भक्ति आन्दोलन में कबीर का योगदान



भक्ति आन्दोलन वह आन्दोलन है जिसमें भागवत धर्म के प्रचार और प्रसार के परिणामस्वरूप भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। भक्ति आन्दोलन ने जन सामान्य को सम्मानपूर्वक जीने का रास्ता दिखाया, आत्मगौरव का भाव जगाया और जीवन के प्रति सकारात्मक आस्थापूर्ण दृष्टिकोण विकसित किया। देश की अखण्डता और समस्त देशवासियों के कल्याण तथा मानव के समान अधिकारों को अभिव्यक्ति दी। भक्ति आन्दोलन के सम्बन्ध में शिव कुमार मिश्र लिखते हैं -
"यह भक्ति आन्दोलन, सच पूछा जाए तो अपने समय की राजनीतिक, धामिर्क और सामाजिक परिस्थितियों की अनिवार्य देन था। वह युग जीवन की ऐतिहासिक माँग बनकर आया। इस तथ्य का अनुमान महज इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने न केवल अपने समय की राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक जड़ता को तोड़ा, चली आती हुई सांस्कृतिक जीवन की धारा के साथ विजेताओं की नई संस्कृति को घुलाते-मिलाते हुए पहली बार जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण आदि से निरपेक्ष एक मानव धर्म तथा एक मानव संस्कृति की परिकल्पना सामने रखी। इसने शताब्दियों से कुंठित और अपमानित देश के करोड़ों-करोड़ साधारण जनों के लिए उनकी सामाजिक मुक्ति तथा आध्यात्मिकता के द्वार भी उन्मुक्त कर दिए, समाज तथा धर्म के ठेकेदारों ने जिन्हें उनके लिए कब का बन्द कर रखा था। इस आधार पर यदि यह कहा जाए कि एक स्तर पर यह भक्ति-आन्दोलन रूढि़ग्रस्त धर्म तथा उसके द्वारा अभिशप्त एक अनैतिक और अमानवीय समाज व्यवस्था के प्रति सामान्य जन के सात्विक शेष तथा उसकी दुर्दम जिजीविषा की भावात्मक अभिव्यक्ति था, तो अतिशयोक्ति न होगी।"
 Dhan Dhan Jai Satguru Kabir Ji Maharaj

इन परिस्थितियों में कबीर के आविर्भाव को रेखांकित करते हुए शिव कुमार मिश्र लिखते हैंः 
"समझौते का रास्ता छोड़कर विद्रोह का रास्ता अपनाते हुए निर्गुण भक्ति की जो धारा भक्ति-आन्दोलन की स्रोतस्वनी से फूटी कबीर उसकी सबसे ऊँची लहर के साथ सामने आए। समझौता उनकी प्रकृति में नहीं था। विद्रोह और क्रांति की ज्वाला उनकी रग-रग में व्याप्त थी सिर पर कफन बाँधकर, अपना घर फूंककर वे अलख जगाने निकले थे। उन्हें समझौता परस्तों की नहीं, अपना घर फूंककर साथ चलने वालों की जरूरत थी वे लुकाठी लिए सरे बाजार गहुार लगा रहे थे।"
कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ। 
जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।।
भक्ति आन्दोलन के व्यापक पटल पर कबीर का मूल्यांकन और उनका योगदान रेखांकित करने के लिए हमें कबीर को अन्दर से देखना-परखना होगा, क्योंकि कबीर ऊपर से एक नजर में जो दिखते हैं उससे कहीं अधिक वो हैं। कबीर को केवल दार्शनिक, निर्गुण ब्रह्म के प्रतिपादक, समाज सुधारक, हिन्दू-मुस्लिम एकता और समन्वय के पुरोधा तथा एक संत के रूप में देखना कबीर के साथ अन्याय करना होगा।

