इलाहाबाद के डा. रोहित गुप्‍ता द्वारा मरीज के साथ किया गया अनुचित‍ चिकित्‍सीय अभ्‍यास



आप किसी भी सार्वजनिक पेशे से जुड़े हो ईमानदारी के साथ काम करने की आदत डालना चाहिये, चाहे तो वह डाक्टरी पेश हो या फिर वकालत का यह भी फिर कोई अन्य भी..

हाईकोर्ट शीतकालीन अवकाश के बाद कुछ तबियत नसाज रही, पहले तो आम समस्या लगी किन्तु जब तकलीफ बढ़ी तो गल्ट क्लीनिक के गेस्टोलाजिस्ट डा. रोहित गुप्ता से सम्पर्क किया, उन्होने बकायदा ₹800/- चार्ज किया और समास्या सुनने के बाद तुरंत ही अपने ही गल्ट क्लीनिक के विजन अल्ट्रासाउंड केन्द्र मे भेज दिया कि वहां से रिपोर्ट लेकर उनको दिखाऊ और साथ ही साथ डा. साहब ने कुछ जांच के साथ क्लोनोस्कोपी जांच के लिये भी पर्चे पर लिख दिया।

अल्ट्रासाउंड के लिये गया, तो पता चला कि अल्ट्रासाउड की डा. रक्षा गुप्ता जी, डा. रोहित गुप्ता जी की पत्नी है, वहां भी ₹1000/- की रसीद कट गई। सबसे बड़ी समस्या यह है प्रत्येक डाक्टरों के साथ की सबकी जांच केन्द्र फिक्स है और मरीस अपनी जांच किसी अन्य जगह से कराने के लिये स्वतंत्र नही है।

अल्ट्रासाउंड मे सब कुछ सामान्य निकला, रिपोर्टानुसार लीवर मे हल्की सूजन की शिकायत आई और डा. रक्षा गुप्ता ने पुन: गेंद अपने पति डा. डा. रोहित गुप्ता के पाले मे क्लोनोस्कोपी के लिये डाल दी। मै रिपोर्ट लेकर पुन: डाक्टर रोहित के पास गया, तो उन्होने क्लोनोस्कोपी जांच के लिये कहा और कहा कि ये दवा कल पीकर खाली पेट आना है तब यह जांच होगी।

उनके ही कैम्पस मे मेडिकल स्टोर की, सुविधा भी विद्यमान थी, पीने की दवा भी ₹750/- के भुगतान पर प्राप्त हुई। शाम तक अपने एक मित्र जो बीएचयू एमडी की पढ़ाई कर रहे थे, उनको मैने पूरी समास्या और अल्ट्रासाउड रिपोर्ट और डाक्टर साहब के पर्चे दिखाया तो उन्होने क्लोनोस्कोपी न करवाने की सलाह दी और उनका कहना था कि क्लोनोस्कोपी एक मंहगी और दर्ददायक जांच प्रकिया है। फिर उन्होने कुछ सामान्य रक्त जांच करने को कहा, जो मैने अगले दिन ही करवा लिया। जांच के बाद उन रिपोर्ट को पुन: अपने मित्र को भेज दिया और उसका अध्ययन करके उन्होने कहा कि आपको क्लोनोस्कोपी की कोई आवाश्यकता नही है। इस रिपोर्ट के साथ आप इलाहाबाद के किसी अच्छे एमडी को दिखा लीजिये जो भी दवा देगे आपको पूरा आराम मिलेगा। मित्र की सलाह के बाद किये इलाज से काफी आराम मिल रहा है।

सबसे बड़ी बात यह है कि डा. रोहित गुप्ता जो ₹800/- परामर्श शुल्क चार्ज करने के बाद भी उचित परामर्श न दे और पीडित को और पीडित करें तो यह मेडिकल प्रेक्टिशनर के लिये कितना उचित है। इस पर एक चर्चा तो होनी ही चाहिये। डा. रोहित गुप्ता द्वारा अपनाई गई प्रकिया अनुचित चिकित्सीय अभ्यास है और अपने मरीज के साथ धोखा भी।




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भाजपा की आत्मघाती नीति



भाजपा ने जगदण जीत ली, मोदी जी ने भी बधाई दी...
 
गौरतलब हो कि कांग्रेस ने कुंवर जी बावलिया को नेता विपक्ष नही बनाया तो बावलिया ने भाजपा विरोध की नीति त्याग कर मंत्री पद के साथ भाजपा को दिल दे बैठे. गजब की राजनीति है कि जो भाजपा विरोध के लिए नेता विपक्ष के लिए लड़ रहा था वो मंत्री पद के साथ भाजपा के साथ खड़ा है.बावलिया की निष्ठा किसके प्रति मानी जाए, जो बावलिया नेता विपक्ष (भाजपा विरोध का पद) के लिए कांग्रेस छोड़ दिये, उसकी भाजपा पूजा कर रही है, ऐसे लोगो तक के लिए मोदी जी भी ट्वीट कर रहे है.
 
