विवाह, दहेज और कानून



विवाह एक ऐसा सामाजिक अवसर है जहां दो परिवार उपहारों का लेन-देन करते हैं। पर इन लेन-देनों में समानता नहीं होती, किसी एक पक्ष की ओर आमतौर पर झुकाव ज्यादा होता है। इसके अलावा विवाह के बाद भी काफी अर्से तक लेन-देन की यह प्रक्रिया चलती रहती है।

हमारे समाज में दहेज समुदाय के हर वर्ग तक पहुंच चुका है। इसका अमीरी-गरीबी से कोई ताल-मेल नहीं है और न ही सम्प्रदाय-जाति का भेद-भाव है। आज दहेज के रूप में मोटी रकम के साथ-साथ कार, फर्नीचर, कीमती कपड़े व भारी गहने भी वधू के परिवार से वर के परिवार भेजे जाते हैं। इसके अलावा वधू-पक्ष, वर-पक्ष एवं ब्याह के सारे खर्चे, जिसमें यात्रा खर्च भी शामिल होता है वहन करता है। यहीं नही वर-पक्ष को हक है कि वह कोई भी अप्रत्याशित मांग वधू के परिवार के सामने रखे और जिसे पूरी करना विवाह के लिए अनिवार्य समझा जाता है।
 
दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की कुछ खास बातें
  •  दहेज का लेन-देन दोनों अपराध हैं। इसके लिए कम से कम पांच वर्ष कैद या पंद्रह हजार रुपये जुर्माना किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त दहेज की मांग करने पर भी छः मास सजा और दस हजार रुपये तक का जुर्माना किया जा सकता है।
  • यह कानून महिलाओं को पति या ससुराल वालों से सम्पत्ति/सामान लेने की स्थिति में उनकी सुविधा के लिए बनाया गया है। इसके तहत महिला के नाम पर शादी के समय दी गई सारी सम्पत्ति/दहेज शादी के बाद तीन माह के भीतर महिला के नाम कर दिया जाएगा। अगर इस सम्पत्ति/दहेज की मिल्कियत पाने से पहले महिला की मौत हो जाती है तो महिला के वारिस इस सम्पत्ति/दहेज को वापस लेने की मांग कर सकते हैं। अगर विवाह के सात साल के अंदर महिला की मौत हो जाती तो सारा दहेज उसके माता-पिता या बच्चों को दिया जायेगा।
  • दहेज हत्या के लिए सात साल की सजा दी जा सकती है। यह अपराध गैरजमानतीय है।
  • दोषी व्यक्ति पर धारा 304 बी के साथ ही भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 (हत्या) 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) 44 ए (क्रूरता) और दहेज विरोधी कानून सेक्शन 4 लगाया जा सकता है।
इस अधिनियम से क्या राहत मिल सकती है?
  • धारा 304बी :  यह धारा दहेज हत्या के मामलों में सजा के लिए लागू की जाती है। दहेज हत्या का अर्थ है, अगर औरत की मौत जलने या किसी शारीरिक चोट के कारण हुई है या शादी के सात साल के अन्दर किन्हीं अन्य संदेहास्पद कारणों से हुई है। यह धारा उस समय भी लागू की जा सकती है, जब साबित हो जाए कि पति या उसके माता-पिता या अन्य संबंधी दहेज के लिए उसके साथ हिंसा और बदसलूकी कर रहे थे जिसके कारणवश औरत की मौत हो गई हो।
  • धारा 302 : यह धारा दहेज हत्या के आरोप में सजा के मामले में लागू की जाती है जिसमें उम्र कै़द या फांसी की सजा हो सकती है।
  • धारा 306 : यह धारा मानसिक और भावनात्मक हिंसा, जिसके फलस्वरूप औरत आत्महत्या के लिए मजबूर हो गई हो, के मामलों में लागू होती है। इसके तहत जुर्माना तथा 10 साल तक की सजा सुनाई जा सकती है।
  • धारा 498ए : यह धारा पति या रिश्तेदारों द्वारा दहेज के लालच में क्रूरता और हिंसा के लिए लागू की जाती है। यहां क्रूरता के मायने हैं औरत को आत्महत्या के लिए मजबूर करना, उसकी ज़िंदगी के लिए खतरा पैदाकरना व दहेज के लिए सताना व हिंसा। इस सभी धाराओं के अलावा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 113 ए, 174 (3) और धारा 176 भी दहेज व इससे जुड़ी हत्या की स्थिति में लागू की जा सकती है। इसके तहत दहेज हत्या की रिपोर्ट दर्ज होने पर आत्महत्या या मौत की दूसरी वजह होने के बावजूद पुलिस छान-बीन, कानूनी कार्यवाही, लाश का पोस्टमार्टम आदि करने का आदेश दे सकती है; ख़ासतौर पर जब मौत विवाह के सात वर्ष के अन्दर हुई हो या फिर किसी पर दहेज हत्या का संदेह हो।


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दिल्ली का इण्डिया गेट



इंडिया गेट प्रथम विश्वयुद्ध एवं अपफगानयुद्ध में मारे गए शहीद सैनिकों की स्मृति में बनाया गया था। प्रथम विश्वयुद्ध में 70,000 भारतीय सैनिक तथा अपफगानिस्तान युद्ध में पश्चिमोत्तर सीमा पर भारतीय सैनिक शहीद हुए। इन्ही ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के नाम इंडिया गेट की दीवार पर अंकित है। इंडिया गेट की स्थापना की नींव ड्यूक ऑफ कनॉट ने 1921 में रखी। यह स्मारक ल्यूटियन्स के द्वारा डिजायन किया गया जो दस वर्ष के बाद तत्कालीन वायस लार्ड इरविन के द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया। इसी में स्वतंत्राता प्राप्ति के काफी बाद भारत सरकार ने ‘अमर जवान ज्योति’बनवाये जो दिन-रात जलता है। अमर जवान ज्योति दिसंबर 1971 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों के त्याग और बलिदान की याद दिलाता है। भारतीय सैनिकों के सम्मान में यह बनाया गया है।
दिल्ली का इण्डिया गेट

इंडिया गेट का वास्तु प्रारूप में भी यूरोपीय और भारतीय कला का मिश्रण है। यह षटभुजीय आकार में है। यह भारतीय परिस्थिति में यूरोपीय मेमोरियल आर्क ‘‘आर्क डी ट्राइम्पफ’’ पेरिस की संरचना के अनुसार बना है। इंडिया गेट का स्मारक भरतपुर (राजस्थान) के लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है। दोनों तरपफ पत्थर पर ‘इंडिया गेट’ खुदा  हुआ है। 1914-1919 भी लिखा है। शिखर पर तेल डालने का स्थान है जो लाॅ को जलने के लिए ईंध्न उपलब्ध् करता है। पर अब गैस ईंध्न से यह चलता है। इंडिया गेट के चारों तरपफ विशाल हरा-भरा आकर्षक लॉन है जो  इसकी सुंदरता को बढ़ाता है। यहां नौकायन की सुविध उपलब्ध् है। शाम होते ही इंडिया गेट आश्चर्यजनक रूप से प्रकाशित हो जाता है। झरने, प्रकाश के रंग के साथ मनोरम दृश्य प्रस्तु करते हैं जिससे पर्यटक आकर्षित होते हैं। इंडिया गेट राजपथ के अंतिम छोर पर अवस्थित है जो लोगों के लिए मनोरंजक पिकनिक स्थल है। यहां सालोभर पर्यटक और लोग आते हैं परंतु ग्रीष्म ऋतू में विशेष भीड़ रहती है। इंडिया गेट में प्रवेश और फोटोग्राफी निःशुल्क हैं तथा  दर्शकों के लिए हमेशा दिन-रात खुला रहता है। नजदीकी मेट्रो स्टेशन - प्रगति मैदान है।
दिल्ली का इण्डिया गेट
राष्ट्रपति भवन:- ब्रिटिश शासन के दौरान वाइसराय भारत में सत्ता का केंद्र था। एक ऐसी घुरी जिसके चारों और प्रशासनिक व्यवस्था घूमती थी। इसलिए नई दिल्ली को इस तरह बनाने का पैफसला किया कि इसे केंद्र मान कर शहर का नक्शा बनाया जाए। दिल्ली के ऐतिहासिक स्मारक वाइसराय निवास, कनॉट प्लेस और इंडिया गेट राजपथ। इंडिया गेट पर एक हेक्सामेन बनाया गया जिस के चारों ओर उससे निकलने वाली सड़कों पर राजा महाराजा के निवास बनाने का विचार था अंग्रेज निर्माताओं का स्वपन था कि राज भवन को पहाड़ी के उफपर बनया जाए ताकि पूरे शहर में कहीं से भी देखा जा सके, परंतु जिस रूप में वायसराय हाउफस बना वह ल्यूटेन के लिए जीवन भर एक पीड़ा का कारण बना रहा यह। विजय चैक से भी दिखाई नहीं देती। नार्थ और साउथ ब्‍लाक कहीं ज्यादा भव्य रूप में दिखाई देते हैं। ल्यूटेन ने बहुत प्रयास किया हरर्बट बैंकर से विवाद भी हुआ और उसके सचिवालय बाद एक ऐसी बड़ी खाली जगह छोड़ने की व्यवस्था की गई जहां सरकारी समारोह आयोजित किए जा सके। आज हम इसे विजय चैक कहते हैं। उस समय इसे ग्रेट प्लेस कहते थे।



