकीय आदेश
                जारी किये गये आदेशों के अतिरिक्त कुछ अलिखित आचरण संहिता भी है। अलिखित आचरण संहिता के अर्थ सर्वत्र मान्य ऐसे आचरण से है, जिसका पालन सरकारी सेवक के लिये आवश्यक है। उदाहरण के लिये सरकारी सेवक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह शालीनता की मर्यादा में रहे। वह आज्ञाकारी, निष्ठावान, सावधान, ईमानदार, समय का ध्यान रखने वाला, अच्छे व्यवहार करने वाला व अपने कार्य के निष्पादन में दक्ष हो।
              यदि सरकारी सेवक सत्यनिष्ठा व कर्तव्य परायण नहीं है, यदि वह विशिष्ट या ध्वनित आदेशों का अनुपालन नहीं करता है तो उसका कृत्य दुराचरण की श्रेणी में आयेगा। यह भी ध्यान रखे जाने की बात है कि दुराचरण केवल सरकारी कार्य से ही संबंधित नहीं है। निजी जीवन का आचरण भी दुराचरण हो सकता है। यदि कोई कार्मिक अपने निजी जीवन में कोई ऐसा कृत्य करता है जो सरकारी सेवा के समय नहीं किया गया है तथा वह कृत्य अनैतिक है, तो भी उसका कृत्य दुराचरण की श्रेणी में आयेगा। वस्तुत: राज्य अपने कार्मिकों से आचरण के कतिपय मानक की अपेक्षा न केवल कर्मचारियों के सरकारी कार्यो वरन निजी जीवन में भी कर सकता है।
                वर्ष के अन्त में सरकारी कर्मचारियों की गोपनीय प्रविष्टि के साथ-2 सत्यनिष्ठा पर भी रिपोर्ट दी जाती है, जिसका रूप-पत्र निम्नवत् है :-
                'ईमानदारी के लिये श्री --------------- की ख्याति अच्छी है और मेरी जानकारी में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे श्री -------------- की सत्यनिष्ठा पर संदेह किया जा सके अत: उनकी सत्यनिष्ठा प्रमाणित।'
नियम 3-क कामकाजी महिलाओं के यौन उत्पीड़न का प्रतिषेध -
    (1)    कोई सरकारी सेवक किसी महिला के कार्यस्थल पर उसके यौन उत्पीड़न के किसी कार्य में संलिप्त नहीं होगा।
     (2)    प्रत्येक सरकारी सेवक जो किसी कार्य स्थल का प्रभारी हो, उस कार्यस्थल पर किसी महिला के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिये उपयुक्त कदम उठायेगा।
स्पष्टीकरण- इस नियम के लिये 'यौन उत्पीड़न' में प्रत्यक्षत: या अन्यथा काम वासना प्रेरित कोई ऐसा अशोभनीय व्यवहार सम्मिलित है जो कि-
        (क)    शारीरिक स्पर्श और कामोदीप्त सम्बन्धी चेष्टाएँ,
        (ख)    यौन स्वीकृति की माँग या प्रार्थना,
        (ग)    काम वासना-प्रेरित फब्तियाँ,
        (घ)    किसी कामोत्तेजक कार्य व्यवहार या सामग्री का प्रदर्शन या
        (ङ)    यौन सम्बन्धी कोई अन्य अशोभनीय शारीरिक, मौखिक या सांकेतिक आचरण।
नियम 4-    सभी लोगों के साथ समान व्यवहार
    (क)    प्रत्येक सरकारी सेवक, सभी लोगों के साथ, चाहे वे किसी भी जाति, पंथ या धर्म के क्यों न हों, समान व्यवहार करेगा।
     (ख)    कोई भी सरकारी सेवक किसी भी रूप में अस्पृश्यता का आचरण नहीं करेगा।
नियम 4-क    मादकपान और औषधि का सेवन
                यह नियम सरकारी कर्मचारियों के मादकपान और औषधि के सेवन के संबंध में है। इस नियम के निम्न तथ्य महत्वपूर्ण हैं :-
  1. किसी भी क्षेत्र जहाँ वह उस समय विद्यमान हो मादकपान  अथवा औषधि सम्बन्धी जारी किसी भी आदेश का दृढ़ता से पालन करेगा।
  2. अपने कर्तव्य पालन के दौरान किसी मादक पान या औषधि से प्रभावित नहीं होगा और इस बात का ध्यान रखेगा कि वह किसी भी समय अपने कर्तव्य पालन में ऐसे पेय अथवा भेषज से प्रभावित नहीं होता है।
  3. सार्वजनिक स्थानों में किसी मादक पान अथवा औषधि के सेवन से अपने को विरत रखेगा।
  4. मादक पान करके किसी सार्वजनिक स्थान पर उपस्थित नहीं होगा।
  5. किसी भी मादकपान या औषधि का प्रयोग अत्यधिक मात्रा में नहीं करेगा।
                कुछ विशेष स्थानों को जैसे तीर्थस्थल अयोध्या आदि को मद्यनिषेध क्षेत्र घोषित किया गया है। वहाँ पर कोई भी व्यक्ति मादकपान नहीं कर सकता है। सरकारी सेवक भी यदि ऐसे स्थानों पर जायें तो उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह इन नियमों का दृढ़ता से पालन करें। इसके अतिरिक्त जैसा कि नियम में कहा गया है कि कोई सरकारी सेवक न तो किसी सार्वजनिक स्थान पर मदिरा पान करेगा, न ही अत्यधिक मात्रा में मादकपान करेगा। कभी-कभी कतिपय सरकारी सेवक इस नियम का अनुपालन करने में लापरवाही बरतते हैं। ऐसे अपवाद स्वरूप उदाहरण है कि सेवक कार्यालयों तक में नशे की हालत में आते हैं, इससे उनके कार्य करने की क्षमता तो घटती ही है, सरकार की छवि भी खराब होती है, साथ ही साथ ऐसे सरकारी सेवक जो मादकपान कर सार्वजनिक स्थानों पर या कार्यालयों में जाते हैं, ऐसी बात कह बैठते हैं, जिसकी उनसे अपेक्षा नहीं की जाती है। यह भी सम्भव है कि वह ऐसे अवसरों पर गोपनीय बात भी सबके सामने कह दें। अत: अन्य नियमों की भाँति इस नियम का अनुपालन सभी कर्मचारियों के लिये आवश्यक है।
नियम 5 -    राजनीति तथा चुनावों में भाग लेना
            इस नियम को दो भागों में बाँटा जा सकता है। नियम का पहला भाग सरकारी कर्मचारियों के लिये लागू है, तथा दूसरा भाग उसके परिवार के सदस्यों के लिये है।
        पहले भाग में कहा गया है कि
(अ)    कोई सरकारी सेवक किसी राजनीतिक दल अथवा किसी ऐसी संस्था जो राजनीति में भाग लेती है का न तो सदस्य होगा और न अन्यथा उससे सम्बन्ध रखेगा।
(ब)    वह किसी ऐसे आन्दोलन में या संस्था में हिस्सा नहीं लेगा, न उसकी सहायता के लिये चन्दा देगा या किसी रीति से उसकी मदद ही करेगा जो प्रत्यक्ष रूप से सरकार के प्रति विद्रोहात्मक कार्यवाहियाँ करने की प्रवृत्ति पैदा करें।
                उपरोक्त का अर्थ है सरकारी सेवक न तो किसी राजनैतिक दल से संबंधित रहेगा और  न ही ऐसी संस्था से, जो स्थापित सरकार के प्रति विद्रोह पैदा करवाने के लिये कार्य में संलग्न हो।
                सरकारी सेवक विधान मण्डल के किसी सदन अथवा स्थानीय निकाय के चुनावों में न तो भाग लेगा और न हस्तक्षेप करेगा और न ही उसके सम्बन्ध में अपने प्रभाव का प्रयोग करेगा।
                परन्तु सरकारी सेवक, जो किसी चुनाव में वोट डालने का अधिकारी है, वोट डालने हेतु अपने अधिकार का प्रयोग अवश्य कर सकेगा लेकिन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह संसूचित नहीं करेगा कि उसने किसे वोट दिया है। इस कार्य के लिये वह अपने शरीर, सम्पत्ति अथवा निवास स्थान पर कोई चुनाव चिन्ह का प्रदर्शन नहीं करेगा चाहे वह विकास कार्यों से संबंधित हो या अन्य किसी प्रकार।
                नियम का द्वितीय भाग सरकारी कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों के सम्बन्ध में भी लागू है। सरकारी सेवक के परिवार के सदस्यों के लिये राजनीति में भाग लेने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
                प्रत्येक सरकारी सेवक का यह कर्तव्य होगा कि वह अपने परिवार के सदस्य को किसी ऐसे आन्दोलन में एवम् कार्य में जो विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति उच्छेदक है अथवा ऐसे कार्य करने की प्रवृत्ति प्रदान करते हैं, में हिस्सा लेना, चन्दा देने या किसी भी अन्य विधि से उसकी मदद करने से रोकने का प्रयास करेगा। यदि सरकारी सेवक ऐसा करने में असफल रहता है तो वह इन समस्त तथ्यों की जानकारी राज्य सरकार को देगा।
नियम 5-क प्रदर्शन एवं हड़ताल
प्रदर्शन
            सरकारी कर्मचारियों के लिये प्रदर्शन में रूकावट नहीं है, लेकिन वह ऐसा प्रदर्शन नहीं करेगा अथवा ऐसे प्रदर्शन में सम्मिलित नहीं होगा, जो भारत राष्ट्र की अखण्डता, प्रभुता एवं सुरक्षा के प्रतिकूल हो, जो भद्रता या नैतिक/मर्यादित आचरण के प्रतिकूल हो, स्थापित विधिक व्यवस्था के प्रतिकूल हो, शिष्टाचार या सदाचार के विरूद्ध हो, मा0 न्यायालयों की अवमानना तथा मानहानि करते हों, अपराध करने के लिये प्रेरित करते हों, विशेषकर विदेशी सरकार से मित्रता से संबंधित रिश्तों पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हो।
हड़ताल
                सरकारी सेवक अपनी सेवा या किसी अन्य सरकारी सेवक की सेवा से संबंधित मामले में न तो हड़ताल करेंगें और न हड़ताल करने के लिये उत्प्रेरित करेंगे।
                शासन द्वारा समय-समय पर इस बात को स्पष्ट किया गया है कि काई भी सरकारी सेवक हड़ताल पर जाते हैं, तो उनके विरूद्ध इस नियम की अवहेलना के लिये कार्यवाही की जाये।
नियम 5-ख    सरकारी कर्मचारियों का संघों का सदस्य बनना
