कष्टों को हरने वाला नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्र अर्थ सहित



ग्रहों से होने वाले कष्टों और दुखों को दूर करने के लिए नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्र का पाठ अत्यंत लाभदायक है। इसमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु ग्रहों से क्रमश: एक-एक श्लोक के द्वारा पीड़ा अर्थात कष्टों को दूर करने की प्रार्थना की गई है -

ग्रहाणामादिरात्यो लोकरक्षणकारक:।
विषमस्थानसम्भूतां पीड़ां हरतु मे रवि: ।।1।।

रोहिणीश: सुधा‍मूर्ति: सुधागात्र: सुधाशन:।
विषमस्थानसम्भूतां पीड़ां हरतु मे विधु: ।।2।।

भूमिपुत्रो महातेजा जगतां भयकृत् सदा।
वृष्टिकृद् वृष्टिहर्ता च पीड़ां हरतु में कुज: ।।3।।

उत्पातरूपो जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति:।
सूर्यप्रियकरो विद्वान् पीड़ां हरतु मे बुध: ।।4।।
 
देवमन्त्री विशालाक्ष: सदा लोकहिते रत:।
अनेकशिष्यसम्पूर्ण:पीड़ां हरतु मे गुरु: ।।5।।

दैत्यमन्त्री गुरुस्तेषां प्राणदश्च महामति:।
प्रभु: ताराग्रहाणां च पीड़ां हरतु मे भृगु: ।।6।।

सूर्यपुत्रो दीर्घदेहा विशालाक्ष: शिवप्रिय:।
मन्दचार: प्रसन्नात्मा पीड़ां हरतु मे शनि: ।।7।।

अनेकरूपवर्णेश्च शतशोऽथ सहस्त्रदृक्।
उत्पातरूपो जगतां पीडां पीड़ां मे तम: ।।8।।

महाशिरा महावक्त्रो दीर्घदंष्ट्रो महाबल:।
अतनुश्चोर्ध्वकेशश्च पीड़ां हरतु मे शिखी: ।।9।।

Navagraha Peeda Hara Stotram in Hindi हिन्दी भावार्थ -
  1. सूर्य : ग्रहों में प्रथम परिगणित, अदिति के पुत्र तथा विश्व की रक्षा करने वाले भगवान सूर्य विषम स्थानजनित मेरी पीड़ा का हरण करें ।।1।।
  2. चंद्र : दक्षकन्या नक्षत्र रूपा देवी रोहिणी के स्वामी, अमृतमय स्वरूप वाले, अमतरूपी शरीर वाले तथा अमृत का पान कराने वाले चंद्रदेव विषम स्थानजनित मेरी पीड़ा को दूर करें ।।2।।
  3. मंगल : भूमि के पुत्र, महान् तेजस्वी, जगत् को भय प्रदान करने वाले, वृष्टि करने वाले तथा वृष्टि का हरण करने वाले मंगल (ग्रहजन्य) मेरी पीड़ा का हरण करें ।।3।।
  4. बुध : जगत् में उत्पात करने वाले, महान द्युति से संपन्न, सूर्य का प्रिय करने वाले, विद्वान तथा चन्द्रमा के पुत्र बुध मेरी पीड़ा का निवारण करें ।।4।।
  5. गुरु : सर्वदा लोक कल्याण में निरत रहने वाले, देवताओं के मंत्री, विशाल नेत्रों वाले तथा अनेक शिष्यों से युक्त बृहस्पति मेरी पीड़ा को दूर करें ।।5।।
  6. शुक्र :  दैत्यों के मंत्री और गुरु तथा उन्हें जीवनदान देने वाले, तारा ग्रहों के स्वामी, महान् बुद्धिसंपन्न शुक्र मेरी पीड़ा को दूर करें ।।6।।
  7. शनि : सूर्य के पुत्र, दीर्घ देह वाले, विशाल नेत्रों वाले, मंद गति से चलने वाले, भगवान् शिव के प्रिय तथा प्रसन्नात्मा शनि मेरी पीड़ा को दूर करें ।।7।।
  8. राहु  : विविध रूप तथा वर्ण वाले, सैकड़ों तथा हजारों आंखों वाले, जगत के लिए उत्पातस्वरूप, तमोमय राहु मेरी पीड़ा का हरण करें ।।8।।
  9. केतु  : महान शिरा (नाड़ी)- से संपन्न, विशाल मुख वाले, बड़े दांतों वाले, महान् बली, बिना शरीर वाले तथा ऊपर की ओर केश वाले शिखास्वरूप केतु मेरी पीड़ा का हरण करें।।9।।


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श्री नृसिंहपञ्चामृतस्तोत्रम्



“हिरणा.किसना गोविन्दा प्रहलाद भजे“ के उद्घोष से समूचे वातावतरण को गुजायमान करते हुए आप सब को नरसिंह भगवान् की जयंती की शुभकामनाये ...आज ही के दिन भगवान् से इस सृती पर अवतरित होकर हरी के द्रोही हिरनकश्यप का वध किया था ..

श्री नृसिंहपञ्चामृतस्तोत्रम्
(श्रीरामकृतम्)

अहॊबिलं नारसिंहं गत्वा रामः प्रतापवान् ।
नमस्कृत्वा श्रीनृसिंहं अस्तौषीत् कमलापतिम् ॥ १ ॥

गॊविन्द कॆशव जनार्दन वासुदॆव
विश्वॆश विश्व मधुसूदन विश्वरूप ।
श्री पद्मनाभ पुरुषोत्तम पुष्कराक्ष
नारायणाच्युत नृसिंह नमॊ नमस्तॆ ॥ २ ॥

देवाः समस्ताः खलु यॊगिमुख्याः
गन्धर्व विद्याधर किन्नराश्च ।
यत्पादमूलं सततं नमन्ति
तं नारसिंहं शरणं गतॊऽस्मि ॥ ३ ॥

