देवताओं का शहर प्रयागराज इलाहाबाद City of God Prayagraj Allahabad



इलाहाबद उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा शहर है। यह तीन नदियों गंगा, यमुना, तथा अदृश्य सरस्वती का संगम हैं। इन तीनों के मिलान का स्थान त्रिवेणी कहलाता है। विशेष रूप से हिन्दूओं के लिये यह एक पवित्र स्थान है। आर्यो का पहले निवास इस शहर में होने के कारण इसको प्रयाग के नाम से जाना गया इसकी पवित्रता का प्रमाण पुराण, रामायण तथा महाभारत में संदर्भित है। हिन्दु पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान ब्रहमा परमेशवर के निर्माता है। जिन्होने सृष्टि के प्रारम्भ मे प्रकृषठ यज्ञ पूरा करने हेतु पृथ्वी पर भूमि प्रयाग चूनी और इसे तीथ्र राज अथवा सभी तीर्थ स्थानों का राजा कहा गया । पदम् पुराण के अनुसार सूर्य के बीच चन्द्र तथा चन्द्र के बीच में तारे है इस प्रकार सभी तीर्थ स्थलों में प्रयाग सबसे अच्छा है।

इलाहाबाद एक महत्वपूर्ण शहर है जहाँ इतिहास संस्कृति और धर्म एक जादुई प्रभाव उत्पन्न करते है उसी शहर जहाँ इतिहास संस्कृति और धर्म एक जादुई प्रभाव उत्पन्न करते है उसी तरह पवित्र नदियों के स्पर्श से यह पृथ्वी धन्य है। इसी धर्मिक महत्व के कारण बहुत से तीर्थ यात्री स्नान पर्व पर इलाहाबाद आते है। मार्च माह जनवरी से फरवरी के मध्य मे हिन्दु स्वय को शुद्ध करते है। इस माह के दौरान एक विशाल भीड़ होती है और बालू की भूसी पर लगने वाला यह मेला माघ मेले के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक 12 वर्ष में जब विशेष रूप से पानी पवित्र हो जाता है तब इलाहाबाद में एक वृहत मेला लगता है जिसे कुभ मेला कहते है। भारत वर्ष के प्रत्येक कोने से लाखों तीर्थ यात्री इस मेले मे आते है। ऐसा विश्वास है कि इस कुंभ मेले में स्नान करने से सभी पाप और बुराईयाँ नष्ट हो जाती है। और स्नान से मोक्ष प्राप्त होता है। जनवरी और फ़रवरी में इलाहाबाद माघ मेले का आयोजन होता है। 1885 में मार्क दवेन ने इलाहाबाद कुंभ के संबंध में लिखा है 1 माह तक जोश में लेाग यहाँ थके हुए, अकिंचन तथा भूखे रहते है फिर उनका विश्वास अटल बना हुआ है। इस माह के दौरान आयोजित इस धार्मिक प्रवचन सांस्कृतिक गतिविधियों एवं अन्य क्रिया कलाप बड़ी संख्या में लोगों को बाधे रखते है। इस वृहत मेले में दर्शको का विश्वास प्रतिबिंबित होता है। यह जगत कुटुम्बकम् अथवा सार्वमोम गाँव का प्रतीक है इसमें विभिन्न सांस्कृतियां विभिन्न धर्म विभिन्न विचार धाराओं के लोग आपस में विचार विमर्श कर सूचनाओं का व ज्ञान का आदान - प्रदान करते है।
भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान और सम्पूर्ण शताब्दी में इलाहाबाद का राष्ट्रीय महत्व सर्वविदित रहा है। इलाहाबाद के इतिहास ने उपने धार्मिक सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के फलस्वरूप अनेक प्रतिष्ठित विद्वान, कविलेखक विचारक, राजनेता दिये है। 

