गांधी का ब्रह्मचर्य और स्‍त्री प्रसंग



नेहरू के विभिन्‍न स्‍त्रियों से सम्‍बन्‍धो की चर्चा तो हमेशा होती ही रही है किन्‍तु अभी गांधी जी के स्‍त्रियों के के सम्‍बन्‍ध पर मौन प्रश्‍न विद्यमान है। गांधी जी ने अपनी पुस्‍तक सत्‍य के प्रयोग में अपने बारे में जो कुछ लिखा है उसमें कितना सही है, यह गांधी से अच्‍छा कौन जान सकता है? गांधी जी के जीवन के सम्‍बन्‍ध में अभी तक इतना ही जाना जा सका है जितना कि नवजीवन प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। आज गांधी की वास्‍तविक स्थिति हम अनभिज्ञ है, बहुत से बातों में गांधी को समझ पाना कठिन है। गांधी की नज़रों में गीता माता है, पर वे गीता के हर श्‍लोक से बंधे नही थे, वह हिन्‍दू धर्म को तो मानते थे किन्‍तु मंदिर जाना अपने लिये गलत मानते थे, वे निहायत आस्तिक थे किन्‍तु भगवान सत्‍य से बड़ा या भिन्‍न हो सकता है उन्‍हे इसका सदेह था ठीक इसी प्रकार ब्रह्मचर्य उनका आदर्श रहा, लेकिन औरत के साथ सोना और उलंग होकर सोना उनके लिये स्‍वाभाविक बन गया था।

गांधी के सत्‍य के प्रयोगों में ब्रह्मचर्य भी प्रयोग जैसा ही था, विद्वानों का कथन है कि गांधी जी अपने इस प्रयोग को लेकर अपने कई सहयोगियों से चर्चा और पत्रचार द्वारा बहस भी की। एक पुस्‍तक में एक घटना का उल्‍लेख किया जाता है - पद्मजा नायडू (सरोजनी नाडयू की पुत्री) ने लिखा है कि गांधी जी उन्‍हे अकसर चिट्ठी लिखा करते थे ( पता नही गांधी जी और कितनी औरतो को चिट्ठी लिखा करते थे :-) ), एक हफ्ते में पद्मजा के पास गांधी जी की दो तीन चिट्ठियाँ आती है, पद्मजा की बहन लीला मणि कहती है कि बुड्डा (माफ करे, गांधी के लिये यही शब्‍द वहाँ लिखा था, एक बार मैने बुड्डे के लिये बुड्डा शब्‍द प्रयोग किया था तो कुछ लोग भड़क गये थे, बुड्डे को बुड्डा क्‍यो बोला) जरूर तुमसे प्‍यार करता होगा, नही तो ऐसी व्‍यस्‍ता में तुमको चिट्ठी लिखने का समय कैसे निकल लेता है ?

लीला मंणि की कही गई बातो को पद्मजा गांधी जी को लिख भेजती है, कि लीलामणि ऐसा कहती है। गांधी जी का उत्‍तर आता है। '' लीलामणि सही ही कहती है, मै तुमसे प्रेम करता हूँ। लीलामणि को प्रेम का अनुभव नही, जो प्रेम करता है उसे समय मिल ही जाता है।'' पद्मजा नायडू की बात से पता चलता है कि गांधी जी की औरतो के प्रति तीव्र आसक्ति थी, यौन सम्‍बन्‍धो के बारे में वे ज्‍यादा सचेत थे, अपनी आसक्ति के अनुभव के कारण उन्हे पाप समझने लगे। पाप की चेतना से ब्रह्मचर्य के प्रयो तक उनमें एक उर्ध्‍वमुखी विकास है । इस सारे प्रयोगो के दौरान वे औरत से युक्‍त रहे मुक्‍त नही। गांधी का पुरूषत्‍व अपरिमेय था, वे स्‍वयं औरत, हिजड़ा और माँ बनने को तैयार थे, यह उनकी तीवता का ही लक्षण था। इसी तीव्रता के कारण गांधी अपने यौन सम्‍बन्‍धो बहुतआयामी बनाने की सृजनशीलता गांधी में थी। वो मनु गांधी की माँ भी बने और उसके साथ सोये भी।

