अर्थशास्‍त्र बनाम चिठ्ठाशास्‍त्र



पिछली पोस्‍ट पर मैने समयाभाव के कारण ब्‍लाग पर न लि‍ख पाने की असर्मथता जाहिर किया था। जिस पर कई वरिष्‍ठ तथा सदैव सहयोग की भावना रखने चिठ्ठाकारों की अमूल्‍य टिप्‍पणी प्राप्‍त हुई थी, जो मुझे सदैव प्रेरणा देती रहेगी।
जब से न लिखने बात की है मन घोर अशांत हो गया था, कुछ सुझ नही रहा था सोचा था कि चिठ्ठा लेखन छोड़ने से पढ़ाई मे ध्‍यान लगेगा किन्‍तु हुआ, इसके विपरीत। आज जब पढ़ने बैठा अर्थशास्‍त्र की पुस्‍तको को लेकर बैठा तो कुछ खोया-खोया से लग रहा था, पर क्‍या खोया था इसकी जानकारी मुझे नही थी। पर जब कुछ ज्‍यादा ध्‍यान देकर बैठा अर्थशास्‍त्र की जगह समने चिठ्ठाशास्‍त्र की फोटो मौजूद थी। आखे तो किताबों के अध्‍ययन मे थी किन्‍तु दिमाग मे चिठ्ठे की पोस्‍ट की रचना हो रही थी। मुझे लग कि यह क्‍या हो रहा है। मै एक गड्डे को पाटने के लिये दूसरा गड्डा खोदा दूसरा गड्डा तो और भी घातक सिद्ध हो रहा था। तभी संजय भाई की टिप्‍पणी याद आई कि ‘इतनी जल्दी 'लागी छुटे ना' आपकी अगली प्रविष्टी की प्रतिक्षा रहेगी.’। सही मे ‘लागी छूटे न’ वो गाना याद आ गया कि मेरी चुनरी मे लागा दाग़ छुटाऊ कैसे, मानो वह गाना मेरे लिये ही लिखा गया है कि लागा ब्‍लागिंग का रोग ठीक होऐगा कैसे? मैने आपने अन्‍त:करण के डाक्‍टर से इसका इलाज पूछा कि क्‍या है इसकी दवा क्‍या है तो उत्‍तर मिलता है कि लोहा लोहे को काटता है, इसी प्रकार इसका इलाज है कि चालू करो कम्‍प्‍युटर और शुरू हो जाओं। चूकि जब से न लिखने की बात कही है तब से पढ़ने मे भी मन नही लग रहा था आज पूरे दिन पढ़ रहा था अर्थशास्‍त्र पर मेरा 100% ध्‍यान चिठ्ठाशास्‍त्र पर ही था। आज पूरे दिन मेरे दिमाग मे एक एक पोस्‍ट की छवि घूम रही थी।
एक बात का संशय भी मन मे घर किये जा रहा था कि एक बार कहा कि लिखना छोड़ रहा हूँ, और दूसरी बार लिखने लगूँगा, तो लोग हसेंगे, और बात बोलेगे कि रहा नही गया और फिर आ गया। फिर दिव्‍य नेत्र खुले और अर्न्‍तामा की आवाज़ आई कि लोगो का काम ही है कहना किस-2 से बचते फिरोगे के एक न एक दिन समाना करना ही होगा। वह दिन आज क्‍यों न हो? और आत्‍मा की आवाज़ को सुन कर फिर से चालू हो रहा हूँ। मन को लगा कि जब हम खाने के लिये समय निकाल रहे लेते है, अपने अन्‍य काम के लिये समय निकाल लेते है। तो एक काम के लिये दूसरे काम को त्‍यागना कहाँ तक उचित है। हॉं यह जरूरी नही है कि जितना पर्याप्‍त समय पहले दिया जाता था उसमे कुछ कटौती कर समय संयोजन आवाश्‍यक है।
वैसे सागर भाई कि टिप्‍पणी ने को भी इस का श्रेय जाता है वे अगर टिप्‍पणी न करते तो शायद मै न लिख पाता। उन्‍होने कहा था कि प्रमेन्द्र जी बहुत अच्छा लिखने लगे हो, जाते कहाँ हो अभी तो प्रतीक भाई के जैसे और कई प्रश्नों का जवाब अभी देना बाकी है।जब बचकानी हरकतें करते थे तब डटे रहे और जब समझदारी आई है तो छोड़ कर जाना चाहते हो, क्या हमारे प्यार से दूर हो पाओगे आप? जल्दी से अगला लेख लिखो यह बड़े भाई का आदेश है। मैने हमेशा ही सागर भाई के आदेश को शिरोधर्य किया हूँ, सागर भाई की प्रत्‍येक बात मेरे लिये आदेश के समान होती है। उनकी नजर मे मै अब समझदार होगया हूँ, एक तरफ वे कह रहे है कि मै समझदार हूँ दूसरी तरफ मै बचकानी सोच जगृत कर रहा था। सागर वे ऐसे शक्‍श है जो मेरी हर हरकत पर निगरानी रखते है। मै कोई भी हरकात करता हूँ तो उनका मेल मुझे सदा मिल जाता है। हॉं यह गलत है। काफी हद तक बिना सोचे समझे मै गलत मान भी लेता हूँ । उनकी टिप्‍पणी रूप मे चिठ्ठा लिखने के लिये आदेश मिला जिसे मेरा मन बिल्‍कुल भी मानने का नही कर रहा था किन्‍तु परिस्‍थितियों ने उनके आदेश को मनवा ही दिया।
समीर जी ने कहा कि कहाँ जा रहे हो, सन्यासी. कौन से जंगल में ?अरे समीर जी मै तो जा रहा था राधा पर शोध करने पर हाल वही हुआ। कहावत है न आये थे हरि भजन को ओटन लगे कापास। अब काहे न ओटना पड़े कापास क्‍याकि हरि पर समीर जी ने जो कब्‍जा कर लिया है।
डा. साहब कहते है- अरे भाई अभी तो मेरे सवालों का भी जबाब देना है , प्रमेन्द्र, ऐसे ही जाने न दूगाँ, बस कुछ दिन इंतजार करो।
डा. साहब अब मै आ गया हूँ, प्रश्‍नोत्‍तरी चालू कर सकते है।
उन्‍मुक्‍त जी, जाना तो चाह रहा था किन्‍तु जा न सका,ब्‍लागर ही मेरी पंसद है।
खैर आप सब महानुभाव को कष्‍ट दिया आपने मन को व्‍य‍थित किया इसके लिये क्षमा प्रार्थी हूँ, पहले मेरा मानना था कि लेखक को क्षमा माँगना सोभा नही देता है, पर आज महसूस हो रहा हैंकि कभी कभी समय से समझौता करना चाहिये। गलत रहते पर अडे़ रहे पर बडा़ई नही है, बड़ाई नम्र होने पर है।


