भारतीय विधि और संविधान पर आधारित महत्वपूर्ण लेख



महाशक्ति पर भारतीय विधि और संविधान पर आधारित महत्वपूर्ण लेख


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दहेज एवं दहेज हत्या पर कानून



 
दहेज पर कानून 
दहेज प्रतिशोध अधिनियम, 1961 के अंतर्गत इस विषय पर कानून बना है। इसके अंतर्गत जब शादी से संबंधित जो भी उपहार दबाव या जबरदस्ती के कारण दूल्हे या दुल्हन को दिये जाते हैं, उसे दहेज कहते है। उपहार जो मांग कर लिया गया हो उसे भी दहेज कहते हैं।
  • दहेज लेना या देना या लेने देने में सहायता करना अपराध है। शादी हुई हो या नहीं इससे फर्क नहीं पड़ता है। इसकी सजा है पाँच साल तक की कैद, पन्द्रह हजार रूपये जुर्माना या अगर दहेज की रकम पन्द्रह हजार रूपये से ज्यादा हो तो उस रकम के बराबर जुर्माना।
  • दहेज मांगना अपराध है और इसकी सजा है कम से कम छःमहीनों की कैद या जुर्माना।
  • दहेज का विज्ञापन देना भी एक अपराध है और इसकी सजा है कम से कम छः महीनों की कैद या पन्द्रह हजार रूपये तक का जुर्माना।


 दहेज हत्या पर कानून 
भारतीय दंड संहिता की धारा 304ख व 306 दहेज हत्या पर दंड का प्रविधान है इसके अंतर्गत यदि-
  • शादी के सात साल के अन्दर अगर किसी स्त्री की मृत्यु हो जाए
  • गैर प्राकृतिक कारणों से, जलने से या शारीरिक चोट से, आत्महत्या की वजह से हो जाए-और उसकी मृत्यु से पहले उसके पति या पति के किसी रिश्तेदार ने उसके साथ दहेज के लिए क्रूर व्यवहार किया हो, तो उसे दहेज हत्या कहते हैं। दहेज हत्या के संबंध में कानून यह मानकर चलता है कि मृत्यु ससुराल वालों के कारण हुई है।
इन अपराधों की शिकायत कौन कर सकता हैः-
  1. कोई पुलिस अफसर
  2. पीडि़त महिला या उसके माता-पिता या संबंधी
  3.  यदि अदालत को ऐसे किसी केस का पता चलता है तो वह खुद भी कार्यवाई शुरू कर सकता है।
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विवाह संबंधी अपराधों के विषय में भारतीय दण्ड संहिता 1860 के अंतर्गगत दंड प्रविधान



 विवाह संबंधी अपराधों के विषय में भारतीय दण्ड संहिता 1860 के अंतर्गगत दंड प्रविधान
विवाह संबंधी अपराधों के विषय में भारतीय दण्ड संहिता 1860 के अंतर्गगत धारा 493 से 498 के प्रावधान है - 
  •  धारा 493 -धारा 493 के अन्तर्गत बताया गया है कि विधिपूर्ण विवाह का प्रवंचना से विश्वास उत्प्रेरित करने वाले पुरुष द्वारा कारित सहवास की स्थिति में, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिनकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। 
  • धारा 494 - धारा 494 के अन्तर्गत पति या पत्नी के जीवित रहते हुए विवाह करने की स्थिति अगर वह विवाह शून्य है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। बहुविवाह के लिए आवश्यक है कि दूसरी शादी होते समय शादी के रस्मो-रिवाज पर्याप्त ढंग से किये जाएं। 
  • धारा 494 क - इस धारा के अंतर्गत बताया गया है कि वही अपराध पूर्ववती विवाह को उस व्यक्ति से छिपाकर जिसके साथ पश्चात्‌वर्ती विवाह किया जाता है, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी। 
  • धारा 496 - धारा 496 में बताया गया है कि विधिपूर्ण विवाह के बिना कपटपूर्ण विवाहकर्म पूरा कर लेने की स्थिति में से वह दोनों में किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। 
  • धारा 497 - व्यभिचार की स्थिति में वह व्यक्ति जो यह कार्य करता है वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा। ऐसे मामलों में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी। 
  • धारा 498 - धारा 498 के अन्तर्गत यह प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति विवाहित स्त्री को आपराधिक आशय से फुसलाकर ले जाता है या ले आना या निरूञ्द्घ रखना है तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा। 
  • धारा 498 क - सन्‌ 1983 में भारतीय दण्ड संहिता में यह संशोधन किया गया जिसके अन्तर्गत अध्याय 20 क, पति या पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में, अन्त स्थापित किया गया इस अध्याय के अन्तर्गत एक ही धारा 498-क है, जिसके अन्तर्गत बताया गया है कि किसी स्त्री के पति या पति के नातेदारों द्वारा उसके प्रति क्रूरता करने की स्थिति में दण्ड एवं कारावास का प्रावधान है इसके अन्तर्गत बताया गया है कि जो कोई, किसी स्त्री का पति या पति का नातेदार होते हुए, ऐसी स्त्री के प्रति क्रूरता करेगा, उसे कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।
    क्रूरता 
    मानसिक तथा शारीरिक क्रूरता - शारीरिक क्रूरता का अर्थ है महिला को मारने या इस हद तक शोषित करना कि उसकी जान, शरीर या स्वास्थ्य को खतरा हो।मानसिक क्रूरता जैसे- दहेज की मांग या महिला को बदसूरत कहकर बुलाना इत्यादि। 
    • किसी महिला या उसके रिश्तेदार या संबंधी को धन-संपति देने के लिये परेशान किया जाना भी क्रूरता है। 
    • अगर ऐसे व्यवहार के कारण औरत आत्महत्या कर लेती है तो वह भी क्रूरता कहलाती है। 
    • यह धारा हर तरह की क्रूरता पर लागू है चाहे कारण कोई भी हो केवल दहेज नहीं।
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भारतीय दंड संहिता की धारा 503, 504 व 506 के अधीन अपराध एवं सजा