                कोई सरकारी सेवक किसी ऐसे संघ का न तो सदस्य बनेगा और न उसका सदस्य बना रहेगा, जिसके उद्देश्य  अथवा कार्य-कलाप भारत की प्रभुता तथा अखण्डता के हितों या सार्वजनिक सुव्यवस्था अथवा नैतिकता के प्रतिकूल हो।
नियम 6-    समाचार पत्रों अथवा रेडियो से सम्बन्ध
                कोई सरकारी सेवक बिना शासन की पूर्वानुमति के किसी समाचार पत्र अथवा अन्य नियतकालिक प्रकाशन का पूर्णत: अथवा अंशत: स्वामी नहीं बनेगा और न संचालन करेगा और न ही उसके सम्पादन या प्रबंधन में भाग लेगा। इसी प्रकार कोई सरकारी सेवक रेडियो प्रसारण में भाग नहीं लेगा अथवा किसी समाचार पत्र, पत्रिका में लेख नहीं भेजेगा, न ही गुमनाम या अपने नाम से अथवा किसी अन्य व्यक्ति के नाम से। यह नियम केवल उस स्थिति में नहीं लागू होंगे यदि सरकारी सेवक का प्रसारण एवम् लेख का स्वरूप साहित्यिक, कलात्मक अथवा वैज्ञानिक हो। ऐसे मामलों में‍ किसी स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होगी।
                इसी प्रकार प्रेस से वार्ता के संबंध में शासकीय अनुदेश जारी किये गये हैं।
नियम 7-    सरकार की आलोचना
                कोई भी सरकारी सेवक किसी रेडियो प्रसारण में अपने नाम से अथवा गुमनाम अथवा किसी अन्य नाम से किसी लेख अथवा समाचार पत्र में भेजे गये पत्र अथवा किसी सार्वजनिक स्थान में कोई ऐसे तथ्य की बात या मत व्यक्त नहीं करेगा -
    1-    जिससे वरिष्ठ पदाधिकारियों के किसी निर्णय की प्रतिकूल आलोचना होती हो, उत्तर प्रदेश सरकार, केन्द्र सरकार अथवा अन्य राज्य सरकार अथवा किसी स्थानीय प्राधिकारी की किसी नीति या कार्य की प्रतिकूल आलोचना होती हो अथवा
    2-    जिससे उत्तर प्रदेश सरकार अथवा केन्द्र सरकार अथवा किसी राज्य सरकार के तथा विदेशी सरकार के सम्बन्धों में उलझन पैदा हो सकती हो।
नियम 8-    किसी समिति या अन्य प्राधिकारी के समक्ष साक्ष्य
    1-    उप नियम 3 में उपबन्धित स्थिति के अतिरिक्त, कोई सरकारी सेवक, सिवाय उस दशा के जबकि उसने सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर ली हो, किसी व्यक्ति, समिति या प्राधिकारी द्वारा संचालित किसी जाँच के सम्बन्ध में साक्ष्य नही देगा।
    2-    उस दशा में, जबकि उप नियम 1 के अन्तर्गत कोई स्वीकृति प्रदान की गई हो, कोई सरकारी कर्मचारी, इस प्रकार के साक्ष्य देते समय, उत्तर प्रदेश सरकार, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की नीति की आलोचना नहीं करेगा।
    3-    इस नियम में दी हुई कोई बात, निम्नलिखित के सम्बन्ध में लागू न होगी -
        क-    साक्ष्य, जो प्रदेश सरकार, केन्द्रीय सरकार, उत्तर प्रदेश के विधान-मण्डल या संसद द्वारा नियुक्त किसी प्राधिकारी के सामने दी गयी हो, या
        ख-    साक्ष्य, जो किसी न्यायिक जाँच में दी गई हो।
नियम 9-    सूचना का अनधिकृत संचार
                सरकारी सेवकों के पास गोपनीय तथा अनेक महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं। इस नियम के तहत कोई भी सरकारी सेवक प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई सरकारी लेख अथवा सूचना किसी अन्य सरकारी सेवक को अथवा अन्य व्यक्ति को, जिसे ऐसा लेख रखने अथवा सूचना पाने का विधिक अधिकार नहीं है, को न तो देगा और न ही उसके पास जाने देगा। इन नियमों में यह  भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी पत्रावली की टीप का उद्धरण नहीं किया जा सकता है। लेकिन कतिपय मामलों में यह देखा गया है कि पत्रावलियों की टिप्पणियाँ कार्यालयों के बाहर चली जाती है, और कभी-कभी तो ये उद्धरण साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत होते हैं। ऐसे सरकारी सेवक जो इस प्रकार के उद्धरण दे रहे हैं, वे इस नियम के उल्लंघन के दोषी हैं।
                यदि किसी समय यह पाया जाता है कि इस प्रकार की सूचना राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ी है, तो संबंधित सेवक शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923 के अन्तर्गत भी दोषी है।
नियम 10 -    चन्दे
                सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त करके ही सरकारी सेवक चिकित्सीय सहायता, शिक्षा या सार्वजनिक उपयोगिता अथवा धर्मार्थ प्रयोजन के लिये चन्दा या वित्तीय सहायता माँग सकता है।
नियम 11-    भेंट
                कोई सरकारी सेवक बिना शासन की पूर्वानुमति के स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से किसी ऐसे व्यक्ति से, जो उसका निकट संबंधी न हो कोई भेंट अनुग्रह धन या पुरस्कार स्वीकार नहीं करेगा, न ही अपने परिवार के सदस्यों को ऐसी भेंट अनुग्रह धन या भेंट स्वीकार करने की अनुमति देगा।
                विशेष अवसरों, यथा विवाह या किसी रीतिक अवसर पर सरकारी सेवक के मूल वेतन का दशांश या उससे कम मूल्य का एक उपहार स्वीकार कर सकते हैं, या परिवार के सदस्यों को इसे स्वीकार करने की अनुमति दे सकते हैं, यद्यपि इस प्रकार की उपहार-प्रवृत्ति को रोकने का भी हर सम्भव प्रयत्न होना चाहिये।
नियम 11-क    दहेज
                कोई भी सरकारी सेवक न तो दहेज लेगा न उसके देने या लेने के लिये दुष्प्रेरित करेगा और न ही वर-वधू या वर-वधू के माता पिता या उसके संरक्षक से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी दहेज की माँग करेगा।
                यदि कोई सरकारी सेवक अपने सरकारी कृत्यों का निर्वहन करते हुये नियमानुसार निर्धारित शुल्क के अतिरिक्त भेंट या अनुग्रह धन या पारितोषिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लेता है तो वह नियम-11 का ही उल्लंघन नहीं करता वरन् वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा-161 तथा 165 तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के धारा-5 का भी दोषी है। सरकारी सेवक यदि अपने दायित्वों/कर्तव्यों के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार करता है, तथा दायित्व निर्धारण के क्रम में नियत धनराशि से अधिक माँग करता है तो नियम-11 का उल्लंघन होगा। सरकारी कर्मचारियों द्वारा इस नियम का कड़ाई से पालन करने हेतु कार्मिक विभाग द्वारा 11 मार्च 1986 को अनुदेश जारी किये गये हैं।
नियम 12-    समाप्त
नियम 13-    समाप्‍त
नियम 14-    सरकारी सेवक के सम्मान में सार्वजनिक  प्रदर्शन
                सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त करके ही सरकारी सेवक कोई मान-पत्र या विदाई-पत्र स्वीकार करेगा।
नियम 15-    गैरसरकारी व्यापार या नौकरी
                कोई सरकारी सेवक सिवाय उस दशा के जबकि उसने सरकार की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त कर ली हो, प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: किसी व्यापार या कारोबार में नहीं लगेगा और न ही कोई नौकरी करेगा।
                किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि कोई सरकारी सेवक, इस प्रकार की स्वीकृति प्राप्त किये बिना कोई सामाजिक या धर्मार्थ प्रकार का अवैतनिक कार्य या कोई साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक प्रकार का आकस्मिक कार्य कर सकता है लेकिन शर्त यह है कि इस कार्य के द्वारा उसके सरकारी कर्तव्यों में कोई अड़चन नहीं पड़ती है तथा वह ऐसा कार्य हाथ में लेने से एक महीने के भीतर ही, अपने विभागाध्यक्ष को और यदि स्वयं विभागाध्यक्ष हो तो सरकार को सूचना दे दे, किन्तु यदि सरकार उसे इस प्रकार का कोई आदेश दे, तो वह ऐसा कार्य हाथ में नहीं लेगा और यदि उसने हाथ में ले लिया है तो बन्द कर देगा।
                किन्तु अग्रेतर प्रतिबन्ध यह है कि किसी सरकारी सेवक के परिवार के किसी सदस्य द्वारा गैरसरकारी व्यापार या गैरसरकारी नौकरी हाथ में लेने की दशा में ऐसे व्यापार या नौकरी की सूचना सरकारी सेवक द्वारा सरकार को दी जायेगी।
नियम 15-क (उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की आचरण (संशोधन) नियमावली 2002)
                कोई सरकारी सेवक चौदह वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे के किसी परिसंकटमय कार्य में न तो नियोजित करेगा, न लगाएगा या ऐसे बच्चे से बेगार या इसी प्रकार अन्य बलात श्रम नहीं लेगा।
नियम 16- कम्पनियों का निबन्धन, उन्नयन एवं प्रबन्ध
