श्री हरिहर मंदिर बनाम जामा मस्जिद विवाद: हाईकोर्ट ने वाद दायर करने और स्थल निरीक्षण की अनुमति को सही ठहराया


सांभल जामा मस्जिद विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद प्रबंधन समिति की पुनरीक्षण याचिका खारिज की

प्रमुख निर्णय:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने Committee of Management, Jami Masjid Sambhal द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दीवानी वाद दर्ज करने की अनुमति तथा अधिवक्ता आयुक्त (Advocate Commissioner) की नियुक्ति को वैध ठहराया है।

विवाद की पृष्ठभूमि

वादी हरि शंकर जैन एवं अन्य सात व्यक्तियों ने दावा किया कि सांभल स्थित जामा मस्जिद वास्तव में प्राचीन श्री हरिहर मंदिर है, जिसे वर्ष 1920 में संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। वादियों का कहना था कि मंदिर परिसर में हिंदू धार्मिक प्रतीकों एवं अवशेषों की उपस्थिति है और उन्हें वहां पूजा-अर्चना तथा प्रवेश का अधिकार मिलना चाहिए।

इस संबंध में वादियों ने पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजा, किन्तु अपेक्षित कार्रवाई न होने पर 19 नवंबर 2024 को दीवानी वाद संस्थित किया।

न्यायालय के समक्ष प्रमुख प्रश्न

1. क्या दो माह की नोटिस अवधि पूरी होने से पहले मुकदमा दायर किया जा सकता था?
मस्जिद प्रबंधन समिति ने तर्क दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 80 के अनुसार सरकार के विरुद्ध वाद दायर करने से पूर्व दो माह का नोटिस अनिवार्य है। न्यायालय ने माना कि जहां तत्काल राहत की आवश्यकता हो, वहां धारा 80(2) के अंतर्गत न्यायालय की अनुमति से बिना प्रतीक्षा किए वाद दायर किया जा सकता है। न्यायालय ने पाया कि वादियों द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को देखते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अनुमति विधिसम्मत थी।

2. क्या अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति उचित थी?
उच्च न्यायालय ने कहा कि विवादित स्थल की वास्तविक स्थिति और वहां मौजूद संरचनात्मक तथ्यों का प्रारंभिक आकलन करने के लिए स्थानीय निरीक्षण आवश्यक था। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा अधिवक्ता आयुक्त नियुक्त कर सर्वेक्षण कराने का आदेश न्यायोचित एवं प्रक्रिया-सम्मत था।

3. उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का प्रभाव
मस्जिद समिति ने तर्क दिया कि Places of Worship Act, 1991 के तहत किसी धार्मिक स्थल की स्थिति या पहचान को परिवर्तित करने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने इस स्तर पर यह टिप्पणी की कि मूल वाद में वादियों ने प्रवेश एवं पूजा-अधिकार से संबंधित राहत मांगी है, इसलिए इस प्रारंभिक चरण में केवल इसी आधार पर वाद को खारिज नहीं किया जा सकता।

4. सरकारी पक्ष का रुख
राज्य सरकार, ASI तथा अन्य सरकारी प्रतिवादियों ने वाद की संस्थापन प्रक्रिया या नोटिस अवधि से छूट दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं उठाई। न्यायालय ने इसे भी महत्वपूर्ण तथ्य माना।

न्यायालय का निष्कर्ष

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध तथ्यों एवं कानून के अनुरूप वाद दर्ज करने की अनुमति प्रदान की तथा अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति की। न्यायालय को इन आदेशों में कोई ऐसी विधिक त्रुटि या अधिकार क्षेत्र संबंधी कमी नहीं मिली, जिसके आधार पर हस्तक्षेप किया जाए।

साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 80 CPC के अंतर्गत नोटिस संबंधी आपत्ति मुख्यतः सरकारी पक्ष द्वारा उठाई जा सकती है; निजी पक्षकार इस आधार पर वाद की वैधता को चुनौती नहीं दे सकते।

मामले का विवरण:
केस: Committee of Management, Jami Masjid Sambhal Ahmed Marg Kot Sambhal vs. Hari Shankar Jain and Others
केस संख्या: Civil Revision No. 4 of 2025
निर्णय दिनांक: 19 मई 2025

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