वॆदान् समस्तान् खलु शास्त्रगर्भान्
विद्याबलॆ कीर्तिमतीं च लक्ष्मीम् ।
यस्य प्रसादात् सततं लभन्तॆ
तं नारसिंहं शरणं गतॊऽस्मि ॥ ४ ॥

ब्रह्मा शिवस्त्वं पुरुषॊत्तमश्च
नारायणॊऽसौ मरुतां पतिश्च ।
चन्द्रार्क वाय्वग्नि मरुद्गणाश्च
त्वमॆव तं त्वां सततं नतॊऽस्मि ॥ ५ ॥

स्वप्नॆऽपि नित्यं जगतां त्रयाणाम्
स्रष्टा च हन्ता विभुरप्रमॆयः ।
त्राता त्वमॆकस्त्रिविधॊ विभिन्नः
तं त्वां नृसिंहं सततं नतॊऽस्मि ॥ ६ ॥

राघवॆणकृतं स्तॊत्रं पञ्चामृतमनुत्तमम् ।
पठन्ति यॆ द्विजवराः तॆषां स्वर्गस्तु शाश्वतः ॥ ७ ॥


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अग्नि सूक्तं.. (Agni Shuktam)



अग्नि सूक्तं... सबसे पहले वेद... ऋग्वेद... की सबसे पहली ऋचा है... यह अग्नि देव को संबोधित करके गयी है | अग्नि देव... जिन्हें ब्रह्माण्ड की शक्ति माना जाता है... यह ऋचा रक्षा करने वाली है और मनुष्यों को पूर्णता की ओर प्रेरित करती है...

[ऋषि - मधुच्छन्दा वैश्वामित्र,  छंद- गायत्री,  देवता- अग्नि... ]

विशेष: - ऋग्वेुदस्यत प्रथमं सूक्तं अग्निदेवस्ये कृते सम्र्पितम् अस्ति , अनेनेव ज्ञायते यत् वैदिक काले एव अग्नि देवस्य महातम्यम ज्ञातम् आसीत् । अग्नि: विश्वगस्य सर्वप्रथम: आविष्का्र: आसीत् । अस्यज प्रथमप्रयोग: भारतदेशे एव अभवत् ।

[ अर्थ : ऋग्वेद का प्रथम सूक्त अग्निदेव को समर्पित है... इससे यह ज्ञात होता है की वैदिक काल में भी अग्निदेव की महिमा ज्ञात थी | अग्नि विश्व का प्रथम आविष्कार थी | इसका प्रथम प्रयोग भारत देश में ही हुआ था...]

ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् । होतारं रत्न धातमम्।।१।।

हम अग्निदेव की स्तुति करते हैं... जो यज्ञ के पुरोहित, देवता, ऋत्विज ( समयानुकूल यज्ञ का सम्पादन करने वाले), होता (देवों का आवाहन करने वाले) और याजको को रत्नों (यज्ञ के लाभों ) से विभूषित करने वाले हैं |

अग्निः पूर्वेभिर्र्षिभिरीड्यो नूतनैरुत | स देवानेह वक्षति ||२ ||

जो अग्निदेव पूर्वकालीन ऋषिओं द्वारा प्रशंसित है... जो आधुनिक काल में भी ऋषि कल्प वेदज्ञ विद्वानों द्वारा स्तुत्य हैं... वे अग्निदेव इस यज्ञ में देवो का आवाहन करें |

अग्निना रयिमश्नवत पोषमेव दिवे-दिवे | यशसं वीरवत्तमम || ३ ||

ये बढाने वाले अग्निदेव (स्तोता द्वारा स्तुति किये जाने पर)... मनुष्यों को (यजमान को) प्रतिदिन विवर्धमान (बढाने वाला) धन, यश, पुत्र -पौत्रादि वीर पुरुष प्रदान करने वाले हैं |

अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि | स इद्देवेषु गछति || ४ ||

हे अग्निदेव ! आप सबका रक्षण करने में समर्थ हैं | आप जिस अध्यर ( हिंसा रहित यज्ञ ) को आवृत किये रहते हैं... वही ( जिसकी आहुति को आप ग्रहण कर रहे हैं ) यज्ञ के देवताओं तक अवश्य पहुँचता है |

अग्निर्होता कविक्रतुः सत्यश्चित्रश्रवस्तमः | देवो देवेभिरा गमत || ५ ||

हे अग्निदेव ! आप हवि -प्रदाता , ज्ञान और कर्म की संयुक्त शक्ति के प्रेरक , सत्यरूप और विलक्षण रूप युक्त हैं | आप देवो के साथ इस यज्ञ में पधारें |

यदङग दाशुषे तवमग्ने भद्रं करिष्यसि | तवेत तत सत्यमङगिरः || ६ ||

हे अग्निदेव ! आप जो भी कृपा अपने भक्त पर करते हैं... वह अग्निरस... अवश्य ही आपका सार है |

उप तवाग्ने दिवे-दिवे दोषावस्तर्धिया वयम | नमो भरन्त एमसि || ७ ||

हे अग्निदेव ! रात्रि को दूर करने वाले... अपने विचारों और प्रार्थनाओं से , आपकी वंदना करते हुए... हम दिन पर दिन आपके समीप आयें (अर्थात हमें आपका सानिध्य प्राप्त हो) |

राजन्तमध्वराणां गोपां रतस्य दीदिविम | वर्धमानंस्वे दमे || ८ ||

हे अग्निदेव ! यज्ञों के राजा/स्वामी... सनातन सत्य , प्रकाशमयी , अपने तेज में निरंतर वृद्धि को प्राप्त होने वाले , हम आपके समीप आ रहे हैं |

स नः पितेव सूनवे.अग्ने सूपायनो भव | सचस्वा नः सवस्तये || ९ ||

हे अग्निदेव ! कृपया आप हमें उसी प्रकार उपलब्ध होईये , जिस प्रकार
एक पिता अपने पुत्र को होता है | हे अग्निदेव ! आप हमारे भले के लिए हमारे साथ रहिये |

