बकुची - कुष्ठ रोग, दंत कृमि, श्वास, पीलिया एवं अर्श की रामबाण औषधि



 बकुची (Psoralea corylifolia)
बकुची (Psoralea corylifolia) के छोटे-छोटे पादप, वर्षा ऋतु में समस्त भारत वर्ष में अपने आप उगते हैं तथा जगह-जगह इसकी खेती भी की जाती है। साधारणतया बाकुची के पौधे एक वर्षायु होते हैं, परन्तु उचित देखभाल करने से 4-5 वर्ष तक जीवित रह जाते हैं। औषधि कर्म में इसके बीज और बीजों से प्राप्त तेल का व्यवहार किया जाता है। इस पर शीतकाल में पुष्प लगते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में पुष्प फलों में बदल जाते हैं।
Bakuchi for a perfect Skin
बाह्मस्वरूप
बाकुची के 1-4 फुट तक ऊंचे सीधे खडे़ कोमल पौधे होते हैं, परन्तु शाखाएं अपेक्षाकृत कड़ी और ग्रंथि बिन्दुकित होती हैं। पत्रा साधारण, सवृन्त, 1-3 लम्बी गोलाकार, प्रायः चिकनी दोनों पृष्ठों पर कृष्ण बिन्दुकित होती है। पुष्प नीली झाई लिये, हलके बैंगनी रंग के पत्राकोण से उद्भूत, मंजरियों पर 10-30 की संख्या में लगते हैं। फली छोटी-छोटी काले रंग की, लम्बी, गोल, चिकनी होती हैं तथा प्रत्येक फली में एक बीज, फली के ही आकार का कृष्ण वर्ण एवं बेल फल की भांति सुगन्धित होता है।
रासायनिक संघठन
बाकुची के बीजों में एक उड़नशील तेल, एक राल या रेबिन, एक स्थिर तेल तथा दो क्रिस्टलाइन सत्व सोरालेन पाये जाते हैं। फल के छिलके से सोरोलिडिन सत्व भी प्राप्त किया गया है। बाकुची के कुष्ठघ्न एवं कृमिघ्न कर्म इन्हीं दोनों तत्वों के कारण होते हैं।
गुणधर्म
बाकुची मधुर, कड़वी, पाक में तिक्त, कटु रसायन, बिष्टम्भनाशक, शीतल, रुचिकारी, दस्तावर,रूखी, हृदय को हितकारी और कफ रक्तपित्त, श्वास, कोढ़, प्रमेह, ज्वर तथा कृमि को नष्ट करने वाली है। 1 फल पित्तवर्धक, केश तथा त्वचा को हितकारी, चरपरा, कुष्ठ, कफ वात, वमन, श्वास, खांसी शोथ, आम और पांडु रोग विनाशक है।
दंतकृमि
बावची की जड़ को पीसकर जरा सी मात्रा में भुनी हुई फिटकरी मिला लें, सुबह शाम इससे मंजन करने से दांत के कीड़े नष्ट हो जायेंगे।
श्वास
आधा ग्राम बीजों का चूर्ण अदरक के रस के साथ दिन में 2-3 बार सेवन करने से खांसी में आराम मिलता है। कफ ढीला होकर निकल जाता है।
दस्त और पेचिश
बावची के पत्तों का साग सुबह शाम नियमित रूप से कुछ सप्ताह खिलाते रहने से बहुत लाभ होता है।
पीलिया
10 मिली लीटर पुनर्नवा के रस में आधा ग्राम पीसी हुई बावची के बीजों का चूर्ण मिलाकर सुबह शाम प्रतिदिन सेवन करने से लाभ होता है। ज्यादा बावची का सेवन वमन पैदा करता है।
अर्श
2 ग्राम हरड़, 2 ग्राम सोंठ और 1 ग्राम बावची के बीज लेकर पीस लें, आधे चम्मच की मात्रा में गुड़ के साथ सुबह शाम सेवन करने से लाभ मिलेगा।
बांझपन
मासिक धर्म से शुद्ध होने के पश्चात बावची के बीजों को तेल में पीसकर योनि में रखने से गर्भधारण करने की क्षमता समाप्त हो जाती है।
कुष्ठ रोग
  1. बावची के बीज चार भाग और तबकिया हरताल एक भाग, दोनों को चूर्ण कर गोमूत्रा में घोंटकर श्वेत दागों पर लगाने से सफेद दाग दूर हो जाते हैं।
  2. बावची और पवाड़ समभाग लेकर सिरके में पीसकर सफेद दागों पर लगाने से दाग में लाभ होता है।
  3. बावची, गंधक व गुड्मार को बराबर की मात्रा में लेकर तीनों का चूर्ण कर लें तथा 12 ग्राम चूर्ण को रात्रि में जल में भिगो दें तथा प्रातःकाल निथरा हुआ जल सेवन कर लें तथा नीचे के तल में जमा पदार्थ श्वेत दागों पर लगाते रहने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।
  4. बावची तेल दो भाग, तुवरक तेल दो भाग, चंदन तेल एक भाग मिलाकर रख लें, इस तेल के लगाने से सामान्य त्वक् रोग तथा श्वेत कुष्ठ आदि रोग नष्ट होते हैं।
  5. शुद्ध बावची चूर्ण एक ग्राम की मात्रा में आंवले अथवा खैर त्वक के 100 मिलीग्राम क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वित्र रोग नष्ट हो जाता है।
  6. बावची को तीन दिन तक दही में भिगोकर पिफर सुखाकर रख लें। इसका आतशी शीशी में तेल निकाल लें। इस तेल में नौसादर मिलाकर श्वेत दागों पर लेप करें।