                कोई सरकारी कर्मचारी सिवाय उस दशा के, जब तक उसने सरकार की पूर्व अनुमति न प्राप्त कर ली हो, किसी ऐसे बैंक या अन्य कम्पनी के निबन्धन, परिवर्तन या प्रबन्धन में भाग न लेगा जो इण्डियन  कम्पनी  ऐक्ट 1913 के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन निबद्ध हुआ हो।
नियम 17- बीमा कारोबार
                कोई भी सरकारी सेवक अपनी पत्नी को या अपने किसी अन्य संबंधी को जो या तो उस पर पूर्णत: आश्रित हो या उसके साथ निवास करता हो, उसी जिले में, जिसमें वह तैनात हो, बीमा अभिकर्ता के रूप में कार्य करने की अनुमति नहीं देगा।
नियम 18-    अवयस्कों का संरक्षकत्व
                कोई सरकारी कर्मचारी समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति प्राप्त किये बिना, उस पर आश्रित किसी अवयस्क के अतिरिक्त किसी अवयस्क (Minor) के शरीर या सम्पत्ति के विधिक संरक्षक के रूप में कार्य नहीं करेगा। आश्रित का तात्पर्य पत्नी, बच्चों तथा सौतेले बच्चों और बच्चों के बच्चे, बहने, भाई तथा उनके बच्चों से है जो सरकारी सेवक पर आश्रित हों।
नियम 19-    किसी सम्बन्धी के विषय में कार्यवाही
                सरकारी सेवक के सामने कभी-कभी उनके सम्बन्धियों व रिश्तेदारों के मामले भी आते हैं। उदाहरण के लिए किसी सरकारी सेवक को ही उसका रिश्तेदार अनुदान के लिए आवेदन पत्र देता है या प्रार्थना पत्र पर अन्तिम कार्यवाही सरकारी सेवक को करनी है। ऐसी कार्यवाहियों को दो भागों में बांटा जा सकता है -
  1. ऐसी कार्यवाही जिसमें सरकारी सेवक को अपना प्रस्ताव अथवा मत प्रस्तुत करना है लेकिन अन्तिम निर्णय वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दिया जाना है। ऐसी स्थिति में सरकारी सेवक ऐसे प्रस्ताव अथवा मत की कार्यवाही नियमानुसार करेगा लेकिन यह बात भी स्पष्ट रूप से बता देगा कि उस व्यक्ति विशेष का उससे क्या सम्बन्ध है और उस सम्बन्ध का स्वरूप क्या है।
  2. यदि सरकारी सेवक  ऐसे प्रस्ताव पर अन्तिम निर्णय करने की शक्ति रखता है तो ऐसी स्थिति में अपने सम्बन्धी के प्रस्ताव पर चाहे वह सम्बन्धी दूर का हो अथवा निकट का और उस व्यक्ति विशेष पर अनुकूल प्रभाव पड़ता हो अथवा प्रतिकूल, वह काई निर्णय नहीं लेगा बल्कि उस मामले को अपने वरिष्ठ अधिकारियों को प्रेषित करेगा। प्रस्तुत करने के कारणों, एवं उस व्यक्ति से सम्बन्ध व स्वरूप को स्पष्ट भी किया जाएगा।
                        सरकारी सेवक द्वारा अपने किसी नातेदार के सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही भले ही निष्पक्ष क्यों न हो, आलोचना का विषय अवश्य हो सकती है। यह भी सम्भव हो सकता है कि सरकारी सेवक अपने नातेदारों और रिश्तेदारों के लिये निष्पक्षता दिखने में अधिक तत्परता से काम करें और अपने नातेदारो व रिश्तेदारों के प्रति उतना कुछ करने से भी इन्कार कर दें जितना हक हो। इस प्रकार नातेदार बिना किसी दोष के न्याय से वंचित हो सकते हैं। अत: यह नियम बनाया गया है कि प्रस्ताव भेजते समय सरकारी सेवक इस बात का उल्लेख करें कि यह मामला उनके रिश्तेदार का है और रिश्तेदारों का स्वरूप क्या है। इससे वरिष्ठ अधिकारी वस्तुनिष्ठ तरीके से मामले में अन्तिम निर्णय दे सकते हैं।
नियम 20-    सट्टा लगाना
                कोई सरकारी सेवक, किसी विनिवेश में सट्टा नहीं लगाएगा।
नियम 21-    विनिवेश
                कोई सरकारी सेवक, न तो कोई पूँजी इस प्रकार स्वयं लगायेगा और न ही अपनी पत्नी या अपने परिवार के सदस्य को लगाने देगा, जिससे उसके सरकारी कर्तव्यों के परिपालन में उलझन या प्रभाव पड़ने की संभावना हो। कोई पूँजी या प्रतिभूति उक्त प्रकार की है अथवा नहीं इसका निर्णय सरकार द्वारा किया जायेगा।
नियम 22-    उधार देना अथवा उधार लेना
                कोई सरकारी सेवक, सिवाय उस दशा के जब कि उसने समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर ली हो, किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके पास उसके प्राधिकार की स्थानीय सीमाओं के भीतर, कोई भूमि या बहुमूल्य  सम्पत्ति हो, रूपया उधार नहीं देगा और न किसी व्यक्ति को ब्याज पर रूपया उधार देगा।
                किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि कोई सरकारी कर्मचारी, किसी सरकारी नौकर को, अग्रिम रूप से वेतन दे सकता है, या इस बात के होते हुए भी कि ऐसा व्यक्ति (उसका मित्र या सम्बन्धी) उसके प्राधिकार की स्थानीय सीमाओं के भीतर कोई भूमि रखता है, वह अपने किसी जाति, मित्र य सम्बन्धी को, बिना ब्याज के, एक छोटी रकम वाला ऋण दे सकता है।
2-                कोई सरकारी कर्मचारी, सिवाय किसी बैंक, सहकारी समिति या अच्छी साख वाले फर्म के साथ साधारण व्यापार क्रम के अनुसार न तो किसी व्यक्ति से, अपने स्थानीय प्राधिकार की सीमाओं के भीतर रूपया उधार लेगा, और न अन्यथा, अपने को ऐसी स्थिति में रखेगा, जिससे वह उस व्यक्ति के वित्तीय आभार (Pecuniary obligation) के अन्तर्गत हो जाय, और न वह सिवाय उस दशा के जब कि उसने समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर ली हो, अपने परिवार के किसी सदस्य को, इस प्रकार का व्यवहार करने की अनुमति देगा।
                किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि कोई सरकारी कर्मचारी किसी मित्र या सम्बन्धी से बिना ब्याज वाली एक छोटी रकम का एक नितान्त अस्थायी ऋण स्वीकार कर सकता है या किसी वास्तविक व्यापारी के साथ उधार लेखा चला सकता है।
3-                जब कोई सरकारी कर्मचारी, इस प्रकार के किसी पद पर नियुक्त या स्थानान्तरण पर भेजा जाय, जिसमें उसके द्वारा उप नियम-1 या उप नियम-2 के किसी उपबन्धों का उल्लंघन निहित हो, तो वह तुरन्त ही समुचित प्राधिकारी को उक्त परिस्थितियों की रिपोर्ट भेज देगा, और उसके बाद ऐसे आदेशों के अनुसार कार्य करेगा जिन्हें समुचित प्राधिकारी दे।
4-                ऐसी सरकारी कर्मचारियों की दशा में, जो राजपत्रित अधिकारी हैं, समुचित प्राधिकारी सरकार होगी और दूसरे मामलों में, कार्यालयाध्यक्ष समुचित प्राधिकारी होगा।
नियम 23-    दिवालियापन एवं आदतन ऋणग्रस्तता
                सरकारी कर्मचारी अपने व्यक्तिगत मामलों का ऐसा प्रबन्ध करेगा जिससे वह अभ्यासी ऋणग्रस्तता से या दिवालिया होने से बच सके। ऐसे सरकारी कर्मचारी की, जिसके विरूद्ध उसके दिवालिया होने के सम्बन्ध में कोई विधिक कार्यवाही चल रही हो, चाहिए कि वह तुरन्त ही उस कार्यालय या विभागाध्यक्ष को, जिसमें वह नौकरी कर रहा हो, समस्त तथ्यों से अवगत करा दे।
नियम 24-    चल, अचल एवं बहुमूल्य सम्पत्ति
                यह नियम सम्पत्ति अर्जित करने तथा उसके विक्रय के सम्बन्ध में है। प्रत्येक सरकारी सेवक के सेवा काल में ऐसे अवसर आयेंयगे जब उनको सम्पत्ति अर्जित करने की अथवा सम्पत्ति बेचने की आवश्यता होगी। सम्पत्ति को दो भागों में बाँटा जा सकता है -
    (1)    चल सम्पत्ति- जिसमें साइकिल, टेलीफोन, रेडियो आदि आते हैं।
    (2)    अचल सम्पत्ति- जिसमें जमीन, मकान, बागान, भवन आदि आते हैं।
चल सम्पत्ति
                कोई सरकारी सेवक अपने एक माह के मूल वेतन से अधिक मूल्य की कोई चल सम्पत्ति क्रय अथवा विक्रय करता है अथवा अन्य प्रकार से व्यवहार करता है तो ऐसे व्यवहार की रिपोर्ट क्रय विक्रय अथवा व्यवहार के पश्चात समुचित प्राधिकारी को करेगा किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि कोई सरकारी सेवक, किसी ख्याति प्राप्त व्यापारी या अच्छी साख के अभिकर्ता के अतिरिक्त यदि अन्य व्यापारी के साथ ऐसा क्रय/विक्रय करता है तो इसके लिए समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी। उदाहरण के लिए यदि कोई सरकारी सेवक जिसका मूल वेतन रू0 10,000/- है किसी ऐसी दुकान से जो नियमानुसार टी0वी0 बिक्री का कार्य करती है, से टी0वी0 क्रय करता है जिसकी कीमत रू0 8,000/- है तो वह क्रय करने के पश्चात इसकी सूचना समुचित प्राधिकारी को देगा।
                किन्तु यदि सरकारी सेवक इस प्रकार का व्यवहार किसी ऐसी व्यक्ति से करता है जो ख्याति प्राप्त व्यापारी अथवा अच्छी साख के अभिकर्ता के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति है तो ऐसी दशा में यह व्यवहार समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति से ही किया जा सकता है। उदाहरण के लिये यदि कोई सेवक जिसका मूल वेतन 10,000/- है किसी व्यक्ति से कोई टी0वी0 क्रय करता है, जिसकी कीमत रू0 8000 है तो वह ऐसा क्रय समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बाद ही करेगा।