आईपीसी की धारा 503 - आपराधिक अभित्रास
सजा/दंड
  • जो कोई किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, ख्याति या सम्पत्ति को या किसी ऐसे व्यक्ति के शरीर या ख्याति को, जिससे कि वह व्यक्ति हितबद्ध हो कोई क्षति करने की धमकी उस अन्य व्यक्ति को इस आशय से देता है कि उसे संत्रास कारित किया जाए, या उससे ऐसी धमकी के निष्पादन का परिवर्जन करने के साधन स्वरूप कोई ऐसा कार्य कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या
  • किसी ऐसे कार्य को करने का लोप कराया जाए, जिसे करने के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह आपराधिक अभित्रास करता है ।
स्पष्टीकरण--किसी ऐसे मॄत व्यक्ति की ख्याति को क्षति करने की धमकी जिससे वह व्यक्ति, जिसे धमकी दी गई है, हितबद्ध हो, इस धारा के अन्तर्गत आता है । 

आईपीसी की धारा 504 - लोकशांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से साशय अपमान
सजा/दंड
  • जो कोई किसी व्यक्ति को साशय अपमानित करेगा और तद्द्वारा उस व्यक्ति को इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए, प्रकोपित करेगा कि ऐसे प्रकोपन से वह लोक शान्ति भंग या कोई अन्य अपराध कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा। 
आईपीसी की धारा 506 - आपराधिक अभित्रास के लिए सजा (अपराधिक धमकी )
    सजा/दंड 
    • जो कोई आपराधिक अभित्रास का अपराध करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जायेगा या 
    • यदि धमकी मृत्यु या घोर उपहति कारित करने की या अग्नि द्वारा किसी संपत्ति का नाश कारित करने की या मृत्युदंड से या आजीवन कारावास से या सात वर्ष की अवधि तक के कारावास से दंडनीय अपराध कारित करने की, या  
    • किसी स्त्री पर असतीत्व का लांछन लगाने की हो, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जायेगा।
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      भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत बलात्कार पर कानून और दंड



       
      भारतीय दंड संहिता की धारा 375 
      जब कोई पुरुष किसी स्त्री के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध सम्भोग करता है तो उसे बलात्कार कहते हैं। सम्भोग का अर्थ - पुरुष के लिंग का स्त्री की योनि में प्रवेश होना ही सम्भोग है। किसी भी कारण से सम्भोग क्रिया पूरी हुई हो या नहीं वह बलात्कार ही कहलायेगा। बलात्कार तब माना जाता है यदि कोई पुरुष किसी स्त्री साथ निम्नलिखित परिस्थितियों में से किसी भी परिस्थिति में मैथुन करता है वह पुरुष बलात्कार करता है, यह कहा जाता है-
      • उसकी इच्छा के विरुद्ध
      • उसकी सहमति के बिना
      • उसकी सहमति डरा धमकाकर ली गई हो
      • उसकी सहमति नकली पति बनकर ली गई हो जबकि वह उसका पति नहीं है
      • उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह दिमागी रूप से कमजोर या पागल हो
      • उसकी सहमति तब ली गई हो जब वह शराब या अन्य नशीले पदार्थ के कारण होश में नहीं हो
      • यदि वह 16 वर्ष से कम उम्र की है, चाहे उसकी सहमति से हो या बिना सहमति के
      • 15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा किया गया सम्भोग भी बलात्कार है
      बलात्संग के अपराध के लिए आवश्यक मैथुन गठित करने के लिए प्रवेशन पर्याप्त है ।