इलाहाबाद के रोचक स्थान 
  • संगम
    हिन्दु पुराण के अनुसार पवित्र संगम तीन पावन नदियो गंगा, यमुना, एवं अदृश्य सरस्वती का सम्मिलन है। ऐसी धारणा है कि संगम मे अमृत की कुछ बूँदें मिलायी गयी। जिससेे इसका जन जादुई प्रभाव वाला हो गया। सिविल लाइन से करीब 7 किलोमीटर दूर इलाहाबाद के पूर्व मिट्टी से घिरे किनारों वाले पवित्र संगम के पास किला स्थित है। पंडा (पूजारी) एक छोटे चबूतर पर बैठ कर पूजा - अर्चना कराते है और श्रद्धलुओं को विधि अनुसार पवित्र जन में स्नान करते है। तीर्थ यात्री अपने मृतक माता - पिता को पिंड दान करते है साथ ही अपने पूर्वजों को भेट दान देते हैं। संगम पर लगी नावें तीर्थ यात्री एवं पर्यटक द्वारा प्रयोग में लाई जाती है। जो किले के पूर्व में 12/- रूपया प्रति व्यक्ति की दर से तत्काल उपलब्ध हो सकती हैं वार्षिक माघ मेला/अर्द्ध कुम्भं कुम्भ मेला का स्थान पवित्र संगम है।
  • इलाहाबाद किला
    बादशाह अकबर द्वारा ईसवी सन् 1583 में बनाया गया यह किला संगम के करीब यमुना नदी के किनारे स्थित है। सिविल लाइन से यह करीब 8 किलोमीटर दूर हैं। कला, निर्माण तथा शिल्पकारी में यह किला अद्वितीय है। वर्तमान समय में किले का उपयोग सेना द्वारा किया जाता है तथा एक सीमित क्षेत्र ही आगन्तुक के लिए खुला है। आगन्तुकों का अशोक स्तम्भ एवं सरस्वती कूप देखने की ही अनुमति है ऐसा कहा जाता है कि यह कूप सरस्वती नदी तथा जोधाबाई महल का प्रमाण है यहां पातालपूरी मन्दिर भी यहां का अक्षय-वट अथवा बरगद के वृक्ष का नाम भी श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
  • हनुमान मन्दिर
    संगम के समीप स्थित इस मन्दिर का उत्तरी भारत में एक विशेष महत्व हैं जहां भगवान हनुमान एक आदर्श है। यह करीब 20 फिट लम्बे एवं 8 फीट चैड़े है इन्हें लेटी हुई मुद्रा में देखा जा सकता है। जब गंगा में बाढ़ आती है तो यह मन्दिर जलमग्न हो जाता है।
  • शंकर विमान मण्डपम्
    यह मण्डपम् हनुमान मन्दिर के नज़दीक 130 फीट उंचा 4 मंजिला है। इसमें कुमारिल भटट् जगतगुरू शंकराचार्य, कामाक्षी देवी करीब 5 शक्तिणी सहित योगशस्त्र शास्त्रयोग लिंग कबीब 108 शिव की प्रतिमाएँ है। इलाहाबाद का यह सबसे महत्व पूर्ण शिव मनकामेश्वर मन्दिर यमुना नदी के किनारे सरस्वती घाट पर स्थित है यह जगत गुरू शंकराचार्य के अधिकार क्षेत्र में हैं।
  • मिन्टो पार्क
    सरस्वती घाट के नज़दीक स्थित इस पार्क के ऊपरी भाग में चार शेरों का प्रतीक एक यादगार पत्थर लगा हुआ हैं। जिसे 1910 मे लार्ड मिन्टों द्वारा लगाया गया था।
  • आनन्द भवन
    यह नेहरू परिवार का पैतृक भवन है। स्वतत्रता संर्घष के लिए घटित विभिन्न युगों की घटनाओं का यह भवन प्रत्यक्षदर्शी रहा है। आज यह महत्वपूर्ण संग्रहालय में परिणित है जो नेहरू परिवार से संबंधित यादें ताजा करती है। आगमन समय 9.30 प्रातः काला से 5.00 बजे शाम टिकट - 5रू0 प्रति व्यक्ति दूरभाष 600476 सोमवार एवं अन्य सरकारी अवकाश में बंद रहेगा।
  • स्वराज भवन
    पुराना आनंन्द भवन को सन् 1930 में मोतीलाल नेहरू ने राष्ट्र को समर्पित कर दिया था जिसे काग्रेंस कमेटी के मुख्यालय के रूप उपयोग किया जाता था स्वर्गीय प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी का जन्म यही हुआ था। अब यह भवन बच्चों का चित्रकारी एवं दस्तकारी सिखने के लिए उपयोग में लाया जाता हैं यहां प्रकाश एवं घ्वनि से संबंधित कार्यक्रम भी देखे जा सकते हैं। प्रकाश एवं ध्वनि से संबंधित 4 कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते है। प्रातः काल 10.00 1.30 सायंकाल तथा 2.30 सांय काल एवं 4 बजे सायंकाल, टिकट 5 रू0 प्रति व्यक्ति सोमवार एवं सरकारी अवकाश में बंद रहेगा।
  • जवाहर प्लेटोरियम
    यह आनन्द भवन के बगल में स्थित है। यहां वैज्ञानिक दृष्टि कोण से खगोलीय दर्शन हेतु लोग आते है। यह हमेशा चलता रहता हैं यहां पांच शो होते है - 11.00 प्रातःकाल 12.00 दोपहर , 2.00 सायंकाल एवं 4 बजे सायंकाल। टिकट दर 10 रू0 प्रति व्यक्ति, यहाँ का फोन नंबर 2600493 हैं और सोमवार एवं सरकारी अवकाशों में बंद रहेगा।
  • इलाहाबाद विश्वविद्यालय
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय 1887 में स्थापित भारत के प्रसिद्ध विश्व विद्यालयों में एक यह आनन्द भवन के करीब स्थित है। विस्तृत भू भाग में फैले इस के कैम्पस में विकटोरियन तथा इस्लामिक वास्तुकला कौशल से प्रतीक भवन हैं म्योर कालेज इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज्ञान संकाय है। म्योर कालेज का विजयनगरम हाल उत्कृष्ट गाॅथिक वास्तुशिल्प का नमूना है।
  • इलाहाबाद संग्रहालय
    चन्द्रशेखर आजाद पार्क के पास स्थित गुप्त काल की मूर्तिकला का यह सग्रहालय विशेष रूप से दर्शनीय है।
  • चन्द्रशेखर आजाद पार्क
    अलफ्रेड पार्क संग्रहालय के पीछे स्थित यह इालाहाबद का सबसे बड़ा पार्क है। पहले इसे अलफ्रेड पार्क कहा जाता था। जार्ज-5 तथा विकटोरिया की विशाल मूर्ति इसके केन्द्र में लगी थी। जहां कभी कभी पुलिस बैंड का प्रयोग होता था स्ववंत्रता के पश्चात इस पार्क को चन्द्रशेखर आजाद पार्क के नाम से जाना गया और ब्रिटिश अवधि में पुलिस मुठभेंड में मारे गये स्थान पर आजाद की अर्द्ध प्रतिमा लगाई गई इस पार्क के केन्द्र में मदन मोहन मालवीय के नाम पर एक स्टेडियम बनाया गया है जहां सभी महत्पूर्ण मैंच एवं खेल कूद कराये जाते है इस पार्क में सार्वजनिक वाचनालय भी है जहां करीब 75,000 हजार किताबें हैं। इसी के समीप पाण्डुलिपियेां का खज़ाना एवं जनरल मौजूद है।
  • खुसरोबाग
    यह मुगल गार्डेन में एक है जिसे जहांगीर द्वारा अपने बेटे राजकुमार खुसरो की याद मे बनवाया गया था। इसके मध्य में राजकुमार का मकबरा बनवाया गया था। यह इलाहाबाद जक्शन के पास जी.टी.रोड पर स्थित है। अमरूद तथा आम इस बगीचे के प्रसिद्ध फल है।
  • भरद्ववाज आश्रम
    आनन्द भवन के सामने स्थित है। एकसी धारणा है कि भगवान राम अपनी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण के साथ बनवास के समय इसी आश्रम मे रूके थे। उन दिन मुनि भरद्वाज गंगा से भरद्वाज आश्रम आते थे। अब यहां अनेक मन्दिर विद्यामान हैं सभी सन्त कैथीड्रल (पत्थर गिरजाघर) उन सभी आयु ओर स्थान के व्यक्तियों की याद में समर्पित है जिनका सर्वशक्तिमान पर विश्वास है। इस खूबसूरत कैथीड्रल की रचना सर विलियम इमरसन ने 1870 में की तथा 1887 में इसे समर्पित किया। यह एशिया का एक खूबसूरत कैथीड्रल है इसमें सफ़ेद तथा लाल पत्थर लगे हैं इसको देखने के लिये आया हुआ कोई भी व्यक्ति जटिलता से लगाये गये मारबल तथा मोजेक कार्य की सुन्दरता से प्रभावित हुए बिना नही रह सकता। इसमें विशिष्ट शीशे तथा चित्रकारी भी प्रदर्शित है। यह सिविल लाइन में स्थित है।