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जमानतीय एवं गैर जमानती अपराध



भारतीय दंड संहिता  जमानतीय और अजमानतीय अपराध का वर्गीकरण किया गया है जो निम्‍न है- 

जमानती अपराध Bailable Offense 
भारतीय दंड संहिता की धारा 2 (a) के अनुसार जमानतीय अपराध की परिभाषा दी गई है जमानती अपराध से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जो प्रथम सूची में जमानती अपराध के रूप में दिखाया गया हो या जो तब समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा जमानतीय अपराध बनाया गया हो या जो जमानती अपराध से भिन्न अन्य कोई अपराध हो। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की प्रथम अनुसूची में जमानतीय एवं अजमानतीयअपराधों का उल्लेख किया गया है जो अपराध जमानतीय बताया गया है उसमें अभियुक्त को जमानत स्वीकार करना पुलिस अधिकारी एवं न्यायालय का कर्तव्य है।  
गैर जमानती अपराध Non-Bailable Offense 
जबकि दंड प्रक्रिया संहिता में अजमानतीय (गैर जमानती) अपराध की परिभाषा नहीं दी गई है अतः यह कहा जा सकता है कि जो अपराध जमानतीय नहीं है एवं जिसे प्रथम अनुसूची में अजमानतीय अपराध के रूप में स्वीकार किया गया है वह अजमानतीय अपराध है। वास्तव में गंभीर प्रकृति के अपराधों को अजमानतीय अपराध बताया गया है ऐसे अपराधों में जमानत स्वीकार करना या नहीं करना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है।


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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके कैबिनेट मंत्रियों के मोबाइल और व्हात्सप्प नंबर



उत्तरप्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपना व्हाटसअप नंबर जारी किया है। इस नंबर के जरिये राज्य का कोई भी नागरिक शिकायत दर्ज करवा सकता है और सरकार की ओर से 3 घंटो के अंदर कार्यवाई की जाएगी। यूपी में भाजपा सरकार ने बहुत से बदलाव किये है और आदेश जारी किया है, जिनसे राज्य में सुरक्षा कानून सख्त हुआ है। योगी सरकार द्वारा राज्य में जारी उनका यह संपर्क नंबर एक नई योजना का काम कर रही है। मुख्यमंत्री के इस नंबर पर कोई भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है और दर्ज की गई समस्या या शिकायत पर 3 घंटो के अंदर करवाई की जाएगी। इस नंबर पर आने वाली समस्याओ व शिकायतों पर योगी जी की नज़र रहेगी। इस नंबर के जरिये कोई भी अभी समस्याओ को बिना परेशानी दर्ज करवा सकता है। यूपी राज्य में जारी मुख्यमंत्री जी के नंबर पर शिकायत दर्ज करवाने का समय प्रात: 7 बजे से सायं 7 बजे तक होंगी । इसके लिए राज्य में कण्ट्रोल रूम भी स्थापित किये जाएंगे।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व्हाटसअप नंबर :- 09454404444





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बैस राजपूत वंश



बैंस सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल है,  हालाँकि कुछ विद्वान इन्हें नागवंशी भी बताते हैं।
  • इनका गोत्र भारद्वाज है
  • प्रवर-तीन है : भारद्वाज, वृहस्पति और अंगिरस
  • वेद-यजुर्वेद
  • कुलदेवी-कालिका माता
  • इष्ट देव-शिव जी
  • ध्वज-आसमानी और नाग चिन्ह
प्रसिद्ध बैस व्यक्तित्व
  • शालिवाहन - शालिवाहन राजा, शालिवाहन (जिसे कभी कभी गौतमीपुत्र शताकर्णी के रूप में भी जाना जाता है) को शालिवाहन शक के शुभारम्भ का श्रेय दिया जाता है जब उसने वर्ष 78 में उजयिनी के नरेश विक्रमादित्य को युद्ध मे हराया था और इस युद्ध की स्मृति मे उसने इस युग को आरंभ किया था। एक मत है कि, शक् युग उज्जैन, मालवा के राजा विक्रमादित्य के वंश पर शकों की जीत के साथ शुरु हुआ।
  • हर्षवर्धन - हर्षवर्धन प्राचीन भारत में एक राजा था जिसने उत्तरी भारत में अपना एक सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया था। वह अंतिम हिंदू सम्राट् था जिसने पंजाब छोड़कर शेष समस्त उत्तरी भारत पर राज्य किया। शशांक की मृत्यु के उपरांत वह बंगाल को भी जीतने में समर्थ हुआ। हर्षवर्धन के शासनकाल का इतिहास मगध से प्राप्त दो ताम्रपत्रों, राजतरंगिणी, चीनी यात्री युवेन संग के विवरण और हर्ष एवं बाणभट्टरचित संस्कृत काव्य ग्रंथों में प्राप्त है। उसके पिता का नाम 'प्रभाकरवर्धन' था। राजवर्धन उसका बड़ा भाई और राज्यश्री उसकी बड़ी बहन थी।
  • त्रिलोकचंद
  • सुहेलदेव
  • अभयचंद
  • राणा बेनीमाधव बख्श सिंह
  • मेजर ध्यानचंद आदि
बैस राजपूतों की शाखाएँ
  • कोट बहार बैस
  • कठ बैस
  • डोडिया बैस
  • त्रिलोकचंदी(राव, राजा, नैथम, सैनवासी) बैस,
  • प्रतिष्ठानपुरी बैस,
  • रावत,
  • कुम्भी,
  • नरवरिया,
  • भाले सुल्तान,
  • चंदोसिया

बैस राजपूतों के प्राचीन राज्य और ठिकाने
  • प्रतिष्ठानपुरी, स्यालकोट ,स्थानेश्वर, मुंगीपट्टम्म, कन्नौज, बैसवाडा, कस्मांदा, बसन्तपुर, खजूरगाँव थालराई, कुर्रिसुदौली, देवगांव,मुरारमउ, गौंडा, थानगाँव, कटधर आदि
बैस राजपूतों वर्तमान निवास
  • यूपी के अवध में स्थित बैसवाडा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, कानपुर, इलाहबाद, बनारस, आजमगढ़, बलिया, बाँदा, हमीरपुर, प्रतापगढ़, सीतापुर रायबरेली, उन्नाव, लखनऊ, हरदोई, फतेहपुर, गोरखपुर, बस्ती, मिर्जापुर, गाजीपुर, गोंडा, बहराइच, बाराबंकी, बिहार, पंजाब, पाक अधिकृत कश्मीर, पाकिस्तान में बड़ी आबादी है और मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुछ हिस्सों में भी थोड़ी आबादी है।

परम्पराएँ
बैस राजपूत नागो को नहीं मारते हैं, नागपूजा का इनके लिए विशेष महत्व है, इनमे ज्येष्ठ भ्राता को टिकायत कहा जाता था और सम्पत्ति का बड़ा हिस्सा आजादी से पहले तक उसे ही मिलता था। मुख्य गढ़ी में टिकायत परिवार ही रहता था और शेष भाई अलग किला/मकान बनाकर रहते थे, बैस राजपूतो में आपसी भाईचारा बहुत ज्यादा होता है। बिहार के सोनपुर का पशु मेला बैस राजपूतों ने ही प्रारम्भ किया था।

