कबीर दास जी का परिचय एवं उनके काव्य की विशेषताएँ



कबीर संतमत के प्रवर्तक और संत काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि है। विलक्षण के धनी और समाज - सुधारक संत कबीर हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। इनके समान सशक्त और क्रांतिकारी कोई अन्य कवि हिन्दी साहित्य में दिखलाई नहीं पडता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीरदास के काव्य और व्यक्तित्त्व का आकलन करते हुए लिखा है - कबीर की उक्तियों में कहीं - कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बडी प्रखर थी, इसमें संदेह नहीं। कबीर की विलक्षण प्रतिभा पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है - हिन्दी साहित्य के हजार वर्षो के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्त्व लेकर लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। भाषा पर कबीर का जबर्दस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे। उनके संत रूप के साथ ही उनका कविरूप बराबर चलता रहता है।
PIYF Rishikesh India salute to nobel sage Kabīr (c. 1440 – c. 1518) was a mystic poet and saint of India,
कबीर की जन्मतिथि के सम्बन्ध में कई मत प्रचलित है, पर अधिक मान्य मत - डॉ. श्यामसुन्दर दास और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का है। इन विद्वानों ने कबीर का जन्म सम्वत् 1456 वि. (सन्1389 ई.) माना है। इनके जन्म के सम्बध में कहा जाता है कि कबीर काशी की एक ब्राह्मणी विधवा की सन्तान थे। समाज के डर से ब्राह्मणों ने अपने नवजात पुत्र को एक तालाग के किनारे छोड दिया था, जो नीरू जुलाहे और उसकी पत्नी नीमा को जलाशय के पास प्राप्त हुआ। विद्वानों के मतानुसार कबीर का अवसान मगहर में सम्वत् 1575 वि.(सन् 1518 ई.) में है।
Dhan Dhan Jai Satguru Kabir Ji Maharaj
कबीर की जितनी भी रचनाएँ मिलती हैं उनकें शिष्यों ने इन्हे बीजक नामक ग्रन्थ में संकलित किया है। इसी बीजक के तीन भाग हैं - साख, शबर और रमैनी । साखी में संग्रहित साखियों की संख्या 809 है। सबद के अन्तर्गत 350 पद संकलित है। साखी शब्द का प्रयोग कबीर ने संसार की समस्याओं को सुलझाने के लिए किया है। सबद कबीर के गेय पद है। रमैनी के ईश्वर सम्बन्धी, शरीर एवं आत्मा उद्धार सम्बन्धी विचारों का संकलन है। कबीर के निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी थे और वैष्णव भक्त थे। रामानंद से शिष्यत्व ग्रहण करने के कारण कबीर के ह्नदय में वैष्णवों के लिए अत्यधिक आदर था। कबीर ने धार्मिक पाखण्डों, सामाजिक कुरीतियों, अनाचारों, पारस्परिक विरोधों आदि को दूर करने का सराहनीय कार्य किया है। कबीर की भाषा में सरलता एवं सादगी है, उसमें नूतन प्रकाश देने की अद्भुत शक्ति है। उनका साहित्य जन-जीवन को उन्नत बनाने वाला, मानवतावाद का पोषाक, विश्व -बन्धुत्व की भावना जाग्रत करने वाला है। इसी कारण हिन्दी सन्त काव्यधारा में उनका स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
Kabir Dohas
कबीर काव्य की विशेषताएँ
भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में भक्ति आन्दोलन को देखा-परखा जाता है। यह इतिहास की महत्वपूर्ण घटना निम्नलिखित विशेषताओं के कारण है:- 
  • जनता की एकता की स्वीकृति
    भक्ति आन्दोलन ने अपने धार्मिक विचारों के बावजूद जनता की एकता को स्वीकार किया। यह स्वीकृति वैचारिक और व्यावहारिक दोनों आधारों पर है। रामानन्द की शिष्य परम्परा में कबीर, रैदास, दादू, तुकाराम तथा तुलसी समान रूप से स्वीकृत हैं, तथा मीरा ने अपने गुरू के रूप में रैदास को स्वीकार किया यह भी एक मिसाल है। दूसरे कबीर कहते हैं- "ना मैं हिन्दू ना मुसलमान" और तुलसी जब भील-भीलनी, किरात जैसी जंगली जातियों को राम के द्वारा स्वीकार और सम्मानित करवाते हैं तो इसी एकता की बात करते हैं।
     
  • ईश्वर के समक्ष सबकी समानता
    भक्ति आन्दोलन का यह एक ऐसा वैचारिक आधार है जिसके माध्यम से वह ऊँच-नीच एवं जाति और वर्ण-भेद के आधार पर विभाजित मानवता की समानता को एक नैतिक और मजबूत आधार प्रदान करते हैं। समाज में व्याप्त असमानताओं का आधार भी ईश्वर की भक्ति को बनाया गया था- भक्ति संतों ने उन्हीं के हथियारों से उन पर वार किया और कहा कि- 'ब्रह्म' के अंश सभी जीव हैं तो फिर यह विषमता क्यों? कि किसी को ईश्वर उपासना का सम्पूर्ण अधिकार और किसी को बिल्कुल नहीं, इतना ही नहीं इसी आधार पर समाज को रहन-सहन, खान-पान, छुआ-छूत एवं आर्थिक विषमताओं से विभाजित किया गया था। भक्तों ने चाहे वे निर्गुण हों चाहे सगुण सभी ने ईश्वर के समक्ष मानव मात्र की समानता को एक स्वर से स्वीकार किया।
  • जाति-प्रथा का विरोध
    'जाति प्रथा' समाज की एक ऐसी बुराई थी जिसके चलते समाज के एक बड़े वर्ग को मनुष्यत्व के बाहर का दर्जा मिला हुआ था। 'अछूत', 'शूद्र', 'अन्त्यज', 'निम्नतम' श्रेणी के मनुष्यों का ऐसा समूह था जिसे मनुष्यत्व की मूलभूत पहचान भी प्राप्त नहीं थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्ग में भी जातिगत श्रेष्ठता और सामाजिक व्यवस्था में उच्च श्रेणी के लिए संघर्ष होते रहते थे। भक्ति संतों ने मनुष्यता के इस अभिशाप से मुक्ति की लड़ाई पूरी ताकत से लड़ी। कबीर जब "ना हिन्दू ना मुसलमान" की बात करते हों या किसी जाति विशेष के विशिष्ट अधिकारों पर चोट करते हों जो उन्हें जातिगत आधार पर मिले हों तो वे वास्तव में जाति प्रथा की इसी वैचारिक धरातल को तोड़ना चाहते हैं। 'जाति' विशेष का विरोध या जाति को खत्म करने की बात नहीं की गई, बल्कि 'जाति' और 'धर्म' के तालमले से उत्पन्न मानवीय विषमताओं और हृसमान जीवन मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए जाति के आधार मिले विशेषाधिकारों को खत्म करने की बात भक्ति आन्दोलन ने उठाई।
    जाति प्रथा के आधार पर ईश्वर की उपासना का जो विशेष अधिकार ऊंची जाति वालों ने अपने पास रख रखा था और पुरोहित तथा क्षत्रियों की साँठ-गाँठ के आधार पर जिसे बलपूर्वक मनवाया जाता था। उसे तोड़ने का अथक प्रयास भी भक्ति आन्दोलन ने किया और कहा कि ईश्वर से तादात्म्य के लिए मनुष्य के सद्गुण - प्रेम, सहिष्णुता, पवित्र हृदय, सादा-सरल जीवन और ईश्वर के प्रति अगाध विश्वास आवश्यक है न कि उसकी ऊँची जाति या ऊँचा सामाजिक, राजनैतिक या आर्थिक आधार।
  • धर्मनिरपेक्षता
    धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति किसी धर्म-विशेष से कोई सम्बन्ध न रखे। बल्कि इसका अर्थ यह है कि अपने धर्म पर निष्ठा रखते हुए भी व्यक्ति दूसरे धर्मों का सम्मान करे तथा अपनी धार्मिक निष्ठा को दसूरे धर्मों में निष्ठा रखने वालों से जुड़ने में बाधा न बने। धर्मनिरपेक्षता एक जीवन मूल्य है जिसमें सहिष्णुता का गुण समाहित है। वर्ग, वर्ण, सम्प्रदाय तथा धर्मगत बन्धनों की अवहेलना करते हुए मनुष्य मात्र को ईश्वरोपासना का समान अधिकारी घोषित भक्ति आन्दोलन ने एक ऐसी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को जन्म दिया जो उस समय तो क्रांतिकारी थी ही आज भी इस विचारधारा को भारतीय समाज व्यावहारिक स्तर पर नहीं अपना पाया है। भक्ति आन्दोलन के सभी सूत्रधारों में यह जीवन-मूल्य कमोवेश पाया जाता है। कबीर ने तो मानो इस विचारधारा को जन-जन तक पहुंचने का बीड़ा उठा रखा था। वे जानते थे कि इसे पाना आसान नहीं है, नहीं होगा तभी उन्होंने शर्त रखी जो अपना 'सर' काटकर रखने की क्षमता रखता हो या अपना उन्होंने फूंकने की क्षमता रखता हो वही कबीर की इस धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के साथ चल सकता है।
    कबीरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ।
    जो घर जारे आपना, चले हमारे साथ।।
    जायसी इस विचारधारा को साहित्यिक स्तर पर अभिव्यक्त करते हैं। अपने मजहब के प्रति ईमानदारी रखते हुए भी उन्होंने दूसरे धर्ममतो को आदर दिया और जिसे मनुष्यता का सामान्य हृदय कहते हैं, या जिसे मनुष्यत्व की सामान्य भूमि कहते हैं, उस जमीन पर, जिससे भी मिलें, मनुष्य के नाते मिलें, बिना किसी भेदभाव के।
    भारत के सांस्कृतिक इतिहास में पहली बार अंत्यजों और पीडि़त-शोषित वर्गों ने अपने संत दिए और इन संतों ने प्रथम बार साहसपूर्वक सम्पूर्ण आस्था और विश्वास से धर्म-जाति और वर्ण-सम्प्रदायगत बन्धनों को तोड़ते हुए मानव धर्म तथा मानव संस्कृति का गान गाया।
  • सामाजिक उत्पीड़न और अंधविश्वासों का विरोध
    भक्ति आन्दोलन ने एक लम्बी लड़ाई-अपने प्रारंभ से अंत तक-लड़ी वह थी, सामाजिक उत्पीड़न और जन सामान्य में व्याप्त अंधविश्वासों के विरुद्ध। कबीर इस युद्ध के उद्घोषक थे। उन्होंने इसे स्वयं की स्वयं को दी हुई चुनौती के रूप में स्वीकार किया और अपने तरकश के सभी तीर चलाए, तुक्का नहीं लगाया। कहीं-कहीं तो ऐसा लगता है कि कबीर अकेले खड़े हैं सामने चुनौती झेलने वाला कोई नहीं पर लड़ाई किसी व्यक्ति या शासक के विरुद्ध नहीं थी। लड़ाई थी उस गलीच 'विचारधारा' और 'सोच' के विरुद्ध जिसके आधार पर सदियों से मानवता का शोषण किया जा रहा था उसे उत्पीडि़त किया जा रहा था और मनुष्य जिसे अपनी नियति मानकर जी रहा था। कबीर ने कहा कि "यह हमारी नियति नहीं, हमारा शोषण है, मानवता के प्रति अभिशाप है, किसी धर्म में इसका कोई आधार नहीं है।" नियति और धर्म के नाम पर थोपे गए अंधविश्वासों को उन्होंने धर्म और ईश्वर के आधार पर ही खण्डित किया और ज्ञान का प्रकाश प्रकाशित किया। इसी कारण उन्होंने सच्चे गुरू का महत्व प्रतिपादित किया - "आगे थे सतगुर मिल्या, दीया दीपक हाथ।"
    सूर और तुलसी ने भी सामाजिक उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाई है। तुलसी ने कई जगह तत्कालीन अर्थव्यवस्था का चित्र अंकित किया है तथा सामाजिक जीवन की विषमताओं को रेखांकित किया है। लगता है तुलसी स्वयं सामाजिक रूप से उत्पीडि़त रहे हैं। यह पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं।
    धूत कहौ अवधूत कहौ, रजपूत कहौ, जुलहा कहौ कोऊ,
    काहू की बेटी सो बेटा न ब्याहब, काहू की जाति बिगारिन सोऊ।
    तुलसी सरनाम गलुाम है राम को, जाको रुचै सो कहो कछु कोऊ,
    माँग के खइबौ, मसीत को सोइबो, लेबे को एक न देबे को दोऊ।
    या फिर सामाजिक जीवन का यह हृदय विदारक दृश्य:
    खेती न किसान को, भिखारी को न भीख,
    बलि, बनिक को वाणिज न, चाकर को चाकरी।
    जीविका-विहीन लोग, सीद्यमान-सोच बस,
    कहैं एक-एकन सौ, कहाँ जाइ, का करी।।
    भक्ति आन्दोलन की उपर्युक्त प्रमुख विशेषताओं के अलावा और भी कई विशिष्टताएँ हैं- जैसे कि भक्ति आन्दोलन ने इस विचार पर जोर दिया कि भक्ति ही आराधना का उच्चतम स्वरूप है तथा बाह्याचारों, कर्मकाण्डों आदि की निंदा तथा भत्र्सना करना। भक्त कवि आन्तरिक पवित्रता और सहज भक्ति पर जोर देते थे। मानवीय यथार्थ को सर्वोपरि मानते हुए वर्गगत, जातिगत भेदभावों तथा धर्म के नाम पर किए जाने वाले उत्पीड़न का दृढ़ विरोध। सामन्तीय मूल्यों और पुरोहितवाद की साँठगाँठ को और इनके द्वारा किए जाने वाले संयुक्त शोषण अत्याचारों का विरोध भी इसकी एक विशेषता थी। 'लोक संपृक्ति' इस आन्दोलन की एक उल्लेखनीय विशिष्टता है।

    “LAAGA CHUNRI MEIN DAAG ..OR MY VEIL GOT STAINED " IS A PHILOSOPHICAL CONCEPT KABIR


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अन्याय के प्रतिकार के योद्धा शहीद भगत सिंह