  7. बावची, कलौंजी, धतूरे के बीज समभाग लेकर आक के पत्तों के रस में पीसकर श्वेत दागों पर लगाने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।
  8. बावची, इमली, सुहागा और अंजीर मूलत्वक् समभाग लेकर जल में पीसकर सफेद दागों पर लेप करने से श्वित्र रोग नष्ट हो जाता है।
  9. बावची, पवांड, गेरू समभाग लेकर कूट पीसकर अदरक के रस में खरल कर सफेद दागों पर लगाकर धूप सेंकने से श्वेत कुष्ठ नष्ट हो जाता है।
  10. बावची, गेरू और गन्धक समभाग लेकर, पीसकर अदरक के रस में खरल कर 10-10 ग्राम की टिकिया बनाकर एक टिकिया रात्रि को 30 मिली जल में डाल दें प्रातः ऊपर का स्वच्छ जल पी लें तथा नीचे की बची हुई औषधि को श्वेत दागों पर मालिश कर धूप सेंकने से श्वित्र (धवल) रोग नष्ट होता है।
  11. बावची, अजमोद, पवांड तथा कमल गट्टा समान भाग लेकर कूट पीस, मधु मिलाकर गोलियां बना लें। एक से दो गोली तक प्रातः सायं अंजीर मूल त्वक् क्वाथ के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ दूर होता है।
  12. शुद्ध बावची 1 ग्राम तथा काले तिल 3 ग्राम लेकर 2 चम्मच मधु मिला, प्रातः सायं सेवन करने से श्वित्र रोग नष्ट होता है।
  13. शुद्ध बावची, अंजीर की जड़ की छाल, नीम की छाल तथा पत्रा समभाग लेकर कूट पीसकर खैर छाल के क्वाथ में खरल करके रख लें। दो से पांच ग्राम तक की मात्रा जल के साथ सेवन करने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
  14. बावची पांच ग्राम, केसर एक भाग लेकर दोनों को कूट पीसकर गोमूत्रा में खरल कर गोली बना लें। यह गोली जल में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभप्रद है।
  15. बावची 100 ग्राम, गेरू 25 ग्राम, पवांड़ के बीज 50 ग्राम लेकर सबको कूट पीसकर वस्त्रा पूत चूर्ण कर भांगरे के रस की 3 भावनाएं देकर रख लें। प्रातः सायं गोमूत्रा में घिसकर लगाने से श्वित्र रोग में लाभ होगा।
  16. बावची चूर्ण को अदरक के रस में घिसकर लेप करने से श्वित्र रोग नष्ट होता है।
  17. बावची दो भाग, नीला थोथा तथा सुहागा एक एक भाग लेकर कपड़छान चूर्ण कर एक सप्ताह भांगरे के रस में घोंटकर रख लें। इसको नींबू स्वरस में मिला श्वित्र पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट होते हैं। यह प्रयोग तीक्ष्ण है, अतः इसके प्रयोग के फलस्वरूप फाले होने पर यह प्रयोग बन्द कर देवें।
  18. शुद्ध बावची चूर्ण की एक ग्राम मात्रा, बहेड़े की छाल तथा जंगली अंजीर मूल छाल के क्वाथ में मिलाकर निरन्तर सेवन करते रहने से श्वित्र तथा घोर पुंडरीक में लाभ होता है।
  19. बावची हल्दी, अर्कमूलत्वक् समान भाग लेकर महीन चूर्ण कर कपड़छान कर लें। इस चूर्ण को गोमूत्रा या सिरका में पीसकर श्वित्र के दागों पर लगाने से श्वेत दाग नष्ट हो जाते हैं। यदि लेप उतारने पर जलन हो तो तुबरकादि तेल लगायें।
  20. बावची एक किलो ग्राम को जल में भिगोकर, छिलके रहित करके पीसकर 8 किलो गौदुग्ध तथा 16 लीटर जल में पाक करें। जल के जल जाने पर दूध मात्रा लेकर उसमें जामन लगाकर जमा दें। मक्खन निकालकर उसका घी बना लें। एक चम्मच घी की मात्रा मधु मिलाकर चाटने से श्वेत कुष्ठ में लाभ होता है।
  21. बावची तेल की 10 बूंदे बताशे में डालकर प्रतिदिन कुछ दिनों तक सेवन करने से श्वित्र रोग में लाभ होता है।
  22. बावची को गोमूत्र में भिगोकर रखें तथा तीन-तीन दिन बाद गोमूत्रा बदलते रहें, इस तरह कम से कम 7 बार करने के बाद उसको छाया मे सुखाकर पीसकर रखें। उसमें से 1-1 ग्राम सुबह शाम ताजे पानी से खाने से एक घंटा पहले सेवन करें, इससे श्वित्र (सफेद दाग) में निश्चित रूप से लाभ होता है, अनुभूत है।
  23. 1 ग्राम बावची और 3 ग्राम काले तिल को मिलाकर एक वर्ष तक दिन में दो बार सेवन करने से कुष्ठ रोग नष्ट होता है।
 गांठ
बावची के बीजों को पीसकर गांठ पर बांधते रहने से गांठ बैठ जायेगी।

महत्वपूर्ण लेख 


Share:

No comments: