राष्ट्रभाषा हिंदी के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी



राजभाषा हिंदी के संबध में महत्वपूर्ण जानकारी
  • विश्व के लगभग 133 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। ऐसे देशों में जहां भारतीय मूल के लोगों की संख्या अधिक है, जैसे फिजी, गुआना, मारीशस, नेपाल, कम्बोडिया, त्रिनिदाद आदि के स्कूलों में हिंदी अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जाती है।
  • प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर, दूसरा मारीशस तथा तीसरा नई दिल्ली में हुआ था।
  • पश्चिमी देशों में लंदन विश्वविद्यालय की ‘स्कूल आॅफ ओरियंटल एण्ड अफ्रीकन स्टडीज’ सबसे प्राचीन संस्था है जिसमें हिंदी पढ़ाने की व्यवस्था है।
  • फ्रांस दूसरा बड़ा देश है, जहां हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। उत्तरी अमेरिका में हिंदी पढ़ाने वाले 114 केन्द्र हैं, जबकि सोवियत रूस में 7 हिंदी शोध संस्थान हैं।
  • दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना मद्रास में 1927 में हुई।
  • ब्रिटिश भारत में, 1803 में पहला परिपत्र जारी किया गया ताकि सभी नियमों, विनियमों का हिंदी में अनुवाद किया जाए।
  • दक्षिण में हिंदी का आगमन अलाउद्दीन खिलजी द्वारा 1296 के आक्रमण के बाद शुरू हुआ।
  • 14वीं सदी में अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर, आदिलशाही, कुतबशाही, बरीदशाही आदि राज्यों ने हिंदी को अपनी राजभाषा बनाया था।
  • ‘हिन्दुस्तान लैंग्वेज’ नामक पहला हिंदी ग्रामर जाॅन जोशना केटलर ने 1698 में लिखा। तारिक फरिश्ता’ नामक पुस्तक के अनुसार बीजापुर और गोलकुण्डा के बहमनी साम्राज्य की राजभाषा हिंदी थी।
  • तंजावुर के राजा श्री शाह ने हिंदी में ‘विश्वजीत’ और ‘आधाविलास’ नामक दो नाटक क्रमशः 1674 और 1711 में लिखे।
  • देवनागरी टाइप अक्षर सर्वप्रथम 1667 में यूरोप में तैयार किए गए।
  • प्रसि( पश्चिमी विद्वानों- एडबीनग्रीव्स, ग्राडस, ग्रियर्सन, ग्रिफिथ, हार्नले, रोडाल्फ, टेसीदरी, ओल्डाम, पीनकैट इत्यादि ने हिंदी के विकास में बहुत योगदान दिया।
  • संयुक्त राष्ट्र में हिंदी स्वीकार करने का प्रस्ताव मारीशस द्वारा रखा गया।
  • वर्ष 1909 से मारीशस में ‘‘हिन्दुस्तान’’ नामक तथा फिजी में ‘‘फिजी समाचार’’ नाम से हिंदी साप्ताहिक छप रहे हैं।
  • करीब 3000 हिंदी पुस्तकें प्रतिवर्ष प्रकाशित होती हैं।
  • विश्व में बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी का दूसरा स्थान है।


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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अन्दर से जानो



 राष्ट्रवाद के प्रकाश पुंज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अन्दर से जानो

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को कुछ लोग श्रद्धा भाव से देखते हैं, तो कुछ भय और विरोध से। अधिकांश शहरी हिन्दू होंगे कभी न कभी संघ की शाखा में जा चुके हैं। फिर भी संघ के बारे में भ्रम अधिक हैं, जिसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला तो विरोधियों द्वारा योजनाबद्ध रीति से फैलाया गया मायाजाल, तथा दूसरा संघ द्वारा प्रसिद्धि से दूर रहने की नीति, पर अब संघ ने अपने प्रचारतंत्र को ठीक किया है। फिर भी यह निश्चित है कि संघ को केवल पत्र-पत्रिकाओं में पढ़कर नहीं समझा जा सकता, इसके लिए तो उसके पास आना होगा।
राष्ट्रवाद के प्रकाश पुंज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को अन्दर से जानो 
स्थापना एवं उद्देश्यः संघ की स्थापना 1925 की विजयादशमी पर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी डा0 केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। उनका मत था कि अंग्रेजों के चले जाने से ही भारत की दुर्दशा समाप्त नहीं होगी। इसके लिए राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले हिन्दू युवकों को टोली हर गांव-शहर में खड़ी करनी होगी। इसीलिए उन्होंने संघ की स्थापना की। 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' का अर्थ हैः अपनी इच्छा से राष्ट्र की सेवा करने वाले लोगों का समूह। ऐसे ही हिन्दू का अर्थ है भारत को अपना सर्वस्व मानने वाला व्यक्ति, चाहे उसकी पूजा पद्धति कुछ भी हो।
शाखाः संघ का प्रमुख आधार है, शाखा। स्वयंसेवक किसी भी मैदान में प्रतिदिन सुबह-शाम अथवा रात्रि में एक घंटे के लिए आकर अपनी आयु व क्षमता के अनुसार सामूहिक रूप से कुछ शारीरिक व बौद्धिक कार्यक्रम करते हैं। इसे ही शाखा कहते हैं।

स्वयंसेवकः शाखा में आने वाले को ‘स्वयंसेवक‘ कहा जाता है, चाहे उसकी आयु, जाति, आर्थिक या शैक्षणिक स्थिति कुछ भी हो। सरसंघचालक से लेकर किसी गांव या बस्ती की शाखा पर आने वाला कक्षा चार-पांच में पढ़ने वाला छात्र, सब पहले स्वयंसेवक हैं, बाद में कुछ और। स्वयंसेवक का अर्थ है- 'अपनी इच्छा से राष्ट्र की सेवा में लगा रहने वाला।'

कार्यक्रमः एक घंटे की शाखा में प्रायः 40-50 मिनट शारीरिक कार्यक्रम होते हैं। अनेक स्थानों पर एक ही शाखा में अलग-अलग आयु-वर्ग के स्वयंसेवक आते हैं, वहां उनकी अवस्था के अनुसार दो-तीन ‘गण‘ बना दिये जाते हैं। बाल-किशोर एवं युवा स्वयंसेवक मुख्यतः खेल, नियुद्ध, दंड संचालन, सूर्य नमस्कार आदि करते हैं। शाखा के अन्तिम 14-20 मिनट में संस्कारप्रद मानसिक कार्यक्रम होते हैं। इनमें देशभक्तिपूर्ण गीत का गायन, सामायिक विषय पर चर्चा, किसी महापुरूष के वाक्य, श्लोक या सुभाषित का स्मरण एवं उनका विश्लेषण, प्रश्नोत्तर आदि प्रमुख हैं।

भगवाध्वज एवं प्रार्थनाः संघ ने अपने गुरू-स्थान पर भारतीय संस्कृति के प्रतीक परमपवित्र भगवाध्वज को रखा है। संघ की शाखा तथा अन्य सभी गतिविधियां इसकी छत्रछाया में ही सम्पन्न होती हैं। कार्यक्रमों की समाप्ति भगवाध्वज के सम्मुख खड़े होकर प्रार्थना के बाद होती है। यह संस्कृत में भारतमाता की वंदना है, जो ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे‘ से प्रारम्भ होकर ‘भारतमाता की जय‘ पर समाप्त होती है।
भगवा ध्वज

अन्य कार्यक्रमः शाखा के अतिरिक्त समय में भी संस्कार जगाने तथा गुणसंवर्धन करने वाले अनेक कार्यक्रम होते हैं। जैसे- सहभोजः इसमें सब स्वयंसेवक अपने-अपने घर से भोजन लाते हैं। सबका भोजन एक स्थान पर मिला दिया जाता है। कुछ देर तक गीत-कविता, अंत्याक्षरी-प्रश्नमंच आदि मनोरंजक एवं ज्ञानवर्द्धक कार्यक्रमों के बाद सब एक साथ बैठकर भोजन करते हैं, किसके घर का भोजन किसने किया, यह पता ही नहीं लगता। परस्पर स्नेह तथा समरसता जाग्रत करने में यह कार्यक्रम अतुलनीय है।

वनविहारः इसमें सब स्वयंसेवक अपने नगर-गांव से दूर जाकर खेलकूद आदि के बाद ‘सहभोज‘ करते हैं। कभी-कभी वहीं भोजन बनाते हैं या फिर सब आपस में शुल्क एकत्र कर कुछ खानपान सामग्री मंगा लेते हैं।

शिविरः प्रायः दो-तीन दिन के शिविर बाल एवं तरूण विद्यार्थियों, व्यावसायियों, अवकाश प्राप्त स्वयंसेवकों के लिए अलग-अलग होते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार की शारीरिक-मानसिक प्रतियोगिताओं द्वारा स्वयंसेवक की प्रतिभा को उभारने का प्रयास किया जाता है। शिविर में सब तरह की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति वाले स्वयंसेवक आते हैं, पर सब एक साथ भूमि पर सोते, खाते-पीते तथा खेलते हैं। इनमें भाग लेने के लिए गणवेश, किराया, भोजन शुल्क आदि सब अपनी जेब से भरते हैं।

गणवेशः शाखा में तो स्वयंसेवक किसी भी निक्कर में आ सकता है, पर कुछ कार्यक्रमों में गणवेश अनिवार्य होता है। इसमें पूरी बांहों की एक जेब वाली सफेद कमीज, खाकी निकर, चमड़े की लाल पेटी का हुआ करता था अब सिंथेटिक की पेटी का उपयोग होने लगा है, खाकी मोजे, चमड़े या प्लास्टिक के काले फीते वाले जूते तथा काली टोपी होती है। प्रायः ऐसे कार्यक्रमों में कंधे तक की लाठी भी सब लाते हैं।

प्रशिक्षण वर्गः समय-समय पर नये कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण हेतु वर्गों का आयोजन होता है। एक सप्ताह के वर्ग को ‘प्राथमिक शिक्षा वर्ग‘ कहते हैं, इनका आयोजन दोे-तीन जिलों को मिलाकर किया जाता है। तीन सप्ताह के वर्ग के ‘संघ शिक्षा वर्ग‘ कहते हैं। ये प्रायः 20-25 जिलों के बीच मई-जून के अवकाश में होता है। प्रथम और द्वितीय वर्ष के संघ शिक्षा वर्ग अपने प्रान्त में ही होते हैं, जबकि ‘तृतीय वर्ष‘ का वर्ग पूरे देश का एक साथ नागपुर में होता है, इसकी अवधि एक मास की होती है।

संगठन संरचना:
संघ की संगठनात्मक रचना हिन्दू परिवार जैसी है। एक शाखा के क्षेत्र को तीन-चार भागों में बांट देते हैं, जिसे ‘गट‘ तथा इसके प्रमुख को ‘गटनायक‘ कहते हैं, यह संघ की पहली इकाई है। शाखा के शारीरिक कार्यक्रमों को कराने के लिए 15-20 स्वयंसेवकों की कई टोलियां बनाते हैं, इन्हें ‘गण‘ तथा इनके प्रमुख को ‘गणशिक्षक‘ कहते हैं। शाखा लगाने वाला ‘मुख्यशिक्षक‘ तथा उनके ऊपर ‘कार्यवाह‘ होता है। नगर की तीन-चार शाखाओं या ग्रामीण क्षेत्र में न्यायपंचायत को कार्य देखने वाले को ‘मंडल कार्यवाह‘ तथा इसी प्रकार ‘नगर कार्यवाह‘ या ग्रामीण क्षेत्र में खंड, तहसील और जिला कार्यवाह होते हैं। नगर, खंड, तहसील तथा इसके ऊपर के स्तर पर ‘संघचालक‘ भी होते हैं, इनकी भूमिका परिवार के मुखिया जैसी, जबकि कार्यवाह की भूमिका मुख्य कर्ताधर्ता की होती है। जिला तथा उससे ऊपर के संघचालकों का प्रति तीन वर्ष बाद चुनाव होता है। ये अन्य प्रतिनिधियों के साथ मिलकर ‘सरकार्यवाह‘ को चुनते हैं। वर्तमान सरकार्यवाह श्री भैया जी जोशी हैं। ‘सरसंघचालक‘ की भूमिका परिवार के मुखिया की भांति ‘मार्गदर्शक एवं परामर्शदाता‘ की होती है, प्रायः संघचालक प्रमुख कार्यकर्ताओं के परामर्श से इनका मनोनयन करते हैं, वर्तमान में श्री मोहन जी भगवत पर यह दायित्व है। संघचालक तथा कार्यवाह के साथ खंड से लेकर अ0भा0 स्तर तक शारीरिक, बौद्धिक, सेवा तथा व्यवस्था प्रमुखों की टोली होती है। जिले में एक प्रचार प्रमुख भी होता हैं ये सब परस्पर विचार-विमर्श से अपने क्षेत्र के कार्य को गति एवं स्थायित्व प्रदान करते हैं।

प्रचारकः संघकार्य के विस्तार में प्रचारकों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है। अनेक युवा स्वयंसेवक अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद 2-3 वर्ष का समय देते हैं। इन्हीं ही ‘प्रचारक‘ कहते हैं। इनको कोई वेतन आदि नहीं मिलता, पर योगक्षेम की न्यूनतम आवश्यकताएं संगठन पूर्ण करता है। सामान्यतः प्रचारक स्वयंसेवक-परिवारों में ही भोजन करते हैं, निर्धारित समय के बाद ये घर लौटकर सामान्य कामकाज में लग जाते हैं। प्रचारक अपनी कार्य-अवधि में अविवाहित रहते हैं। अब बड़ी संख्या में अवकाश प्राप्त ‘वानप्रस्थी‘ कार्यकर्ता‘ भी पूरा समय देकर काम करने लगे हैं।

आर्थिक व्यवस्था : 
संघकार्य के संचालन में होने वाले सम्पूर्ण व्यय का आधार ‘श्री गुरूदक्षिणा‘ है। वर्ष में एक बार सब स्वयंसेवक अपनी शाखा के अनुसार एकत्र होकर कुछ राशि भगवद्ध्वज के सम्मुख अर्पण करते हैं। यह राशि एक लिफाफे में रखकर अर्पण की जाती है, जिससे किसी के मन में हीनता या बड़प्पन का भाव उत्पन्न न हो। उस शाखा के तीन-चार प्रमुख कार्यकर्ता इसका हिसाब रखते हैं। संघ के कार्यक्रम, कार्यालय की व्यवस्था, प्रचारकों के प्रवास... आदि इससे पूरे होते हैं।

संघ और सेवाकार्यः
स्वयंसेवक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते समाजसेवा में स्वाभाविक रूप से लगे रहते हैं। गत 15-20 वर्ष से इन सेवाकार्य को व्यवस्थित रूप दिया गया है। हिन्दू समाज के उपेक्षित, वंचित एवं निर्धन वर्ग की सेवार्थ 50,000 से भी अधिक सेवाकेन्द्र चलाये जा रहे हैं। प्रतिवर्ष इनकी संख्या बढ़ रही है। इनके संचालन के लिए 'सेवा भारती' आदि अनेक पंजीकृत संस्थाएं हैं। शाखा के प्राप्त संस्कारों के कारण बाढ़, भूकम्प, तूफान, चक्रवात, दुर्घटना आदि प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं में स्वयंसेवक सेवाकार्य में सबसे आगे तथा सबसे देर तक लगे दिखायी देते हैं।

संघ और विविध कार्य :  स्वयंसेवकों में अपनी रूचि, प्रवृत्ति तथा सामाजिक आवश्यकता के अनुसार अनेक संगठन बनाये गये हैं। मजदूर-किसान, विद्यार्थी-नारी, धर्म-कला, शिक्षा-वनवासी, उपभोक्ता-सहकारिता, अर्थनीति-राजनीति, साहित्य-इतिहास...., अर्थात समाज के प्रायः सभी क्षेत्रों में स्वयंसेवक काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं तो इन क्षेत्रों में काम करने वाले अन्य संगठनों से वे बहुत आगे भी हैं। इनका संविधान, कार्यविधि, अर्थव्यवस्था, कार्यालय आदि अलग होते हैं, फिर भी वैचारिक आधर पर ये संघ से जुड़े रहते हैं।

संघ का विरोध क्यों : एक सामाजिक संगठन होने के बावजूद अनेक लोग इसका विरोध करते हैं। मुख्यतः यह विरोध कम्युनिस्टों तथा कांग्रेस की ओर से होता है। कम्युनिस्टों के विरोध का आधार तो स्पष्ट है। कांग्रेस ने 1947 के बाद चाहा कि संघ उसकी युवा शाखा बन जाये, पर संघ ने यह स्वीकार नहीं किया। तब से नेहरू जी संघ के विरोधी बने गये। दूसरी ओर संघ ने अपनी बहुआयामी गतिविधियों से धर्मान्तरण को काफी मात्रा में रोका है तथा जो हिन्दू किसी कारण से धर्मान्तरित हो गये थे, उन्हें वापस लाने की प्रक्रिया भी तेजी से चलायी है। ईसाई तथा मुस्लिम संस्थाएं इस कारण संघ को शत्रु मानती हैं।

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रत्नों का हमारे जीवन में महत्व तथा धारण के प्रभाव



आज के इस वैज्ञानिक युग में रत्नों के धारण के प्रभाव को सभी विद्वानों ने सर्वसहमति से मान लिया है। रत्न शब्द का अर्थ है अनुपम वस्तु। अर्थात् किसी विषय वस्तु या व्यक्ति को उनके गुणों के आधार पर हम रत्न शब्द से संबोधित करते है।
ज्योतिष की दृष्टि में पूरा सौरमण्डल सूर्य की अस्तित्व की वजह से माना गया है। इसलिये सभी ग्रह सूर्य को केन्द्र मानकर परिक्रमा कर रहे है। सूर्य , सात घोडो के रथ पर विद्यमान है। और ये सात घोडे सूर्य की किरणों में स्थित सात रंगो का प्रतिनिधित्व करते है। सौरमण्डल में स्थित ग्रह भी रंगो के प्रतीक है। सूर्य की किरणे जब पृथ्वी पर पडती है तो ग्रहो के प्रतीक रंगो का प्रभाव किरणो के द्वारा व रत्नों के माध्यम से हमारे षरीर पर पडता है। रत्नों में प्रकाश किरणो को अवशोषित करके परावर्तित करने की प्रबल शक्ति होती है। रत्नों का मूल्य प्रकाश किरणों के इस अवशोषण व परावर्तन की शक्ति के अनुसार होता है अर्थात रत्नों की गुणवत्ता जितनी अधिक होगी वह उतना ही अधिक मूल्यवान व प्रभावशाली होगा । रत्नों की कार्यप्रणाली व हमारे शरीर तथा व्यक्तित्व पर रत्नों का प्रभाव पडने का मुख्य कारण यही है कि हमारा शरीर पंचतत्वों (आकाश , पृथ्वी , जल , वायु एवं प्रकाश) से बना हुआ है और इसमें मुख्य रुप से सप्त चक्र (मूलाधार , स्वाधिष्ठान , मणिपुर , अनाहत , विशुद्धि , आज्ञा व सहस्त्र नार) विभाजित है। रत्नों के धारण करने से हमारे शरीर में पंचतत्वों व सप्तचक्रो के संतुलन में मदद मिलती है और इस प्रकार हमारा व्यक्तित्व बेहतर होता है तथा भविष्य में हम विशेष धनात्मक उर्जा के साथ सफलता पाते है।

