भगवान शंकर की पूजा के लिए विहित और निषिद्ध पुष्प और पत्र



भगवान शिव को ही महादेव, भोलेनाथ, महेश, रुद्र, नीलकंठ शंकर


भगवान शिव को ही महादेव, भोलेनाथ, महेश, रुद्र, नीलकंठ और शंकर के नाम से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हीं का नाम भैरव है। वैदिक ऋचाओं में इन्हीं का नाम रुद्र है।  भगवान शिव को भोले भंडारी कहा जाता है। अगर कोई इन्हें सच्चे मन से एक लोटा जल ही चढ़ा दें तो भी वो प्रसन्न होकर उसे सब कुछ दे डालते हैं।
ऐसे परम दयालू देवादि-देव महादेव भगवान शिव पर फूल चढ़ाने का बहुत अधिक महत्व है।

तपःशील गुणोपेते विप्रे वेदस्य पारगे।
दत्त्वा सुवर्णस्य शतं तत्फलं कुसुमस्य च।   वीरमित्रोदय )

एक तप शील सर्व गुण संपन्न और वेदों में निष्णात किसी ब्राह्मण को सौ सुवर्ण दान करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह भगवान शंकर पर सौ फूल चढ़ा देने से प्राप्त हो जाता है ।

कौन से पत्र-पुष्प शिव के लिए विहित है और कौन से निषिद्ध इसकी जानकारी अपेक्षित है, आज हम आपको इस बारे में बताएंगे।

भगवान विष्णु के लिए जो पत्र और पुष्प विहित है वे सब भगवान शंकर पर भी चढ़ाये जा सकते है केवल केतकी और केवड़े के पुष्प का निषेध है। -

विष्णोर्यानीह चोक्तानि पुष्पाणि च पत्रिकाः ।
केतकीपुष्पमेकं तु विना तान्यखिळान्यपि ।
शस्तान्येव सुरश्रेष्ठ शंकराराधनाय  हि ।।  (नारद )

शास्त्रों में भगवान शंकर की पूजा में मौलसिरी अर्थात बक/बकुल के पुष्प को अधिक महत्व दिया है -
सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शिवं स्पृष्ट्वॆदमुच्यते।
बकपुष्पेण चैकेन शैवमर्चनमुत्तमं।।  -  (वीरमित्रोदय )

आचारेन्दु में ‘बक’ का अर्थ ‘बकुल’ से किया गया है और ‘बकुल’ का अर्थ है ‘मौलसिरी’।  वीरमित्रोदय के उपरोक्त श्लोक में मौलसिरी का विधान है लेकिन अन्य कथन  ‘बकुलैर्नार्चयेद् दॆवं’ में निषेध किया गया है जो विरोधाभासी प्रतीत होता है। काल विशेष के द्वारा इस विरोधाभास का निवारण हो जाता है - ‘सायाह्ने बकुलं शुभम्’,  अर्थात मौलसिरी को दिन के समय चढ़ाने का निषेध है इसे सायं काल चढ़ाना शुभ  है।

भविष्य पुराण में भगवान शंकर पर चढ़ाने योग्य जिन फूलों को वर्णन किया गया है वे इस प्रकार है –
करवीर अर्थात कनेर, मौलसिरी(बक/बकुल), धतूरा, बड़ी कटेरी, कुरची या कुरैया,  मन्दार यानि आक, अपराजिता, शमी का फूल, शंखपुष्पी, चिचिड़ा(अपामार्ग), कमल,चमेली, नागचम्पा या नागकेसर, चम्पा, खस, तगर,  किंकिरात यानि कटसरैया, गूमा, शीशम, गूलर,  बेला, पलाश जिसे ढाँख के नाम से भी जाता है, बेलपत्र, कुङ्कुम अर्थात केसर, नील कमल और लाल कमल।

वीरमित्रोदय में बतलाया गया है की समस्त फूलों की जातियों में सबसे बढ़कर नील कमल होता है

जल और थल में उत्पन्न होने वाले जितने भी सुगन्धित फूल है वे सभी भगवान शंकर को प्रिय हैं

शास्त्रों में फूलों को चढ़ाने से मिलने वाले फल का तारतम्य भी बताया गया है। जो इस प्रकार है-

दस सुवर्ण माप के बराबर सुवर्ण दान करने का फल एक आक के पुष्प को चढ़ाने से मिल जाता है। एक हजार आक के फूलों को चढ़ाने का जो फल होता है मात्र एक कनेर का पुष्प चढ़ाने से मिल जाता है और एक हजार कनेर पुष्पों का फल एक बिल्व पत्र चढ़ाने से मिल जाता है। एक हजार बिल्व पत्रों का फल एक गूमा फूल चढ़ाने से मिल जाता है इसी तरह एक हजार गूमा से बढ़कर एक चिचिड़ा और हजार चिचिडों से बढ़कर एक कुश का फूल हजार कुश पुष्पों से बढ़कर एक शमी का पत्ता हजार शमी के पत्तों से बढ़ कर एक नील कमल, हजार नील कमल से बढ़कर एक धतूरा और हजार धतूरों से बढ़कर एक शमी का फूल होता है। 
 
 
 
 
 
 
 

शिवार्चन में निषिद्ध पत्र पुष्प 
भगवन शंकर पर जो फूल नहीं चढ़ाने चाहिए वे इस प्रकार है - सारहीन पुष्प, कदम्ब, शिरीष, तिन्तिणी, बकुल (मौलसिरी), कोष्ठ, कैथ, गाजर, बहेड़ा, कपास, गंभारी, पत्रकंटक, सेमल, अनार, धव, केवड़ा और केतकी, बसंत ऋतु में खिलने वाला कंद, कुंद, जूही, मदन्ति, शिरीष सर्ज और दोपहरिया के फूल भगवान  शंकर पर नहीं चढ़ाने चाहिए। केवडा की दो प्रजातियाँ होती है - सफेद और पीली। सफेद जाति को केवड़ा और पीली को केतकी कहते है।


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