ॐ असतो मा सद्गमय |  तमसो मा ज्योतिर्गमय | मृत्योरमा अमृतं गमय ||
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:


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पूर्णता : पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है। पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है



अथर्ववेद में कहा गया है, ‘पूर्णात्पूर्णमुदचति पूर्णं पूर्णेन सिच्यते।’
यानी पूर्ण से पूर्ण का उदय होता है। पूर्ण ही पूर्ण के द्वारा सींचा जाता है

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
इस मंत्र का सरल अर्थ है कि वह पूर्ण है। यह भी पूर्ण है। पूर्ण में से पूर्ण ही उत्पन्न होता है। और यदि पूर्ण में से पूर्ण को निकाल लें, तो भी पूर्ण ही शेष बचता है।ब्रह्म की सत्ता अखण्ड है। ब्रह्म ही आनन्द रूप है। वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव, चित्‌ एक एवं असंग है। वह चलता है, वह नहीं चलता है। वह दूर है, वह समीप है।

अशून्यमिव यच्छून्यं यस्मिंछून्यं जगत्‌ स्थितम्‌।
अर्थात्‌ जो शून्य होते हुए अशून्य के समान है, जिसमें जगत्‌ वर्तमान रहता हुआ भी शून्य है, जो सृष्टिसमूह के होते हुए भी शून्य है, वह परमात्मा का स्वरूप है।

1. ‘मानव की पूर्णता अपनी अपूर्णता से परिचित होना है।’
2.‘यदि यहां और अभी पूर्णता की प्राप्ति असंभव है, तो इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि दूसरे जन्म में हमें पूर्णता मिल ही जाएगी।’
3.‘ब्रह्म निर्वाण दो बातों का समन्वय नहीं है। एक सत्य के लिए उपयोग किए गए दो शब्दों का समवेत प्रयोग है। जो शून्य से चलते हैं, वे निर्वाण कहते हैं, जो पूर्ण से चलते हैं, वे ब्रह्म कहते हैं।’

भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन' कहा जाता है

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'
सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ......

संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें
१ - एको देवः
२ - सर्वर्भूतेषु गूढः
३ - सर्वव्यापी
४ - सर्वभूतान्तरात्मा
५ - कर्माध्यक्षः
६ - सर्व भूताधिवासः
७ - साक्षी
८ - चेता
९ - केवलः
१० - निर्गुणश्च

पूरे मन्त्र को १ से १० की संख्या में विभाजित किया जा सकता है. संख्या का प्रारंभ १ से है और एक अंक की सबसे बड़ी संख्या ९ है और यह संख्या 'केवल' है. दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह शून्य है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले १ पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से १० संख्या स्वतः बन जाती है. इस १० में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता.

'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'

'ब्रह्म' आदि, मध्य और अन्त, सभी काल में पूर्ण है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी, और नहीं भी रहा, वह अनेक '१०' बन गया, जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०'है सृष्टि है, सगुण हैपरन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.


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॥ श्री ललिता सहस्र नाम स्तोत्रम् ॥



 
॥ न्यासः ॥
अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमाला मन्त्रस्य।
वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः।
अनुष्टुप् छन्दः।
श्रीललितापरमेश्वरी देवता।
श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम्।
मध्यकूटेति शक्तिः।
शक्तिकूटेति कीलकम् ।
श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी- प्रसादसिद्धिद्वारा
चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।

      ॥ ध्यानम् ॥
सिन्दूरारुण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलि स्फुरत्
तारा नायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं
सौम्यां रत्न घटस्थ रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥

अरुणां करुणा तरङ्गिताक्षीं
धृत पाशाङ्कुश पुष्प बाणचापाम् ।
अणिमादिभि रावृतां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥

ध्यायेत् पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं
हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
सर्वालङ्कार युक्तां सतत मभयदां भक्तनम्रां भवानीं
श्रीविद्यां शान्त मूर्तिं सकल सुरनुतां सर्व सम्पत्प्रदात्रीम् ॥

सकुङ्कुम विलेपनामलिकचुम्बि कस्तूरिकां
समन्द हसितेक्षणां सशर चाप पाशाङ्कुशाम् ।
अशेषजन मोहिनीं अरुण माल्य भूषाम्बरां
जपाकुसुम भासुरां जपविधौ स्मरे दम्बिकाम् ॥

