अभिनंदन हे! मौन तपस्वी Abhinandan Hey Maun Tapasvi



अभिनंदन हे! मौन तपस्वी
अभिनंदन हे! मौन तपस्वी धीरोदात्त पुजारी!
तुम्हें जन्म दे धन्य हुई मां भारत भूमि हमारी!!
नव जीवन भर कर कण-कण में, बहा प्रेम रस धारा,
अमित राग मन में भर केशव साथर्क नाम तुम्हारा!
फिर बसंत की फूल रही है, आशा की फूलवारी…………
आज जागरण का स्वर लेकर मलियानिल के झोंके
प्रेम हृदय में भरते जाते कोटी कोटी सुमनों के
नव प्रभात हो रहा चतुदिर्क फैली फिर उजियारा ……।।१।। 
प्राची का मुख भी उज्ज्वल है केशव किरणें फैली
चला अंधेरा ले समेट कर अपनी चादर मैली
अंधकार अज्ञान ही त्यागी मिटी कालिमा सारी …………।। २।।
देव तुम्हारी पुण्य स्मृति में रोम रोम हषिर्त है
देव तुम्हारे पद पदमों पर श्रध्दांजलि अपिर्त है
केशव बन ध्रुव ज्योति दिखा दो जन मानस भवहारी…… ।।३।।


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नववर्ष के प्रथम शाम - एक यादगार वार्तालाप



सर्वप्रथम लोचको तथा आलोचकों को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई व शुभकामनाएं, नवरात्रि के प्रथम दिन की संध्‍या पर नीशू तिवारी का फोन आया। बड़ी गर्मजोशी के साथ जयरमी हुई बधाईयों को आदान प्रदान हुआ और चर्चाओ और परिचर्चा को दौर भी शुरू हुई। हमारे और नीशू के बीच अत्यधिक आत्मीय सम्बन्ध होने के कारण हम सभी विषयों पर खुलकर चर्चा करने है। यह जरूर खेद जनक रहा कि वर्ष 2010 की जुलाई मे मेरे दिल्‍ली मे रहने पर वह व मिथलेश जी दिल्‍ली में मिलने नही आये और उस समय न मिल पाने का कारण मुझे दिसम्‍बर 2010 में मिथलेश जी के साथ लखनऊ में उनके आवास पर ठहरने पर पता चला, कारण मुझे जैसे पता चला वैसे ही मिथलेश जी जितनी फजीहत किया वो मिथलेश जी ही बता सकते है। फिर नीशू जी की बात आई उनका उनका फोन काफी समय से नही मिल रहा था और मैने मिथलेश जी से कहा कि नीशू जी से जैसे भी हो सूचित करे कि मेरे से बात हो, नीशू जी का 5-6 घन्‍टे के अंदर फोन आ गया। बात करते हुये पता चला कि एक दो दिन मे इलाहाबाद मे आ रहे है तो दिल्‍ली मे न मिलने के कारण पर इलाहाबाद मे ही चर्चा होगी, जब इलाहाबाद आये नीशू तो जब दिल्‍ली का जिक्र मैने किया तो वो भी मुँह बना कर रह गये और और मैने कहा कि अब कोई भी बात कभी होगी आप मेरे से जिक्र जरूर करोगे।

इसी तर्ज पर नीशू जी ने कहा प्रमेन्द्र भाई मै चाह रहा हूँ कि आप दो तीन महीने के अंदर जबलपुर घूम जाइये मिलने का बड़ा मन कर रहा है और मैने और तारा जी ने मुंबई जाने का प्लान बनाया है, हाल मे ही जबलपुर से मुम्बई के लिये हवाई सेवा भी प्रारंभ हुई है। मैने बीच मे ही बात काटते हुए कहा कि भाई दिसंबर में लखनऊ से लौटा हूं, जनवरी में ही आवश्यक काम से के लिए आगरा जाने के लिये घर मे अनुमति लेनी है और फरवरी में फिर से ही अन्‍य आवश्‍यक काम से मुरैना जाने के लिए लेनी होगी। और अब आप भी प्रवास के लिए कह रहे हो यदि ऐसा ही चलता रहा तो हमारे लिये स्थाई आवास की व्यवस्था आपको करनी पड़ेगी और रही वायुयान की यात्रा का प्रश्‍न तो मुझे ऐसा लगता है कि जिस दिन मै यात्रा करूँगा और वो उड़ेगा तो.......... इस बात से ही मै सहम जा रहा हूँ। नीशू जी ने कहा प्रमेन्द्र भाई ऐसा कुछ नहीं होगा, आप कार्यक्रम तो बनाइये।

अभी अभी प्रात: नवभारत पर एक खबर (स्‍क्रीन शॉट) देखा तो इसके बाद क्‍या कहा जाये - :)



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इस्लाम की शिक्षा मूर्ति तोड़ना पवित्र कार्य



