विधि का एक प्रसिद्ध सिद्धांत है — "De Minimis Non Curat Lex", जिसका अर्थ है कि "कानून तुच्छ या नगण्य बातों पर ध्यान नहीं देता।"
समाज में रहते हुए अनेक ऐसे छोटे-छोटे कार्य अनजाने में हो जाते हैं जो तकनीकी रूप से किसी अपराध की परिभाषा में आ सकते हैं, किन्तु उनसे होने वाली हानि इतनी नगण्य होती है कि उनके लिए न्यायालयों का समय और संसाधन खर्च करना उचित नहीं माना जाता।
उदाहरण के लिए, भीड़भाड़ वाली सड़क पर चलते समय किसी व्यक्ति का हल्का-सा धक्का लग जाना, अनजाने में किसी के पैर पर पैर पड़ जाना, किसी की कलम का क्षणिक उपयोग कर लेना अथवा अन्य ऐसी मामूली घटनाएँ, जिनसे कोई वास्तविक या गंभीर हानि नहीं होती, सामान्यतः कानून की दृष्टि में अपराध नहीं मानी जातीं।
इसी सिद्धांत को भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 95 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 में भी समान अवधारणा) में मान्यता दी गई थी। धारा 95 के अनुसार—
"कोई कार्य केवल इस कारण अपराध नहीं होगा कि उससे कुछ हानि हुई है या हानि पहुँचाने का आशय अथवा संभावना थी, यदि वह हानि इतनी तुच्छ हो कि साधारण समझ और स्वभाव वाला कोई व्यक्ति उसकी शिकायत करना उचित न समझे।"
धारा 95 के लागू होने की आवश्यक शर्तें
संबंधित कार्य तकनीकी रूप से अपराध की श्रेणी में आता हो।
उससे हुई हानि इतनी नगण्य या तुच्छ हो कि एक सामान्य एवं समझदार व्यक्ति उसकी शिकायत करना उचित न समझे।
प्रसिद्ध विधि-विशेषज्ञ हुदा ने इस प्रावधान पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि कोई भी विवेकशील व्यक्ति तुच्छ बातों को लेकर न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाता। भीड़भाड़ वाले स्थानों पर चलते समय किसी को हल्का धक्का लग जाना या किसी के पैर पर पैर पड़ जाना सामान्य सामाजिक जीवन का हिस्सा है। यदि ऐसी प्रत्येक घटना को अपराध मान लिया जाए तो सामाजिक जीवन का संचालन ही कठिन हो जाएगा।
हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हर छोटा कार्य तुच्छ नहीं होता। किसी कार्य को तुच्छ माना जाएगा या नहीं, यह उसकी प्रकृति, परिस्थितियों, उसके पीछे की मंशा तथा उससे हुई वास्तविक हानि पर निर्भर करेगा।
अतः यह सिद्धांत न्याय व्यवस्था को अनावश्यक मुकदमों से बचाने तथा न्यायालयों का ध्यान वास्तव में गंभीर और महत्वपूर्ण मामलों पर केंद्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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