 श्री ललिता सहस्र नाम स्तोत्रम्


       ॥ अथ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्- सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्नि- कुण्ड- सम्भूता देवकार्य- समुद्यता ॥१॥
उद्यद्भानु- सहस्राभा चतुर्बाहु- समन्विता ।
रागस्वरूप- पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥२॥
मनोरूपेक्षु- कोदण्डा पञ्चतन्मात्र- सायका ।
निजारुण- प्रभापूर- मज्जद्ब्रह्माण्ड- मण्डला ॥३॥
चम्पकाशोक- पुन्नाग- सौगन्धिक- लसत्कचा ।
कुरुविन्दमणि- श्रेणी- कनत्कोटीर- मण्डिता ॥४॥
अष्टमीचन्द्र- विभ्राज- दलिकस्थल- शोभिता ।
मुखचन्द्र- कलङ्काभ- मृगनाभि- विशेषका ॥५॥
वदनस्मर- माङ्गल्य- गृहतोरण- चिल्लिका ।
वक्त्रलक्ष्मी- परीवाह- चलन्मीनाभ- लोचना ॥६॥
नवचम्पक- पुष्पाभ- नासादण्ड- विराजिता ।
ताराकान्ति- तिरस्कारि- नासाभरण- भासुरा ॥७॥
कदम्बमञ्जरी- कॢप्त- कर्णपूर- मनोहरा ।
ताटङ्क- युगली- भूत- तपनोडुप- मण्डला ॥८॥
पद्मराग- शिलादर्श- परिभावि- कपोलभूः ।
नवविद्रुम- बिम्बश्री- न्यक्कारि- रदनच्छदा ॥९॥ orदशनच्छदा
शुद्ध- विद्याङ्कुराकार- द्विजपङ्क्ति- द्वयोज्ज्वला ।
कर्पूर- वीटिकामोद- समाकर्षि- दिगन्तरा ॥१०॥
निज- सल्लाप- माधुर्य- विनिर्भर्त्सित- कच्छपी । orनिज- संलाप
मन्दस्मित- प्रभापूर- मज्जत्कामेश- मानसा ॥११॥
अनाकलित- सादृश्य- चिबुकश्री- विराजिता । orचुबुकश्री
कामेश- बद्ध- माङ्गल्य- सूत्र- शोभित- कन्धरा ॥१२॥
कनकाङ्गद- केयूर- कमनीय- भुजान्विता ।
रत्नग्रैवेय- चिन्ताक- लोल- मुक्ता- फलान्विता ॥१३॥
कामेश्वर- प्रेमरत्न- मणि- प्रतिपण- स्तनी ।
नाभ्यालवाल- रोमालि- लता- फल- कुचद्वयी ॥१४॥
लक्ष्यरोम- लताधारता- समुन्नेय- मध्यमा ।
स्तनभार- दलन्मध्य- पट्टबन्ध- वलित्रया ॥१५॥
अरुणारुण- कौसुम्भ- वस्त्र- भास्वत्- कटीतटी ।
रत्न- किङ्किणिका- रम्य- रशना- दाम- भूषिता ॥१६॥
कामेश- ज्ञात- सौभाग्य- मार्दवोरु- द्वयान्विता ।
माणिक्य- मुकुटाकार- जानुद्वय- विराजिता ॥१७॥
इन्द्रगोप- परिक्षिप्त- स्मरतूणाभ- जङ्घिका ।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ- जयिष्णु- प्रपदान्विता ॥१८॥
नख- दीधिति- संछन्न- नमज्जन- तमोगुणा ।
पदद्वय- प्रभाजाल- पराकृत- सरोरुहा ॥१९॥
सिञ्जान- मणिमञ्जीर- मण्डित- श्री- पदाम्बुजा । orशिञ्जान
मराली- मन्दगमना महालावण्य- शेवधिः ॥२०॥
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण- भूषिता ।
शिव- कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन- वल्लभा ॥२१॥
सुमेरु- मध्य- शृङ्गस्था श्रीमन्नगर- नायिका ।
चिन्तामणि- गृहान्तस्था पञ्च- ब्रह्मासन- स्थिता ॥२२॥
महापद्माटवी- संस्था कदम्बवन- वासिनी ।
सुधासागर- मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥२३॥
देवर्षि- गण- संघात- स्तूयमानात्म- वैभवा ।
भण्डासुर- वधोद्युक्त- शक्तिसेना- समन्विता ॥२४॥
सम्पत्करी- समारूढ- सिन्धुर- व्रज- सेविता ।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व- कोटि- कोटिभिरावृता ॥२५॥
चक्रराज- रथारूढ- सर्वायुध- परिष्कृता ।
गेयचक्र- रथारूढ- मन्त्रिणी- परिसेविता ॥२६॥
किरिचक्र- रथारूढ- दण्डनाथा- पुरस्कृता ।
ज्वाला- मालिनिकाक्षिप्त- वह्निप्राकार- मध्यगा ॥२७॥
भण्डसैन्य- वधोद्युक्त- शक्ति- विक्रम- हर्षिता ।
नित्या- पराक्रमाटोप- निरीक्षण- समुत्सुका ॥२८॥
भण्डपुत्र- वधोद्युक्त- बाला- विक्रम- नन्दिता ।
मन्त्रिण्यम्बा- विरचित- विषङ्ग- वध- तोषिता ॥२९॥
विशुक्र- प्राणहरण- वाराही- वीर्य- नन्दिता ।
कामेश्वर- मुखालोक- कल्पित- श्रीगणेश्वरा ॥३०॥
महागणेश- निर्भिन्न- विघ्नयन्त्र- प्रहर्षिता ।
भण्डासुरेन्द्र- निर्मुक्त- शस्त्र- प्रत्यस्त्र- वर्षिणी ॥३१॥
कराङ्गुलि- नखोत्पन्न- नारायण- दशाकृतिः ।
महा- पाशुपतास्त्राग्नि- निर्दग्धासुर- सैनिका ॥३२॥
कामेश्वरास्त्र- निर्दग्ध- सभण्डासुर- शून्यका ।
ब्रह्मोपेन्द्र- महेन्द्रादि- देव- संस्तुत- वैभवा ॥३३॥
हर- नेत्राग्नि- संदग्ध- काम- सञ्जीवनौषधिः ।
श्रीमद्वाग्भव- कूटैक- स्वरूप- मुख- पङ्कजा ॥३४॥
कण्ठाधः- कटि- पर्यन्त- मध्यकूट- स्वरूपिणी ।
शक्ति- कूटैकतापन्न- कट्यधोभाग- धारिणी ॥३५॥
मूल- मन्त्रात्मिका मूलकूटत्रय- कलेबरा ।
कुलामृतैक- रसिका कुलसंकेत- पालिनी ॥३६॥
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।
अकुला समयान्तस्था समयाचार- तत्परा ॥३७॥
मूलाधारैक- निलया ब्रह्मग्रन्थि- विभेदिनी ।
मणि- पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि- विभेदिनी ॥३८॥
आज्ञा- चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि- विभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधा- साराभिवर्षिणी ॥३९॥
तडिल्लता- समरुचिः षट्चक्रोपरि- संस्थिता ।
महाशक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु- तनीयसी ॥४०॥
भवानी भावनागम्या भवारण्य- कुठारिका ।
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर् भक्त- सौभाग्यदायिनी ॥४१॥
भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥४२॥
शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र- निभानना ।
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥४३॥
निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥४४॥
नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया ।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥४५॥
निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर् निरीश्वरा ।
नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥४६॥
निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥४७॥
निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी ।
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥४८॥ orनिस्संशया
निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥४९॥
निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥५०॥
दुष्टदूरा दुराचार- शमनी दोषवर्जिता ।
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक- वर्जिता ॥५१॥
सर्वशक्तिमयी सर्व- मङ्गला सद्गतिप्रदा ।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र- स्वरूपिणी ॥५२॥
सर्व- यन्त्रात्मिका सर्व- तन्त्ररूपा मनोन्मनी ।
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर् मृडप्रिया ॥५३॥
महारूपा महापूज्या महापातक- नाशिनी ।
महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर् महारतिः ॥५४॥
महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।
महाबुद्धिर् महासिद्धिर् महायोगेश्वरेश्वरी ॥५५॥
महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।
महायाग- क्रमाराध्या महाभैरव- पूजिता ॥५६॥
महेश्वर- महाकल्प- महाताण्डव- साक्षिणी ।
महाकामेश- महिषी महात्रिपुर- सुन्दरी ॥५७॥
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी ।
महाचतुः- षष्टिकोटि- योगिनी- गणसेविता ॥५८॥
मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल- मध्यगा ।
चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र- कलाधरा ॥५९॥
चराचर- जगन्नाथा चक्रराज- निकेतना ।
पार्वती पद्मनयना पद्मराग- समप्रभा ॥६०॥
पञ्च- प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म- स्वरूपिणी ।
चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान- घनरूपिणी ॥६१॥
ध्यान- ध्यातृ- ध्येयरूपा धर्माधर्म- विवर्जिता ।
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥६२॥
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था- विवर्जिता ।
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥६३॥
संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान- करीश्वरी ।
सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य- परायणा ॥६४॥
भानुमण्डल- मध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।
पद्मासना भगवती पद्मनाभ- सहोदरी ॥६५॥
उन्मेष- निमिषोत्पन्न- विपन्न- भुवनावली ।