हाथ में अॅंगूठी जड़कर जो रत्न पहना जाता है वह पांचो तत्वों को प्रभावित करता है। हमारे हाथ की पाॅच अंगुलियां पांच तत्वों की प्रतीक ही नहीं बल्कि इनका प्रत्यक्षतः संबंध है। अंगूठा आकाश तत्व , तर्जनी वायु तत्व , मध्यमा तैजस तत्व , अनामिका जल तत्व , कनिष्ठका पृथ्वी तत्व से संबंधित है। हाथ की दूसरी विशेषता यह है कि यह सारे शरीर से सम्पर्क में रहते है।अतः यह निष्कर्ष निकालना कि बुध ग्रह (जो पृथ्वी प्रधान है) का रत्न पन्ना कनिष्ठा में धारण करना युक्तियुक्त है। अपनी विभिन्न प्रकार की समस्याओं को दूर करने हेतु हम ज्योतिष शास्त्र का सहारा भी लेते है। इस शास्त्र में पूजा पाठ व विभ्न्नि प्रकार के टोने टोटके के अलावा रत्नों के माध्यम से भी हम समस्याओं का निराकरण कर सकते है। रत्नों का महत्व हमारे जन्मपत्री में स्थित ग्रहों की स्थिति के आधार पर देखा जाता है। अर्थात् व्यक्ति को कौन सा रत्न पहनना चाहिये यह जानना बहुत आवष्यक है। जन्मपत्री में कमजोर ग्रहों को बल देने के लिये विभिन्न राशियों के व्यक्तियों के लिये अलग - अलग रत्न महत्व रखते है।
रत्नों को पहनने के बाद उनका प्रभाव निम्न बातो पर निर्भर करता है।
1. सही रत्न का चुनाव
2 रत्नों की शुद्धता
3. सही वार व सही विधि द्वारा उचित अंगली में पहनने हेतु ज्ञान का होना।

मुख्य रुप से संस्थान की जिम्मेदारी होती है कि वो अपने ग्राहक को उचित सलाह व विस्तृत विधि का वर्णन करे व उचित रत्न दे। यदि आप दोषपूर्ण रत्न धारण करते है। व उचित विधि का पालन नहीं करते है तो रत्न का प्रभाव गलत पड सकता है। इसके अलावा यह जानना बहुत जरुरी है कि किसी भी प्रकार की पूजा या रत्नों के द्वारा समस्याओं के निराकरण का महत्व व सही प्रभाव तभी सामने आता है जब आप पूर्ण विश्वास व श्रद्धा रखते है।पूजा , रत्न , रुद्राक्ष , तन्त्र , मंत्र आदि सभी अपने-अपने क्षेत्र में उचित सफलता देने में सक्षम होते है बशर्ते कि आपने श्रद्धा व विश्वास के साथ उचित विधि विधान का ध्यान रखा है। यहा हम यह सलाह देना चाहेंगे कि अपनी समस्याओं के निराकरण के लिये तंत्र शास्त्र का प्रयोग जहा तक संभव हो न करे या बहुत सोच - समझकर किसी ज्ञानी तांत्रिक के मार्गदर्शन में ही करे।

रत्नों की उत्पति दो प्रकार से मानी गयी है, 1. खनिज रत्न व 2. जैविक रत्न

खनिज रत्न पृथ्वी के गर्भ में होने वाली रासायनिक क्रियाओं के फलस्वरुप उत्पन्न तत्वों से होते है। उदाहरण के लिये हीरा , माणिक , पन्ना , नीलम , पुखराज , गोमेद व लसुनिया। जैविक रत्न समुद्र मे स्थित जीवों के द्वारा उत्पन्न होते है। जैसे -मूंगा व मोती उपरोक्त 9 रत्नों के अलावा इन रत्नों के उपरत्न भी पाये जाते है। जिनका प्रभाव उनसे संबंधित राशियों के अनुसार पडता है। रत्नों को उनकी पारदर्शिता , चमक , रंग कठोरता के मापदण्ड के द्वारा परखा जाता है। कुछ रत्न या उपरत्न अपारदर्शी भी होते है।



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निबंध एवं जीवनी स्वामी विवेकानंद



स्वामी विवेकानंद हिंदी में (Swami Vivekananda In Hindi)
स्वामी विवेकानन्द भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, देशप्रेम और विश्व बंधुत्व की जीवंत प्रतिमा थे, जिन्होंने विश्व में गहन आध्यात्मिकता और मानव मूल्यों के भारतीय दर्शन की स्थापना की। युवा नरेन्द्र अपने गुरू स्वामी रामकृष्ण परमहंस की उस रहस्यमयी ऊर्जा के समन्वय थे, जा भारतीय ऋषियों ने युगों से विश्व विरासत की उदात्त भावना के परिपेक्ष्य में अपने शिष्यों को विरासत में दी है। ऊर्जा और अध्यात्म धर्म और समाज संस्कृति और समन्वय का ऐसा उदाहरण विश्व इतिहास में ही नहीं मिलता जो स्वामी जी के विराट व्यक्तित्व में समाहित रहा है। स्वामी विवेकानन्द के पिता श्री विश्वनाथ दत्त और दादा दुर्गाचरण दत्त थे। उनके पिता अंग्रेजी और फारसी भाषा के विद्वान थे। उन्हें बाइबिल और फारसी के कवि फाजिल के शेरों की बहुत अच्छी जानकारी थी। वह कलकत्ता के हाईकोर्ट में एक सफल बैरिस्टर थे। स्वामी विवेकानंद के बाबा फारसी और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे। वह 50 वर्ष की उम्र में सन्यासी हो गये थे। स्वामी विवेकानन्द अपने पिता की मृत्यु के कुछ दिन बाद ही रामकृष्ण परमहंस के शिष्य बन गये थे।
स्वामी विवेकानंद


स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ था। उनका बचपन का नाम नरेन्द्र था। नरेन्द्र की माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। वह बड़ी ही धार्मिक प्रवृत्ति की सद्गृहस्थ महिला थीं। वे अत्यन्त बुद्धिमान और तेजस्विनी थीं। वह बहुत जल्दी ही अपने संपर्क में आने वाले लोगों को प्रभावित कर देती थीं। उन्हें रामायण और महाभारत जैसे धार्मिक ग्रन्थों का अच्छा ज्ञान था। दोनों ग्रन्थ उन्होंने कंठस्थ ही कर रखे थे। नरेन्द्र को अंग्रेजी की प्रारंभिक शिक्षा अपनी मां से ही मिली। उन्होंने भी मां की तरह कई धार्मिक ग्रन्थों के प्रसंग याद कर रखे थे। वह घर पर ही ध्यान में तल्लीन हो जाते। एक दिन तो घर वालों ने कमरे का दरवाजा तोड़कर उन्हें जोर से हिलाया तब उनका ध्यान टूटा।

माता उनकी चंचलता देखकर कह उठतीं- मैंने शिवजी से पुत्र मांगा था, उन्होंने यह भूत भेज दिया। वही भूत आगे चलकर देश-विदेश में हिन्दू राष्ट्र और संस्कृति का कितना बड़ा नाम कर गया यह सारी दुनिया जानती है। उन्हें पशु-पंक्षियों और प्राकृतिक दृश्यों से बड़ा लगाव था। छह वर्ष की अवस्था में उन्हें पाठशाला भेजा गया। अगले वर्ष पंडित ईश्वर चन्द्र विद्यासागर द्वारा स्थापित मैट्रोपोलिटन इंस्टीट्यूट में प्रवेश दिलाया गया। वे हाजिर जबाब थे। उन्हें तलवारबाजी, लाठीचालन, कुश्ती, नौका और कई तरह के खेल पसन्द थे। पाक विद्या अर्थात् रसोई के कार्य में भी वे बड़ी रूचि लेते थे। सन् 1877 ई0 में वह कक्षा 3 के विद्यार्थी थे। पिता को किसी कार्यवश रायपुर जाना पड़ा। नरेन्द्र भी उनके साथ थे जिस कारण उनकी स्कूली शिक्षा बाधित हो गयी। दो वर्ष बाद वे कलकत्ता लौटे। उनकी कुशाग्र बुद्धि को देखते हुए ही उन्हें पुनः प्रवेश मिल सका लेकिन इससे भी बड़े आश्चर्य की बात थी कि उन्होंने तीन वर्ष का पाठ्यक्रम मात्र एक वर्ष में ही पूरा कर लिया। कालेज प्रवेश परीक्षा में वे विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण हुए। इस अवधि में उनकी ध्यान और साधना काफी बढ़ गई थी। उन्हें प्रेसीडेन्सी कालेज में प्रवेश मिला। वहां के प्रधानाचार्य डब्लूडब्लू हेस्टी ने एक बार कहा था- ’’मैंने सुदूर देशों का भ्रमण किया है लेकिन कहीं भी नरेेंद्र जैसा प्रतिभावान और संभावनाओं से भरा शिष्य नहीं देखा।

जान स्टुअर्ट मिल, ह्यूम और हर्बर्ट स्पेन्सर के अध्ययन से उनके विचारों में काफी बड़ा परिवर्तन आया। उन पर ब्रह्म समाज के नेता केशव चन्द्र सेन का बड़ा प्रभाव था। सत्य को जानने की तीव्र आकांक्षा से वे ब्रह्म समाजी नेता महर्षि देवेन्द्र नाथ ठाकुर के पास भी गये। जब उन्होंने देवेन्द्र नाथ ठाकुर से पूछा- क्या आपने ईश्वर को देखा है? यह सुनकर वे सकते में आ गये। उन्होंने नरेंद्र को रामकृष्ण परमहंस के पास भेजा। रामकृष्ण हुगली जिले के छोटे से गांव में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे और दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में पुजारी थे। उन्होंने कई धर्मों का ज्ञान प्राप्त किया था। नरेन्द्र ने अपने कालेज के प्रधानाचार्य विलियम हेस्टी से उनका उल्लेख सुना था। जब वह विलियम वर्डस्वर्थ की कविता का भावार्थ समझा रहे थे।
रामकृष्ण परमहंस नरेन्द्र से कुछ इस तरह मिले जैसे पूर्व परिचित हों और लम्बे अरसे से उनकी बाट देख रहे हों। रामकृष्ण से जब उन्होंने ईश्वर क¨ देखने की बात पूछी तो उन्होंने कहा- ’’ठीक ऐसे ही देखा है जैसे मैं तुझसे बात कर रहा हूं।’’ नरेन्द्र इस घटना के एक महीने बाद पुनः दक्षिणेश्वर आये तो रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें छू दिया। उनके स्पर्श मात्र से उनके अन्दर की अभिनव अनुभूति जाग गयी। फिर नरेन्द्र का हफ्ते-पन्द्रह दिन में आना-जाना होता रहा। इसी बीच, 1884 में नरेन्द्र के पिता की हृदयगति रुक जाने से मृत्यु हो गयी। छह-सात लोगों के भरण-पोषण का भार अब उन्हीं पर आ गया। पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने बीए की परीक्षा उत्तीर्ण की और लाॅ कालेज में प्रवेश लिया। अत्यन्त धनी बाप के बेटे को गरीब की तरह बिना जूते के मोटे कपड़े पहने भूखे पेट ही कालेज जाना पड़ता था। नरेन्द्र और रामकृष्ण की निकटता बढ़ती गयी।

1885 में रामकृष्ण परमहंस को गले का कैंसर हुआ। उन्हें श्याम पुकुर से काशीपुर के उद्यान भवन में लाया गया। एक दिन रामकृष्ण परमहंस ने उन्हें निर्देश दिया- मैं तेरे संरक्षण में इन लोगों को छोड़ता हूं। देखना मेरे चले जाने के बाद यह साधना-भजन छोड़कर कहीं घर वापस न जायें। 16 अगस्त 1886 को श्री रामकृष्ण ने महासमाधि ली। उसके बाद नरेन्द्र ने वराहनगर में रामकृष्ण संघ की स्थापना की जिसे बाद में रामकृष्ण मठ में बदल दिया गया। उन्होंने एक दिन विरजा होम संस्कार कर ब्रह्मचर्य और त्याग का व्रत लिया। 1888 तक वह वराहनगर में ही रहे उसके बाद कलकत्ता छोड़ वाराणसी, अयोध्या, लखनऊ, आगरा, वृन्दावन और हाथरस होकर हिमालय की यात्रा को चले गये। हाथरस रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर शरदचंद्र गुप्त से उनकी भेंट हुयी जिन्हें उन्होंने प्रथम शिष्य बनाया और सदानन्द नाम दिया। एक वर्ष के उपरान्त वह गाजीपुर में पवहारी बाबा से मिले। 1890 में वह वापस वराह नगर पहुंचे। उनके गुरुभाई स्वामी अखंण्डानन्द तभी तिब्बत यात्रा से लौटे थे।
फरवरी 1891 में स्वामीजी एकांगी हो गये और दो वर्ष तक परिव्राजक के रूप में भ्रमण करते रहे। इस बीच वह राजपूताने की यात्रा पर निकले और इसी दौरान अलवर के महाराजा मंगल सिंह से भी मिले। महाराजा मूर्ति पूजा पर विश्वास नहीं करते थे लेकिन स्वामी विवेकानन्द से हुयी वार्ता के बाद उनकी आंखें खुल गयीं। खेतड़ी के महाराजा उनसे पहले ही शिक्षा ले चुके थे। एक दिन संध्या को एक नर्तकी महाराज का मनोरंजन कर रही थी। महाराज ने स्वामी जी को भी आने का निमंत्रण दिया लेकिन उन्होंने आने से इन्कार कर दिया। यह सूचना जब नर्तकी को मिली तो वह सूरदास का एक पद गाने लगी- ’’प्रभु मेरे अवगुण चित न धरो’’। नर्तकी के भावपूर्ण स्वर सुनकर स्वामीजी बाहर निकल आये और उन्होंने कहा कि इस घटना ने मेरी आंखों से पर्दा हटा दिया है। हम सभी ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं। मैं किसी की निन्दा नहीं कर सकता। वे खेतड़ी महाराज के साथ जयपुर गये अ©र फिर राजपूताना होते हुए बम्बई और दक्षिण भारत की यात्रा की। वह 23 दिसम्बर 1892 को कन्याकुमारी पहुंचे। वहां वह तीन दिन तक सुदीर्घ और गंभीर समाधि में रहे।

वहां से वापस लौटकर स्वामीजी आबू रोड़ में अपने गुरुभाई स्वामी ब्रह्मानन्द और स्वामी तूर्यानन्द से मिले। उन्होंने उन दोनों से कहा- ’’मैं सारे भारत में घूमा हूं। देश की दरिद्रता और दुखों को देखकर मेरे आंसू नहीं रुक पाते। अब मैं इनकी मुक्ति के लिये अमेरिका जा रहा हूं। इकत्तीस मई 1893 को वह बम्बई से अमेरिका के लिये रवाना हुये। उन्होंने लंका, पनामा, सिंगापुर, हांगकांग, कैन्टान, नागाशाकी, ओसाका, क्योटो, टोक्यो, योकोहामा होते हुए जुलाई के अन्त में शिकागो पहुंचे। उन्होंने रास्ते में चीन और जापान के मंदिरों में भारत के धार्मिक प्रभावों के अवशेष देखे। चीन में संस्कृत पाण्डुलिपि देखकर वह आश्चर्यचकित थे, जापान में उन्हें बंग्ला लिपि में संस्कृत मंत्रों को देखकर अचरज हुआ। शिकागो पहुंचने के कुछ दिन पश्चात् उन्होंने विश्व धर्म मेले के सूचना विभाग में सम्पर्क किया तो पता चला कि सितम्बर के प्रथम सप्ताह में धर्म सम्मेलन शुरू होगा। उसमें हिस्सा लेने के लिए समुचित परिचय पत्र होना आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति उस सम्मेलन में ऐसे ही शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने मद्रास के एक मित्र को तार भेजकर सहायता की मांग की लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
शिकागो की अपेक्षा बोस्टन कम खर्चीला था इसलिए स्वामी विवेकानन्द बोस्टन के लिए रवाना हुए। रास्ते में उनकी भेंट अमेरिकन महिला से हुयी जिसने उन्हें अपने घर रहने का निमन्त्रण दिया। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में यूनानी विभाग के प्रोफेसर जेएच राइट का परिचय दिया। श्री राइट का एक मित्र डा. बोरोज धर्म संसद प्रतिनिधि चयन समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने एक पत्र देकर स्वामीजी को उनके पास भेजा। उन्होंने पत्र में लिखा-’’यह एक ऐसा मनुष्य है जो हमारे सब प्रोफेसरों को मिला देने पर उनसे कहीं अधिक विद्वान है।’’ उन्होंने स्वामी जी को शिकागो का टिकट भी खरीदकर दिया। जब वह शिकागो पहुंचे तो समिति का पता उनके हाथ से खो गया। वे थक कर चकनाचूर हो गये। इस हताशा के क्षण में श्रीमती जार्ज डब्लू ह्वेल से उनका परिचय हुआ। ह्वेल ने स्वामीजी को धर्म महासभा के कार्यालय में पहुंचाया। उन्हें प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार कर लिया गया। स्वामीजी धर्म सम्मेलन के प्रतिनिधियों के साथ ठहरा दिये गये।

कोलम्बस हाल में 11 सितम्बर 1893 को धर्म संसद आरम्भ हुयी उसमें 120 करोड़ मानवों के धार्मिक विश्वासों के प्रतिनिधि विराजमान थे। रोमन कैथोलिक चर्च के सर्वोच्च धार्मिक नेता कार्डीनल गिब्बन्स के दोनों ओर प्रतिनिधियों को बैठाया गया जिनमें प्रताप चन्द्र मजूमदार, बम्बई से ब्रह्म समाज के प्रतिनिधि नगरकर, लंका के बौद्ध प्रतिनिधि धर्मपाल, जैनियों के प्रतिनिधि महात्मा गांधी, श्रीमती ऐनी बीसेन्ट के साथ श्री चक्रवर्ती थियोसाॅफिकल सोसाइटी के प्रतिनिधि थे। उन्हीं के बीच स्वामी विवेकानन्द भी शामिल हुए। तीसरे पहर स्वामी विवेकानन्द को अध्यक्ष के जोर देने पर खड़ा होना पड़ा। उन्होंने बोलना प्रारम्भ किया- ’’अमेरिका निवासी बहनो और भाइयो!’’ इसके बाद स्वामी विवेकानन्द बोल न सके। समूचा सभास्थल तालियों से गडगडा उठा। स्वामी विवेकानन्द के सम्बोधन पर सभी श्रोता मन्त्रमुग्ध थे। उनसे पूर्व इतना हृदयस्पर्शी सम्बोधन कोई धर्म प्रतिनिधि नहीं दे सका था। देर तक सभा स्थल हर्षोल्लास से भरा हुआ था। लगभग पांच मिनट तक स्वामी विवेकानन्द ने बोलने की कोशिश की लेकिन खुशी के शोर में उनकी आवाज कोई सुन न सका।
Swami Vivekananda
स्वामी जी ने विश्व के युवाओं को सहिष्णुता की शिक्षा दी। उन्होंने दो श्लोकों का उद्धरण देते हुए कहा कि यदि कभी कोई सार्वभौमिक धर्म होना है तो वह किसी देश-काल की सीमा में नहीं रह सकता। वह उस असीम ईश्वर के सदृश ही असीम होगा जिसका उपदेश सूर्य, कृष्ण, ईसा और दूसरे धर्मगुरुओं ने समय-समय पर दिया है। उन्होंने अन्त में शुद्धता, पवित्रता, दयाशीलता, उन्नत चरित्र तथा गरीबों और असहायों पर दया की शिक्षा दी। अमेरिका के समाचार पत्रों में स्वामी विवेकानन्द पूरी तरह से छा गये थे। किसी समाचार पत्र ने उन्हें मशीहा तो किसी ने उन्हें ऋषि की संज्ञा दी। दि न्यूयार्क हेरल्ड ने ‘धर्म महासभा के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति‘ की संज्ञा दी। उसने लिखा- ऐसे ज्ञानी देश में मिशनरियों को भेजना कितनी मूर्खता की बात है।