गांधी सत्‍य के प्रयोग के लिये जाने जाते है। उनके प्रयोग के परिणाम आये भी आये होगा और बुरे भी। हमेशा प्रयोगों के लिये कामजोरो का ही शोषण होता है- इसी क्रम में चूहा, मेढ़क आदि मारे जाते है। गांधी ने अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोग जो अन्‍यों पर किये होगे वे कौन है और उन पर क्‍या बीती होगी, यह प्रश्‍न आज भी अनुत्‍तरित है। गांधी की दया सिर्फ स्‍वयं तक सीमित रही, वह भिखरियों से नफरत करके है, उनके प्रति उनकी तनिक भी सहनुभूति नही दिखती है ये बो गांधी जिसे भारत के तत्‍कालीन परिस्थित से अच्‍छा ज्ञान रहा होगा। गांधी के इस रूप से गांधी से क्रर इस दुनिया में कौन हो सकता है, जो पुरूष हो कर माँ बनना चाहता है।

इस लेख के सम्‍पूर्ण तथ्‍य राज कमल प्रकाशन से प्रकाशित किशन पटनायक की पुस्‍तक विकल्‍पहीन नही है दुनिया के पृष्‍ठ संख्‍या 101 में गांधी और स्‍त्री शीर्षक के लेख से लिये गये है।


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35 comments:

Anonymous said...
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Vivek Rastogi said...

सच है यह कि गांधीजी का ब्रह्मचर्य था या पाखंड पर केवल इस सवाल से गांधीजी के आगे से "जी" हटा दिया जाये यह अच्छा नहीं, शिष्टता नहीं।

जरुरी नहीं कि हरेक महान आदमी में सब चीजें अच्छी ही हों पर शायद वो नजरअंदाज कर देनी चाहिये, यह मेरा नजरिया है। और बिना किसी सबूत और तर्क के इस तरह शालीनता की सीमा नहीं लांघनी चाहिये।

मैंने बहुत पहले सहारा समय साप्ताहिक में भी इस बारे में पढ़ा था किंतु लेखक ने बिना सबूत के काफ़ी अश्लील बातें लिखी थी। यह सब आक्षेप लगाने वाले व्यक्ति को पहले खुद उससे बेहतर कार्य कर दिखाना चाहिये और फ़िर उसका कमजोर पक्ष उजागर करना चाहिये।

हमेशा शालीन व्यक्ति को मर्यादा में रहना चाहिये यही शालीन व्यक्ति का भूषण है।

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

प्रमेन्द्र भाई
अनुत्तरित प्रश्नों की वज़ह क्या है...?
गांधी को लेकर इस तरह की पोस्ट का अर्थ भी मुझे समझ नहीं आ रहा
गांधीजी को यौन चर्चा से जोड़कर क्या साबित कर रहें हैं .
"एक पुस्‍तक में एक घटना का उल्‍लेख किया जाता है" कौन सी पुस्तक है ?
कुल मिला कर गांधीजी को बदनाम करने की कोशिश तो नहीं
मेरे अनुत्तरित सवालों का उत्तर देना ही होगा
छोटे भाई
किसी को इन सब बातों से कोई नीचे नहीं ला सकता
आप को मित्र वत सलाह देना चाहता हूँ की हम सदा
सात्विकता पूर्ण मर्यादित आलेखन करें
अनवरत असीम स्नेह के साथ

mahashakti said...

श्री विवेक जी,
विषय परिस्थिति के अनुसार जरूर नही था कि शीर्षक में जी शब्‍द जो जाये, वर्तमान समय की पत्रकारिता तथा व्‍यवहारिकता के संदर्भ में मै देखता हूँ तो पता कि कौन भारत के राष्‍ट्रपति तथा राज्‍यों राज्‍यपाल के नाम से पहले महामहिम लगाता है।

लेख के अंदर जहाँ उपयुक्‍त रहा वहाँ मैने जी का प्रयोग किया है, और सम्‍मान में कहीं पीछे नही रहा हूँ। मगर एक बात कहना चाहूँगा। भारत में जिस प्रकार महापुरूषों को महान बताया गया वह ठीक नही रहा है। आज भी भारत सरकार सिर्फ नेहरू-गांधी के प्रचार में सर्वधिक रूपये खर्च करती है, क्‍या इनका ही आजादी की लडाई में योगदान था, नही और भी लोग थे कि हमारी पाठ पुस्‍तको में राजीव गांधी तो स्‍थान पा सकते है किन्‍तु भगतसिंह को स्‍थान पाने के संघर्ष करना होगा। गर गांधी जी के बारें बताया जा रहा है तो उनके हर पहलू पर चर्चा होनी चाहिये।

Vivek Rastogi said...