Share:

गैर ब्राह्मण भी मंदिर में पुजारी नियुक्त हो सकते है



Non-Brahmins can also be temple priests

Non-Brahmins can also be temple priests

एक गैर ब्राहमण भी मन्दिर का पुजारी नियुक्त किया जा सकता है अपने महत्वपूर्ण निर्णय एन.आदित्यन बनाम ट्रावनकोर देवस्वम बोर्ड वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिर्निधारित किया की केवल ब्राह्मणो को भी मन्दिर का पुजारी नियुक्त किये जाने का एकाधिकार नही है और एक गैर ब्राह्मण भी मन्दिर का पुजारी नियुक्त किया जा सकता है। यदि वह पूर्ण रुपेण प्रशिक्षित है और कर्मकाडो का पूर्ण रुप से जानकार है इस वाद में अपीलार्थी एक मलयाली ब्राहमण था और शिव मन्दिर का पुजारी था मन्दिर का प्रशासन देवस्म बोर्ड पर निहित था ट्रावनकोंर कोचीन हिन्दू रिलीजस इन्स्टीटयूशन अधिनियम 1950 के अन्तर्गत एक विधिक निकाय है एक व्यक्ति अस्थायी रुप से मन्दिर का पुजारी था उस के विरुद्ध कुछ शिकायते थी।