क्रांतिकारी युग पुरुष भगत सिंह का स्वतंत्रता आंदोलन में दिया गया बलिदान क्रांति का अमर प्रतीक है, जो युगों-युगों तक देश की माटी से जुड़े सपूतों को नई दिशा एवं उत्साह देता रहेगा, उन्होंने अपने खून से स्वतंत्रता के वृक्ष को सींचकर देश को जो मजबूती एवं ताजगी दी है भला उसे कौन भुला सकता है? उनका अनुपम बलिदान इतिहास की अमूल्य धरोहर है, भगत सिंह का जन्म ऐसे सिख परिवार में हुआ था जिस परिवार की दो-दो पीढि़याँ स्वतंत्रता के लिए खून बहा चुकी थीं, जो टूट गए परन्तु झुके नहीं, गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेकने का संकल्प जिनकी हर सांस में भरा था।
28 सितम्बर 1907 में जन्मे भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह, लोकमान्य गंगाधर तिलक के स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय सहयोगी थे। क्रांतिकारी परिवार में जन्म लेने के कारण भगत सिंह को बचपन से ही संघर्ष एवं अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने का संस्कार मिला था। तीसरी कक्षा में पहुँचते-पहुँचते भगत सिंह उस क्रांति की परिभाषा समझने लगे थे जिसके कारण उनके चाचा सरदार अजीत सिंह विदेशों में भटक रहे थे और अपने देश नहीं लौट सकते थे, वे अपनी चाची श्रीमती हुक्म कौर को कहते-चाची आँसू पोछ ले, मैं अंग्रेजों से बदला लूँगा एवं अपने देश से अंग्रेजों को बाहर निकाल कर चैन से बैठूँगा, एक बालक की ऐसी क्रांतिकारी बातों को सुनकर वह अपने गोद में उसे समेट लेती, मात्रा चौथी कक्षा में उन्होंने सरदार अजीत सिंह, सूफी अम्बिका प्रसाद, लाला हरदयाल की लिखी सैकड़ों पुस्तकों को पढ़ लिया था। इस अध्ययन से भगत सिंह की बुद्धि का बहुत विकास हुआ। उम्र के हिसाब से वे अभी बालक ही थे, परन्तु बातचीत, विचार एवं चाल-ढाल से वे काफी बड़ी-बड़ी बातें बहुत आत्मविश्वास से किया करते थे। जन्म से सिख होते हुए भी भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह आर्य समाजी सिद्धांतों में विश्वास रखते थे, इसलिए उन्होंने अपने दोनों पोतों का यज्ञोपवीत संस्कार करवाया और उसी दिन यह संकल्प लिया कि " मैं इस यज्ञ वेदी पर खड़े होकर अपने दोनों वंशधरों को देश के लिए अर्पित करता हूँ।" उन्होंने नई पीढ़ी में जन्में दो नन्हें सेनानियों को देश की बलिवेदी के लिए तैयार कर दिया। इसके बाद उनके मन में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना वक्त के साथ और पुख्ता होती गई।
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1919 में जब महात्मा गाँधी ने भारत की राजनीति में प्रवेश कर असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया उस समय भगत सिंह सातवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग के भीषण हत्याकाण्ड ने भगत सिंह को अंदर तक झंकझोर दिया। उन्होंने जलियाँवाला बाग पहुँचकर निर्दोष, निहत्थी जनता के खून से सनी मिट्टी को अपने माथे से लगाया एवं एक शीशी में उस मिट्टी को भरकर काफी रात गए घर लौटे - उनकी छोटी बहन अमर कौर बोली - वीर जी, आज इतनी देर क्यों कर दी? भगत सिंह उदास थे, धीरे से वे, खून में सनी वह मिट्टी अपनी बहन की हथेली पर रखकर बोले - अंग्रेजों ने निर्दोषों के खून बहाये हैं, इस खून सनी मिट्टी की कसम मैं उनका खून भी इसी मिट्टी में मिलाकर ही दम लूँगा। उन्होंने यह बात अच्छी तरह समझ ली थी कि अहिंसा का मार्ग देश को आजादी नहीं दिला सकता, इसके लिए बहुत से बलिदान देने होंगे। धीरे-धीरे उनका सम्पर्क प्रो. जयचन्द्र विद्यालंकार से हुआ, जिनका सम्बंध बंगाल के क्रांतिकारियों से था। प्रो. विद्यालंकार के सम्पर्क के बाद उनका चरित्र और विकसित हुआ। वहीं उनकी मुलाकात विख्यात क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई और भगत सिंह क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गए।
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1923 में जब भगत सिंह नेशनल कालेज में पढ़ रहे थे तब उनके घर में उनकी शादी की चर्चा होने लगी, तो उन्होंने अपने पिताजी को पत्र लिखा- मेरी जिन्दगी आजाद-ए- हिन्द के लिए है, मुझे आपने यज्ञोपवीत के समय देश के लिए समर्पित कर दिया था। मैं आपकी इस प्रतिज्ञा को पूरा कर रहा हूँ। उम्मीद है मुझे माफ़ कर देंगे और वे घर छोड़कर कानपुर चले गए। वहाँ का काम उन दिनों योगेश चन्द्र चटर्जी देख रहे थे। बटुकेश्वर दत्त, अजय घोष और विजय कुमार सिन्हा जैसे क्रांतिकारियों से उनका परिचय वहीं हुआ। बाद में श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के "प्रताप" नामक अखबार के सम्पादक विभाग में "बलवंत सिंह" के नाम से लिखने लगे। बाद में भगत सिंह कानपुर से लाहौर लौट आये और पूरी शक्ति से "नौजवान भारत सभा" की स्थापना की। इस काम में उनके साथी थे भगवतीचरण। भगत सिंह का विचार था कि जनता को अपने साथ लिए बिना सशस्त्र क्रांति के लिए किए गए प्रयत्न सफल नहीं हो सकते।
29 जुलाई 1927 को उन्हें काकोरी केस के सिलसिले में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें 15 दिन तक लाहौर के किले में रखा गया, फिर उन्हें पोस्टल जेल भेज दिया गया। कुछ सप्ताह बाद वे जेल से मुक्त कर दिए गए। नवम्बर 1928 में चाँद पत्रिका का "फांसी" अंक प्रकाशित हुआ जिसमें "विप्लव यज्ञ की आहुतियाँ" के शीर्षक से क्रांतिकारियों पर बहुत से लेख भगत सिंह ने लिखे। भारत में शासन सुधरों के विषय में सुझाव देने के लिए लार्ड साइमन की अध्यक्षता में एक कमीशन नियुक्त किया गया। 3 फरवरी 1928 को जब कमीशन मुम्बई पहुँचा तब तक भगत सिंह के नेतृत्व में एक सशक्त क्रांतिकारी दल का गठन हो चुका था। स्टेशन पर उतरते ही कमीशन को काले झण्डे दिखाने एवं "साइमन वापस जाओ" के नारे लगाने की योजना थी। भगत सिंह के साथ लाला लाजपत राय भी इसका विरोध कर रहे थे। अंग्रेज पुलिस ने लाजपत राय को बुरी तरह पीटा। चोट लगने के बाद भी उन्होंने जोरदार भाषण देते हुए कहा- "मैं घोषणा करता हूँ कि मुझे जो चोट लगी है वह भारत में अंग्रेजी राज के लिए कफन की कील साबित होगी।"
इस घटना के बाद 17 नवम्बर 1928 को लालाजी की मृत्यु हो गई। इस घटना के प्रमुख दोषी असिस्टेण्ट पुलिस सुप्रीटेण्डेंट मिस्टर साण्डर्स को बाद में गोली मारने के आरोप में पुलिस चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु और जयगोपाल आदि क्रांतिकारियों को पकड़ने हेतु कुत्ते की तरह पीछे पड़ गई थी, भगत सिंह के मन में आग भड़क रही थी। उन्होंने दिल्ली के केन्द्रीय असेम्बली में बम फेकने का निर्णय कर लिया। देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले इन वीरों का हर क्षण किसी योजना में लगा हुआ था। असेम्बली में बम फेकने की बात भगत सिंह ने की थी, वे इसके लिए तैयार थे। 7 अप्रैल 1929 को वाइसराय के निर्णय की घोषणा असेम्बली में सुनाई जाने वाली थी। भगत सिंह के साथ बटुकेश्वर दत्त भी थे। भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेंक दिया, पुलिस ने दोनों को गिरफ्रतार कर लिया। दिल्ली में 4 जून 1929 को मुकदमे की सुनवाई सेशन जज मिस्टर मिडलटन की अदालत में आरम्भ हुई। न्यायालय में भगत सिंह से पूछा गया कि क्रांति से वे क्या समझते हैं? उन्होंने कहा- क्रांति में घातक संघर्षों का अनिवार्य स्थान नहीं है न उसमें व्यक्तिगत बदला लेने की गुंजाइश है। क्रांति बम और पिस्तौल की संस्कृति नहीं है। क्रांति से हमारा प्रयोजन है कि अन्याय पर आधारित वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन होना चाहिए।
असेम्बली बम काण्ड का मुकदमा दिल्ली में चला था जहाँ भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को यूरोपीय वार्ड में रखा गया था। 12 जून 1929 को उनको आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। भगत सिंह को लाहौर सेन्ट्रल जेल में रखा गया जहाँ उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। दुनिया भर के मुकदमों के इतिहास में लाहौर षड्यंत्र केस ही ऐसा केस था जिसमें न अभियुक्त उपस्थित हुए न उनके गवाह और न वकील ही, परन्तु अदालत ने फैसला दे दिया जिसके तहत भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सजा सुनाई गई।
INQLAAB ZINDABAAD" - Shaheed Bhagat Singh
फांसी की सजा सुनाने के बाद भी भगत सिंह जेल में अध्ययन करते रहते। चाल्र्स डिकिन्स उनका प्रिय लेखक था। गोर्की, उमर खैयाम, एंजिल्स आस्कर वाइल्ड, जार्ज बनार्ड शा के साहित्य का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया। इध्र क्रांतिकारी दल भी एक के बाद एक धमाके करने में जुटा रहा। बंगाल के महान क्रांतिकारी श्री सूर्यसेन के नेतृत्व में चटगाँव शस्त्रागार लूटा गया। बम के द्वारा रेलगाड़ी उड़ाने का प्रयास क्रांतिकारी यशपाल ने किया। नवयुवक हरिकृष्ण ने पंजाब के गवर्नर पर गोली चलाई। भगत सिंह को फांसी की सजा से बचाने के लिए हस्ताक्षर आन्दोलन पूरे देश भर में चला। महाराजा बीकानेर ने वाइसराय से प्रार्थना की एवं इंग्लैण्ड की पार्लयामेण्ट में उनके सदस्यों ने भी तर्क दिए कि वे भगत सिंह की जीवन रक्षा करें, परन्तु सब व्यर्थ रहा।
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3 मार्च 1931 को भगत सिंह अपने परिवार वालों से अंतिम बार मिले। उस दिन उनके दो छोटे भाई कुलवीर सिंह एवं कुलतार सिंह भी थे। भगत सिंह को अपने जीवन के प्रति कोई मोह नहीं था। उनके रक्त की एक-एक बूंद मातृभूमि के लिए थी। 23 मार्च 1931 की सुबह लाहौर जेल के चीफ वार्डन चतुर सिंह द्वारा फांसी की पूर्ण व्यवस्था हेतु निर्देश दिया गया। उसे जब मालूम हुआ कि भगत सिंह की जिन्दगी के कुछ ही घण्टे बाकी हैं तो वह बोला - आप अंतिम समय गुरुवाणी का पाठ कर लो "वाहे गुरु" का नाम ले लो। भगत सिंह जोर से हंस पड़े। बोले - इसलिए कि सामने मौत है, मैं बुज़दिल नहीं, जो डरकर परमात्मा को पुकारुँ। तभी एक जेल अधिकारी कहा - सरदार जी, फांसी लगाने का हुक्म आ गया है आप तैयार हो जायें। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव तीनों अपनी-अपनी कोठरियों से बाहर आ गए, भगत सिंह बीच में थे। सुखदेव व राजगुरू दायें-बायें। क्षण भर के लिए तीनों रुके फिर चल पड़े फांसी के तख्ते पर भगत सिंह गा रहे थे - 
"दिल से निकलेगी न मर कर भी उलफत मेरी मिट्टी से भी खुश्बू-ए-वतन आएगी"
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वार्डन ने आगे बढ़कर फांसी घर का काला दरवाजा खोला। तीनों ने अपना-अपना फंदा पकड़ा और उसे चूमकर अपने ही हाथ से गले में डाल दिया। जल्लाद डबडबाती आंखों एवं कंपकपाते हाथों से चरखी घुमाया तखता गिरा और तीनों वीर भारत माता की सेवा में अर्पित हो गए।


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संगठन कर्ता क्रन्तिकारी शहीद सुखदेव



सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के शहर लायलपुर में श्रीयुत् रामलाल थापर व श्रीमती रल्ली देवी के घर विक्रमी सम्वत १९६४ के फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष सप्तमी तदनुसार १५ मई १९०७ को अपरान्ह पौने ग्यारह बजे हुआ था। उनके जन्म से तीन महीने पहले ही पिता का देहान्त हो गया था। उसके बाद उनका लालन-पालन चाचा लाला अचिन्तराम के यहां होता रहा। उनके घर में आढ़त का काम होता था।
संगठन कर्ता क्रन्तिकारी शहीद सुखदेव
ऐसा लगता है कि राजनीति की ओर प्रवृत्ति सुखदेव को अपने चाचा से प्राप्त हुई। वह असहयोग आन्दोलन में जेल गए थे। सुखदेव अपने चाचा की बड़ी इज्जत करते थे और खादी की वर्दी और हथकड़ी पहने हुए चाचा का चित्रा सुखदेव की मेज पर रखा रहता था। सुखदेव स्वभाव में मुंहपफट और स्वतंत्र विचार के व्यक्ति थे। उनका रहन-सहन और वेश-भूषा सभी से यही प्रकट होता था। साथियों ने उनका नाम ‘विलेजर’ रख छोड़ा था। बहुत दिनों तक लोग यह समझ नहीं पाए कि दल में सुखदेव बड़ा साबित होगा या भगतसिंह। यहां तक कि शिव वर्मा का, जिन्होंने उन्हें बहुत नजदीक से देखा, यह कहना है-‘‘एक संगठन-कर्ता के नाते भगतसिंह की अपेक्षा सुखदेव मुझे कहीं अधिक जंचा’’। शिव वर्मा की यह धरणा इस कारण थी कि भगतसिंह दूर-दूर, ऊपर-ऊपर उड़ाने भरते थे और बड़ी-बड़ी बातें सोचते थे जबकि सुखदेव दल के और साथियों की छोटी-छोटी जरूरत पर विचार करते रहते थे। जिन छोटी दिखने वाली बातों की ओर भगतसिंह का ध्यान कभी भी नहीं जाता था, उन पर सुखदेव गहराई से सोचते रहते थे। शिव वर्मा की यह धारणा थी कि भगतसिंह पार्टी के राजनीतिक नेता थे और सुखदेव उसके संगठन-कर्ता थे।
संगठन कर्ता क्रन्तिकारी शहीद सुखदेव
लाहौर षड्यंत्र के जयदेव, सुखदेव के चचेरे भाई थे। यह एक विशेष द्रष्टव्य तथ्य है कि सुखदेव ने सांडर्स की हत्या में भाग नहीं लिया था फिर भी वह इतने महत्वपूर्ण व्यक्ति समझे गए कि उन्हें फांसी की सजा हुई। सुखदेव में विचारों की स्वतंत्रता इस हद तक थी कि कभी-कभी वह बहुत अजीब बात कर देते थे। ऐसा उन्होंने, बाद में अनशन के दौरान किया। जबरदस्ती नाक से दूध पिला दिया तो उन्होंने अनशन ही तोड़ दिया, फिर शुरू कर दिया और फिर तोड़ दिया। सुखदेव विचारों से किसी भी प्रकार भगतसिंह या अन्य साथियों से पीछे नहीं थे। उन्होंने फांसी से कुछ पहले गांधीजी के नाम एक पत्र लिखा था जिसमें कहा गया: ‘‘क्रांतिकारियों का ध्येय इस देश में सोशलिस्ट प्रजातन्त्र प्रणाली स्थापित करना है। इस ध्येय में संशोधन के लिए जरा भी गुंजाइश नहीं है। मेरा ख्याल है, आपकी भी यही धरणा न होगी कि क्रांतिकारी तर्कहीन होते हैं ओर उन्हें केवल विनाशकारी कार्यों में ही आनन्द आता है। हम आपको बतला देना चाहते हैं कि यथार्थ में बात इसके विपरीत है। वे प्रत्येक कदम आगे बढ़ाने से पहले अपने चारों ओर की परिस्थितियों पर विचार कर लेते हैं। उन्हें अपनी जिम्मेदारी का ज्ञान हर समय बना रहता है। वे अपने क्रांतिकारी विधान में रचनात्मक अंश की उपयोगिता को मुख्य स्थान देते हैं, यद्यपि मौजूदा परिस्थितयों में उन्हें केवल विनाशात्मकअंश की ओर ध्यान देना पड़ा। ‘‘................ वह दिन दूर नहीं है जबकि उनके (क्रांतिकारियों के) नेतृत्व में और उनके झण्डे के नीचे जन-समुदाय उनके समाजवादी प्रजातंत्रा के उच्च ध्येय की ओर बढ़ता हुआ दिखाई पड़ेगा।’’