बैस क्षत्रियों कि उत्पत्ति : बैस राजपूतों कि उतपत्ति के बारे में कई मत प्रचलित हैं-
  1. ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के प्रष्ठ संख्या 112-114 के अनुसार सूर्यवंशी राजा वासु जो बसाति जनपद के राजा थे, उनके वंशज बैस राजपूत कहलाते हैं, बसाति जनपद महाभारत काल तक बना रहा है
  2. देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74 के अनुसार वैशाली से निकास के कारण ही यह वंश वैस या बैस या वैश कहलाया, इनके अनुसार बैस सूर्यवंशी हैं, इनके किसी पूर्वज ने किसी नागवंशी राजा कि सहायता से उन्नति कि इसीलिए बैस राजपूत नाग पूजा करते हैं और इनका चिन्ह भी नाग है।
  3. महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी (मखवान, झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है, मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैं।
  4. महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या 154-162 में भी बैस राजपूतों को सूर्यवंशी सिद्ध किया गया है।
  5. श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के प्रष्ठ संख्या 78, 79 एवं 368, 369 के अनुसार भी बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।
  6. डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स तोड़ कृत राजपूत जातियों का इतिहास के प्रष्ठ संख्या 182 के अनुसार बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं।
  7. ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर में बैस वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी बताया गया है।
  8. इनके झंडे में नाग का चिन्ह होने के कारण कई विद्वान इन्हें नागवंशी मानते हैं,लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार भी माना जाता हैअत: कुछ विद्वान बैस राजपूतो को लक्ष्मण का वंशज और नागवंशी मानते हैं,कुछ विद्वानों के अनुसार भरत के पुत्र तक्ष से तक्षक नागवंश चला जिसने तक्षिला कि स्थापना की,बाद में तक्षक नाग के वंशज वैशाली आये और उन्ही से बैस राजपूत शाखा प्रारम्भ हुई
  9. कुछ विद्वानों के अनुसार बैस राजपूतों के आदि पुरुष शालिवाहन के पुत्र का नाम सुन्दरभान या वयस कुमार था जिससे यह वंश वैस या बैस कहलाया,जिन्होंने सहारनपुर कि स्थापना की
  10. कुछ विद्वानों के अनुसार गौतम राजा धीरपुंडीर ने 12 वी सदी के अंत में राजा अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में दिए इन बाईस परगनों के कारण यह वंश बाईसा या बैस कहलाने लगा
  11. कुछ विद्वान इन्हें गौतमी पुत्र शातकर्णी जिन्हें शालिवाहन भी कहा जाता है उनका वंशज मानते हैं, वहीं कुछ के अनुसार बैस शब्द का अर्थ है वो क्षत्रिय जिन्होंने बहुत सारी भूमि अपने अधिकार में ले ली हो

बैस वंश कि उत्पत्ति के सभी मतों का विश्लेष्ण एवं निष्कर्ष
 
बैस राजपूत नाग कि पूजा करते हैं और इनके झंडे में नाग चिन्ह होने का यह अर्थ नहीं है कि बैस नागवंशी हैं, महाकवि बाणभट ने सम्राट हर्षवर्धन जो कि बैस क्षत्रिय थे उनकी बहन राज्यश्री और कन्नौज के मौखरी (मखवान, झाला) वंशी महाराजा गृहवर्मा के विवाह को सूर्य और चन्द्र वंश का मिलन बताया है, मौखरी चंद्रवंशी थे अत: बैस सूर्यवंशी सिद्ध होते हैंलक्ष्मण जी को शेषनाग का अवतार माना जाता है किन्तु लक्ष्मन जी नागवंशी नहीं रघुवंशी ही थे और उनकी संतान आज के प्रतिहार(परिहार) और मल्ल राजपूत है।
जिन विद्वानों ने 12 वी सदी में धीरपुंडीर को अर्गल का गौतमवंशी राजा लिख दिया और उनके द्वारा दहेज में अभयचन्द्र को 22 परगने दहेज़ में देने से बैस नामकरण होने का अनुमान किया है वो बिलकुल गलत है,क्योंकि धीरपुंडीर गौतम वंशी नहीं पुंडीर क्षत्रिय थे जो उस समय हरिद्वार के राजा थे, बाणभट और चीनी यात्री ह्वेंस्वांग ने सातवी सदी में सम्राट हर्ष को स्पष्ट रूप से बैस या वैश वंशी कहा है तो 12 वी सदी में बैस वंशनाम कि उतपत्ति का सवाल ही नहीं है, किन्तु यहाँ एक प्रश्न उठता है कि अगर बैस वंश कि मान्यताओं के अनुसार शालिवाहन के वंशज वयस कुमार या सुंदरभान सहारनपुर आये थे तो उनके वंशज कहाँ गए?
बैस वंश कि एक शाखा त्रिलोकचंदी है और सहारनपुर के वैश्य जैन समुदाय कि भी एक शाखा त्रिलोकचंदी है इन्ही जैनियो के एक व्यक्ति राजा साहरनवीर सिंह ने अकबर के समय सहारनपुर नगर बसाया था, आज के सहारनपुर, हरिद्वार का क्षेत्र उस समय हरिद्वार के पुंडीर शासको के नियन्त्रण में था तो हो सकता है शालिवाहन के जो वंशज इस क्षेत्र में आये होंगे उन्हें राजा धीर पुंडीर ने दहेज़ में सहारनपुर के कुछ परगने दिए हों और बाद में ये त्रिलोकचंदी बैस राजपूत ही जैन धर्म ग्रहण करके व्यापारी हो जाने के कारण वैश्य बन गए हों और इन्ही त्रिलोकचंदी जैनियों के वंशज राजा साहरनवीर ने अकबर के समय सहारनपुर नगर कि स्थापना कि हो, और बाद में इन सभी मान्यताओं में घालमेल हो गया होअर्गल के गौतम राजा अलग थे उन्होंने वर्तमान बैसवारे का इलाका बैस वंशी राजा अभयचन्द्र को दहेज़ में दिया था।
गौतमी पुत्र शातकर्णी को कुछ विद्वान बैस वंशावली के शालिवाहन से जोड़ते हैं किन्तु नासिक शिलालेख में गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी को एक ब्राह्मण (अद्वितिय ब्राह्मण) तथा खतिय-दप-मान-मदन अर्थात क्षत्रियों का मान मर्दन करने वाला आदि उपाधियों से सुशेभित किया है। इसी शिलालेख के लेखक ने गौतमीपुत्र की तुलना परशुराम से की है। साथ ही दात्रीशतपुतलिका में भी शालीवाहनों को मिश्रित ब्राह्मण जाति तथा नागजाति से उत्पन्न माना गया है। अत: गौतमी पुत्र शातकर्णी अथवा शालिवाहन को बैस वंशी शालिवाहन से जोड़ना उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि बैसवंशी सूर्यवंशी क्षत्रिय हैं
उपरोक्त सभी मतो का अधयन्न करने पर हमारा निष्कर्ष है कि बैस राजपूत सूर्यवंशी हैं, प्राचीन काल में सूर्यवंशी इछ्वाकू वंशी राजा विशाल ने वैशाली राज्य कि स्थापना कि थी, विशाल का एक पुत्र लिच्छवी था यहीं से सुर्यवंश कि लिच्छवी, शाक्य (गौतम), मोरिय (मौर्य), कुशवाहा (कछवाहा), बैस शाखाएँ अलग हुई, जब मगध के राजा ने वैशाली पर अधिकार कर लिया और मगध में शूद्र नन्दवंश का शासन स्थापित हो गया और उसने क्षत्रियों पर जुल्म करने शुरू कर दिए तो वैशाली से सूर्यवंशी क्षत्रिय पंजाब, तक्षिला, महाराष्ट्र, स्थानेश्वर, दिल्ली आदि में आ बसे, दिल्ली क्षेत्र पर भी कुछ समय बैस वंशियों ने शासन किया, बैंसों की एक शाखा पंजाब में आ बसी। इन्होंने पंजाब में एक नगर श्री कंठ पर अधिकार किया, जिसका नाम आगे चलकर थानेश्वर हुआ। दिल्ली क्षेत्र थानेश्वर के नजदीक है अत:दिल्ली शाखा,थानेश्वर शाखा,सहारनपुर शाखा का आपस में जरुर सम्बन्ध होगा, बैसवंशी सम्राट हर्षवर्धन अपनी राजधानी थानेश्वर से हटाकर कन्नौज ले गए, हर्षवर्धन ने अपने राज्य का विस्तार बंगाल, असम, पंजाब, राजपूताने, मालवा व नेपाल तक किया और स्वयं राजपुत्र शिलादित्य कि उपाधि धारण की।
हर्षवर्द्धन के पश्चात् इस वंश का शासन समाप्त हो गया और इनके वंशज कन्नौज से आगे बढकर अवध क्षेत्र में फ़ैल गए, इन्ही में आगे चलकर त्रिलोकचंद नाम के प्रसिद्ध व्यक्ति हुए इनसे बैस वंश कि कई शाखाएँ चली, इनके बड़े पुत्र बिडारदेव के वंशज भाले सुल्तान वंश के बैस हुए जिन्होंने सुल्तानपुर कि स्थापना की.इन्ही बिडारदेव के वंशज राजा सुहेलदेव हुए जिन्होंने महमूद गजनवी के भतीजे सैय्यद सलार मसूद गाजी को बहराइच के युद्ध में उसकी सेना सहित मौत के घाट उतार दिया था और खुद भी शहीद हो गए थे
चंदावर के युद्ध में हर्षवर्धन के वंशज केशवदेव भी जयचंद के साथ युद्ध लड़ते हुए शहीद हो गए बाद में उनके वंशज अभयचंद ने अर्गल के गौतम राजा कि पत्नी को तुर्कों से बचाया जिसके कारण गौतम राजा ने अभयचंद से अपनी पुत्री का विवाह कर उसे 1440 गाँव दहेज़ में दे दिए जिसमें विद्रोही भर जाति का दमन कर अभयचंद ने बैस राज्य कि नीव रखी जिसे आज बैसवाडा या बैसवारा कहा जाता है, इस प्रकार सूर्यवंशी बैस राजपूत आर्याव्रत के एक बड़े भू भाग में फ़ैल गए