      भारतीय दंड संहिता की धारा 376
      धारा 376 बलात्संग के लिए दण्ड का प्रावधान बताती है। इसके अन्तर्गत बताया गया है कि
      • उपधारा (1) द्वारा उपबन्धित मामलों के सिवाय बलात्संग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिनकी अवधि सात वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन के लिए दस वर्ष के लिए हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, किंञ्तु यदि वह स्त्री जिससे बलात्संग किया गया है, उसकी पत्नी है और बारह वर्ष से कम आयु की नहीं है तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा वह जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जाएगा। परंतु न्यायालय ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से जो निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, सात वर्ष से कम की अवधि के कारावास का दण्ड दे सकेगा। बलात्कार केस जिनमें अपराध साबित करने की जिम्मेदारी दोषी पर हो न कि पीडि़त स्त्री पर। यानि वे केस जिनमें दोषी व्यक्ति होने को अपने निर्दोष होने का सबूत देना हो।
      • उपधारा (2) के अन्तर्गत बताया गया है कि जो कोई
        • पुलिस अधिकारी होते हुए- उस पुलिस थाने की सीमाओं के भीतर जिसमें वह नियक्त है, बलात्संग करेगा, या किसी थाने के परिसर में चाहे वह ऐसे पुलिस थाने में, जिसमें वह नियुक्त है, स्थित है या नहीं, बलात्संग करेगा या अपनी अभिरक्षा में या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में किसी स्त्री से बलात्संग करेगा, या
        • लोक सेवक होते हुए, अपनी शासकीय स्थिति का फायदा उठाकर किसी ऐसी स्त्री से, जो ऐसे लोक सेवक के रूप में उसकी अभिरक्षा में या उसकी अधीनस्थ किसी लोक सेवक की अभिरक्षा में है, बलात्संग करेगा, या
        • तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा यह उसके अधी स्थापित किसी जेल, प्रतिप्रेषण गृह या अभिरक्षा के अन्य स्थान के या स्त्रियों या बालकों की किसी संस्था के प्रबंध या कर्मचारीवृंद में होते हुए अपनी शासकीय स्थिति का फायदा उठाकर ऐसी जेल, प्रतिपे्रषण गृह स्थान या संस्था के किसी निवासी से बलात्संग करेगा, या
        • किसी अस्पताल के प्रबंध या कर्मचारीवृंद में होते हुए अपनी शासकीय स्थिति का लाभ उठाकर उस अस्पताल में किसी स्त्री से बलात्संग करेगा,या
        • किसी स्त्री से, यह जानते हुए कि वह गर्भवती है, बलात्संग करेगा या
        • - किसी स्त्री से, जो बारह वर्ष से कम आयु की है, बलात्संग करेगा या
        • - सामूहिक बलात्संग करेगा।
        • - जब गर्भवती महिला के साथ बलात्संग किया गया हो
      • वह कठोर कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन हो सकेगी दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। परंतु न्यायालय ऐसे पर्याप्त और विशेष कारणों से, जो निर्णय में उल्लिखित किये जाऐंगे, दोनों में से किसी भांति के कारावास को, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की हो सकेगी दण्ड दे सकेगा।
      • इस धारा में तीन स्पष्टीकरण दिये गए है, प्रथम स्पष्टीकरण के अंतर्गत बताया गया है कि जिन व्यक्तियों के समूह में से एक या अधिक व्यक्तियों द्वारा सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किसी स्त्री से बलात्संग किया जाता है, वहां ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने उस उपधारा के अर्थ में सामूहिक बलात्संग किया है।
      • द्वितीय स्पष्टीकरण के अंतर्गत बताया गया है कि स्त्रियों या बालकों को किसी संस्था से स्त्रियों और बालकों को ग्रहण करने और उनकी देखभाल करने के लिए स्थापित या अनुरक्षित कोई संस्था अभिप्रेत है, चाहे वह उसका नाम अनाथालय हो या उपेक्षित स्त्रियों या बालकों के लिए गृह हो या विधवाओं के लिए गृह या कोई भी अन्य नाम हों।
      • तृतीय स्पष्टीकरण के अन्तर्गत बताया गया है कि अस्पताल से अस्पताल का अहाता अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसी किसी संस्था का आहता है जो उल्लंघन(आरोग्य स्थापना) के दौरान व्यक्तियों को या चिकित्सीय ध्यान या पुर्नवास की अपेक्षा रखने वाले व्यक्तियों का ग्रहण करने और उनका आचार करने के लिए है।
      भारतीय दंड संहिता की धारा 376 क
      पृथक रहने के दौरान किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ सम्भोग करने की दशा में वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
      भारतीय दंड संहिता की धारा 376 ख
      लोक सेवक द्वारा अपनी अभिरक्षा में किसी स्त्री के साथ सम्भोग करने की दशा में जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की ही हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
      भारतीय दंड संहिता की धारा 376 ग
       जेल, प्रतिप्रेषण गृह आदि के अधीक्षक द्वारा सम्भोग की स्थिति में वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
      भारतीय दंड संहिता की धारा 376 घ
      अस्पताल के प्रबंधक या कर्मचारीवृन्द आदि के किसी सदस्य द्वारा उस अस्पताल में किसी स्त्री के साथ सम्भोग करेगा तो वह दोनों में किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।
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      क्‍या है आईपीसी की धारा 377 और क्या कहता है कानून





      क्‍या है आईपीसी की धारा 377
      प्रकृति विरुद्ध अपराध के बारे में है जो यह बताती है कि जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीव वस्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्द्रिय-भोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा। यह अपराध संजेय अपराध की श्रेणी में आता है और गैरजमानती है।
      हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट मे आईपीसी की धारा 377
      2 जुलाई 2009 को एक संस्‍थ नाज फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्‍ली उच्‍च न्‍यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि दो व्‍यस्‍क आपसी सहमति से एकातं में समलैंगिक संबंध बनाते है तो वह आईपीसी की धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा कोर्ट ने सभी नागरिकों के समानता के अधिकारों की बात की थी। इसके विपरीत 4 साल बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर 2013 को  होमो सेक्‍सुअल्‍टी के मामले में दिए गए अपने ऐतिहासिक जजमेंट में समलैंगिगता मामले में उम्रकैद की सजा के प्रावधान के कानून को बहाल रखने का फैसला किया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया था जिसमें दो बालिगो के आपसी सहमति से समलैंगिक संबंध को अपराध की श्रेणी से बाहर माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा जबतक धारा 377 रहेगी तब तक समलैंगिक संबंध को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
      धारा 377 के पक्ष और विपक्ष मे संवाद
      आईपीसी की धारा 377 का विरोध किसी खास जाति, वर्ग या धर्म के लोग कर रहे हैं बल्कि हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई सभी धर्मों के नेताओं ने न सिर्फ समलैंगिकता को एक गंभीर खतरा माना है, बल्कि भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों को नष्ट कर देने वाला भी बताया है। जहां कुछ स्वास्थ्य वैज्ञानिकों के अनुसार समलैंगिकता का उपचार संभव है, और इस उपचार पद्धति को रिपैरेटिव चिकित्सा कहा जाता है वहीं दूसरी तरफ कुछ डॉक्टर मानते हैं कि समलैंगिकता एक चिकित्सीय जरूरत है और इसे कतई अप्राकृतिक नहीं माना जा सकता है और यही तर्क धारा 377 के विरुद्ध सबसे मजबूत पहलू है। डॉक्टरों का कहना है कि समलैंगिकों को अक्सर पथभ्रष्ट के रूप में ब्रांडेड किया जाता है जबकि वे भी आम आदमी होते हैं और उन पर सामाजिक प्रतिबंध लगाने की जरूरत नहीं है।
       
