जस्टिस सी. एस. कर्णन पर कार्यवाही और शिकायत में जाँच से परहेज क्यों?



सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की महापंचाट ने ‘जस्टिस सी. एस. कर्णन को नोटिस जारी कर दिया है और उन्हें न्यायिक और प्रशासनिक काम देने से रोक दिया है। जजों के विरुद्ध जज की टिप्पणी पर जाँच करने के बजाय खुद शिकायतकर्ता को सुने चाप चड़ा देना कहा तक उचित है?

सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया कि खुद के चरित्र पर लांछन को पोछने के लिए एक जज पर एकतरफा कार्यवाही जा सकती है तो आम आदमी को बोलने कि कोई हैसियत नही है।देश में ऐसे कई मौके आये है जब उच्च न्यायपालिका में जजनिर्मल यादव जैसे जज रंगे हाथ पकड़े गए और सुप्रीमकोर्ट ने कोई कार्यवाही नहीं, इसका अर्थ यही निकला जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार स्वीकार है किंतु भ्रष्टाचार का लांछन नही।

महान्यायवादी मुकुल रोहतगी कि इस मामले में भूमिका गैरजिम्मेदाराना और निष्पक्ष नही रही, अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बहस शुरू करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को ये निर्देश दें कि जस्टिस कर्णन को कोई काम नहीं दिया जाए। अब यह प्रशासनिक मसला नहीं रहा, जस्टिस कर्णन पर कार्यवाही पर तो बोले किन्तु, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर मौन रहे। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी जी को चाहिए कि वह तत्काल मुकुल रोहतगी को महान्यायवादी पद के दायित्व से मुक्त करें। सरकार का पक्ष निष्पक्ष होना चाहिए न कि सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्तियों प्रभाव में किसी के प्रति अन्याय मेंं।

जज न्यायपालिका में खुद भ्रष्टाचार कि आग लगी है तो न्यायपीठ पर बैठी होलिका रुपी असुरी शक्तियों के जलने का वक्त आ गया है..


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