प्रत्‍यक्षा जी का जन्‍मदिन बार बार क्‍यो चला आता है ?





जन्‍मदिन भी बड़ा अजीब दिन है, हर साल मुँह उठाकर चला आता है। :) अभी अभी कुछ देर पहले अनूप जी की पोस्ट पढ़ी तो पता चला कि आज फिर से प्रत्‍यक्षा जी का जन्म दिन आ गया है। जबकि अभी पिछले ही साल अक्टूबर में हम सबने मिलकर प्रत्‍यक्षा जी का जन्मदिन मनाया था।

जन्मदिन भी बिन बुलाये मेहमान की तरह चला आता है और पूरे दिन अपनी मनमानी करता है, और फिर अगले दिन एक साल और गुजर जाने का एहसास करा कर चला जाता है कहता कि देख बन्‍दे तुझे पिछले साल कहा था कि अच्‍छे अच्‍छे काम करूँगा पर किया नही इस बार तो कर। यह संदेश देकर पुन: आ धमकाने की धमकी देकर कि रिपोर्ट कार्ड दे‍खूँगा, कहकर चला जाता है। :)

निश्चित रूप से प्रत्‍यक्षा जी सफल है और उनका रिपोर्ट कार्ड भी अच्‍छा, उन्‍हे चिन्तित होने की कोई आवश्यकता नही है। और इस बार की जन्मदिन की शुभकामना स्वीकार करें और अगले जन्मदिन की तैयारी शुरू कर दें। क्‍योकि पता नही ये प्रत्‍यक्षा जी का जन्मदिन बार बार क्यों चला आता है ? :)


कुछ स्माइली एक्‍सट्रा दे रहा हूँ लगा कर पढ़ लीजिएगा। :) :) :) :) :) :) :D :D :D ;) ;)



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गांधी का अहं



 Mahatma Gandhi and Subhas Chandra Bose: A Clash of Ideology
भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में एक ऐसा समय भी आया जब गांधी जी को अपने अस्तित्व पर संकट नज़र आने लगा था। गांधी जी को एहसास होने लगा था कि अगर अब प्रतिरोध नहीं किया गया तो, “गांधी” से भी बड़ा कोई नाम सामने आ सकता है। जो स्वतंत्रता की लड़ाई “गांधी” नाम की धुरी पर लड़ा जा रहा था, वह युद्ध कहीं किसी और के नाम से प्रारम्भ न हो जाये। वह धुरी गांधी जी को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के रूप में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। यह एक ऐसा नाम था जो गांधी जी को ज्यादा उभरता हुआ दिखाई दे रहा था। देश की सामान्य जनता सुभाष बाबू में अपना भावी नेता देख रही थी। सुभाष बाबू की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही थी। जो परिस्थितियां गांधी जी ने अपने अरमानों को पूरा करने के‍ लिये तैयार की वह सुभाष चन्द्र बोस के सक्रिय रूप से सामने आने पर मिट्टी में मिलती दिख रही थी। गांधीजी को डर था कि जिस प्रकार यह व्यक्ति अपने प्रभावों में वृद्धि कर रहा है वह गांधी और नेहरू के प्रभाव को भारतीय परिदृश्य से खत्म कर सकता है। इन दोनों की भूमिका सामान्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की भांति होने जा रही थी। गांधी और नेहरू की कुटिल बुद्धि तथा अंग्रेजों की चतुराई को यह कदापि सुखद न था। इस भावी परिणाम से भयभीत हो नेता जी को न केवल कांग्रेस से दूर किया गया बल्कि समाज में फैल रहे उनके नाम को समाप्त करने का प्रयास किया गया। यह व्यवहार केवल नेता जी के साथ ही नहीं हर उस स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ किया गया जो गांधी जी के अनर्गल प्रलापों का विरोधी था और उनकी चाटुकारिता करना पसंद नहीं करता था तथा देश की आज़ादी के लिये जिसके मन में स्पष्ट विचार थे।
Funny Mahatma Gandhi by endarte on DeviantArt