इसी पत्र में एक अन्य स्थान पर अपनी फांसी की सजा के बारे में उन्होंने लिखा, ‘‘लाहौर षड्यंत्र के तीन राजबन्दी, जिन्हें फांसी देने का हुक्म हुआ है और जिन्होंने संयोगवश देश में बहुत बड़ी ख्याति प्राप्त कर ली है, क्रांतिकारी दल के सब कुछ नहीं हैं। वास्तव में इनकी सजाओं को बदल देने से देश का उतना कल्याण न होगा, जितना इन्हें फांसी पर चढ़ा देने से होगा।’’


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हाथ और बाँह की सुन्दरता के लिए प्राकृतिक उपचार



 हाथो और बाँहों की सुन्दरता के लिए प्राकृतिक उपचार
खूबसूरत हाथ
  • हाथ ज्यादा फटते हों तो थोड़ा-सा जामुन का सिरका रात को सोते समय हाथों पर लगाएं। सुबह हाथों को ताजे पानी से धो लें। यह उपाय प्रतिदिन करने से सप्ताह भर में ही आपके हाथ नाजुक-कोमल हो जायेंगे।
  • हाथों की झुर्रियां मिटाने के लिए आलू का रस हाथों पर मलें।
  • आधा नींबू काट लें। उस पर एक चम्मच चीनी रखकर हाथों की त्वचा पर तब तक रगड़ें, जब तक चीनी पूरी तरह घुल न जाए। इस उपचार से हाथों का खुरदरापन, कालापन तथा झुर्रियां दूर होती हैं।
  • हाथ ज्यादा खुरदरे हैं तो हाथों को कुछ देर तक गुनगुने पानी में रखें। फिर हाथों को सुखाकर बादाम का तेल लगाएं।
  • आध चम्मच नींबू के रस में एक चम्मच बेसन मिलाकर पानी की मदद से पेस्ट बना लें। हाथों को साबुन की बजाए इस पेस्ट से साफ करने से मैल तथा खुरदरापन समाप्त हो जाता है।
  • एक चम्मच शहद, एक चम्मच बादाम का तेल, दोनों को मिलाकर हाथों पर मलें। एक घंटे तक कोई काम न करें। इसके बाद हाथों को ताजे पानी से धे लें। प्रतिदिन ऐसा करते रहने से कड़े हाथ मुलायम हो जाते हैं और झुर्रियां भी दूर होती हैं।
  • एक चम्मच नींबू का रस, एक चम्मच ग्लिसरिन, एक चम्मच टमाटर का रस-तीनों को मिलाकर हाथों पर लगाएं। इससे हाथों की त्वचा का कालापन दूर होता है और त्वचा निखर उठती है।
  • हाथों पर समय उभर आई झुर्रियां दूर करने के लिए एक चम्मच जैतून का तेल मिलाकर हलका गरम कर इसकी मालिश धीरे-धीरे हाथों पर करें। झुर्रियां दूर होकर हाथ कोमल तथा सुंदर बनते हैं।
हाथों की एक्सरसाइज
  • दोनों हाथों की मुट्ठियां बांध् लें। फिर उन्हें खोलकर उंगलियों को अधिक से अधिक फैलाएं। यह एक्सरसाइज 8-10 बार करें।
  • उंगलियों को तेजी से पफैलाएं, फिर आपस में चिपकाएं और सिकोड़ें। इसे 10-12 बार करें।
  • हाथ को किसी टेबल पर रखकर उंगलियों को हारमोनियम बजाने के समान चलाएं। इससे रक्त संचार बढ़ता है।
सावधानी
  • हाथों को अधिक समय तक गीला न रखें। इससे हाथों त्वचा शुष्क एवं खुरदरी हो जाती है। रोजाना पौष्टिक आहार लें। गीले हाथों को पोंछकर कोई तेल या क्रीम लगाएं।
सुंदर बांहें
  • कच्चे दूध् में थोड़ा-सा नमक और आध चम्मच गुलाब जल मिलाकर बांहों पर लगाएं। 30 मिनट के बाद बांहों को धे लें। इससे त्वचा साफ होती है।
  • एक चम्मच कच्चा दूध्, आध चम्मच नींबू का रस, दो चम्मच टमाटर का रस-इन तीनों को मिलाकर बांहों पर लगाएं। 30 मिनट के बाद ठंडे पानी से धेलें। बांहें कोमल बनती हैं।
  • एक चम्मच कच्चे आलू का रस, एक चम्मच खीरे के रस में मिलाकर बांहों पर लेप करें। इससे बांहों की झुर्रियां मिटती हैं।
  • धूप में बांहें काली हो जाने पर एक चम्मच खीरे का रस, एक चम्मच टमाटर का रस तथा 3-4 बूंद नींबू का रस - इन तीनों को मिलाकर बांहों पर लगाएं। एक घंटे के बाद पानी से धो लें। प्रतिदिन के प्रयोग से बांहें गोरी और कोमल हो जाती हैं।
बांहों के एक्सरसाइज
  • बांहों की रोजाना मालिश करें। मालिश बांहों के लिए सबसे अच्छी एक्सरसाइज है। इससे नावश्यक चर्बी छंटती है मांसपेशियां मजबूत होती हैं तथा वे सुडौल हो जाती हैं।
  • बांहों को दिन में चार-पांच बार सामने की तरपफ झाड़ें। इससे रक्त संचार का संतुलन सही रहता है। 
कोहनियों पर भी ध्यान दें
  • नींबू का छिलका रोजाना कुहनियों पर मलने से काली पड़ गयी कोहनियां साफ एवं चिकनी हो जाती हैं।
  • खुरदरी कोहनियां होने पर आधे नींबू पर चीनी रखकर रगड़ें। इससे वहां का मैल ठीक से साफ होकर कोहनी सुन्दर हो जाती है।
  • एक चम्मच नींबू का रस एक गिलास गुनगुने पानी में डालें। रफमाल को इस पानी में भिगोकर काली हुई कोहनियों पर रखें ताकि मैल फूल जाए। फिर रफमाल से धीरे-धीरे रगड़कर मैल साफ करें।
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उच्च रक्तचाप के लिए घरेलू उपचार



वर्तमान मनुष्य का जीवन बहुत संघर्षमय है और इस कारण उसके रहन-सहन और खान-पान में बहुत बदलाव आया है। फास्टफूड (जंकफूड) की संस्कृति ने मनुश्य के स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव डाला है। साथ ही साथ प्रतिस्पर्धाओ के इस दौर में हरेक मनुष्य कम या अधिक तनावग्रस्त रहने लगा है। आज वह न ही सुकून से खा पाता है और न चैन की नींद से पाता है। उच्च रक्तचाप भी इन्हीं सब बातों का परिणाम है। रक्त वाहिनियों में बहता हुआ रक्त इसकी दीवारों पर जो दबाव डालता है रक्तचाप कहलाता है। उच्च रक्तचाप में यह दबाव सामान्य से अधिक हो जाता है। स्वस्थ मनुष्य का सामान्य रक्तचापः एक स्वस्थ्य मनुष्य का आराम करते समय यदि रक्तचाप नापा जाय तो वह सामान्यतः 120/80 मि0 मि0 मर्करी या इसके आसपपास होगा। हर व्यक्ति में यह दबाव भिन्न-भिन्न हो सकता है। यहाँ पर 120 मि. मि0 प्रकुंचन (सिस्टोलिक) तथा 80 मि0 मि0 प्रसारण (डायस्टोलिक) रक्त दबाव है। उम्र के साथ यह रक्तचाप बढ़ता जाता है, क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ रक्तवाहिनियों के लचीलेपन में कमी आती है।
उच्च रक्तचाप के लिए घरेलू उपचार
  • बढ़ता है रक्तचाप
    मनुष्य का शरीर भी एक बहुत ही जटिल प्रकार की मशीन है। इसका ठीक से रख-रखाव रखना बहुत आवश्यक है। ऐसा न करने से शरीर में तरह-तरह की व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हें। शरीर को चुस्तदुरुस्त रखने के लिए हमें नियमित व्यायाम, पौष्टिक मगर संतुलित भोजन का सेवन, गहरी व पर्याप्त नींद लेने के साथ-साथ प्रसन्नचित व तनाव मुक्त रहना चाहिए, किन्तु अक्सर ऐसा हो नहीं पाता है। इसीलिए हम अस्वस्थ भी रहते है। रक्तचाप बढ़ने के निम्न प्रमुख कारण हैः
    • मधुमेह से पीडि़त होना
    • गुर्दे की बीमारियाँ
    • अत्यधिक मानसिक तनाव
    • लगातार कई दिनों तक ठीक से सो न पाना
    • हृदय की बीमारियाँ
    • रक्त नालिकाओं का लचीलापन कम हो जाना
    • उत्तेजक पदार्थ, सिगरेट, बीड़ी, तम्बाकू आदि का अधिक सेवन करना।
    • अधिक चाय का सेवन
    • अधिक मदिरापान करने से
    • भोजन में अधिक चिकनाई, मलाई व सूखे मेवे लेने से
    • शारीरिक परिश्रम बिल्कुल न करने से
    • अत्यधिक मानसिक श्रम
  • उच्च रक्तचाप के सामान्य लक्षण
    उच्च रक्तचाप से पीडि़त व्यक्ति में सामान्यतः निम्नलिखित लक्षण मिल सकते हैं।
    • सामान्य कमजोरी और चक्कर
    • बेचैनी रहना एवं किसी भी काम में मन न लगना।
    • सिर भारी-भारी सा रहना या सिर में तीव्र पीड़ा होना।
    • बहुत अधिक तनाव महसूस करना। नाक से रक्त बहना।
    • बिना वजह चिड़चिड़ाहट रहना।
    • बांहों और अंगुलियों में कम्पन।
    • अनिद्रा
    • हर समय एकांत में लेटे रहने का मन करना, किसी भी काम में मन न लगना।
  • प्राकृतिक उपचार भी हो सकते हें कारगार
    आजकल जरा-सा बीमार पड़ने पर मनुष्य अंधाधुंध दवाइयाँ लेने लगता है, परन्तु वह अपने आहार-विहार में कोई परिवर्तन नहीं करता। इसका परिणाम यह होता है कि कुछ समय बाद उन दवाइयों का प्रभाव घटता जाता है, जिसमें हमे दवाइयों की मात्रा बढ़ानी पड़ती है, दूसरे इन दवाइयों के दुष्परिणाम से शरीर में नई बीमारियाँ उत्पन्न होने लगती हैं। अंग्रेजी दवाइयों का यह बहुत बुरा अवगुण है। इसलिए दवाइयाँ शुरू करने से पहले प्राकृतिक उपचार पर विचार करना चाहिए। प्राकृतिक उपचार में उपवास,पथ्य-अपथ्य एवं जीवन शैली में बदलाव लाने पर बल दिया जाता है।
    • रक्त प्रवाह को शुद्ध रखने के लिए उच्च रक्तचाप के रोगियों को उपवास रखना चाहिए।
    • उपवास के दौरान रोगी को कच्ची सब्जियों व फलों का रस बिना नमक मिलाए दो-तीन बार लेना चाहिए।
    • रोगी को अपना खान-पान इस उपवास के बाद भी नियमित रखना चाहिए
    • वसायुक्त, मिर्चा मसाला युक्त, अति प्रोटीनयुक्त आहार नहीं लेना चाहिए।
    • नमक, मसाले और डिब्बाबंद आहार का पूर्ण परहेज करने से रक्तदाब शीघ्र ही सामान्य होने लगता है।
    • शराब, सिगरेट, बीड़ी और तम्बाकू तो उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए बहुत ही हानिकारक है, एकदम त्याग देना चाहिए।
    • अधिक नमक का सेवन गुर्दे को प्रभावित करता है, जिसके कारण गुर्दे की समस्याएं पैदा हो जाती हैं एवं रक्तप्रवाह में अषुद्धियाँ मिल जाती हैं, जिससे उच्च रक्तचाप रहने लगता है। इसलिए सामान्य व्यक्ति को भी नमक कम से कम लेना चाहिए।
    • दिन भर में 10-12 गिलास पानी पीना हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। यह पानी सारे शरीर की गंदगी मूत्र द्वारा बाहर निकाल देता है। इसी प्रकार ष्शरीर के लिए कुनकुनी धूप भी आवश्यक है। इससे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे मनुष्य अधिक स्वस्थ व चुस्त-दुरुस्त रहता है।
  • सबसे उत्तम आयुर्वेदिक उपचार
    आयुर्वेदिक औषधियाँ प्रकष्ति के सबसे करीब हैं। प्रायः इनके कोई भी दुष्परिणाम देखने को नहीं मिलते हैं। आयुर्वेदिक औषधियाँ रोगी को स्वाभाविक रूप से स्वस्थ बनाने का प्रयत्न करतीहैं। इनको लम्बे समय तक बिना किसी भय के लिया जा सकता है। उच्च रक्तचाप के लिए निम्नलिखित आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन करना अच्छा रहता है।
    • जहर मोहरा खताई पिष्टी
    • राप्य भस्म
    • समीर-पन्नग रस
    • चन्द्रकला रस
    • चिन्तामणि रस
    • बालचन्द्र रस
    • रस राज रस
    • सर्पगंधा चूण योग
    • सर्पगंधाधन बटी आदि।
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    सतावर के प्रमुख औषधीय उपयोग