भगतसिंह को अपनी जगह बनानी होगी यह एक अलग विषय है, कृप्या विषय के मूल से नहीं भटकें।

Anonymous said...

bahdhuvar yaa to tum is lekh ko hata kar maafi maango ya iske samarthan me paryaapt saakshya prastut karo. anyatha tum kaanuni pachde me pad sakte ho. yeh dhamki nahi salah hai.

jara socho koi is tarah ki anargal batein tumhare hindu wadi netaon ya sangh ke sansthapakon ke baare me kahe to tum chup chap sun loge??

apni pahchan main filhal chhipa raha hun par jaldi hi tumne uchit kadam nahi uthaaya to main adaalat ki notice ke saath apna parichaya dunga.

aur haan yah comment delete mat karna jara dusron ko bhi padhne do.

vakrachakshu said...

You are a Cynic...
You should not make such a big statement unless you are so sure ...
this post is "Bullshit" , total crap

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बंद करिए यह चर्चा . क्या हासिल होगा यह सब करके . ............ आजन्म कुआरे दत्तक पुत्री बनाते है और दत्तक पत्नी साथ रहते है क्या इस पर चर्चा करे ? क्या आप तेयार है

himanshu said...

प्रामेन्‍द्र जी,
आपका लिखा पढा लेकिन समझ नहीं सका। मित्र आपको एक बात कहना चाहता हूं कि आप जिसके बारे में लिखें अपनी विश्‍वसनीयता को बरकारर रखने के लिए तथ्‍यों को जरूर परख लें और उन्‍हें पुनारूत्‍पादित करने से बचें।
गांधी को लेकर आपका लिखा अभी और अध्‍यययन की मांग करता है और अगर आप अन्‍यथा न लें तो यह भी कहा जा सकता है कि अनावश्‍यक जल्‍दी बाजी दिखाते हुये इस लेख को लिखा गया है।
रात्रि अधिक हो जाने और कल की नौकरी की वजह से फिलहाल जवाब पूरा नहीं लिख पा रहा हूं। कल कोशिश कंरूगा कि अपनी बात पूरी तरह रख सकूं।
शेष कुशल होंगे

हिमांशु

तपन शर्मा said...

पोस्ट हटाने की जरूरत नहीं समझता मैं..
ज़रा इन लिंक पर जाइये

http://www.straightdope.com/columns/040813.html (Must Read)

http://www.sikhtimes.com/books_020278a.html

वैसे प्रमेंद्र भाई.. पूरी रिसर्च करके फिर लेख लिखो... ताकि कोई शक न बचे...

चन्दन चौहान said...

प्रमेन्द्र जी लेख जानदार है इस में कोई शक नही हम सभी हिन्दुस्तानी के सामने कुछ अनछुये पहलू को सामने लाना चाहिये। आजादी के वाद से सत्ता पर लगभग वैसे ही तत्वों का कब्जा रहा है जो सच्चाई को छुपा कर हम जनता को बरगलाया कर रखा है और कुछ यैसे आदमीयों को पुज्यनीय बना दिया है जो शायद इस लायक नही है।

Anonymous said...

गांधीजी हमारे राष्ट्रपिता हैं | उनके बारे में ऐसी बातें लिखने का न तो आपको अधिकार है और न ही योग्यता | कृपा कर के अपनी निंदनीय पार्टी राजनीति से ऊपर उठें | आपके पूरे लेख से ये स्पष्ट हो जाता है की आपने सारी सुनी सुनाई बातों को इकटठा करके इस लेख में डाल दिया है | ऐसे लेख से आपकी छवि ख़राब होती है | इससे और कुछ प्राप्त न होगा | किसी के चरित्र बारे में ऐसा कुछ सारी लिखने से पहले आपको सौ बार सोचना चाहिए | विशेषकर जब उनकी मृत्यु को ६० से ज्यादा वर्ष हो गए हैं | वो इसका जवाब देने के लिए उपस्थित नहीं हैं | ये निहायत ही कायरता वाली बात है | और इससे आपको ही क्षति पहुँचेगी |
मुझे दुःख है की आज का एक प्रतिभाशाली युवा ऐसी हरकत भी कर सकता है |

Anonymous said...