सहस्र- शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥६६॥
आब्रह्म- कीट- जननी वर्णाश्रम- विधायिनी ।
निजाज्ञारूप- निगमा पुण्यापुण्य- फलप्रदा ॥६७॥
श्रुति- सीमन्त- सिन्दूरी- कृत- पादाब्ज- धूलिका ।
सकलागम- सन्दोह- शुक्ति- सम्पुट- मौक्तिका ॥६८॥
पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।
अम्बिकाऽनादि- निधना हरिब्रह्मेन्द्र- सेविता ॥६९॥
नारायणी नादरूपा नामरूप- विवर्जिता ।
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय- वर्जिता ॥७०॥
राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना ।
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि- मेखला ॥७१॥
रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया ।
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥७२॥
काम्या कामकलारूपा कदम्ब- कुसुम- प्रिया ।
कल्याणी जगतीकन्दा करुणा- रस- सागरा ॥७३॥
कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया ।
वरदा वामनयना वारुणी- मद- विह्वला ॥७४॥
विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल- निवासिनी ।
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥७५॥
क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ- पालिनी ।
क्षयवृद्धि- विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल- समर्चिता ॥७६॥
विजया विमला वन्द्या वन्दारु- जन- वत्सला ।
वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल- वासिनी ॥७७॥
भक्तिमत्- कल्पलतिका पशुपाश- विमोचिनी ।
संहृताशेष- पाषण्डा सदाचार- प्रवर्तिका ॥७८॥ orपाखण्डा
तापत्रयाग्नि- सन्तप्त- समाह्लादन- चन्द्रिका ।
तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥७९॥
चितिस्तत्पद- लक्ष्यार्था चिदेकरस- रूपिणी ।
स्वात्मानन्द- लवीभूत- ब्रह्माद्यानन्द- सन्ततिः ॥८०॥
परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता ।
मध्यमा वैखरीरूपा भक्त- मानस- हंसिका ॥८१॥
कामेश्वर- प्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।
शृङ्गार- रस- सम्पूर्णा जया जालन्धर- स्थिता ॥८२॥
ओड्याणपीठ- निलया बिन्दु- मण्डलवासिनी ।
रहोयाग- क्रमाराध्या रहस्तर्पण- तर्पिता ॥८३॥
सद्यःप्रसादिनी विश्व- साक्षिणी साक्षिवर्जिता ।
षडङ्गदेवता- युक्ता षाड्गुण्य- परिपूरिता ॥८४॥
नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण- सुख- दायिनी ।
नित्या- षोडशिका- रूपा श्रीकण्ठार्ध- शरीरिणी ॥८५॥
प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।
मूलप्रकृतिर् अव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त- स्वरूपिणी ॥८६॥
व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या- स्वरूपिणी ।
महाकामेश- नयन- कुमुदाह्लाद- कौमुदी ॥८७॥
भक्त- हार्द- तमोभेद- भानुमद्भानु- सन्ततिः ।
शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥८८॥
शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥८९॥
चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जडशक्तिर् जडात्मिका ।
गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजबृन्द- निषेविता ॥९०॥
तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च- कोशान्तर- स्थिता ।
निःसीम- महिमा नित्य- यौवना मदशालिनी ॥९१॥ orनिस्सीम
मदघूर्णित- रक्ताक्षी मदपाटल- गण्डभूः ।
चन्दन- द्रव- दिग्धाङ्गी चाम्पेय- कुसुम- प्रिया ॥९२॥
कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।
कुलकुण्डालया कौल- मार्ग- तत्पर- सेविता ॥९३॥
कुमार- गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर् मतिर् धृतिः ।
शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर् नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥९४॥
तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी- कामरूपिणी ।
मालिनी हंसिनी माता मलयाचल- वासिनी ॥९५॥
सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।
कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥९६॥
वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था- विवर्जिता ।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥९७॥
विशुद्धिचक्र- निलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।
खट्वाङ्गादि- प्रहरणा वदनैक- समन्विता ॥९८॥
पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक- भयङ्करी ।
अमृतादि- महाशक्ति- संवृता डाकिनीश्वरी ॥९९॥
अनाहताब्ज- निलया श्यामाभा वदनद्वया ।
दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष- मालादि- धरा रुधिरसंस्थिता ॥१००॥
कालरात्र्यादि- शक्त्यौघ- वृता स्निग्धौदनप्रिया ।
महावीरेन्द्र- वरदा राकिण्यम्बा- स्वरूपिणी ॥१०१॥
मणिपूराब्ज- निलया वदनत्रय- संयुता ।
वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥१०२॥
रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न- प्रीत- मानसा ।
समस्तभक्त- सुखदा लाकिन्यम्बा- स्वरूपिणी ॥१०३॥
स्वाधिष्ठानाम्बुज- गता चतुर्वक्त्र- मनोहरा ।
शूलाद्यायुध- सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥१०४॥
मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि- समन्विता ।
दध्यन्नासक्त- हृदया काकिनी- रूप- धारिणी ॥१०५॥
मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्च- वक्त्राऽस्थि- संस्थिता ।
अङ्कुशादि- प्रहरणा वरदादि- निषेविता ॥१०६॥
मुद्गौदनासक्त- चित्ता साकिन्यम्बा- स्वरूपिणी ।
आज्ञा- चक्राब्ज- निलया शुक्लवर्णा षडानना ॥१०७॥
मज्जासंस्था हंसवती- मुख्य- शक्ति- समन्विता ।
हरिद्रान्नैक- रसिका हाकिनी- रूप- धारिणी ॥१०८॥
सहस्रदल- पद्मस्था सर्व- वर्णोप- शोभिता ।
सर्वायुधधरा शुक्ल- संस्थिता सर्वतोमुखी ॥१०९॥
सर्वौदन- प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा- स्वरूपिणी ।
स्वाहा स्वधाऽमतिर् मेधा श्रुतिः स्मृतिर् अनुत्तमा ॥११०॥
पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण- कीर्तना ।
पुलोमजार्चिता बन्ध- मोचनी बन्धुरालका ॥१११॥ orमोचनी
बर्बरालका
विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि- जगत्प्रसूः ।
सर्वव्याधि- प्रशमनी सर्वमृत्यु- निवारिणी ॥११२॥
अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष- नाशिनी ।
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष- निषेविता ॥११३॥
ताम्बूल- पूरित- मुखी दाडिमी- कुसुम- प्रभा ।
मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥११४॥
नित्यतृप्ता भक्तनिधिर् नियन्त्री निखिलेश्वरी ।
मैत्र्यादि- वासनालभ्या महाप्रलय- साक्षिणी ॥११५॥
परा शक्तिः परा निष्ठा प्रज्ञानघन- रूपिणी ।
माध्वीपानालसा मत्ता मातृका- वर्ण- रूपिणी ॥११६॥
महाकैलास- निलया मृणाल- मृदु- दोर्लता ।
महनीया दयामूर्तिर् महासाम्राज्य- शालिनी ॥११७॥
आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।
श्री- षोडशाक्षरी- विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥११८॥
कटाक्ष- किङ्करी- भूत- कमला- कोटि- सेविता ।
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र- धनुःप्रभा ॥११९॥
हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर- दीपिका ।
दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ- विनाशिनी ॥१२०॥
दरान्दोलित- दीर्घाक्षी दर- हासोज्ज्वलन्- मुखी ।
गुरुमूर्तिर् गुणनिधिर् गोमाता गुहजन्मभूः ॥१२१॥
देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश- रूपिणी ।
प्रतिपन्मुख्य- राकान्त- तिथि- मण्डल- पूजिता ॥१२२॥
कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप- विनोदिनी । orविमोदिनी
सचामर- रमा- वाणी- सव्य- दक्षिण- सेविता ॥१२३॥
आदिशक्तिर् अमेयाऽऽत्मा परमा पावनाकृतिः ।
अनेककोटि- ब्रह्माण्ड- जननी दिव्यविग्रहा ॥१२४॥
क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य- पददायिनी ।
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस् त्रिदशेश्वरी ॥१२५॥
त्र्यक्षरी दिव्य- गन्धाढ्या सिन्दूर- तिलकाञ्चिता ।