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      गोस्वामी तुलसीदास का जीवन एवं साहित्यिक परिचय



       
      भगवान राम के पावन चरित्र वर्णन से जहां तुलसी ने आत्मकल्याण किया वहां उन्होंने भारतीय समाज, संस्कृति एवं धर्म का वह उपकार किया है जो आज तक भी हिन्दी का साहित्यकार नहीं कर सका। निःसंदेह ठीक ही है।
      भारी सब सागर में उतारतै कौन पार,
      जो पै यह रामायण तुलसी न गावतो।।
       TULSI DAS JI KE DOHE 
       तुलसीदास का जीवन परिचय
       कुछ विद्धानों के मध्‍य विवाद का विषय है कि तुलसीदास का जन्म कब हुआ था किन्‍तु
      पन्द्रह सौ चौउन बिसे, कालिंदी के तीर,
      श्रावन शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयौ शरीर।
      इस दोहे अनुसार इस महाकवि का जन्म बाँदा जिले के राजापुर नामक स्थान में सन् 1490 ई. में हुआ था। पिता का नाम पं. आत्माराम तथा माता का नाम हुलसी था। ये सरयू पारीण बाह्मण थे। जल श्रुति के अनुसार अभुक्त मूल वदात्र पैदा होने के कारण माता-पिता ने इन्हें त्याद दिया था। इधर से उधर भटकते हुए आथ बालक तुलसी का बाबा नरहरिदास ने पालन-पोषण किया, गुरु मंत्र दिया तथा इन्हें संस्कृत का अध्ययन कराया। इसके पश्चात् ये काशी चल गए, वहां विधिवत् शास्त्रों का अध्ययन किया और वहां से फिर राजापुर लौट आये।

      भगवान शंकरजी की प्रेरणा से रामशैल पर रहनेवाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्द जी (नरहरि बाबा) ने इस रामबोला के नाम से बहुचर्चित हो चुके इस बालक को ढूँढ निकाला और विधिवत उसका नाम तुलसीराम रखा। तदुपरान्त वे उसे अयोध्या (उत्तर प्रदेश) ले गये और वहाँ संवत्‌ 1561 माघ शुक्ला पञ्चमी (शुक्रवार) को उसका यज्ञोपवीत-संस्कार सम्पन्न कराया। संस्कार के समय भी बिना सिखाये ही बालक रामबोला ने गायत्री-मन्त्र का स्पष्ठ उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि बाबा ने वैष्णवों के पाँच संस्कार करके बालक को राम-मन्त्र की दीक्षा दी और अयोध्या में ही रहकर उसे विद्याध्ययन कराया। बालक रामबोला की बुद्धि बड़ी प्रखर थी। वह एक ही बार में गुरु-मुख से जो सुन लेता, उसे वह कंठस्थ हो जाता। वहाँ से कुछ काल के बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ नरहरि बाबा ने बालक को राम-कथा सुनायी किन्तु वह उसे भली-भाँति समझ न आयी।

      ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी, गुरुवार, संवत् 1583 को 29 वर्ष की आयु में राजापुर से थोडी ही दूर यमुना के उस पार स्थित एक गाँव की अति सुन्दरी भारद्वाज गोत्र की कन्या रत्नावली के साथ उनका विवाह हुआ। चूँकि गौना नहीं हुआ था अत: कुछ समय के लिये वे काशी चले गये और वहाँ शेषसनातन जी के पास रहकर वेद-वेदांग के अध्ययन में जुट गये। वहाँ रहते हुए अचानक एक दिन उन्हें अपनी पत्नी की याद आयी और वे व्याकुल होने लगे। जब नहीं रहा गया तो गुरूजी से आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमि राजापुर लौट आये। पत्नी रत्नावली चूँकि मायके में ही थी क्योंकि तब तक उनका गौना नहीं हुआ था अत: तुलसीराम ने भयंकर अँधेरी रात में उफनती यमुना नदी तैरकर पार की और सीधे अपनी पत्नी के शयन-कक्ष में जा पहुँचे। रत्नावली इतनी रात गये अपने पति को अकेले आया देख कर आश्चर्यचकित हो गयी। उसने लोक-लज्जा के भय से जब उन्हें चुपचाप वापस जाने को कहा तो वे उससे उसी समय घर चलने का आग्रह करने लगे। उनकी इस अप्रत्याशित जिद से खीझकर रत्नावली ने स्वरचित एक दोहे के माध्यम से जो शिक्षा उन्हें दी उसने ही तुलसीराम को तुलसीदास बना दिया। रत्नावली ने जो दोहा कहा था वह इस प्रकार है:
      अस्थि चर्म मय देहमय, ता में जैसी प्रीति,
      तैसी जो श्री श्राम में, होति न तब भय भीति।।
      यह दोहा सुनते ही उन्होंने उसी समय पत्नी को वहीं उसके पिता के घर छोड़ दिया और वापस अपने गाँव राजापुर लौट गये। राजापुर में अपने घर जाकर जब उन्हें यह पता चला कि उनकी अनुपस्थिति में उनके पिता भी नहीं रहे और पूरा घर नष्ट हो चुका है तो उन्हें और भी अधिक कष्ट हुआ। उन्होंने विधि-विधान पूर्वक अपने पिता जी का श्राद्ध किया और गाँव में ही रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे।