अचल सम्पत्ति
                सरकारी सेवक सिवाय उस दशा के जबकि समुचित प्राधिकारी को इसकी पूर्व जानकारी हो अपने नाम से अथवा अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम से न तो कोई अचल सम्पत्ति क्रय कर सकता है और न ही विक्रय कर सकता है न पट्टा करा सकता है न रेहन रख सकता है, न भेंट कर सकता है अन्यथा किसी प्रकार से हस्तान्तरित नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई सरकारी सेवक लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद आदि संस्थाओं में मकान बनाने के लिए प्लाट अथवा भूमि या बना बनाया भवन क्रय करना चाहे तो वह ऐसा कार्य समुचित प्राधिकारी की पूर्व जानकारी के पश्चात ही कर सकेगा। यदि सरकारी सेवक उपरोक्त क्रय विक्रय आदि किसी अन्य व्यक्ति संस्था अथवा ख्याति प्राप्त व्यापारी से भिन्न व्यक्ति से करता हो तो समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी। उदाहरण के लिए यदि लखनऊ में चिनहट के पास किसी गाँव में कोई सरकारी सेवक गाँव के किसी काश्तकार से मकान बनाने के लिए भूमि क्रय करना चाहे तो चूंकि गाँव का काश्तकार ख्याति प्राप्त व्यापारी नहीं है, अत: समुचित प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति आवश्यक होगी।
                अचल सम्पत्ति के संदर्भ में समुचित प्राधिकारी राज्य सेवा के किसी सरकारी सेवक के प्रसंग में शासन होगा जबकि अन्य सरकारी कर्मचारियों के प्रसंग में  विभागाध्यक्ष होंगे।
                जब भी कोई सरकारी सेवक प्रथम बार सेवा में नियुक्त होता है तो उन्हें नियुक्त अधिकारी को सामान्य तरीके से ऐसी सभी चल-अचल सम्पत्ति की घोषणा करनी होगी जिसका वह स्वामी है, अथवा जिसे उसने स्वयं अर्जित किया हो, या दान के रूप में प्राप्त किया हो, या जो उसके पास पट्टे या रेहन के रूप में रखी गयी हो। इसी प्रकार वह ऐसी पूँजी व हिस्सों की भी स्वयं घोषणा करेगा जो उसकी पत्नी अथवा उसके साथ रहने वाले किसी भी प्रकार से, आश्रित परिवार के सदस्य द्वारा रखी गयी हो अथवा अर्जित की गयी हो। तत्पश्चात वह यह सूचना प्रत्येक पाँच वर्षों की अवधि बीतने पर भी देगा। इन घोषणाओं में सम्पत्ति, हिस्सों और अन्य लगी हुई पूंजियों के ब्यौरे भी दिये जाने चाहिए।
                समुचित प्राधिकारी सामान्य अथवा विशेष आज्ञा द्वारा किसी भी समय किसी सरकारी सेवक को यह आदेश दे सकता है कि वह निर्दिष्ट अवधि के अन्दर ऐसी चल व अचल सम्पत्ति का, जो उसके पास अथवा उसके परिवार के किसी सदस्य के पास रही हो, या अर्जित की गयी हो का सम्पूर्ण विवरण पत्र प्रस्तुत करें तथा साथ ही उन साधनों के ब्यौरे भी उपलब्ध करें जिनके द्वारा सम्पत्ति अर्जित की गयी थी।
                शासन की मंशा यह नही कि सरकारी सेवक सम्पत्ति अर्जित न करे, केवल यह उद्देश्य है कि अर्जित की गयी सम्पत्ति उसके द्वारा विधिसम्मत अर्जित आय की सीमा के अन्दर ही हो।
नियम 25 - सरकारी सेवकों के कार्यों तथा चरित्र का प्रतिसमर्थन
                कोई भी सरकारी सेवक, सिवाय उस दशा के जबकि उसने सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर ली हो, किसी ऐसे सरकारी कार्य का, जो प्रतिकूल आलोचना या मानहानिकारी आक्षेप का विषय बन गया हो, प्रतिसमर्थन करने के लिए, किसी समाचार पत्र की शरण न लेगा।
नियम 26 - समाप्त
नियम 27 - सेवा सम्बन्धी मामलों में गैर सरकारी एवं बाहय प्रभाव
                कोई भी सरकारी सेवक अपनी सेवा से सम्बन्धित अपने हितों के संबंध में किसी मामले में कोई राजनीतिक अथवा अन्य वाहय साधनों से न तो स्वयं अथवा अपने कुटुम्ब के किसी सदस्य द्वारा कोई प्रभाव डालेगा या प्रभाव डलवाने का प्रयास करेगा। कभी-कभी सरकारी सेवक अपने, स्थानान्तरण, प्रोन्नति आदि के सम्बन्ध में माननीय विधायक सांसद अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा दबाव डलवाने का प्रयास करते हैं। आचरण नियमावली में इस बात की पूरी तरह मनाही है। इसी नियम से सम्बद्ध अधोलिखित नियम 27-क है।
नियम  27-क    कोई सरकारी सेवक सिवाय उचित माध्यम अथवा ऐसे निर्देशों के अनुसार जो समय-समय पर जारी किये गये है व्यक्तिगत रूप से अपने या परिवार के किसी सदस्य के माध्यम से सरकार अथवा किसी अन्य प्राधिकारी को कोई अभ्यावेदन नहीं करेगा। कभी-कभी सरकारी सेवक बाहरी प्रभाव का प्रयोग स्वयं नहीं करते अथवा अभ्यावेदन स्वयं नही देते हैं लेकिन उनके परिवार के सदस्य इस प्रकार का प्रभाव डलवाते हैं या अभ्यावेदन देते हैं। इस नियम में स्पष्ट किया गया है कि जब तक बात विपरीत प्रमाणित नहीं हो जाए यह माना जायेगा कि ऐसा कार्य सरकारी सेवक की प्रेरणा या मौन स्वीकृति से किया गया है।
नियम 28 - अनाधिकृत वित्तीय व्यवस्थाएँ
                कोई सरकारी कर्मचारी किसी अन्य सरकारी कर्मचारी के साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई ऐसी वित्तीय व्यवस्था नहीं करेगा जिसमें दोनों में से किसी एक को या दोनों को ही अनाधिकृत रूप से या तत्पसमय प्रवृत्त किसी नियम के विशिष्ट या ध्वनित उपबन्धों के विरूद्ध किसी प्रकार का लाभ हो।
नियम  29 - बहु-विवाह
  1. कोई सरकारी कर्मचारी, जिसकी एक पत्नी जीवित है, इस बात के होते हुए भी कि तत्समय  उस पर लागू किसी वैयक्तिक विधि के अधीन उसे इस प्रकार की बाद की दूसरी शादी की अनुमति प्राप्त है, बिना सरकार की पूर्व अनुमति प्राप्त किये, दूसरा विवाह नहीं करेगा।
  2. कोई महिला सरकारी कर्मचारी, बिना सरकार की पूर्व अनुमति के, ऐसे व्यक्ति से जिसकी एक पत्नी जीवित हो, विवाह नहीं करेगी।
नियम 30 - सुख सुविधाओं का समुचित उपयोग
            इस नियम में इस बात का उल्लेख किया गया है कि सरकारी सेवक ऐसी सुख सुविधा का दुरूपयोग नहीं करेगा और न ही उनका असावधानी के साथ प्रयोग करेगा जिनकी व्यवस्था सरकार ने उसके सरकारी कर्तव्यों के पालन में उसे सुविधा पहुँचाने के प्रयोजन से की हो।
नियम 31 - क्रय का मूल्य देना
            कोई सरकारी सेवक, उस समय तक जब तक किस्तों में मूल्य देना प्रथानुसार या विशेष रूप से उपबन्धित न हो या जब तक किसी सद्भावी व्यापारी के पास उसका उधार-लेखा न खुला हो, उन वस्तुओं का, जिसे उसने खरीदा, चाहे ये खरीददारियाँ उसने दौरे पर या अन्यथा की हों, तुरंत पूर्ण मूल्य देने से मना नहीं करेगा।
नियम 32 - बिना मूल्य दिए सेवाओं का उपयोग करना
            इस नियम में इस बात का उल्लेख किया गया है कि बिना मूल्य दिये कोई सरकारी सेवक किसी सेवा अथवा आमोद का स्वयं प्रयोग नहीं करेगा जिसके लिये कोई शुल्क अथवा मूल्य दिया जाता है। उदाहरण के लिए सरकारी सेवक  बिना टिकट क्रय किए सिनेमा हाल में फिल्म नहीं देख सकते हैं। लेकिन ऐसे उदाहरण हो सकते हैं जहाँ पर सरकारी सेवक नि:शुल्क फिल्म ही नहीं देखते वरन् आमोद-कर भी सरकार को नही देते हैं। इस प्रकार वह दुराचरण करते हैं।
नियम 33 - दूसरों के गैर सरकारी वाहन का उपभोग
            कोई सरकारी सेवक, सिवाय बहुत ही विशेष परिस्थितियों के होने की दशा में, किसी ऐसी सवारी गाड़ी को प्रयोग में नहीं लाएगा जो किसी असरकारी व्यक्ति की हो या किसी ऐसे सरकारी सेवक की हो जो उसके अधीन हो।
नियम 34 - अधीनस्थों के माध्यम से क्रय
            कोई सरकारी कर्मचारी, किसी ऐसे सरकारी कर्मचारी से, जो उसके अधीन हो, अपनी ओर से या अपनी पत्नी या अपने परिवार के अन्य सदस्य की ओर से, चाहे अग्रिम भुगतान करने पर या अन्यथा, उसी शहर में या किसी दूसरे शहर में, खरीददारियां करने के लिए न तो स्वयं कहेगा और न अपनी पत्नी को या अपने परिवार के किसी अन्य सदस्य को जो उसके साथ रह रहा हो, कहने की अनुमति देगा। अधिसूचना संख्या-9/7/78-कार्मिक-1, दिनांक 20 नवम्बर, 1980 द्वारा चपरासियों के माध्यम से भी क्रय विक्रय कराने की सुविधा पर प्रतिबन्ध लगाया गया है।
नियम 35 - निर्वचन
                यदि इन नियमों के निर्वाचन से संबंधित कोई प्रश्न उठ खड़ा हो तो उसे सरकार के पास भेज देना चाहिए और उस पर सरकार का जो भी निर्णय होगा, वह अंतिम होगा।
नियम 36 - निरसन एवं अपवाद
                इन नियमों के प्रवृत्त होने के ठीक पूर्व कोई भी नियम, जो इन नियमों के प्रतिस्थानी थे एवं जो उत्तर प्रदेश के नियंत्रण के अधीन सरकारी सेवकों पर लागू होते थे, एतदद्वारा निरस्त किए जाते हैं।


