गांधी का अहं

भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में एक ऐसा समय भी आया जब गांधी जी को अपने अस्तित्व पर संकट नज़र आने लगा था। गांधी जी को एहसास होने लगा था कि अगर अब प्रतिरोध नहीं किया गया तो, “गांधी” से भी बड़ा कोई नाम सामने आ सकता है। जो स्वतंत्रता की लड़ाई “गांधी” नाम की धुरी पर लड़ा जा रहा था, वह युद्ध कहीं किसी और के नाम से प्रारम्भ न हो जाये। वह धुरी गांधी जी को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। यह एक ऐसा नाम था जो गांधी जी को ज्यादा उभरता हुआ दिखाई दे रहा था। देश की सामान्य जनता सुभाष बाबू में अपना भावी नेता देख रही थी। सुभाष बाबू की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। जो परिस्थितियां गांधी जी ने अपने अरमानों को पूरा करने के‍ लिये तैयार की वह सुभाष चन्द्र बोस के सक्रिय रूप से सामने आने पर मिट्टी में मिलती दिख रही थी। गांधीजी को डर था कि जिस प्रकार यह व्यक्ति अपने प्रभावों में वृद्धि कर रहा है वह गांधी और नेहरू के प्रभाव को भारतीय परिदृश्य से खत्म कर सकता है। इन दोनों की भूमिका सामान्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भांति होने जा रही थी। गांधी और नेहरू की कुटिल बुद्धि तथा अंग्रेजों की चतुराई को यह कदापि सुखद न था। इस भावी परिणाम से भयभीत हो नेता जी को न केवल कांग्रेस से दूर किया गया बल्कि समाज में फैल रहे उनके नाम को समाप्त करने का प्रयास किया गया। यह व्यवहार केवल नेता जी के साथ ही नहीं हर उस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ किया गया जो गांधी जी के अनर्गल प्रलापों का विरोधी था और उनकी चाटुकारिता करना पसंद नहीं करता था तथा देश की आज़ादी के लिये जिसके मन में स्पष्ट विचार थे।

Mahatma Gandhi and Subhas Chandra Bose: A Clash of Ideology

गांधी और सुभाष का स्वतंत्रता संग्राम में आने में एक समानता थी कि दोनों को ही इसकी प्रेरणा विदेश में प्राप्त हुई। किन्तु दोनों की प्रेरणा स्रोत में काफी अंतर था। गांधी जी को इसकी प्रेरणा तब मिली जब दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा लात मार कर ट्रेन से उतार दिया गया, और गांधी जी को लगा कि मैं एक कोट पैंट पहने व्यक्ति के साथ यह कैसा व्यवहार किया जा रहा है? अंग्रेजों द्वारा लात मारने घटना गांधी जी को महान बनाने में सर्व प्रमुख थी। अगर गांधी जी के जीवन में यह घटना न घटित हुई होती तो वह न तो स्वतंत्रता के प्रति को ललक होती, और न ही आज राष्‍ट्रपिता का तमका लिये न बैठे होते, न ही उनकी गांधीगिरी अस्तित्व में हो।

Funny Mahatma Gandhi by endarte on DeviantArt

वही सुभाष चन्द्र बोस इंग्लैंड में भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian Civil Service) की परीक्षा के दौरान देश में घट रहे जलियावाला बाग काण्ड, रोलेट एक्ट, तथा कांग्रेस के द्वारा इन घटनाओं के परिपेक्ष में असहयोग आंदोलन जैसी घटनाओं प्रभावित हो उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में आना उचित समझा। उनके जहान में देश के प्रति प्रेम और इसकी स्वतंत्रता के भाव का संचार हो गया। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक परीक्षा चौथे स्थान पर रह कर पास की थी। ऊँचा रैंक था, ऊँचा वेतन और किसी राजा से भी बढ़कर मान सम्मान एवं सुख सुविधाएं उन्हें सहज प्राप्त थी। सुभाष बाबू किसी अंग्रेज ने छुआ तक नहीं था। किन्तु भारत माँ की करुण पुकार ने उन्हें देश भक्ति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने समस्त सुख सुविधाओं से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र में कहा- “मै नही समझता कि कोई व्यक्ति अंग्रेजी राज के प्रति निष्ठावान भी रहे तथा अपने देश की मन, आत्मा तथा ईमानदारी से सेवा करें, ऐसा संभव नही।”

 नेता जी विदेश से लौटते ही देश की सेवा में लग गये और जब 1925 ई. को कलकत्ता नगर निगम में स्वराज दल को बहुमत मिला तो उन्होंने निगम के प्रमुख के पद पर रहते हुए अनेक महत्वपूर्ण काम किये।

Why is Netaji Subhas Chandra Bose called Netaji?