आज हमारे पाठ्यक्रम की पुस्तकें और तथाकथित बुद्धिजीवी इस्लामी विचारधारा को उदारवादी बताने के लिए तर्क देते हैं कि जब मुसलमानों ने मंदिर और मूर्तियां तोड़ी थी तो वो केवल धन लूटना चाहते थे, इस्लाम तो एक शांतिपूर्ण संप्रदाय है। इनके पूर्वज इतिहास कार ऐसे दोगले नहीं थे। वो मूर्तियों और मंदिरों को तोड़ना इस्लाम की शान समझते थे क्योंकि उन्हें कुरान और मोहम्मद के आदेश भली भांति पता थे। अपने इन घिनौने कृत्यों को वो अपनी एक उपलब्धि और इस्लाम की सेवा के रूप में करते थे और गर्व अनुभव करते थे।
जिस समय महमूद गज़नी सोमनाथ के मंदिर की मूर्ति को तोड़ने लगा तो वहाँ के ब्राह्मणों ने उस से आग्रह किया कि इस मूर्ति के प्रति लाखों हिंदुओं की श्रद्धा है इसलिए इसे न तोड़े, इसके लिए ब्राह्मणों ने उसे अपार धन देने का प्रस्ताव रखा। किंतु महमूद ने उनके प्रस्ताव को ये कह कर ठुकरा दिया कि वो इतिहास में बुत शिकन (मूर्ती तोड़ने वाला) के नाम से प्रसिद्द होना चाहता है, बुत फरोश (मूर्ति व्यापारी) के नाम से नहीं। उसने पवित्र लिंगम के टुकड़े टुकड़े कर दिए और उन में से दो टुकड़ों को गज़नी की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकने के लिए और दो को मक्का और मदीना की मुख्य गलियों में फेंकने के लिए भेज दिया ताकि जब मुसलमान वहाँ से जाएँ तो उन टुकड़ों को अपने पैरों से रौंदते हुए जाएँ। तारीख - ऐ - फ़रिश्ता - १, पृष्ठ ३३ 

उस समय का इतिहासकार अल बेरुनी लिखता है:-
महमूद ने सन १०२६ में मूर्ति को नष्ट किया। उसने मूर्ति के ऊपरी भाग को तोड़ने का आदेश दिया और बचे हुए को, जिस में सोना, आभूषण और सुन्दर वस्त्र चढ़े हुए थे। इस का कुछ भाग, चक्रद्वामी की मूर्ति जोकि कांसे से बनी थी और थानेसर (स्थानेश्वर) से लायी गयी थी, नगर के घोड़ों के मैदान में फेंक दी गयी। सोमनाथ से लायी मूर्ति का एक टुकड़ा गज़नी की मस्जिद दे द्वार पर पड़ा है, जिस पर अपने पांवों की मिट्टी और पानी साफ़ करते हैं।
अल बेरुनी - २, पृष्ठ १०३, खंड - १, पृष्ठ ११७
चलिए देखें कि औरंगज़ेब मूर्तियों के साथ क्या करता था। उस के जीवन से सम्बंधित मासिर - इ - आलमगिरी के अनुसार:-
जनवरी १६७० में, संप्रदाय के शंशाह ने मथुरा के मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया। भारी श्रम का के, उस के अधिकारियों ने कुछ ही समय में कुफ्र के उस घर का नाश कर दिया। उसके स्थान पर एक विशाल मस्जिद का निर्माण किया गया। छोटी और बड़ी मूर्तियां, जिन में मूल्यवान आभूषण जड़े थे और जो इस मंदिर में स्थापित थीं, आगरा ले आयी गयीं और बेगम साहिब की मस्जिद (जहानारा मस्जिद) की सीढ़ियों के नीचे दबा डि गयीं ताकि इमानवालों के पैरों तले रौंदी जाती रहें। मथुरा का नाम इस्लामाबाद रख दिया गया।
उल्लेखनीय है कि इस मंदिर का नवीनीकरण राजा वीर सिंह बुंदेला ने उस काल में ३३ लाख रुपये से करवाया था।
सिकंदर लोदी के समकालीन और उस के बाद के इतिहासकार बताते हैं कि सिकंदर लोदी ने हिन्दू मंदिरों की मूर्तियां तोड़ कर उनके टुकड़े मुसलमान कसाइयों को माँस तोलने के लिए दिए थे। जब वो एक राजकुमार था, तब उसने थानेसर (कुरुक्षेत्र) में हिंदुओं के स्नान पर्व पर निषेध की इच्छा जताई थी और सूर्य ग्रहण पर एकत्रित हिन्दुओं का वध करने की आज्ञा दी थी लेकिन उसे स्थगित कर दिया था। मथुरा और अन्य कई स्थानों पर हिन्दू मंदिरों को मस्जिदों और मुसलमान सरायों में परिवर्तित कर दिया था। कुछ मंदिरों को मदरसे और बाज़ार बना दिया था।