अतः उसे स्थाई नियुक्ति नही दी गई उसके स्थान पर प्रत्यर्थी की नियुक्ति कर दी गई और देवस्वम आयुक्त ने भी उसका अनुमोदन कर दिया था उसकी नियुक्ति पर इसलिए आपत्ति की गई वह गैर ब्राह्मण था। अपीलार्थी ने इस नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी कि वह मलयाली नही था अतः उस की नियुक्ति अनुच्छेद 25 एंव 26 का अतिक्रमण करती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस अभिकथन को अस्वीकार करते हुए यह अभिनिर्धारित किया कि एक गैर ब्राह्मण भी मन्दिर का पुजारी नियुक्त किया जा सकता है यदि वह पूजा कराने के लिए पूर्ण रुपेण प्रशिक्षित है अपीलार्थी यह दिखाने में असर्मथ रहे है की मन्दिर स्थापित करने वालो ने ऐसी कोई प्रथा या रुढी स्थापित की थी कि वे केवल जन्म से ब्राह्मण पैदा होने वाले ही मन्दिर के पुजारी हो सकते थे।
N. Adithyan v. Travancore Devaswom Board & Ors. (2002 8 SCC 106)


Share:

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 108 Section 108 in The Code Of Criminal Procedure, 1973



दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 108 राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति से सम्बंधित है।
Section 108 in The Code Of Criminal Procedure, 1973
  1. धारा 108:- राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति
  2. क्या उनके स्थानीय अधिकार क्षेत्र की सीमा के अन्दर है
  3. क्या दंडाधिकारी उपस्थिति के लिए जमानत या जमानत बांड मांगने की शक्ति रखते हैं
  4. क्या आदेश के समय व्यक्ति को सदेह दंडाधिकारी के अिधकार क्षेत्र में रहना है
  5. धारा 111 के अधीन नोटिस जारी किया जाना है
  6. धारा 124 आईपीसी के क्लॉज (1) का सबक्लॉज (ब.)
  7. धारा 153 आईपीसी, वर्गो के बीच शत्रुता का संप्रवर्तन
  8. धारा 295 आईपीसी
  9. क्या साबित करना आवश्यक हैं,
  10. क्लॉज (1), सब क्लॉज
  1. धारा 108 राजद्रोहात्मक बातों को फैलाने वाले व्यक्तियों से सदाचार के लिए प्रतिभूति
    जब कोई दंडाधिकारी यह सूचना पाते हैं कि उनके स्थानीय अधिकार क्षेत्र के अंदर कोई व्यक्ति है जो इस अधिकार क्षेत्र के अंदर अथवा बाहर:- I. या तो मौखिक रूप से लिखित रूप से या किसी अन्य रूप से निम्नलिखित बातें साक्ष्य फैलाता है या फैलाने का प्रयत्न करता है या फैलाने का दुष्प्रेरण करता है, अर्थात:-(क) कोई ऐसी बात जिसका प्रकाशन भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए या धारा 153ए या धारा 153बी या धारा 295ए (1860 का 45) के अधीन दंडनीय है या(ख) किसी न्यायाधीश से, जो अपने पदीय कर्तव्यों के निर्वहन में कार्य कर रहा है या कार्य करने का तात्पर्य रखता है, संबंध कोई बात जो भारतीय दंड संहिता 1860 के अधीन आपराधिक अभित्रास या मानहानि की कोटि में आती है अथवा
    II. भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 292 में यथानिदेशित कोई अश्लील वस्तु प्रकाशित करता, या आयात करता है, निर्यात करता है, संवाहित करता है, बेचता है, किराये पर देता है, बांटता है, आम जनता के लिए प्रदर्शित करता है अथवा किसी भी तरीके से परिचलित करता है, और दंडाधिकारी इस विचार के हैं, कि पर्याप्त आधार है कार्रवाई के लिए तो दंडाधिकारी उन तरीकों द्वारा जो यहां या इसके बाद प्रावधानित है ऐसे व्यक्ति से चाहेंगे कि वह कारण बतावें कि क्यों न उससे उसके ऐसे व्यवहार के लिए बौंड बनाने के लिए प्रतिभू के साथ आदेशित किया जाय। उतने समय के लिए जो एक साल से अधिक नहीं है या जिसे दंडाधिकारी उचित समझते हैं।प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1867 में दिए गए नियमों के अधीन रजिस्ट्रीकृत और उनके अनुरूप सम्पादित, मुद्रित और प्रकाशित किसी प्रकाशन में अन्तर्विष्ठ किसी बात के बारे में कोई कार्यवाही; ऐसे प्रकाशन के सम्पादक, स्वत्वधारी, मुद्रक या प्रकाशन के विरूद्ध राज्य सरकार के या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किए गए किसी अधिकारी के आदेश से उसके प्राधिकार के अधीन ही की जाएगी, अन्यथा नहीं।