    सतावर का वानस्पतिक नाम ऐस्पेरेगस रेसीमोसस है यह लिलिएसी कुल का एक औषधीय गुणों वाला पादप है। इसे 'शतावर', 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल' और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत, श्रीलंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं। वर्तमान समय में इस पौधे पर लुप्त होने का खतरा है।सतावर अथवा शतावरी भारतवर्ष के विभिन्न भागों में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली बहुवर्षीय आरोही लता है। नोकदार पत्तियों वाली इस लता को घरों तथा बगीचों में शोभा हेतु भी लगाया जाता है। जिससे अधिकांश लोग इसे अच्छी तरह पहचानते हैं। सतावर के औषधीय उपयोगों से भी भारतवासी काफी पूर्व से परिचित हैं तथा विभिन्न भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में इसका सदियों से उपयोग किया जाता रहा है। विभिन्न वैज्ञानिक परीक्षणों में भी विभिन्न विकारों के निवारण में इसकी औषधीय उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है तथा वर्तमान में इसे एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा होने का गौरव प्राप्त है।
    Asparagus racemosus willd shatavari
    सतावर की पूर्ण विकसित लता 30 से 35 फुट तक ऊँची हो सकती है। प्रायः मूल से इसकी कई लताएं अथवा शाखाएं एक साथ निकलती हैं। यद्यपि यह लता की तरह बढ़ती है परन्तु इसकी शाखाएं काफी कठोर और लकड़ी के जैसी होती हैं। इसके पत्ते काफी पतले तथा सुइयों जैसे नुकीले होते हैं। इनके साथ-साथ इनमें छोटे-छोटे कांटे भी लगते हैं। जो किन्हीं प्रजातियों में ज्यादा तथा किन्हीं में कम आते हैं ग्रीष्म ऋतु में प्रायः इसकी लता का ≈परी भाग सूख जाता है तथा वर्षा ऋतु में पुनः नवीन शाखाएं निकलती हैं। सितंबर-अक्टूबर माह में इसमें गुच्छों में पुष्प आते हैं तथा तदुपरान्त उन पर मटर के दाने जैसे हरे फल लगते हैं।
    Asparagus racemosus willd shatavari
    धीरे-धीरे ये फल पकने लगते हैं तथा पकने पर प्रायः लाल रंग के हो जाते हैं। इन्हीं फलों से निकलने वाले बीजों को आगे बिजाई हेतु प्रयुक्त किया जाता है। पौधे के मूलस्तम्भ से सफेद ट्यूबर्स (मूलों) का गुच्छा निकलता है जिसमें प्रायः प्रतिवर्ष वृद्धि होती जाती हैं औषधीय उपयोग में मुख्यतया यही मूल आथवा इन्हीं ट्यूबर्स का उपयोग किया जाता है।

    सतावर के प्रमुख औषधीय उपयोग
    सतावर भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में प्रयुक्त होने वाले प्रमुख औषधीय पौधों में से एक हैं जिन विकारों के निदान हेतु इसका प्रमुखता से उपयोग किया जाता है, वे निम्नानुसार है-
    • शक्तिवर्धक के रूप में
      विभिन्न शक्तिवर्धक दवाइयों के निर्माण में सतावर का उपयोग किया जाता है। यह न केवल सामान्य कमजोरी, बल्कि शुÿवर्धन तथा यौनशक्ति बढ़ाने से संबंधित बनाई जाने वाली कई दवाईयों जिसमें यूनानी पद्धति से बनाई जाने वाली माजून जंजीबेल, माजून शीर बरगदवली तथा माजून पाक आदि प्रसिद्ध हैं, में भी प्रयुक्त किया है। न केवल पुरुषों बल्कि महिलाओं के विभिन्न योनिदोषों के निवारण के साथ-साथ यह महिलाओं के बांझपन के इलाज हेतु भी प्रयुक्त किया जाता हैं इस संदर्भ में यूनानी पद्धति से बनाया जाने वाला हलवा-ए-सुपारी पाक अपनी विशेष पहचान रखता है।
    • दुग्ध बढ़ाने हेतु
      माताओं का दुग्ध बढ़ाने में भी सतावर काफी प्रभावी सिद्ध हुआ है तथा वर्तमान में इससे संबंधित कई दवाइयां बनाई जा रही हैं। न केवल महिलाओं बल्कि पशुओं-भैसों तथा गायों में दूध बढ़ाने में भी सतावर काफी उपयोगी सिद्ध हुआ है।
    • चर्मरोगों के उपचार हेतु
      विभिन्न चर्म रोगों जैसे त्वचा का सूखापन, कुष्ठ रोग आदि में भी इसका बखूबी उपयोग किया जाता है।
    • शारीरिक दर्दों के उपचार हेतुआंतरिक हैमरेज, गठिया, पेट के दर्दों, पेशाब एवं मूत्र संस्थान से संबंधित रोगों, गर्दन के अकड़ जाने (स्टिफनेस), पाक्षाघात, अर्धपाक्षाघात, पैरों के तलवों में जलन, साइटिका, हाथों तथा घुटने आदि के दर्द तथा सरदर्द आदि के निवारण हेतु बनाई जाने वाली विभिन्न औषधियों में भी इसे उपयोग में लाया जाता है। उपरोक्त के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के बुखारों ह्मलेरिया, टायफाइड, पीलिया तथा स्नायु तंत्र से संबंधित विकारों के उपचार हेतु भी इसका उपयोग किया जाता है। ल्यूकोरिया के उपचार हेतु इसकी जड़ों को गाय के दूध के साथ उबाल करके देने पर लाभ होता है। सतावर काफी अधिक औषधीय उपयोग का पौधा है। यूं तो अभी तक इसकी बहुतायत में उपलब्धता जंगलों से ही है परन्तु इसकी उपयोगिता तथा मांग को देखते हुए इसके कृषिकरण की आवश्यकता महसूस होने लगी है तथा कई क्षेत्रों में बड़े स्तर पर इसकी खेती प्रारंभ हो चुकी है जो न केवल कृषिकरण की दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी काफी लाभकारी सिद्ध हो रही है।
    सतवारी से दवा बनाने की विधिपाँच किलो भैंस के दूध् का घर पर मावा (खोवा) बनायें, पाँच किलो दूध का लगभग एक किलो मावा बन जाता है, मावा बनाने के लिए दूध को धीमी आँच पर रख दें। जब दूध पकते -पकते गाढ़ा-सा हो जाये और मावा बनने वाला हो तब पचास ग्राम शतावरी का चूर्ण उसमें डालकर कुछ देर तक हिलाते रहें। मावा बनने के साथ शतावरी का चूर्ण उसमें एकदिल हो जाएगा। जब मावा बनकर तैयार हो जाये तब 20-20 ग्राम के पेड़े बना ले और काँच के पात्रा में सुरक्षित रख ले।
    सेवन विधिरोजाना प्रातः निराहार एक पेड़ा दूध् के साथ बच्चे बड़े सभी खा सकते हैं। बारह मास इन पेड़ों का सेवन किया जा सकता है।
    लाभशतावरी के पेड़ों के नियमित सेवन से बालको की बुद्धि,स्मरणशक्ति और निश्चय-शक्ति बढ़ती है और अच्छा विकास होता है। रूपरंग निखरता है। त्वचा मजबूत और स्वस्थ होती है।
    शरीर भरा-भरा पुष्ट और संतुलित होता है। पफेपफड़े रोग रहित और मजबूत बनते हैं। आँखों में चमक और ज्योति बढ़ती है। शरीर की सब प्रकार की कमजोरियां नष्ट होकर अपार वीर्य वृद्धि और शुक्र वृद्धि होती है। इसके सेवन से वृद्धावस्था दूर रहती है और मनुष्य दीर्घायु होता है।
    जो बच्चे रात को चैंक कर और डर कर अचानक नींद से जाग उठते हों उनके सिरहाने, तकिये के नीचे या जेब में शतावरी के पौधे की एक छोटी सी डंठल रख दें अथवा बच्चे के गले में बांध दें तो बच्चा रात में नींद में डरकर या चैंककर नहीं उठेगा।

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    भरण-पोषण का अधिकार अंतर्गत धारा 125 द.प्र.स. 1973