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व- सेविता ॥१२६॥
विश्वगर्भा स्वर्णगर्भा वरदा वागधीश्वरी ।
ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥१२७॥
सर्ववेदान्त- संवेद्या सत्यानन्द- स्वरूपिणी ।
लोपामुद्रार्चिता लीला- कॢप्त- ब्रह्माण्ड- मण्डला ॥१२८॥
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता ।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥१२९॥
इच्छाशक्ति- ज्ञानशक्ति- क्रियाशक्ति- स्वरूपिणी ।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप- धारिणी ॥१३०॥
अष्टमूर्तिर् अजाजैत्री लोकयात्रा- विधायिनी । orअजाजेत्री
एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥१३१॥
अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य- स्वरूपिणी ।
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥१३२॥
भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव- विवर्जिता ।
सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥१३३॥
राज- राजेश्वरी राज्य- दायिनी राज्य- वल्लभा ।
राजत्कृपा राजपीठ- निवेशित- निजाश्रिता ॥१३४॥
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग- बलेश्वरी ।
साम्राज्य- दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥१३५॥
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक- वशङ्करी ।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द- रूपिणी ॥१३६॥
देश- कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥१३७॥
सर्वोपाधि- विनिर्मुक्ता सदाशिव- पतिव्रता ।
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल- रूपिणी ॥१३८॥
कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥१३९॥
स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति- रूपिणी ।
सनकादि- समाराध्या शिवज्ञान- प्रदायिनी ॥१४०॥
चित्कलाऽऽनन्द- कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी ।
नामपारायण- प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥१४१॥
मिथ्या- जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥१४२॥
भवदाव- सुधावृष्टिः पापारण्य- दवानला ।
दौर्भाग्य- तूलवातूला जराध्वान्त- रविप्रभा ॥१४३॥
भाग्याब्धि- चन्द्रिका भक्त- चित्तकेकि- घनाघना ।
रोगपर्वत- दम्भोलिर् मृत्युदारु- कुठारिका ॥१४४॥
महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना ।
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर- निषूदिनी ॥१४५॥
क्षराक्षरात्मिका सर्व- लोकेशी विश्वधारिणी ।
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥१४६॥
स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प- निभाकृतिः ।
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥१४७॥
दुराराध्या दुराधर्षा पाटली- कुसुम- प्रिया ।
महती मेरुनिलया मन्दार- कुसुम- प्रिया ॥१४८॥
वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी ।
प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥१४९॥
मार्ताण्ड- भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त- राज्यधूः । orमार्तण्ड
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥१५०॥
सत्य- ज्ञानानन्द- रूपा सामरस्य- परायणा ।
कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ॥१५१॥
कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥१५२॥
परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा ।
पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र- विभेदिनी ॥१५३॥
मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानस- हंसिका ।
सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ॥१५४॥
ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता ।
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥१५५॥
प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ- रूपिणी ।
विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥१५६॥
मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह- रूपिणी ।
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र- प्रवर्तिनी ॥१५७॥
छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।
उदारकीर्तिर् उद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥१५८॥
जन्ममृत्यु- जरातप्त- जनविश्रान्ति- दायिनी ।
सर्वोपनिष- दुद्- घुष्टा शान्त्यतीत- कलात्मिका ॥१५९॥
गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।
कल्पना- रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध- विग्रहा ॥१६०॥
कार्यकारण- निर्मुक्ता कामकेलि- तरङ्गिता ।
कनत्कनकता- टङ्का लीला- विग्रह- धारिणी ॥१६१॥
अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र- प्रसादिनी ।
अन्तर्मुख- समाराध्या बहिर्मुख- सुदुर्लभा ॥१६२॥
त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी ।
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥१६३॥ orसुधास्रुतिः
संसारपङ्क- निर्मग्न- समुद्धरण- पण्डिता ।
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान- स्वरूपिणी ॥१६४॥
धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य- विवर्धिनी ।
विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण- कारिणी ॥१६५॥
विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी ।
अयोनिर् योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥१६६॥
वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी ।
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥१६७॥
तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ- स्वरूपिणी ।
सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव- कुटुम्बिनी ॥१६८॥ orसोम्या
सव्यापसव्य- मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी ।
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥१६९॥
चैतन्यार्घ्य- समाराध्या चैतन्य- कुसुमप्रिया ।
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य- पाटला ॥१७०॥
दक्षिणा- दक्षिणाराध्या दरस्मेर- मुखाम्बुजा ।
कौलिनी- केवलाऽनर्घ्य- कैवल्य- पददायिनी ॥१७१॥
स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति- संस्तुत- वैभवा ।
मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥१७२॥
विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥१७३॥
व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।
पञ्चयज्ञ- प्रिया पञ्च- प्रेत- मञ्चाधिशायिनी ॥१७४॥
पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च- संख्योपचारिणी ।
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥१७५॥
धरा धरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥१७६॥
बन्धूक- कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी ।
सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥१७७॥
सुवासिन्यर्चन- प्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा ।
बिन्दु- तर्पण- सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥१७८॥
दशमुद्रा- समाराध्या त्रिपुराश्री- वशङ्करी ।
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय- स्वरूपिणी ॥१७९॥
योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा ।
अनघाऽद्भुत- चारित्रा वाञ्छितार्थ- प्रदायिनी ॥१८०॥
अभ्यासातिशय- ज्ञाता षडध्वातीत- रूपिणी ।
अव्याज- करुणा- मूर्तिर् अज्ञान- ध्वान्त- दीपिका ॥१८१॥
आबाल- गोप- विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य- शासना ।
श्रीचक्रराज- निलया श्रीमत्- त्रिपुरसुन्दरी ॥१८२॥
श्रीशिवा शिव- शक्त्यैक्य- रूपिणी ललिताम्बिका ।
एवं श्रीललिता देव्या नाम् नां साहस्रकं जगुः ।
॥ इति श्री ब्रह्माण्ड पुराणे उत्तरखण्डे श्री हयग्रीवागस्त्यसंवादे
श्रीललिता सहस्रनाम स्तोत्र कथनं सम्पूर्णम् ॥