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राज्य सभा - एक परिचय



पृष्ठभूमि

काउंसिल ऑफ स्टेट्स, जिसे राज्य सभा भी कहा जाता है, एक ऐसा नाम है जिसकी घोषणा सभापीठ द्वारा सभा में 23 अगस्त, 1954 को की गई थी। इसकी अपनी खास विशेषताएं हैं। भारत में द्वितीय सदन का प्रारम्भ 1918 के मोन्टेग-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन से हुआ। भारत सरकार अधिनियम, 1919 में तत्कालीन विधानमंडल के द्वितीय सदन के तौर पर काउंसिल ऑफ स्टेट्स का सृजन करने का उपबंध किया गया जिसका विशेषाधिकार सीमित था और जो वस्तुत: 1921 में अस्तित्व में आया। गवर्नर-जनरल तत्कालीन काउंसिल ऑफ स्टेट्स का पदेन अध्यक्ष होता था। भारत सरकार अधिनियम, 1935 के माध्यम से इसके गठन में शायद ही कोई परिवर्तन किए गए।
संविधान सभा, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर 1946 को हुई थी, ने भी 1950 तक केन्द्रीय विधानमंडल के रूप में कार्य किया, फिर इसे 'अनंतिम संसद' के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। इस अवधि के दौरान, केन्द्रीय विधानमंडल जिसे 'संविधान सभा' (विधायी) और आगे चलकर 'अनंतिम संसद' कहा गया, 1952 में पहले चुनाव कराए जाने तक, एक-सदनी रहा।
स्वतंत्र भारत में द्वितीय सदन की उपयोगिता अथवा अनुपयोगिता के संबंध में संविधान सभा में विस्तृत बहस हुई और अन्तत: स्वतंत्र भारत के लिए एक द्विसदनी विधानमंडल बनाने का निर्णय मुख्य रूप से इसलिए किया गया क्योंकि परिसंघीय प्रणाली को अपार विविधताओं वाले इतने विशाल देश के लिए सर्वाधिक सहज स्वरूप की सरकार माना गया। वस्तुत:, एक प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित एकल सभा को स्वतंत्र भारत के समक्ष आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए अपर्याप्त समझा गया। अत:, 'काउंसिल ऑफ स्टेट्स' के रूप में ज्ञात एक ऐसे द्वितीय सदन का सृजन किया गया जिसकी संरचना और निर्वाचन पद्धति प्रत्यक्षत: निर्वाचित लोक सभा से पूर्णत: भिन्न थी। इसे एक ऐसा अन्य सदन समझा गया, जिसकी सदस्य संख्या लोक सभा (हाउस ऑफ पीपुल) से कम है। इसका आशय परिसंघीय सदन अर्थात् एक ऐसी सभा से था जिसका निर्वाचन राज्यों और दो संघ राज्य क्षेत्रों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा किया गया, जिनमें राज्यों को समान प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। निर्वाचित सदस्यों के अलावा, राष्ट्रपति द्वारा सभा के लिए बारह सदस्यों के नामनिर्देशन का भी उपबंध किया गया। इसकी सदस्यता हेतु न्यूनतम आयु तीस वर्ष नियत की गई जबकि निचले सदन के लिए यह पच्चीस वर्ष है। काउंसिल ऑफ स्टेट्स की सभा में गरिमा और प्रतिष्ठा के अवयव संयोजित किए गए। ऐसा भारत के उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाकर किया गया, जो इसकी बैठकों का सभापतित्व करते हैं।