  2. क्या उनके स्थानीय अधिकार क्षेत्र की सीमा के अंदर है (Is within the local limits of his jurisdiction) धारा 108 का क्षेत्र
    जहां अभियुक्त मूलरूप से दंडाधिकारी द्वारा समन के अनुपालन में आया हो, अधिकार क्षेत्र के अधीन उसकी उपस्थिति के लिए यद्यपि मूल समन जो उनके द्वारा जारी किया गया था तथा जिसके अनुपालन में वह अभियुक्त आया था वैध नहीं भी हो सकता है।
    {नरसिंह प्र॰ अग्रवाल बनाम इम्परर ए॰आई॰आर॰ 1937 नाग॰ 70}
    इस दृष्टिकोण की सत्यता संदेह के लिए फिर भी खुला है। दंडाधिकारी इस धारा के अधीन अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग तभी कर सकते हैं जब वह व्यक्ति जिसके विरूद्ध कार्रवाई की जा रही है वह उनके अधिकार क्षेत्र की सीमा के अन्दर रहता है। उसकी बाद की न्यायालय में उपस्थिति जो समन के अनुपालन में है, उनके ‘‘स्थानीय अधिकारिता के समतुल्य न तो है और न होगा’’ दूसरी तरह यदि वह चाहता है कि वह दंडाधिकारी के अग्रसर होने के अधिकारिता के आधार पर विरोध करना चाहता है तो वह ऐसा कदापि नहीं कर सकता है।
  3. क्या दंडाधिकारी उपस्थिति के लिए जमानत या जमानत बौंड मांगने की शक्ति रखते है (Whether Magistrate has power to require bail or bail bonds for appearance in court)
    इस अध्याय के अधीन प्रावधानित प्रक्रिया पूर्णरूप से व्यापक (Comprehensive) है तथा दंडाधिकारी आरोपित व्यक्तियों को बुलाने की कोई शक्ति नहीं रखते हैं कि न्यायालय में वह अपनी उपस्थिति के लिए जमानत प्रदान करें।
    {एस कृपाल सिंह बनाम हि॰प्र॰ राज्य -1976 क्रि॰एल॰टी॰ 80}
    जमानत या जमानत बौंड की सुरक्षा कार्रवाई (Security Proceeding) में अवधारणा पूर्णरूप से गैर अनुमान्य है (In applicable)।
    एम.वाई. सिंह ब॰ मणिपुर प्रशासन-ए.आई.आर. 1964 मणिपुर 62
    वह केस जो दूसरे तरह से धारित किया जाता है वह सही-सही कानून स्थापित नहीं करता है।
    बालरूप शर्मा ब0 उ0प्र0 सरकार ए.आई.आर. 1956 इला॰ 270 से 271
    इस तरह की कार्रवाई में धारा 116(3) के अधीन अंतरिम बौंड लेने के लिए आदेश दिया जाता है बेल बौंड आदेशित नहीं किया जा सकता है।
  4. क्या आदेश के समय व्यक्ति को सदेह दंडाधिकारी के अधिकार क्षेत्र में रहना है? (Should the person be physically within the jurisdiction of the Magistrate at the time of the order)
    जहां उस व्यक्ति को जिसके विरूद्ध कार्रवाई की जा रही है साधारण तया वह किसी खास दंडाधिकारी के अधिकार क्षेत्र की सीमा में रहता था तो केवल यह तथ्य कि ‘‘वह दंडाधिकारी के अधिकार क्षेत्र की सीमा में नहीं रहता था जिस दिन आदेश पारित हुआ’’ आदेश को अवैध नहीं बनाता है धारा 462 ठीक ऐसे ही केसों का सामना करता है। सवोर्परि (More over) जैसा कि दंडाधिकारी ने सूचना पर कार्य किया जिसे उन्होंने सच्चा समझा कि व्यक्ति उनके स्थानीय अधिकार क्षेत्र की सीमा में था तो धारा की शर्तों का अनुपालन हुआ।
    एन.पी.अग्रवाल बनाम इम्मर -ए.आई.आर. 1937 नाग0 70
  5. धारा 111 के अधीन नोटिस जारी किया जाना है (Notice under Section 111 is to be issued)
    यदि इस धारा के अधीन कार्रवाई किया जाना विचारित है तो प्रथमतः धारा 111 के अधीन एक नोटिस निश्चित रूप से दिया जाना है। उक्त नोटिस में प्राप्त सूचना का सारांश रहना चाहिए। पूर्व शर्तों के अनुपालन के बिना धारा 116(1) के अधीन कार्रवाई या धारा 116(3) के अधीन रोका जाना आदेशित नहीं किया जा सकता है।
    -लाल बिहारी ब. राज्य 1976(2) दिल्ली एल.टी. 302