गांधीजी हमारे राष्ट्रपिता हैं | उनके बारे में ऐसी बातें लिखने का न तो आपको अधिकार है और न ही योग्यता | कृपा कर के अपनी निंदनीय पार्टी राजनीति से ऊपर उठें | आपके पूरे लेख से ये स्पष्ट हो जाता है की आपने सारी सुनी सुनाई बातों को इकटठा करके इस लेख में डाल दिया है | ऐसे लेख से आपकी छवि ख़राब होती है | इससे और कुछ प्राप्त न होगा | किसी के चरित्र बारे में ऐसा कुछ सारी लिखने से पहले आपको सौ बार सोचना चाहिए | विशेषकर जब उनकी मृत्यु को ६० से ज्यादा वर्ष हो गए हैं | वो इसका जवाब देने के लिए उपस्थित नहीं हैं | ये निहायत ही कायरता वाली बात है | और इससे आपको ही क्षति पहुँचेगी |
मुझे दुःख है की आज का एक प्रतिभाशाली युवा ऐसी हरकत भी कर सकता है |

PD said...

paramendra bhaai, aapse aise lekh padhkar dukh hua.. main Gandhiji ka samrthak nahi hun, magar aapke is lekh ka bhi samthak nahi ho sakta hun..

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

प्रमेन्द्र जी !

वन्दे-मातरम.

हर व्यक्ति के जीवन के कई रंग होते हैं. सामान्यतः हम जिनके प्रति श्रद्धा रखते हैं उनके नकरात्मक पक्ष को देखना-सुनना पसंद नहीं करते. अपने माता-पिता के दांपत्य प्रसंगों पर कौन खुलकर चर्चा करना चाहेगा. जगत्पिता शिव और जगत्जननी पार्वती के श्रृंगार और भोग के क्षणों का वर्णन रावन और कालिदास ने किया है किन्तु जन सामान्य ने तुलसी के मर्यादित वर्णन को हो सराहा. गाँधी जी या ऐसे अन्य व्यक्तित्वों के नुजी पलों को उद्घाटित कर कुछ रचनात्मक तो हो नहीं सकता, विवाद खडा कर चर्चित जरूर हो सकते हैं. गाँधी जी के भक्त गलत कहेंगे या उनके विरोधी नेताओं को लांछित करेंगे. कुछ अति उत्साही इसकी प्रशंसा भी करें. जनता को आप क्या बताएँगे? क्या वह जानती नहीं है. हो सकता है की आप न जानते हों और कहीं पढ़ लेने पर अति उत्साह में ढिंढोरा पीटने लगे. आपने तो शतांश भी नहीं लिखा. मैंने देश-विदेश के बीस से अधिक नेताओं और साहित्यकारों-कलाकारों के बारे में बहुत गहरई से की गयी खोजों के तथ्यपरक वर्णन पढ़े हैं पर उनकी सामाजिक उपयोगिता क्या है?

अपनी ऊर्जा ऐसे व्यर्थ के प्रसंगों पर खर्च न करें. धमाने वाले भी कम गलत नहीं हैं. वे मुद्दे को जितना उछालेंगे आपको उतना ही प्रचार मिलेगा- क्या वे इतना भी नहीं जानते? अस्तु...

सोचें..

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said...

प्रमेन्द्र जी !

वन्दे-मातरम.

हर व्यक्ति के जीवन के कई रंग होते हैं. सामान्यतः हम जिनके प्रति श्रद्धा रखते हैं उनके नकरात्मक पक्ष को देखना-सुनना पसंद नहीं करते. अपने माता-पिता के दांपत्य प्रसंगों पर कौन खुलकर चर्चा करना चाहेगा. जगत्पिता शिव और जगत्जननी पार्वती के श्रृंगार और भोग के क्षणों का वर्णन रावन और कालिदास ने किया है किन्तु जन सामान्य ने तुलसी के मर्यादित वर्णन को हो सराहा. गाँधी जी या ऐसे अन्य व्यक्तित्वों के नुजी पलों को उद्घाटित कर कुछ रचनात्मक तो हो नहीं सकता, विवाद खडा कर चर्चित जरूर हो सकते हैं. गाँधी जी के भक्त गलत कहेंगे या उनके विरोधी नेताओं को लांछित करेंगे. कुछ अति उत्साही इसकी प्रशंसा भी करें. जनता को आप क्या बताएँगे? क्या वह जानती नहीं है. हो सकता है की आप न जानते हों और कहीं पढ़ लेने पर अति उत्साह में ढिंढोरा पीटने लगे. आपने तो शतांश भी नहीं लिखा. मैंने देश-विदेश के बीस से अधिक नेताओं और साहित्यकारों-कलाकारों के बारे में बहुत गहरई से की गयी खोजों के तथ्यपरक वर्णन पढ़े हैं पर उनकी सामाजिक उपयोगिता क्या है?

अपनी ऊर्जा ऐसे व्यर्थ के प्रसंगों पर खर्च न करें. धमाने वाले भी कम गलत नहीं हैं. वे मुद्दे को जितना उछालेंगे आपको उतना ही प्रचार मिलेगा- क्या वे इतना भी नहीं जानते? अस्तु...