कबीर का मूल्यांकन उन "मूल्यों" के आधार पर करना चाहिए जिन्हें विकसित और पल्लवित करने के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उस वैचारिक पृष्ठभूमि के आधार पर करना चाहिए जिसके आधार वे अकेले इतना जबर्दस्त विद्रोह कर सके। तमाम सामन्तीय जीवन प्रणाली और पुरोहिती दंभ क े विरुद्ध जन सामान्य की प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान की घोषणा कर सके। सदियों से अनुप्राणित उस कठोर जमीन को तोड़ने और एक नई उर्वर जमीन को बनाने के प्रयास के आधार पर करना चाहिए जिसे उन्होंने अपने रक्त के आँसुओ से सींचा। 
सोई आँसू साजणां, सोई लोक बिडाहिं।
जे लोइण लोई चुवैं, तो जाणो हेत हियाहिं।। 
कबीर का मूल्यांकन उनकी इस करुणा के आधार पर करना चाहिए जो समस्त मानवता के प्रति थी। चुपचाप खा-पीकर चैन से सोने वाले इस संसार की सदियों की इस नींद पर, इस जड़ता पर अन्याय को चुपचाप सहने की आदत पर और भविष्य के प्रति उदासीनता की सोच पर कबीर रात-रात भर जागते हैं और आँसू बहाते हैं। 
सुखिया सब संसार है, खावे औ सोवे।
दुखिया दास कबीर है, जागै औ रोवे।। 
यहाँ कबीर जाग रहे हैं और रो रहे हैं शेष सब खा रहे हैं और सो रहे हैं। कबीर का यह जागना और रोना बहुत महत्वपूर्ण है। वास्तव में कबीर देश के सांस्कृतिक नवजागरण के अग्रदूत थे। डॉ. रामविलास शर्मा ने भक्ति युग को प्रथम नव-जागरण की संज्ञा दी है। कबीर इस नवजागरण के पुरोधा थे। कबीर ने अपने समय में जिस युग सत्य का साक्षात्कार किया था उसे देखकर कबीर जैसा संवेदनशील निष्ठावान व्यक्ति रो ही सकता है। कबीर के विद्रोही होने का एक कारण यह रुदन भी है।

कबीर अहंकार से मुक्ति में मानव-जीवन की बृहत्तर सार्थकता देखते हैं। अहं से मुक्ति उनकी प्रखर विचारधारा से जुड़ा प्रश्न है, चूँकि मध्यकालीन समाज अहं परिचालित था। वर्ग-भेद आधारित जहाँ अमीर-गरीब का अन्तर है, धर्म और जाति का अन्तर है। सामन्तीय-पुरोहितवाद ने अपने को सुरक्षित करने के लिए मानव-मानव के बीच कई दीवारें खड़ी कीं। इसीलिए कबीर कहते हैं- अपने से बाहर निकलो, सीमाओं का अतिर्कमण कर व्यापक समाज में पहुंचा जहाँ उच्चतर मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा है: 
हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोऊ तजे, ताकर मता अगाध।। 
सहजता और सहिष्णुता जैसे मानवीय मूल्य अहं के साथ नहीं चल सकते। इन मूल्यों के अभाव में न ईश्वर मिल सकता और न सांसारिक सुख। कबीर के यहाँ "राम" ईश्वरत्व की अपेक्षा उच्चतर मूल्य-समुच्च के प्रतीक हैं। कबीर ‘राम’यानि मानवीय मूल्यों को पाने का जो रास्ता बताते हैं वह है प्रेम का। कबीर के यहाँ प्रेम भी एक जीवन मूल्य के रूप में प्रतिपादित है:
पोथी पढि़ जग मुआ, पण्डित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पण्डित होय।। 
इस प्रेम की अर्थ व्यंजना गहरी है और इसका आधार ईमानदार संवेदन है जो आचार-विचार की मत्रैी के लिए आवश्यक है। कबीर प्रेम को कई तरह से परिभाषित करते हैं: 
कबीर यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुईं धरे, सो घर पैठे आहिं।। 
प्रेम के घर में बैठने के लिए जो शर्त है वह प्रेम को उस जीवन मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करती है जिसके बिना जीवन चल नहीं सकता। सीस काटकर जमीन पर रखने की क्षमता हो तो प्रेम को पा सकते हो। 
प्रेम न खेतो नीपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा-परजा जिस रुचै, सिर दे सौ ले जाय।। 
प्रेम के मार्ग में सम्पूर्ण समर्पण की बात कबीर बार-बार करते हैं, यह बात ध्यान देने लायक है। सम्पूर्ण भक्ति काव्य में ही नहीं हिन्दी साहित्य में बहुत कम कविताओं में प्रेम के लिए सिर काट कर रखने की शर्त मिलेगी। भक्ति काव्य में अन्य कवियों ने प्रेम में प्रिय के प्रति समर्पण की बात तो चित्रित की है, परन्तु प्रेम के लिए दुर्दम शर्त सिर्फ कबीर ही रख सकते थे। इसका कारण था यहाँ यह प्रेम व्यक्तिगत भावना या किसी एक के प्रति तरल भावनात्मक अनुभूति मात्र नहीं है। यहाँ तो वह एक ऐसी विचारधारा है, एक ऐसा दृष्टिकोण है, एक ऐसा सूत्र है जिसके आधार पर ही मानव-मानव कहा जा सकता है। आपस में मनुष्य सत्य को लेकर जी सकता है। कबीर ने एक ऐसे देश की कल्पना की जहाँ मनुष्य मात्र समानता के सिद्धान्त पर जिये जहाँ कोई ऊँच-नीच, भेद-भाव कोई विषमता और विश्रृंखलतायें न होंः
अवधू, बेगम देश हमारा
राजा रंक फकीर-बादसा, सबसे कहौं पुकारा।
जो तुम चाहो परम पद को, बसिहों देस हमारा।। 
कबीर का यह आध्यात्मिक देश उच्चतम मानव मूल्यों का देश है। सामाजिक स्तर पर जहाँ व्यक्ति का सामाजिक चेतना में पर्यवसान होना ही मानवीय मूल्यों का प्रतीक है।