स्वामी विवेकानन्द की सफलता के समाचार शीघ्र ही भारत के सभी शहरों में पहुंच गये। मद्रास से अल्मोड़ा, कलकत्ता से बम्बई, सभी भारतीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने स्वामी विवेकानन्द की सफलता की चर्चा की। वराह नगर रामकृष्ण मठ के सन्यासियों को भी यह समाचार मिला तो उनके आनन्द की सीमा न रही। इस धर्म सम्मेलन के बाद स्वामीजी अमेरिका के विभिन्न विद्यापीठों, संस्कृति केन्द्रों के प्रवास पर गये। उन्होंने ब्रूकलिन एथिकल एसोसिएशन के निमंत्रण पर आध्यात्मिक प्रकाश का मार्गदर्शन किया। जिज्ञासुओं को राजयोग और ज्ञानयोग का अभ्यास कराया। वह यूरोप और जर्मनी की यात्राओं पर भी गये जहां उन्होंने कई केन्द्र स्थापित कर अपने वेदान्त आन्दोलन का आरम्भ किया। 1895 में वह इंग्लैण्ड गये और लगभग डेढ़ वर्ष यूरोपीय संस्कृति के केन्द्र पेरिस में अजायबघर, गिरजाघर, केथेड्रल, आर्ट गैलरी और कला सम्पदा देखकर खूब मुग्ध हुए।

लंदन में उनकी भेंट मार्गेट नोबल से हुयी जो बाद में भगिनी निवेदिता के नाम से प्रसिद्ध हुयीं। स्वामीजी ने अपने गुरुभाई स्वामी शारदानन्द को लन्दन का काम सौंपकर पुनः अमेरिका का रुख किया जिन्हें बाद में न्यूयार्क बुला लिया गया था। 30 दिसम्बर 1896 को स्वामी जी स्वदेश के लिए रवाना हुए। लगभग 15 दिन बाद वह लंका के समुद्रतट पर पहुंचे। कोलम्बो पहुंचने पर धार्मिक स्त्रोतों, ध्वजाओं और पताकाओं के साथ जयघोष से उनका स्वागत किया गया। वे वहां 10 दिन रहे। फिर वे मद्रास पहुंचे जहां उनका बड़े धर्मगुरू की तरह स्वागत किया गया। उन्होंने वहीं विश्व के युवाओं का आह्वान किया - ’’उठो, जागो और ध्येय की प्राप्ति तक रुको मत। आत्मा अनन्त, सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ है। यदि सारी दुनिया हाथ में नंगी तलवार लेकर तुम्हारे विरोध में खड़ी हो जाये तो भी तुम जिसे सत्य समझते हो, उसे पूरा करने का साहस करो।’’ 28 फरवरी 1897 को वराहनगर रामकृष्ण मठ की ओर से स्वामी विवेकानन्द का अभिनन्दन किया गया जिसकी अध्यक्षता राजा विनय कृष्ण देव बहादुर ने की।

स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवनकाल में वेलूर मठ की स्थापना के अलावा अमरनाथ, अल्मोड़ा जैसे सुदूर हिमालय क्षेत्रों की यात्राएं भी कीं। वह दूसरी विदेश यात्रा पर 20 जून 1899 को रवाना हुए। अमेरिका में स्वामी तूर्यानन्द को ले जाकर वहां के कार्य को पुनः गति प्रदान की। वे न्यूयार्क के निकट मांट क्लेयर में रूक गये। स्वामी विवेकानन्द ने केलीफोर्निया, सान फ्रान्सिस्को, ओकलैण्ड, अलॅमेडा आदि स्थानों पर नये केन्द्र खोले। जुलाई 1900 में वे पेरिस पहुंचे जहां कांग्रेस आॅफ दि हिस्ट्री रिलीजन्स में शामिल हुए। लगभग तीन महीने पेरिस में रहकर विएना, कुस्तुन्तुनिया, एथेन्स और  मिस्र होते हुए वे दिसम्बर में मातृभूमि वापस आ गये। सन् 1901 में वह पूर्वी बंगाल और असम की तीर्थयात्रा पर गये। अगले वर्ष उन्होंने बनारस की यात्रा की। स्वामी विवेकानन्द ने 39 वर्ष की अवस्था में देहत्याग कर दिया।

स्वामी विवेकानंद पर अन्य लेख और जानकारियां 


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बाल शहीद वीर हकीकत राय दे दी जान पर धर्म नहीं छोड़ा



जिन दिनों श्री गुरू हरि राय साहब स्यालकोट (पँजाब) पहुँचे, वहाँ भाई नंदलाल क्षेत्री गलोटियां खुरद क्षेत्रों में निवास करते थे। उन्हाेंने गुरूदेव का भव्य स्वागत किया और उनसे सिक्खी धरण की । इनके सुपुत्रा श्री बाघमल जी, स्थानीय हुक्मरान अमीर बेग के पास एक अधिकारी के रूप में कार्यरत हुए, आगामी समय में श्री बाघमल की सुपत्नि श्रीमती गौरा जी ने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम हकीकत राय रखा गया। हकीकत राय बहुत प्रतिभाशाली और साहसी युवक निकला। इसकी माता ने इसे सिक्ख गुरूजनों के जीवन वृतान्त सुना-सुना कर आत्मगौरव से जीना सीखा दिया था। सिक्खी तो घर में थी परन्तु पंजाब सरकार के सिक्ख विरोधी अभियानों के कारणहकीकत राय केश धरण न कर सका। इसके पीछे राजनीतिक दबाव अथवा सामाजिक विवशता थी परन्तु उसका मन सदैव गुरू चरणों से जुड़ा रहता था। इस परिवार में सिक्खी के वातावरण को देखते हुए बटाला नगर जिला गुरदासपुर के निवासी सरदार किशन सिंह जी ने अपनी सुपुत्राी का विवाह हकीकत राय से कर दिया । उन दिनों केशधरी युवक दल खालसा के सदस्य बन चुके थे अथवा शहीद कर दिये गये थे। अतः विवशता के कारण सरदार किशन सिंह जी ने हकीकत राय को अपनी सुपुत्राी के लिए उचित वर समझा।
बाल शहीद वीर हकीकत राय दे दी जानपर धर्म नहीं छोड़ा
बाल शहीद वीर हकीकत राय दे दी जानपर धर्म नहीं छोड़ा
हकीकत राय का जन्म सन् 1724 ईस्वी में हुआ था। इन्हें इनके पिता बाघमल जी ने उच्च शिक्षा दिलवाने के विचार से, सन् 1741 में मौलवी अब्दुल हक के मदरसे में भेज दिया । वहाँ हकीकत राय अपने सहपाठियों से बहुत मिलजुल कर शिक्षा ग्रहण करते थे, वैसे भी बहुत नम्र स्वभाव और मधुर भाषी होने के कारण लोकप्रिय थे। परन्तु एक दिन ‘भइया दूज के दिन’ वह अपने माथे पर तिलक लगवा कर मदरसे पहुँच गये। मुसलमान विद्यार्थियों ने उनकी खिल्ली उड़ाई और बहुत अभद्र व्यंग्य किये। इस पर हकीकत राय ने बहुत तर्कसंगत उत्तर दिये। जिसे सुनकर सभी विद्यार्थी निरूत्तर हो गये । परन्तु बहुमत मुसलमान विद्यार्थियों का था। अतः वे हिन्दू विद्यार्थी से नीचा नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने हीनभावना के कारण मौलवी को बीच में घसीटा और इस्लाम का पक्ष प्रस्तुत करने को कहा - मौलवी ने एक विचार गोष्ठि का आयोजन कर दिया। दोनों पक्षों में जम कर बहस हुई और एक दूसरों की त्राुटियों को लक्ष्य बना कर आरोप लगाए गये, इन खामियों के कारण बात लांछन तक पहुँच गई। मुस्लिम विद्यार्थियों का पक्ष बहुत कमजोर रहा। वे पराजित हो गये परन्तु उनके स्वाभिमान को बहुत ठेस पहुँची, अतः वे हठध्र्मी करने लगे कि हकीकत राय उनसे माफी माँगे परन्तु हकीकत राय ने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया। इस पर मुस्लिम विद्यार्थियों ने दबाव बनाने के लिए अपनी अपनी पगडि़यां उतार कर मौलवी के समक्ष रख दी और कहा - हकीकत राय को पैगम्बरों के अपमान करने का दण्ड मिलना चाहिए। हकीकत राय का तर्क था कि मैंने कोई झूठ नहीं कहा और मैंने कोई अपराध नहीं किया जो सत्य था, उसकी ही व्याख्या की है। यह बातें सभी को स्वीकार करनी चाहिए। इस पर मौलवी भी दुविधा में पड़ गया, उसने मुस्लिम विद्यार्थियों के दबाव में इस कांड का निर्णय करने के लिए शाही काज़ी के सम्मुख प्रस्तुत किया।
शाही काज़ी ने घटनाक्रम को जाँचा तो वह आग बबूला हो गया। उसका विचार था जब हम सत्ता में हैं तो इन हिन्दू लोगों कि यह हिम्मत कि हमारे पैगम्बरों पर लांछन लगाये। अतः उसने हकीकत राय को गिरफ्रतार करवा कर कारावास में डलवा दिया और उस पर दबाव बनाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले। परन्तु हकीकत राय किसी और मिट्टी का बना हुआ था, वह अपने विश्वास से टस से मस नहीं हुआ। स्थानीय प्रशासक अमीर बेग तक जब यह बात पहुँची तो उसने विद्यार्थियों का मन-मुटाव कह कर हकीकत राय को हरजाना (आर्थिक दण्ड) लगाकर छोड़ने का आदेश दिया परन्तु शाही मौलवी ने उसे इस न्याय के लिए लाहौर भेज दिया।
उन दिनों लाहौर के घर घर शहीद मनी सिंह, महताब सिंह, बोता सिंह, गरर्जा सिंह इत्यादि की ध्र्म प्रति निष्ठा और उनके बलिदान की चर्चाएं हो रही थी। ऐसे में हकीकत राय के मन में ध्र्म के प्रति आत्म बलिदान देने की इच्छा बलवती हो गई। घर से चलते समय उसकी माता औरपत्नि ने उन्हें विशेष रूप से प्रेरित किया कि ध्र्म के प्रति सजग रहना है, पीठ नहीं दिखानी है और गुरूदेव के आदेशों से बेमुख नहीं होना, भले ही अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े।
लाहौर के शाही काज़ी के पास जब यह मुकद्दमा पहुँचा तो उसने भी स्यालकोट के काज़ी का ज्यों का त्यों फैसला रखा, उसने कह दिया कि पैगम्बर साहब की शान में गुस्ताखी (अवज्ञा) करने वाले को इस्लाम कबूलना होगा, नहीं तो मृत्यु दण्ड निश्चित ही है। इस पर लाहौर नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति दीवान सूरत सिंह, लाला दरगाही मल्ल तथा जमांदार कसूर बेग इत्यादि लोगों ने राज्यपाल जक्रिया खान से कहा कि वह हकीकत राय को छोड़ दे परन्तु वह उन दिनों काजि़यों के चक्र में फँस कर हठध्र्मी पर अड़ा हुआ था, अतः उसने किसी की भी सिफारिश नहीं मानी और इस्लाम कबूल करने अथवा मृत्यु दण्ड का आदेश बरकरार रखा।
उन दिनों कई केशाधरी सिक्ख कैदी भी मृत्यु दण्ड की प्रतीक्षा में जक्रिया खान की जेलों में बन्द पड़े थे। उनसे प्रेरणा पाकर हकीकत राय का मनोबल बढ़ता ही चला गया, वह मृत्यु दण्ड का समाचार सुनकर भेड़ों की तरह भयभीत होकर भैं-भैं न करके शेरों की तरह गर्जना करने लगा । 
इस प्रकार वीर योद्धा 18 वर्षीय हकीकत राय को सन् 1742 ईस्वी की बसन्त पंचमी वाले दिन लाहौर के नरवास चैक में तलवार के एक झटके से शहीद कर दिया गया। 
जब इस निर्दोष युवक की हत्या की सूचना दल खालसा में पहुँची तो उनहोंने सभी अपराधियों की सूची तैयार कर ली और समय मिलते ही स्यालकोट पहुँचकर छापामार युद्ध कला से उन दोषियों को चुन चुन कर मौत के घाट उतार दिया ।



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राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग - सर्वोच्च न्यायलय या संसद



न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता की बात करती है और कहती है कि उसके आलावा अगर जजों की नियुक्ति कोई और संस्था करेगी तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होगा. आखिर लोकतंत्र में सर्वोच्च कौन है? जनता द्वारा चुनी गयी संसद अथवा संसद द्वारा बनाये गए सविधान से न्यायपालिका. न्यायपालिका स्वयं अपने हितों के लिए "उत्कृष्ठ और निष्पक्ष जज" कैसे साबित हो सकती है? जब न्यायपालिका में बैठे लोगो के हित स्वयं इस मामले में निहित है तो न्यायपालिका कैसे स्वतंत्र हो कर फैसला दे सकती है?

किसी भी संविधान संसोधन को तब तक असवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता जबकि वह संशोधन संविधान की प्रस्तावना या जनता को प्राप्त मूल अधिकार का अतिक्रमण न करता हो. राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग किसी भी प्रकार से जनता के मूलअधिकार को छेड़ नहीं रहा था और न ही संविधान की प्रस्तावना के.. सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान फैसला सिर्फ न्यायपालिका के अपने हितों के संरक्षण करने का उपबंध मात्र है..

हर व्यक्ति अपने मामले में सर्वश्रेष्ठ न्यायधीश होता है उसी प्रकार न्यायपलिका ने साबित कर दिया कि वह अपने मामले में सर्वश्रेष्ठ जज है. न्यायपलिका को अब न लोकतंत्र की चिंता है और न ही संविधान की और न ही संसद की, सर्वविदित है कि अपने हितों की रक्षा में आदमी अँधा हो कर काम करता है उससे इन्साफ की उम्मीद नहीं कर सकते है..


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प्रथम सूचना रिपोर्ट/देहाती नालिशी, गिरफ्तारी और जमानत के सम्बन्ध में नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य



1. अपराध तथा प्रथम सूचना रिपोर्ट/देहाती नालिशी:- जब कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जो कानून द्वारा दण्डनीय हो तो यह कहा जाता है कि उस व्यक्ति ने ‘‘अपराध’’ किया है । दण् प्रक्रिया संहिता में अपराधों को दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है । ‘‘संज्ञेय अपराध’’ और ‘‘असंज्ञेय अपराध’’ । असंज्ञेय अपराध से तात्पर्य ऐसे अपराधों से हे जिसमें पुलिस किसी भी अपराधी को बिना वारण्ट के गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं रखती। किसी संज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को विवेचना करने के आदेश देने का ऐसा अपराध भी संज्ञेय अपराध की परिधि में आ जाता है किन्तु पुलिस द्वारा बिना वारण्ट गिरफ्तारी पर प्रतिबंध बना रहता है । सामान्यतया पुलिस द्वारा विवेचना के पहले अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट लेखबद्ध की जाती है । प्रथम सूचना रिपोर्ट देहाती नालिशी का आशय उस सूचना से है जो किसी पुलिस थाने पर या थाने के अलावा मौके पर किसी पुलिस अधिकारी या लोक सेवक के माध्यम से अपराध कारित होने के संबंध में सबसे पहले प्राप्त होती है । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 में संज्ञेय तथा धारा 155 में असंज्ञेय अपराध के विषय में प्रथम सूचना रिपोर्ट लेखबद्ध करने का प्रावधान है । संज्ञेय अपराध के संबंध में किसी भी व्यक्ति द्वारा संबंधित थाने के भार साधक अधिकारी को मौखिक या लिखित सूचना दी जाती है । मौखिक सूचना प्राप्त होने पर थाने के भार साधक अधिकारी द्वारा स्वयं या अपने निर्देशाधीन किसी भी अधिकारी द्वारा सूचना को निर्धारित प्रपत्र पर लेखबद्ध करना अनिवार्य है । लिखित सूचना प्राप्त होने पर प्रथम सूचना रिपोर्ट का आधार लिखित सूचना होती है । प्रथम सूचना रिपोर्ट लेखबद्ध करने के बाद सूचना देने वाले को पढ़कर सुनाया जाना चाहिए तथा उस पर सूचना देने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर या निशान अंगूठा लिया जाना चाहिए । प्रथम सूचना रिपोर्ट की एक प्रतिलिपि सूचना देने वाले व्यक्ति को तत्काल निःशुल्क दिया जाना आवश्यक है । किसी मामले में भारसाधक अधिकारी द्वारा सूचना लिखने से इन्कार करने की दशा में व्यथित व्यक्ति द्वारा सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा सम्बद्ध पुलिस अधीक्षक को भेजा जा सकता है । संज्ञेय अपराध होने का समाधार होने पर पुलिस अधिकारी द्वारा स्वयं विवेचना की जा सकती है या अपने किसी अधीनस्थ पुलिस अधिकारी के माध्यम से विवेचना कराई जा सकती है तथा इस प्रकार अधिकृत विवेचना करने वाले पुलिस अधिकारी को भी पुलिस थाने में भारसाधक अधिकारी की सभी शक्तियां प्राप्त हो जाती है ।

असंज्ञेय अपराध के विषय में भी सूचना प्राप्त होने पर थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा प्राप्त सूचना के सार को प्रथम सूचना रिपोर्ट के निर्धारित फार्म पर लेखबद्ध किया जाता है तथा सूचना देने वाले को मजिस्ट्रेट के न्यायालय में कार्यवाही करने को निर्देशित किया जाता है । असंज्ञेय अपराध में पुलिस को विवेचना का अधिकार नहीं होता किन्तु मजिस्ट्रेट द्वारा विवेचना का आदेश दिये जाने पर पुलिस का विवेचना करने का अधिकार (वारण्ट के बिना गिरफ्तार करने की शक्ति के सिवाय) हो जाता है ।

प्रथम सूचना निपोर्ट से दो या अधिक अपराध बनने की दशा में, जिनमें कम से कम एक अपराध संज्ञेय हो, पुलिस को असंज्ञेय अपराधों में भी विवेचना का अधिकार हो जाता है । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 190(1)(क) में मजिस्ट्रेट को परिवार के आधार पर प्रसंज्ञान लेने का प्रावधान है किन्तु मजिस्ट्रेट द्वारा प्रसंज्ञान न लेकर, पुलिस को विवेचना के लिए आदेशित करने की दशा में पुलिस को विवेचना का अधिकार प्राप्त हो जाता है ।

यदि अपराध दर्ज होने के उपरान्त विवेचना अधिकारी द्वारा मामले में विवेचना उचित ढंग से नहीं किये जाने पर फरियादी या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3), 159, 190 के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष विवेचना अधिकारी का उचित रूप से विवेचना करने हेतु निर्देश देने के लिए आवेदन दे सकेगा ।

अपराधिक मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दोष सिद्ध करने के लिए साक्ष्य का आधार होती है अतः प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाते समय ध्यान रखना आवश्यक हे कि उसमें घटना का सही समय, स्थान तथा घटना के सही तथ्य लिखाएं जाएं अन्यथा विवेचना तथा विचारण के साक्ष्य में विरोधाभास हो जाता है जिसका लाभ अपराध करने वालों को मिलता है तथा सही अपराधी भी दोष मुक्त हो जाते हैं। अपराध होने के बाद जितना शीघ्र ही पुलिस को सूचना दी जानी चाहिए । विलम्ब से सूचना देने पर अभियुक्त द्वारा प्रायः तर्क दिया जाता है कि सूचना सोच विचार करके तथा तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर लिखायी गयी है ।

2. आम जनता का पुलिस को अपराध की सूचना देना एवं सहायता करने का कर्तव्य :- जहां कानून में अपराधियों को पकड़ने तथा दण्ड दिलवाने का कर्तव्य पुलिस का है वहां कुछ परिस्थितियों में जनता भी पुलिस की सहायता करने को बाध्य है। जनता द्वारा पुलिस को सहायता से इंकार करने पर कानूनी कार्यवाही की जा सकती है । निम्न परिस्थितियों में प्रत्येक नागरिक पुलिस की सहायता करने को बाध्य है:-

(क) उस व्यक्ति को पकड़कर ले जाने या पकड़ने में भगाने से रोकने में जिस पुलिस अधिकारी गिरफ्तार करने के लिए अधिकृत है ।

(ख) शान्ति भंग को दबाने या रोकने में, रेल्वे, नहर, टेलीग्राफ या अन्य सार्वजनिक संपत्ति को होने वाले नुकसान को रोकने में ।

अपराधियों की सूचना पुलिस को सही समय पर न मिलने पर संबंधित महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट हो जाता है तथा अपराधी कानूनी दायित्वों से बच जाते हैं अतः जनता से यह अपेक्षा की गई है कि कुछ विशेष अपराध जो गम्भीर प्रकृति के होते हैं उनकी जानकारी होने पर अविलम्ब निकटतम पुलिस स्टेशन को सूचित करें ।

3. पुलिस को बिना वारन्ट गिरफ्तार करने का अधिकार -कानून में पुलिस द्वारा किसी भी व्यक्ति को निम्नलिखित स्थितियों में बिना वारण्ट गिरफ्तार करने का अधिकार है.