गुजरात की जसदण विधानसभा सीट पर उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार कुंवरजी बावलिया 19,500 से अधिक मतों से जीत गए हैं. उन्होंने कांग्रेस के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी अवसर नाकिया को हराया है. नाकिया राजकोट जिला पंचायत के सदस्य हैं, जिन्होंने कांग्रेस में बावलिया के साथ करीब से काम किया था. वह जहां पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं बावलिया विगत में कांग्रेस के टिकट पर पांच बार विधायक रह चुके हैं.
 
प्रभावी कोली समुदाय के नेता बावलिया ने साल 2017 में जसदण सीट कांग्रेस के टिकट पर जीती थी, लेकिन बाद में वह कांग्रेस और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए. इस कारण इस सीट पर उपचुनाव जरूरी हो गया था. बावलिया ने दो जुलाई को इस्तीफा दिया था और उन्हें उसी दिन भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बना दिया गया था.


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अधिवक्ता परिषद् उत्तर प्रदेश



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अधिवक्ता परिषद उ. प्र. का विधि के क्षेत्र में, हिंदू समाज के अंतिम व्यक्ति के लिए उपयोगिता और प्रांसगिकता ! राष्ट्रीय अधिवेशन के परिपेक्ष में..

एक्जिट पोल टीवी के लिए तो अधिवक्ता परिषद सेमिनार के लिए बहुत ही रोमांचक कार्यक्रम बनाते है..

दोनो की खूबी है कि आज तक कोई नही बोला कि उसे कोई एक्जिट पोल वाला मिला और न कि कोई बोलने को तैयार है अधिवक्ता परिषद की कोई निःशुल्क रिलीफ उसे मिली, किन्तु दोनो का कार्यक्रम प्रजेंटेशशन बड़ा ही धाकड़ होता है जिसका वास्तविकता से कोई सरोकार नही होता है..

वास्तविकता यह है कि एक्जिट पोल के 2 दिन बाद आया मुख्य परिणाम एक्जिट पोल और अधिवक्ता परिषद दोनो की पोल खोल देता है और तय कर देता है कि अगले 5 साल अधिवक्ता परिषद की दुकान खुली रहेगी अथवा बंद.

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2015 में अधिवक्ता परिषद हाईकोर्ट यूनिट के कुछ पदाधिकारियों ने बंगलोर अधिवेशन से दूरी बनाए रखी थी...

वे इस असमंजस में थे कि 2017 के विधानसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा...

लखनऊ से व्हाट्सएप पर परिषद की सुखद स्थिति के रुझान आ रहे है, वे सरकारी फसले भी लखनऊ में लहलहा रही है जो बंगलौर में सूखे के डर बोये जाने से बच रही थी..

ये मौकापरस्ती की फसलें हैं, जो मौसम विज्ञान को ध्यान में रख कर बोये जाने या न बोये जाने का डिसीजन लेती है..

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करीब 1 माह से अधिवक्ताओ के मध्य ऐसी खबर है कि सरकारी वकीलों नई लिस्ट नए साल में आने वाली है...

जो अधिवक्ता राष्ट्रीय सेमिनार में प्रतिभाग करेगा उसका चयन अगली सरकारी अधिवक्ताओ वाली लिस्ट में जरूर होगा...

कुछ लखनऊ जाने वाले सरकारी और सरकारी अधिवक्ता उम्मीदवारों से बात से लगा कि जो सरकारी वकील नही जाएगा उसका नाम अगली लिस्ट से कट जाएगा..

कहीं न कहीं कट जाने का डर ने आतंक रूप धर लिए जैसा कि नसीरुद्दीन_शाह को हुआ था. अब डर ही है कि जो कभी भुबनेश्वर और बंगलोर अधिवेशन नही गया वह लखनऊ अर्जी डालने पहुंच रहा है..

अब ये बताओ कि जिसने 2012 में भुबनेश्वर और 2015 में बंगलोर के राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रतिभाग किया, उसका घंटा कहीं चयन नही हुआ, तो 2018 में क्या लखनऊ सेलेक्शन कमेटी बैठी है जो चयन करेगी?

किसी न किसी का डर दिखा कर कुछ भी करवा लेने वालों की कमी नही, और कुछ पाने के लिए कुछ न कुछ भी कर डालने वालों की कमी नही, बस जरूरत है वही करने की जो जरूरी है, जिसके लिए आप उपयुक्त हो यही आपका हुनर है...

एक_वकील_का_काम_सिर्फ_और_सिर्फ_वकालत_करना_है, कुछ भी करना नही..

आपको अपने हुनर पर भरोसा हो तो डर के आगे जीत है...


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