      कुछ काल राजापुर रहने के बाद वे पुन: काशी चले गये और वहाँ की जनता को राम-कथा सुनाने लगे। कथा के दौरान उन्हें एक दिन मनुष्य के वेष में एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान ‌जी का पता बतलाया। हनुमान ‌जी से मिलकर तुलसीदास ने उनसे श्रीरघुनाथजी का दर्शन कराने की प्रार्थना की। हनुमान्‌जी ने कहा- "तुम्हें चित्रकूट में रघुनाथजी दर्शन होंगें।" इस पर तुलसीदास जी चित्रकूट की ओर चल पड़े।

      चित्रकूट पहुँच कर उन्होंने रामघाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले ही थे कि यकायक मार्ग में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए, परन्तु उन्हें पहचान न सके। तभी पीछे से हनुमान्‌जी ने आकर जब उन्हें सारा भेद बताया तो वे पश्चाताप करने लगे। इस पर हनुमान्‌जी ने उन्हें सात्वना दी और कहा प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे।

      संवत्‌ 1607 की मौनी अमावस्या को बुधवार के दिन उनके सामने भगवान श्रीराम पुनः प्रकट हुए। उन्होंने बालक रूप में आकर तुलसीदास से कहा-"बाबा! हमें चन्दन चाहिये क्या आप हमें चन्दन दे सकते हैं?" हनुमान ‌जी ने सोचा, कहीं वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये उन्होंने तोते का रूप धारण करके यह दोहा कहा:
      चित्रकूट के घाट पर, भइ सन्तन की भीर।
      तुलसिदास चन्दन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
      तुलसीदास श्रीराम जी की उस अद्भुत छवि को निहार कर अपने शरीर की सुध-बुध ही भूल गये। अन्ततोगत्वा भगवान ने स्वयं अपने हाथ से चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदास जी के मस्तक पर लगाया और अन्तर्ध्यान हो गये। इसके पश्‍चात शास्त्रों का मंथन किया और साथ-साथ पर्यटन भी। रामेश्वर, जगन्नाथ, अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा आदि सभी तीर्थों का परिभ्रमण किया। फिर अयोध्या, आकर इन्होनें अपने विश्व-विश्रत महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना प्रारम्भ की। कुछ समय पश्चात् ये काशी चले गये और प्रहलाद घाट पर रहने लगे। यहीं इनके इस महाकाव्य की परिसमाप्ति हुइर्। यहीं रहकर दोहावली, विनय पत्रिका आदि ग्रन्थों की भी रचना की। यहीं रहते हुए सन् 1623 ई. में इस महापुरुष का स्वर्गवास हुआ। मृत्यु के संबंध में यह दोहा प्रसिद्ध हैः-
      सम्वत् सोलह सो असी, असी गग के तीर।
      श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यौ शरीर।।
       

      तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथों का संक्षिप्त विवरण
      तुलसीदास जी ने सवा सौ वर्ष का दीर्घ जीवन प्राप्त किया था। यही कारण है कि इतने अधिक समृद्धिशाली साहित्य से हिन्दी की रिक्त प्राय गोद को भरने में समर्थ हो सके। तुलसी का समस्त जीवन साहित्य-साधना एवं कष्टों का जीवन था। रचनायें इस प्रकार हैः-
      • रामचरितमानस
        संवत्‌ 1631 का प्रारम्भ हुआ। दैवयोग से उस वर्ष रामनवमी के दिन वैसा ही योग आया जैसा त्रेतायुग में राम-जन्म के दिन था। उस दिन प्रातःकाल तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस की रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने और छ्ब्बीस दिन में यह अद्भुत ग्रन्थ सम्पन्न हुआ। संवत्‌ 1633 के मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष में राम-विवाह के दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।
      • गीतावली
        गीतावली में गीतों का आधार विविध कांड का रामचरित ही रहा है। यह ग्रंथ रामचरितमानस की तरह व्यापक जनसम्पर्क में कम गया प्रतीत होता है। इसलिए इन गीतों में परिवर्तन-परिवर्द्धन दृष्टिगत नहीं होता है। गीतावली में गीतों के कथा - संदर्भ तुलसी की मति के अनुरूप हैं। इस दृष्टि से गीतावली का एक गीत लिया जा सकता है -
        कैकेयी जौ लौं जियत रही।
        तौ लौं बात मातु सों मुह भरि भरत न भूलि कही।।
        मानी राम अधिक जननी ते जननिहु गँसन गही।
        सीय लखन रिपुदवन राम-रुख लखि सबकी निबही।।
        लोक-बेद-मरजाद दोष गुन गति चित चखन चही।
        तुलसी भरत समुझि सुनि राखी राम सनेह सही।।
        इसमें भरत और राम के शील का उत्कर्ष तुलसीदास ने व्यक्त किया है। गीतावली के उत्तरकांड में मानस की कथा से अधिक विस्तार है। इसमें सीता का वाल्मीकि आश्रम में भेजा जाना वर्णित है। इस परित्याग का औचित्य निर्देश इन पंक्तियों में मिलता है -
        भोग पुनि पितु-आयु को, सोउ किए बनै बनाउ।
        परिहरे बिनु जानकी नहीं और अनघ उपाउ।।
        पालिबे असिधार-ब्रत प्रिय प्रेम-पाल सुभाउ।
        होइ हित केहि भांति, नित सुविचारु नहिं चित चाउ।।
      • पार्वती-मंगल
        यह तुलसी की प्रामाणिक रचना प्रतीत होती है। इसकी काव्यात्मक प्रौढ़ता तुलसी सिद्धांत के अनुकूल है। कविता सरल, सुबोध रोचक और सरस है। ""जगत मातु पितु संभु भवानी"" की श्रृंगारिक चेष्टाओं का तनिक भी पुट नहीं है। लोक रीति इतनी यथास्थिति से चित्रित हुई है कि यह संस्कृत के शिव काव्य से कम प्रभावित है और तुलसी की मति की भक्त्यात्मक भूमिका पर विरचित कथा काव्य है। व्यवहारों की सुष्ठुता, प्रेम की अनन्यता और वैवाहिक कार्यक्रम की सरसता को बड़ी सावधानी से कवि ने अंकित किया है। तुलसीदास अपनी इस रचना से अत्यन्त संतुष्ट थे, इसीलिए इस अनासक्त भक्त ने केवल एक बार अपनी मति की सराहना की है -
        प्रेम पाट पटडोरि गौरि-हर-गुन मनि।
        मंगल हार रचेउ कवि मति मृगलोचनि।।
      • श्रीकृष्ण गीतावली
        श्रीकृष्ण गीतावली भी गोस्वामीजी की रचना है। श्रीकृष्ण-कथा के कतिपय प्रकरण गीतों के विषय हैं।
      • रामलता नहछू
        यह संस्कार गीत है। इस गीत में कतिपय उल्लेख राम-विवाह की कथा से भिन्न हैं।
        गोद लिहैं कौशल्या बैठि रामहिं वर हो।
        सोभित दूलह राम सीस, पर आंचर हो।।
      • वैराग्य संदीपनी
        वैराग्य संदीपनी को माताप्रसाद गुप्त ने अप्रामाणिक माना है, पर आचार्य चंद्रवली पांडे इसे प्रामाणिक और तुलसी की आरंभिक रचना मानते हैं। कुछ और प्राचीन प्रतियों के उपलब्ध होने से ठोस प्रमाण मिल सकते हैं। संत महिमा वर्णन का पहला सोरठा पेश है -
        को बरनै मुख एक, तुलसी महिमा संत।
        जिन्हके विमल विवेक, सेष महेस न कहि सकत।।
      • दोहावली
        दोहावली में अधिकांश दोहे मानस के हैं। कवि ने चातक के व्याज से दोहों की एक लंबी श्रृंखला लिखकर भक्ति और प्रेम की व्याख्या की है। दोहावली दोहा संकलन है। मानस के भी कुछ कथा निरपेक्ष दोहों को इसमें स्थान है। संभव है कुछ दोहे इसमें भी प्रक्षिप्त हों, पर रचना की अप्रामाणिकता असंदिग्ध है।
      • जानकी-मंगल
        विद्वानों ने इसे तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाओं में स्थान दिया है। पर इसमें भी क्षेपक है।
        पंथ मिले भृगुनाथ हाथ फरसा लिए।
        डाँटहि आँखि देखाइ कोप दारुन किए।।
        राम कीन्ह परितोष रोस रिस परिहरि।
        चले सौंपि सारंग सुफल लोचन करि।।
        रघुबर भुजबल देख उछाह बरातिन्ह।
        मुदित राउ लखि सन्मुख विधि सब भाँतिन्ह।।
        तुलसी के मानस के पूर्व वाल्मीकीय रामायण की कथा ही लोक प्रचलित थी। काशी के पंडितों से मानस को लेकर तुलसीदास का मतभेद और मानस की प्रति पर विश्वनाथ का हस्ताक्षर संबंधी जनश्रुति प्रसिद्ध है।
      • रामाज्ञा प्रश्न
        यह ज्योतिष शास्त्रीय पद्धति का ग्रंथ है। दोहों, सप्तकों और सर्गों में विभक्त यह ग्रंथ रामकथा के विविध मंगल एवं अमंगलमय प्रसंगों की मिश्रित रचना है। काव्य की दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्त्व नगण्य है। सभी इसे तुलसीकृत मानते हैं। इसमें कथा-श्रृंखला का अभाव है और वाल्मीकीय रामायण के प्रसंगों का अनुवाद अनेक दोहों में है।
      • बरवै रामायण
        विद्वानों ने इसे तुलसी की रचना घोषित किया है। शैली की दृष्टि से यह तुलसीदास की प्रामाणिक रचना है। इसकी खंडित प्रति ही ग्रंथावली में संपादित है।
      • हनुमान बाहुक
        यह गोस्वामी जी की हनुमत-भक्ति संबंधी रचना है। पर यह एक स्वतंत्र रचना है। इसके सभी अंश प्रामाणिक प्रतीत होते हैं।
        तुलसीदास को राम प्यारे थे, राम की कथा प्यारी थी, राम का रूप प्यारा था और राम का स्वरूप प्यारा था। उनकी बुद्धि, राग, कल्पना और भावुकता पर राम की मर्यादा और लीला का आधिपत्य था। उनक आंखों में राम की छवि बसती थी। सब कुछ राम की पावन लीला में व्यक्त हुआ है जो रामकाव्य की परम्परा की उच्चतम उपलब्धि है। निर्दिष्ट ग्रंथों में इसका एक रस प्रतिबिंब है।
      • कवितावली
        कवितावली तुलसीदास की रचना है, पर सभा संस्करण अथवा अन्य संस्करणों में प्रकाशित यह रचना पूरी नहीं प्रतीत होती है। कवितावली एक प्रबंध रचना है। कथानक में अप्रासंगिकता एवं शिथिलता तुलसी की कला का कलंक कहा जायेगा।
      • विनय पत्रिकविनयपत्रिका तुलसीदास रचित एक ग्रंथ है। यह ब्रज भाषा में रचित है। विनय पत्रिका में विनय के पद है। विनयपत्रिका का एक नाम राम विनयावली भी है विनय पत्रिका की भाषा ब्रज है तथा इसमें 21 रागों का प्रयोग हुआ है विनय पत्रिका का प्रमुख रस शांतरस है इस रस का स्‍थाई भाव निर्वेद होता है। विनय प्रत्रिका अध्‍यात्मिक जीवन को परिलक्षित करती है। इस में सम्‍मलित पदों की संख्‍या 280 है।