राज्य सभा से संबंधित संवैधानिक उपबंध संरचना/संख्या

संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्य सभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है, जिनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाते हैं और 238 सदस्य राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं। तथापि, राज्य सभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है, जिनमें से 233 सदस्य राज्यों और संघ राज्यक्षेत्र दिल्ली तथा पुडुचेरी के प्रतिनिधि हैं और 12 राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित हैं। राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है।

स्थानों का आवंटन

संविधान की चौथी अनुसूची में राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को स्थानों के आवंटन का उपबंध है। स्थानों का आवंटन प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है। राज्यों के पुनर्गठन तथा नए राज्यों के गठन के परिणामस्वरूप, राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों को आवंटित राज्य सभा में निर्वाचित स्थानों की संख्या वर्ष 1952 से लेकर अब तक समय-समय पर बदलती रही है।

पात्रता अर्हताएं

संविधान के अनुच्छेद 84 में संसद की सदस्यता के लिए अर्हताएं निर्धारित की गई हैं। राज्य सभा की सदस्यता के लिए अर्ह होने के लिए किसी व्यक्ति के पास निम्नलिखित अर्हताएं होनी चाहिए:
(क) उसे भारत का नागरिक होना चाहिए और निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार शपथ लेना चाहिए या प्रतिज्ञान  करना चाहिए और उस पर अपने हस्ताक्षर करने चाहिए;
(ख)  उसे कम से कम तीस वर्ष की आयु का होना चाहिए;
(ग)  उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं होनी चाहिए जो संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त विहित की जाएं।
निरर्हताएं
संविधान के अनुच्छेद 102 में यह निर्धारित किया गया है कि कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा-
(क) यदि वह भारत सरकार के या किसी राजय की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर, जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है;
(ख) यदि वह विकृतचित है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है;
(ग) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है;
(घ) यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली हे या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा या अनुषक्ति को अभिस्वीकार किए हुए है;
(ड.) यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है।

स्पष्टीकरण-

इस खंड के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल इस कारण भारत सरकार के या किसी राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या ऐसे राज्य का मंत्री है।

इसके अतिरिक्त, संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-परिवर्तन के आधार पर सदस्यों की निरर्हता के बारे में उपबंध किया गया है। दसवीं अनुसूची के उपबंधों के अनुसार, कोई सदस्य एक सदस्य के रूप में उस दशा में निरर्हित होगा, यदि वह स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है; या वह ऐसे राजनीतिक दल द्वारा, जिसका वह सदस्य है, दिए गए किसी निदेश के विरुद्ध सदन में मतदान करता है या मतदान करने से विरत रहता है और ऐसे मतदान या मतदान करने से विरत रहने को उस राजनीतिक दल द्वारा पन्द्रह दिन के भीतर माफ नहीं किया गया है। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित सदस्य निरर्हित होगा यदि वह अपने निर्वाचन के पश्चात् किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है।

तथापि, राष्ट्रपति द्वारा सदन के किसी नामनिर्देशित सदस्य को किसी राजनीतिक दल में सम्मिलित होने की अनुमति होगी यदि वह सदन में अपना स्थान ग्रहण करने के पहले छह मास के भीतर ऐसा करता/करती है।

किसी सदस्य को इस आधार पर निरर्हित नहीं किया जाएगा यदि वह राज्य सभा का उप-सभापति निर्वाचित होने के पश्चात् अपने राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता/देती है।
निर्वाचन/नामनिर्देशन की प्रक्रिया निर्वाचक मंडल
           राज्य सभा में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन अप्रत्यक्ष निर्वाचन पद्धति द्वारा किया जाता है। प्रत्येक राज्य तथा दो संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का निर्वाचन उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों तथा उस संघ राज्य क्षेत्र के निर्वाचक मंडल के सदस्यों, जैसा भी मामला हो, द्वारा एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार किया जाता है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के निर्वाचक मंडल में दिल्ली विधान सभा के निर्वाचित सदस्य और पुडुचेरी संघ राज्य क्षेत्र के निर्वाचक मंडल में पुडुचेरी विधान सभा के निर्वाचित सदस्य शामिल हैं।
द्वि-वार्षिक/उप-चुनाव
            राज्य सभा एक स्थायी सदन है और यह भंग नहीं होता। तथापि, प्रत्येक दो वर्ष बाद राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य सेवा-निवृत्त हो जाते हैं। पूर्णकालिक अवधि के लिए निर्वाचित सदस्य छह वर्षों की अवधि के लिए कार्य करता है। किसी सदस्य के कार्यकाल की समाप्ति पर सेवानिवृत्ति को छोड़कर अन्यथा उत्पन्न हुई रिक्ति को भरने के लिए कराया गया निर्वाचन 'उप-चुनाव' कहलाता है।

उप-चुनाव में निर्वाचित कोई सदस्य उस सदस्य की शेष कार्यावधि तक सदस्य बना रह सकता है जिसने त्यागपत्र दे दिया था या जिसकी मृत्यु हो गई थी या जो दसवीं अनुसूची के अधीन सभा का सदस्य होने के लिए निरर्हित हो गया था।
पीठासीन अधिकारीगण-सभापति और उपसभापति
            राज्य सभा के पीठासीन अधिकारियों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे सभा की कार्यवाही का संचालन करें। भारत के उपराष्ट्रपति राज्य सभा के पदेन सभापति हैं। राज्य सभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति का भी चयन करती है। राज्य सभा में उपसभाध्यक्षों का एक पैनल भी होता है, जिसके सदस्यों का नामनिर्देशन सभापति, राज्य सभा द्वारा किया जाता है। सभापति और उपसभापति की अनुपस्थिति में, उपसभाध्यक्षों के पैनल से एक सदस्य सभा की कार्यवाही का सभापतित्व करता है।
महासचिव
            महासचिव की नियुक्ति राज्य सभा के सभापति द्वारा की जाती है और उनका रैंक संघ के सर्वोच्च सिविल सेवक के समतुल्य होता है। महासचिव गुमनाम रह कर कार्य करते हैं और संसदीय मामलों पर सलाह देने के लिए तत्परता से पीठासीन अधिकारियों को उपलब्ध रहते हैं। महासचिव राज्य सभा सचिवालय के प्रशासनिक प्रमुख और सभा के अभिलेखों के संरक्षक भी हैं। वह राज्य सभा के सभापति के निदेश व नियंत्रणाधीन कार्य करते हैं।
दोनों सभाओं के बीच संबंध
            संविधान के अनुच्छेद 75 (3) के अधीन, मंत्री परिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति जिम्मेदार होती है जिसका आशय यह है कि राज्य सभा सरकार को बना या गिरा नहीं सकती है। तथापि, यह सरकार पर नियंत्रण रख सकती है और यह कार्य विशेष रूप से उस समय बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब सरकार को राज्य सभा में बहुमत प्राप्त नहीं होता है।