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दीक्षित साधकों के लिए : श्रीयंत्र दैनिक पूजन विधि



Shri Yantra
साधारण गृहस्थ साधकों के लिए मान्य संक्षिप्त दैनिक पूजन पद्धति। इस पद्धति द्वारा गृहस्थ व्यक्ति नियमित पूजन कर सकते हैं। श्रीयंत्र दैनिक पूजन में श्रीयंत्र में स्थित नौ-आवरणों का पूजन किया जाता है। इस विधि में श्रीयंत्र के नौ आवरणों की जानकारी क्रमवार सरलता से चित्र सहित समझा दी गई है।घर, दुकान आदि में स्थापित श्रीयंत्र की दैनिक संक्षिप्त पूजा निम्न प्रकार से करें :-नोट :- ‘मूल मंत्र’ अर्थात अपनी-अपनी आम्नाय में गुरु द्वारा निर्दिष्ट त्री अक्षरी, चतुरक्षरी, पंच अक्षरी, षोडष अक्षरी मंत्र पहले बोलकर पश्चात पीछे का व्याक्यांश बोलें अथवा ‘मूल मंत्र’ अपनी राशि के अनुसार जान लें।त्रैलोक्यमोहन चक्र (प्रथम आवरण)चतुरस्य त्रिरेखायां अर्थात चतुरस्र की तीन रेखाओं पर ( दर्शाए गए चित्र के अनुसार) निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’- त्रैलोक्यमोहन चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्वसंक्षोभिणी मुद्रा दिखाएँ अथवा प्रणाम करें।
सर्वाशापरिपूरक चक्र (द्वितीय आवरण)
‘षोडषदल कमले’ अर्थात सोलह कमल दल पर (दर्शाए गए चित्र के अनुसार) निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’ सर्वाशापरिपूरक चक्राय नमः।
उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्वविद्रावण मुद्रा दिखाएँ अथवा प्रणाम करें।