      काव्यगत विशेषताएँ
      भाव-तुलसी का काव्य लोक-कल्याण की चार पवित्र भावनाओं से प्रेरित है। सर्वप्रथम-भक्ति भावना, द्वितीय-समाजिक आदर्शो की स्थापना, तृतीय-धार्मिक समन्वय, चतुर्थ-दासता से मुक्ति का संदेश।

       
      भक्ति-भावना
      तुलसी की भक्ति अनन्य भाव को भक्ति थी। ये स्मार्त वैष्णव और विशिष्टाद्वैतवादी थे। राम उनके जीवन सर्वस्व है। अपने ईष्टदेव भगवान राम के पावन चरित्र, उन्ही महानता और विशालता तथा अपनी दीनता और दास्य भाव का विशद एवं विस्तृत, कल्याणकारी एवं मनोहारी वर्णन किया है। तुलसी की अनन्यता इससे अधिक क्या हो सकती है। कि जिस देवता से यदि कुछ माँगा भी तो यही माँगा कि राम मेरे मन में निवास करे:-
      ‘माँगत तुलसीदास कर जोरे, बसहिं राम सिय मानस मोरे’ तुलसीदास की दीनता और अनन्यता अपने स्थान पर अद्वितीय है, कितना भी कठोर स्वामी क्यों न हो सेवक की इन बातों से जरुर पिघल जाएगा।
      रावरे को दूसरो न द्वार राम दया धाम।
      रावरी ही गति बले, विभव विहीन की।। 

      सामाजिक आदर्शों की स्थापना
      तत्कालीन समाज की स्थिति अस्त-व्यस्त एवं अव्यवस्थित हो चुकी थी। तुलसी ने मर्यादा पुरूषोत्तम राम का अनुकरणीय आदर्श चरित्र समाज के आगे रखा। समाज को स्वस्थ एवं सुनियंत्रित बनाने के लिए राम के आदर्श चरित्र के माध्यम से समाज का नीति निर्देश एवं पथ-प्रदर्शन किया। लोक मंगल की भावना सं े ओतःप्रोत तुलसी का काव्य मानव-जीवन के अनन्त कर्तव्यों से भरा पड़ा है जिससे समाज आज भी नियन्त्रित और अनुप्रणित हो रहा है।

      धार्मिक समन्वय
      तुलसी महान समन्वयवादी थे। विश्रृंखलित समाज में उस समय धर्म का स्वरूप विकृत होता जा रहा था। अनेकों वाद, सम्प्रदाय और मत मतान्तर पारस्परिक विद्वेष और धृणा फैला रहे थे। इस विद्वेष को दूर करने के लिए तुलसी ने अपने काव्य में बड़ा बुद्धिमतापूर्वक सभी को एक दूसरे से मिलाने का और पास लाने का सफल प्रयत्न किया।
      दासता से मुक्ति का संदेश 
      विदेशी विजेताओं ने भारत में जमकर अपना राज्य स्थापित कर लिया था। जन नायक के अभाव में जनता राह भूले राहगीर की भाँति भटक रही थी, मुक्ति का मार्ग दूर-दूर तक दिखाई न देता था। तुलसी ने इस अभाव की पूर्ति की। जनता को संगठन और सुसंगठित शक्ति का महान संदेश दिया। 

      भाषा
      तुलसी की भाषा अवधी एवं ब्रज है। राम चरित मानस अवधी भाषा में तथा विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, गीतावली आदि ब्रज भाषा में लिखित काव्य है। इनकी दोनो भाषाएं भावों को प्रकट करने में पूर्णतया समर्थ है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है। कहीं अरबी और फारसी के सरल शब्द भी पाए जाते है। शब्द चयन व्यवस्थित है। भाषा में अपूर्व प्रवाह है। भाषा ओज, प्रमाद और माधुर्य गुणों से युक्त है।
      शैली
      तुलसी ने अपने समय तक हिन्दी काव्य जगत् में प्रचलित समस्त शैलियों में विद्वता पूर्वक रचना करके सभी शैलियों का प्रतिनिधित्व किया है। भिन्न-भिन्न शैलियाँ तथा रचनाएँ इस प्रकार है।
      1. चन्द की छप्पय शैली-कवितावली में।
      2. कबीर की दोहा शैली-कवितावली में।
      3. सूर की पद शैली-गीतावली तथा विनयपत्रिका में।
      4. जायसी की चैपाई शैली-कवितावली में।
      5. रहीम की बरवैशैली-बरवै रामायण में।
      6. मोहर शैली-ग्राम्य एवं लोकगीतों में।
      रस, छन्द व अलंकार
      महाकवि तुलसी के काव्य में सभी रसों का सफल एवं सुन्दर परिपाक हुआ है। परन्तु प्राधान्य करूण और शान्त रस का है। तुलसी का शृंगार अत्यन्त मर्यादित एवं शिष्ट है। संयोग शृंगार की एक झलक पात्र देखिए-
      "राम को रूप निहारति जानकी कंकन के नग की परछाही,
      याते सवैं सुध भूलि गई कर टेक रही पल टरति नाहीं।।" 
      छन्द योजना तुलसी की अत्यन्त विस्तृत एवं व्यापक है। इन्होने युग की प्रचलित सभी शैलियों एवं छन्दों का प्रयोग अपने काव्य में किया था। परन्तु दोहा, चैपाई कविता सवैया तथा पद तुलसी को अधिक प्रिय थे।
      तुलसी को अंलकारों की चिंता नहीं थी। इन्हें सच्वे भाव की आवश्यकता थी। इस पर भी जहाँ आप की दृष्टि जाएगी वहाँ आपको कोई न कोई अलंकार अवश्य मिल जाएगा। तुलसी के काव्य में अलंकार भावों के पीछे-पीछे सहायक बनकर चले है। फिर भी उपमा, रूपक, सांगरूपक, उत्प्रेक्षा आदि का स्वाभाविक एवं सफल प्रयोग दर्शनीय है।