(क) यदि वह व्यक्ति किसी संज्ञेय अपराध से संबंधित है, या उसके विरूद्ध संज्ञेय अपराध करने के विश्वसनीय संदेह, परिवाद या सूचना प्राप्त हो या किए जाने की शिकायत है ।
(ख) यदि उसके आधिपत्य में गृह भेदन के औजार पाए जाते हैं ।
(ग) यदि उसके कब्जे से चोरी की संपत्ति पाई जाती है ।
(घ) यदि वह उद्घोषित अपराधी है ।
(ड.) यदि वह किसी पुलिस अधिकारी को उसके कत्र्तव्य पालन में अवरोध उत्पन्न करता है ।
(च) यदि वह वैधानिक हिरासत से भागता है ।
(छ) यदि वह जल, थल या वायु सेना का भगोड़ा हे ।
(ज) यदि वह भारत के बाहर है और कोई ऐसा अपराध करता है जो यदि भारत में किया गया होता तो अपराध के रूप में दण्डनीय होता या किसी प्रत्यावर्तित कानून या कानून के अंतर्गत दण्डनीय होता ।
(झ) यदि उसके द्वारा संज्ञेय अपराध की तैयारी करने का संदेह है ।
(य) यदि वह सजा पाने के उपरान्त न्यायालय द्वारा लगाये गये किसी प्रतिबन्ध को तोड़ता है ।
(र) यदि वह आदतन अपराधी हो ।
(ल) यदि वह असंज्ञेय अपराध करने के बाद पुलिस को अपना नाम पता न बताता हो या गलत बताता है ।

जहां पर अपराध उपरोक्त प्रकृति के नहीं है अर्थात असंज्ञेय अपराध है तो पुलिस को अपराधी को गिरफ्तार करने से पहले मजिस्ट्रेट से गिरफ्तारी वारण्ट प्राप्त करना आवश्यक है । जब तक उस अपराधी को गिरफ्तारी वारण्ट नहीं दिखाया जाता पुलिस को यह अधिकार नहीं है कि वह असंज्ञेय अपराध करने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर सके । किसी-किसी कानून में पुलिस के अलावा अन्य अधिकारियों को भी गिरफ्तार करने की शक्ति दी हुई है । यदि ऐसे अधिकारियों द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके थाने पर लाया जाता है तो ऐसे व्यक्ति को पुलिस द्वारा पुनः गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना होता है ।

गिरफ्तारी वारण्ट मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा जारी किया जाता है जिसमें पुलिस अधिकारी को यह आदेश दिया जाता है कि वह अपराधी जिसका नाम तािा पूर्ण पता और अपराध का विवरण लिखा होता है, को गिरफ्तार करके न्यायालय में पेश करें । पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को वारण्ट के विषय में बताए तथा यदि वह वारण्ट की मांग करता है तो उसको वारण्ट दिखाए ।

4. पुलिस द्वारा गिरफ्तारी किस प्रकार की जाएगी :जब किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाएगा तो उसके प्रति बल प्रयोग नहीं किया जा सकता परन्तु यदि कोई व्यक्ति गिरफ्तार किए जाने के प्रयास का प्रतिरोध करता है अथवा गिरफ्तारी से बचने का प्रयत्न करता है तो ऐसी दशा में पुलिस अधिकारी उसे आवश्यक बल प्रयोग करके गिरफ्तार कर सकता है । किन्तु किसी भी दशा में बल प्रयोग करके उसकी मृत्यु कारित नहीं कर सकता जब तक कि व्यक्ति ने आजीवन केद या मृत्यु दण्ड से दण्डित होने वाला अपराध नहीं किया है दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 46 में गिरफ्तारी किस प्रकार की जाएगी, का उल्लेख किया गया है । गिरफ्तार किये जाने वाले व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करके या उसे परिरूद्ध करके गिरफ्तारी की जाएगी जब तक वह स्वतः अपने व्यवहार या शब्दों से अपने को अभिरक्षा में समर्पित न कर दे । यह आवश्यक नहीं है कि उसको पकड़कर हथकड़ी या रस्सी बंाधी जाए तभी उसकी गिरफ्तारी समझी जायेगी । न्यायालय द्वारा यह व्यवस्था दी गई कि यदि गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति शतिर किस्म का अपराधी है या उसका हिरासत से भाग जाने का डर नहीं है तो उसको हथकड़ी नहीं लगानी चाहिए । इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी भी दशा में गिरफ्तार व्यक्ति को अनावश्यक रूप से परेशान नहीं किया जाए । यदि गिरफ्तार किया गया व्यक्ति अपने करीबी या हितैषी या वकील से सम्पर्क करना चाहता है तो उसको अवसर भी दिया जाना चाहिए । गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को अपराधी के छिपने वाले स्थान की तलाशी का भी अधिकार है ।

5. जनता द्वारा अपराधी को गिरफ्तार करने का अधिकार:- पुलिस का यह प्रमुख कर्तव्य है कि वह चैकसी बरते और अपराधियों को पकड़कर उनको दण्ड दिलवाए । परन्तु यह बात सच है कि पुलिस प्रत्येक स्थान पर हमेशा उपलब्ध नहीं रह सकती । अपराधी भी पुलिस की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर अपराध करने का मौका ढूंढ़ते हैं इसलिए जनता का भी यह कर्तव्य है कि किसी अपराधी को पकड़ने में सक्रिय सहयोग दे और केवल मूक दर्शक न रहें । कानून में आम जनता से भी यह अपेक्षा की गई है कि वह अपराध की रोकथाम करने के लिए अपराधियों को पकड़वाने में पुलिस की मदद करें । इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कानून में आम जनता को भी अपराधियों को गिरफ्तार करने का अधिकार दिया गया है । धारा 43 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत जनता का कोई भी व्यक्ति, कुछ विशेष परिस्थितियों में, जिसका विवरण नीचे दिया गया है किसी भी अपराध करने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है ।

यदि अपराध करने वाले व्यक्ति ने उसकी उपस्थिति में ऐसा अपराध किया है जिसकी प्रकृति अजमानतीय है अर्थात् जिस अपराध में जमानत अधिकार के रूप में प्राप्त नहीं की जा सकती, तथा जो अपराध किया गया है वह संज्ञेय अपराध है जिसका अर्थ यह है कि पुलिस की उपस्थिति में यदि वह अपराध किया जाता तो पुलिस अधिकारी भी उस व्यक्ति को बिना वारण्ट के गिरफ्तार कर सकती, इसके अतिरिक्त अपराध करने वाला व्यक्ति यदि घोषित अपराधी है तो ऐसे अपराधी को भी जनता द्वारा गिरफ्तार किये जाने का अधिकार है । उपरोक्त परिस्थितियों में आम जनता द्वारा किसी अपराधी को गिरफ्तार करने के बाद बिना अनुचित विलम्ब में पुलिस अधिकारी को सौंप देना अनिवार्य है और यदि कोई पुलिस अधिकारी उपलब्ध नहीं है तो गिरफ्तार शुदा व्यक्ति को अविलम्ब निकटतम थाने में ले जाकर सुपुर्द करने का विधान हे ।

6. गिरफ्तारी वारण्ट कैसा होना चाहिए : गिरफ्तारी के वारण्ट के संबंध में यह प्रावधान है कि वारण्ट लिखित रूप में न्यायालय द्वारा जारी किया जाए जिसमें कि मजिस्ट्रेट/पीठासीन अधिकारी के हस्ताक्षर हों और न्यायालय की मोहर भी हो । गिरफ्तारी का वारण्ट भारत के किसी भी स्थान पर निष्पादित किया जा सकता है । इस प्रकार का वारण्ट तब तक प्रभावी रहता है जब तक कि उसका निष्पादन न हो जाए अथवा न्यायालय द्वारा उसको निरस्त न कर दिया जाए । गिरफ्तारी के वारण्ट में मुख्यतः 3 बातों पर ध्यान देना जरूरी है ।

1. वारण्ट लिखित हो ।
2. न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित हो ।
3. न्यायालय मोहर अंकित हो ।

जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा रहा है उसका नाम तथा पता और उस अपराध का भी विवरण होना चाहिए जिसमें वह आरोपित है । यदि इसमें से कोई भी ततव नहीं है तो ऐसा वारण्ट वैध नहीं है और निष्पादन में की गई गिरफ्तारी अवैधानिक मानी जा सकती है ।

गिरफ्तारी वारण्ट दो प्रकार के होते हैं:-

(क) जमानतीय वारण्ट ।

(ख) बिना जमानतीय वारण्ट ।

जमानतीय वारण्ट से तात्पर्य ऐसे वारण्ट से है जिसमें न्यायालय द्वारा यह निर्देश होता है कि यदि वह व्यक्ति गिरफ्तार होता है और न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए समुचित बंधनामा प्रस्तुत करता है तो उससे निर्धारित धनराशि का जमानतनामा लेकर हिरासत से मुक्त किया जाए । जमानती वारणट में यह भी उल्लेख किया जाता है कि गिरफ्तार शुदा व्यक्ति को कितनी धनराशि की जमानत देने पर मुक्त किया जाना है और ऐसे व्यक्ति को न्यायालय में किस तिथि को तथा स्थान पर उपस्थित होना है । बिना जमानती वारण्ट से तात्पर्य ऐसे वारण्ट से है जिसमें गिरफ्तार किए जाने पर पुलिस अधिकारी को ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को बिना किसी विलम्ब के न्यायालय के समक्ष पेश करना अनिवार्य होता है तथा गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति जमानत अधिकार के रूप में प्राप्त नहीं कर सकता । ऐसे गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की जमानत मजिस्ट्रेट/न्यायालय द्वारा ही की जाती है । यदि किसी दूसरे जिले के गैर जमानती वारण्ट पर कोई गिरफ्तार होता है तो ऐसे व्यक्ति की जमानत गिरफ्तारी वाले जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है ।

7. तलाशी वारण्ट तथा तामीली का तरीका :किसी व्यक्ति की, घर या शरीर की, यदि तलाशी देना हो तो उसके लिये तलाशी वारण्ट का प्रयोग किया जाता है। तलाशी वारण्ट मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया जाता है। मजिस्ट्रेट द्वारा तलाशी वारण्ट जारी करने संबंधी प्रावधान इस प्रकार है:-

1) अगर किसी व्यक्ति के बारे में संदेह हो जाता है कि वह अपने शरीर पर कोई ऐसी चीज छिपाए है जिसके लिए तलाशी ली जानी है तो उस व्यक्ति की तलाशी ली जा सकती है और यदि वह व्यक्ति स्त्री है तो स्त्री की शिष्टता का पूर्ण ध्यान रखते हुए तलाशी ली जाएगी ।
2) जब किसी न्यायालय को ऐसा विश्वास हो जाता है कि अन्वेषण, जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के प्रयोजन के लिए किसी दस्तावेज का या किसी अन्य चीज का पेश किया जाना आवश्यक हे या वांछनीय है और जिस व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में ऐसा दस्तावेज या चीज होने का विश्वास है, वह व्यक्ति सम्मन द्वारा अपेक्षित दसतावेज या चीज पेश नहीं करता है या ऐसे दस्तावेज या चीज के विषय में न्यायालय का यह समाधान हो जाए कि वह किसी व्यक्ति के कब्जे में या अमुक स्थान पर है तो न्यायालय द्वारा तलाशी वारण्ट जारी किया जा सकता है । न्यायालय को यह सामान्य अधिकार भी प्राप्त है कि अगर वह यह समझती है कि किसी जांच या विचारण या अन्य प्रयोजन की पूर्ति तलाशी द्वारा होगी तो उस स्थिति में भी न्यायालय द्वारा तलाशी हेतु वारण्ट जारी किया जा सकता है । न्यायालय को यह सामान्य अधिकार भी प्राप्त हे कि अगर वह यह समझी है कि किसी जांच या विचारण या अन्य प्रयोजन की पूर्ति तलाशी द्वारा होगी तो उस स्थिति में भी न्यायालय द्वारा तलाशी हेतु वारण्ट जारी किया जा सकता है ।
3) अगर राज्य सरकार द्वारा किसी समाचार पत्र या पुस्तक या अन्य दस्तावेज को सरकार के पक्ष में समपहरण या जब्त किए जाने की घोषणा कर दी गई हो तो कोई मजिस्ट्रेट किसी पुलिस अधिकारी को, जो उपनिरीक्षणक स्तर से कम का न होगा, इस प्रकार के अंकों को प्राप्त करने हेतु तलाशी लेने के लिए वारण्ट द्वारा प्राधिकृत कर सकता है ।
4. अगर किसी व्यक्ति को ऐसी परिस्थिति में बन्द कर रखा गया हो जो कि अवैध परिरोध की श्रेणी मंे आता है तो मजिस्ट्रेट द्वारा उसकी रिहाई के लिए तलाशी वारण्ट जारी किया जा सकता है और उस व्यक्ति के प्रस्तुत किये जाने पर उसके बार में उचित आदेश मजिस्ट्रेट दे सकता है ।
5. तलाशी लेने के लिए पुलिस अधिकारी के लिए यह आवश्यक है कि तलाशी लेने के पूर्व वह आसपास के दो प्रतिष्ठित व्यक्तियों को बुलाए और उनके सामने तलाशी ले । अगर ऐसे व्यक्ति जिन्हें तलाशी लेने वाले अधिकारी ने बुलाया है या लिखित आदेश इस संबंध में उन्हें दिया है और वह उसके बावजूद भी उपस्थित नहीं होते तो उन व्यक्तियों के विरूद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 187 के अंतर्गत मुकदमा चलाया जा सकता है ।
6. तलाशी लेने वाले अधिकारी का दायित्व है कि तलाशी में जितनी चीजें पाई जाएं उनकी सही सूचना तैयार करें और उस पर साक्षियों के हस्ताक्षर कराए तथा उसकी एक नकल उस व्यक्ति को दे जिसके पास या स्थान से वह चीजें प्राप्त हुई है । तैयार की गई सूची तथा वस्तु भी शीघ्र न्यायालय में भेजें ।
7. तलाशी वारण्ट में घर का पता, उसकी चैहद्दी का वर्णन होना आवश्यक है और जब पुलिस अधिकारी उस वारण्ट के अनुपालन में तलाशी लेने के लिए उस स्थान पर पहुंचता है तो उस स्थान के स्वामी को यह अधिकार होगा कि उस वारण्ट को देख सके । अगर वारण्ट में स्थान का वर्णन अपूर्ण है या वह वर्णन उसके स्थान से नहीं मिलता तो उस व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह पुलिस अधिकारी को इस तथ्य की जानकारी दे।
8. बिना वारण्ट के भी कतिपय विशेष परिस्थितियों में पुलिस अधिकारियों द्वारा तलाशी लेने की व्यवस्था है । अगर पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या विवेचना अधिकारी को अपराध के अन्वेषण के संबंध में यह विश्वास हो जाए कि कोई चीज किसी स्थान पर पाई जा सकती है तो उसके जांच के लिए आवश्यक है, और वारण्ट प्राप्त करने में विलम्ब होगा उस विलम्ब के कारण यह चीज न मिल सकेगी तो फिर वह अधिकारी अपने विश्वास के आधार पर लिखकर उस चीज को प्राप्त करने हेतु बिना वारण्ट के तलाशी ले सकता है । इस प्रकार की तलाशी थाने के भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण अधिकारी द्वारा ही ली जाएगी । किन्तु यदि वह ऐसी तलाशी स्वयं लेने में असमर्थ हो तो असमर्थता का कारण लिखने के पश्चात अपने अधीनस्थ अधिकारी को भी तलाशी लेने हेतु प्राधिकृत कर सकता है । इन सभी अभिलेखों की प्रतियां तत्काल उसके द्वारा निकटतम ऐसे मजिस्ट्रेट के सामने जिन्हें अपराध का संज्ञान लेने का अधिकार हो, प्रस्तुत कर दी जाएगी । जिस व्यक्ति के स्थान की तलाशी ली गई हो उसको यह अधिकार होगा कि वह तलाशी संबंधी सभी अभिलेखों की नकलें निःशुल्क मजिस्ट्रेट से प्राप्त कर लें । अगर किसी पुलिस अधिकारी को यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति जिसे गिरफ्तार किया जाना है किसी स्थान में छिपा हुआ है तो उस स्थान के स्वामी से पुलिस अधिकारी द्वारा अपेक्षा की जाएगी कि वह उस स्थान की तलाशी लेने दे । इस प्रकार की अपेक्षा किये जाने पर उस स्थान के स्वामी का दायित्व है कि उस स्थान की तलाशी लेने के लिए सब उचित सुविधाएं उपलब्ध कराए । इसके पश्चात पुलिस अधिकारी को उस स्थान की तलाशी लेने का अधिकार है । यदि कोई पर्दा करने वाली महिला ऐसे स्थान के भीतर हो जिसे स्वयं को गिरफ्तार नहीं किया जाना है तो पुलिस अधिकारी उस महिला को वहां से हट जाने के लिए उचित सुविधा प्रदान करने के बाद उस स्थान में प्रवेश करेगा ।

8. गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार और कर्तव्य :भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 में यह व्यवस्था है कि प्रत्येक व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है, गिरफ्तारी से 24 घण्टे के भीतर (गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा में व्यतीत हुए समय को छोड़कर) निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 57 व धारा 167 में इसी प्रकार के प्रावधान किए गए हैं । ऐसे व्यक्ति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह निःशुल्क कानूनी सहायता प्राप्त करने के लिए मजिस्ट्रेट से अनुरोध कर सके और यह मजिस्ट्रेट का दायित्व है कि विधिक सहायता, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के माध्यम से या अन्य माध्यम से उसे उपलब्ध कराए ।

ऐसा व्यक्ति यदि जमानतीय अपराध में गिरफ्तार किया गया है तो वह अधिकारिक रूप से जमानत पाने का अधिकारी है । यदि वह पुलिस या मजिस्ट्रेट के आदेश के अनुरूप जमानतनामा दाखिल करता है तो उसे अभिरक्षण में नहीं रखा जा सकता ।

गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को वह कारण व आधार बताए कि उसको क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है और उस व्यक्ति को यह भी अधिकार है कि पुलिस अधिकारी से कहे कि उसकी गिरफ्तारी का वारण्ट उसे दिखाया जाए (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50, 57 तथा 75) ।

अभियुक्त को यह भी अधिकार है मजिस्ट्रेट के सामने यह प्रार्थना करे कि उसने कोई अपराध नहीं किया है, इस आशय से उसका डाक्टरी परीक्षण करा लिया जाए या जेल में पहचान करा लिया जाए जो कुछ मामलों में इस बात का साक्ष्य हो सकता है कि उसने जुर्म नहीं किया है या इस बात का साक्ष्य हो सकता है कि उसके प्रति किसी दूसरे द्वारा जुर्म किया गया है । अभियुक्त को यह सावधानी रखनी चाहिए कि यदि उसके विरूद्ध नामजद रिपोर्ट न हो या गवाह उसे न पहचानते हो तो अपने को बापर्दा रखे । पुलिस को भी ऐसे व्यक्ति को बापर्दा रखना चाहिए ।

यदि किसी महिला की डाक्टरी परीक्षा कराई जाती हो तो महिला डाक्टर द्वारा ही परीक्षा करानी चाहिए । अगर किसी अभियुक्त को यह शिकायत है कि पुलिस ने उसके साथ दुव्र्यवहार किया है और मारा-पीटा है तो वह मजिस्ट्रेट से कहकर अपना डज्ञक्टरी मुआईना करा सकता है । (दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 53-54) । मजिस्ट्रेट द्वारा भी स्वयमेव डाक्टरी परीक्षण के आदेश दिए जा सकते हैं ।

गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि गिरफ्तारी की दशा मंे वह अपने मित्र, रिश्तेदार अथवा किसी व्यक्ति के माध्यम से अपने वकील से संपक्र कर सके और विधिक, राय प्राप्त कर सकें । अगर पुलिस आफिसर जमानत नहीं लेता है तो वह मजिस्ट्रेट से जमानत का प्रार्थना कर सकता है उसे जमानत पर छोड़ दिया जाए ।

9. जमानत का अधिकार :अपराध दो प्रकार के होते हैं-

1. जमानतीय अपराध
2. बिना जमानतीय अपराध

जमानतीय अपराध में अभियुक्त को जमानत पाने का विधिक अधिकार है ऐसी जमानत पुलिस थाने या न्यायालय से करायी जा सकती है । बिना जमानतीय अपराध में मजिस्ट्रेट/न्यायालय को यह अधिकार है कि वह जमानत स्वीकार करें अथवा अस्वीकार करें । जमानतीय तथा बिना जमानतीय अपराधों के विषय में जमानत के अधिकार दण्ड प्रक्रिया संहिता की धरा 436, 437, 439 के अंतर्गत वर्णित है । जो अपराध मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास द्वारा दण्डनीय है उसमें मजिस्ट्रेट द्वारा तभी जमानत दिया जा सकता है जबकि यह सिद्ध होने के कारण हो कि व्यक्ति दोषी नहीं है । किन्तु 16 वर्ष से कम आयु के बालक, औरत तथा अपंग अथवा बीमार अभियुक्त की जमानत बिना जमानतीय अपराध में भी मजिस्ट्रेट से मिल सकती है ।

परीक्षण के मध्य यदि न्यायालय को ऐसा प्रतीत हो कि कदाचित अभियुक्त किसी गैर जमानतीय अपराध का दोषी नहीं है तो ऐसी दशा में बिना जमानतीय अपराध में भी वह जमानत ले सकता है । बिना जमानतीय अपराधों में जमानत के साथ कुछ शर्तें भी लगायी जा सकती हैं ।

धारा-167 द.प्र.सं. के प्रावधान के अनुसार कि यदि 90/60 दिनों के अन्दर विवेचना पूरी करके न्यायालय में आरोप-पत्र दाखिल नहीं होता है तो निरूद्ध व्यक्ति को जमानत का अधिकार हो जाता है तथा न्यायालय द्वारा शर्तों के साथ जमानत ली जा सकती है । किन्तु ऐसी जमानत के मामलों में आरोप पत्र प्रेषित होने तथा न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने के बाद अपराधी को पुनः हिरासत में लेकर अपराध के गुण-दोष के आधार पर जमानत मांगने के लिए आदेश दिया जा सकता है ।

10. अग्रिम जमानत का अधिकार : किसी व्यक्ति को गैर जमानती अपराध में अग्रिम जमानत पर रिहा होने का अधिकार प्राप्त है, इस संबंध में धारा 438 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार निम्न प्रावधान है:-

धारा 438 द.प्र.सं. गिरफ्तारी की आशंका करने वाले व्यक्ति की जमानत मंजूर करने के निर्देश

(1) जब किसी व्यक्ति को यह विश्वास करने का कारण है कि उसको किसी अजमानतीय अपराध के किए जाने के अभियोग में गिरफ्तार किया जा सकता है तो वह इस धारा के अधीन निर्देश के लिए उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय को आवेदन कर सकता है और यदि वह न्यायालय ठीक समझे तो वह निर्देश दे सकता है कि ऐसी गिरफ्तारी की स्थिति में उसको जमानत पर छोड़ दिया जाए ।
(2) जब उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय उपधारा (1) के अधीन निदेश देता है तब वह विशिष्ट मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उन निदेशों में ऐसी शर्तें, जो वह ठीक समझे, सम्मिलित कर सकता है जिनके अन्तर्गत निम्नलिखित भी है-
(क) यह शर्त कि वह व्यक्ति पुलिस अधिकारी द्वारा पूछे जाने वाले परिप्रश्नों का उत्तर देने के लिए जैसे और अब अपेक्षित हो, उपलब्ध होगा;
(ख) यह शर्त कि वह व्यक्ति उस मामले के तथ्यों से अवगत किसी व्यक्ति को न्यायालय या किसी पुलिस अधिकारी के समक्ष ऐसे तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाने के वास्ते प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उसे कोई उत्प्रेरणा, धमकी या वचन नहीं देगा;
(ग) यह शर्त कि वह व्यक्ति न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना भारत नहीं छोड़ेगा;
(ड.) ऐसी अन्य शर्तें जो धारा 437 की उपधारा (3) के अधीन ऐसे अधिरोपित की जा सकती है मानों उस धारा के अधीन जमानत मंजूर की गई हो ।
(3) यदि तत्पश्चात ऐसे व्यक्ति को ऐसे अभियोग पर पुलिस थाने के भारसाधक, अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार किया जाता है और वह या तो गिरफ्तारी के समय या जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है तब किसी समय जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, तथा यदि ऐसे अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि उस व्यक्ति के विरूद्ध प्रथम बार ही वारंट जारी किया जाना चाहिए, तो वह उपधारा (1) के अधीन न्यायालय के निदेश के अनुरूप जमानतीय वारण्ट जारी करेगा ।

11. पुलिस द्वारा गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत पर छोड़ना :दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा-71 के अंतर्गत जारी किए गए जमानतीय वारण्ट में जमानत की शर्तें लिखी जानी चाहिए कि कितनी धनराशि की जमानतों पर छोड़ा जाना है तथा जमानतदारों की संख्या कितनी होगा तथा किस तिथि को उसे न्यायालय में उपस्थित होना है । जमानतीय अपराधों में थानाध्यक्ष से लिखित रूप से भी जमानत की मांग की जा सकती है ।संज्ञेय अपराधों में पुलिस द्वारा सामान्यतया निम्न आधार पर जमानत का विरोध किया जाता है कि:-

(1) जमानत पर छूटने पर अभियुक्त न्यायालय में उपस्थित नहीं होगा ।
(2) जमानत हो जाने के बाद अभियुक्त गवाहान को प्रभावित करेगा ।
(3) जमानत होने के बाद दूसरे जघन्य अपराध करेगा या पूर्व में सजायाफ्ता अपराधी है ।
(4) जमानत होन के पश्चात चोरी या लूटा हुआ माल बरामद न हो सकेगा तथा
(5) अपराध बहुत गम्भीर प्रकृति का है तथा अपराधी शातिर है ।

12. न्यायालय में जमानत के लिए प्रार्थना-पत्र देने का तरीका : अभियुक्त स्वयं या जेल से या अपने वकील के माध्यम से जमानत का प्रार्थना पत्र दे सकता है, जिसमें पूर्व जमानत के प्रार्थना पत्र के संबंध में पूर्ण या सतय जानकारी देना आवश्यक है अन्यथा प्रार्थना पत्र निरस्त ही नहीं हो सकता बल्कि हर्जाना भी अधिरोपित किया जा सकता है ।

जमानत खारित होने पर आदेश की निःशुल्क प्रति प्राप्ति करने का अधिकार अभियुक्त को होता है जो न्यायालय से प्रार्थना करके प्राप्त किया जा सकता है। अगर जमानत हो जाती हो तो जमानत के समय जमानतदारों को न्यायालय में उपस्थित होना आवश्यक है जिससे मजिस्ट्रेट अपने को संतुष्ट कर सके कि प्रतिभूतियों द्वारा जो जमानतनामें दिए गए हैं वे पर्याप्त हैं और जमानतदार की हैसियत कितनी है । जमानतदार 18 वर्ष से अधिक आयु का होना चाहिए । जमानतदार यदि हैसियत वाले हैं और पेशेवर नहीं है और यदि उनके आचरण के विरूद्ध कोई रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है तो जमानतनामें सामान्यतया अस्वीकृत नहीं किए जाते ।

13. जमानतदारों के दायित्व : जो जमानतदार किसी व्यक्ति की जमानत लेता है उसका यह दायित्व है कि न्यायालय के आदेशानुसार या प्रत्येक निश्चित तिथि पर अभियुक्त को न्यायालय के समक्ष पेश करे, ऐसा न करने पर न्यायालय द्वारा जमानत जब्त की जा सकती है तथा जब्त करने के पहले जमानतदार को नोटिस देना आवश्यक नहीं है किन्तु वसूली की कार्यवाई के पूर्व नोटिस आवश्यक है । न्यायालय द्वारा वसूल की जाने वाली धनराशि में कभी भी की जा सकती है अगर यह संतुष्टि हो जाए कि जमानतदार ने जानबूझ कर न्यायालय के आदेश की अवज्ञा नहीं की है।

14. तलाशी, गिरफ्तारी व जमानत के मामलों में महिलाओं के विशेष अधिकार :यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी के घर में तलाशी लेने के लिए आता है तो उसको दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 47 (2) में यह सावधानी बरतनी होगी कि वह प्रवेश से पूर्व उस घर की पर्दानसीन स्त्री को कमरे से हटने के लिए पहले ही सूचित कर दे और वह स्त्री जब कमरे से जब अपनी सुविधानुसार बाहर निकल जाय तो पुलिस अधिकारी उसकी पूरी शिष्टता को ध्यान में रखते हुए प्रवेश करे । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 51 (2) में यह प्रावधान है कि किसी महिला की तलाशी लेते समय महिला की पूरी शिष्टता को ध्यान में रखते हुए केवल महिला पुलिस अथवा स्त्री द्वारा ही तलाशी ली जाय । यदि किसी महिला को चिकित्सा परीक्षा कराना आवश्यक हो तो भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 53 (2) के अंतर्गत वह किसी महिला चिकित्सक द्वारा जो रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी है या किसी महिला रजिस्ट्रीकृत चिकित्सक के पर्यवेक्षण में ही की जा सकती है । पुलिस अधिकारी धारा 160 द.प्र.सं. किसी अपराध के अन्वेषण के लिए किसी भी महिला को गवाह व 15 वर्ष से कम उम्र के बालक को ऐसे स्थान से जिसमें ऐसा पुरूष या स्त्री निवास करती है भिन्न किसी स्थान पर हाजिर होने की अपेक्षा नहीं की जावेगी । दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 437 के अंतर्गत किसी स्त्री, कोई रोगी या शिथिल व्यक्ति मृत्यु दण्ड अथवा आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध में लिप्त है को मजिस्ट्रेट परिस्थितियों का मननकर तथा समुचित कारण पाये जाने पर जमानत दे सकता है ।

15. साक्षीगण का दायित्व :दण्ड प्रक्रिया संहिता की उपधारा (2) धारा 161 के अंतर्गत साक्षीगण विवेचना के अधिकारी को घटना के संबंध में सत्य कथन देने के लिये बाध्य है। अन्यथा पुलिस तथा न्यायालय द्वारा विवेचना के दौरान किए गए कथन असत्य पाए जाने पर दांडिक कार्यवाही की जा सकती है ।

16. न्यायालयीन निर्णय :न्यायालय निर्णय के बाद अभियुक्त को दण्डित किये जाने की स्थिति में न्यायालय द्वारा प्रत्येक अभियुक्त को निर्णय की प्रतिलिपि निःशुल्क प्राप्त करने का अधिकार है ।


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प्राणायाम और आसन दें भयंकर बीमारियों में लाभ



दिल की बीमारी
आसन : ताड़ासन, कटिचक्रासन (खड़े होकर व लेटकर), एक पैर से उत्तानपादासन, नौकासन, पवनमुक्तासन, बिलावासन (कैट पॉश्चर), आनंद मदिरासन
प्राणायाम : अनुलोम-विलोम, उज्जायी, भ्रामरी और ओम का जाप। बीपी वाले कपालभाति और भ्रस्तिका न करें।

डायबीटीज़
आसन : अर्ध्वहत्तोनासान, कटिचक्रासन (लेटकर), पवनमुक्तासन, भुजंगासन, धनुसारन, वज्रासन, मंडूकासन, उड्यानबंध
प्राणायाम : कपालभाति, अनुलोम-विलोम, भस्त्रिका, अग्निसार क्रिया। भस्त्रिका न करें।

मोटापा
आसन : सारे आसन फायदेमंद हैं। खासतौर पर सूर्य नमस्कार, पवनमुक्तासन, शलभासन, हस्तपादासन, उर्ध्वहस्तोत्तानासन, कटिचक्रासन खासकर असरदार।
प्राणायाम : कपालभाति और भस्त्रिका।

जोड़ों का दर्द
कमर दर्द : एक पैर से उत्तपादासन, अर्धनौकासन, कटि चक्रासन, एक पैर से पवनमुक्तासन, अर्धभुजंगासन, अर्ध नौकासन, कैट पॉश्चर
गर्दन में दर्द : गर्दन की सूक्ष्म क्रियाएं। हथेली को माथे पर टिकाकर दवाब डालें और पीछे से प्रेशर डालकर रोकने की कोशिश करें। इसी तरह कनपटी के दोनों ओर से भी करें।
घुटने का दर्द : घुटने की सूक्ष्म क्रियाएं।

डिप्रेशन
आसन : सभी आसन (खासकर सूर्य नमस्कार, ताड़ासन, नौकासन आदि) फायदेमंद हैं, क्योंकि ये शरीर को ताकत देते हैं और ताकतवर शरीर मन को मजबूत बनाता है।
प्राणायाम : नाड़ीशोधन, भ्रामरी के साथ-साथ बाकी प्राणायाम भी कारगर। मेडिटेशन खासतौर पर असरदार।

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शारदीय नवरात्र के व्रत का धार्मिक महत्व



आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाले नवरात्र को ‘शारदीय’ कहा जाता है। इन दिनों महामाया दुर्गा माता व कन्या पूजन का माहत्म्य है। नवरात्र पूजन प्रतिपदा से दशमी तक किया जाता है। प्रातःकाल उठकर स्नान करके, मंदिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा पढ़नी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष फलदायक है।
दुर्गा माता
कथा
बृहस्पति बोले- हे ब्रह्मा जी! आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हैं। हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो। चैत्र, आश्विन, माघ और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों मनाया जाता है? हे भगवान्! इस व्रत का फल क्या है? किस प्रकार इसे करना उचित है? और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहिये। बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्माजी कहने लगे कि हे बृहस्पति! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। जो मनुष्य मनोरथपूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं। यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार में पड़ा हुआ मनुष्य बंधन से छूट जाता है।
शैलपुत्री
मनुष्य की तमाम विपत्तियां दूर हो जाती हैं और उसके घर में संपूर्ण सम्पत्तियां आकर उपस्थित हो जाती हैं। बन्ध्या और काक बन्ध्या को इस व्रत के करने से पुत्र हो जाता है। समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत को करने से ऐसा कौन सा मनोरथ है जो सिद्ध नहीं हो सकता। जो मनुष्य इस अलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता है वह माता-पिता से हीन हो जाता है। उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंगहीन हो जाता है। इस व्रत को न करने वाले को अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। यदि व्रत करने वाला मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सके तो एक समय भोजन करे और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र व्रत की कथा श्रवण करे।
ब्रह्मचारिणी
हे बृहस्पति! जिसने सबसे पहले इस महाव्रत को किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें बताता हूं। पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त मानों ब्रह्मा जी की सबसे पहली रचना हो, ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक अत्यन्त सुंदर कन्या हुई। वह कन्या सुमति अपने घर के बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे पक्ष में चंद्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रतिदिन दुर्गा की पूजा और होम किया करता था। उस समय वह भी नियम से वहां उपस्थित होती थी। एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ खेलने गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ठी और दरिद्र मनुष्य से तुम्हारा विवाह करूंगा। इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुख हुआ और वह पिता से कहने लगी कि हे पिता जी! मैं आपकी कन्या हूं। मैं आपके सब तरह से अधीन हूं। जैसी आपकी इच्छा हो वैसा ही करो। रोगी, कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी आपकी इच्छा हो, मेरा विवाह कर सकते हो। होगा वही, जो मेरे भाग्य में लिखा है, मेरा तो इस पर पूरा विश्वास है।
चंद्रघंटा
मनुष्य न जाने कितने मनोरथों का चिंतन करता है पर होता वही है जो भाग्य में विधाता ने लिखा है। जो जैसा करता है उसको फल भी उस कर्म के अनुसार ही मिलता है क्योंकि कर्म करना मनुष्य के अधीन है। पर फल देव के अधीन है। जैसे अग्नि में पड़े हुए तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ-जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल भोगो। देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर क्या करती हो?
कूष्माण्डाइस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमति अपने मन में विचार करने लगी कि अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुख का विचार करती हुई सुमति अपने पति के साथ वन चली गई और भयानक वन में कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की। उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगीं कि हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुई हैं, यह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीनदासी को कृतार्थ करो। ऐसा ब्राह्मणी का वचन सुनकर देवी कहने लगीं कि मैं आदि शक्ति हूं और मैं ही ब्रह्मा, विद्या और सरस्वती हूं। मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी! मैं तुझ पर पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।
स्कंदमाता
तुम्हारे पूर्व जन्म का वृत्तांत तुम्हें सुनाती हूं सुनो! तू पूर्व जन्म में निषाद की स्त्री थी और अति पविव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और जेलखाने में कैद कर दिया। उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया ओर न जल ही पिया। इसलिए 9 दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया। हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें मनवांिछत वस्तु दे रही हूं तुम्हारी जो इच्छा हो सो मांगो। इस प्रकार दुर्गा जी के कहे हुए वचन सुनकर ब्राह्मणी बोली कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे! आपको प्रणाम करती हूं। कृपा करके मेरे पति के कोढ़ को दूर करो। देवी कहने लगीं कि उन दिनों में तुमने जो व्रत किया था उस व्रत के एक दिन का पुण्य अपने पति का कोढ़ दूर होने के लिए अर्पण करो मेरे प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से रहित और सोने के जैसे शरीर वाला हो जायेगा।
कात्यायनी
ब्रह्माजी बोले कि इस प्रकार देवी का वचन सुनकर ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है, ऐसे बोली। तब तक उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया जिसकी कान्ति के सामने चंद्रमा की कान्ति भी क्षीण हो जाती है।
कालरात्रि
वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रमी समझकर स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे! आप दुर्गत को दूर करने वाली तीनों जगत का संताप हरने वाली, समस्त दुखों को दूर करने वाली, रोगी मनुष्य को निरोग करने वाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु को देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो। तुम ही सारे जगत की माता और पिता हो। हे अम्बे! मुझ अपराध रहित अबला का मेरे पिता ने कुष्ठा के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया। आपने ही मेरा इस आपत्ति रूपी समुद्र से उद्धार किया है। हे देवी! म्ैं आपको प्रणाम करती हूं। मुझ दीन की रक्षा करो।
महागौरी : मां दुर्गा का आठवां स्वरूप
ब्रह्माजी बोले कि हे बृहस्पति! इसी प्रकार उस सुमति ने मन से देवी की बहुत स्तुति की, उससे की हुई स्तुति सुनकर देवी को बहुत संतोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगीं कि हे ब्राह्मणी! तुम्हारे उदालय नाम का एक अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीघ्र ही होगा। ऐसा कहकर वह देवी उस ब्राह्मणी से फिर कहने लगीं कि हे ब्राह्मणी और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु मांग सकती हो। भगवती दुर्गा का ऐसा वचन सुनकर सुमति बोली कि हे भगवती दुर्गे! अगर आप मेरे पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्र विधि बताइए। हे दयावती! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन करें।
सिद्धिदात्री : मां दुर्गा का नौवां रूप
इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुनकर दुर्गा कहने लगीं कि हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हारे लिए संपूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र व्रत विधि बतलाती हूं जिसको सुनने से तमाम पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। आश्विन मास के शुल्कपक्ष की प्रतिपदा से लेकर 9 दिन तक विधिपूर्वक व्रत करें। यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें। पढ़े-लिखे ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सींचें। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्तियां बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से अघ्र्य दें। बिजौरा के फूल से अघ्र्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से कीर्ति, दाख से कार्य की सिद्धि होती है। इस प्रकार फलों से अघ्र्य देकर यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, शहद, जौ, तिल, बिम्ब, नारियल, दाख और कदम्ब, इनसे हवन करें। गेहूं होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। खीर व चम्पा से धन और पत्तों से तेज और सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति और केले से पुत्र प्राप्त होता है। कमल से राज सम्मान और दाखों से सुख सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। खांड, घी, नारियल, शहद, जौ और तिल, इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है।
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व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से होम कर आचार्य को अत्यत्न नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इन 9 दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है, उसका करोड़ों गुना मिलता है। इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मंदिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें।
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ब्रह्माजी बोले कि हे बृहस्पति! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अन्तध्र्यान हो गईं। जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्तिपूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अंत में दुलर्भ मोक्ष को प्राप्त होता है। हे बृहस्पते! यह दुलर्भ व्रत का माहात्म्य मैंने तुम्हारे लिये बतलाया है। ब्रह्माजी के यह वचन सुनकर बृहस्पति जी आनंद के कारण रोमांचित हो गये और ब्रह्माजी से कहने लगे कि हे ब्रह्माजी! आपने मुझ पर अति कृपा की जो अमृत के समान इस नवरात्रि व्रत का माहात्म्य सुनाया।
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हे प्रभो! आपके बिना और कौन इस माहात्म्य को सुना सकता है? बृहस्पति जी के ऐसे वचन सुनकर ब्रह्माजी बोले कि हे बृहस्पते! तुमने सब प्राणियों का हित करने वाले इस अलौकिक व्रत को पूछा है इसलिए तुम धन्य हो। यह भगवती शक्ति संपूर्ण लोगों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है।


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प्रथम हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति महामना पंडित मदनमोहन मालवीय का भाषण



 
मुझको बहुत से लोग जानते है कि मैं वाचाल हूँ लेकिन मुझको जब काम पड़ता है तब मैं देखता हूँ कि मेरी वाणी रूक जाती है। यही दशा मेरी इस समय हो रही है। प्रथम तो जो अनुग्रह और आदर आपलोगों ने मेरा किया है उसके भार से ही मैं दब रहा हूँ, इसके उपरान्त मेरे प्रिय मित्रों और पूज्य विद्वानों ने जिन शब्दों में मेरे सभापतित्व का प्रस्ताव किया है उसने मेरे थोड़े से सामर्थ्य को भी कम कर दिया है। सज्जनों! मैं अपने को बहुत बड़भागी समझता यदि मैं उन प्रशंसा-वाक्यों के सवे हिस्से का भी अपने को पात्र समझता जो इस समय इन सज्जनों ने मेरे विषय में कहे हैं। हाँ, एक अंश में मैं बड़भागी अवश्य हूँ। गुण न रहने पर भी मैं आपकी मंडली में गुणी के समान सम्मान पाता हूँ। इसी के साथ मुझको खेद होता है कि इतने योग्य और विद्वानों के रहते हुए भी मैं इस पद के लिये चुना गया। फिर भी मैं आपके इस सम्मान का धन्यवाद करता हूँ, जो आपने मेरा किया है। मेरा चित्त कहता है कि इस स्थान में उपस्थित होने के लिये हमारे हिन्दी संसार में अनेक विद्वान् थे और हैं जिनमें कुछ यहाँ भी उपस्थित हैं और जिनको यदि आप इस कार्य में संयुक्त करते तो अच्छा होता ओर कार्य में सफलता और शोभा होती। अस्तु, बड़ों से एक उपदेश मैंने सीखा है। वह यह है कि अपनी बुद्धि में जो आवे उसे निवेदन कर देना। मित्रों की आज्ञा, मित्रों की मंडली की आज्ञा पालन करना मैं अपना परम धर्म समझता हूँ। अनुरोध होने पर अंत में मैंने अपने प्यारे मित्रों से प्रेमपूर्वक निवेदन किया कि साहित्य सम्मेलन जिसका सभापति होने का सौभाग्य मुझे प्रदान किया गया है उसके कर्तव्य का पालन मेरा परम धर्म है। मैं आपसे दूर रहता हूँ। सो भी मैं कदाचित् निर्भय कह सकता हूँ कि हिन्दी साहित्य का रस पान करने में मुझको अन्य मित्रों की अपेक्षा कम स्वाद नहीं मिलता। उसके स्वाद लेने में मैं अपने किसी मित्र से पीछे नहीं। किन्तु अनेक कामों में रूका रहने के कारण मैं आपके बाहरी कामों का करने वाला सेवक हूँ। इस काम के लिए मैं अपने को कदापि योग्य नहीं समझता हूँ और इस अवसर में जिसमें आपको पूर्व उन्नति के उद्देश्यों को देखना चाहिए था, जिसमें हिन्दी की भावी उन्नति का पथ प्रशस्त करना चाहिए था, किसी और ही मनुष्य को इस स्थान में बैठना चाहिए था, इसके योग्य मैं किसी प्रकार नहीं। अब यदि मैं इस स्थान में आकर आपकी आज्ञा पालन करने का यत्न न करूँ तो उससे अपराध होता है। केवल इसी कारण मैं इस सम्मान का धन्यवाद देता हूँ और इस समय इस स्थान में आप लोगों की सेवा करने को तैयार हुआ हूँ।

हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन के विषय में जो मत भेद हो रहा है, जैसा कि मेरे प्रथम वक्ता महाशय ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं, उसे स्वीकार करना चाहिए। हठधर्मी अच्छी नहीं। अनेक विद्वानों के मत से यह समय सम्मेलन के लिए उपयुक्त नहीं। नवरात्र दुर्गा देवी के पूजन का समय है, नवरात्र में सरस्वती शयन करती हैं। प्राचीन रीति के अनुसार तीन दिन सरस्वती शयन के दिन हैं। यह नियम आर्यजाति ने इसलिये रखा कि तीन सौ सत्तावन दिन संसार के व्यवहार करो, अपने मस्तिष्क को पीड़ा दे लो, किन्तु जाति की रक्षा के लिए उन तीन दिनों में लेखनी मत उठाओ, पत्रा मत पढ़ो, इन दिनों सरस्वती शयन करती है। ऐसे समय में मेरे मित्रों ने आप महाशयों को इधर-उधर से खींचकर बुलाया है और इसके लिये मेरी बुद्धि में आता है कि मुझको आपके सामने उनकी ओर से उत्तर देना चाहिए। इसमें मैं इतना ही कहूँगा कि जितना मतभेद हो उसे आपको स्वीकार करना चाहिए और जिन लोगों का मत नही मिलता उनके मत का आदर करके उनसे यही कहना चािहए कि अब से यह समय उन्नति का होगा। इसके विचार में यह मेरी बुद्धि में आता है कि हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन के लिये यह समय बहुत ही उपयुक्त है। हिन्दी की दशा इस समय शोचनीय हो रही है। हिन्दी साहित्य के इस शयन की अवस्था में सरस्वती शयन कैसा? इस ध्यान से हमारे हिन्दी प्रेमियों में बहुत से लोगों का यदि यह विचार है कि सरस्वती शयन कर रही हैं तो इससे क्या होता है? हमलोग इस सम्मेलन में उपयुक्त यत्न कर सरस्वती को जगाएँ। बात भी ऐसी ही है। जहाँ रात होती है वहीं सूर्यनारायण की लालिमा दिखाई देती है। रात के अंधकार के पश्चात् प्रातःकाल होता है तो उसको देखना अच्छा लगता है। ऐसी अवस्था में इस सरस्वती शयन का समय मुझको आशा देता है कि हिन्दी भाषा के शयन के समय में जब साहित्य सम्मेलन होता है तब इस सरस्वतीशयन के समय के उपरान्त जैसे विजयादशमी का दिन आता है वैसे ही, मुझको विश्वास है कि सोई हिन्दी भाषा, हिन्दी साहित्य के जागने का समय निकट है। प्राचीन समय से लोग दुर्गा-अष्टमी में विद्या की वृद्धि के लिये देवी की उपासना करते आते हैं। जिस तरह पहले उसी तरह आज भी हिन्दुस्तान में हिमालय के ऊँचे शिखर और लंका के छोर तक सहस्रों करोड़ों हमारे भाई इस नवरात्र में दुर्गा जी की स्तुति करते हैं। एक ही विद्या है, एक ही तरह नहीं चल रहा है इसलिये यद्यपि कुछ संताेष का विषय है तथापि विशेष रूप से एकत्र होकर इस बात का विचार किया जाता है कि कार्य कैसे चले। मेरी बुद्धि में तो हिन्दी का ऐसा सौभाग्य नहीं है। हमलोग वर्तमान समय में जो मिले हैं वह इस दूसरी श्रेणी का सम्मेलन है। कुछ लोगों के मत में हमारी उन्नित कुछ भी संतोषजनक नहीं है। अन्य लोगों के विचार ऐसे हैं कि यह कहना ठीक-ठीक है। फिर भी प्रत्येक दशा में यह सम्मेलन आवश्यक हो गया है। अब इस सम्मेलन में यदि हम मिले हैं तो दूसरी या तीसरी कक्षा, जिसको ले लीजिये, उसी के अनुसार पहले यह विचार कीजिये कि हमारी अवस्था क्या है। जब कोई वैद्य बुलाया जाता है तब निर्दिष्ट स्थान में पहुँचकर पहले वह यह जानना चाहता है कि रोगी की दशा क्या है, रोग कहाँ तक बढ़ा है, कितनी आशा है, कितना घटा है, रोगी में कितना बल आया है। यह आवश्यक है कि हम पहले हिन्दी की दशा विचारें। किन्तु इससे पहले कि हम इस बात का विचार करें हमारे एक मित्र ने प्रश्न किया है कि पहले यह तो बतलाइए कि हिन्दी है क्या? यह बड़ा टेढ़ा प्रश्न उठा है कि हिन्दी क्या है। ऐसी दशा में पहले मैं इसी को लेता हूँ। मुझको दुःख है कि मैं न संस्कृत का ऐसा विद्वान् हूँ कि इस विषय में प्रमाण के साथ कह सकूँ, न भाषा का ऐसा विद्वान् हूँ कि इस विषय की चर्चा चलाऊँ। किन्तु मैं आपके सम्मुख निवेदन करता हूँ कि जब प्रमाण की रीति से कोई कुछ न कह सके तो उसका धर्म है कि वह अपने विचारों को उपस्थित करके जो प्रमाण दे सकता हो उन्हीं को दे। हिन्दी के विषय में बहुत सा विवाद है। हिन्दी के संबंध में हमारे देश के लिखनेवालों में जो हुए वह तो हुए ही, हमारे यूरोपियन लिखनेवालों में विलायत के डाक्टर ग्रियर्सन एक बड़े शिरोमणि हैं (हर्षध्वनि) । आपने हिन्दी की बड़ी सेवा की है और हिन्दी की उन्नति में बड़ा यत्न किया है। आपने एक स्थान में लिखा है कि हिन्दी यूरोपियन सन् 1803 ई0 के लगभग लल्लूलाल जी से लिखवाई गई। और भी लोगों ने इसी प्रकार की बात कही है। जो विदेशी हिन्दी के विद्वान् हैं, वह तो यही कहते आए हैं कि हिन्दी कोई भाषा नहीं है। इस भाषा का नाम उर्दू है। इसी का नाम हिन्दुस्तानी है। यह लोग यह सब कहेंगे, किन्तु यह न कहेंगे कि यह भाषा हिन्दी है (लज्जा)। लज्जा तो कुछ नहीं है, विचार की बात है सज्जनों! ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित कितने ही अँगरेज अफ्सरों ने मुझसे पूछा था कि हिन्दी क्या है? इस प्रान्त की भाषा तो हिन्दुस्तानी है। मैं यह प्रश्न सुन दंग रह गया। समझाने से जब उन्होंने स्वीकार नहीं किया तब मैंने कहा कि जिस भाषा को आप हिन्दुस्तानी कहते हैं, वही िहन्दी है। अब आप कहेंगे कि इसका अर्थ क्या हुआ? इसका अर्थ यह है कि न हमारी कही आप मानें, न उनकी कही। इसमें न्यायपूर्वक विचार कीजिए। डाक्टर ग्रियर्सन का क्या कहना है। मैं उनका सम्मान करता हूँ किंतु उनकी बात पर न जाकर हमें यह देखना चाहिए कि यथार्थ तत्व क्या है? यहाँ इस मंडली में बड़े-बड़े विद्वान् और विचारवान् पुरूष हैं, वह इसे अच्छी रीति से कह सकेंगे। इसके विचारने में हमको अपने विचारों का दिग्दशर्न करना चाहिए। इसमें बहुत कुछ अंतर हो सकता है। किन्तु मूल में कोई अंतर हो नहीं सकता। हिन्दी भाषा के संबंध में विचार करते हुए सबसे पहले संस्कृत की आकृति एक बार ध्यान में लाइए, हिन्दी भाषा की आकृति को ध्यान में लाइए। इसके पीछे आप विचारिए कि हिन्दी कौन भाषा है और उसकी उत्पत्ति कहाँ से है। संस्कृत की जितनी बेटियाँ हैं इनमें कौन सी बड़ी बेटी है। संस्कृत की बेटियों में हिन्दी का कौन सा पद है। इसका संस्कृत से क्या संबंध है। संस्कृत, जैसा कि शब्द कहता है, नियमों से बाँध दी गई है। जो व्यर्थ बातें थी, वह निकाली गई, अच्छी-अच्छी बातें रखी गई, नियमों और सूत्रों से बँधे शब्द रखे गए, जो शब्द नियमविरूद्ध थे उनके लिये कह दिया गया कि यह नियम से बाहर है। नियमबद्ध शब्दों का व्याकरण में उल्लेख हो गया। आप जानते हैं कि संस्कृत से प्राकृत हुई। जो लोग यह कहते हैं कि संस्कृत कभी बोली नहीं जाती थी, वह संस्कृत को नहीं जानते। वे थोड़ी, प्राकृत पढ़े तो उनको मालूम हो जायेगा कि प्राकृत तो बोली जा नहीं सकती। संस्कृत के बोले जाने में कोई संदेह नहीं। संस्कृत से प्राकृत हुई। उसके पीछे सौरसेनी, मागधी और महाराष्ट्री। कदाचित् आपके ध्यान में होगा कि दंडी 8वीं शताब्दी में थे। अपने समय में उन्होंने यह लिखा था कि भारत में चार भाषाएँ हैं, महाराष्ट्री, सौरसेनी, मागधी और भाषा । यही चार भाषाएँ चली आई हैं।