1928 मे जब कलकत्ता में भारत के लिये स्वशासी राज्य पद की मांग के मुख्य प्रस्ताव को महात्मा गांधी ने प्रस्तावित किया। तो सुभाष बाबू ने उसमें एक संशोधन प्रस्तुत किया, जिसमें पूर्ण स्वराज की मांग की गई। गांधीजी पूर्ण स्वराज रूपी संशोधन से काफी खिन्न हुए, उन्होंने धमकी दिया कि यदि संशोधित प्रस्ताव पारित हुआ तो वे सभा से बाहर चले जायेगे। गांधी जी के समर्थकों ने इसे गांधी जी की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया, क्योंकि अगर गांधी की हार होती है तो निश्चित रूप से समर्थकों की महत्वाकांक्षाओं को झटका लगता, क्योंकि गांधी के बिना वे अपंग थे। समर्थकों की न कोई सोच थी और न ही सामान्य जनों के विचारों से उनका कोई सरोकार था। सिर्फ और सिर्फ महत्वाकांक्षा ही उनके स्वतंत्रता संग्राम का आधार थी। यही उनके संग्राम सेनानी होने के कारण थे। गांधी जी की इस प्रतिष्ठा की लड़ाई में अंग्रेज सरकार की पौबारा हो रही थी। सुभाष बाबू का संशोधित प्रस्ताव 973 के मुकाबले 1350 मतों से गिर गया। गांधी की आंधी के आगे सुभाष बाबू को 973 वोट प्राप्त होना एक महत्वपूर्ण घटना थी। यहीं पर गांधी जी का स्वराष्ट्र से बड़ा हो गया। गांधी जी के अहं के आगे उन्ही का सत्‍य, अहिंसा, और आर्शीवचन पाखंड साबित हुआ और जिस लाठी सहारे वह चलते थे वही लाठी कांग्रेसियों के गुंडई प्रमुख अस्त्र बन गई। कांग्रेसियों द्वारा गांधी जी के नाम को अस्त्र बना अपना मनमाना काम करवाया, और इस कुकृत्य में गांधी जी पूर्ण सहयोगी रहे। इसका फायदा मिला सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी साम्राज्य को।

नेता जी सुभाष चंद्र बोस सम्बंधित अतिरिक्त लेख -

17 टिप्‍पणियां:

  1. gandhi ki sachachi
    ati uttam
    lage rho
    andhe rastra ko
    gayan ki ati aavasyaskata hai

    is blog par pir aana hoga

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  2. लेकिन गांधी और सुभाष दोनों में एक कमी थी। दोनों ही भारतीय अवाम की भागीदारी और सक्रियता पर यकीन नहीं करते थे। दोनों ही अपने व्यक्तित्व को लेकर मुदित थे। जबकि राजनीति, समाज और शासन-प्रशासन में कोई चीज तभी स्थायित्व पाती है, जब उसमें उन लोगों यानी अवाम की भागीदारी है जिनके लिए उसे बनाया जा रहा है। गांधी ने हमेशा नीचे से उभरे आंदोलनों के दमन में अंग्रज़ों की मदद की। और सुभाष तो देश की जनता के बजाय बाहर के लोगों की मदद लेने चले गए।

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  3. anjil ji,
    सुभाष जी मदद लेने बाहर नहीं गए, जब उन्होने देखा की देश के अन्दर उनके हर आजादी के प्रयास को गांधी और उनके समर्थक राजनीती के चक्कर में डाल दे रहे है, तो उन्होने सोचा की ठीक है तो मैं बाहर बसे भारतीयों के सहयोग से एक सेना खडी करूंगा (बजाये कि देश में जनता को दो गुटों में बाँट कर जनता में भ्रम और अंग्रेजो में ख़ुशी पैदा करू ) और इसके लिए उन्होने जान प्राण लगा दिए निस्वार्थ भाव से.

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  4. अच्छा विमर्श.

    मगर अब इतिहास को समग्रता से देखा जाना चाहिए. हमारे इतिहास नायक विभिन्न विचार धाराओं से प्रभावित थे. क्यो हम सबका समानरूप से सम्मान नहीं कर सकते? कोई कहता है भगतसिंह साम्यवादी थे, गाँधी अलाणे फलाणे थे, आम्बेडकर के लिए अलग चौका रचा गया है, सावरकर हिन्दूत्ववादी थे. भई सबने लड़ा तो भारत के लिए ही ना.

    लेकिन मंथन न रूके. जारी रखें.

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  5. मुझे तो आप पर दया आती है। इसमें कोई शंका नहीं कि उन लोगों में मतभेद थे परन्तु लेख में गाधीं जी का तो नहीं आपका अपराधबोध अवश्य नजर आता है। इसका जबाब मेरे पास है। इन्तजार किजीए।

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  6. ati uttam kahaa aapne pramendra ji... apne vichaar ko thoda aur lamba karte aur usme aur tathya daalte to mazaa hi aa jata..
    meri shubhkaamnaayein aapke saath hain..
    Jai Hind Jai Bharat...