सर्वसंक्षोभण चक्र (तृतीय आवरण)षोडष कमल दल के अन्दर अष्ट कमल दल पर (दर्शाए गए चित्र के अनुसार)निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’ सर्व संक्षोभण चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्वाकर्षिणी मुद्रा प्रदर्शित करें अथवा प्रणाम करें।
सर्व सौभाग्यदायक चक्र (चतुर्थ आवरण)अष्ट कमल दल के अंदर स्थित चौदह त्रिभुजों पर ( दर्शाए गए चित्र के अनुसार) निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’ सर्व सौभ्यदायक चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्ववशंकरी मुद्रा दिखाएँ अथवा प्रणाम करें।
सर्वार्थसाधक चक्र (पंचम आवरण)उक्त चौदह त्रिभुज के भीतर दस त्रिभुजों ( दर्शाए गए चित्र के अनुसार) में निम्नांकित मंत्र बोलकर पूजन करें (बहिर्दसार पूजन अर्थात बाह्य पूजन)

‘मूलमंत्र’ सर्वार्धसाधक चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प-अक्षत से पूजन करें।पश्चात्‌ सवोन्मादिनी मुद्रा दिखाएँ अथवा प्रणाम करें।
सर्वरक्षाकर चक्र (षष्ट आवरण)उन्ही के भीतर दस त्रिभुजों में (दर्शाए गए चित्र के अनुसार) निम्नांकित मंत्र बोलकर पूजन करें (अंतर्दसार पूजन अर्थात त्रिभुजों का आंतरिक पूजन) :-

‘मूलमंत्र’ सर्वरक्षाकर चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्वमहाअंकुश मुद्रा दिखाएँ अथवा प्रणाम करें।

सर्वरोगहर चक्र (सप्तम आवरण)उक्त दस त्रिभुजों के अंदर आठ त्रिभुजों (दर्शाए गए चित्र के अनुसार) में निम्नांकित मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’ सर्वरोगहर चक्राय नमःउक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्वखेचरी मुद्रा प्रदर्शित करें अथवा प्रणाम करें।
सर्वसिद्धिप्रद चक्र (अष्टम आवरण)उक्त आठ त्रिभुजों के भीतर स्थित त्रिभुज (दर्शाए गए चित्र के अनुसार) में निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’ सर्व सिद्धिप्रद चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प अक्षत से पूजन करें।
पश्चात्‌ सर्व बीजा मुद्रा प्रदर्शित करें अथवा प्रणाम करें।
सर्वानन्दमय चक्र (नवम आवरण)उक्त त्रिभुज के मध्य स्थित बिंदु पर (दर्शाए गए चित्र के अनुसार) निम्न मंत्र बोलकर पूजन करें :-

‘मूलमंत्र’ सर्वानन्दमय चक्राय नमः।उक्त मंत्र बोलकर गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन करें। पश्चात्‌ सर्वयोनि मुद्रा दिखाएँ अथवा प्रणाम करें।
उक्त नवावरण पूजा के पश्चात निम्न प्रकार से समग्र श्रीयंत्र का चंदन, पुष्प, धूप, दीप व नैवेद्य से पूजन करें :-
() निम्न मंत्र से चंदन अर्पित करें:-
‘लं’ पृथ्व्यात्मकं गंधम्‌ समर्पयामि।(इसके पश्चात कनिष्ठि का अग्रभाग व अंगुष्ठ मिलाकर पृथ्वी मुद्रा दिखाएँ।)
() निम्न मंत्र से पुष्प अर्पित करें :-
‘हं’ आकाशात्मकं पुष्पम्‌ समर्पयामि।(इसके पश्चात तर्जनी अग्रभाग व अंगुष्ठ मिलाकर आकाश मुद्रा दिखाएँ।)
() निम्न मंत्र से धूपबत्ती जलाकर उसका सुवासित धुआँ आघ्रापित करें-
‘यं’ वायव्यात्मकं धूपम्‌ आघ्रापयामि।(इसके पश्चात तर्जनी मूल भाग व अंगुष्ठ मिलाकर वायु मुद्रा दिखाएँ।)() निम्न मंत्र से दीपक प्रदर्शित करें। (इस हेतु किसी पात्र अथवा दीपक मेंशुद्ध घी में रूई की बत्ती डालकर उसे प्रज्वलित करें, हाथ धो लें) :-
‘रं’ अग्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि।(इसके पश्चात मध्यमा अग्रभाग व अंगुष्ठ मिलाकर अग्निमुद्रा दिखाएँ।)
() निम्न मंत्र से नैवेद्य के रुप में सूखे मेवे अथवा फल अर्पित करें :-
‘वं’ अमृतात्मकं नैवेद्यम्‌ निवेदयामि।(इसके पश्चात अनामिका अग्रभाग व अंगुष्ठ मिलाकर अमृतमुद्रा दिखाएँ।)
() निम्न मंत्र से लौंग, इलायची अथवा तांबूल अर्पित करें :-
‘सं’ सर्वात्मकं ताम्बूलादि सर्वोपचारं समर्पयामि।(इसके पश्चात चारों अंगुलियों के अग्रभाग को अंगुष्ठ से मिलाकर सर्वोपचार मुद्रा दिखाएँ।)


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