    मानव एक सामाजिक प्राणी है, मानव पशुओं जैसा व्यव्हार तो नहीं करता क्योकि मानव में सोच समझ की शक्ति और बुद्धि है जो कि पशु में नहीं होती। फिर भी सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज में रहते हुए किसी पारिवारिक कलह या पति-पत्नी का झगड़ा इस तरह बढ़ता है कि पति पत्नी अलग रहने के लिए बाध्य हो जाते हैं। यही झगड़ा कभी-कभी संबंध विच्छेद की स्थिति तक पहुंचा देता है। आपस के झगड़े में केवल दोनों ही कष्टता की चक्की में नहीं पीसे जाते परन्तु उनके साथ नाबलिग बच्चे भी संकट व कष्ट भोगते है। इसी प्रकार वृद्ध असहाय माता-पिता को उनके पुत्र या पुत्री भूलकर उनकी अवहेलना करते है और ऐसे असहाय वृद्ध रोटी कपड़ों के लिए तरसते रह जाते है। मानव को सम्मान की जिन्दगी बसर करने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकता है। जैसे की पानी तथा वायु की। संसार में जो प्राणी आया है कि उसे अपने को जीवित रखने के लिए भर पेट खाने की आवश्यकता है। कई बार पारिवारिक कलह के कारण पत्नी, नाबालिग बच्चे, वृद्ध, महिला लाचार हो जाते हैं क्योंकि वह अपना भरण-पोषण करने में सामर्थ नहीं रहते हैं।
    Alimony and Maintenance Support after Divorce
    इसलिए हम सभी का सामाजिक कर्तव्य हो जाता है कि इस प्रकार के पारिवारिक कलह से दुखी दम्पती को सही रास्ते पर लाए तथा उनका उचित मार्गदर्शन करें ताकि वह अपने बच्चों का भविष्य सुखमय व सुन्दर बना सकें। इस प्रकार दंपति का भी यह सामाजिक कर्तव्य बनता है कि वह पारिवारिक कलह को भूलकर अपने लिए नही तो बच्चो के भविष्य के लिए सुखमय जीवन व्यतीत कर सामाजिक तथा पारिवारिक शांति को बनाए रखें। कई बार पति-पत्नी का झगड़ा पारिवारिक कलह से बढ़कर पति-पत्नी के अलग रहने से लेकर सम्बन्ध विच्छेद तक की स्थिति तक पंहुचा देता है। इस कलह की चक्की में सन्तान भी पिस जाती है।
    कई बार वृद्ध असहाय माता पिता भी पुत्र व पुत्रियों की अवेहलना का शिकार बने, पैसे-पैसे के लिए मोहताज हो जाते हैं। पति पत्नी, बच्चों व माता-पिता को खर्चा प्राप्त करने सम्बन्धित अधिकार है, आईए इस पर चर्चा करें। पत्नी, नाबालिग बच्चों या बूढ़े मां-बाप, जिनका कोई अपना भरण-पोषण का सहारा नहीं है और जिन्हें उनके पति/पिता ने छोड़ दिया है या बच्चे अपने मां बाप के बुढापें में उनका सहारा नहीं बनते हैं और उनको भरण-पोषण का खर्च नहीं देते हैं तो धारा 125 दण्ड प्राक्रिया संहिता के अन्तर्गत ऐसे व्यक्ति खर्चा गुजारा प्राप्त करने का अधिकार रखते हैं। इस धारा 125 दण्ड प्राक्रिया संहिता, 1973 के तहत पति या पिता का यह कानूनी कर्तव्य है कि वह पत्नी, जायज या नाजायज नाबलिग बच्चों का पालन पोषण करें। अगर ऐसा पति या पिता पत्नी या बच्चों को खर्चा देने से इन्कार करें तो उनके द्वारा प्रार्थना पत्र या दरखास्त देने पर न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी को कानूनी अधिकार है कि वह आवदेक को 500 रूपये खर्च प्रति व्यक्ति की दर से प्रदान करें और यह रकम उस पति से या पिता से अदालत के निर्देश द्वारा जबरन वसूल की जा सकती है।
     भरण-पोषण धारा 125 द.प्र.स. 1973 के प्रावधान
    दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 से 128 तक इस सामाजिक समस्या निवारण के लिए बनाए गये कानून हैं। इन धाराओं के अधीन, निश्रित पत्नी, बच्चे व माता-पिता याचिका प्रथम श्रेणी के ज्युडिशियल मैजिस्ट्रेट की अदालत में दायर कर सकते हैं।
    खर्चा प्राप्त करने के लिए याचिका ऐसे अधिकार क्षेत्र वाले ज्युडिशियल मैजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी की अदालत में दी जा सकती है।
    जहां पति उस समय रह रहा हो।जहां प्रतिवादी हाल तक आवेदक के साथ रहता रहा हो,
    जहां आवेदक रहता हो/जहां प्रतिवादी का स्थाई निवास हो,
    जहां पति-पत्नी याचिका से पहले (चाहे अस्थाई रूप से) रह रहे हों।
    1. धारा 125 सी0आर0पी0सी0 की कार्यवाही की प्रणाली
      खर्चे के लिए दी गई याचिका-आरोप पत्र न होकर एक याचिका होती है इसलिए प्रतिपक्षी को अभियुक्त नहीं बल्कि प्रत्यार्थी माना जाता है। यह कार्यवाही पूर्णतया फौजदारी नहीं होती बल्कि अर्ध-फौजदारी होती है। याचिका अदालत में प्रत्यार्थी को सम्मन जारी किये जाते हैं। अगर प्रत्यार्थी सम्मन लेने से जान बूझकर इन्कार करे या सम्मन मिलने के बावजूद अदालत में उपस्थित न हों तो उनके खिलाफ एक तरफा कार्यवाही के आदेश दिये जा सकते हैं। एक तरफा फैसले का आदेश उचित कारण साबित किये जाने पर तीन महीने के अन्दर रद्द करवाया जा सकता है। प्रार्थी या प्रत्यार्थी दोनों पक्षों को अपने आरापों को साबित करने के लिए गवाही देने का अधिकार है। दोनों पक्ष स्वयं अपने गवाह के तौर पर अदालत के समक्ष पेश होने का अधिकार रखते हैं। केस व अनुमान सावित्री बनाम गोबिन्द सिंह रावत,1986(1) सी.एल.आर.पेज नं0 331 में उच्च न्यायालय द्वारा निर्देश दिया गया है कि जब तक 125 सी0आर0पी0सी0 के तहत कारवाई पूरी होने तक गुजारा भता बारे कोई अन्तिम फैसला नहीं होता तब तक अन्तरिम आदेश के तहत 125 सी0आर0पी0सी0 की दरखास्त दायर होते ही गुजारा भता दिया जा सकता है। यहां यह भी बताना उचित होगा कि केस व अनुमान श्रीमती कमला वगैरा बनाम महिमा सिंह, 1989(1) सी.एल.आर.पेज न0 501 में दर्ज, उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले के मुताबिक ऐसी हर दरखास्त जेर धारा 125 सी0आर0पी0सी0 दुबारा चालू हो सकती है जो प्रार्थीय के न आने के कारण खारिज कर दी गई हो। यहां यह भी बताना उचित होगा कि केस व अनुमान पवित्र सिंह बनाम भुपिन्द्र कौर, 1988 एस.एल.जे. पेज न0 164 में दर्ज उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक ऐसी दरखास्त जेर धारा 125 सी0आर0पी0सी0 जो राजीनामा की वहज से वापिस ले ली गई हो दुबारा चलाई जा सकती है अगर उस केस का राजीनामा टूट जाये।
    2. धारा 125 सी0आर0पी0सी0 के अधीन खर्चा प्राप्त करने की पात्रता हर उस व्यक्ति पर जो साधन सम्पन्न है, यह कानूनी दायित्व है कि वहः
      अपनी पत्नी जो अपना, खर्चा स्वयं वहन न कर सकती हों,
      अपने नाबालिग बच्चों (वैध व अवैध) जो स्वयं अपना खर्चा चलाने में असमर्थ हो,
      अपने बालिग बच्चों (वैध व अवैध) सिवाय विवाहित पुत्री के) जो शारीरिक या मानसिक रूप से अक्षम होने पर अपना खर्चा स्वयं वहन न कर सकते हों,
      अपने वृद्ध व लाचार माता पिता जो स्वयं अपना खर्चा उठाने में असमर्थ हो, कि वह उनका खर्चा व पालन पोषण का व्यय उठाएं।
      ध्यान रहे कि केवल कानूनन व्याहिता पत्नी ही खर्चा लेने की अधिकारिणी है।
      दूसरी (पत्नी जो विवाह कानून द्वारा मान्य नहीं है, या रखैल, खर्चा प्राप्त करने की हकदार नहीं है लेकिन वैध या अवैध सन्तानें इस धारा के अन्तर्गत खर्चा लेने की हकदार है।)
    3. खर्चा प्राप्त करने हेतू साक्ष्य
      खर्चा प्राप्त करने के लिए प्रार्थी को निम्नलिखित बातें साबित करना आवश्यक हैः-
      1. कि प्रार्थी के पास खर्चा देने के पर्याप्त साधन हैं।
      2. वह जानबूझकर भरण-पोषण देने में आनाकानी या इन्कार कर रहा है।
      3. आवेदक प्रत्यार्थी के साथ न रहने के लिए मजबूर है, अगर पति के खिलाफ व्यभिचार (परस्त्रीगमन) निर्दयता (शारीरिक व मानसिक) दूसरी शादी या अन्य ऐसे कोई आरोप साबित हो तो पत्नी द्वारा अलग रह कर खर्चा प्राप्त करने का अधिकार मान्य होगा।
    4. आवदेक के पास स्वयं अपना खर्चा चलाने के लिए कोई साधन उपलब्ध न है।
      1. लेकिन अगर पत्नी स्वयं व्यभिचारणी का जीवन बिता रही है। या
      2. पत्नी बिना किसी उचित कारण के पति के साथ रहने से मना करती हो
      3. पति-पत्नी स्वयं रजाबन्दी से अलग रह रहे हों, तो खर्चा प्राप्त करने की याचिका रद्द की जा सकती है। अदालत द्वारा प्रति माह व्यक्ति (आवेदक) 500 रूपये से अधिक खर्चे का आदेश नहीं दिया जा सकता। यह आदेश अदालत द्वारा दोनों पक्षों की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों, उनकी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाता है। किसी भी पक्ष की परिस्थितियों में फेर बदल होने पर खर्च के आदेश को रद्द या कम या ज्यादा किया जा सकता है।
    5. धारा 127 सी0आर0पी0सी0 के तहत खर्चे मे तबदीली
      अगर खर्चा प्राप्त करने वाले व्यक्ति का समय व्यतीत हो जाने के उपरान्त अदालत द्वारा प्रदान किये हुए खर्चे से गुजारा नहीं होता या जिस व्यक्ति के विरूद्ध खर्चा लगवाया गया है उसकी आर्थिक स्थिति में खर्चे के निर्देश उपरान्त तबदीली आती है तो खर्चा प्राप्त करने वाले व्यक्ति को अधिकार है कि वहा न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत में खर्चा बढ़ाने के लिए आवेदन धारा 127 दण्ड प्राक्रिया संहिता के तहत दे सकता है। 2001 के अधिनियम 50 ने तबदीली लाई है कि खर्चे की रकम अदालत हालत के मुताबिक तय करेगी और इसकी कोई सीमा न होगी। अगर इस प्रकार के आवेदन पर पत्नी, बच्चों या माता पिता के खर्चा तबदीली करने की सुनवाई करता है तो अदालत किसी दिवानी दावे में हुए फैसले को भी मद्देनजर रखेगी। इस प्रकार अगर किसी पत्नी ने तलाक लिया है या पति ने उसे तलाक दिया है और ऐसी पत्नी तलाक लेने के उपरान्त दूसरी शादी कर लेती है तो अदालत को अधिकार है कि वह पति के आवेदन पर ऐसी पत्नी के खर्चा गुजारे के आदेश को उसके द्वारा शादी करने की तारीख से रद्द कर सकती है।
    6. धारा 128 सी0आर0पी0सी0 के अधीन आदेश कैसे लागू किया जाता है
      अगर प्रत्यार्थी बिना किसी उचित कारण के आदेश का उलंघन करता है तो खर्चे की रकम के बारे में वारन्ट जारी किया जा सकता है। वारन्ट जारी होने के बावजूद मासिक खर्चे के भुगतान होने की स्थिति में प्रत्यार्थी को एक माह तक की कैद हो सकती है। खर्चे के आदेश को लागू करने की याचिका, देय तिथि के एक साल के भीतर दिया जाना अनिवार्य है। हमारे उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले के मुताबिक प्रत्यार्थी को उतने महीने तक लगातार जेल में बन्द रखा जा सकता है जितने महीने तक का गुजारा भता उसने नहीं अदा किया हो। यहां यह भी कहना उचित है कि किसी भी पत्नी को अपने पति से देय गुजारा वसूल करने के लिये अदालत में कोई पैसा जमा करवाने की जरूरत नहीं होती हैं।  एमपरर बनाम सरदार मोहम्मद, ए.आई.आर. 1935, लाहौर, पेज 758


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    वाहन दुर्घटना के अन्तर्गत मुआवजा



    सड़कों पर दिनों दिन बढ़ती भीड़ व बढ़ते हुए यातायात के कारण मोटर दुर्घटनाओ की संख्या में वृद्वि हो रही है। दुर्घटना की षिकार व्यक्ति को आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है। भारत देश कल्याणकारी देश होने के नाते इस प्रकार की सहायता देने के लिए वचनबद्व है। सबसे प्रमुख कार्य दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को प्रातिकार या हर्जाना दिलाना होता है। मोटर गाडि़यों से सम्बन्धित कानून को अधिक कल्याणकारी और व्यापक बनाने के लिए मोटरयान अधिनियम 1988 (59 ऑफ़ 1988) नया मोटरयान अधिनियम सड़क यातायात तकनीकी ज्ञान, व्यक्ति तथा माल की यातायात सहूलियत के बारे में व्याख्या करता है। इसमें मोटर दुर्घटनाओं के लिए प्रतिकार दिलाने की व्यवस्था है। इस कानून के अन्तर्गत मोटरयान का तात्पर्य सड़क पर चलने योग्य बनाया गया प्रत्येक वाहन जैसे ट्रक, बस, कार, स्कूटर, मोटर साईकिल, मोपेड़ व सड़क कूटने का इंजन इत्यादि से है। इनसे होने वाला प्रत्येक दुर्घटना मोटर दुर्घटना मानी जाती है और उसके लिए प्रतिकार दिलाया जाता है।

    वाहन दुर्घटना के अन्तर्गत मुआवजा
    वाहन दुर्घटना के अन्तर्गत मुआवजा
    धारा 166 (ज्ञात मोटरयान से दुर्घटना जब गलती मोटर वाले की हो) : यदि दुर्घटना मोटर के स्वामी या चालाक की गलती से होती है तो उसके लिए प्रतिकर मांगने का आवेदन, उस इलाका के दुर्घटना दावा अधिकरण (मोटर दुर्घटना अध्यर्थना न्यायाधिकरण) जो कि जिला न्यायाधीश होता है को दिया जाता है वहां दुर्घटना होती है या जिस स्थान का आवेदक रहने वाला है या जहां प्रतिवादी रहता है उस अधिकरण के पास आवेदन आवेदक की इच्छानुसार स्थान का चयन करते हुए दायर किया जा सकता है। आवेदन घायल व्यक्ति स्वयं, विधिक प्रतिनिधि या एजेंट द्वारा दे सकता है। मृत्यु की दशा में मृतक का कोई विधिक प्रतिनिधि या उसका एजेंट आवेदन दे सकता है। जो छपे फार्म पर दिया जाता है। अगर छपा फार्म उपलब्ध न हो तो फार्म की नकल सादे कागज पर करके आवेदन दिया जा सकता है। एक आवेदन में मोटर के मालिक व चालक को तो पक्षकार बनाया ही जाता है बल्कि बीमा कम्पनी को भी पक्षकार बनाना चाहिए क्योंकि कोई भी मोटर गाड़ी बीमा करवाए बिना नहीं चलाई जा सकती। मोटरयान कर स्वामी इस बात के लिए आवद्ध है कि वह बीमा कम्पनी का नाम बताएं। दावा अधिकारी मुकद्दमें की सुनवाई करता है जो कि प्रायः संक्षिप्त होती है। दावा में यह साबित करना होता है कि:-
    1. दुर्घटना उस मोटर गाड़ी से हुई।
    2. मोटर वाले की गलती के कारण हुई
    3. दुर्घटना से क्या हानि हुई
    यदि दुर्घटना से मृत्यु होती है तो दावेदारों को यह भी साबित करना होता है कि मृतक के दावेदारों को क्या लाभ होता था व क्या लाभ भविष्य में होने की आशा थी। इसके आधार पर प्रतिकर की राशि नियत की जाती है, सम्पति की हानि भी साबित करनी होगी व 6000 रूपये तक मुआवजा अधिकरण दे सकता है। अगर किसी वाहन की बीमा राशि में अतिरिक्त बढ़ौतरी बाबत असीमित नुक्सान की जिम्मेवारी जमा कराया गया हो तो उस सूरत में बीमा कम्पनी 6000 रूपये से अधिक रक़म की सम्पति नुकसान की भी भरपाई करने की जिम्मेवार होगी अन्यथा इससे अधिक की राशि के लिए दिवानी दावा करना आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति को दुर्घटना से चोट लगी है तो उसके इलाज पर होने वाल व्यय, काम न कर पाने के कारण होने वाली हानि, आदि के विषय में प्रतिकर देय है। यदि कोई गम्भीर चोट आती है जिसका स्थाई प्रभाव हो जैसे की कोई लंगड़ा या काना हो जाए तो उसे शेष जीवन, उससे होने वाली असुविधा व हानि का भी प्रतिकर देय होगा। राशि बीमा कम्पनी द्वारा ही चुकाई जाती है। परन्तु तात्पर्य यह नहीं कि वह मोटर वाले से वसूल नहीं की जा सकती है। राशि जितनी दिलाई जाए वह चाहे कम्पनी चाहे मालिक या फिर दोनों से ही दिलाई जा सकती है।
    यह भी हो सकता है कि मोटर चालक या स्वामी का दोष साबित न हो पाये। उस सूरत में चाहिए कि आवेदन में ही यह मांग भी की गई हो कि गलती न होने पर मिलने वाले प्रतिकर तो दिलाया ही जाए। इस प्रकार यदि मोटर वाले की गलती साबित हो तो पूरा, अगर न साबित हो तो नियम प्रतिकर मिल जायेगा।

    मुआवजा लेने सम्बन्धित कार्यवाई : मोटर दुर्घटना की रिपोर्ट थाने में करनी चाहिए। रिर्पोट घायल व्यक्ति स्वयं या उसका कोई साथी लिखवा सकता है। रिपोर्ट में दुर्घटना का समय, स्थान, वाहन का नम्बर, दुर्घटना का कारण इत्यादि लिखवाने चाहिए। चोट के बारे में शीघ्रातिषीघ्र डाक्टरी जांच करवानी चाहिए। सम्पति हानि का विवरण भी देना चाहिए। गवाहों के नाम भी लिखवाने चाहिए। यदि बहुत घायल हुए हों तो प्रत्येक को अलग रिर्पोट लिखवाने की आवश्यकता नहीं, परन्तु यह देख लेना चाहिए कि रिर्पोट में पूरी बात आ गई है या नहीं ज्यादा घायल होने पर रिर्पोट अस्पताल में पुहंचने के बाद भी लिखवाई जा सकती है। डाक्टरी परीक्षा की नकल प्राप्त कर लेनी चाहिए और इलाज के कागज सावधानी से रख लेने चाहिए ताकि प्रतिकर लेते वक्त हानि साबित करने में सुविधा रहे।
    मृत्यु होने की दशा में शव परीक्षा पुलिस करवाती है लेकिन दुर्घटना में लम्बी चोटों के कारण मृत्यु कुछ दिन बाद होती है तो भी शव परीक्षा की आवश्यकता होती है क्योंकि यह मृत्यु भी दुर्घटना में घायल होने के कारण ही मानी जाती है। पुलिस को की गई रिर्पोट को भी मोटर दुर्घटना अध्यर्थना न्यायाधिकरण हर्जाने के लिए स्वीकार कर सकती है।

    धारा 173 के अधीन अपील :
    दावा अधिकरण के निर्णय से असन्तुष्ट कोई भी व्यक्ति निर्णय की तारीख के 90 दिन के भीतर उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। उचित कारण बताए जाने पर, उच्च न्यायालय 90 दिन के अविध के बाद भी अपील की सुनवाई कर सकता है अगर प्रतिकर की रक़म 10000 रूपये से कम हो तो अपील नहीं की जा सकती है और अगर प्रतिकर की रक़म ज्यादा हो तो अपील करने से पहले 25000 रूपये या प्रतिकर का 50 प्रतिशत जो भी कम हो, उच्च न्यायालय में जमा करवाना पड़ता है।

