बिना पुरुष के भी मां बनना संभव!



वैज्ञानिकों ने मानव अस्थिमज्जा से ही शुक्राणु कोशिकाएं विकसित करने की ऐसी तकनीक विकसित कर ली है, जिससे अब संतान उत्पत्ति के लिए महिला को पुरुष की जरूरत नहीं होगी।

वैज्ञानिकों का दावा है कि इससे उन कैंसर रोगियों को भी लाभ मिल सकेगा जो कीमोथेरेपी की वजह से संतान उत्पत्ति के लायक नहीं रह जाते। लंदन की पत्रिका डेली मेल में प्रकाशित एक ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। इससे जहां लाखों करोड़ों लोगों को आशा की एक किरण नजर आई है वहीं कई पक्षों ने इस तरह विकसित की गई शुक्राणु कोशिकाओं के दुरुपयोग पर नैतिक सवाल उठाया है। भारतीय प्रजनन विशेषज्ञ इस वैज्ञानिक कामयाबी पर खुश हैं। न्यू टेक मेडीव‌र्ल्ड की डॉ. गीता सर्राफ को उम्मीद है कि यह तकनीक कुछ वर्षो में ही अपने देश में उपलब्ध हो जाएगी। भारतीय संदर्भ में इस तकनीक के सामाजिक परिणामों के बारे में उनका कहना है कि यह एक तकनीकी कामयाबी है और इसका इसी रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।

आलोचकों का कहना है कि इससे नैतिकता की सीमाएं टूटेंगी और पुरुष की भूमिका गौण हो जाएगी। इस नई प्रक्रिया का इस्तेमाल कर वैज्ञानिक प्रयोगशाला में ही शुक्राणु विकसित कर संतानहीन तथा बांझ महिलाओं की मदद कर सकेंगे। इस प्रक्रिया से शुक्राणु कोशिकाएं विकसित करने की तकनीक को लेकर ब्रिटेन में सरकारी स्तर पर भी भ्रुकुटियां तननी शुरू हो गई हैं। वैज्ञानिकों को आशंका है कि ब्रिटिश सरकार इस प्रकार के अनुसंधान कार्यो तक के लिए कृत्रिम शुक्राणु कोशिकाएं विकसित करने पर कानून में फेरबदल लाकर पाबंदी लगा सकती है।

इस प्रक्रिया के तहत मानव की अस्थिमज्जा से स्टेम सेल निकालकर उन्हें प्रयोगशाला में विकसित किया जाता है और फिर उन्हें उन विशेष कोशिकाओं में बदलने दिया जाता है, जिनसे शुक्राणु पैदा होते हैं।

जर्मनी की यूनीवर्सिटी आफ गौटिंजन में यह अनुसंधान करने वाले प्रोफेसर नेयरनिया का कहना है कि ये विशेष कोशिकाएं लगातार शुक्राणु नहीं पैदा करतीं, लेकिन उन्हें आशा है कि जल्दी ही यह भी संभव हो जाएगा। प्रोफेसर नेयरनिया का कहना है कि वह पहले ही यह दिखा चुके हैं कि किस प्रकार चूहे के भ्रूण से निकाली गई स्तंभ कोशिका से प्रयोगशाला में पूरी तरह सक्रिय शुक्राणु विकसित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे शुक्राणु से अंडाणु तैयार हुए जिनसे छह चूहे के बच्चों का जन्म हुआ। प्रोफेसर नेयरनिया ने कहा कि ये बात और है कि चूहे के बच्चे जीवित नहीं रह पाए थे।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अस्थि मज्जा में से ही स्तंभ कोशिका तैयार करने की वजह से प्रयोगशाला में विकसित कोशिकाओं को स्वीकार नहीं करने की आशंका भी समाप्त हो जाती है। उनका कहना है कि शुक्राणु कोशिकाओं बनने में मदद करने वाली सरटोली समेत अन्य कोशिकाओं को भी शामिल किया जा सकता है। प्रोफेसर नेयरनिया ने कहा है कि वह अपनी इस सफलता से काफी उत्साहित हैं तथा इसके बाद अब उनका अगला लक्ष्य स्परमैटागोनियल स्तंभ कोशिका विकसित करनी होगी, ताकि प्रयोगशाला में ही शुक्राणु तैयार किया जा सके। उन्होंने कहा कि इसमें तीन से पांच वर्ष तक का समय लग सकता है। प्रोफेसर नेयरनिया ने कहा है कि अगर उनका यह प्रयोग भी सफल रहा तो कीमोथैरेपी के कारण संतान उत्पत्ति की क्षमता खो चुके पुरुषों को लाभ मिल सकेगा।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा भी हो सकता है कि संतानोत्पत्ति को बढ़ाने के लिए कभी जादुई गोली भी तैयार की जा सकेगी। हालांकि साथ ही यह भी आशंका व्यक्त की गई कि प्रयोगशाला में विकसित अंडाणुओं और शुक्राणुओं को मिलाकर पूरी तरह से कृत्रिम तरीके से बच्चे पैदा किए जा सकेंगे।

पत्रिका में कहा गया है कि इस प्रक्रिया से समलैंगिक जोड़ों को भी संतान का सुख मिल सकेगा। ब्रिटिश फर्टिलिटी सोसाइटी के सचिव डॉक्टर ऐलन पेसी ने इस प्रकार शुक्राणु और अंडाणु विकसित करने पर पाबंदी लगाने के औचित्य को नकारते हुए कहा है कि इस पर पूरी तरह पाबंदी लगाना सर्वथा अनुचित होगा तथा सुरक्षा के आधार पर लगने वाली किसी भी प्रकार की पाबंदी केवल तभी लगाई जानी चाहिए जब किसी भी उपचार से जुड़े सभी खतरों की पूरी तरह जांच कर ली जाए।

ब्रिटेन का स्वास्थ्य मंत्रालय इस प्रकार से कृत्रिम तरीके से भ्रूण और अंडाणु विकिसित किए जाने के खिलाफ है तथा इन पर पाबंदी लगाए जाने के पक्ष में है। उसका कहना है कि ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन तथा कई संगठन भी ऐसा ही चाहते है।


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