रोज गार्डेन भाग-1



(मेरे दिल्ली यात्रा के दौरान बोरियत भरे कुछ क्षणों को व्यतीत करने के लिए पास के ही बने रोज गार्डेन में गया। जहां पर मुझे कुछ अजीबो-गरीब दृश्य नजर आये। जिसने मेरे जेह़न में चल मचा दी और कुछ लिखने को विवश किया सो मैनें लिख डाला आप भी पढ़िये और आनन्द लीजिए। )

मेरे सामने एक मुसाफि़र गज़ल गा रहे हैं।
गज़ब देखकर फिर मचल जा रहे है।।
वो गुलाबों का बागीचा, था पानी से सींचा,
चलते ही चलते फिसल जा रहे है।
वो पक्षियों की चहचहाहट, बादलों की गड़गड़ाहट,
डालकर बाहों में बांह युगल जा रहे है।
वो मौसम हसीना, न आये पसीना,
देखते ही देखते `वो´ बदल जा रहे हैं।
शुरू हो गई बरसात, पूरी हुई नहीं है बात,
बादल भी ऐस दखल दिये जा रहे है।
वो फूलों की खुश्बू, न कोई थी बदबू,
`बाबा´ के रेडियो पर भी गज़ल आ रहे है।
वो पानी की बूंदे, कोई आंख तक न मूंदे,
हम भी ऐसे किये पहल जा रहे है।
बैठ गये महफिल में, कोई नहीं मंजिल में,
बूढ़े भी चहल-पहल किये जा रहे है।
वो `बाबा´ की दीवानगी, सखी-सहेली थी बानगी,
अब तो महफिल भी एकदम विरल हो रहे है।


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6 comments:

tanha kavi said...

ताराचंद जी ये बाबा कौन हैं, जरा इनकी भी खबर दें।और रही बात रोज गार्डन की तो वहाँ तो शब-औ-रोज यही होता है।हम केवल कहने की मुद्रा में तब तक रहते हैं जब तक हमारे साथ कोई "रोज" न हो। जहाँ कोई रोज हमसे गलबहियाँ डाले होती है, हम कहते नहीं , बस महसूस करते हैं। दुआ करता हूँ कि आपको भी कोई "रोज" जल्द हीं मिले।
आमीन!

-विश्व दीपक 'तन्हा'

Udan Tashtari said...

भाव तो ठीक हैम जाअ रचना के शिल्प पर गौर करें..टूटा हुआ पठन लग रहा है..अन्यथा न लेना मगर एकरुपता मिसिंग है...लेखन में..भाव में समझ पाया और उसके लिये बधाई.

revolution said...

nice gazal, pls send more .. and introduce the composer...

Anonymous said...

आपने लिखा, हमने पढा. ये बीच से आनंद गायब है. अगर आप रोज गार्डन में मिले एहसासों को आधार बनाकर ऎसी ग़ज़ल लिखेंगे, तो बस स्टाप पर मिले एहसासों से क्या-क्या लिखेंगे, साहब?

ग़ज़ल की ऎसी दुर्गति! मैंने पहले नहीं देखी थी, चलो आज वो भी देख लिया.

Tara Chandra Gupta said...

tanha ji ye baba sirf BABA hi the.
rahi bat udan tashtari ji ko to mai kavita, gazal nahi likhta lekin prayas kiya hi. kaise likha jata hi mughe nahi malum.
benami ji jisne sankriti ki durgati ki hi uski durgati to hogi hi. mai gazal nahi kisi aur ki bat................................

Rakesh Pasbola said...

भाई पढ़ने के बाद लगा कि क्यूं पढ़ा. आपको हतोत्साहित करना मेंरा मक्सद नही लेकिन सच में समझ से परे है. या यूं कह लीजिए मै नासमझ हूं