       किसी सामान्य विधान की दशा में, दोनों सभाओं के बीच गतिरोध दूर करने के लिए, संविधान में दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक बुलाने का उपबंध है। वस्तुत:, अतीत में ऐसे तीन अवसर आए हैं जब संसद की सभाओं की उनके बीच मतभेदों को सुलझाने के लिए संयुक्त बैठक हुई थी। संयुक्त बैठक में उठाये जाने वाले मुद्दों का निर्णय दोनों सभाओं में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की कुल संख्या के बहुमत से किया जाता है। संयुक्त बैठक संसद भवन के केन्द्रीय कक्ष में आयोजित की जाती है जिसकी अध्यक्षता लोकसभाध्यक्ष द्वारा की जाती है। तथापि, धन विधेयक की दशा में, संविधान में दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक बुलाने का कोई उपबंध नहीं है, क्योंकि लोक सभा को वित्तीय मामलों में राज्य सभा की तुलना में प्रमुखता हासिल है। संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में, संविधान में यह उपबंध किया गया है कि ऐसे विधेयक को दोनों सभाओं द्वारा, संविधान के अनुच्छेद 368 के अधीन विहित रूप में, विशिष्ट बहुमत से पारित किया जाना होता है। अत:, संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में दोनों सभाओं के बीच गतिरोध को दूर करने का कोई उपबंध नहीं है।

मंत्री संसद की किसी भी सभा से हो सकते हैं। इस संबंध में संविधान सभाओं के बीच कोई भेद नहीं करता है। प्रत्येक मंत्री को किसी भी सभा में बोलने और उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है, लेकिन वह उसी सभा में मत देने का हकदार होता है जिसका वह सदस्य होता है।

         इसी प्रकार, संसद की सभाओं, उनके सदस्यों और उनकी समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के संबंध में, दोनों सभाओं को संविधान द्वारा बिल्कुल समान धरातल पर रखा गया है।

जिन अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों के संबंध में दोनों सभाओं को समान शक्तियां प्राप्त हैं वे इस प्रकार हैं:- राष्ट्रपति का निर्वाचन तथा महाभियोग, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, आपातकाल की उद्घोषणा का अनुमोदन, राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता से संबंधित उद्घोषणा और वित्तीय आपातकाल। विभिन्न संवैधानिक प्राधिकरणों आदि से प्रतिवेदन तथा पत्र प्राप्त करने के संबंध में, दोनों सभाओं को समान शक्तियां प्राप्त हैं।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि मंत्री-परिषद् की सामूहिक जिम्मेदारी के मामले और कुछ ऐसे वित्तीय मामले, जो सिर्फ लोक सभा के क्षेत्राधिकार में आते हैं, के सिवाए दोनों सभाओं को समान शक्तियां प्राप्त हैं।
राज्य सभा की विशेष शक्तिया
            एक परिसंघीय सदन होने के नाते राज्य सभा को संविधान के अधीन कुछ विशेष शक्तियां प्राप्त हैं। विधान से संबंधित सभी विषयों/क्षेत्रों को तीन सूचियों में विभाजित किया गया है-संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ और राज्य सूचियां परस्पर अपवर्जित हैं-कोई भी दूसरे के क्षेत्र में रखे गए विषय पर कानून नहीं बना सकता।
       तथापि, यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह कहते हुए एक संकल्प पारित करती है कि यह "राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन" है कि संसद, राज्य सूची में प्रमाणित किसी विषय पर विधि बनाए, तो संसद भारत के संपूर्ण राज्य-क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए उस संकल्प में विनिर्दिष्ट विषय पर विधि बनाने हेतु अधिकार-संपन्न हो जाती है। ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेगा परन्तु यह अवधि इसी प्रकार के संकल्प को पारित करके एक वर्ष के लिए पुन: बढ़ायी जा सकती है।
       यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत द्वारा यह घोषित करते हुए एक संकल्प पारित करती है कि संघ और राज्यों के लिए सम्मिलित एक या अधिक अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन किया जाना राष्ट्रीय हित में आवश्यक या समीचीन है, तो संसद विधि द्वारा ऐसी सेवाओं का सृजन करने के लिए अधिकार-संपन्न हो जाती है।
       संविधान के अधीन, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की स्थिति में, किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति में अथवा वित्तीय आपात की स्थिति में उद्घोषणा जारी करने का अधिकार है। ऐसी प्रत्येक उद्घोषणा को संसद की दोनों सभाओं द्वारा नियत अवधि के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। तथापि, कतिपय परिस्थितियों में राज्य सभा के पास इस संबंध में विशेष शक्तियाँ हैं। यदि कोई उद्घोषणा उस समय की जाती है जब लोक सभा का विघटन हो गया है अथवा लोक सभा का विघटन इसके अनुमोदन के लिए अनुज्ञात अवधि के भीतर हो जाता है और यदि इसे अनुमोदित करने वाला संकल्प राज्य सभा द्वारा अनुच्छेद 352, 356 और 360 के अधीन संविधान में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर पारित कर दिया जाता है, तब वह उद्घोषणा प्रभावी रहेगी।
वित्तीय मामलों में राज्य सभा
धन विधेयक केवल लोक सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है। इसके उस सभा द्वारा पारित किए जाने के उपरान्त इसे राज्य सभा को उसकी सहमति अथवा सिफारिश के लिए पारेषित किया जाता है। ऐसे विधेयक के संबंध में राज्य सभा की शक्ति सीमित है। राज्य सभा को ऐसे विधेयक की प्राप्ति से चौदह दिन के भीतर उसे लोक सभा को लौटाना पड़ता है। यदि यह उस अवधि के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है तो विधेयक को उक्त अवधि की समाप्ति पर दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित किया गया समझा जाएगा जिसमें इसे लोक सभा द्वारा पारित किया गया था। राज्य सभा धन विधेयक में संशोधन भी नहीं कर सकती; यह केवल संशोधनों की सिफारिश कर सकती है और लोक सभा, राज्य सभा की सभी या किन्हीं सिफारिशों को स्वीकार अथवा अस्वीकार कर सकेगी।
       धन विधेयक के अलावा, वित्त विधेयकों की कतिपय अन्य श्रेणियों को भी राज्य सभा में पुर:स्थापित नहीं किया जा सकता। तथापि, कुछ अन्य प्रकार के वित्त विधेयक हैं जिनके संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं है। ये विधेयक किसी भी सभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं और राज्य सभा को ऐसे वित्त विधेयकों को किसी अन्य विधेयक की तरह ही अस्वीकृत या संशोधित करने का अधिकार है। वस्तुत: ऐसे विधेयक संसद की किसी भी सभा द्वारा तब तक पारित नहीं किए जा सकते, जब तक राष्ट्रपति ने उस पर विचार करने के लिए उस सभा से सिफारिश नहीं की हो।
       तथापि, इन सारी बातों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि राज्य सभा का वित्त संबंधी मामलों से कुछ भी लेना-देना नहीं है। भारत सरकार के बजट को प्रतिवर्ष राज्य सभा के समक्ष भी रखा जाता है और इसके सदस्यगण उस पर चर्चा करते हैं। यद्यपि राज्य सभा विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर मतदान नहीं करती - यह मामला अनन्य रूप से लोक सभा के लिए सुरक्षित है फिर भी, भारत की संचित निधि से किसी धन की निकासी तब तक नहीं की जा सकती, जब तक दोनों सभाओं द्वारा विनियोग विधेयक को पारित नहीं कर दिया जाता। इसी प्रकार, वित्त विधेयक को भी राज्य सभा के समक्ष लाया जाता है। इसके अलावा, विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियां, जो मंत्रालयों/विभागों की वार्षिक अनुदान मांगों की जांच करती हैं, संयुक्त समितियां हैं जिनमें दस सदस्य राज्य सभा से होते हैं।
सभा के नेता
सभापति और उपसभापति के अलावा, सभा का नेता एक अन्य ऐसा अधिकारी है जो सभा के कुशल और सुचारू संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राज्य सभा में सभा का नेता सामान्यतया प्रधान मंत्री होता है, यदि वह इसका सदस्य है, अथवा कोई ऐसा मंत्री होता है, जो इस सभा का सदस्य है और जिसे उनके द्वारा इस रूप में कार्य करने के लिए नाम-निर्दिष्ट किया गया हो। उसका प्राथमिक उत्तरदायित्व सभा में सौहार्दपूर्ण और सार्थक वाद-विवाद के लिए सभा के सभी वर्गों के बीच समन्वय बनाए रखना है। इस प्रयोजनार्थ, वह न केवल सरकार के, बल्कि विपक्ष, मंत्रियों और पीठासीन अधिकारी के भी निकट संपर्क में रहता है। वह सभा-कक्ष (चैम्बर) में सभापीठ के दायीं ओर की पहली पंक्ति में पहली सीट पर बैठता है ताकि वह परामर्श हेतु पीठासीन अधिकारी को सहज उपलब्ध रहे। नियमों के तहत, सभापति द्वारा सभा में सरकारी कार्य की व्यवस्था, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा हेतु दिनों के आवंटन अथवा समय के आवंटन, शुक्रवार के अलावा किसी अन्य दिन को गैर-सरकारी सदस्यों के कार्य, अनियत दिन वाले प्रस्तावों पर चर्चा, अल्पकालिक चर्चा और किसी धन विधेयक पर विचार एवं उसे वापस किये जाने के संबंध में सदन के नेता से परामर्श किया जाता है।
       महान व्यक्तित्व, राष्ट्रीय नेता अथवा अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित व्यक्ति की मृत्यु होने की स्थिति में उस दिन के लिए सभा के स्थगन अथवा अन्यथा के मामले में सभापति उनसे भी परामर्श कर सकते हैं। गठबंधन सरकारों के युग में उनका कार्य और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। वह यह सुनिश्चित करते हैं कि सभा के समक्ष लाये गए किसी भी मामले पर सार्थक चर्चा के लिए सभा में हर संभव तथा उचित सुविधा प्रदान की जाए। वह सभा की राय व्यक्त करने और इसे समारोह अथवा औपचारिक अवसरों पर प्रस्तुत करने में सभा के वक्ता के रूप में कार्य करते हैं। निम्नलिखित सदस्य राज्य सभा में सभा के नेता रहे हैं:
नाम से तक
1. श्री एन. गोपालास्वामी अयंगर मई, 1952 फरवरी, 1953
2. श्री चारू चन्द्र बिश्वास फरवरी, 1953 नवम्बर, 1954
3. श्री लाल बहादुर शास्त्री नवम्बर, 1954 मार्च, 1955
4. पंडित गोविंद बल्लभ पंत मार्च, 1955 फरवरी, 1961
5. हाफीज मोहम्मद इब्राहीम फरवरी, 1961 अगस्त, 1963
6. श्री यशवन्त राव बलवन्तराव अगस्त, 1963 दिसम्बर, 1963
7. श्री जय सुख लाल हाथी फरवरी,1964 मार्च, 1964
8. श्री महोमदाली करीम छागला मार्च, 1964 नवम्बर, 1967
9. श्री जय सुख लाल हाथी नवम्बर, 1967 नवम्बर, 1969
10. श्री कोडारादास कालीदास शाह नवम्बर, 1967 मई, 1971
11. श्री उमा शंकर दीक्षित मई, 1971 दिसम्बर,1975
12. श्री कमलापति त्रिपाठी दिसम्बर,1975 मार्च, 1977
13. श्री लाल कृष्ण आडवाणी मार्च, 1977 अगस्त, 1979
14. श्री कृष्ण चन्द्र पंत अगस्त, 1979 जनवरी, 1980
15. श्री प्रणव मुखर्जी जनवरी, 1980
अगस्त, 1981
जुलाई 1981 और दिसम्बर, 1984
16. श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह दिसम्बर, 1984 अप्रैल, 1987
17. श्री नारायण दत्त तिवारी अप्रैल, 1987 जून, 1988
18. श्री पी. शिव शंकर जुलाई, 1988 दिसम्बर, 1989
19. श्री एम.एस. गुरूपदस्वामी दिसम्बर, 1989 नवम्बर, 1990
20. श्री यशवंत सिन्हा दिसम्बर, 1990 जून, 1991
21. श्री शंकर राव बलवंत राव चव्हाण जुलाई, 1991 अप्रैल, 1996
22. श्री सिकन्दर बख्त 20 मई, 1996 31 मई, 1996
23. श्री इन्द्र कुमार गुजराल जून, 1996 नवम्बर, 1996
24. श्री एच.डी. देवेगौड़ा नवम्बर, 1996 अप्रैल, 1997
25. श्री इन्द्र कुमार गुजराल अप्रैल, 1997 मार्च, 1998
26. श्री सिकन्दर बख्त मार्च, 1998 अक्तूबर, 1999
27. श्री जसवन्त सिंह अक्तूबर, 1999 मई, 2004
28. श्री डा. मनमोहन सिंह 01 जून, 2004 18 मई, 2009
29 मई, 2014 26 मई, 2014
29. श्री अरुण जेटली 02 जून, 2014 अब तक
विपक्ष के नेता
 विधायिका में विपक्ष के नेता के पद का अत्यधिक सार्वजनिक महत्व है। इसका महत्व संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष को दी गई मुख्य भूमिका से उद्भूत होता है। विपक्ष के नेता का कार्य वस्तुत: अत्यधिक कठिन है क्योंकि उन्हें आलोचना करनी पड़ती है, गलती इंगित करनी पड़ती है और ऐसे वैकल्पिक प्रस्तावों/नीतियों को प्रस्तुत करना पड़ता है जिन्हें लागू करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार उन्हें संसद और देश के प्रति एक विशेष सामाजिक जिम्मेवारी निभानी होती है।
       राज्य सभा में वर्ष 1969 तक वास्तविक अर्थ में विपक्ष का कोई नेता नहीं होता था। उस समय तक सर्वाधिक सदस्यों वाली विपक्षी पार्टी के नेता को बिना किसी औपचारिक मान्यता, दर्जा या विशेषाधिकार दिए विपक्षी नेता मानने की प्रथा थी। विपक्ष के नेता के पद को संसद में विपक्षी नेता वेतन और भत्ता अधिनियम, 1977 द्वारा अधिकारिक मान्यता प्रदान की गई। इस अधिनियम के द्वारा राज्य सभा में विपक्षी नेता, राज्य सभा का एक ऐसा सदस्य होता है जो कुछ समय के लिए राज्य सभा के सभापति द्वारा यथा मान्य सबसे अधिक सदस्यों वाले दल की सरकार के विपक्ष में होता है। इस प्रकार विपक्ष के नेता को तीन शर्तें पूरी करनी होती हैं, नामश: (i) उसे सभा का सदस्य होना चाहए (ii) सर्वाधिक सदस्यों वाले दल की सरकार के विपक्ष में राज्य सभा का नेता होना चाहिए और (iii) इस आशय से राज्य सभा के सभापति द्वारा उसे मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।