  6. धारा 124A आईपीसी के क्लॉज (1) का सब क्लॉज (a) (Sub clause (a) of clause (1)of Section 124A, I.P.C.) धारा 124A
    आईपीसी के प्रावधान बहुत ही विस्तृत है और कठोर नियमों में वे उन सभी बातों को अपने में समेट लेंगे (Cover) जो सरकार की अवमानना के तुल्य है। यदि कोई एक किसी टर्म का अपवर्जन (Excludes) करता है। प्रशासन के किसी विशिष्ट उपाय या कार्य की आलोचना करता है। धारा के शर्त इतने विस्तृत है कि कोई भी न्याय संगत भाषण इसके अन्तर्गत आ जायेगा। कोई आचरण उक्त धारा के शर्त के अधीन है या नहीं न्यायालय को निश्चित रूप से एक स्वच्छ विचार प्रकट करना चाहिए कि पार्टियों के बीच अपने राजनैतिक विचारों की समीचीनता से अलग हटकर। -परमानंद ब0 इम्परर ए.आई.आर. 1941 इला0 156, 157। परीक्षण यह है कि क्या कोई व्यक्ति विप्लवकारी बातों को विस्तार देता रहा है या नहीं और क्या उक्त अपराध के दुहराये जाने का भय है ? प्रत्येक केस में यह तथ्य का प्रश्न है जिसका निर्धारण व्यक्ति के पूर्ववृत (Antecedents) एवं आस पास के अन्य परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
    -इम्परर ब0 बामन 11 बम्बई एल.आर. 743; 10 क्रि.लॉ.ज. 379
  7. धारा 153A आईपीसी वर्गो के बीच शत्रुता का सम्प्रवर्तन (Section 153A I.P.C.Promoting enemity between classes)
    किसी आदेश को इस धारा के अधीन जीवित रखने के लिए यह पर्याप्त नहीं है कि व्यवहार की गयी; भाषा किसी एक समुदाय पर अत्यधिक आक्रामक है। यह निश्चित रूप से प्रदर्शित होना चाहिए कि वह व्यक्ति दो समुदायों के बीच घृणा या शत्रुता को प्रेरित और प्रोत्साहित कर रहा था, फिर भी आवश्यक नहीं है कि वह ऐसी भावना भड़काने में सफल हो चुका हो यदि कोई ऐसा करने की मंशा जानबूझ कर करने की मंशा जाहिर होती हो। {यू.धमनालोक ब0 इम्परर 4 Bur. एल.टी. 24, 12 क्रि.लॉ.ज. 248}धारा 153B आईपीसी (Sectiom 153B I.P.C.) : कोई भी बात भारतीय दंड संहिता के अधीन दंडनीय होगी यदि यह ऐसी बातों का दोषारोपण या निश्चित अधिघोषणा करता है जो राष्ट्रीय अखंडता के लिए प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है।
  8. धारा 295A आईपीसी (Section 295A I.P.C.)
    धारा 295A किसी बात को दंडनीय बना देता है।
  9. क्या साबित करना आवश्यक है (What is required to be proved)
    इस धारा के अधीन कार्रवाई करने के लिए यह साबित किया जाना चाहिए कि यदि नहीं रोका गया तो अभियुक्त उसी तरह का कार्य करता रहेगा जैसा करता रहा है। यह स्पष्ट रूप से माना जा सकता है कि वह भविष्य में भी वैसा ही कार्य करता रहेगा तो ऐसी स्थिति में उसकी आदतन प्रवृति निश्चित रूप से प्रमाणित की जानी चाहिए।
    {जे.एन.नथूरा ब॰इम्परर -ए.आई.आर. 1932 लाहौर 7}
    शब्द समूह ‘‘विस्तार देता है या विस्तार देने का प्रयास करता है’’ अनेक किये कार्यो को इंगित नहीं करता है वरन जहां साक्ष्य यह प्रमाणित करता है कि कुछ ऐसा है जो यह दर्शाता है कि अपराध की पुनरावृत्ति संभव था। यह प्रत्येक केस के तथ्य पर निर्भर करता है। ए.आई.आर. 1932 पटना 213 धारा के प्रावधान किसी खास अवसर पर दिए गए एकल भाषण (Isolated Speech) पर लागू नहीं होगा। इसबात का निश्चित तौर पर साक्ष्य होना चाहिए कि व्यक्ति ने कोई दूसरा आपतिजनक भाषण भूतकाल में दिया था अथवा यह मंशा रखता हो कि भविष्य में ऐसा भाषण फिर देना चाहता हो।
    -चंद्रमान गुप्ता बनाम इम्परर - ए.आई.आर. 1934 अवध 70
  10. क्लॉज (1) सब क्लॉज (बी) Clause (1) sub-Clause (b)
    धारा के अधीन कार्रवाई किसी भी उस व्यक्ति के विरूद्ध किया जा सकता है जो या तो मौखिक रूप से या लिखित रूप से या किसी अन्य तरीकों से जान बूझकर किसी न्यायाधीश के संबंध में जो न्यायाधीश की अपने कार्यालीय पदीय कर्तव्यों का निर्वह न कर रहा हो, व्यवधान पहुंचाता है।