    अधिकरण द्वारा दिलाई गई रक़म प्राप्त करने की विधि :- यह रकम निर्णय के 30 दिन के अन्दर देय होती है अधिकरण द्वारा दिलाई गई रक़म की वसूली के लिए एक प्रमाण-पत्र जिला कलैक्टर के नाम भी प्राप्त किया जा सकता है। जिला कलैक्टर इस रक़म को मालगुजारी की बकाया रक़म की तरह-कुर्की गिरफतारी आदि से वसूल करवा सकता है। अन्यथा मोटर दुर्घटना अध्यर्थना न्यायाधिकरण खुद भी इजराए के जरिए मुआवजे की रक़म उत्तरवादियों से वसूल कर सकता है।

    कानूनी सहातया कार्यक्रमों के अंतर्गत लोक अदालत द्वारा दुर्घटनाओं में प्रतिकर सम्बन्धी वादों के निर्णय की विधि : मोटर दुर्घटना के प्रतिकर सम्बन्धी वादों के लोक अदालतों में संधिकर्ताओं की मद्द से तय कराने का प्रयास किया जाता हैं जो आवेदक अपना निर्णय, लोक अदालत के माध्यम से करवाने के इच्छुक हैं वह छपे फार्म में दी गई सूचनाओं के साथ प्रार्थना-पत्र सम्बन्धित अधिकरण को दे सकता है जिसमें वह यह अनुरोध कर सकता है कि उसका निर्णय लोक अदालत के माध्यम से शीघ्र करवाया जाए। इस आवेदन पर मोटर मालिक व बीमा कम्पनी को सूचना भेज कर निष्चित समय पर बुलाया जाएगा व प्रतिकर के बारे समझौते द्वारा निर्णय करवाने की कोषिष की जाएगी। ऐसी दशा में बीमा कम्पनी या मालिक से आवेदक की धन राशि बिना किसी विलम्ब के दिलाने का प्रयास किया जायेगा।


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    धारा 50 सी.आर.पी.सी. के अधीन हिरासत व जमानत सम्बन्धित अधिकार



    समाज में न्याय व्यवस्था रखना राज्य सरकार का संवैधानिक तथा कानूनी कर्तव्य है। भारत का संविधान भारत के लोगों को समान अधिकार और जीवित रहने का अधिकार प्रदान करता है तथा संविधान के तहत लोगों का यह मूलभूत अधिकार है कि बिना किसी अभियोग के किसी भी व्यक्ति को सजा न दी जाए औरदोषी व्यक्ति को केवल उतनी ही सजा दी जाए जितनी का कानून में प्रावधान है। किसी ऐसे दोषी व्यक्ति को दो बार किसी एक विशेष अभियोग में सजा नहीं दी जा सकती है।
    धारा 50 सी.आर.पी.सी. के अधीन हिरासत व जमानत सम्बन्धित अधिकार
    धारा 50  सीआरपीसी के अधीन हिरासत व जमानत सम्बन्धित अधिकार
    सामाजिक अव्यवस्था तथा अपराधिक व असामाजिक तत्वों से जनता की सुरक्षा के लिए पुलिस विभाग की रचना की गई है। पुलिस विभाग का मुख्य कर्तव्य जनता की सुरक्षा व सहयोग देना है परन्तु कई बार कानून प्रदत्त इन शक्तियों का पुलिस विभाग के कुछ कर्मियों द्वारा दुरूपयोग किया जाता है और कई बार जनता से पुलिस विभाग का अपना कर्तव्य पालन करने के लिए समुचित सहयोग प्राप्त नहीं होता। अतः यह आवश्यक हो जाता है कि हर व्यक्ति यह जान सके कि उसके अधिकार और कर्तव्य मुख्यतः बन्दी बनाए जाने पर व जमानत करवाने सम्बन्धी क्या है।
     
    पुलिस विभाग को बन्दी बनाने का अधिकार कानून प्रदत्त है परन्तु यह अधिकार असीमित नहीं है। कानून में यह व्यवस्था है कि समुचित कारण होने पर या अपराध जघन्न होने पर ही, पुलिस किसी व्यक्ति को बन्दी बना सकती है। मुख्यतः अपराध दो श्रेणियों में बांटे जा सकते है:-
    • संज्ञेय अपराध - इस प्रकार के अपराधों के लिए पुलिस बिना किसी वारंट के संदिगध अपराधी को गिरफ्तार कर सकती है। सामान्यतः गम्भीर अपराधों के लिए ही बिना वारंट गिरफ्तार करने का अधिकार है। गम्भीर या जघन्य अपराधों की श्रेणी में मुख्यतः निम्नलिखित अपराध आते हैंः-
      1. अगर वह हत्या, बलात्कार, अपहारण जैसे अपराधों का दोषी हो
      2. अगर उस पर चोरी-डकैती इत्यादि का अभियोग हो, या उसके पास चोरी का सामान इत्यादि बरामद हो।
      3. अगर वह इश्तहारशुदा भगोड़ा हो।
      4. अगर वह जेल से फरार हुआ हो।
      5. अगर व किसी भी सेना से भागा हुआ हो।
      6. गंभीर चोट पहुंचाना, बिना अधिकार प्रवेष करना, नाजायज शराब खरीद करना व रखना, इन्यादि भी संज्ञेय अपराध की परिभाषा में आते हैं।
    • असंज्ञेय अपराध इस प्रकार के अपराधों में छोटे-मोटे और व्यक्तिगत अपराध जैसे कि किसी पर बिना चोट पहुंचाए हमला करना, किसी की मान हानि करना या किसी को गाली गलौच देना गैर-कानूनी तौर पर दूसरी शादी करना आदि आते हैं। असंज्ञेय अपराध बारे जब पुलिस में सूचना दी जाती है, तो वैसी सूचना रोजनामचा में दर्ज की जाती है और सूचना देने वाला व्यक्ति पुलिस को बाध्य नहीं कर सकता कि वह प्रथम सूचना रिर्पोट (एफ0आई0आर0) दर्ज करें। इस प्रकार के असंज्ञेय अपराधों को पुलिस अनुवेषण या तहकीकात बिना इलाका मैजिस्ट्रेट से आदेश प्राप्त किए बिना नहीं कर सकता है।

    गिरफ्तार होने पर अपराधी के अधिकार है कि उसे यह जानकारी मिलें :- 
    1. कि वह किस अपराध में हिरासत में लिया जा रहा है।
    2. अगर वह वारंट के आधार पर गिरफ्तार किया गया है तो वह उस वारंट को देखे और पढ़े।
    3. किसी वकील को बुलाकर सलाह ले सके।
    4. अदालत के समय 24 घंटे के भीतर पेश किया जाए।
    5. उसे यह जानकारी दी जाए कि वह जमानत ले सकता है कि नहीं।
    6. अगर अदालत द्वारा उसे पुलिस हिरासत में रखने का आदेश हो तो वह अपना डाक्टरी मुआयना किसी सरकारी अस्पलात से करवाए।
    7. उसे किसी ऐसे बयान को देने के लिए बाध्य न किया जाए जो अदालत में उसके अपने खिलाफ साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता हो।
    8. अगर 24 घंटों के दौरान उसके साथ कोई अत्याचार या जोर जबरदस्ती की गई तो वह इलाका मैजिस्ट्रेट को इस बारे में बताए व उचित आदेश प्राप्त कर सके।
    9. उच्चतम न्यायालय के दिषा निर्देषानुसार हथकड़ी लगाए जाने सम्बन्धी अधिकार उच्चतम न्यायालय द्वारा यह निर्देष जारी किए गये हैं कि अपराधी को हथकड़ी सामान्यतः नहीं लगाई जाएगी बल्कि उचित कारणों पर ही लगाई जा सकती है जैसे (अपराधी द्वारा भागने की कोषिष या अपराधी के हिंसक होने की स्थिति या अन्य किसी ऐसे उचित कारण होने पर, व लिखित रूप से आदेश प्राप्त करने पर ही अपराधी को हथकड़ी लगाई जा सकती है।

    जमानत के अधिकार को आधार मानकर, अपराधों को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है:-
    1. धारा 436 सी0आर0पी0सी0 :- जमानत योग्य अपराध जिनमें जमानत प्राप्त करना अधिकार है। इस श्रेणी में आने वाले केसों में अपराधी जमानत करवाने का अधिकार रखता है और अगर वह मैजिस्ट्रेट या पुलिस द्वारा मांगी गई जमानत देता है तो उसे जमानत पर रिहा करना आवश्यक है।
    2. धारा 437 सी0आर0पी0सी0 :- बिना जमानत योग्य अपराध जिनमें जमानत देना या ना देना अदालत की इच्छा पर निर्भर करता है। इन अपराधों में जमानत सिर्फ अदालतों द्वारा दी जाती है और अदालत द्वारा अपराध की गम्भीरता, साक्ष्य को सुरिक्षत रखना इत्यादि बातों को ध्यान में रखते हुए, जमानत दरखास्त मंजूर या नामंजूर की जा सकती है।
    महिला अपराधी के अधिकार कुछ अतिरिक्त विशेषाधिकार प्राप्त है :-
    1. महिला अपराधी को किसी महिला पुलिस की ही हिरासत में रखा जा सकता है।
    2. किसी महिला को किसी अपराध की पूछताछ के लिए सूर्यास्त के बाद या सूर्योदय से पहले किसी भी पुलिस स्टेशन व चौकी में नहीं बुलाया जा सकता औा पूछताछ के वक्त महिला आरक्षी का उपस्थित रहना आवश्यक है।
    3. किसी भी महिला अपराधी की डाक्टरी जांच महिला डाक्टर द्वारा ही करवाई जा सकती है।
    4. किसी गिरफतार महिला की तलाशी केवल महिला ही ले सकती है।
    5. घर की तलाशी लेते वक्त महिला को अधिकार है कि वह तलाशी लेने वाली महिला अधिकारी/अधिकारी उस महिला को घर से बाहर आने का समय दें।
    धारा 53-54 सी0आर0पी0सी0 के अधीन अपराधी की डाक्टरी जांच
    पुलिस अधिकारी अदालत में दरखास्त देकर अपराधी का डाक्टरी मुआयना करवा सकता है ताकि उस डाक्टरी सर्टीफिकेट को वह साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल कर सके। जैसे बलात्कार के अपराध में वह शराब पीने का साक्ष्य प्राप्त करने के लिए भी डाक्टरी जांच का आदेश अदालत से हासिल कर सकता है।
    अपराधी स्वयं भी अपनी डाक्टरी जांच की लिए अदालत को प्रार्थना पत्र दे सकता है। ताकि यह साबित कर सके कि उस पर पुलिस द्वारा जयादती या मार-पीट की गई है। बलात्कार इत्यादि अपराधों की षिकार महिलाएं अपनी डाक्टरी जांच करवाने मे पुलिस से आमतौर पर सहयोग नहीं करती। उन्हें ऐसी जांच के लिए बाध्य तो नहीं किया जा सकता लेकिन परिणामस्वरूप आवश्यक साक्ष्य की कमी रह जाने के कारण अपराधी कानून के षिकंजे से छूटने में सफल हो जाता है और समाज में असामाजिक तत्वों को बढ़ावा मिलता है। इसलिए यह आवश्यक है कि पुलिस को जनता का सम्पूर्ण सहयोग प्राप्त हो।

    धारा 438 सी0आर0पी0सी0 के अधीन अग्रिम जमानत
    गैर जमानती अपराधों मे अग्रिम जमानत का भी प्रावधान है। इस कानून की धारा के अन्तर्गत कोई भी व्यक्ति जिसके विरूद्ध गैर जमानती अपराध का मुकदमा दर्ज किया गया हो सेशन अदालत या उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत करवाने हेतू प्रार्थना-पत्र दे सकता है। अदालत मुकद्दमें के विभिन्न पहलुओं को देखते हुए, शर्तो पर या बिना शर्त के अग्रिम जमानत मन्जूर या नामन्जूर कर सकती है।
    अगर कोई अपराधी स्वयं वकील का खर्च वहन करने में असमर्थ है तो उसे सरकारी खर्चे पर वकील अदालत द्वारा दिलाया जा सकता है। बल्कि अदालत स्वयं भी इस बात के लिए बाध्य है कि अगर किसी अपराधी के पास वकील न हो तो स्वयं उसे सरकारी खर्चे पर वकील देने की आज्ञा दें।

    जमानत
    इस शब्द का अभिप्राय यह है कि जहाँ कोई व्यक्ति किसी फौजदारी मुकद्दमें में अभियुक्त हो और अदालत उसके केस की सुनवाई के दौरान उसे जेल में बन्द रखने के बजाय उसे ‘‘जमानत’’ पर छोडे़ जाने के आदेश देती है तो उस सूरत में जो व्यक्ति उस अभियुक्त की उस अदालत में समय-समय पर हाजिर रहने की जिम्मेदारी लेता है, वह व्यक्ति उस अभियुक्त का जमानती कहलाता है और अगर वह व्यक्ति इस जिम्मेदार को निभाने में असफल रहता है तो वह अपने द्धारा ज़मानतनामें में लिखी रक्म (या उससे कम रक्म) अदालत के आदेश अनुसार देने का बाध्य रहता है। जब तक अभियुक्त या उसके ज़मानती पर अदालत द्वारा कोई जुर्माना अभियुक्त की किसी गैर हाजरी बारे नहीं लगाया जाता तब तक कोई भी रक्म दोषी या उसके जमानती द्वारा किसी भी व्यक्ति या अधिकारी को देने की कोई जरूरत न है। जब कभी ऐसी कोई रक्म कोई अदा करता है तो वह उस अदायगी की सरकारी रसीद पाने का हकदार है।


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    दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144



    दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 शांति व्यवस्था कायम करने के लिए लगाई जाती है। इस धारा को लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट द्वारा एक नोटिफिकेशन जारी की जाती है और जिस भी स्थान के लिए यह धारा-144 लगाई जाती है, उस स्थान पर पांच या उससे ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते हैं। इस धारा से उस स्थान पर हथियारों के लाने ले जाने पर भी रोक लगा दी जाती है, जो भी व्यक्ति इस धारा का पालन नहीं करता है तो फिर पुलिस उस व्यक्ति को धारा-107 या फिर धारा-151 के तहत गिरफ्तार भी कर सकती है। इस प्रकार के मामलों में एक साल की कैद भी हो सकती है। वैसे यह एक जमानती अपराध है, इसमें जमात हो जाती है।
    दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-144
    धारा 144 :- न्यूसेंस या आशंकित खतरे के अर्जेंट मामलों में आदेश जारी करने की शक्ति :-
    1. उन मामलों में जिनमें जिला मजिस्ट्रेट या उप खंड मजिस्ट्रेट राज्य सरकार द्वारा इस निमित विशेषतया सशक्त किये गये किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट की राय में इस धारा के अधीन कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है और तुरंत निवारण या शीघ्र उपचार करना वांछनीय है, वह मजिस्ट्रेट ऐसे लिखित आदेश द्वारा जिसमें इस मामले के तात्विक तथ्यों का कथन होगा और जिसकी तामील धारा 134 द्वारा उपबंधित रीति से कराई जाएगी, किसी व्यक्ति को कार्य विशेष न करने या अपने कब्जे की या अपने प्रबंधाधीन किसी विशिष्ट सम्पति की कोई विशिष्ट व्यवस्था करने का निर्देश उस दशा में दे सकता है, जिसमें मजिस्ट्रेट ऐसा समझता है कि ऐसे निर्देश से यह सम्भाव्य है या ऐसे निर्देश की यह प्रवृति है कि विधिपूर्वक नियोजित ऐसे व्यक्ति को बाधा, क्षोभ या क्षति का मानव जीवन, स्वास्थ्य या क्षोभ के खतरे का या लोक प्रशान्ति विक्षुब्ध होने का, या बलवे या दंगे का निवारण हो जाएगा।
    2. इस धारा के अधीन, आदेश, आपात की दशाओं में या उन दशाओं में जब परिस्थितियाँ ऐसी है कि उस व्यक्ति पर, जिसके विरुद्ध वह आदेश निर्दिष्ट है, सूचना की तामील सम्यक समय में करने की गुंजाइश न हो, एक पक्षीय रुप में पारित किया जा सकता है।
    3. इस धारा के अधीन आदेश किसी विशिष्ट व्यक्ति को, या किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में निवास करने वाले व्यक्तियों को अथवा आम जनता को, जब वे, किसी विशेष स्थान या क्षेत्र में जाते रहते हैं या जाऐं, निर्दिष्ट किया जा सकता है।
    4. इस धारा के अधीन कोई आदेश उस आदेश के दिए जाने की तारीख से ही दो मास से आगे प्रवृत्त न रहेगा-परन्तु यदि राज्य सरकार मानव जीवन, या स्वास्थ्य या क्षेत्र को खतरे का निवारण करने के लिए अथवा बलवे या किसी दंगे का निवारण करने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझती है तो वह अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकती है कि मजिस्ट्रेट द्वारा इस धारा के अधीन किया गया कोई आदेश उतनी अतिरिक्त अवधि के लिए, जितनी वह उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करें प्रवृत्त रहेगा, किन्तु वह अतिक्ति अवधि उस तारीख से छः मास से अधिक की न होगी, जिसको मजिस्ट्रेट द्वारा दिया गया आदेश ऐसे निदेश के अभाव में समाप्त हो गया होता।
    5. कोई मजिस्ट्रेट या तो स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर किसी ऐसे आदेश को विखंडित या परिवर्तित कर सकता है, जो स्वयं उसने या उसके अधीनस्थ किसी मजिस्ट्रेट ने या उसके पद पूर्ववर्ती ने इस धारा के अधीन दिया है।
    6. राज्य सरकार उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन अपने द्वारा दिए गये किसी आदेश को या तो स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर विखंडित या परिवर्तित कर सकती है।
    7. जहाँ उपधारा (5) या उपधारा (6) के अधीन आवेदन प्राप्त होता है वहाँ यथास्थिति मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार आवेदक को या तो स्वयं या प्लीडर द्वारा उसके समक्ष हाजिर होने और आदेश के विरुद्ध कारण दर्शित करने का शीध्र अवसर देगी और यदि यथास्थिति मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार आवेदन को पूर्णतः या अंशतः नामंजूर कर दे तो वह ऐसा करने के अपने कारणों को लेखबद्ध करेगी।
     न्यूसेंस या आशंकित खतरे के अर्जेंट मामलों में आदेश जारी करने की शक्ति
        1. धारा 144 ‘क’ - आयुध सहित जुलूस या सामूहिक कवायद या सामूहिक प्रशिक्षण के प्रतिषेध की शक्ति -
          (1) जिला मजिस्ट्रेट, जब भी वह लोक शांति या लोक सुरक्षा या लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझता है, लोक सूचना या आदेश द्वारा अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर किसी जुलूस में आयुध ले जाने या किसी लोक स्थान में आयुध सहित कोई सामूहिक कवायद या सामूहिक प्रशिक्षण व्यवस्थित या आयोजित करने या उसमें भाग लेने का प्रतिषेध कर सकता है।
          (2) इस धारा के अधीन जारी की गई लोक सूचना या किया गया आदेश किसी विशिष्ट व्यक्ति या किसी समुदाय, दल या संगठन के व्यक्तियों के प्रति, सम्बोधित हो सकती या हो सकता हैं।
          (3) इस धारा के अधीन जारी की गई लोक सूचना या किया गया आदेश जारी किए जाने या बनाए जाने की तारीख से तीन मास से अधिक के लिए, प्रवृत्त नहीं रहेगी या रहेगा।
          (4) राज्य सरकार, यदि वह लोक शांति या लोक व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक समझती है, तो अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकती है कि इस धारा के अधीन जिला मजिस्ट्रेट द्वारा निकाली गई लोक सूचना या किया गया आदेश, उस तारीख से जिसका जिला मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसी लोक सूचना निकाली गई थी या आदेश किया गया था, ऐसे निर्देश के न होने की दशा में समाप्त हो जाती या हो जाता, ऐसी अतिरिक्त अवधि के लिए लागू रहेगी या रहेगा जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए।
          (5) राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, उपधारा (4) के अधीन अपनी शक्तियां जिला मजिस्ट्रेट को, ऐसे नियंत्रणों और निदेशों के अधीन रहते हुए जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे, प्रत्यायोजित कर सकती है। स्पष्टीकरण - ‘आयुध’ शब्द का वही अर्थ है जो उसका भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 153कक में है।’’
        2. धारा 144 का क्षेत्र (SCOPE) - यह धारा केवल आशंकित खतरे या इमरजेंसी को ही आकर्षित करताहै। शक्ति का उपयोग, Obstruction, Annoyance, Injury को रोकने के लिए उस व्यक्ति के लिए किया जाएगा जो कानूनन रुप से कार्यरत है या मानव जीवन को खतरा हो या स्वास्थ्य, सुरक्षा आम जनता की शांति, स्थिरता, दंगा या बलवा (Affray) का खतरा हो। बाबूलाल बनाम महाराष्ट्र सरकार, ए.आई.आर. 1961 एस.सी. 884, गुलाम बनाम इब्राहिम ए.आई.आर. 1978 एस.सी.422, 
        3. निषेध का तरीका:- इस धारा के अंतर्गत व्यवधान निषेध निम्न प्रकार से किया जा सकता हैः-
          1. किसी व्यक्ति विशेष के कोई कार्य नहीं करने हेतु निर्देश देकर
          2. किसी व्यक्ति को किसी सम्पत्ति विशेष के लिए कोई आदेश देकर जो सम्पत्ति उसके स्वामित्व या नियंत्रण में है।
        4. धारा 144 के कार्यवाही की प्रकृति :- कार्यवाही की प्रकृति:- धारा 144 के अधीन किया गया आदेश प्रशासनिक व कार्यपालक होता है न कि न्यायिक या न्यायिककल्प। अतः अनु. 32 के अंतर्गत ऐसा आदेश रिट-अधिकारिता में परीक्षणीय है। गुलाम अब्बास व अन्य बनाम उ.प्र. राज्य, व अन्य (1980) 3 उम.नि.प. 467, 1981 क्रि.ला.ज. 1835 धारा 144 के अधीन आदेश पारित किया गया था। इसके प्रकृति के बारे में प्रश्न था कि क्या वह अस्थाई प्रकृति का था धारित किया गया कि अधिसूचना की पुनरावृत्ति करके उसे स्थायी या अर्धस्थायी के रुप में आरोपित नहीं किया जा सकता। एम.एस. एसोसिएट्स बनाम पुलिस कमिश्नर, 1997 क्रि.ला.ज.377 
        5. आदेश की प्रकृति:- धारा 144 का आदेश न्यायिक कल्प प्रकृति का नहीं है। यह कार्यपालक या प्रशासनिक प्रकृति का है, जिसे लोक व्यवस्था एवं शान्ति की रक्षा के लिए आवश्यक जानकर दिया जाता है। इसी कारण दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के लागू हो जाने के बाद धारा 144 के अधीन आदेश जारी करने की अधिकारिता केवल कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को दी गई है, न्यायिक मजिस्ट्रेट को नहीं। गुलाम अब्बास बनाम उ.प्र. राज्य 1981 एस.सी. 2198, 1981 क्रि.ला.ज. 1835
          अतः संहिता 1973 के लागू हो जाने के बाद धारा 144 के आदेश को न्यायिक वाली उदाहरणें अब विधि की दृष्टि में विधिमान्य नहीं रही है। यह आदेश आपात प्रकृति का है। मधुलिमए बनाम एस.डी.एम. मुंगेर, ए.आई.आर. 1971 एस.सी. 2486, आचार्य जगदीश्वर का मामला 1983 क्रि.ला.ज. 1872(एस.सी.)
          कार्यपालक कर्तव्यों के सम्पादन में पारित धारा 144 दं.प्र.सं. के आदेश को एक कार्यपालक आदेश मानना होगा, जिसमें कोई वाद अवधारित नहीं होता। यह तो केवल ऐसा आदेश है, जो लोक शान्ति के बनाए रखने के लिए किया जाता है। अब यह सुस्थापित है कि भारत के संविधान अनुच्छेद 19 में गारंटीशुदा 6 स्वतंत्रताऐं आत्यांतिक (Absolute) नहीं है, किन्तु उन पर भी युक्तियुक्त परिसीमाऐं अधिरोपित की जा सकती है। व्यापार संबंधी स्वतंत्रता पर भी सार्वजनिक लोकहित में कुछ परिसीमाऐं (Restriction) लगाई जा सकती है। बाल भारती स्कूल बनाम जिला मजिस्ट्रेट 1990 क्रि.ला.ज. 422, 1989 ए.एल.जे. 139 
        6. धारा लागू करने की शर्त (Condition for Application of Section) :-वह सूचना जो दंडाधिकारी को संतुष्ट करता है कि सूचना का विषय अति आवश्यक है, तुरंत का रोक अथवा तीव्र उपाय आवश्यक है, संभावित खतरा टालने के लिए यही एक आधार है जिस पर दंडाधिकारी आगे कार्य कर सकते हैं। इम्परर बनाम तुरब ए.आई.आर. 1942 अवध 39, बाबूलाल बनाम महाराष्ट्र सरकार ए.आई.आर. 1961 एस.सी. 884 
        7. सूचना प्राप्ति का प्रकार :-सूचना मौखिक या पुलिस प्रतिवेदन पर आधारित हो सकती है।
        8. प्रारुप एवं आदेश का सार(Forms & Contents of Order):- आदेश निश्चित रुप से लिखित होना चाहिए। पीताम्बर 17 डब्लू. आर. 57 इस धारा के अधीन का आदेश संक्षिप्त सरल, पूर्ण रुप से स्पष्ट तथा निश्चित होना चाहिए ताकि उसे लागू करने में आसानी हो। भगवती ए.आई.आर. 1940 इला. 465 ए.आई.आर. 1935 बाम्बे 33
          आदेश में वस्तुमूलक तथ्य अवश्य होना चाहिए जिसे दंडाधिकारी विवाद का तथ्य समझते हैं तथा जिस आधार पर उनका आदेश टिका है। कारुँ लाल - 32 सी. कल. 935 
        9. आदेश की विषय-वस्तु :- धारा 144 के अधीन पारित आदेश लिखित अंतिम व निश्चित शर्तो का होना चाहिए। उपधाराऐं (1) व (2) में ऐसे सशर्त आदेश के पारित करने का अनुध्यात अथवा परिकल्पना नहीं है, जो वाद में अन्तिम किया जाए। भोला गिरी का मामला 36 क्रि.लॉ.ज.1955 पृ.547आदेश में ऐसे सारवान व ”तात्विक (मेटेरियल) तथ्यों के कथन“ का समावेश होना आवश्यक है जो मजिस्ट्रेट की राय में मामले के तथ्य हैं तथा कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है। बाबूलाल पराठे बनाम महाराष्ट्र राज्य ए.आई.आर. 1961 एस.सी.884, ए.आई.आर. 1971 एस.सी. 2486, 1977 क्रि.लॉ.ज. 1747
          यदि आदेश में वास्तविक तथ्य नहीं दिए गये हैं तो आदेश अपास्त हो जाएगा। गोपाल प्रसाद बनाम सिक्किम राज्य, 1981, क्रि.लॉ.ज. 60 
        10. कौन मजिस्ट्रेट कार्यवाही कर सकता है:- धारा 144 की उपधारा (1) के अधीन आदेश करने की अधिकारिता केवल जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त सशक्त किए गये किसी अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट को है। अ.च.चैधरी बनाम अनिरुद्ध रविदास 1983 क्रि.लॉ.ज. (एन.ओ.सी.) 80 गोहाटी 
        11. दंडाधिकारी की अधीनस्थता:- धारा 144 के अधीन कार्यरत दंडाधिकारी उच्च न्यायालय तथा सत्र न्यायाधीश के अधीनस्थ होते हैं रिविजन के उद्देश्य के लिए। यशवंत सिंह बनाम प्रीतम वगैरह ए.आई.आर. 1967 पंजा.482, 1967 क्रि.लॉ.ज. 1630 
        12. दंडाधिकारी आदेश पारित कर सकते हैं:-1. हथियार ले जाने से रोकने का। गर्ग बनाम सुपरिटेंडेंट 1970 (3) एस.सी.सी. 747
          2. सामूहिक रुप से जमा होने से रोक सकता है। राम मनोहर बनाम स्टेट ए.आई.आर. 1968 इला. 100
          3. जूलूस निकालने पर रोक लगा सकते हैं। बाबूलाल बनाम महा. ए.आई.आर. 1961 एस.सी. 884
          4. किसी सभा को रोक सकते हैं। गर्ग बनाम सुपरिटेंडेंट 1970(3) 3 सी.सी. 747
          5. किसी खास व्र्यिक्त को किसी खास इलाके अथवा राज्य में प्रवेश पर रोक लगा सकते हैं। डांगे बनाम राज्य, 1970(3) एस.सी.सी. 218
          6. किसी व्यक्ति को यह निदेश दे सकते हैं कि वह किसी खास और अपनी संबंधित वस्तु से अलग रहे।
        13. आदेश आत्यंतिक (Absolute) होना चाहिए :- इस धारा के अधीन का आदेश आत्यंतिक होना चाहिए न कि सशर्त। इम्परर बनाम भोला गिरी ए.आई.आर. 1939 कल. 259, 63 क्रि.लॉ.ज. 1374
        14. आदेश सकारण (Speaking) अवश्य होना चाहिए :- धारा 144 की उपधारा (2) कार्यपालक दंडाधिकारी के तरफ से न्यायिक मस्तिष्क की ओर अनुबंधित करता है। कार्यपालक दंडाधिकारी से यह आशा की जाती है कि वे एक सकारण आदेश जारी करें जिसमें स्पष्ट रुप से यह वर्णित करें कि इमरजेंसी की स्थिति वर्तमान है जिसके कारण वे असाधारण अधिकार क्षेत्र प्राप्त कर एक पक्षीय आदेश विरोधी पक्ष के पीछे कार्यवाही के तरफ पारित करने में सक्षम हुए हैं। विष्णु पदखरा बनाम पं. बंगाल. सरकार 1995 कल. क्रि.एल.आर. 25 (कल.)
          एकपक्षीय आदेश पारित करने के पूर्व दंडाधिकारी को अपना कारण लिखना चाहिए , विचारित किया गया तथा यह इमरजेंसी का समय पाया गया। इसकी असफलता में एकपक्षीय आदेश अनुमान्य नहीं होगा। बी. लिंगारेडी बनाम बी.हुसैन 1979 क्रि.लॉ.ज. 1147 आं.प्र. 
        15. साक्ष्य ग्रहण करने का प्रावधान :- इस प्रक्रिया में साक्ष्य ग्रहण करना आवश्यक नहीं है। 1971 एस.सी.(2) 486, 1977 ए.सी.सी. 315 
        16. आदेश किसको संबोधित किया जाय:- धारा 144 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट रुप से यह स्पष्ट किया गया कि इस धारा के अधीन आदेश किसी विशिष्ट व्यक्ति को अथवा आम जनता को जब वे किसी विशेष क्षेत्र में जाते रहते हैं या जाऐं, निर्दिष्ट किया जा सकता है। 1978 क्रि.लॉ.ज. 496, ए.आई.आर. 1978 एस.सी.सी. 422 
        17. धारा 144 व पक्षकारों के कब्जे व हक का फैसला :- मजिस्ट्रेट को धारा 144 के अधीन कार्यवाही करने के लिए तात्पर्यिक होते हुए पक्षकारों के कब्जे अथवा हक-विषयक प्रश्नों को तय करने की अधिकारिता नहीं है। 53 क्रि.लॉ.ज. 1952, 1981 क्रि.लॉ.ज. 1835 
        18. आदेश का साक्ष्यिक मूल्य :- धारा 144 का आदेश प्रशान्ति भंग के निवारण हेतु एक अस्थायी कदम है। इसका कब्जा के प्रश्न के बारे में कोई साक्ष्यिक मूल्य नहीं है। किन्तु निम्न उदाहरण में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि यह सही है कि धारा 144 का आदेश कब्जे का साक्ष्य नहीं है, किन्तु इस सीमित प्रयोजन के लिए कि कार्यवाही में पक्षकारों के दावे क्या थे, देखने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता है। राम प्र. बनाम शंकर प्रसाद, 52 क्रि.ला.ज. 778 (पटना), भूपत कुम्हार बनाम बिहार राज्य 1975 क्रि.लॉ.ज. 1405 (पटना) 
        19. आदेश की अवधि :- दो मास की अधिकतम अवधि- धारा 144 की उपधारा (4) के अधीन मजिस्ट्रेट का आदेश केवल दो माह तक लागू रह सकता है, इससे अधिक नहीं। जब तक कि इस अवधि में राज्य सरकार द्वारा मानव जीवन, स्वास्थ्य या क्षेम को खतरे का निवारण करने के लिए अथवा बलवे को या दंगेका निवारण करने के लिए इस अवधि में वृद्धि नहीं की जाती। रामदास बनाम नगर मजिस्ट्रेट 1960 क्रि.लॉ.ज.865 (2) 1984 एस.सी.सी. (क्रि.), माधव सिंह बनाम इम्परर ए.आई.आर. 1982 पटना 331, 
        20. अवधि की गणना :- साठ दिनों की गिनती कैसे की जाएगी इसका प्रारंभ उसी दिन से होता है जिस दिन धारा 144 के अधीन की कार्यवाही के अधीन रोक आदेश पारित किया जाता है। 1983 बी.एल.जे. 289 
        21. राज्य सरकार द्वारा अवधि में वृद्धि :- राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा मानव-जीवन एवं स्वास्थ्य या क्षेम को खतरे अथवा बलवे या दंगे का निवारण करने के लिए आवश्यक होने पर अधिसूचना द्वारा 6 मास की अवधि में, उस तारीख से जिसको मजिस्ट्रेट द्वारा किया गया है आदेश ऐसे निदेश के अभाव में समाप्त हो गया हो, वृद्धि कर सकता है। किन्तु राज्य सरकार को ऐसे आदेश को जो प्रवर्तन में नहीं है, धारा 144 के अधीन अवधि बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह उपधारा आज्ञापक है। चानन सिंह बनाम इम्परर 42 क्रि.ला.ज. 1941 
        22. पुनरीक्षण :- उचित मामले में आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय धारा 401 के अधीन तथा सेशन न्यायालय धारा 399 के अधीन धारा 144 के मामले में हस्तक्षेप कर सकता है। उच्च न्यायालय इस धारा के अधीन वैधता पर विचार तो करती है, साथ ही ऐसा आदेश उचित है अथवा नहीं, उसके आधार न्यायोचित है अथवा नहीं उस पर भी विचार किया जा सकता है। जिला परिषद इटावा बनाम के.सी. सक्सेना 1977 क्रि.लॉ.ज. 1747 (इलाहाबाद) 1977 क्रि.लॉ.ज. 1747
          रिविजन (Rivision):- इस धारा के अधीन आदेश से व्यथित व्यक्ति उच्च न्यायालय में जा सकते हैं या सेशन जज के यहाँ रिविजन (पुर्नविचार) के लिए जा सकते हैं। मधुलिमा बनाम एस.डी.एम. ए.आई.आर. 1971 एस.सी. 2486, 1971 क्रि.लॉ.ज 1720 बाबूलाल बनाम महा. सरकार ए.आई.आर. 1961 एस.सी. 884, जिला परिषद बनाम के.सी. सक्सेना 1977 क्रि.लॉ.ज. 1747 (इला.) 
        23. आदेश की अवज्ञाकारिता का परिणाम:- यदि कोई व्यक्ति धारा 144 के आदेश की अवज्ञा करता है तो वह धारा 188 आई.पी.सी. के अधीन दंड पाने के योग्य है। राजनारायण बनाम डी.एम; ए.आई.आर. 1956 इला. 481 
        24. परिवाद दायर करना आवश्यक:- धारा 144 के आदेश की अवज्ञा के लिए आदेश जारी करने वाला मजिस्ट्रेट भा.दं.सं. की धारा 188 में अभियुक्त को दंडित करने के लिए स्वयं सशक्त नहीं है। उसे या किसी ऐसे अन्य लोकसेवक को, जिसके वह प्रशासनिक तौर पर अधीनस्थ है, उसे दं.प्र.सं. की धारा 195 तथा धारा 340 के उपबंधानुसार लिखित परिवाद दाखिल करना होगा। सतीश बनाम राज्य 39 सी.डब्लू.एन1053, महेन्द्र बनाम राज्य ए.आई.आर. 1970 पृ. 162 
        25. धारा 144 को 145 दं.प्र.सं.में बदलना:- धारा 144 दं.प्र.सं. की कारवाई को धारा 145 दं.प्र.सं. में उसी अंतिम दिन की या पहले बदला जा सकता है जिस दिन धारा 144 के अधीन का निषेधात्मक आदेश की समय सीमा खत्म हो रही हो। हदु खान बनाम महादेव दास ए.आई.आर. 1968 उड़ी. 221, 1968 क्रि.लॉ.ज. 1623, 1976 क्रि.लॉ.ज. 649, 1975 बी.बी.सी.जे. 632, यदि धारा 145 दं.प्र.सं. की जरुरतें पूरी हो जाती है उस कारवाई में जो धारा 144 दं.प्र.सं. की लंबित कारवाई है तो कारवाई को धारा 145 दं.प्र.सं. की कारवाई में परिवत्र्तित किया जा सकता है। सुरेन्द्र मिश्रा बनाम वी. त्रिनाथ राव 1975 क्रि.लॉ.ज. 1850 उड़ीसा
          जब कारवाई में ऐसा परिवर्तन होता है तो दंडाधिकारी एक नई कारवाई प्रारंभ करते हैं। वीजेन्द्र राय बनाम मोहन राय 1978 क्रि.लॉ.ज. 306 पटना, राधा सहनी बनाम रामकांत झा 1978 पी.एल.जे.आर. 606, 1978 बी.एल.जे.आर. 187