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5 comments:

Pratik Pandey said...

कहावत है - देर आयद दुरुस्त आयद। लेकिन आपके आने में देरी नहीं हुई। बढ़िया है :-)
वैसे, पढ़ाई पर ध्यान देना भी बहुत ज़रूरी है।

संजय बेंगाणी said...

भैये पढ़ाई-लिखाई पर भी ध्यान देना नहीं तो हम पर आरोप लगेगा की गलत लाइन से बाहर जा रहा था और आपने फिर से खिंच लिया. :)
मन का गुब्बार चिट्ठे पर निकालो फिर शांत मन से पढ़ाई करो.

सागर चन्द नाहर said...

एक बार फ़िर से स्वागत है, प्रमेन्द्र जी।
आशा है अन्तिम तीन चार प्रविष्टियाँ जो किसी शोध पत्र के दर्जे की सी थी, और पढ़ने को मिलेंगी।:)
और हाँ जिअसा उपर भाइ लोगोंने कहा है मैं भी कहना चाहूंगा कि चिठ्ठा लिखने और पढ़ने की वजह से पढ़ाई का अगर हर्जा ना हो, इस बात का ध्यान रहे।

Udan Tashtari said...

वाह भाई, यह अच्छा रहा कि आप जंगल यात्रा पर जाने से रुक गये. वरना वहां तो चिट्ठा वगैरह चलता नहीं, अपना अखबार ही निकालना पड़ता. पैसे के पैसे लगते और पढ़ाई का हरजाना अलग. :)

अब पढ़ाई में ध्यान देते हुये, मात्र मंनोरजन के लिये पढ़ते पढ़ाते रहिये. शुभकामनायें.

mahashakti said...

आप सभी के प्‍यार भरी टिप्‍पणी के लिये धन्‍यवाद