तारीख - ऐ - दौड़ी पृष्ठ ३९, ९६-९९। मख्जान - ऐ - अफगाना पृष्ठ ६५-६६, १६६। तबकात - इ - अकबरी पृष्ठ ३२३, ३३१, ३३५-३६। तारीख - ऐ - फ़रिश्ता - १, पृष्ठ १८२, १८५-८६। तारीख-इ-सलातीन-इ-अफगाना पृष्ठ ४७, ६२-६३
इतिहासकार शम्स सिराज अफिफ, जिसने सुलतान के साथ होने के कारण ऐसी घटनाएं देखी थी, मोहम्मद तुगलक और फिरोज तुगलक के लिए लिखता है: 
इन्हें ईमानदार मुसलमानों में से अल्लाह ने खासतौर से चुना है, इन्होने अपनी सल्तनत में जहां भी मंदिर और मूर्तियां देखीं, उन्हें तोड़ दिया।
Elliot and Dowson, Vol। 3, pp - 318
फिरोज तुगलक को इस घृणित कार्य के लिए किसी और की प्रशंसा की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वो अपने इस पवित्र कार्य का वर्णन अपने शब्दों में इस प्रकार कर रहा है:
जहां भी काफिर और मूर्ति पूजक (मुशरिक) मूर्ति पूजा करते थे, वहाँ अल्लाह के रहम से अब मुसलमान सच्चे अल्लाह की नमाज़ करते हैं। मैंने काफिरों की मूर्तियों और मंदिरों को नष्ट कर के उनके स्थान पर मस्जिदें बना दी हैं।
तारीख ऐ फ़िरोज़ शाही (ELLIOT & DOWSON VOL।3, PP 380)
मुसलमानों द्वारा गर्व से लिखे गए उनके शब्द यहाँ बताने का उद्देश्य भारतवासियों को ये दिखाना है कि किस प्रकार एक आसुरी प्रवृति ने हमारे पूर्वजों पर अन्याय किया था। मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ने का उद्देश्य था हिंदुओं को नीचा दिखाना और उनका मनोबल तोड़ना। हिन्दू सभ्यता पर ये अत्याचार इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया है।
ये सब आसुरी शासक वही सब कर रहे थे जो बारहवीं सदी के अंत में दिल्ली पर विजय प्राप्त करने वाले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था। उसने सबसे पहला जो आदेश दिया वो था भव्य निर्माण का ताकि नए जीते गए लोगों पर धाक बैठाई जा सके। भवन निर्माण को मुसलमान राजनैतिक शक्ति और विजय का प्रतीक मानते थे। जो पहले दो निर्माण उन्होंने किये वो थे क़ुतुब मीनार और मस्जिद कुव्वत उल इस्लाम। इस मस्जिद का निर्माण ११९५ में आरम्भ हुआ और इसे बनाने में २७ हिन्दू और जैन मंदिरों की सामग्री का उपयोग किया गया।
यहाँ दो तथ्य ध्यान देने योग्य हैं, पहला तो जो इस मस्जिद का नाम है कुव्वत उल इस्लाम उस का अर्थ है इस्लाम की शक्ति। दूसरा कि इसके लिए २७ हिन्दू और जैन मंदिरों की सामग्री का उपयोग किया गया है, ये आज भी वहाँ फ़ारसी में शान से लिखा हुआ है।
क़ुतुब मीनार का निर्माण कुतुबुद्दीनऐबक के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने पूरा किया और इसमें भी वैसी ही सामग्री का प्रयोग है। नक्काशी किये हुए पत्थरों को बिगाड़ कर अथवा उन्हें उल्टा लगा कर इस का निर्माण किया गया है।


इन के निर्माण के लगभग १२५ वर्ष पश्चात जब इब्न बतूता नामक यात्री भारत आया तो वो मस्जिद कुव्वत उल इस्लाम के संबंध में लिखता है:
पूर्वी द्वार के पास दो विशाल मूर्तियां पड़ी हैं जो ताम्बे से निर्मित हैं और पत्थरों के द्वारा परस्पर जुड़ी हैं। हर कोई आने जाने वाला इन पर पाँव रख कर जाता है। इस मस्जिद के स्थान पर एक बुतखाना (मंदिर), अर्थात मूर्ति घर था। दिल्ली की फतह के बाद इसे मस्जिद में तब्दील कर दिया गया।
Ibn Battutah, p। 27; Rizvi Tughlaq Kalin Bharat, vol। I, p। १७५
ये जो गिनी चुनी घटनाएं यहाँ प्रस्तुत की हैं, ऐसी ही दुःख और बेबसी से भरी घटनाओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। इन घटनाओं में कहीं ऐसा प्रतीत होता है कि ये दरिंदगी से भरे कृत्य धन के लोभ में किये गए थे। लेकिन यदि आप सरकारी पदों और विश्वविद्यालयों पर आसीन इतिहासकारों से इस विषय में पूछेंगे तो उन्हें ये घटनाएँ या तो दिखाई नहीं देती अथवा वो हिंदुओं द्वारा किये गए घृणित कार्यों की दुहाई देने लगते हैं। लेकिन उन से इस के प्रमाण मांगो तो वो उनके पास नहीं होते।

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