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  7. लक्ष्य सब के एक थे भले ही सोचने का नजरिया अलग-२ था । मेरे ख्याल से हम को इस परिपेक्ष मे रख कर सोचना चाहिये ।

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  8. main aapki vicharon se sehmat hoon....main aapki har baat se sehmat hoon...vaise gandhiji ko [b]neutral[/b](tathashta) roop se janana chaho....to aap OSHO ki.....
    asvikriti mein utha hua haath..(dekh kabira roya).....
    avshya padhein......kya shandaar postmortam kiya hai OSHO ne unka......

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  9. is gandhi buddhe ne BHARAT WARSH ko jitna barbad kiya utna shayad kisi aur ne nahi kiya hoga, congresh party to gandhi nam ki mala hi japti rah gayi aur desh ko lutere loot le ja rahe hain. Agar gandhi ne Shahid Bhagat Singh aur Netaji Bose ka sath diya hota to apna BHARAT akhand roop se bahut p[ahle hi swatantra ho chuka hota. Gandhi hi ek matra karan tha jisne Desh ki jaldi azadi me tang ladai aur is desh ka bantwara kiya kyonki wo chahta tha ki Nehru Primr Minister bane na ki jinna. aur sachchai ye thi ki jinna ne bas ek bar apne aapko prime minister banane ki shart rakhi thi uske bad is lok tantra me janta jise chahti uski sarkar banati.

    Agar ham pichhli baton ko bhoolkar aaj ki halat denkhe to yahan bhi congresh GANDHI nam ke pichhe bhag rahi hai, Soniya ne jo kaha wo sir mathe par..............
    Akhir congresh Gandhi ko chhodkar Desh ke liye kab ladegi.

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  10. गाँधी जी की देशभक्ति पर किसी को सन्देह नहीं लेकिन यह भी सत्य है कि गांधी जी जिद्दी और तानाशाही प्रवृति के थे। वे अपने अलावा किसी और को जनता का नेता बनते देखना ही नहीं चाहते थे। भगतसिंह और नेताजी को खुड्डेलाइन लगाना इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा था।

    पाकिस्तान को ५५ करोड़ दिलाने के लिए उन्होंने अनशन किया, जबकि सब इसे देने के खिलाफ थे। १९४२ का सफल चल रहा आन्दोलन उन्होंने एक छोटी सी घटना के कारण वापस ले लिया, जबकि सभी ने ऐसा न करने की सलाह दी। और भी कई उदाहरण हैं, गाँधी जी सब जगह अपनी ही मर्जी चलाते थे।

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  11. गांधीजी के विषय में हम तो एक बार हाथ जला कर देख चुके, अब आपकी बारी है।
    मेरा मानना है प्रमेन्द्रजी, जो होना था हो चुका, जो कर रहा है भुगतेगा आप अपनी ऊर्जा को इस फालतू विषय में बर्बाद ना कर कुछ रचनात्मक लिखें।
    सब जानते हैं कौन क्या था!!!!

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  12. abe nalayak besaram ghatia khandaan ki aulad ye faltu baatain karte tujhe saram nahi aati kya... kaamchor koi kaam kiya kar faltu time kharab mat kiya kar .saala nanga

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  13. pata nahi kyo par mujhe nahi lagata ki yadi yuvao se pucha jae ki "bhai gandhi or shree chandrashekhar aazad main se kise pasand karoge"

    to koi kayar hi gandhi ji ka naam lega..........

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  14. नेता तो नेता ही हो जाता है। भगतसिंह की हिसप्रस में उनका महत्व, आजाद हिन्द फौज में नेताजी का महत्व और कांग्रेस में गाँधी का महत्व हमेशा रहा है।
    आप इस बात को कहकर एकांगी बात कर रहे हैं कि गाँधी ऐसे थे।

    गाँधी की सबसे भयंकर गलतियों में नेहरु का पक्षपात और नेताजी के साथ भेद है, मैं इससे इनकार नहीं करता।

    लेकिन नेताजी के बारे में आप बहुत जानते हों तो बताइए कि घटनाओं का असर नेताजी और गाँधी जी दोनों पर पड़ा। स्वाभाविक क्रान्तिकारी तो दोनों नहीं रहे इस हिसाब से जैसे आपने सोचा है। एक खुद पर अत्याचार से और एक लोगों के अत्याचार से। लेकिन यहाँ गाँधी ने कपड़े और खाने तथा सभी खर्चों में जमकर कटौती की देश के लिए उसका महत्व आपकी नजरों में नहीं है।

