बाल शहीद वीर हकीकत राय दे दी जान पर धर्म नहीं छोड़ा



जिन दिनों श्री गुरू हरि राय साहब स्यालकोट (पँजाब) पहुँचे, वहाँ भाई नंदलाल क्षेत्री गलोटियां खुरद क्षेत्रों में निवास करते थे। उन्हाेंने गुरूदेव का भव्य स्वागत किया और उनसे सिक्खी धरण की । इनके सुपुत्रा श्री बाघमल जी, स्थानीय हुक्मरान अमीर बेग के पास एक अधिकारी के रूप में कार्यरत हुए, आगामी समय में श्री बाघमल की सुपत्नि श्रीमती गौरा जी ने एक बालक को जन्म दिया, जिसका नाम हकीकत राय रखा गया। हकीकत राय बहुत प्रतिभाशाली और साहसी युवक निकला। इसकी माता ने इसे सिक्ख गुरूजनों के जीवन वृतान्त सुना-सुना कर आत्मगौरव से जीना सीखा दिया था। सिक्खी तो घर में थी परन्तु पंजाब सरकार के सिक्ख विरोधी अभियानों के कारणहकीकत राय केश धरण न कर सका। इसके पीछे राजनीतिक दबाव अथवा सामाजिक विवशता थी परन्तु उसका मन सदैव गुरू चरणों से जुड़ा रहता था। इस परिवार में सिक्खी के वातावरण को देखते हुए बटाला नगर जिला गुरदासपुर के निवासी सरदार किशन सिंह जी ने अपनी सुपुत्राी का विवाह हकीकत राय से कर दिया । उन दिनों केशधरी युवक दल खालसा के सदस्य बन चुके थे अथवा शहीद कर दिये गये थे। अतः विवशता के कारण सरदार किशन सिंह जी ने हकीकत राय को अपनी सुपुत्राी के लिए उचित वर समझा।
बाल शहीद वीर हकीकत राय दे दी जानपर धर्म नहीं छोड़ा
बाल शहीद वीर हकीकत राय दे दी जानपर धर्म नहीं छोड़ा
हकीकत राय का जन्म सन् 1724 ईस्वी में हुआ था। इन्हें इनके पिता बाघमल जी ने उच्च शिक्षा दिलवाने के विचार से, सन् 1741 में मौलवी अब्दुल हक के मदरसे में भेज दिया । वहाँ हकीकत राय अपने सहपाठियों से बहुत मिलजुल कर शिक्षा ग्रहण करते थे, वैसे भी बहुत नम्र स्वभाव और मधुर भाषी होने के कारण लोकप्रिय थे। परन्तु एक दिन ‘भइया दूज के दिन’ वह अपने माथे पर तिलक लगवा कर मदरसे पहुँच गये। मुसलमान विद्यार्थियों ने उनकी खिल्ली उड़ाई और बहुत अभद्र व्यंग्य किये। इस पर हकीकत राय ने बहुत तर्कसंगत उत्तर दिये। जिसे सुनकर सभी विद्यार्थी निरूत्तर हो गये । परन्तु बहुमत मुसलमान विद्यार्थियों का था। अतः वे हिन्दू विद्यार्थी से नीचा नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने हीनभावना के कारण मौलवी को बीच में घसीटा और इस्लाम का पक्ष प्रस्तुत करने को कहा - मौलवी ने एक विचार गोष्ठि का आयोजन कर दिया। दोनों पक्षों में जम कर बहस हुई और एक दूसरों की त्राुटियों को लक्ष्य बना कर आरोप लगाए गये, इन खामियों के कारण बात लांछन तक पहुँच गई। मुस्लिम विद्यार्थियों का पक्ष बहुत कमजोर रहा। वे पराजित हो गये परन्तु उनके स्वाभिमान को बहुत ठेस पहुँची, अतः वे हठध्र्मी करने लगे कि हकीकत राय उनसे माफी माँगे परन्तु हकीकत राय ने ऐसा करने से साफ इन्कार कर दिया। इस पर मुस्लिम विद्यार्थियों ने दबाव बनाने के लिए अपनी अपनी पगडि़यां उतार कर मौलवी के समक्ष रख दी और कहा - हकीकत राय को पैगम्बरों के अपमान करने का दण्ड मिलना चाहिए। हकीकत राय का तर्क था कि मैंने कोई झूठ नहीं कहा और मैंने कोई अपराध नहीं किया जो सत्य था, उसकी ही व्याख्या की है। यह बातें सभी को स्वीकार करनी चाहिए। इस पर मौलवी भी दुविधा में पड़ गया, उसने मुस्लिम विद्यार्थियों के दबाव में इस कांड का निर्णय करने के लिए शाही काज़ी के सम्मुख प्रस्तुत किया।