राज्य सभा में निम्नलिखित सदस्य विपक्ष के नेता रहे हैं:

नाम से तक
1. श्री श्याम नंदन मिश्र दिसम्बर, 1969 मार्च, 1971
2. श्री एम.एस. गुरूपदस्वामी मार्च, 1971 अप्रैल, 1972
3. श्री कमलापति त्रिपाठी 30.3.1977 15.2.1978
4. श्री भोला पासवान शास्त्री 24.2.1978 23.3.1978
5. श्री कमलापति त्रिपाठी 23.3.1978
18.4.1978
2.4.1978 और
8.1.1980
6. श्री लाल कृष्ण आडवाणी 21.1.1980 7.4.1980
7. श्री पी. शिव शंकर 18.12.1989 2.1.1991
8. श्री एम.एस. गुरुपदस्वामी 28.6.1991 21.7.1991
9. श्री एस. जयपाल रेड्डी 22.7.1991 29.6.1992
10. श्री सिकन्दर बख्त 7.7.1992
10.4.1996
10.4.1996 और
23.5.1996
11. श्री शंकर राव बलवन्त राव चव्हाण 23.5.1996 1.6.1996
12. श्री सिकन्दर बख्त 1.6.1996 19.3.1998
13. डा. मनमोहन सिंह 21.3.1998 21.5.2004
14. श्री जसवन्त सिंह 3.6.2004
5.7.2004
4.7.2004
और 16.5.2009
15. श्री अरुण जेटली 3.6.2009 26.5.2014
16. श्री गुलाम नबी आज़ाद 8.6.2014 11.02.2015
 हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्य सभा ने रचनात्मक और प्रभावी भूमिका निभाई है। विधायी क्षेत्र और सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के मामले में इसका कार्य-निष्पादन काफी अहम रहा है। वस्तुत: राज्य सभा ने संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक लोक सभा के साथ सहयोग की भावना से कार्य किया है। राज्य सभा ने जल्दबाजी में कानून पारित नहीं किया है और संघीय सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हुए एक आदर्श सभा की तरह कार्य किया है। संघीय सभा होने के नाते इसने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का कार्य किया है और संसदीय लोकतंत्र में लोगों की आस्था बढ़ाई है।

राज्य सभा के पीठासीन अधिकारी
1.  हामिद अंसारी - सभापति
2. प्रो. पी. जे. कुरियन-उपसभापति
उपाध्यक्षों का पैनल
1.  डा. सत्यनारायण जटिया, संसद सदस्य
2.  डा. ई.एम. सुदर्शन नाच्चीयप्पन, संसद सदस्य
3.  श्री तिरुची शिवा, संसद सदस्य
4.  श्री वी. पी. सिंह बदनौर, संसद सदस्य
5.  श्री सुखेन्‍दु शेखर राय, संसद सदस्य
6.  श्री टी. के. रंगराजन, संसद सदस्य



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