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      IPC में हैं ऐसी कुछ धाराएं, जिनका नहीं होता इस्तेमाल



      भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) काफी समय से भारतीय दंड व्यवस्था में चली आ रही है। हालांकि इसमें समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं। लेकिन अभी भी इसमें कई ऐसी धाराएं हैं जिनका इस्तेमाल न के बराबर होता है। ऐसी 6 धाराएँ निम्न है-
      •  धारा 124-ए- होता रहता है विरोध
        इस धारा को 1860 में लॉर्ड मैकाले ने फ्रेम किया था, लेकिन इन्फोर्समेंट में यह धारा अस्तित्व में नहीं आई।
        जब देश में क्रांतिकारी एक्टिविटीज शुरू हुईं तो ब्रिटिश शासन ने 1871 में इसे लागू कर क्रांतिकारियों की आवाज दबाने का काम शुरू कर दिया। महात्मा गांधी ने भी इस धारा को जनता की आवाज दबाने के लिए राजकुमारों का कानून बताया। इसके तहत उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।
      • धारा 182- इस्तेमाल ही होना बंद है
        धारा 182 के तहत झूठी एफआईआर दर्ज कराने पर 7 साल तक की सजा का प्रावधान है। बावजूद इसके इस धारा का इस्तेमाल नहीं होता। जबकि प्रायः झूठी एफआईआर खूब दर्ज की जाती है। जिन लोगों ने झूठी शिकायत देकर केस दर्ज कराते है, उनके खिलाफ आइपीसी की धारा 182 के तहत कार्रवाई हो सकती है। बावजूद इसके इन दो सालों में गुड़गांव पुलिस ने इस धारा के तहत कोई केस नहीं चलाया। इसका कारण यह है कि इस धारा में पुलिस को खुद शिकायतकर्ता बनकर कोर्ट में केस की पैरवी करनी पड़ती है और  कोर्ट के चक्कर काटने से बचने के लिए पुलिस इस धारा में कोई केस नहीं चलाना चाहती है। जबकि ऐसे मामलों पर अधिकतम 7 साल तक की कैद का प्रावधान है। 
      • आईपीसी 263 ए- क्राइम बड़ा, जुर्माना कम इस धारा में फर्जी तरीके से पोस्टल स्टांप बनाने पर सजा का प्रावधान है। इसमें केवल दो सौ रूपए का जुर्माना है। यानी की जो भी फर्जी पोस्टल स्टांप बनाएगा उस पर मजिस्ट्रेट अधिकतम दो सौ रुपए का जुर्माना लगा सकता है।
      • धारा 309- अपराध साबित करना मुश्किल
        अगर कोई व्यक्ति सुसाइड की कोशिश करे और वह किसी कारणवश बच जाए तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 309 के तहत कार्रवाई होती है। आईपीसी की धारा 309 दर्ज होने के बाद अदालत में कभी प्रूव नहीं हो पाती। इसका कारण यह है कि 309 में अपराधी भी वो ही होता है, जो खुदकुशी की कोशिश करता है। वह कभी कोर्ट में यह बात मानता ही नहीं कि वह आत्महत्या का प्रयास कर रहा था।
      • धारा 371-373- दूसरे नए कानून के सामने पुरानी हो गई है यह धारा
        देवदासी प्रथा के खिलाफ बनाई गई इस धारा की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है। दरअसल मानव तस्करी रोधी एक्ट लागू होने के बाद धारा-371 से 373 की अब कोई जरूरत नहीं रह गई है। देवदासी प्रथा के खिलाफ धारा- 371 के तहत उम्रकैद की सजा का प्रावधान था। वहीं 372 व 373 में दस साल की सजा होती थी।
      • धारा 467- आरोपी नहीं चाहता जमानत
        कीमती सिक्युरिटीज के फर्जी दस्तावेज तैयार करने के केस में यह धारा लगाई जाती है। इसमें उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इस धारा में सामान्य रूप से गिरफ्तार आरोपी की जमानत एडीजे से नीचे नहीं ली जाती है। मगर एडीजे इस मामले में सुनवाई तब ही कर सकता है जब मजिस्ट्रेट के यहां पर जमानत अर्जी खारिज हो चुकी हो। मजेदार बात तो यह है कि मजिस्ट्रेट इस तरह के मामलों में जमानत नहीं लेते हैं मगर जमानत अर्जी खारिज होगी तभी एडीजे के यहां सुनवाई होगी।
      भारतीय विधि से संबधित महत्वपूर्ण लेख



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