सोचें..

राज भाटिय़ा said...

प्रमेंदर भाई .
छोडो इन बातो को,गांधी जी के बारे लोग बहुत कुछ जानते है,

राज भाटिय़ा said...

अनामी भाई जरा दुनिया मै झांको फ़िर धमकी देना, ओर किस किस को धमकी दो गये....?

खटराग said...

hi
this is you "

NARAD said...

अगर किसी को शक है तो नाथूराम गोडसे की लिखी पुस्तक गाँधी वध क्यूँ जो की प्रतिबंधित है, को पढने का प्रयास करे,,
तरुण जोशी नारद

पन्चायती said...

गाँधी नेहरु ने देश बचाया
वो ही असली नेता थे।
तो क्या शेखर बोस भगत
केवल बस अभिनेता थे॥
उनको फूल चढ़ाये तुमने
जो सत्ता के ग्राहक थे।
उनको जाने क्यू भूल गये
जो आजादी के वाहक थे॥

- कवि कुलदीप ललकार
Lines taken from :-
http://tsdaral.blogspot.com/

सौरभ आत्रेय said...

सराहनीय लेख, आज समाज की यही स्तिथि है की यदि सत्य बोलने की चेष्टा करो तो लोग दुनिया भर की तुम्हे सीख देंगे. गांधी को राष्ट्रपिता बनाने वाली कांग्रेस थी वरना वो तो राष्ट्रपुत्र बनने के लायक भी नहीं है. न तो मैं भाजपा से सम्बंधित हूँ और ना ही "RSS" से क्योंकि यदि गाँधीजी के विरुद्ध एक शब्द भी बोलो तो लोग तुंरत ये ही कहते हैं. गाँधीजी के समर्थन में बहुत से लोग बोलते हैं और आप से बातों का साक्ष्य मांगते हैं पर वो महात्मा थे उन्हें इस बात का भी तो साक्ष्य देना चाहिए. इस देश की दुर्दशा में उस आदमी का भी बहुत बड़ा हाथ था. और ये बात जो आपने लिखी है वो तो स्वयं गाँधीजी ने अपने बारे में लिखा है तो उसमें कैसा प्रमाण चाहिए लोगो को.
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said: "सामान्यतः हम जिनके प्रति श्रद्धा रखते हैं उनके नकरात्मक पक्ष को देखना-सुनना पसंद नहीं करते. अपने माता-पिता के दांपत्य प्रसंगों पर कौन खुलकर चर्चा करना चाहेगा. जगत्पिता शिव और जगत्जननी पार्वती के श्रृंगार और भोग के क्षणों का वर्णन रावन और कालिदास ने किया है किन्तु जन सामान्य ने तुलसी के मर्यादित वर्णन को हो सराहा"

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी किसी के प्रति श्रद्धा हमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलू देख कर ही करनी चाहिए. माता-पिता के दाम्पत्य प्रसंगों पर खुल कर चर्चा करने से आपका क्या तात्पर्य है यदि आपका तात्पर्य उनके यौन संबंधों से है तो आप यहाँ क्या सिद्ध करना चाहते हैं ये कह कर, ये बात सभी बालिग़ लोग जानते हैं और उनके या किसी भी व्यक्ति के वैवाहिक यौन संबंधों के बारे में हम बात क्यों करें उस से हमें क्या मिलेगा. किन्तु एक तथाकथित महात्मा के नाजायज संबंधों के बारे में हमें कहने का हक़ है और चर्चा का विषय भी क्योंकि वो व्यक्ति भारत का राष्ट्रपिता कहलाया जाता है प्रत्येक नोट पर वो ही छपता है जैसे की इस देश में कोई महात्मा संत पैदा ही नहीं हुआ हो. वेदों में उस अनंत निराकार ईश्वर को कई नामों से पुकारा गया है उनमें से शिव भी एक नाम है नाकि किसी व्यक्ति का जो श्रंगार और भोग करे, शिव को व्यक्ति मान कर जिस ने भी चाहे भोग आदि का वर्णन किया हो वो व्यक्ति विद्वान नहीं हो सकता, रावण के कर्मों को तो सभी जानते ही हैं और कालिदास ने ऐसा कुछ लिखा है तो मुझे उसका ज्ञान नहीं और यदि लिखा है तो गलत है मैं यहाँ कालिदास के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कह सकता क्युकी मैंने उनको अभी तक पढ़ा नहीं है. बहुत सी जनता तो इस्लाम को शांति का सम्प्रदाय कहती तो क्या उनकी बात आँख बंद करके मान लें क्या हमें सत्य जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए.