बैसवंशी राजपूतों का सम्राट हर्षवर्धन से पूर्व का इतिहास
बैस राजपूत मानते हैं कि उनका राज्य पहले मुर्गीपाटन पर था और जब इस पर शत्रु ने अधिकार कर लिया तो ये प्रतिष्ठानपुर आ गए, वहां इस वंश में राजा शालिवाहन हुए, जिन्होंने विक्रमादित्य को हराया और शक सम्वत इन्होने ही चलाया,कुछ ने गौतमी पुत्र शातकर्णी को शालिवाहन मानकर उन्हें बैस वंशावली का शालिवाहन बताया है और पैठण को प्रतिष्ठानपुर बताया और कुछ ने स्यालकोट को प्रतिष्ठानपुर बताया है, किन्तु यह मत सही प्रतीत नहीं होते कई वंशो बाद के इतिहास में यह गलतियाँ कि गई कि उसी नाम के किसी प्रसिद्ध व्यक्ति को यह सम्मान देने लग गए, शालिवाहन नाम के इतिहास में कई अलग अलग वंशो में प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। भाटी वंश में भी शालिवाहन हुए हैं और सातवाहन वंशी गौतमीपुत्र शातकर्णी को भी शालिवाहन कहा जाता था, विक्रमादित्य के विक्रम सम्वत और शालिवाहन के शक सम्वत में पूरे 135 वर्ष का फासला है अत: ये दोनों समकालीन नहीं हो सकते.दक्षिण के गौतमीपुत्र शातकर्णी को नासिक शिलालेख में स्पष्ट ब्राह्मण लिखा है अत:इसका सूर्यवंशी बैस वंश से सम्बन्ध होना संभव नहीं है। 

वस्तुत: बैस इतिहास का प्रतिष्ठानपुर न तो दक्षिण का पैठण है और न ही पंजाब का स्यालकोट है यह प्रतिष्ठानपुर इलाहबाद (प्रयाग) के निकट और झूंसी के पास था, किन्तु इतना अवश्य है कि बैस वंश में शालिवाहन नाम के एक प्रसिद्ध राजा अवश्य हुए जिन्होंने प्रतिष्ठानपूरी में एक बड़ा बैस राज्य स्थापित किया, शालिवाहन कई राज्यों को जीतकर उनकी कन्याओं को अपने महल में ले आये, जिससे उनकी पहली तीन क्षत्राणी रानियाँ खिन्न होकर अपने पिता के घर चली गयी, इन तीन रानियों के वंशज बाद में भी बैस कहलाते रहे और बाद कि रानियों के वंशज कठबैस कहलाये, ये प्रतिष्ठानपुर (प्रयाग)के शासक थे।

इन्ही शालिवाहन के वंशज त्रिलोकचंद बैस ने दिल्ली (उस समय कुछ और नाम होगा) पर अधिकार कर लिय.स्वामी दयानंद सरस्वती के अनुसार दिल्ली पर सन 404 ईस्वी में राजा मुलखचंद उर्फ़ त्रिलोकचंद प्रथम ने विक्रमपाल को हराकर शासन स्थापित किया इसके बाद विक्र्मचन्द, कर्तिकचंद, रामचंद्र, अधरचन्द्र, कल्याणचन्द्र, भीमचंद्र, बोधचन्द्र, गोविन्दचन्द्र और प्रेमो देवी ने दो सो से अधिक वर्ष तक शासन किया,वस्तुत ये दिल्ली के बैस शासक स्वतंत्र न होकर गुप्त वंश और बाद में हर्षवर्धन बैस के सामंत के रूप में यहाँ पर होंगे,इसके बाद यह वंश दिल्ली से समाप्त हो गया,और सातवी सदी के बाद में पांडववंशी अर्जुनायन तंवर क्षत्रियों(अनंगपाल प्रथम) ने प्राचीन इन्द्रप्रस्थ के स्थान पर दिल्ली कि स्थापना की. वस्तुत:बैसवारा ही बैस राज्य था. (देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 70,एवं ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 113,114)

बैस वंश कि शाखाएँ
  • कोट बाहर बैस - शालिवाहन कि जो रानियाँ अपने पीहर चली गयी उनकी संतान कोट बाहर बैस कहलाती है
  • कठ बैस - शालिवाहन कि जो जीती हुई रानियाँ बाद में महल में आई उनकी संतान कोट बैस या कठ बैस कहलाती हैं।
  • डोडिया बैस - डोडिया खेडा में रहने के कारण राज्य हल्दौर जिला बिजनौर
  • त्रिलोकचंदी बैस - त्रिलोकचंद के वंशज इनकी चार उपशाखाएँ हैं राव, राजा, नैथम व सैनवासी
  • प्रतिष्ठानपूरी बैस - प्रतिष्ठानपुर में रहने के कारण
  • चंदोसिया - ठाकुर उदय बुधसिंह बैस्वाड़े से सुल्तानपुर के चंदोर में बसे थे उनकी संतान चंदोसिया बैस कहलाती है
  • रावत - फतेहपुर, उन्नाव में
  • भाले सुल्तान - ये भाले से लड़ने में माहिर थे मसूद गाजी को मारने वाले सुहेलदेव बैस संभवत: इसी वंश के थे,रायबरेली, लखनऊ, उन्नाव में मिलते हैं
  • कुम्भी एवं नरवरिया - बैसवारा में मिलते हैं

