चुराई हुई संपत्ति एवं उसे बेईमानी से प्राप्त करने का अपराध
भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 410 "चुराई हुई संपत्ति" (Stolen Property) की परिभाषा प्रदान करती है। इस धारा के अनुसार, वह संपत्ति चुराई हुई संपत्ति कहलाती है जिसका कब्जा चोरी, उद्यापन (Extortion), लूट (Robbery) अथवा डकैती जैसे अपराधों द्वारा प्राप्त किया गया हो, या जिसका आपराधिक दुर्विनियोग (Criminal Misappropriation) अथवा आपराधिक न्यास-भंग (Criminal Breach of Trust) किया गया हो।
यह भी महत्वपूर्ण है कि यदि उक्त अपराध भारत के बाहर भी किए गए हों, तब भी संबंधित संपत्ति "चुराई हुई संपत्ति" मानी जाएगी। अर्थात अपराध का स्थान नहीं, बल्कि संपत्ति की अवैध प्राप्ति महत्वपूर्ण है।
हालाँकि, यदि बाद में वही संपत्ति ऐसे व्यक्ति के कब्जे में पहुँच जाती है जो उस पर वैध अधिकार रखता है, तो वह संपत्ति "चुराई हुई संपत्ति" नहीं रह जाती।
न्यायिक दृष्टिकोण
चान्द मल बनाम राजस्थान राज्य (1976 Cr.L.J. 679) के मामले में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि "चुराई हुई संपत्ति" की श्रेणी में केवल वही संपत्ति आएगी जिसका कब्जा चोरी, उद्यापन, लूट, आपराधिक दुर्विनियोग अथवा आपराधिक न्यास-भंग जैसे अपराधों के माध्यम से प्राप्त किया गया हो।
चुराई हुई संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना (धारा 411)
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 411 उस व्यक्ति को दंडित करती है जो किसी चुराई हुई संपत्ति को यह जानते हुए, अथवा यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण रखते हुए कि वह चुराई हुई संपत्ति है, बेईमानी से प्राप्त करता है या अपने पास रखता है।
इस अपराध के लिए अभियोजन पक्ष को सामान्यतः निम्नलिखित तत्व सिद्ध करने होते हैं—
संबंधित संपत्ति वास्तव में चुराई हुई संपत्ति हो।
अभियुक्त ने उस संपत्ति को प्राप्त किया हो या अपने कब्जे में रखा हो।
संपत्ति प्राप्त करते समय अभियुक्त को यह जानकारी हो, अथवा विश्वास करने का पर्याप्त कारण हो कि वह चुराई हुई संपत्ति है।
संपत्ति का प्राप्त करना या रखना बेईमानी (Dishonestly) से किया गया हो।
दंड
धारा 411 के अंतर्गत दोषसिद्धि होने पर अभियुक्त को—
तीन वर्ष तक का कारावास, या
जुर्माना, या
कारावास एवं जुर्माना दोनों
से दंडित किया जा सकता है।
उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति बाजार मूल्य से अत्यंत कम कीमत पर किसी अज्ञात व्यक्ति से महंगा मोबाइल फोन खरीद लेता है और परिस्थितियाँ यह संकेत करती हैं कि वह चोरी का माल हो सकता है, तो ऐसे व्यक्ति पर धारा 411 के अंतर्गत अभियोग चलाया जा सकता है, यदि यह सिद्ध हो जाए कि उसे संपत्ति के चोरी की होने का ज्ञान था या ऐसा विश्वास करने का पर्याप्त कारण था।
इस प्रकार धारा 411 का उद्देश्य केवल चोर को दंडित करना नहीं, बल्कि चोरी के माल की खरीद-फरोख्त और उसके अवैध बाजार को भी हतोत्साहित करना है। यदि चोरी की संपत्ति खरीदने वाले लोगों को दंडित न किया जाए, तो चोरी जैसे अपराधों को बढ़ावा मिलेगा।
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