Share:

भारत के संविधान का अनुच्छेद 243 और उसके महत्व Article 243 of the Constitution of India and its Importance



वर्ष 1992 से पहले पंचायती राज संस्थाओं को संविधानिक दर्जा नहीं दिया गया था। संविधान के निर्माताओं ने जब 26 नवम्बर 1949 में संविधान बनाकर तैयार किया तथा 26 जनवरी 1950 में गणतन्त्र दिवस के रूप में संविधान को लागू किया तो उसमें एक बहुत बड़ी त्रुटि रह गई। संविधान निर्माता तथा विशेषज्ञों द्वारा यह भूल हो गई कि संविधान में उन्होनें "पंचायतों" तथा "नगरपालिकाओं" के बारे में कुछ नहीं कहा तथा इन दो महत्वपूर्ण संस्थाओं को कोई विशेष अनुच्छेद में नहीं बताया गया। नतीजा यह रहा कि "पंचायतों" तथा "नगरपालिकाओं" को संविधानिक दर्जा नहीं मिल पाया।
Article 243 of the Constitution of India and its Importance
 
संविधान के अनुच्छेद 40 में केवल एक पंक्ति में कहा गया है कि "राज्य अगर चाहें तो पंचायतों का गठन कर सकते हैं"। यह सिद्धान्त अनुच्छेद 40 जो "राज्यों के नीति निदेशक सिद्धान्त" के तहत माना गया था। परन्तु 1991-92 में संविधान में पंचायतों के बारे अनुच्छेद होने की बात रखी गई। मध्य नज़र 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन विधेयक लोक सभा में पारित किये गए। इन विधेयकों को लोक सभा में पूर्ण रूप से बहुमत से पारित किया गया तथा बिल अधिनियम के रूप में निकल कर उभरे और 73वें संशोधन अधिनियम के तहत पंचायतों को अनुच्छेद 243 के रूप में संवैधानिक दर्जा मिला तथा 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा मिला।
 
जब संविधानिक दर्जा पंचायतों को मिला तब सभी राज्यों को आदेशानुसार जरूरी हो गया कि वे अपने राज्य में नया पंचायती राज अधिनियम, संविधान के 73वें और 74वें अधिनियम के मध्य नजर रखकर बनायें। अनुच्छेद 243 बहुत महत्वपूर्ण है। इसमें पंचायतों के बारे में कहा गया है कि पंचायतें क्या हैं, कैसी होंगी, इनके कार्य क्या होंगे, चुनाव प्रक्रिया क्या होगी इत्यादि।
 
अनुच्छेद 243 को संक्षिप्त में यहां बताया जा रहा है:-
अनुच्छेद 243 - परिभाषाएँ
अनुच्छेद 243 क - ग्रामसभा
अनुच्छेद 243 ख - ग्राम पंचायतों का गठन
अनुच्छेद 243 ग - पंचायतों की संरचना
अनुच्छेद 243 घ - स्थानों का आरक्षण
अनुच्छेद 243 ङ - पंचायतों की अवधि
अनुच्छेद 243 च - सदस्यता के लिए अयोग्यताएँ
अनुच्छेद 243 छ - पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
अनुच्छेद 243 ज - पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ
अनुच्छेद 243 झ - वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
अनुच्छेद 243 ञ - पंचायतों की लेखाओं की संपरीक्षा
अनुच्छेद 243 ट - पंचायतों के लिए निर्वाचन
अनुच्छेद 243 ठ - संघ राज्यों क्षेत्रों को लागू होना
अनुच्छेद 243 ड - इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
अनुच्छेद 243 ढ - विद्यमान विधियों और पंचायतों का बना रहना
अनुच्छेद 243 ण - निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन
अनुच्छेद 243 त - परिभाषा
अनुच्छेद 243 थ - नगर पालिकाओं का गठन
अनुच्छेद 243 द - नगर पालिकाओं की संरचना
अनुच्छेद 243 ध - वार्ड समितियों आदि का गठन और संरचना
अनुच्छेद 243 न - स्थानों का आरक्षण
अनुच्छेद 243 प - नगर पालिकाओं की अवधि आदि
अनुच्छेद 243 फ - सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
अनुच्छेद 243 ब - नगरपालिकाओं आदि की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तदायित्व
अनुच्छेद 243 भ - नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियाँ
अनुच्छेद 243 म - वित्त आयोग
अनुच्छेद 243 य - नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा
अनुच्छेद 243 य क - नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन
अनुच्छेद 243 य ख - संघ राज्य क्षेत्रों को लागू होना
अनुच्छेद 243 य ग - इस भाग का कतिपय क्षेत्रों को लागू न होना
अनुच्छेद 243 य घ - ज़िला योजना के लिए समिति
अनुच्छेद 243 य ङ - महानगर योजना के लिए समिति
अनुच्छेद 243 य च - विद्यमान विधियों पर नगर पालिकाओं का बना रहना
अनुच्छेद 243 य छ - निर्वाचन सम्बन्धी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्णन