बैसवंशी राजपूतो कि वर्तमान स्थिति 
बैस राजपूत वंश वर्तमान में भी बहुत ससक्त वंश मन जाता है, ब्रिटिश गजेटियर में भी इस वंश कि सम्पन्नता और कुलीनता के बारे में विस्तार से लिखा गया है। अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश के बैसवारा में बहुत से बड़े जमीदार बैस वंश से थे, बैस वंशी राणा बेनी माधव बख्श सिंह और दूसरे बैस जमीदारों ने सन 1857 इसवी में अवध क्षेत्र में अंग्रेजो से जमकर लोहा लिया था, बैस राजपूतों द्वारा अंग्रेजो का जोरदार विरोध करने के बावजूद अंग्रेजो कि हिम्मत इनकी जमिदारियां खत्म करने कि नहीं हुई, बैस राजपूत अपने इलाको के सरताज माने जाते हैं और सबसे साफ़ सुथरे सलीकेदार वस्त्र धारण करने से इनकी अलग ही पहचान हो जाती है, अंग्रेजी ज़माने से ही इनके पक्के ऊँचे आवास इनकी अलग पहचान कराते थे, इनके बारे में लिखा है कि-
"The Bais Rajput became so rich at a time it is recorded that each Bais Rajput held Lakhs (Hundreds of thousands) of rupees a piece which could buy them nearly anything. To hold this amount of money you would have to have been extremely rich.This wealth caused the Bais Rajput to become the "best dressed and housed people"[22] in the areas they resided. This had an influence on the areas of Baiswara and beyond as recorded the whole area between Baiswara and Fyzabad was.
जमीदारी के अतिरिक्त बैस राजपूत राजनीती और व्यापार के क्षेत्र में भी कीर्तिमान बना रहे हैं,कई बड़े व्यापारी और राजनेता भारत और पाकिस्तान में बैस बंश से हैं जो विदेशो में भी व्यापार कर रहे हैं,राजनीती और व्यापार के अतिरिक्त खेलो कि दुनियां में मेजर ध्यानचंद जैसे महान हॉकी खिलाडी,उनके भाई कैप्टन रूप सिंह आदि बड़े खिलाडी बैस वंश में पैदा हुए हैं.कई प्रशासनिक अधिकारी,सैन्य अधिकारी बैस वंश का नाम रोशन कर रहे हैं। वस्तुत: जिस सूर्यवंशी बैस वंश में शालिवाहन, हर्षवर्धन, त्रिलोकचंद, सुहेलदेव, अभयचंद, राणा बेनी माधव बख्श सिंह, मेजर ध्यानचंद आदि महान व्यक्तित्व हुए हैं उन्ही के वंशज भारत,पाकिस्तान,पाक अधिकृत कश्मीर, कनाडा, यूरोप में बसा हुआ बैस राजपूत वंश आज भी पूरे परिश्रम, योग्यता से अपनी सम्पन्नता और प्रभुत्व समाज में कायम किये हुए है और अपने पूर्वजो कि गौरवशाली परम्परा का पालन कर रहा है


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उत्तर प्रदेश में महाधिवक्ता और अपर महाधिवक्ताओ की मनमानी नियुक्तियां



उत्तर प्रदेश में महाधिवक्ता और अपर महाधिवक्ताओ कि नियुक्ति पर मन में कुछ प्रश्न उपजे है,
  1. क्या महाधिवक्ता और अपर महाधिवक्ताओ कि नियुक्ति वास्तव में सर्वोत्तम है और क्या वास्तव में नवनियुक्त 6 विकल्पों से अच्छे विकल्प संघ, भाजपा और अन्य अनुसांगिक सगठनों में उपलब्ध नहीं थे ?
  2. इन नियुक्ति के समय ग्राउंड लेबल (जमीनी स्तर) पर कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार अधिकारीयों से राय ली गयी?
  3. इन नियुक्तियों में अधिवक्ताओं कि योग्यता, कार्य कुशलता, वरिष्ठता और कार्यकर्ताओं के मध्य लोकप्रियता आदि पैमानों पर गढ़ा गया?
मेरे इन प्रश्नों के उत्तर देना उपरी लोगो के लिए कठिन होगा, क्योकि ये चयनित नाम उत्तम हो सकते है किन्तु यह सर्वोत्तम नहीं है इसलिए मैं महाधिवक्ता सहित सभी नियुक्तियों निंदा और भर्त्सना करता हूँ, कोई भी चयन निष्पक्ष नहीं रहा और न ही जनभावना के सम्मान में रख कर किया गया.. वास्तव में यह नियुक्तियां बड़े बड़े राजनैतिक "घाघों" के दबाव में हुई है..
http://images.indianexpress.com/2017/03/up-logo.jpg?w=480

उत्तर प्रदेश में महाधिवक्ता और अपर महाधिवक्ता के चयन पर प्रश्न उठ रहा है कि 1 माह बाद खूब खोज बीन कर नियुक्ति भी हुई तो सिफारिशी लोगो की। उत्तर प्रदेश में आजादी के बाद पहले महाधिवक्ता स्व प्यारेलाल बनर्जी थे। गोविन्द बल्लभ पन्त उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। महाधिवक्ता से किसी राय की जरूरत थी। महाधिवक्ता को पन्त जी ने इलाहबाद से लखनऊ बुलवाया। बनर्जी साहब ने जो उत्तर दिया वह चकरा देने वाला था।

उन्होंने कहा कि मुवक्किल वकील के पास जाता है, न कि वकील मुवक्किल के पास। पन्त जी ने निर्देश दिया कि चीफ सेक्रेटरी तुरंत इलाहाबाद जा कर महाधिवक्ता से विचार विमर्श करें और चीफ सेक्रेटरी ने ऐसा ही किया। इसके बाद बनर्जी साहब ने इस्तीफा दे दिया। वकालत के कार्य की dignity अर्थात सम्मान का बड़ा महत्व है, बनर्जी साहब का यह कदम वकीलों के सम्‍मान के लिए एक नमूना मात्र है। वर्तमान एक महाधिवक्ता मंत्री और विधायको की चरण वंदना करने से बाज नहीं आयेगे। 

महाधिवक्ता का पद तो अब हर मुख्यमंत्री और राजनेताओं के पसंद का पद हो चुका है। जहाँ तक काबिलियत की कोई कीमत नही है और कबीलीयत की परख तब होती है जब भी कोई तकनिकी विधि का मामला होता है नियु‍क्त महाधिवक्ता और अपर महाधिवक्ता हाथ खड़ेकर देते है और सरकार को सलाह और पैरवी के लिये मोटी फीस पर विशेष अधिवक्ता नियुक्त करना पड़ता है, ऐसे कई मामले पिछली सपा सरकार मे आये थे जब महाधिवक्ता वि‍जय बहादुर 7 जजो की बेच के सामने बौने पड़ गये और सरकार को विशेष वकील के रूप मे एसपी गुप्‍ता नियुक्त करना पड़ा और अन्‍य अपर महाधिवक्ता भी सिर्फ मजे मारते रहे। सरकार को अपने द्वारा नियमित ढंग से नियुक्त किये गए वकीलों पर भरोसा नहीं रहता।

प्रदेश की सरकार ठीक काम करे इसका बहुत कुछ दारोमदार महाधिवक्‍ता का होता है। चाटुकारिता करने वालो की ही नियुक्ति होगी तो महाधिवक्ता और अपर महाधिवक्ता पुरानी कहावत चरित्रार्थ करेगे कि "काम के न काज के दुश्‍मन अनाज के"