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said:"गाँधी जी या ऐसे अन्य व्यक्तित्वों के नुजी पलों को उद्घाटित कर कुछ रचनात्मक तो हो नहीं सकता, विवाद खडा कर चर्चित जरूर हो सकते हैं. गाँधी जी के भक्त गलत कहेंगे या उनके विरोधी नेताओं को लांछित करेंगे. कुछ अति उत्साही इसकी प्रशंसा भी करें. जनता को आप क्या बताएँगे? क्या वह जानती नहीं है. हो सकता है की आप न जानते हों और कहीं पढ़ लेने पर अति उत्साह में ढिंढोरा पीटने लगे. आपने तो शतांश भी नहीं लिखा. मैंने देश-विदेश के बीस से अधिक नेताओं और साहित्यकारों-कलाकारों के बारे में बहुत गहरई से की गयी खोजों के तथ्यपरक वर्णन पढ़े हैं पर उनकी सामाजिक उपयोगिता क्या है? "

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी गांधी के व्यक्तित्व के निजी पलों को उदघाटित करना रचनात्मक क्यों नहीं हो सकता जबकि उनको महात्मा प्रतिष्ठित करना आपके अनुसार रचनात्मक होगा. आखिर क्या जनता को सत्य नहीं जानना चाहिए जिसको हम महात्मा की उपाधि से विभूषित करते हैं उसका आखिर चरित्र है क्या. हाँ हम उत्साहित हैं की आज के नौजवान सत्य को धीरे-२ समझ रहें हैं. जो जनता जानती नहीं है उसको जो बताना है वो इस लेख में बता दिया गया.यदि हो सकता है हम नहीं जानते तो आप अपनी बात जनाईये. कहीं यदि तर्क के साथ कोई बात लिखी है तो उसको मान ने से उत्साह ही बढ़ता है और यदि कुछ लोग उस सत्य बात से अ परिचित हैं तो ढिंढोरा भी पीटना चाहिए. प्रसिद्द व्यक्तियों का अनुसरण करने से पहले उनके विचारों और चरित्र का भी अध्यन करना चाहिए इस लिए इसकी सामाजिक उपयोगिता है. किसी बुद्धिमान व्यक्ति को भेड़ो की तरह नहीं हंकना चाहिए बिना सोचे समझे जबतक उसका तर्क-वितर्क के साथ विवेकपूर्ण निर्णय न हो.

सौरभ आत्रेय said...

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' said:"अपनी ऊर्जा ऐसे व्यर्थ के प्रसंगों पर खर्च न करें. धमाने वाले भी कम गलत नहीं हैं. वे मुद्दे को जितना उछालेंगे आपको उतना ही प्रचार मिलेगा- क्या वे इतना भी नहीं जानते? अस्तु...सोचें..

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी आज की पीढी को उत्तर चाहिए. आपके कहने से यह व्यर्थ का प्रसंग नहीं हो जाता है. धमकाने वाले जितना धमकाएं हम इस से डरने वाले नहीं है. प्रचार मिलना भी चाहिए तभी तो जनता के सामने सत्य आएगा. सोचने के लिए आप कह कर छिपे स्वरों में आप भी धमका रहे हैं किन्तु कोई डरने वाला नहीं है.

सौरभ आत्रेय said...

Anonymous said: १. गांधीजी हमारे राष्ट्रपिता हैं | उनके बारे में ऐसी बातें लिखने का न तो आपको अधिकार है और न ही योग्यता |
२. कृपा कर के अपनी निंदनीय पार्टी राजनीति से ऊपर उठें |
३. आपके पूरे लेख से ये स्पष्ट हो जाता है की आपने सारी सुनी सुनाई बातों को इकटठा करके इस लेख में डाल दिया है | ऐसे लेख से आपकी छवि ख़राब होती है | इससे और कुछ प्राप्त न होगा |
४.किसी के चरित्र बारे में ऐसा कुछ सारी लिखने से पहले आपको सौ बार सोचना चाहिए | विशेषकर जब उनकी मृत्यु को ६० से ज्यादा वर्ष हो गए हैं | वो इसका जवाब देने के लिए उपस्थित नहीं हैं | ये निहायत ही कायरता वाली बात है | और इससे आपको ही क्षति पहुँचेगी |
५.मुझे दुःख है की आज का एक प्रतिभाशाली युवा ऐसी हरकत भी कर सकता है "

