राजद्रोह - Sedition



धारा 124-क के अनुसार- "जो कोई बोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा या पैदा करने का प्रयास करेगा या अप्रीति उत्पन्न करने का प्रयास करेगा, वह आजीवन कारावास से जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिसमें जुर्माना जोड़ा जा सकेगा या जुमनि से दण्डित किया जायेगा।" संक्षेप में राजद्रोह के अपराध के निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं-

  1. अभियुक्त का आशय राज्य सरकार के प्रति घृणा या अवमान फैलाना,
  2. विधि द्वारा स्थापित सरकार के विरुद्ध घृणा, उपेक्षा उत्पन्न करना या द्वेष उत्तेजित करना या उसका प्रयास करना,
  3. ऐसा कार्य वोले गये या लिखे गये शब्दों द्वारा, संकेतों द्वारा या दृश्यरूपण द्वारा किया जाये।

धारा के साथ तीन स्पष्टीकरण भी दिये गए हैं, जिनके अनुसार द्वेष से तात्पर्य गैर भक्ति और शत्रुता की भावना भी सम्मिलित है। उपर्युक्त प्रकार के कार्य किये बिना सरकार के प्रति असहमति प्रकट करना या आलोचना करना अपराध नहीं है।




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द्विविवाह - Bigamy



भा० द० सं० की धारा 494 ऐसे विवाह को दण्डनीय बनाती है जो विवाह के पक्षकार की पति अथवा पत्नी के जीवित रहने के कारण शून्य है। इस प्रकार के विवाह को अंग्रेजी विधि में द्विविवाह (Bigamy) कहा जाता है। धारा 494 के अनुसार- "जो कोई पति अथवा पत्नी के जीवित होते हुए किसी ऐसी दशा में विवाह करेगा जिसमें ऐसा विवाह इस कारण से शून्य है कि वह ऐसे पति अथवा पत्नी के जीवन काल में होता है वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जायेगा और जुमनि से भी दंडनीय होगा।" इस धारा के लागू होने के लिए आवश्यक है कि विवाह करने वाले पक्षकारों के बीच पहले ही वैध रूप से विवाह सम्बन्ध विद्यमान हो तथा उसके बाद उसने किसी अन्य से विवाह कर लिया हो।

गोपाल बनाम राजस्थान राज्य, (1979) 3 S.C.C. 170 के मामले में यह कहा गया है कि यदि किसी विवाह को इस आधार पर शून्य घोषित किया जा सकता है कि उसके किसी पक्षकार ने पति अथवा पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह किया है तो इस प्रकार विवाह शून्य बनाते ही धारा 494 का प्रवर्तन प्रारम्भ हो जाता है। धारा 494 के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि-

  1. अभियुक्त व्यक्ति पहले से विवाहित हो,
  2. जिस व्यक्ति से अभियुक्त का विवाह हुआ था वह जीवित हो,
  3. अभियुक्त ने दूसरे व्यक्ति से पुनर्विवाह किया हो,
  4. पुनःविवाह पहली पत्नी अथवा पति के जीवन काल में किये जाने के कारण शून्य हो।

लिंगेरी ओबुलासा बनाम आई० वेंकट रेड्डी (क्रि० ला० रि० 1979 एस० सी० 439)


विवाह की वैधानिकता-धारा 494 के लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि पक्षकारों के बीच हुआ पहला ही वैध विवाह अस्तित्व में हो अर्थात् वैध विवाह के होते हुए पति अथवा पत्नी के जीवन काल में पुनर्विवाह करने पर ही धारा 494 लागू होगी। अपवाद-धारा 494 द्वारा स्पष्ट रूप से दो अपवादों का उल्लेख किया गया है-

  1. यदि सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय ने किसी विवाह को शून्य घोषित कर दिया हो तो पक्षकारों द्वारा पति अथवा पत्नी के जीवित रहते विवाह करना अपराध नहीं है।
  2. यदि विवाह के किसी पक्षकार ने पति अथवा पत्नी के बारे में निरन्तर सात साल से कुछ भी नहीं सुना हो अर्थात् उसे उसके बारे में कुछ भी सूचना नहीं मिली हो तो ऐसे व्यक्ति द्वारा पुनः विवाह करना अपराध नहीं है।

राधिका समीना बनाम शोहबीव नगर पुलिस स्टेशन हैदराबाद (1977 Cr. L.J. 1655) के मामले में अभिनिर्धारित किया गया कि यदि मुस्लिम पुरुष का विवाह विशिष्ट विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act, 1954) के तहत हुआ और यदि वह दूसरा विवाह करता है तो उसे इस धारा के तहत दोषी सिद्ध किया जा सकता है।



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पत्नी पर होने वाली निर्दयता के विरुद्ध उपबंध - Provisions against the cruelty towards wife




भारतीय समाज में विवाह को एक पवित्र संस्था माना जाता है, किन्तु अनेक मामलों में विवाहिता महिलाओं को पति अथवा उसके रिश्तेदारों द्वारा शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। विशेष रूप से दहेज की मांग को लेकर महिलाओं के साथ की जाने वाली प्रताड़ना को रोकने तथा उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में धारा 498A का प्रावधान किया गया था।

धारा 498A के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति, जो किसी स्त्री का पति है अथवा पति का रिश्तेदार (Relative) है, उस स्त्री के साथ क्रूरता (Cruelty) का व्यवहार करता है, तो वह दण्ड का भागी होगा। इस अपराध के लिए तीन वर्ष तक के कारावास तथा जुर्माने का प्रावधान है।

इस धारा के अंतर्गत “क्रूरता” का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसा कोई भी आचरण इसमें सम्मिलित है जिससे महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित होने की स्थिति उत्पन्न हो जाए या उसके जीवन, अंग अथवा मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँचे। दहेज की अवैध मांग को लेकर की जाने वाली प्रताड़ना भी इसी श्रेणी में आती है।

इस संबंध में वजीर चन्द्र बनाम हरियाणा राज्य (AIR 1989 SC 378) का निर्णय उल्लेखनीय है। इस मामले में नवविवाहिता से उसके पति, सास और ससुर द्वारा बार-बार दहेज एवं अन्य वस्तुओं की मांग की जाती थी तथा उसे प्रताड़ित किया जाता था। उच्चतम न्यायालय ने इसे धारा 498A के अंतर्गत क्रूरता माना और अभियुक्तों को दोषी ठहराया।

दूसरी ओर, बालकृष्ण नायडू बनाम राज्य (AIR 1992 SC 1581) के मामले में यह प्रश्न उठा कि संतान न होने के कारण पत्नी को परेशान करना क्या धारा 498A के अंतर्गत आएगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक प्रकार का वैवाहिक विवाद स्वतः धारा 498A के अंतर्गत नहीं आता। यदि परिस्थितियाँ दहेज या विधिक रूप से परिभाषित क्रूरता से संबंधित नहीं हैं, तो मामला अन्य उपयुक्त धाराओं, जैसे धारा 304 या अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के अंतर्गत विचारणीय हो सकता है।

अतः धारा 498A का मूल उद्देश्य विवाहिता महिलाओं को दहेज-उत्पीड़न एवं वैवाहिक क्रूरता से संरक्षण प्रदान करना है। यह प्रावधान महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान की रक्षा के लिए भारतीय दण्ड कानून का एक महत्वपूर्ण अंग है तथा समाज में महिलाओं के प्रति होने वाले अन्याय को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।



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