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        रात्रि भोजन एवं शयन के मुख्य नियम



        रात्रि चर्या में अंतिम एवं महत्वपूर्ण कर्म शमन या नींद लेना होता है। शरीर के स्वास्थ को बनाये रखने के लिए नींद का बहुत बड़ा योगदान है। सारे दिन की विभिन्न क्र्रियाओं के पश्चात जब मनुष्य का शरीर एवं मस्तिष्क बहुत थक जाता है अतः शरीर के सभी अंगों एवं मन को आराम देने के लिए नींद अति आवश्यक है, मन, मस्तिष्क एवं ज्ञानेन्द्रिय जब शिथिल हो जाता है तथा निष्क्रिय हो जाता है उसे नींद कहते है या मन की ऐसी स्थिति जिसमें उसका सम्पर्क ज्ञानेन्द्रियों और कर्मोन्द्रियों से दूर जाता है वह अवस्था निद्रा कहलाता है। जब मन एवं मस्तिष्क थक जाते है तो स्वतः ही कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञनेन्द्रिय से उसका संपर्क टूट जाता है परिणाम स्वरूप कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेनिद्रय स्वयं निष्क्रिय हो जाती है। इस अवस्था में श्वास-प्रश्वास तथा रक्त संचार, हृदय की गति, पाचन जैसे महत्वपूर्ण क्रियाऐं चलती होती है। शरीर की उर्जा में वृद्धि होती है तथा व्यक्ति अपने आप को स्वस्थ, ताजा व उत्साहित महसूस करता है। इस दौरान शरीर के कोशिकाओं का नया निर्माण भी होता है।
        अच्छे स्वास्थ के लिए नींद अत्यंत आवश्यक कर्म है। जिन व्यक्तियों को नींद नहीं आती। वे अनेक शारीरिक एवं मानसिक रोगों से पीडि़त होते है एवं अनिद्रा रोग से ग्रसित होते है। ठीक इससे विपरीत, ज्यादा नींद भी आलस्य, निष्क्रियता, कफ प्रकोप, मोटापा, मन्दाग्नि आदि रोगों से पीडि़त होते है। एवं कुपोषण, दुर्बलता, अजीर्ण विषाक्तता आदि उत्पन्न होता है। अवस्था भेद से नींद का समय:-
        1. नवजात शिशु को 24 में 20 घंटा सोना आवश्यक है क्योंकि इससे उनकी शारीरिक वृद्धि तीव्र गति से होती है।
        2. साधारण स्वस्थ व्यक्ति को 6-8 घंटा का नींद पर्याप्त है।
        3. वृद्धजनों को चार से छः घंटे की नींद पर्याप्त है।
        कहावत है कि रोगी को आठ घंटा, भोगी (यौवनावस्था में) को छः घंटा, जोगी (साधु-संत वृद्ध) को चार घंटा नींद लेना चाहिए। उचित समय तक गहरी नींद सोने से मनुष्य में प्रसन्नता, पुष्टि, शक्ति, पौरूषत्व, ज्ञान और आयु की वृद्धि होती हैं इसके विपरीत पर्याप्त नींद न लेने से व्यक्ति, दुर्बल, कमजोर, कुपोषित, नपुंसक जड़बुद्धि हो जाता है। और भिन्न रोगों से ग्रसित हो मृत्यु को प्राप्त होता है। शयन के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए -
        1. स्वच्छ एवं हवादार कमरा हो, जहां वर्षा में पानी ठंड में ठंडी हवा तथा ग्रीष्म ऋतु में गरम हवा का शीध्र प्रवेश न हो।
        2. साथ सुथरे-बिछावन हो, सुगन्धित द्रव्यों का प्रयोग करना चाहिए।
        3. रूचि अनुसार संगीत सुनना या साहित्य पढ़ना।
        4. बिछावन में सिर दिशा पूर्व या दक्षिण की ओर होना चाहिए।
        5. मन को शांत रखे, आदि।
        6. सोते समय शरीर पर मालिश, दूध, मिठाई आदि खाना चाहिए।
        इस तरह रात्रि चर्या का पालन करने से दोष धातु, मल अवस्था में मन एवं इन्द्रिय प्रसन्न रहती है। और व्यक्ति आरोग्य रहता है। आहार का वर्णन आहार प्रकरण में किया गया हैं।
        शारीरिक दोषों में कफ दोष की तथा मानसिक दोषों में तमस दोष की प्रधानता होने पर नींद आती है। रात्रि का समय निद्रा के लिए अनुकूल होता है क्योंकि इस समय, अंधकार, शोर की कमी, वातावरण शीतल होने से नींद जल्दी और अच्छी आती है इसी तरह अच्छी नींद के लिए जहां शारीरिक श्रम, थकावट का होना भी आवश्यक है। वहीं मानसिक रूप से पूर्णतः शान्त रहना अर्थात् क्रोध, शोक, भय, चिन्ता आदि मानसिक विकारो से मुक्ती भी होना चाहिए। यह बात सभी लोग जानते है कि भोजन का गहरा सम्बन्ध नींद से होता है भोजन का सही पाचन न होने पर, नींद में बाधा उत्पन्न होती है। अतः रात्रि में यथा संभव जल्दी भोजन कर लेना चाहिए। भोजन के समय एवं सोने के समय के बीच कम से कम एक घंटा का अंतर होना चाहिए। रात्रि का भोजन सुपाच्य एवं हल्का होना चाहिए। भोजन के पश्चात कुछ दूर पैदल भ्रमण करना चाहिए। इससे भोजन का पाचन अच्छा होता है और नींद भी अच्छी आती है।
        रात्रि में दही का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यह शरीर के अंदर स्थित स्त्रोतों में रूकावट उत्पन्न करता हैं। चूंकि रात्रि भोजन के बाद व्यक्ति सो जाता है और पाचन क्रिया सोये अवस्था में चलती जाती है जो धीमी होती है परिणामतः स्त्रोतों में अवरोध होने से नींद बाधित होता है पाचन की क्रिया बाधित होती है।
        रात्रि के समय अध्ययन के लिए यह आवश्यक है कि उचित प्रकाश की व्यवस्था हो। कम प्रकाश की उपस्थिति में नेत्रों पर जोर पड़ने से नेत्र ज्योति प्रभावित होती है। दर्शन शक्ति कम होती जाती है जहां तक हो सके रात मेंकम से कम पढ़ना चाहिए। आवश्यकता पढ़ने पर लेखन कार्य करे। परंतु कई विद्धानों का मत है कि सोते समय अध्ययन करना नींद अच्छी आती है। अतः सोते समय मन पसन्द साहित्यों का अध्ययन जरूर करना चाहिए।

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