अनामी जी
१.गाँधी जी तुम्हारे राष्ट्र पिता होंगे हम हमारे नहीं मानते. आपके कहने मात्र से किसी का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता और योग्यता का निर्धारण करने वाले आप कौन होते हैं.
२.यहाँ पर किसी पार्टी का कोई वर्णन नहीं है तो राजनीति कहाँ से आ गयी.
३.गाँधी जी ने स्वयं "सत्य के प्रयोग" द्वारा यह लिखा है. छवि आपकी नजरो में ख़राब हुई होगी सभी लोगो की नज़र में नहीं. सब कुछ अपनी प्राप्ति के लिए नहीं दूसरे लोगो के लिए भी कुछ करना चाहिए, सत्य से अवगत कराना अच्छी बात है.
४. क्या पता २०० बार सोचा हो. किसी की म्रत्यु को १००० वर्ष भी हो जाएँ इस से क्या फर्क पड़ता है. यदि कोई हमें कहता है की ओरंगजेब महान राजा था तो उसको हम कैसे स्वीकार कर लें जबकि हजारो तथ्य उसके विरुद्ध हों तो क्या उसके लिए ओरंगजेब को जीवित करना पड़ेगा. गलत इतिहास देश को गलत दिशा देता है उसका विरोध करना अति आवश्यक है.
५. हमें सुख है की आज के प्रतिभाशाली युवा इस तरह के पूछने योग्य प्रश्न कर रहे हैं.

हरि शर्मा said...

सलिल जी से काफ़ी हद तक सहमत हू और प्रमेन्द्र जी इस बिषय मे आपने बहुत सतही बाते लिखी है.
गन्धीजी ने कभी इस तरह के आरोपो से इन्कार नही किया. खूव शोध करो. उद्धरण दो फिर ऐसी बाते लिखो

मंगेश said...

yes , gandhi was the hopeless one and the biggest cause of today's shameful condition of our nation

Satish said...

मैं यहाँ पे किसी विदेशी लेखक( मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स) की किताब को पड़ कर उसे दुहराने की कोशिश नहीं कर रहा हु,पर मेरे जेहन में एक ही सवाल बार बार आता है की आखिर उन्हें उम्र के इस पड़ाव पे ही ब्रम्हचर्य प्रयोग की क्या सूझी,निश्चित तौर पे ३९ साल की उम्र में उन्होंने ब्रम्हचर्य का व्रत लिया था और जैसा की हम सब जानते है और इतिहास में देख चुके है की भीष्म,महाबली हनुमान,स्वामी विवेकानंद ने किस तरह ब्रम्हचर्य व्रत का पालन किया,पर किसी ने कभी कोई प्रयोग नहीं किये क्युकी उन्हें अपने इस व्रत पे सम्पूर्ण रूप से विश्वाश था...पर यहाँ पर बात गाँधी जी की बात आती है तो मरी बुद्धि भ्रमित हो जाती है,की आखिर उन्हें प्रयोग की क्या जरुरत पड़ी,कही ऐसा तो नहीं था की उन्हें अपने ब्रम्हचर्य व्रत पे विश्वाश नहीं था और इसीलिए उन्होंने प्रयोग किया,और किया भी तो तो जवान लडकियों साथ .......पहली बात तो इतिहास में ऐसा प्रयोग किसी ने नहीं किया,बल्कि ज्ञानी पुरुषो ने तो ब्रम्हचर्य व्रत लेने पश्चात् नारी जाती से दुरी बनाए रखने पर ही ज्यादा बल दिया है,यहाँ तक की मन में भी किसी नारी के प्रति विचार पर भी प्रतिबन्ध की बात की और गाँधी इसके बिलकुल उलटे नारियो के साथ ज्यादातर समय व्यतीत करते थे,बल्कि अपने साथ सहायता के लिए किसी पुरुष सेवक के बजाय लडकियों के सहायता लेते थे,जबकि ब्रम्हचर्य व्रत के पश्चात तो नारी जाती का स्पर्श भी पाप माना जाता है,,,,,,उनके इस प्रकार के व्यहवार को देखने से सिर्फ दुविधा ही हासिल होती है,बल्कि गाँधी जी के आश्रम में भी कई लोग उनके इस प्रयोग के खिलाफ थे...यहाँ तक नेहरु और सरदार पटेल भी,पर खुल के कभी उन्होंने नहीं कहा...सामान्य तौर पे व्यक्ति वृद्ध अवस्था में इश्वर का नाम लेता है और गाँधी जी को जवान लडकियों के साथ ब्रम्हचर्य का प्रयोग किया करते थे,चलिए प्रयोग किया तो किया पर नारी के साथ ही क्यों,आखिर जब वो प्रयोग के दौरान लडकियों के साथ सोते थे(शायद नग्न भी) तो इस प्रयोग का नतीजा क्या निकलता था,क्या वो ये साबित करना चाहते थे की जवान लडकियों के साथ सोने के पश्चात् भी मन में वासना के भाव उत्पन्न नहीं होते है,,आखिर उन्हें इस अग्निपरीक्षा की जरुरत ही क्या थी,अगर उन्होंने ब्रम्हचर्य व्रत ले ही लिया था तो इसमें संदेह कैसा था क्यों उन्हें बाद में इस प्रयोग की जरुरत पड़ी

Satish said...

कृपया इस पोस्ट को जरुर स्वीकृत करियेगा,,गाँधी जैसा चरित्र हिन् इन्सान समाज में खोजने से भी नहीं मिलेगा,और बात रही ब्रम्हचर्य प्रयोग की तो आखिर उनको प्रयोग करने की क्या जरुरत महसूस हुई, मेरे जेहन में एक ही सवाल बार बार आता है की आखिर उन्हें उम्र के इस पड़ाव पे ही ब्रम्हचर्य प्रयोग की क्या सूझी,३९ साल की उम्र में उन्होंने ब्रम्हचर्य का व्रत लिया भीष्म,महाबली हनुमान,स्वामी विवेकानंद ने किस तरह ब्रम्हचर्य व्रत का पालन किया पर कभी उन्होंने ऐसे किसी भी तरह के घिनोने प्रयोग नहीं किये,उनके प्रयोग से साफ़ स्पष्ट होता है की उन्हें अपने इस व्रत पे यकीन नहीं था जबकि ज्ञानी पुरुषो ने तो ब्रम्हचर्य व्रत लेने पश्चात् नारी जाती से दुरी बनाए रखने पर ही ज्यादा बल दिया है,यहाँ तक की मन में भी किसी नारी के प्रति विचार पर भी प्रतिबन्ध की बात की.....

sachin said...

bogasgiri this is withot base tajmahal. mungeilal ke hasin sapne dikhao mat.

Anonymous said...

main aap ki bat se sahamat hoon aur main chahata hoon ki gandhi ji ko yuva apna adarsh na banaye. kyoki gandhiji khud bhatake hue the aur desh par bhar swaroop the. swami vivekananda and there are many other ideals for youth,mera manana hain ki gandhi ji par logo ki do rahe hain aur saboot bhi to ye satya nahi ho sakta aur ye desh ka durbhagya hain.

Anonymous said...

No ! My friend tumhe sharam ani chahiye aisa likhte huye.swami was real bhramchari and not your gandhi jaisa.

विजय said...

Better go through this new book – “Gandhi ke brahmacharya prayog” (Delhi: Rajpal and Sons, 2012), it is really very interesting and revealing. Everything the author has said is through Gandhi’s own narrations and comments!
There is no other book like it so far on this subject.



Price: Rs 250.00
ISBN: 9789350640814
Author: शंकर शरण
Publisher: Rajpal and Sons
Language: Hindi
Pages: 152

विजय said...

Better go through this new book – “Gandhi ke brahmacharya prayog” (Delhi: Rajpal and Sons, 2012), it is really very interesting and revealing. Everything the author has said is through Gandhi’s own narrations and comments!
There is no other book like it so far on this subject.



Price: Rs 250.00
ISBN: 9789350640814
Author: शंकर शरण
Publisher: Rajpal and Sons
Language: Hindi
Pages: 152

Anonymous said...

गाँधी ना तो हमारा आदर्श है और ना ही उसने कोई महान कार्य किया था मेरा भी यही मानना है यहाँ पर गाँधी के बारे में ठीक ही लिखा जय हिन्द

Anonymous said...

गाँधी ने कौन सा भला काम किया है देश के लिये, 1915 से 1948 तक । इरविन समझौते मे चाहता तो
भगत, राजगुरू, शुखदेव जी की फाँसी रुकवा सकता था। यार तुम लोग भगत सिँह जी से जगह बनाने की बात करते हो। ये अंग्रेजोँ के खिलाप था तो इसने प्रथम विश्व युध्द मेँ भारतीयोँ को क्योँ प्रेरात किया। मैँ इस से ज्यादा कुछ नहीँ कहना चाहुँगा क्योँ कि अब किसी के चरित्र पर उँगली उठाना सही नही है।