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हिंदी पर्यायवाची शब्द कोष



शब्द विशेश के लिए लगभग समान अर्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्दों को पर्यायवाची शब्द की संज्ञा दी जाती है। ऐसे विभिन्न शब्दों की समानता को ध्यान मे रख कर इनके लिए समानार्थी या समानार्थक शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। पर्यायवाची शब्दो के विषय मे मुख्य रूप से यह उल्लेखनीय तथ्य है कि ये शब्द आपस में पूर्ण समान न होकर लगभग समान होते हैं। पूर्ण समानार्थी शब्द को एकार्थी शब्द का नाम दिया जात है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि पर्यायवाची शब्द आपस मे पूर्ण समान लगते हैं, किन्तु लगभग समान होते हैं। गंभीर चिंतन करने पर उनमें सूक्ष्म भिन्नता अवश्य सामने आती है। पर्यायवाची शब्द हिंदी भाषा की सबसे प्रमुख विशेशता है। लगभग समान अर्थ के लिए विभिन्न शब्दों के प्रयोग से भाषा का नवीन और आकृर्शक रूप सामने आता है। जिस प्रकार विभिन्न संदर्भों में मनुष्य भिन्न-भिन्न वस्त्रों को पहन कर सुन्दर लगता है, उसी प्रकार समान अर्थ के लिए भिन्न-भिन्न शब्दों के प्रयोग से जहाँ भाषा को भास्वर रूप मिलता है, वहीं अभिव्यक्ति भी प्रभावी होती है।
  • अकस्मात - अचानक, अनायास, एकदम, एकाएक, सहसा
  • अगणित - अनगिनत, अनन्त, असंख्य, असीम
  • अग्नि - अनल, आग, ज्वाला, दव, पावक, वह्नि, हुताशन
  • अज्ञान - अविद्या, अविवेक, जड़, मूर्ख
  • अतिथि - अम्यागत, आगन्तुक, पाहुना, मेहमान
  • अधम - तुच्छ, निकृश्ट, नीच, पतित
  • अधिक - अति, अतिशय, अतीव, ज्यादा, प्रचुर, बहुत
  • अनुचर - दास, नौकर, परिचारक, भृत्य, सेवक
  • अनुपम - अतुल, अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा, अनोखा, अपूर्व, अभूतपूर्व, निराला
  • अंधकार - अंधेरा, तम, तिमिर, तमिस्र
  • अपमान - अनादर, अप्रतिश्ठा, अवमाना, अवहेलना, उपेक्षा, तिरस्कार, निरादर
  • अमृत - अमिय, अमी, पीयूश, सुधा, सोम
  • असुर - तमीचर, दनुज, दानव, दैत्य, निशाचर, राक्षस
  • अहंकार - अभिमान, घमण्ड, दंभ, दर्प
  • आँख - अक्षि, चक्षु, दृग, नयन, नेत्र, लोचन, विलोचन
  • आकाश - अंतरिक्ष, अंबर, आसमान, गगन, नभ, व्योम, शून्य
  • आक्रमण - अभियान, चढ़ाई, धावा, हमला
  • आनंद - आमोद आह्लाद, उल्लास, खुशी, प्रमोद, प्रसन्नता, प्रसाद, मोद,हर्ष
  • आपत्ति - आपदा, आफत, कश्ट, क्लेश, विपत्ति, विपदा
  • आभूशण - अलंकरण, अलंकार, आमरण, गहना, जेवर, विभूषण
  • आम - अमृतफल, आम्र, रसाल
  • आयु - अवस्था, उमर, जीवन-काल, वय
  • अकस्मात - अचानक, अनायास, एकदम, एकाएक, सहसा
  • अगणित - अनगिनत, अनन्त, असंख्य, असीम
  • अग्नि - अनल, आग, ज्वाला, दव, पावक, वह्नि, हुताशन
  • अज्ञान - अविद्या, अविवेक, जड़, मूर्ख
  • अतिथि - अम्यागत, आगन्तुक, पाहुना, मेहमान
  • अधम - तुच्छ, निकृश्ट, नीच, पतित
  • अधिक - अति, अतिशय, अतीव, ज्यादा, प्रचुर, बहुत
  • अनुचर - दास, नौकर, परिचारक, भृत्य, सेवक
  • अनुपम - अतुल, अद्भुत, अद्वितीय, अनूठा, अनोखा, अपूर्व, अभूतपूर्व, निराला
  • अंधकार - अंधेरा, तम, तिमिर, तमिस्र
  • अपमान - अनादर, अप्रतिश्ठा, अवमाना, अवहेलना, उपेक्षा, तिरस्कार, निरादर
  • अमृत - अमिय, अमी, पीयूश, सुधा, सोम
  • असुर - तमीचर, दनुज, दानव, दैत्य, निशाचर, राक्षस
  • अहंकार - अभिमान, घमण्ड, दंभ, दर्प
  • आँख - अक्षि, चक्षु, दृग, नयन, नेत्र, लोचन, विलोचन
  • आकाश - अंतरिक्ष, अंबर, आसमान, गगन, नभ, व्योम, शून्य
  • आक्रमण - अभियान, चढ़ाई, धावा, हमला
  •  इच्छा - अभिलाशा, आकांक्षा, कामना, चाह, मनोरथ, लालसा
  • इन्द्र - देवराज, देवेन्द्र, देवेश, पुरन्दर, पुरुहूत, मधवा, महेन्द्र, वज्रपाणि, शक्र, सुरपति, सुरेन्द्र, सुरेश
  • ईश्वर - ईश, जगदीश, जगन्नाथ, दीनबंधु, परमात्मा, परमेश्वर, प्रभु, भगवान, स्वयंभू
  • उग्र - घोर, तीव्र, प्रचण्ड, रौद्र, विकट
  • उत्साह - उमंग, जोश, प्रेरणा, साहस
  • उद्देश्य - अभिप्राय, आशय, तात्पर्य, मतलब, लक्ष्य
  • उद्यान - उपवन, कुसुमाकर, फुलवारी, बगीचा, बाग, वाटिका
  • उन्नति - अभ्युदय, उत्कर्ष, उत्थान, उदय, उन्नयन, प्रगति, विकास
  • उपकार - नेकी, भलाई, हित
  • उपमा - तुलना, समानता, सादृश्य
  • उपवन - आराम, उद्यान, बाग, वाटिका
  • उपवास - अनशन, निराहार, फाका, व्रत
  • ओर - तरफ, दिशा, पक्ष
  • ओस - तुशार, तुहिन, शबनम, हिम
  • और - अधिक, एवं, ज़्यादा, तथा, दूसरा
  • कठिन - कठोर, दुश्कर, दृढ़, सख़्त
  • कपड़ा - अंबर, चीर, पद, वसन, वस्त्रम
  • कमल - अंबुज, अरविन्द, उत्पल, कंज, जलज, नलिन, नीरज, पंकज, पद्म, पुण्डरीक, राजीव, वारिज, शतदल, सरसिज, सरोज
  • कमी - घाटा, टोटा, तंगी, न्यूनता
  • कल्पवृक्ष - कल्पतरु, कल्पद्रुम, देववृक्ष, सुरतरु, सुरद्रुम
  • कहानी - आख्यान, आख्यायिका, उपाख्यान, कथा, गल्प
  • कान - कर्ण, श्रवण, श्रवणेन्द्रिय, श्रुतिपट
  • कामदेव - अतनु, अनंग, कन्दर्प, काम, पंचसर, मदन, मनसिज, मनोज, मन्मथ, रतिपति, विश्वकेतु, स्मर
  • किनारा - कगार, कूल, छोर, तट, तीर
  • किरण - अंशु, कर, मयूख, मरीचि, रश्मि
  • किसान - कृशक, खेतहिर, हलधर, हाली
  • कुबेर - किन्नरेश, धनद, धनपति, धनाधिप, यक्षराज
  • कृष्ण - कान्हा, केशव, गिरिधर, गोपाल, घनश्याम, माधव, मुरारि, मोहन, राधावल्लभ, वासुदेव, श्याम
  • कोमल - नरम, नाजुक, मसृण, मृदु, मुलायम, सुकुमार
  • कोयल - कोकिल, कोकिला, परभृात, पिंक, बसंतदूत, श्याम
  • कौशल - कुशलता, चतुराई, चातुर्य, दक्षता, निपुणता, प्रवीणता
  • क्रोध - आक्रोश, आवेश, कोप, गुस्सा,रोष
  • खल - अद्यम, कुटिल, दुर्जन, दुश्ट, धूर्त, नीच
  • खोज - अनुसंधान, अन्वेशण, तलाश, शोध
  • गंगा - अलकनंदा, जाहूनवी, त्रिपथगा, देवनदी, देसाई, देवसरी, भागीरथी, मंदाकिनी, सुरसरि,सुरसरिता
  • गंदा - अपवित्र, अशुद्ध, अश्लील, खराब, घिनौना, घृणित, मलिन, मैला
  • गंध - बास, बू, महक
  • गणेश - एकदन्त, गजवदन, गजानन, गणपति, भवानी-नंदन, मोदक-प्रिय, लंबोदर, विध्न-विनाशक, विध्नेश, विनायक
  • गरुण - खगकेतु, खगेश, पक्षिराज, वैनतेय, हरिवाहन
  • गाय - गो, गौ, धेनु, सुरभि
  • गुरू - अध्यापक, आचार्य, उपाध्याय, वृहस्पति, शिक्षक
  • घर - अयन, आगार, आलय, आवास, गृह, गेह, धाम, निकेतन, निवास, भवन, मन्दिर, शाला, सदन
  • घड़ा - कलश, कुंभ, गगरी, गागर, घट
  • घमंड - अभिमान, अहंकार, ऐंठ, गर्व, दर्प, मान
  • घोड़ा - अश्व, घोटक, तुरग, तुरंग, तुरंगम, वाजि, सैंधव, हय
  • चन्द्रमा - इन्दु, कलानिधि, चन्द्र, चाँद, निशाकर, मयंक, मृगांक, रजनीश, राकेश, विधु, शशांरक, शशि, सोम, हिमकर, हिमांशु
  • चतुर - कुशल, चालाक, दक्ष, नागर, निपुण, प्रवीण, योग्य, सयाना, होशियार
  • चमक - आभा, कांति, दमक, दीप्ति, द्युति, प्रकाश
  • चोट - आघात, घाव, प्रहार, व्रण
  • छल - कपट, चकमा, ठगी, धोखा, प्रपंच
  • छटा - कान्ति, छवि, शोभा, सुन्दरता, सौंदर्य
  • छाया - परछाई, प्रतिकृति, प्रतिबिम्ब, प्रतिमूर्ति, बिम्ब
  • छोटा - कनिश्ठ, तुच्छ, लघु, हीन
  • जंगल - अरण्य, कानन, कांतार, वन, विपिन
  • जल - अंबु, उदक, जीवन, तोय, नीर, पय, पानी, वारि, सलिल
  • जमुना - कालिंदी, यमुना, रविनंदिनी, रवि-सुता, श्यामा, सूर्य-तनया
  • जीभ - जबान, जिह्वा, रसना
  • झंडा - केतु, ध्वज, ध्वजा, निशान, पताका
  • तलवार - असिं, करवाल, कृपाण, खड्ग, चंद्रहास, शमशीर