Share:

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पुराने और दुर्लभ मूल फोटो Old and Rare Photos Of Netaji Subhash Chandra Bose



Subhas Chandra Bose in 1940
Subhas Chandra Bose in 1940
 Subhas Chandra Bose (L) greeting admirers in 1940
Subhas Chandra Bose (L) greeting admirers in 1940
Subhas Chandra Bose (C) being greeted w. garland of flowers after his arrival in Victoria Station
Subhas Chandra Bose (C) being greeted w. garland of flowers after his arrival in Victoria Station

Pro-Japanese, anti-British Indian Nationalist leader Subhas Chandra Bose (C) enjoying a meal at Bardoli Ashram on his way to the 51st Indian National Congress during WWII in 1940.
Pro-Japanese, anti-British Indian Nationalist leader Subhas Chandra Bose (C) enjoying a meal at Bardoli Ashram on his way to the 51st Indian National Congress during WWII in 1940. Subhas Chandra Bose, the new President of the 51st Indian National Congress, wearing traditional formal clothing in 1940
Subhas Chandra Bose, the new President of the 51st Indian National Congress, wearing traditional formal clothing in 1940
Netaji in Germany
Netaji in Germany
 Netaji in Germany
Netaji in Germany 
Netaji in Germany
Netaji in Germany 
Subhas Chandra Bose in a Tokyo speech in 1945
Subhas Chandra Bose in a Tokyo speech in 1945 
George Lansbury (1859-1940) the Labour politician greets the Indian nationalist leader and President of the All-India Congress Subhas Chandra.
George Lansbury (1859-1940) the Labour politician greets the Indian nationalist leader and President of the All-India Congress Subhas Chandra.
Netaji Subhas Chandra Bose and Members of the Azad Hind Fauj - 1940's 
Netaji Subhas Chandra Bose and Members of the Azad Hind Fauj - 1940's
Smiling Photo - Subhas Chandra Bose 
Smiling Photo - Subhas Chandra Bose
Netaji Subhas Chandra Bose Reviewing the Troops of Azad Hind Fauj - 1940's
Netaji Subhas Chandra Bose Reviewing the Troops of Azad Hind Fauj - 1940's 


 
 Rare Pic Of Netaji Subhash Chandra Bose With Adolf HitlerNetaji Subhas Chandra Bose Reviewing the Troops of Azad Hind Fauj - 1940's
Rare photographs of Subhash Chandra Bose, his family 
Anita-Subhash-Bose 
Anita-Subhash-Bose
Emilie-Subhash-Bose 
Emilie-Subhash-Bose
Father Janakinath-Bose 
Father Janakinath-Bose
Mother Prabhabati-Bose 
Mother Prabhabati-Bose
subhas_bose_with_his_wife_emilie_schenkl 
subhas_bose_with_his_wife_emilie_schenkl
raja_habib_ur_rahman_khan 
raja_habib_ur_rahman_khan
Rare-photographs-associated-with-Subhash-Chandra-Bose-Dnyaneshwar-Deshpande-and-his-Japanese-wife-flanking-unknown-person 
Rare-photographs-associated-with-Subhash-Chandra-Bose-Dnyaneshwar-Deshpande-and-his-Japanese-wife-flanking-unknown-person
Group-Photo-with--Shri-Dadasaheb-Khaparde-in-in-center-wearing-a-turban-and-Netaji-sitting-next-to-him-from-1938 
Group-Photo-with--Shri-Dadasaheb-Khaparde-in-in-center-wearing-a-turban-and-Netaji-sitting-next-to-him-from-1938
Rare-photographs-associated-with-Subhash-Chandra-Bose-House-of-Dnyaneshwar-Deshpande-in-Rangoon-later-occupied-by-Netaji-Subhash-Chandra-Bose-with-his-residence-and-H.Q..PNG 
Rare-photographs-associated-with-Subhash-Chandra-Bose-House-of-Dnyaneshwar-Deshpande-in-Rangoon-later-occupied-by-Netaji-Subhash-Chandra-Bose-with-his-residence-and-H.Q.
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पर लेख 


Share:

शहीद भगत सिंह के पुराने और दुर्लभ मूल फोटो Old and Rare Original Photos of Shaheed Bhagat Singh




Bhagat Singh's mother's message to Youth

Orders of Bhagat Singh's execution

Bhagat Singh's letters in Hindi & Urdu


Bhagat Singh's letter in Punjabi

Official Documents of Bhagat Singh trial

MJS Waraich with Bhagat Singh's mother Ram Saran Das Talwar


Share: