सत्‍ता के दौर में भाजपा कार्यकर्ता का दर्द भरा अंत


स्‍व. रमेश शर्मा इलाहाबाद के बाहर भले हम जैसे सामान्‍य कार्यकर्ताओं के लिये सामान्‍य नाम हो किन्‍तु इलाहाबाद जिले शर्मा जी की ऐसे धाक रही है कि शायद ही कोई ऐसा राष्‍ट्रीय नेता रहा हो जो इलाहाबाद से संबंध रखता हो शर्मा जी को नही जानता था। इलाहाबाद जिलें मे भाजपा की कोई बैठक या रैली रही हो जहां उनकी उपस्थिति न होती हो। ऐसे ही भाजपा के वरिष्‍ठ नेता श्री शर्मा जी का हृदय गति रूक जाने के कारण पिछले दिनों मे स्‍वर्गवास हो गया।

स्‍व. शर्मा जी की इस असमयिक मृत्‍यु को भाजपा के शीर्ष नेताओं द्वारा की गई राजनैतिक हत्‍या कहा जाये तो अतिशयोक्ति नही होगा। सत्‍ता सिर्फ नेताओं और उनके चाटुकारों की होती है कार्यकार्ताओं की नही यह शिद्ध हो गया है। उत्तर प्रदेश के सरकार बने लगभग 14 माह होने को रहे थे। आश्‍वासनों के दौर मे श्‍ार्मा जी की सरकारी वकील आस जब टूट गई जब उत्‍तर प्रदेश के सरकारी वकीलों की अन्तिम सूची मे भी उनका नाम नही आया। स्‍व. शर्मा जी उस शीशे की भातिं टूट गई जिसका जीवन भर खूब उपयोग किया और जब नया दौर आया तो उस शीशे को अपनों द्वारा ही पत्‍थर मार कर तोड़ दिया जाता है।

मै स्‍व. शर्मा जी का हंसता हुआ चेहरा भुला नही पा रहा हूं। संगठन से जुडाव और अधिवक्‍ता होने के नाते स्‍व. शर्मा जी से घर पर, हाईकोर्ट परिसर और कार्यक्रमों मे अक्‍सर बात होती थी और संगठन की ओर से हाईकोर्ट मे सरकारी वकील न बनाये जाने की उपेक्षा की चर्चा करते थे कि आखिर अपना संगठन हम जैसे पुराने लोगों को इग्‍नोर कर के कैसे ऐसे लोगो को मौज करने दे रहा है जिनका न कभी संघ से तालुकात रहा है और न ही भाजपा संगठन से, कौन सी योग्‍यता लेकर वो पैदा हुये जो हम लोगों के पास नही है। शर्मा जी की यह बातें झकझोर कर रख देती है उनका इशारा कही न कही सरकारी वकीलों की नियुक्तियों मे धन के प्रभाव की ओर रहा था।

कोई भी व्‍यक्ति ऐसा बतायें कि शर्मा जी के अंदर सरकारी वकील बनने की कौन सी योग्‍यता नही थी कि सरकार की 3 लिस्‍ट आई और तीनों लिस्‍ट मे उनका नही नही था। यह तो कार्यकर्ता के मुंह पर तमाचा है कि संगठन मे दर्री और कुर्सी लगाने वालों की औकात नही होती है, सरकारी वकील की।

हाईकोर्ट के अवकाश के बाद मेरा एक चैम्‍बर मे जाना हुआ जो मे विश्‍वविद्यालय के समय के मित्र रहे है और वो और उनका परिवार सपा मे काफी प्रभावी राजनीति करते है। उनका कहना कि इस बार जीए की लिस्‍ट मेरे चैम्‍बर के 4 लोग आपकी सरकार मे पैसे के दम शासकीय अधिवक्ता नियुक्त हुये है और आप अपनी सरकार की छवि और सुसाशन की बात करते हो, फिर बोला कि तुम सबकी छोड़ो सबसे बड़े संघी बनते हो खुद कहा हो आपनी भगवा सरकार मे।

कुछ भी ऐसे तानों से शर्मा जी भी अछूते नही रहे होगे, वों तो बड़े नेता थे और विरोधियों से उनके कई गुना ज्‍यादा अच्‍छे सम्‍बन्‍ध रहे होगें और मुझे तो एक ताने से रूबरू होना पड़ा उन्‍हे तो उनके कद के हिसाब से बहुत कुछ सुनना पड़ा होगा। कही न कही उनका हर ताने का एक जवाब रहा होगा कि अभी जीए ही लिस्‍ट आने दो देखना एजीए-1 से कम नही मिलेगा किन्‍तु जी की लिस्‍ट पर‍िस्थितियां हृदयाघाती थी ही और वह इस सदमे से निराशा थे ही और अंतोगत्‍वा अपनी पार्टी को सैंकडों लाईयां जितवाने वाले शर्माजी अपनी पार्टी से अपनी ही लड़ाई हार बर्दास्‍त न कर सकें और अचानक हृदयाघात के कारण प्राण त्‍याग दिये।

समाचार पत्रो मे पढ़ने को मिला कि क्‍या राज्‍यपाल तो क्‍या मंत्री-उपमुख्‍यमंत्री सभी ने शर्मा को जी मृत्‍योंपरांत श्रद्धांजंली देते हुये क्‍या क्‍या उपधियां नही दी किन्‍तु शर्मा जी के जीवित रहते सरकारी वकील नही बनवा सके। कारण स्‍पष्‍ट है कि अपनी सरकार मे उनसे पैसा मांगने की औकात किसी मे थी नही और जैसा सुनने मे आ रहा है और हकीकत भी प्रतीत हो रही है कि अपनी सरकार मे बिना पैसा सरकारी वकील बनना सम्‍भव था भी नही।
स्‍व. शर्मा जी आज अपने मध्‍य नही है किन्‍तु हम सब के समक्ष बहुत से अनुत्‍तरित प्रश्‍न छोड गये है !

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