शाही काज़ी ने घटनाक्रम को जाँचा तो वह आग बबूला हो गया। उसका विचार था जब हम सत्ता में हैं तो इन हिन्दू लोगों कि यह हिम्मत कि हमारे पैगम्बरों पर लांछन लगाये। अतः उसने हकीकत राय को गिरफ्रतार करवा कर कारावास में डलवा दिया और उस पर दबाव बनाया कि वह इस्लाम स्वीकार कर ले। परन्तु हकीकत राय किसी और मिट्टी का बना हुआ था, वह अपने विश्वास से टस से मस नहीं हुआ। स्थानीय प्रशासक अमीर बेग तक जब यह बात पहुँची तो उसने विद्यार्थियों का मन-मुटाव कह कर हकीकत राय को हरजाना (आर्थिक दण्ड) लगाकर छोड़ने का आदेश दिया परन्तु शाही मौलवी ने उसे इस न्याय के लिए लाहौर भेज दिया।
उन दिनों लाहौर के घर घर शहीद मनी सिंह, महताब सिंह, बोता सिंह, गरर्जा सिंह इत्यादि की ध्र्म प्रति निष्ठा और उनके बलिदान की चर्चाएं हो रही थी। ऐसे में हकीकत राय के मन में ध्र्म के प्रति आत्म बलिदान देने की इच्छा बलवती हो गई। घर से चलते समय उसकी माता औरपत्नि ने उन्हें विशेष रूप से प्रेरित किया कि ध्र्म के प्रति सजग रहना है, पीठ नहीं दिखानी है और गुरूदेव के आदेशों से बेमुख नहीं होना, भले ही अपने प्राणों की आहुति ही क्यों न देनी पड़े।
लाहौर के शाही काज़ी के पास जब यह मुकद्दमा पहुँचा तो उसने भी स्यालकोट के काज़ी का ज्यों का त्यों फैसला रखा, उसने कह दिया कि पैगम्बर साहब की शान में गुस्ताखी (अवज्ञा) करने वाले को इस्लाम कबूलना होगा, नहीं तो मृत्यु दण्ड निश्चित ही है। इस पर लाहौर नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति दीवान सूरत सिंह, लाला दरगाही मल्ल तथा जमांदार कसूर बेग इत्यादि लोगों ने राज्यपाल जक्रिया खान से कहा कि वह हकीकत राय को छोड़ दे परन्तु वह उन दिनों काजि़यों के चक्र में फँस कर हठध्र्मी पर अड़ा हुआ था, अतः उसने किसी की भी सिफारिश नहीं मानी और इस्लाम कबूल करने अथवा मृत्यु दण्ड का आदेश बरकरार रखा।
उन दिनों कई केशाधरी सिक्ख कैदी भी मृत्यु दण्ड की प्रतीक्षा में जक्रिया खान की जेलों में बन्द पड़े थे। उनसे प्रेरणा पाकर हकीकत राय का मनोबल बढ़ता ही चला गया, वह मृत्यु दण्ड का समाचार सुनकर भेड़ों की तरह भयभीत होकर भैं-भैं न करके शेरों की तरह गर्जना करने लगा । 
इस प्रकार वीर योद्धा 18 वर्षीय हकीकत राय को सन् 1742 ईस्वी की बसन्त पंचमी वाले दिन लाहौर के नरवास चैक में तलवार के एक झटके से शहीद कर दिया गया। 
जब इस निर्दोष युवक की हत्या की सूचना दल खालसा में पहुँची तो उनहोंने सभी अपराधियों की सूची तैयार कर ली और समय मिलते ही स्यालकोट पहुँचकर छापामार युद्ध कला से उन दोषियों को चुन चुन कर मौत के घाट उतार दिया ।



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