व्यक्ति के माध्यम से कबीर ने कुछ बड़ी सामाजिक-सांस्कृतिक चिंताएँ कीं और इस दृष्टि से वे अपनी अनगढ़ता में भी कुछ मूल्य स्थापनाएँ कर सके, जिसे हम उनका विशिष्ट योगदान कह सकते हैं। कबीर भक्ति काव्य की उस परम्परा के सबसे प्रखर स्वर हैं, जिसका आरंभ सिद्ध-नाथ साहित्य से हुआ। साधारण सामान्य वर्ग से आए इन कवियों ने अपने समय-समाज के प्रति तीव्र असंतोष व्यक्त किया और उन्होंने सामाजिक संस्कृति पर बल देते हुए, मध्यकाल के लिए एक नए मानववादी विकल्प का संकेत दिया।

कबीर का सीधा आग्रह सरल जीवन पर है। सारे आडम्बर ताम-झाम से मुक्त, सामंती-पुरोहितवादी अलंकरण का निषेध। उन्होंने उन छोटी जातियों को विशेष रूप से सम्बोधित किया जिनकी कोई सामाजिक, आर्थिक पहचान नहीं थी। उन्होंने वे सामान्य विषय चुने जो मध्यकाल में उनके समक्ष मौजूद थे। वे मूलभूत प्रश्न थे - जातिवाद, पुरोहितवाद, आडम्बर, हर प्रकार का भ्रष्टाचार और शोषण-उत्पीड़न और सबसे महत्वपूर्ण जन सामान्य की प्रतिष्ठा और आत्म-सम्मान। इस प्रकार कबीर का यथार्थ ऊपर-ऊपर नहीं तैरता वे प्रश्नों की गहराई में उतरते हैं और एक संवेदनशील विचारक के रूप में सामने आते हैं।

समय का यथार्थ महत्वपूर्ण रचना की अनिवार्यता है कबीर अपने युग सत्य से सबसे अधिक गहराई से जुड़े प्रतीत होते हैं। यह भोगा हुआ यथार्थ है जिसे वे अपनी विद्रोही वाणी में अभिव्यक्त करते हैं। उनका सर्वाधिक आक्रोश सामंतवाद में नए पनपे सम्प्रदायवाद, वर्ग-विभेद और दो मँहुेपन के प्रति व्यक्त हुआ है।

कबीर मानवीय संवेदना के प्रत्येक स्पंदन से परिचित थे। पण्डितों, मुल्लाओं और अछूतों के कर्मकाण्ड और पाखण्ड उनके लिए ‘आँखों देखी’ प्रमाण थे। पहले से चले आ रहे बाह्याचारों से सामाजिक जड़ता का विकास हो रहा था। इ सीलिए मनुष्य को मनुष्य समझने और उसे संवेद्य बनाने की सार्थक चेष्टा कबीर का सबसे बड़ा योगदान है।

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