  • तारा - उडु, तारक, तारिका, नक्षत्र, नखत
  • तालाब - जलाशय, तड़ाग, ताल, पुष्कर, पोखर, सर, सरोवर
  • तीर - आशुगू, इषु, बाण, शर, शिलीमुख
  • थोड़ा - अल्प, कम, किंचित, कुछ, जरा, तनिक, न्यून, रंच
  • दाँत - दन्त, दशन, द्विज, रद
  • दुख - कष्ट, क्लेश, क्षोभ, पीड़ा, विषाद, वेदना, व्यथा, शोक
  • दुर्गा - कल्याणी, कामाक्षी, काली, जगदम्बा, चंडी, चंडिका, भवानी, महागौरी, माता, सिहंवाहिनी
  • दुष्ट - अधम, कुटिल, खल, दुर्जन, धूर्त, पामर, वंचक,शठ
  • दूध - क्षतीर, गोरस, दुग्ध, पय
  • देवता - अमर, आदित्य, देव, निर्जर, विबुध, सुर
  • देह - कलेवर, काया, गात्र, तन, वपु, शरीर
  • धन - अर्थ, दौलत, मुद्राराशि, पूँजी, लक्ष्मी, विभूति, वित्त, श्री, सम्पत्ति, सम्पदा
  • धनवान - अमीर, धनाढ्य, धनी, श्रीमान, समृद्ध, सम्पन्न।
  • धनुष - कमान, कार्मुक, कोदण्ड, चाप, शरासन
  • नदी - अपगा, तटिनी, तरंगिनी, दरिया, नद, मिर्झरिणी, निम्नगा, सरि, सरिता
  • नमस्कार - अभिवादन, नमः, प्रणति, प्रणाम, वंदन
  • नया - अभिनव, नवीन, नूतन
  • निर्धन - कंगाल, गरीब, दरिद्र, दीन, रंक
  • नौकर - अनुचर, दास, परिचारक, भृत्य, सेवक
  • पंडित - कोविद, पारंगत, बुद्धिमान, बुध, मनीषी, विज्ञ, विद्वान, सुधी
  • पक्षी - अण्डज, खग, खेचर, चिड़िया, नभचर, पखेरू, पतंग,विहंग, विहंगम, विहग
  • पति - आर्यपुत्र, कांत, नाथ, प्राणनाथ, प्राणेश्वर, बालम, भर्ता, वल्लभ, साजन, स्वामी
  • पत्ता - किसलय, दल, पत्र, पर्ण, पात
  • पत्थर - अश्म, उपल, पाषाण, पाहन, प्रस्तर, शिला
  • पत्नी - अर्धांगिनी, कलभ, कान्ता, गृहिणी, जीवन-संगिनी, दारा, प्रिया, भार्या, वधू, वामांगिनी, वामा, स्त्री
  • पराजय - तिरस्कार, निरादर, पराभव, हार
  • पर्वत - अचल, अद्रि, गिरि, चट्टान, नग, पहाड़, भूधर, महीधर, शैल
  • पवन - अनिल, बयार, मारुत, वात, वायु, समीर, समीरण, हवा
  • पवित्र - अकलुश, निर्मल, निष्कलुष, पावन, पुण्य, पूत, शुचि, शुद्ध
  • पाँव - चरण, पग, पद, पाद, पैर
  • पाप - अध, अधर्म, दुष्कृत्य, पातक
  • पिता - जनक, बाप, बापू
  • पुत्र - आत्मज, तनय, तनुज, नन्दन, बेटा, लड़का, लाल, सुत
  • पुत्री - आत्मजा, कन्या, तनया, तनुजा, दुहिता, नन्दिनी, बेटी, लड़की, लाली, सुता
  • पुरस्कार - इनाम, तोहफा, पारितोषिक
  • पुरुष - आदमी, जन, नर, मनुज, मनुष्य, मर्द
  • पूजा - अर्चना, आराधना, उपासना, भक्ति
  • पृथ्वी - अचला, अवनि, जगती, धरणी, धरती, धरा, धरित्री, धारयित्री, भूमि, भू, मही, वसुंधरा, वसुधा
  • प्रकाश - उजाला, चमक, छवि, ज्योति, द्युति, प्रभा, रोशनी
  • प्रेम - नेह, प्रणय, प्रीति, प्यार, ममता, रति, स्नेह
  • बंदर - कपि, कीश, मर्कट, वानर, शाखामृग, हरि
  • बर्फ - तुषार, तुहिन, नीहार, हिम
  • बहन - दीदी, भगिनी, सहोदरा, स्वसा
  • बादल - अंबुद, घन, जलद, जलधर, तोयद, नीरद, पयोद, पयोधर, मेघ, वारिधर
  • बाल - अलक, कच, कुंतल, केश, चिकुर, शिरोरुह
  • बालक - बच्चा, बाल, लड़का, शावक, शिशु
  • बिजली - चंचला, चपला, तड़ित, दामिनी, विद्युत, सौदामिनी
  • बुद्धि - अक्ल, धी, प्रज्ञा, मति, मनीषा, मेधा, विवेक
  • ब्रह्मा - अज, कर्ता, कर्तारि, कमलामन, चतुरानन, चतुर्मुख, पितामह, प्रजापति, लोकेश, विधाता, विधि, स्रष्टा, स्वयंभू
  • भयानक - घोर, भयंकर, भयावह, भीषण, भीष्म, विकट, विकराल
  • भाग्य - किस्मत, दैव, नियति, प्रारब्ध, विधि, होनहार, होनी
  • भौंरा - अलि, द्विरेफ, भँवरा, भृंग, भ्रमर, मधुकर, मधुप, षट्पद
  • मधु - ऋतुराज, कुसुमाकर, माधव, वसंत
  • मनुष्य - आदमी, इन्सान, नर, मनुज, मत्र्य, मानव
  • महादेव - आशुतोष, विलोचना, पशुपति, महेश, रुद्र, शंकर, शिव
  • माता - अम्बा, अम्बिका, जननी, धात्रा, प्रसू, माँ, मातृ
  • मित्र - दोस्त, बंधु, मीत, सखा, सहचर, साथी, सुहृद
  • मिथ्या - अयथार्थ, असत्य, झूठ, मृषा
  • मीन - अंडज, झष, मकर, मछली, मत्स्य
  • मुक्ति - कैवल्य, निर्वाण, परमपद, मोक्ष, सद्गति
  • मृत्यु - अन्त, अवसान, देहान्त, देहावसान, निधन, प्राणान्त, मरण, मौत, शरीरान्त
  • मोर - केकी, मयूर, शिखी
  • यत्न - उद्यम, उद्योग, चेष्टा, परिश्रम, प्रयत्न, प्रयास, मेहनत
  • यमराज - जीवनपति, धर्मराज, यम, सूर्यपुत्र, हरि
  • युद्ध - रण, लड़ाई, संग्राम, संघर्ष, समर, विग्रह
  • युवक - जवान, तरुण, नौजवान, युवा
  • राक्षस - असुर, दनुज, दानव, दैत्य, निशाचर, पिसाच
  • राजा - नरेन्द्र, नरेश, नृप, नृपति, भूप, भूपति, महीप, महीपति
  • रात्रि - तमसा, निशा, निशि, यामा, यामिनी, रजनी, रात, रैन, विभावरी
  • रावण - दशकंठ, दशकंध, दशग्रीव, दशानन, लंकापति, लंकेश
  • लक्ष्मी - इन्दिरा, कमला, चंचला, चपला, पद्मा, रंभा, विष्णुप्रिया, श्री, हरिप्रिया
  • लहू - खून, रक्त, रुधिर, लाल, शोणित
  • वन - अटवी, अरण्य, कानन, कान्तार, गहन, जंगल, विपिन
  • वर्षा - बरसात, बारिश, मेहं , वृष्टि
  • बसंत - ऋतुराज, कुसुमाकर, मधुमास, माधव
  • विध्न - अड़चन, बाधा, रुकावट
  • विवाह - गठबंधन, परिणय, पाणिग्रहण, ब्याह, शादी
  • विष - कालकूट, गरल, जहर, हलाहल
  • विष्णु - अच्युत, उपेन्द्र, कमलापति, केशव, पीताम्बर, गोविन्द, चक्रपाणि, चतुर्भुज, जनार्दन, नारायण, पीताम्बर, माधव, रमापति, लक्ष्मीपति, विश्वंभर
  • वृक्ष - तरु, दरख्त, द्रुभ, पादप, पेड़, विटप
  • शत्रु - अराति, अरि, दुश्मन, रिपु, विपक्षी, बैरी
  • शराब - मदिरा, मधु, वारुणी, सुरा, हाला
  • शरीर - काया, गात, तन, तनु, देह, वपु
  • शिव - त्रिपुरारि, त्रिलोचन, नीलकंठ, पिनाकी, भूतनाथ, महादेव, महेश, रुद्र, शंकर, शंभु, हर
  • शोभा - आभा, कांति, छटा, द्युति, प्रभा, विभा, सुषमा
  • संसार - जग, जगत, दुनिया, ब्रह्माण्ड, भव, भवन, लोक, विश्व
  • समय - अवसर, काल, वक्त
  • समाचार - खबर, वृत्त, वृतान्त, सन्देश, सूचना
  • समुद्र - अंबुधि, उदधि, जलधि, जलनिधि, नीरधि, नीरनिधि, पयोधि, पारावार, वारिधि, रत्नाकार, सागर, सिंधु
  • सरस्वती - इला, गिरा, भारती, भाषा, महाश्वेता, वाक्, वागेश्वरी, वाणी, वीणा-पाणि, वीणा-वादिनी, श्री, शारदा
  • सवेरा - अरुणोदय, उषा, प्रातः, भोर, सूर्योदयकाल
  • साँप - अहि, नाग, पन्नग, फणधर, मणि, भुजंग, भुजंगम, विषधर, व्याल, सर्प
  • साधु - अवधूत, मुनि, यति, वीतराग, वैरागी, संत, संन्यासी
  • सिंह - केसरी, केहरी, पंचमुख, पंचानन, मृगपति, मृगराज, मृगेंद्र, वनराज, शादू, शेर, हरि
  • सितारा - उडु, तारक, तारा, नक्षत्र
  • सुगंध - खुशबू, महक, सुरभि, सुवास, सौरभ
  • सुंदर - कमनीय, खूबसूरत, चारु, मंजु, मंजुल, मनोहर, रमणीक, रम्य, रुचिर, ललित, ललाभम
  • सूर्य - अर्क, आदित्य, दिनकर, दिनेश, दिवाकर, पतंग, प्रभाकर, भानु, भास्कर, रवि, सविता, सूरज
  • सेना - अनी, कटक, चमु, फौज, दल, वाहिनी
  • सोना - कंचन, कनक, कुंदन, सुवर्ण, स्वर्ण, हिरण्य, हेम
  • सौंदर्य - शोभा, सुंदरता, सुषमा
  • स्त्री - अबला, औरत, कान्ता, कामिनी, नारी, महिला, रमनी, ललना, वनिता, वामा, संदुरी
  • स्वर्ग - इन्द्रलोक, दिव, देवलोक, धुलोक, नाक, सुरलोक
  • हनुमान - अंजनीपुत्र, अंजनी-नन्दंन, कपीन्द्र, कपीश, कपीश्वर, पवन-पुत्र, पवनसुत, बजरंगबली, महावीर, मारूति, रामदूत, वज्रांगी
  • हाथ - कर, पाणि, हस्त
  • हाथी - करी, कुंजर, कुंभी, गज, गयंद, दंती, द्विप, नाग, मतंग, हस्ती
  • हिरण - कुरंग, मृग, सारंग
  • होंठ - अधर, ओठ, लब पूर्ण समानार्थी शब्द को एकार्थी शब्द का
संकलन


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उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली एकल बढ़त - मिल सकती है 315 सीट



प्रथम चरण से पांचवे चरण तक बसपा, सपा और कांग्रेस कि स्थिति में उत्तरोत्तर गिरावट आई है... 
उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली एकल बढ़त - मिल सकती है 315 सीट
पहले 3 चरणों के चुनाव में भाजपा को सपा से कुछ हद तक चुनौती दिखती मिल रही थी इस स्थिति में भाजपा लगभग 45% से 50% सीट जीतने की ओर दिख रही थी, किंतु चौथे और पांचवे चरण के चुनाव में सपा और कांग्रेस से यह स्थान बसपा ने छीन लिया किंतु कोई भी भाजपा से बढ़त नहीं ले पाया है चौथे और पाचवे चरण के चुनाव में भाजपा 52% से 58% .. 

छठे और सातवें चरण के चुनाव में भाजपा एकल बढ़त की ओर है और अंतिम दो चरणों में 70% सीट जीत सकती है.. 

मेरा विश्लेषण कहता है कि पूर्वांचल के भावी वोटरों के समर्थन के कारण शुरुवाती तौर पर भाजपा जहाँ पहले 3 चरणों के रूझान के कारण कुल 180 के पास जीतती दिख रही थी वह चौथे और पांचवे चरण के बाद 230 और अंतिम दौर में जिस तरह भाजपा अकेले बची अब मैं कह सकता हूँ भाजपा 270 से 320 सीट आराम से जीत सकती है...



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जस्टिस सी. एस. कर्णन पर कार्यवाही और शिकायत में जाँच से परहेज क्यों?



सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की महापंचाट ने ‘जस्टिस सी. एस. कर्णन को नोटिस जारी कर दिया है और उन्हें न्यायिक और प्रशासनिक काम देने से रोक दिया है। जजों के विरुद्ध जज की टिप्पणी पर जाँच करने के बजाय खुद शिकायतकर्ता को सुने चाप चड़ा देना कहा तक उचित है?

सुप्रीम कोर्ट ने साबित किया कि खुद के चरित्र पर लांछन को पोछने के लिए एक जज पर एकतरफा कार्यवाही जा सकती है तो आम आदमी को बोलने कि कोई हैसियत नही है।देश में ऐसे कई मौके आये है जब उच्च न्यायपालिका में जजनिर्मल यादव जैसे जज रंगे हाथ पकड़े गए और सुप्रीमकोर्ट ने कोई कार्यवाही नहीं, इसका अर्थ यही निकला जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार स्वीकार है किंतु भ्रष्टाचार का लांछन नही।

महान्यायवादी मुकुल रोहतगी कि इस मामले में भूमिका गैरजिम्मेदाराना और निष्पक्ष नही रही, अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने बहस शुरू करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को ये निर्देश दें कि जस्टिस कर्णन को कोई काम नहीं दिया जाए। अब यह प्रशासनिक मसला नहीं रहा, जस्टिस कर्णन पर कार्यवाही पर तो बोले किन्तु, न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर मौन रहे। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी जी को चाहिए कि वह तत्काल मुकुल रोहतगी को महान्यायवादी पद के दायित्व से मुक्त करें। सरकार का पक्ष निष्पक्ष होना चाहिए न कि सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्तियों प्रभाव में किसी के प्रति अन्याय मेंं।

जज न्यायपालिका में खुद भ्रष्टाचार कि आग लगी है तो न्यायपीठ पर बैठी होलिका रुपी असुरी शक्तियों के जलने का वक्त आ गया है..


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