गांधी और सुभाष का स्वतंत्रता संग्राम में आने में एक समानता थी कि दोनों को ही इसकी प्रेरणा विदेश में प्राप्त हुई। किन्तु दोनों की प्रेरणा स्रोत में काफी अंतर था। गांधी जी को इसकी प्रेरणा तब मिली जब दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों द्वारा लात मार कर ट्रेन से उतार दिया गया, और गांधी जी को लगा कि मैं एक कोट पैंट पहने व्यक्ति के साथ यह कैसा व्यवहार किया जा रहा है? अंग्रेजों द्वारा लात मारने घटना गांधी जी को महान बनाने में सर्व प्रमुख थी। अगर गांधी जी के जीवन में यह घटना न घटित हुई होती तो वह न तो स्वतंत्रता के प्रति को ललक होती, और न ही आज राष्‍ट्रपिता का तमका लिये न बैठे होते, न ही उनकी गांधीगिरी अस्तित्व में हो।
Why is Netaji Subhas Chandra Bose called Netaji?
वही सुभाष चन्द्र बोस इंग्लैंड में भारतीय प्रशासनिक सेवा (Indian Civil Service) की परीक्षा के दौरान देश में घट रहे जलियावाला बाग काण्ड, रोलेट एक्ट, तथा कांग्रेस के द्वारा इन घटनाओं के परिपेक्ष में असहयोग आंदोलन जैसी घटनाओं प्रभावित हो उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में आना उचित समझा। उनके जहान में देश के प्रति प्रेम और इसकी स्वतंत्रता के भाव का संचार हो गया। उन्होंने भारतीय प्रशासनिक परीक्षा चौथे स्थान पर रह कर पास की थी। ऊँचा रैंक था, ऊँचा वेतन और किसी राजा से भी बढ़कर मान सम्मान एवं सुख सुविधाएं उन्हें सहज प्राप्त थी। सुभाष बाबू किसी अंग्रेज ने छुआ तक नहीं था। किन्तु भारत माँ की करुण पुकार ने उन्हें देश भक्ति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने समस्त सुख सुविधाओं से त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र में कहा- “मै नही समझता कि कोई व्यक्ति अंग्रेजी राज के प्रति निष्ठावान भी रहे तथा अपने देश की मन, आत्मा तथा ईमानदारी से सेवा करें, ऐसा संभव नही।” 
नेता जी विदेश से लौटते ही देश की सेवा में लग गये और जब 1925 ई. को कलकत्ता नगर निगम में स्वराज दल को बहुमत मिला तो उन्होंने निगम के प्रमुख के पद पर रहते हुए अनेक महत्वपूर्ण काम किये।
1928 मे जब कलकत्ता में भारत के लिये स्वशासी राज्य पद की मांग के मुख्य प्रस्ताव को महात्मा गांधी ने प्रस्तावित किया। तो सुभाष बाबू ने उसमें एक संशोधन प्रस्तुत किया, जिसमें पूर्ण स्वराज की मांग की गई। गांधीजी पूर्ण स्वराज रूपी संशोधन से काफी खिन्न हुए, उन्होंने धमकी दिया कि यदि संशोधित प्रस्ताव पारित हुआ तो वे सभा से बाहर चले जायेगे। गांधी जी के समर्थकों ने इसे गांधी जी की प्रतिष्ठा से जोड़ दिया, क्योंकि अगर गांधी की हार होती है तो निश्चित रूप से समर्थकों की महत्वाकांक्षाओं को झटका लगता, क्योंकि गांधी के बिना वे अपंग थे। समर्थकों की न कोई सोच थी और न ही सामान्य जनों के विचारों से उनका कोई सरोकार था। सिर्फ और सिर्फ महत्वाकांक्षा ही उनके स्वतंत्रता संग्राम का आधार थी। यही उनके संग्राम सेनानी होने के कारण थे। गांधी जी की इस प्रतिष्ठा की लड़ाई में अंग्रेज सरकार की पौबारा हो रही थी। सुभाष बाबू का संशोधित प्रस्ताव 973 के मुकाबले 1350 मतो से गिर गया। गांधी की आंधी के आगे सुभाष बाबू को 973 वोट प्राप्त होना एक महत्‍व पूर्ण घटना थी। यहीं पर गांधी जी का स्वराष्ट्र से बड़ा हो गया। गांधी जी के अहं के आगे उन्ही का सत्‍य, अहिंसा, और आर्शीवचन पाखंड साबित हुआ और जिस लाठी सहारे वह चलते थे वही लाठी कांग्रेसियों के गुंडई प्रमुख अस्त्र बन गई। कांग्रेसियों द्वारा गांधी जी के नाम को अस्त्र बना अपना मनमाना काम करवाया, और इस कुकृत्य में गांधी जी पूर्ण सहयोगी रहे। इसका फायदा मिला सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी साम्राज्य को।


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