    अभी याद आया 22 मार्च 1931 को भगतसिंह का लिखा भी देख लें। कुछ समझ में आ जाएगा।

    सुभाष चन्द्र बोस और गाँधी या कोई हर क्रान्तिकारी किसी घटना से ही सोचना शुरु करता है जब वह महसूस करता है। वरना नेताजी ने अंग्रेजी सरकार में नौकरी की क्यों, भले इस्तीफ़ा दिया। लोग कहते हैं कि पिता को दिखाने के लिए। लेकिन आपका लिखा बताता है कि वे नौकरी कर रहे थे। और बाद में आहत होकर त्यागपत्र दिया। सवाल है नेताजी ने नौकरी क्यों की जबकि भगतसिंह ने ऐसा कुछ नहीं किया था।

    नेताजी अच्छे और नेहरु से ज्यादा योग्य नेता थे, इसमें किसी को संदेह नहीं है। लेकिन 1939 तक यानि उम्र के 48वें साल तक वे कांग्रेस में क्या कर रहे थे जबकि उन्हें मालूम था कांग्रेस सेना और युद्ध नहीं मानती थी। यह साबित करता है सुभाष और गाँधी सभी किसी घटना के बाद अपनी खास नीति से लड़ते हैं। ध्यान से देखिए।

    एक बात याद आई कि भगतसिंह के सम्पूर्ण दस्तावेज देखिए। उसमें नेहरु के प्रति बहुत सम्मान दिखता है भगतसिंह में लेकिन नेताजी के प्रति क्या दिखता है, यह खुद पढ़कर देख लें।

    इसलिए बार बार कह रहा हूँ कि आपकी जो इतिहास दृष्टि है उसमें पक्षपात और पूर्वाग्रह हमेशा दिखते हैं। इस बार की टिप्पणी में हर बात के सबूत हैं हमारे पास। अब साबित कीजिए नेताजी 48 साल तक क्या थे?

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  15. श्रीमान महाशक्ति जी आपने ठीक लिखा गाँधी जी अहंकारी थे ।वें लोकेष्णा के महत्वाकाँक्षी थे ।वेँ चाहते थे कि हिन्दुओँ की तरह मुसलमान भी उन्हे अपना नेता माने उनमे श्रृद्धा रखेँ अपितु उन्हेँ पूजेँ ।इसी कारण उन्होँने तुर्कि के खलीफा का समर्थन किया ।खिलाफत आन्दोलन के समर्थन के लिए काँग्रेस(हिन्दुओँ) को बाध्य किया । परिणाम क्या निकला ? नोआखोली और मालाबार आदि स्थानोँ पर हिन्दुओँ का सामूहिक नरसंहार व धर्मान्तरण । जिन मुसलमानोँ के लिए गाँधी जी ने सभी सीमाँए लाँघ दी ( पाकिस्तान निर्माण , 55 करोड का दान , हिन्दु शरणार्थीयोँ का अपमान ,मुसलमानोँ का सम्मान)उन ही मुसलमानोँ ने गाँधी जी की मृत्यु के पश्चात उनकी राख को पाकिस्तान की नदियोँ मे बहाने को यह कह कर मना कर दिया था कि एक हिन्दु (काफिर) की राख (चिता भष्म)से हमारी पाक(पवित्र) नदियाँ नापाक (अपवित्र) हो जाएंगी ।
    पंडित राकेश आर्य
    [email protected] गाँधी जी अहंकारी थे ।वें लोकेष्णा के महत्वाकाँक्षी थे ।वेँ चाहते थे कि हिन्दुओँ की तरह मुसलमान भी उन्हे अपना नेता माने उनमे श्रृद्धा रखेँ अपितु उन्हेँ पूजेँ ।इसी कारण उन्होँने तुर्कि के खलीफा का समर्थन किया ।खिलाफत आन्दोलन के समर्थन के लिए काँग्रेस(हिन्दुओँ) को बाध्य किया । परिणाम क्या निकला ? नोआखोली और मालाबार आदि स्थानोँ पर हिन्दुओँ का सामूहिक नरसंहार व धर्मान्तरण । जिन मुसलमानोँ के लिए गाँधी जी ने सभी सीमाँए लाँघ दी ( पाकिस्तान निर्माण , 55 करोड का दान , हिन्दु शरणार्थीयोँ का अपमान ,मुसलमानोँ का सम्मान)उन ही मुसलमानोँ ने गाँधी जी की मृत्यु के पश्चात उनकी राख को पाकिस्तान की नदियोँ मे बहाने को यह कह कर मना कर दिया था कि एक हिन्दु (काफिर) की राख (चिता भष्म)से हमारी पाक(पवित्र) नदियाँ नापाक (अपवित्र) हो जाएंगी ।
    पंडित राकेश आर्य
    [email protected]

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