अब आपको मालूम हो गया होगा कि जो महाराष्ट्री भाषा थी, मागधी भाषा थी, इनके बीच में बहुत भेद था। मेरे शब्दों पर ध्यान दीजिए इन भाषाओं में संस्कृत भाषा के शब्दों के रूप का अनुरूप आपको मिलता है। यह जितना हिन्दी भाषा में मिलता है, उतना दूसरा किसी भाषा में नहीं मिलता। संस्कृत के शब्दो को ले लीजिए। अब देखिए कि हिन्दी में यह बात कहाँ से आई। संस्कृत से इन भाषाअों का क्या संबंध था। शंकुतला में ‘तुक मणि दबे बलीयममणाणि’ कहाँ से आया होगा। एक शब्द को आप लीजिए। उसको देखिए कि प्राकृत में उसका क्या रूप है और भाषा में क्या हुआ। इस प्राकृत को देखने से आपको मालूम होगा कि संस्कृत शब्दों का प्राकृत रूप क्या से क्या हो गया। भाषा के कितने ही रूप आपको मिल सकते हैं। परन्तु यह बात मेरे कहने से न मानिए। मेरे सामने इस समय चंद कवि के रासों में बहुत से रूप ऐसे हैं जिनको इस मंडली में पंडित सुधाकर जी और दो तीन को छोड़कर बहुत कम लोग जानते हैं। मैं तो इसका चैथाई भी समझ नहीं सकता। मैं जो देखता हूँ वह आपके सामने उपस्थित करता हूँ। आप ही देखकर यह कहंे कि कौन ठीक है। संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत और प्राकृत से तीसरा रूप हिन्दी दिखाई दिया। अब आप थोड़े से शब्दों पर विचार करें। अग्नि का आग और योग का याग हो गया। चंद के काव्य में तुलसीदास की एक चैपाई को बीच में यदि मैं रख दूँ तो बहुत सज्जनों को यह न मालूम होगा कि दोनांे के बीच कितना अंतर है। संवत् 1125 में चंद कवि ने इसको लिखा। उनकी भाषा में जितने रूप देखते हैं वह रूप इस भारतवर्ष की किसी दूसरी भाषा के रूप से नहीं मिलते। मिलते हैं, हिन्दी से और उतने ही जितनी आज की अंग्रेजी चैसर की अंग्रेजी से मिलती है। ऐसी दशा में यह कहना कि हिन्दी भाषा क्या है, इसका उत्तर यह है कि हिन्दी भाषा वह है जिसमें चंद कवि से लेकर आज तक हिन्दी के ग्रन्थ लिखे गये। यह सही है कि पहले इसका नाम भाषा था, हिन्दी भाषा या सूरसेनी।

क्या आप भाषा की उत्पत्ति पूछते हैं। कितने ही लोगों को अपनी माँ का नाम नहीं मालूम । बहुत सी औरतें ऐसी हैं जिनको अपने लड़कों का नाम नहीं मालूम। प्रयाग और बनारस के कितने ही बालकों का नाम सिर्फ बच्चा है। पिता और दादा के नाम का पता लगाना और भी कठिन है। नाम रखते हैं किन्तु उसको याद नहीं रखते। अस्तु, देखना चाहिए कि चंद के समय से जो भाषा लिखी जाती है वह एक है, उसी को हम हिन्दी भाषा कहते हैं। कभी-कभी लोग उसका नाम बदल देते हैं। भीष्म को लीजिए देवव्रत उनका नाम था। जब उन्होंने पिता की प्रसन्नता के लिये राज्यत्याग किया, ब्रह्मचर्य अंगीकार कर कहा कि हम विवाह न करेंगे, केवल इसलिये कि पिता प्रसन्न होंगे, तब उस दिन से उनका नाम भीष्म हुआ, छठी के समय नहीं हुआ था। इसी तरह भाषा का भी नाम बदलता है। पहले कुछ था, अब कुछ है। भाषा का नाम पहले आैर था पर अब तो हिन्दी कह के इसे पूजते हैं, प्रेम करते हैं। इस हिन्दी भाषा का दूसरा प्रश्न यह उपस्थित होगा कि हिन्दी भाषा की और भाषाओं के साथ तुलना करने से क्या पता लगता है। इसमें भी मैं इतना कहूँगा कि हिन्दी सब बहनों में माँ की बड़ी और सुघर बेटी है। संस्कृत के वंश की बेटियों के 22 करोड़ बोलने वाले हैं, उनमें पाँच या छः करोड़ मद्रास में तामिल और तेलगू बोलते हैं। उनकी भाषा में संस्कृत का भण्डार भरा हुआ है, उनके वाक्यों में संस्कृत की लड़ी आती रूप आपको मिल सकते हैं। परन्तु यह बात मेरे कहने से न मानिए। मेरे सामने इस समय चंद कवि के रासों में बहुत से रूप ऐसे हैं जिनको इस मंडली में पंडित सुधाकर जी और दो तीन को छोड़कर बहुत कम लोग जानते हैं। मैं तो इसका चैथाई भी समझ नहीं सकता। मैं जो देखता हूँ वह आपके सामने उपस्थित करता हूँ। आप ही देखकर यह कहंे कि कौन ठीक है। संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत और प्राकृत से तीसरा रूप हिन्दी दिखाई दिया। अब आप थोड़े से शब्दों पर विचार करें। अग्नि का आग और योग का याग हो गया। चंद के काव्य में तुलसीदास की एक चैपाई को बीच में यदि मैं रख दूँ तो बहुत सज्जनों को यह न मालूम होगा कि दोनांे के बीच कितना अंतर है। संवत् 1125 में चंद कवि ने इसको लिखा। उनकी भाषा में जितने रूप देखते हैं वह रूप इस भारतवर्ष की किसी दूसरी भाषा के रूप से नहीं मिलते। मिलते हैं, हिन्दी से और उतने ही जितनी आज की अंग्रेजी चैसर की अंग्रेजी से मिलती है। ऐसी दशा में यह कहना कि हिन्दी भाषा क्या है, इसका उत्तर यह है कि हिन्दी भाषा वह है जिसमें चंद कवि से लेकर आज तक हिन्दी के ग्रन्थ लिखे गये। यह सही है कि पहले इसका नाम भाषा था, हिन्दी भाषा या सूरसेनी।

क्या आप भाषा की उत्पत्ति पूछते हैं। कितने ही लोगों को अपनी माँ का नाम नहीं मालूम । बहुत सी औरतें ऐसी हैं जिनको अपने लड़कों का नाम नहीं मालूम। प्रयाग और बनारस के कितने ही बालकों का नाम सिर्फ बच्चा है। पिता और दादा के नाम का पता लगाना और भी कठिन है। नाम रखते हैं किन्तु उसको याद नहीं रखते। अस्तु, देखना चाहिए कि चंद के समय से जो भाषा लिखी जाती है वह एक है, उसी को हम हिन्दी भाषा कहते हैं। कभी-कभी लोग उसका नाम बदल देते हैं। भीष्म को लीजिए देवव्रत उनका नाम था। जब उन्होंने पिता की प्रसन्नता के लिये राज्यत्याग किया, ब्रह्मचर्य अंगीकार कर कहा कि हम विवाह न करेंगे, केवल इसलिये कि पिता प्रसन्न होंगे, तब उस दिन से उनका नाम भीष्म हुआ, छठी के समय नहीं हुआ था। इसी तरह भाषा का भी नाम बदलता है। पहले कुछ था, अब कुछ है। भाषा का नाम पहले आैर था पर अब तो हिन्दी कह के इसे पूजते हैं, प्रेम करते हैं। इस हिन्दी भाषा का दूसरा प्रश्न यह उपस्थित होगा कि हिन्दी भाषा की और भाषाओं के साथ तुलना करने से क्या पता लगता है। इसमें भी मैं इतना कहूँगा कि हिन्दी सब बहनों में माँ की बड़ी और सुघर बेटी है। संस्कृत के वंश की बेटियों के 22 करोड़ बोलने वाले हैं, उनमें पाँच या छः करोड़ मद्रास में तामिल और तेलगू बोलते हैं। उनकी भाषा में संस्कृत का भण्डार भरा हुआ है, उनके वाक्यों में संस्कृत की लड़ी आती है। फलतः संस्कृत की महिमा इस देश में गाज रही है और बहुत दिन तक गाजेगी। अब रहा कि इस बहनों में कौन बड़ी और कौन छाेटी है। यह पक्षपात है कि हमारी भाषा हिन्दी है और हम हिन्दू है, हिन्दी का पक्ष करें या हमारा यह विचार है कि (छोटे मुँह बड़ी बात है, मगर चित्त में जो कुछ है कह देंगे) दंडी कवि ने भी उसमें पक्षपात किया है। किन्तु हिन्दी भाषा को यदि मैं आपके सामने यह कहूँ कि यही सब बहनों में माँ की अच्छी पहली पुत्री है, अपने पिता और माता की होनहार मूतिर् है, तो अत्युक्ति न होगी। सौरसेनी में शब्द बंधे हुए हैं, फलते नहीं, महाराष्ट्री में उखड़ते पुखड़ते नाचते कूदते जाते हैं। आपको अनेक शब्द हिन्दी भाषा में मिलते हैं जिनके सात-सात रूप हैं। भारतीय सभी भाषाओं में हिन्दी शब्दों की न्यूनाधिक झोली की झोली भरी पड़ी है। हाँ, यह मानना पड़ेगा कि इनके रूप में बड़ा परिवर्तन है। जैसे कि बनारस से नीचे बंगाल में चलिए तो आगे चलकर बिहार में बिहारी मिलेंगी, बंगाल में जाइये तो लकारों का संगीत पाया जाता है। हरिद्वार से जब गंगा चलीं और उनके संग में जो पत्थर के टुकड़े बहते हुए चलें तो हरिद्वार से काशी आते-आते रगड़ते झगड़ते कोमल और चिकने हो गए। इसी प्रकार यह बिहार में गाजीपुर और बनारस से नीचे रगड़कर प्रिय कोमल स्वराें के हो गए। जब आप बंगाल में पहुँचे तब आपको कोमलता का घर मिला। वहाँ आप की भाषा भी अधिक कोमल दिखाई दी। यहाँ की भाषा का रूप देख हमारे यूरोपियन विद्वान् आैर देशी विद्वान् भी भ्रम में पड़ गए हैं कि क्या हिन्दी महाराष्ट्री और सौरसेनी, पंजाबी आैर बंगला, सब वस्तुतः एक हैं। हमें भी स्वीकार कर लेना चाहिए कि इनके बीच बड़ा अंतर हो गया है। संस्कृत शब्दों का हिन्दी ही में कितना परिवर्तन हो गया है। जो कर्ण था वह कान, नासिका थी वह नाक है, जो हस्त था वह हाथ है। पानीय का पानी है। यह परिवर्तन सभी जगह दिखाई देता है। लक्ष्मी को भाषावालों ने लिखा लच्छमी या लक्खी। लच्छमी कहने में जो प्रेम आया वह लक्ष्मी कहने में नहीं। जैसे-जैसे भाषा बंगाल की ओर बढ़ी वैसे-वैसे कहा गया कि इसमें जितना कर्कशपन है उसे काट दो। अब बेटियों में बड़ा रूपांतर हुआ। यहाँ तक यह कह दिया कि भाषा की उत्पत्ति क्या है। सिवाय इसके यह निवेदन करता हूँ कि जितने और प्रमाण हैं जिनसे भाषा की अवस्था को जान सकते हैं, अब उसको जाँचना चाहिए। भाषा के रूप की शब्दमाला क्या है? इन दोनों के विचारों से हिन्दी भाषा ही प्राचीन है। डाॅक्टर ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि हिन्दी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। आप कहेंगे कि इसमें कौन फूहड़ मालूम होती है। यह मेरा कहना आवश्यक भी नहीं है। यह समझा जा सकता है कि मैं हिन्दू हूँ और पक्षपात से कहता हूँ।

आज मैं अपने बंगाली हिन्दुस्थानी गुजराती भाइयों से पुकार कर कहता हूँ कि भाषा एक चली आई और संस्कृत भी एक है। जब प्राकृत हुई तब अंग की प्राकृत हो गई किन्तु मूल में एक ही रही। जितनी भाषाएँ हैं, हमारी हैं। बंगाली हमारी भाषा, पंजाबी हमारी भाषाऔर गुजराती हमारी भाषा है। अब इसके विचार से कौन किसको कहे कि कौन बुरी है।

हिन्दी अपनी बहनों में सबसे प्राचीनतमऔर बड़ी बहन है और माता की रूप आकृति इससे बहुत मिलती-जुलती है। यह सब जो बड़ी-छोटी बातें मैं आपसे निवेदनकरता हूँ इसका दूसरा प्रमाण मिलना चाहिए। शब्दमाला, शब्दों की रचना यह तो हो गया। दूसरा प्रमाण है ग्रन्थमाला। अधिक हिन्दी ग्रन्थमाला का, भाषाओं की ग्रन्थमाला का शिवसिंह जी ने जैसा कि मालूम होगा, इन बातों को दिखाया है। प्रथम हिन्दी भाषा का काव्य 770 में हुआ। भाषा के ग्रन्थों में राजा मान की सहायता और आदेश से दूसरा जो हमें मिलता है, वह पूज्य कवि 802 में हुआ और तीसरा लेख जो मिलता है, वह राव खुमान सिंह ने एक ग्रन्थ हिन्दी में लिखा। 900 में खुमानरासो, पृथ्वीराजरासो प्रसिद्ध किया। चैथा ग्रन्थ, जैसा कि मैं अभी आपसे निवेदन कर चुका हूँ, चंद कवि कृत रासो है। जो भाषा के विद्वान् हैं और जो भाषा की रूपरचना जानते हैं, वह बिना शंका के यही कह देंगे कि जिस भाषा में चंद कवि ने ग्रन्थ लिखा है वह भाषा बहुत पहले से हुई है। यह नहीं हो सकता कि जिसकी भाषा प्रिय होने लगी उसी में ग्रन्थ लिख डाला। चंद कवि से पहले अनेक कवि हो चुके थे। उन्होंने उर्दू में लिखा, हिन्दी में नहीं। हिन्दुओं में ब्राह्मण और कायस्थ उर्दू अधिक पढ़ने वाले थे। पर हमारे क्षत्रिय भाईयों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। उनमें पढ़ने का प्रचार कम हुआ। वह इसके बदले जमींदारी और खेतीबारी में रहे और उसी से प्रेम रहा और विद्या को कम पढ़ा। वैश्य जो हमारे भाई हैं, उन्होंने कहा, कि जिसको नौकरी करना हो वह पढ़ने जाय, उन्हें इतनी फुरसत कहाँ। वह दूसरी ओर उन्नति करते रहे। आप को उर्दू के ज्ञाता मिलेंगे- ब्राह्मण और कायस्थ। ब्राह्मणों में काश्मीरी ब्राह्मण बुद्धि में प्रखर, भाषा के विशेष योग्य थे। इनका प्रेम उर्दू की ओर बढ़ गया और वे इसी तरफ झुके। कायस्थ भाइयों का भी यही हाल हुआ कि सरकारी दफ्तरों में उर्दू गाज रही थी, हिन्दी सभ्य भाषा भी नहीं समझी जाती थी। हमारे पंडित मथुराप्रसाद, राजा शिवप्रसाद कह गए हैं कि हिन्दी भाषा को यह कहना कि हिन्दी कोई भाषा ही नहीं अनुचित है। यह दशा थी। इसी कारण से हिन्दी की उन्नति न हुई। अब क्या होता है। इस बीच में और और प्रान्तो में उन्नति हुई। बंगाल में जैसा कि मैं आपसे निवेदन कर चुका हूँ, भाषा का बड़ा सुधार हुआ। एक अंश में सर माइकल मधुसूदन को लीजिए। हेमचन्द्र बंकिमचन्द्र इत्यादि बंगाली बड़े-बड़े कवि हुए हैं। उन्हाेंने उपन्यास, इतिहास, और काव्य से अपनी भाषा को बनाया, सजाया। इसके उपरांत कबीरदास हुए, 1540 में मलिक मुहम्मद जायसी हुए। गोस्वामी तुलसीदासजी, श्री केशवदासजी, दादूदयालजी, गुरू गोविन्द सिंहजी, बिहारीलाल को ही देखिए। हर एक की भाषा में हिन्दी के पुष्ट रूप दिखलाई पड़ रहे हैं। यह सिद्ध है कि भाषाओं में मरहटी भाषा में, जो सबसे पुष्ट है, नामदेव 13वीं सदी में थे। बंगला भाषा में, जिसे आज देखकर आनंदित होते हैं और यदि सच कहूँ तो ईष्र्या भी होती है, चंडीदासजी बड़े प्रसिद्ध 14वीं सदी में हुए। चंद के समय तक मराठी में, न बंगला में, न गुजराती, में तीनों में इतना बड़ा काव्य नहीं था जितना बड़ा काव्य चंद कवि का हिन्दी में मिलता है। इस प्रकार से हिन्दी भाषा आरम्भहुई। यदि यह जानना चाहते हैं कि किसका भण्डार किसका रूप और कौन अधिक थी, तो इसके देखने के लिए मैं आपके सम्मुख कुछ बातें उपस्थित करता हूँ। यह जो सन् 1857 ई0 में विप्लव हुआ, उस समय से भाषाओं की और उन्नति हुई। 1835 ई0 में बंगाल में, पंजाब में फारसी भाषा दफ्तरों में थी। अँगरेजीगवर्मेण्ट ने इसको मिटाकर मराठी, गुजराती, बंगाजी और उर्दू को इनके स्थान में किया। वहाँ से देशी भाषाओं की उन्नति की रेखा बँधी। अब इस बात का विचार कीजिए कि सन् 1835 के पूर्व और 1858 के उपरान्त इन सब भाषाओं का कैसा भाण्डार था, इनमें ग्रन्थमाला कैसी थी? 770 से लेकर आप केवल बड़े-बड़े कवियों को लीजिए। उनके ग्रन्थ आज तक हिन्दी भाषा का भाण्डार भर रहे हैं। चंद कवि के रासो काे ले लीजिए। लल्लूजी, कबीरदास, गुरू नानक जी, मलिक मुहम्मद जायसी, भीमदेव, तुलसीदास, सूरदास, अष्टछाप, केशवदास, दादूदास, गुरू गोविंदसिंह जी, बिहारीलाल, किस किसके नाम गिनाऊँ। मुझे सब गिनाना भी नहीं। बिहारीलाल को ले लीजिए। इन्होंने 1650 के लगभग ग्रन्थ लिखा है। बहुत वृक्ष वाटिकाओं में उगते हैं, कितने ही आपसे आप उगते हैं, उनका झाड़ भी बड़ा फैला हुआ होता है। जैसे-जैसे वे ऊपर उठते हैं वैसे-वैसे उनकी छाया अधिक होती जाती है। कुछ ऐसे होते हैं, जिनको आप काटकर मट्टी बनाकर किसी स्थान में लगाते हैं और अपनी वाटिकाओं में उगाते हैं। इसी तरह भाषा में जो बहुत शब्द हैं, जैसे कर्ण से कान, हस्त से हाथ संस्कृत से उत्पन्न हुए हैं वे प्राकृत रूप में अपने से आप उपजे। जो शब्द संस्कृत के उठाकर रख दिए हैं, वह वैसे ही हैं जैसे कि गुच्छा, कितने ही वृक्ष थोड़े समय में सूख जायँगे, फिर उनमे ं शक्ति नहीं कि वह दूसरे फल उत्पन्न करें। जहाँ यह मुरझाए, फिर इन्हें हटाना ही पड़ेगा। इसी प्रकार से हिन्दी भाषा के तद्भव शब्द जो हैं वह निज की संपत्ति हैं, उनके निज के अवयव पुष्ट हैं, वह फूलें फलेंगे और अपने आप बढ़ते चले जायँगे। यह सब प्रबल और पुष्ट होते हैं। किन्तु जिन शब्दों में किसी का पैबंद लगा दिया जाता है, वह बनने को बन जाते हैं किन्तु पुष्ट नहीं होते। जो लिए हुए शब्द हैं, उनमें भाषा की शक्ति नहीं। बच्चा माता के दूध से जितना पुष्ट होता है, ऊपरी दूध से उतना पुष्ट नहीं होता, जो बच्चा धीरे-धीरे माता का दूध पी ता है वह पुष्ट होता जाता है और अंत में संसार में काम करने योग्य होता है। फिर भी हरेक भाषा में हर एक तरह के शब्द मिलेंगे ही, जैसे भोजन में दा ल भात रोटी इत्यादि। और संस्कृत की जितनी बेटियाँ हैं, वह सब भी माँ के गहनों को पहनेंगी, चाहे वह अच्छा हो चाहे बुरा, सब माँ का गहना है। उनमें एक गहना दो गहना चार गहना माँ का है। माँ के गहने से बड़ा प्रेम होता है। उस समय उनको धारण करने में विशेष आनन्द होता है। किन्तु जो सब गहने माँ के ही हों तो सब कहेंगे कि यह सब माँ की संपत्ति है। इसलिये हिन्दी भाषा का यह सौभाग्य है कि उसके जो शब्द हें वह सब माता के ही प्रसाद हैं। किन्तु माता ने कहा, हे बेटी! यह तेरे हैं, तू इसका व्यवहार करना। बिहार में बंगाल में विद्यापति जी ने हिन्दी भण्डार से फूल पत्ते ले जाकर अपने काव्यग्रन्थ को भरा है। इस प्रकार आप देखेंगे कि दक्षिण में मराठी में भी जो शब्द का मेल हैं, उसमें जो कुछ तद्भव शब्द व्यवहार में लाए जाते हैं वह यहीं के हैं। हम आप ‘मुझ, तुझ’ कहते हैं मराठी में ‘मुझा तुझा’ कहते हैं। हाँ यह मानना पड़ेगा कि इन शब्दों का उच्चारण बंगाल में और है, महाराष्ट्र में और। हमें इस बात की ईष्र्या नहीं है, अगर वह सबकी माँ नहीं तो मौसी है। हम तो सब के बालक हैं। सबके पैरों पर लोटेंगे। माँ ने भोजन दे दिया तो ले लेंगे, मौसी ने दे दिया तो ले लेंगे। वह हमारी, हम उनके हैं। आप देखेंगे कि हिन्दी भाषा में शब्दों का अिधक भण्डार है, यह बड़ा प्रबल है और हिन्दी की यह बड़ी सम्पत्ति है। इस प्रकार से आप कीग्रन्थमाला की शब्दावली का भण्डार भरा हुआ है। सन् 1835 से 1858 तक महाभारत का प्रथम अनुवाद हुआ। इसके उपरांत एक विशेष दशा आई। आप जानते हैं कि रीति जो पड़ जाती है, वह छोड़े नहीं छुटती। जब-जब जिस-जिस स्थान में आप देखंेगे, लता वृक्ष के सहारे फैलती पाएँगे। सबसे बड़ा सहारा प्रत्येक भाषा का राजा ही होता है। बिहारी ने जयपुर के महाराज के यहाँ जाकर अपनी कविताशक्ति का चमत्कार दिखाया। शिवाजी महाराज के आश्रय में भूषण कवि ने अपनी कविताशक्ति का परिचय दिया। एक ओर युद्ध में तलवार नाचती थी, दूसरी ओर उनकी कविता नाचती थी। राजा का आश्रय दो प्रकार का होता है। एक तो प्रत्यक्ष, दूसरा गुप्त। इन दोनों की आवश्यकता है, किन्तु इस समय मैं प्रत्यक्ष को ही लूँगा। जब अँगरेजी गवर्मेंट इस देश में आई, तब उसने बड़ी ही सुव्यवस्था की जिसके लिए उसे सच्चे हृदय से धन्यवाद देना चाहिए। इसने इस देश में ऐसा नियम स्थापित किया जिससे आज इतना बड़ा समारोह हो रहा है। याद रहे कि कोई व्यक्ति चाहे वह ऊँचे घर का बालक ही क्यों न हो, जब गिरता है, तब बुरा गिरता है। यह पवित्र आर्यजाति जो अपनी प्राचीन महिमा से गिरी तो ऐसी गिरी कि फिर से उसका पुनरूद्धार न हुआ। इस आर्यजाति के पतन के कारण इससे महाराष्ट्रों और सिक्खों का अलगाव हुआ। जब से अंग्रेजी गवर्नमेण्ट आई तब से आप देखते हैं कि विद्या की चर्चा बढ़ गई। यंत्रालय आया, साथ ही साथ बड़ी भारी शिक्षा आई। आपने देखा होगा कि अँगरेज लाेग अपनी भाषा की कैसी उन्नति करते हैं अँगरेजी गवर्नमेण्ट ने यहाँ आ अँगरेजी विद्या के प्रचार का उपाय किया, साथ-साथ आपकी संस्कृत भाषा की उन्नति का भी पथ प्रशस्त किया। इस काशीपुरी में सबसे पहले क्वींस काॅलेज और संस्कृत कालेज स्थापित हुआ, जिससे हिन्दुओं की भाषा की रक्षा हुई। गवर्नमेण्ट के उत्तम कार्यों का धन्यवाद हम हिन्दू किसी प्रकार कर नहीं सकते और आज जो आपके भारतवर्ष में कुछ जनों में संस्कृत का प्रचार देख पड़ता है, इस काशी ही में धुरंधर पंडित मिलते हैं जिनका सम्मान बड़े-बड़े लोग करते हैं, उसका अन्यतम कारण अंग्रेज सरकार का संस्कृत-प्रचार है। मैरे आपसे इसको सुनकर नहीं कहा है। डाॅ0 वालेंटाइन जब प्रिंसिपल थे तब उन्होंने लेख लिखा था कि हमको केवल संस्कृत के ग्रन्थों का अनुवाद करके हिन्दी भाषा में प्रचार करना चाहिए; सो उन्होंने अपने समय में जो आवश्यक था वह कर डाला। किन्तु खेद की बात है कि इतना अवसर पाने पर भी हम जगाए जाने से भी आप से आप नहीं जागे। गवर्नमेण्ट की सहायता से भी नहीं जागे। इस प्रान्त में भाषा की उन्नति का बीज सबसे पहले बोया गया था, किन्तु आज उसी प्रान्त की हिन्दी भाषा अपनी और बहनों के सामने मुँह मोड़े खड़ी है। अब 1835 के लगभग आ जाइए। उस समय गवर्नमेण्ट के सरकारी दफ्तरों में फारसी में काम होता था। गवर्नमेण्ट ने 1835 में यह आज्ञा दी कि हिन्दुस्थान की भाष्ााएँ भी काम में लाई जायँ। इस आज्ञा के फल से इस प्रान्त में उर्दू जारी हो गई; हिन्दी जारी नहीं हुई, इसका फल यह हुआ कि हिन्दी की बड़ी अवनति हुई। यह सत्य है कि सन् 1844 ई0 में जब टामसन साहब लेफ्टिनेंट गवर्नर थे, सरकार ने हिन्दी भाषा का पढ़ना-पढ़ाना आरंभ किया। यदि यह न हुआ होता तो आज आपको हिन्दी के जानने वाले इतने भी न मिलते जिनसे लोगों को पढ़ाने का अवसर मिलता। फिर भी अदालतों में हिन्दी के प्रवेश न करने से हिन्दी की उतनी उन्नति नहीं हुई। उर्दू सरकारी दफ्तरों में जारी थी उसी का प्रचार था। फिर भी उर्दू का वैसा प्रचार नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था। उर्दू पुस्तकों की उतनी उन्नति नहीं हुई जितनी बंगाली, महाराष्ट्री और गुजराती की। मैं जानता हूँू कि मुसलमान अब जागे हैं, किन्तु पचास साठ वर्ष तक उन्होंने उर्दू की वैसी उन्नति नहीं की जैसी करनी चाहिए थी। उर्दू की उन्नति में बाधा पड़ने का एक कारण यह है कि उर्दू, विशेष करके वह उर्दू जिसे अधिकतर उर्दू के प्रेमी लिखते हैं, अरबी और फारसी के शब्दों से भरी होती है, जिसके जानने वाले लोग कम हैं और जिसके लिखने वाले लोग भी कम हैं। सन् 1858 में जब गवर्नमेंट ने विद्या के विभाग के नियम बनाए, उन्हीं दिनों स्कूल के लिये हिन्दी पुस्तकें छपवाई और बहुतेरे विद्वानों की सम्मति ली। गवर्नमेण्ट आॅफ इंडिया ने सन् 1873 के लगभग 231 पुस्तकों का संचय किया। गवर्नमेण्ट की सहायता से आदित्यराम जी ने एक दो अनुवाद अंग्रेजी पुस्तकों के किए, राजा शिवप्रसाद जी से सम्मति ली गई। लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिए कि हिन्दू मुसलमान दोनों की तरफ से, जहाँ तक मुझको मालूम हुआ है, इन पुस्तकों के पढ़ने वाले अधिक नहीं थे, इसीलिये दोनों की उन्नति नहीं हुई। और प्रान्तवालों ने जिन्होंने अंग्रेजी पढ़ी, उनकी दूसरी भाषा मातृभाषा थी, बंगालियों ने अँगरेजी पढ़ी, उनकी दूसरी भाषा बंगला थी। बंगालियों को ले लीजिए, चार विद्वानों ने बंगाली भाषा को जन्म दिया। पचास वर्ष में बंगला ने ऐसी उन्नति की कि उसको देखकर न केवल संतोष ही होता है बल्कि ईष्र्या भी होती है। मराठी में ऐसा ही हुआ कि जिन्होंने अँगरेजी पढ़ी उन्होंने साथ-साथ अपनी भाषा भी पढ़ी। गुजरात में वर्नाक्यूलर सोसाइटी बनी। संस्कृत से अनुवाद करना आरम्भ किया गया, उनकी भाषा की पुस्तकें जितनी बिकने लगीं, वह सभी को मालूम है। अनुवाद का अंत नहीं। आज ऐसा होता है कि अँगरेजी भाषा में जो अच्छी पुस्तकें छपती हैं, उनका अनुवाद हो जाता है। इधर हिन्दू, मुसलमान, काश्मीरी, कायस्थ हमारे सब भाइयों ने सिर्फ उर्दू लिखना आरम्भ किया। ‘गुलजारे नसीम’ पंडित दयाशंकर नसीम ने लिखी। हिन्दुओं काे यह तो शौक हुआ कि वह लिखें लेकिन हिन्दी में लिखने का शौक नहीं हुआ। पंडित रतननाथ सरशार ने ‘फिसानये आजाद’ लिखक उर्दू भाषा को अनमोल हार पहना दिया। पर हिन्दी जाननेवालों को उस हार का पता नहीं कि वह कैसा है, मूँज का हार है या किसका। यह सत्य है कि मुसलमान कवियों ने हिन्दी भाषा की भी सेवा की है। मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत लिखा है, जब तक हिन्दी भाषा रहेगी उनका नाम रहेगा। किन्तु मैं आपको यह दशा दिखलाता हूँ कि काश्मीरी भाइयों ने जो लिखा वह उर्दू में। हमारे हिन्दू भाइयों में कायस्थ भाइयों ने बहुत समय से बहुत कुछ लिखा किन्तु वह भी उर्दू में। उन्होंने विज्ञान काव्य की कितनी ही पुस्तकें लिखीं। हिन्दू मुसलमानों द्वारा उर्दू की उन्नति का यत्न किया गया सही, किन्तु हमें तो बंगला की उन्नति और वृद्धि से संतोष होता है। मराठी गुजराती से भी ऐसा ही होता है। वहाँ विद्या सरस्वती आप ही आप चली आई। इधर हिन्दी के लिये काम करने वाले नहीं। यह दशा आपकी है। 1835 और 58 से पहले आपकी हिन्दी भाषा अपनी माँ की सुन्दर छवि को लिए हुए अपने भण्ज्ञर को भरे आनन्द के साथ बैठी हुई आपको देखती है। 1835 और 58 के बाद इसकी और बहनें आगे बढ़ गई, यह जहाँ की तहाँ रह गई। कहते हुए दुःख होता है कि जिस हिन्दी के लिखने वालों में चंद कवि तुलसीदास, सूरदास, बिहारीलाल हो गए हैं, बबुआ हरिश्चन्द्र हो गए है, वह हिन्दी आज अपनी बहिनों के सामने आखें नीची किए खड़ी है। हिन्दी के प्रेमियों! तुम्हारे और हमारे लिये यह बड़ी ही लज्जा की बात है। यह सच है कि अँगरेजी कार्यालयों में िहन्दी का प्रचार अधिक नहीं। 1858 में जब राजा शिवप्रसाद विद्यमान थे, उस समय अनेक सज्जनों ने इस बात को कहा था कि सरकारी दफ्तरों में हिन्दी भाषा का प्रवेश हो, किन्तु उस समय यह बात बातों ही में रह गई।

अंत में सर एंटनी मेकडानल का भला हो, उन्होंने यह आज्ञा दी कि कचहरियेां में जो दरख्वास्तंे दी जावें वह हिन्दी उर्दू दोनों में लिखी जावें। उस समय से हमलोग हिन्दी भाषा की विशेष उन्नति करने लगे हैं। जब रोगी दुर्बल हो सन्निपात की दशा को पहुँच जाता है, तब पहले उसका ज्वर छुड़ाया जाता है, फिर उसका आहार आदि ठीक किया जाता है, अंत में यह पहाड़ हट गया। किन्तु बड़े धिक्कार और बड़े लज्जा की बात है कि यद्यपि यह पहाड़ हमारे मार्ग से काटकर हटा दिया गया, तो भी हमलोगों ने आज तक इससे पूरा लाभ न उठाया। हम वकील हम मुख्तार, हम व्यवहार करने वाले महाजन और वह लोग जो कचहरी में वकालत करते हैं, और अपने हिन्दू भाइयों के मुकदमें में उनका धन व्यय कराते हैं, हम लोग भी हिन्दी भाषा की ओर से उदासीन हैं। कितने लोग हैं, जो जाति का उपकार करते हैं। कहते हैं कि जाति बिना भाषा जीवित नहीं रह सकती, जैसे कि नाल के बिना बालक नहीं जीवित रह सकता। किन्तु क्या यह बात सत्य है? जरा बंगाली मराठी आदि को देखिए। हिन्दी भाषा के कितने लोग हैं जिनको इस बात से दुःख और लज्जा होती है कि यह आर्यावर्त देश, जहाँ कि आप देखेंगे कि लाखों लोग ऐसे हैं जो अपनी माँ की बोली से परिचय नहीं रख्ाते। सब आशा उन्नति को छोड़ दीजिए। उन्नति करने वालों के सामने खड़ा होना छोड़ दीजिए। जब तक आप इस लज्जा को न मिटावें, अपनी माँ की बोली न सीखें, तब तक आप मुँह न दिखावें। मातृभाषा के सीखने में कौन लज्जा करता है? अब आप लोग अपने हृदय में आज से इस बात का प्रण कर लें कि जब तक आप मातृभाषा को सीख न लेंगे तब तक आप मस्तक ऊँचा न करेंगे। कोई अँगरेज जो अँगरेजी भाषा से परिचित न हो या कोई और देश का पुरूष जो अपने देश की भाषा न जानता हो, क्या कभी गौरवान्वित हो सकता है? जब हमारी यह दशा है तब क्यों न इस भाषा की दुर्दशा होगी और क्यों न हमको औरों के सामने दुर्बलता स्वीकार करनी पड़ेगी? यह सत्य है कि कुछ लोग अपनी मातृभाषा का काम करते हैं, किन्तु ऐसे लोग कितने हैं? मेरा यह प्रस्ताव नहीं है मेरा यह निवेदन है कि जो हुआ वह हुआ, अब क्या करना चाहिए। आपको यह आवश्यक है कि सरकारी दफ्तरों से जो नकलें दी जाती हैं, उनको आप हिन्दी में लें, जो डिगरियाँ तजबीजें आदि मिलती हैं, उनको आप हिन्दी में लें। यह सब आपके लिये आवश्यक है। गवर्नमेण्ट ने आपको जो अवसर दिया है, उसे आप काम में नहीं लाते। इसके उपरान्त यह भी सत्य है कि आज तक इस कारण से आपके अँगरेजी पढ़नेवालों में केवल उर्दू का अधिक प्रचार है। अब मैं यह आशा करता हूँ और सोचता हूँ कि जब तक यह प्रचार रहेगा, तब तक हिन्दी भाषा की उन्नति में बड़ी रूकावट रहेगी। उर्दू भाषा रहे, कोई बुद्धिमान पुरूष यह नहीं कह सकता कि उर्दू मिट जाय। यह अवश्य रहे और इसके मिटाने का विचार वैसा ही होगा, जैसा हिन्दी भाषा के मिटाने का। दोनों भाषाएँ अमिट हैं, दोनों रहेंगी। उर्दू भ्ााषा के प्रेमी करोड़ों हैं और इस पचास वर्ष में उन्होंने बहुत कुछ उन्नति की है। मौलवी जकाउल्लह साहब, मुहम्मद हुसैन आजाद और देहली के नजीर अहमद को लीजिए, उस शब्दकोष को लीजिए, जो निजाम हैदराबाद में छपकर तैयार हो गया है। हैदराबाद में मुसलमान भाई 25 वर्ष से उर्दू की उन्नति का बड़ा यत्न कर रहे हैं। हमको संतोष और सुख होता है कि मौलवी शिवली के काम से उसकी उन्नति में अधिकता हुई है और उसकी उन्नित हमारे देश की उन्नति है। हम इसकी भलाई चाहते हैं, किन्तु इसी के साथ-साथ हमें यह भी कहना चाहिए कि हिन्दी जानने वाले इस ्रान्त में बहुत हैं। पिछली मनुष्य गणना से जान पड़ा है कि एक उर्दू जाननेवाला है, तो चार हिन्दी जाननेवाले। हमारे मुसलमान भाई जिनको इसका प्रेम है और जो देशभक्त हैं, जिनसे हमारे देश की सब तरह की उन्नति है, वह उर्दू की उन्नति का यत्न करें और हिन्दी जाननेवाले हिन्दी की उन्नति का। इस देश में हिन्दी भाषा जाननेवालों की कमी नहीं, कोई दस बारह करोड़ हैं। इनकी हिन्दी भाषा की उन्नति करने के लिये हमें क्या उपाय करना चाहिए? जितना अब विचार हो चुका है, उससे आपने यह देख लिया कि भाषाओं की अवस्था में कैसा उलट फेर हुआ और हिन्दी ज्यों की त्यों रही। यह दशा जो हमारी है, उसमें क्या करने की आवश्यकता है। इस बात के विचारने में मैंने आपसे कहा कि राजा के सहारे से बड़ा सहारा होता है। यदि आपको जैसा कि नागरी प्रचारिणी सभा के लिये गवर्नमेण्ट सहारा देती चली आई है, राजसाहा ̧य मिले तो काम बहुत कुछ बन जा सकता है। किन्तु बड़े दुःख की बात यह है कि अंग्रेजी गवर्नमेण्ट ने इसका जितना प्रचार करना चाहा था, हमारी अपेक्षा से उसका उतना प्रचार नहीं हुआ। हमलोंगों को जितना करना चाहिए था, उसका सिर्फ कुछ अंश हमने किया। अब यह सम्मेलन ही विचार करें कि इसकी उन्नति का क्या उपाय होना चाहिए। 
 
प्रथम हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन के सभापति महामना पंडित मदनमोहन मालवीय का भाषण हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन का यह अधिवेशन नागरी प्रचारिणी सभा के तत्त्वावधान में 10, 11, 12 अक्टूबर 1910 ई0 को हुआ था।


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